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Oct 1, 2024

कविताः तीर्थ के साथ आते हैं पिता

  - मधु बी. जोशी


पिता के साथ 

आता था हरिद्वार

लाख के सुन्दर गिट्टों में

सुगढ़ गंगाजलियों में

लकड़ी के लुभावने खिलौनों 

शंख की सुन्दर मालाओं में


प्रसाद भी लाते थे पिता

मीठे इलायचीदाने

फीके मुरमुरे

तुलसीदल और फूल


प्रसाद बड़े लोगों की चीज था

वे श्रद्धा से उसे माथे लगाते

फिर मुँह में डालते

हम तो यूँ ही चबा जाते

इलायचीदाने और मुरमुरे

रोज बेचता था मालीराम

तुलसीदल और फूल

हमारी बाड़ी में बहुत थे

बड़े हुए तो जाना 

हरिद्वार 

एक व्यावसायिक कस्बा है

मन्दिर हैं वहाँ, 

मठ भी

महन्त और दुकानदार भी

मीठे इलायचीदाने

फीके मुरमुरे

तुलसीदल और फूल

सभी तीर्थनगरों की 

साझी सौगात हैं

 

आज भी आता है तीर्थ

लाख के सुन्दर गिट्टों,

सुगढ़ गंगाजलियों

लकड़ी के लुभावने खिलौनों 

शंख की सुन्दर 

मालाओं के साथ

 

तीर्थ के साथ आते हैं पिता


कहानीः दहेज की रकम

  - प्रियंका गुप्ता

जाने कब किस मुहूर्त से शन्नो ज़िद पकड़े बैठी थी कि वह शादी करेगी, तो सिर्फ़ एहसान से, वरना ज़िंदगी भर कुँवारी बैठी रहेगी। घरवालों ने कितना समझाया, साम, दाम, दंड, भेद, हर फंडा अपनाकर देख लिया; पर लड़की को न मानना था, वह न मानी। गाहे- बगाहे माँ ने घूँसे थप्पड़ लगाए, भाइयों ने गालियाँ दीं...बाप चप्पल उतारकर मरने-मारने पर उतारू हो गया, पर मज़ाल है, करमजली टस से मस हुई हो। बात घर परिवार के बीच तक रहती, तो भी ग़नीमत थी, पर बेशर्म ने तो पूरे समाज में ढिंढोरा पीटकर रख दिया था। 

कितना अच्छा लड़का मिला था, उसके लिए...। दान-दहेज भले थोड़ा हैसियत से बढ़कर देना पड़ता, पर घरवाले अपनी इकलौती लाडली के लिए, ये भी करने को तैयार थे। थोड़ा कर्ज़ा चढ़ भी जाता, तो क्या, सिर से बोझ तो उतर जाता...और फिर किस बेटी के ब्याह पर थोड़ा बहुत जोड़-तोड़ नहीं बिठाना पड़ता? वह कोई अनोखी तो थी नहीं। न ही कहीं की राजकुमारी... न कोई हूर की परी, जिसे देखते ही कहीं का राजकुमार अपना दिल हार बैठे और मुफ़्त में ही उसे अपनी रानी बना ले...। 

पर शन्नो को तो मानो बहाना मिल गया उस लड़के को भगाने का...। पूरे परिवार को वो पसंद आ गई थी, पर जहाँ लेनदेन की बात शुरू हुई, एकदम बेहया की तरह लड़की बीच मे कूद पड़ी- सुनिए आप लोग, माँ-पिताजी चाहते थे कि मैं एक बार आपका लड़का देख लूँ, सो देख लिया...। आप लोगों ने मुझे पसंद कर लिया, इसका मतलब ये थोड़े न कि आपका ये छछून्दर जैसी पैदाइश मुझे भी पसंद है। ऊपर से आप लोग जितने दहेज की डिमांड कर रहे न, उतने में तो कोई अपनी दो बेटियों की शादी अच्छे तरीके से निपटा दे...। बेहतर होगा, अपनी तशरीफ़ का टोकरा अपने सिर पर रखिए और चुपचाप चलते-फिरते नज़र आइए।

शन्नो के माँ-बाबा ‘हें-हें, अरे-अरे’ करते हुए उसे रोकने की कोशिश करते रहे, पर उसे न रुकना था, न वह रुकी...। बंदी ने अपनी बात पूरी करके ही दम लिया। उसके बाद वे लोग लड़के वालों से हाथ जोड़-जोड़कर माफ़ी माँगते रहे, पर अपने औलाद के लिए ‘छछुन्दर’ और खुद के लिए ‘महा लालची’ जैसे सम्बोधन सुनने के बाद भला कौन माफ़ी देता है या रुकता है?

लड़के वाले तो जवाबी गालियाँ देते और उसकी सात पुश्तों को चिर कुँवारा मरने का शाप देते चले गए, पर उसके बाद शन्नो ने एहसान नाम रूपी जो एटम बम फेंका, उसका प्रहार झेल पाने में घरवालों को बहुत समय लगा जैसे...।

इकलौती लड़की ने नाक के नीचे से छुपकर नैन-मटक्का कर डाला, इतना बड़ा चैलेंज माँ को गश देकर गिराने के लिए काफी था। पिता शेर की तरह दहाड़ना चाहते थे, पर एक तो उनकी शेरनी बेहोश थी...दूसरे अभी-अभी रुख़सत हुए लड़के वालों के ज़ोर-ज़ोर से गरियाने की आवाज़ अभी भी फ़िज़ाओं में इस क़दर घुली थी कि आस-पड़ोस वालों ने सर्द मौसम की ज़रा भी परवाह किए बिना, न केवल अपने घरों की खिड़कियाँ खोल रखी थी; बल्कि कुछ अति-उत्साही लोगों ने 'हेल्थ इज़ वेल्थ' का अक्षरशः पालन करने के विचार से रात्रिकालीन भोजन के पश्चात् बाहर टहलकर उसे पचाने का भी अटल इरादा कर लिया था। शन्नो के दोनों बड़े भाइयों का खून तो शायद दो सौ डिग्री सेंटीग्रेड तक खौल गया था। पहली बात तो यह कि जो काम इतने दिनों से वे दोनों न कर सके, वह उनकी बहन ने जाने कब कर लिया...दूसरे, उससे भी बड़ी बात यह कि, इश्क़ किया सो किया...मुसलमान से काहे किया? उन दोनों का वश चलता, तो अभी ही शन्नो और उसके प्रेमी दोनों के हाथ पैर तोड़ डालते, पर एक तो अम्मा लुढ़की पड़ी थी, दूसरे बाऊजी का रवैया थोड़ा कंफ्यूजिंग था। किसी भी झमेले में सबसे पहले तो उनकी चिंघाड़ सुनाई पड़ जाती थी, लेकिन इतने बड़े मसले पर चुप्पी साधे वे सिर झुकाए अम्मा के सिरहाने बैठे थे।

जब घर का मुखिया ही ऐसे सन्नाटे में बैठा था, तो वो दोनों काहे फ़िज़ूल में उछल-कूद मचाते? पहले ये भी तो देखना था कि तेल किधर है और तेल की धार किधर है? पता चला वो दोनों बवाल मचा दें और इधर बाऊजी एकदम चुप्पे बने हुए, सिर झुकाए हुए अपनी लाडली की बात मान लें। फालतू में वे लोग ही दोनो तरफ की गुड बुक्स से बाहर हो जाएँ। यही सब सोचकर दोनों भाइयों ने आँखों ही आँखों में एक दूसरे को चुप रहने का इशारा किया और जल्दी जल्दी अम्मा के हाथ पैर मलकर उन्हें होश में लाने की जुगत में लग गए।

असली बवाल तो अम्मा के होश में आने पर हुआ, जब उन्होंने आँख खोलते ही शन्नो को सामने देखा और चीते की फुर्ती से बिस्तर से उठते ही, उस पर लपक पड़ी। घर के तीनों पुरुष सदस्य भी उनकी ऐसी लपक-चमक देख के जैसे मुँह बाये रह गए। माँ ने आव देखा न ताव, जो हाथ में समाया, उसका निशाना ताक- ताककर लड़की पर मारा। क्या जूता-चप्पल, क्या कुशन तकिए या फिर क्या गिलास कटोरी...हरेक चीज़ उस पर अस्त्र बनाकर फेंकी...। 

कुछ पल तो सब हतप्रभ थे, पर इससे पहले कि पड़ोसियों का पूरा जत्था यह फैमिली म्यूजिकल देखने उनके घर घुस आए, उन तीनों ने मिलकर उन्हें सम्हाल लिया। शन्नो इतने हमलों से जाने थोड़ा सदमे में थी, या ज़िद में...पर वो बिना हिले-डुले वहीं बैठी रही। पिता से ‘सुबह उससे बात करता हूँ, तुम चिंता न करो...’ का आश्वासन पाकर ही माँ सोई। न भी सोई हो, तो किसे पता, पर अभी दुनिया के सामने घर का तमाशा न बने, पिता की इतनी बात और मानकर वह चुपचाप आँख बंद करके लेट गईं। भाई लोग भी अपने कमरे में चले गए और शन्नो वहीं मूर्ति बनी हुई चुपचाप आँसू बहाती बैठी रही।

दूसरे दिन पिता अपनी आदत के विपरीत सचमुच शांत रहे। शन्नो को प्यार से समझाया, फिर थोड़ा कड़ाई से डाँटा... और उसके बाद भी जब वह न मानी, तो समाज की ऊँच-नीच समझाते हुए एहसान को लड़की बरगलाने के आरोप में जेल भिजवा देने की भी धमकी दे डाली; लेकिन शन्नो पर किसी बात का कोई असर नहीं हो रहा था। वो अपनी जिद पर अड़ी थी। वो और अहसान दोनों बालिग़ थे, सो कानून कुछ नहीं कर पाएगा। समाज में बदनामी की उसे कोई चिंता नहीं थी। घर परिवार छोड़ने को भी वो पूरी तरह तैयार थी... और अगर एहसान पर हल्की- सी आँच भी आई, तो वो सबको खुद जेल भिजवा देगी, पिता के डराने पर उसने बेधड़क यह धमकी भी दे डाली। 

"आप लोग हमें नहीं रोक सकते। ज़्यादा ज़ोर-जबरदस्ती कीजिएगा, तो पहला मौका मिलते ही भाग जाएँगे हम दोनों...कहीं दूर अनजान जगह जाकर शादी कर लेंगे। मेरी शक़्ल देखने तक को तरस जाइएगा... बता दे रहे बस...।" शन्नो अब तक इकलौती होने के कारण पिता के दिए लाड़ का नाजायज़ फायदा उठाने पर तुल आई थी।

बात सच भी थी। पूरे खानदान में दो पीढ़ियों बाद कोई लड़की हुई थी, तो वो थी शन्नो...। पर अगर वो बहुत दुलारी थी, तो खानदान की इज्ज़त उससे भी ज़्यादा अजीज़ थी उनको...। कोई तो हल निकालना ही पड़ेगा, जिससे साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। 

दूसरा दिन बीता, फिर तीसरा भी बीत गया। घर में मनहूसियत छाई हुई थी। इस बीच भाई लोगों ने एहसान का भी पता लगा लिया था। कहाँ रहता है, क्या करता है, घर में कौन-कौन है...सारी कुंडली एकदम डिटेल में...। अब रात को माँ -बेटी जब चुप्पी की चादर ओढ़े सो जातीं, बाप और दोनों भाई सिर से सिर जोड़कर बैठ जाते। कई सुझाव रखे जाते और तीनों में से कोई न कोई उसमें कोई ख़ामी निकालकर खारिज़ कर देता। जैसे जैसे दिन ख़त्म होते जा रहे थे, शन्नो की ज़िद बढ़ती जा रही थी। खानदान की इज्ज़त पर सरेआम बट्टा लगने का भी ख़तरा दुधारी तलवार की तरह पिता के सिर पर लटक रहा था। जिस तरफ भी झुके, घायल तो होना ही था।

आखिरकार क़िस्मत ने ही एक दिन इसका हल निकाल दिया। सुबह- सवेरे जब मोहल्ले वालों को उनके घर से माँ के रोने-पीटने की आवाज़ सुनाई दी, तो दरयाफ़्त करने पर पता चला, रात में जाने कब बिटिया रसोई में पानी पीने के लिए अपने कमरे से नीचे आ रही थी कि पैर फिसला और वो हमेशा के लिए सबको छोड़कर बहुत दूर चली गई। सुबह माँ जब सोकर उठी, तब  बेटी की जगह उसकी ठंडी लाश देखकर अपने होशो-हवास खो बैठी।

सुनने वालों के दिल से आह निकल गई। जवान-जहान बेटी की डोली की जगह घर से अर्थी निकलने की नौबत आए, तो भला कौन ऐसा पत्थर दिल होगा जिसका कलेजा चाक न हो जाए...?

दस्तूर और कायदे के हिसाब से दुनियावाले भी आए और पुलिस भी...। सब काम नियमानुसार निपटने के बाद पुलिस ने भी इसे महज एक एक्सीडेंट मानते हुए केस बंद कर दिया। कुछ दिन बीतते-बीतते सब कुछ सामान्य हो गया। 

शन्नो की मौत के बारे में पता चलने पर एहसान उसे आखिरी विदा देने आया या नहीं, इस पर मोहल्ले वालों की दबी जुबान में अलग-अलग राय थी...।

एहसान वाली बात तो चाहे कुछ भी रही हो, पर उससे भी ज़्यादा विश्वास के साथ कुछ भरोसेमंद लोगों की एक राय तो बिल्कुल पक्की थी...भले ही आपस में फुसफुसाहट के रूप में वह राय बाहर आती हो कि सीढ़ियों पर पुलिस को तेल के निशान मिले तो थे, पर आखिरकार दहेज की जोड़ी हुई रकम उसी के काम निपटाने में ही काम आई...।

सम्पर्कः ‘प्रेमांगन’, एम.आई.जी-292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना संख्या-एक, कल्याणपुर, कानपुर- 208017 (उ.प्र) ,  मो. 09919025046

कविताः सुनो स्त्री!

  
- डॉ. शिप्रा मिश्रा 

कब तक दौड़ोगी 

कब तक भागोगी

कब तक उड़ोगी


सुनो स्त्री!

अपनी बाहों में 

क्या सृष्टि बाँध लोगी?


फुनगियों पर बैठने की 

ख्वाहिश लिए 

कब तक जियोगी?


नीचे तो उतरो

अपनी जड़ों से मिलो


तुम्हें पता है न

संचार नीचे से 

ऊपर की ओर होता है


केवल विस्तार ही 

उद्देश्य नहीं

जीवन का

संक्षिप्त होना भी है


अंधेरी सुनसान रातों में 

अकेला सफर और 

तमाम अनसुलझे सवाल


चौराहे पर खड़ी ज़िन्दगी 

दिशा बताए कौन

कुछ प्रश्न सोने नहीं देते 


काश कुछ दिन और ठहर जाते

शायद बुझ जाती 

सारी जिज्ञासाएँ


बहुत कुछ है अनकहा

कह दूँ तो विवाद हो जाए

न कहूँ तो 

अंतर्मन छलनी होता है


रीत गईं

रिक्त कर गईं

मेरी हथेलियों के

वे सभी भाव- पुष्प


क्या अब भी

कुछ शेष है!

मेरी संवेदनाएँ..


व्यंग्यः आरोप के कारोबार में संभावनाएँ बहुत हैं

 - अखतर अली

जो युवा बिलकुल भी पढ़े लिखे नहीं है और वो किसी क्षेत्र में कैरियर बनाना चाहते हैं तो उन्हें आरोप निर्माण के क्षेत्र में किस्मत आज़माना चाहिए । इसमें शिक्षा और प्रशिक्षण की कोई ज़रूरत नहीं हैं आपको बस बकवास करना आना चाहिए।

यह जो आरोप है यह लगाने के काम आता है । जैसे दीवार पर पोस्टर , गिफ्ट पैकेट में स्टीकर लगाया जाता है, चलिए बात को मैं और स्पष्ट कर देता हूँ जैसे चूना लगाया जाता है, वैसे ही आरोप लगाया जाता है । सियासत की मंडी में बारहों महीना आरोप की अच्छी मांग रहती है ।

आरोप ज़्यादातर नेताओं पर लगाए जाते हैं । असली नेता वही है जो आरोपों से लदा हो । वह नेता भी कोई नेता है जिस पर आज तक कोई आरोप न लगा हो । अगर नेता को दोनों सिरे से पकड़ कर निचोड़ा जाए , तो उसमें से आरोप ही आरोप निकलेंगे । यह बिलकुल शतरंज के खेल की तरह का खेल होता है इसे दो लोग मिल कर खेलते हैं एक वह जो आरोप लगाता है और एक वह जिस पर आरोप लगता है ।

जिस पर आरोप लगाया जाता है वह हमेशा आरोप को नकार देता है और चुनौती देता है कि अगर आरोप सच साबित हो गया तो वह पद से स्तीफा दे देगा । कोई ज़्यादा जोश में आ जाता है तो कहता है राजनीति से सन्यास ले लूँगा । कभी ऐसा भी होता है कि जिस पर आरोप लगता है, वह कोई स्पष्टीकरण तो नहीं देता, उल्टा पलटवार करते हुए कहता है पहले अपना घर संभालों ।

आरोप के उत्पादन में बिक्री की कोई समस्या नही है। इसका बाज़ार बहुत बड़ा है । ज़मीन के जिस जिस हिस्से में नेता बसते हैं वहाँ- वहाँ आरोप की खपत होती है और ज़मीन का ऐसा कोई हिस्सा नही हैं जहाँ नेता न रहते हो । इसके उत्पादन में क्व़ालिटी मेंटेन करने की कोई समस्या नही क्योंकि आरोप जितना घटिया रहेगा वह उतना ही अच्छा माना जाता है ।

आरोप के उत्पादन के साथ- साथ आरोप लगाने की ट्रेनिंग भी देने का काम शुरू किया जा सकता है । पार्टी में कुछ लोगों की नियुक्ति सिर्फ़ आरोप लगाने के लिए  ही की जाती है । दिन निकलते ही वो चार विरोधियों पर पहले आरोप लगा देते हैं फिर ब्रश करने जाते हैं । आरोप लगाने में प्रेजेंटेशन का महत्त्व होता है, जो आरोप सही समय, पर सही आदमी पर लगाए  जाते हैं। बस वही आरोप, आरोप कहलाते हैं । आरोप लगाने में टाइमिंग का सही इस्तेमाल होना चाहिए। आरोप टाइम बम की तरह होता है, जिसमें उसके फटने का टाइम सेट कर दिया जाता है। बम की तरह आरोप में भी बुद्धि नही होती। ये दूसरे की बुद्धि के अनुसार काम करते हैं ।

हर आरोप एक बयान होता है और हर बयान में एक आरोप मौजूद होता है । आरोप की ज़मीन बहुत बड़ी होती है। नफ़रत, अलगाव, हिंसा, जांच, इस्तीफ़ा सब इसी इलाके में बसे हैं । आरोप के रूप में उपेक्षितों को एक सहारा मिला है ज़िंदगी के लिए  ।

जब किसी नेता पर कोई ज़बरदस्त आरोप लगता है तो अन्य नेता तड़प जाते है और मन ही मन सोचते हैं काश यह आरोप मेरे पर लगा होता तो इलेक्ट्रानिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, सोशल मीडिया चारो तरफ़ बस मैं ही मैं होता । इस आरोप से मेरे मरुस्थली जीवन में बहार आ सकती थी ।

ऐसा कोई भी नेता, जिसके ऊपर कभी कोई आरोप नही लगा हो, उसे योग्य नेता नही माना जाता । ऐसी साफ़- सुथरी छवि वालों को पार्टी भी महत्त्व नही देती;  क्योंकि पार्टी को चाहिए  चलता पुर्जा । अतः जब किसी नेता पर बहुत दिनों तक कोई आरोप नही लगता और इससे उसकी छबि धूमिल होने लगती है तो वह पेमेंट देकर अपने ऊपर कोई ऐसा आरोप लगवाता है कि चारों दिशाओं में बस उसी के चर्चे होते हैं ।

बीमार नेता पर जब कोई दवा असर नहीं कर रही थी, तब उनके सचिव ने कहा- अब तो बस आरोप का ही सहारा है । इस समय इन पर कोई गंभीर आरोप लग जाए तो इन्हें नया जीवन मिल सकता है । नेता का आरोप से रिश्ता वही होता है जो रिश्ता प्यासे से पानी का होता है ।

आरोप लगाने में बेहतर प्रबंधन का प्रदर्शन होता है । आरोप कद नापने का यंत्र भी है । अनाड़ी आरोपकर्ता छोटे नेता पर बड़ा आरोप और बड़े नेता पर छोटा आरोप लगा देते हैं यह अच्छा प्रदर्शन नहीं है । इसीलिए  मैंने ऊपर प्रशिक्षण की बात कही है ।

यौन शोषण का आरोप .... यह आरोप की दुनिया की कालजयी कृति है । इसे किसी भी उम्र के नेता पर सुगमतापूर्वक लगाया जा सकता है। इसमें करियर तबाह हो जाने की गारंटी है, बस इसमें प्रबंधन ज़बरदस्त होना चाहिए, ताकि जिसकी सहमति थी वही इसे ज़बरदस्ती कहे । आरोप को मुख्यतः दो भागों में बाटा जाता है - चुनाव के पहले के आरोप और चुनाव के बाद के आरोप । मुँह पर लगे आरोप के धब्बों को आँसुओं से धोने की परम्परा नहीं है । कार्यकर्ता, समर्थक, विचारधारा, पार्टी में बदलाव होता रहता है लेकिन तमाशा सियासत के मदारी का खत्म नहीं होता ।

यदि आरोप मैनुफेक्चरिंग कम्पनी स्टॉक मार्केट में सूचीबद्ध हो गई तो बढ़िया रिटर्न की गारंटी दी जा सकेगी। आप तो खुले आम आरोप बनाओ और बेचो व्यंग्यकार के अतिरिक्त कोई और आप का कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

सम्पर्कः निकट मेडी हेल्थ हाँस्पिटल, आमानाका, रायपुर (छत्तीसगढ़) 492010, मो.न. 9826126781


रत्नकुमार साँभरिया की दो लघुकथाएँ

1. फूल
ओह! आज तो मन्दिर जाने में देर हो गई ।दादी माँ ने दीवार घड़ी की ओर देखा। वे उतावली में गमले में लगे गुलाब के फूल को तोड़ने के लिए आगे बढ़ीं, तो उनका पाँचेक साल का पोता जिद कर बैठा कि फूल वह लेगा । दादी माँ ने जब उसे फूल न लेने के लिए कहा, तो वह रो-रोकर जिद पकड़ गया। वे उसको दुलारती हुई कहने लगीं-बेटे ,मैं तुम्हें ऐसे ही फूल मँगवा दूँगी; लेकिन ये अपने घर के गुलाब हैं, मैंने इनको भगवान् के लिए रखा हुआ है।”

रोते-रोते बच्चे की साँस फूलने लगी थीं। दादी माँ की पूजा और बच्चे की ज़िद को लेकर पूरा परिवार दो खेमों में बँट गया था । कुछ का मानना था -बच्चे भगवान् का रूप होते हैं । फूल…। परिवार के दूसरे लोग कुपित थे कि दादी माँ की पूजा में विघ्न पड़ा तो, भगवान् नाराज़ होंगे ।

दादी माँ ने जब फूलों की ओर देखा, तो उनकी आँखें वहीं रुक गईं। फूलों का व्यथित मन मानों कह रह था-आदमी भी कितना नासमझ है ! वह अपने हाथों बनाए भगवान् के सामने खुद गिड़गिड़ाता है, हमें सूख-सूखकर मरने के लिए उसके चरणों में फेंक आता है ।

दादी माँ मानो सोकर जागीं । फूल लेकर बच्चे के हाथ में थमाया। और आँसुओं से धुले उसके गालों को चूमने लगी।




2. अन्तर

घोड़े की पीठ पर दिनभर पड़ी चाबुकें नील बनकर उभर आईं थीं। उसके एक–एक रोएँ में लहू चुहचुहा रहा था। वह टीस के मारे बार–बार पैर पटकता था, गर्दन झटकता था। घोड़ा पीठ के असहनीय दर्द को आँसुओं में बहा देना चाहता था, भूखी कुलबुलाती अंतड़ियों ने उसे चारे में थूथन गड़ाने के लिए विवश कर दिया।

एकाएक घोड़े की गीली आँखें अपने मालिक की ओर घूमीं। वह घोड़े के पास ही चारपाई डाले बैठा था और चाबुक से छिली अपनी हथेली पर मेहंदी लगा रहा था। घोड़े का मन व्यथित हो गया। उसकी आँखें डबडबा आईं। वह चारा छोड़कर थोड़ा आगे बढ़ा। घोड़ा चाबुक से आहत अपने मालिक की हथेली को अपनी नर्म–नर्म जीभ से सहलाने लगा था।