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Apr 1, 2024

कहानीः नजर बट्टू

  - ज्योति जैन

‘‘जल्दी से लाओ यार... लपक के भूख लग रही है...’’ दोनों हाथों को आपस में रगड़ते हुए नव्या ने कहा। मानो दोनों हथेलियाँ रगड़ने से जिन्न प्रकट होगा और नाश्ता उसके हाथों में।

‘‘हाँ यार... मुझे तो उसल की खुशबू से ही मुँह में पानी आ रहा है...’’ पलक ने नाक से गहरी सांस ली और आँखें बंद करके मानों उसल का स्वाद ले रही थी।

‘‘ओ भई... अपने को तो पहले जलेबी...’’ तन्मय की बात बीच में ही काटकर स्वीटी ने ‘‘ऽऽ.....’’ बिल्कुल विज्ञापन वाले बच्चे के अंदाज में ‘‘जलेबीऽऽऽ’’ कहा...’’ और सब खिलखिला कर हँस पड़े।

तब तक अंकित, गगन और इंदर गरम-गरम नाश्ता ले आऐ। जिनमें पोहे, उसल व जलेबी शामिल थे। 

‘‘ओ भई प्याज-नींबू अलग से...’’ स्वीटी चिल्लाई।

‘‘ठण्ड रख बेटा... ला रहा हूँ...’’ इंदर बिल्कुल बड़ों जैसी स्टाईल में बोला।

सबने फिर ठहाका लगाया।

वो एक 7-8 जनों का ग्रुप था , जो पढ़ाई में अंतिम वर्ष में था। और सब उस रविवार की ठण्डी सुबह में खाऊ ठिये पर नाश्ते का आनन्द लेने आए थे।

पहले एक-डेढ़ मिनट में तो सब चुपचाप सूतने में लग गए। पेट में जब थोड़ा वजन पड़ा तो बातचीत का क्रम फिर शुरू हो गया।

‘‘अबे... क्या पेटू की तरह खाए जा रहा है...’’ यह स्वीटी थी, जो अंकित को टारगेट बना रही थी। ‘‘तेरे झाँसी में खाने को नहीं मिलता क्या......?’’

‘‘ऐ... अपने शहर के बारे में कुछ नहीं बोलना हो... झाँसी की रानी...’’

और सब फिर हँस पड़े। बड़ी मस्त जिन्दगी लगती है वो, जब लोग बात-बात पर हँस दें। आजकल तो हँसी से भरी जिन्दगी कम ही नजर आती है।

‘‘सही है रे झाँसी की रानी...’’ अब नव्या ने छेड़ा ‘‘बेचारे को नजर मत लगा...’’ ‘‘देख तो कितना दुबला हो रहा है’’ और उसने हथेली के पृष्ठ भाग से उसकी हल्की उभरती ‘टमी’ पर धीरे से हाथ मारा।

फिर बिंदास ठकाहा गूंज उठा था।

‘‘अरे नजर से याद आया... पलक ने नव्या से पूछा तेरे पैर में यह काला धागा नजर के लिए ही बंधा है क्या...?’’ सबकी नजर नव्या के पैरों पर चली गई। उसके खुबसूरत, नाजुक पैरों में से बायें पैर में एक काला धागा बंधा था।

‘‘हाँ यार... नव्या ने एक सांस भरकर कहा - ‘‘दादी ने बंधवाया है। बीच में मुझे वायरल हो गया था ना। तब से तबियत कुछ ज्यादा ही बिगड़ गई थी। बस...... दादी को लगा कि मुझे नजर लग गई है। और उन्होंने पता नहीं कहाँ से मंत्रा कर यह ‘नजर बट्टू’ बाँध दिया।’’

’’तुझे लगता है यह नजर-वजर कुछ होती है...’’ स्वीटी ने पूछा। वह जरा अलग सोच वाली लड़की थी।

‘‘देख यार... जवाब इन्दर ने दिया।... नजर होती है या नहीं, इससे बड़ी यह चीज है कि यह हमारे बड़ों की आस्था होती है... हमारे लिए प्यार व फिक्र होती है... मैंने कहीं एक कविता पढ़ी थी, ऐसी कुछ थी कि

माँ ने नजर से बचाने को

काले धागे बाँध दिये

पर वो नहीं जानती कि

ताकत काले धागे में नहीं

खुद माँ की उंगलियों में है...

ऐसी कुछ थी... कविता से इंदर ने अपनी बात पूरी की।

‘‘वा...वा......ऽऽ बहुत खूब... अंकित बोल पड़ा... ‘‘तो ऐसा है कि मेरे खाने को कोई नजर न लगे इसलिए मैं भी माँ से धागा बंधवा कर आऊँगा अगली बार... क्या कहते हैं इसे...? नजर बट्टू ना...?

खाऊ ठिये पर फिर ठहाका गूँज उठा।

‘‘और इसी बात पर एक समोसा लेने जा रहा हूँ और कोई खाएगा क्या...? कहते हुए अंकित उठा।

‘‘रुक मैं भी आ रहा हूँ’’ और इंदर उसके पीछे-पीछे चला गया, तभी... उन 4-5 बच्चों का झुण्ड उन लोगों के थोड़ा और करीब खिसक आया , जो काफी देर से थोड़ी दूर खड़े थे। शायद इस उम्मीद से कि अब बचा-खुचा कुछ तो मिल ही जाएगा।

दोस्तों की टोली का ध्यान उन बच्चों की ओर गया तो एक-दो बच्चों ने कहा - ‘‘भैया-दीदी कुछ खाने को दिला दो ना... भूख लगी है।’’

आजकल की युवा पीढ़ी को शायद हम ठीक से समझ नहीं पाते हैं। ये लोग जीवन को जीना जानते हैं, काटना नहीं। देने का सुख भी यह पीढ़ी शायद बेहतर जानती है। इसीलिए लेने से ज्यादा देने में यकीन रखती है।

स्वीटी, पलक, तन्मय... सभी ने एक दूसरे की आँखों में देखा और शायद सब, सबकी बात समझ गए। दो-तीन दोस्त अंकित व इंदर के पास गए और उन्होंने दुकानदार से उन भिक्षुक बच्चों को पाँच पैकेट पोहे और पाव भर जलेबी देने को कहकर पेमेन्ट कर दिया।

धूल-गंदगी से काले पड़े बच्चों के चेहरों पर सफेद आँखें चमकीली हो उठी। गरम पोहे, जलेबी मिलेंगे इस विचार ने ही उनकी ठंड भगा दी।

दोस्तों की टोली नाश्ते को ‘दी एण्ड’ करती पार्किंग की ओर बढ़ गई।

वे पाँचों बच्चे ललचाई निगाहों से अपने हाथ में आने वाले पैकेट का इन्तजार कर रहे थे, लेकिन दुकानदार को उन्हें देने की कोई जल्दी नहीं थी। मानो उससे ही भीख ले रहे थे।

बड़ी हिकारत से उसने पूरा समय लेकर खाने की पुड़ियाँ उन बच्चों के हाथों में पटक दीं।

‘‘नीम्बू...? नीम्बू... तो अलग से देओ ना अंकल जी’’। एक बच्चे ने हिम्मत करके कहा।

‘‘नीम्बू चाहिए... स्याले चल भाग... पता नहीं है दस रुपये के दो है... भागों यहाँ से। इतना मिल गया है ना... चल भाग...’’ और उसने दुत्कार दिया...।

पाँचों बच्चों ने पोहे की पाँचों पुड़िया व जलेबी का पैकेट एक मटमैले झोले में डाला व एक ओर दौड़ लगा ली।

पार्किंग स्थल से सटी एक जगह थी, जहाँ वे पाँचों आराम से नीचे जमीन पर बैठ गए और लपलपाती जीभ व चमकीली आँखों से पाँचों ने अपनी-अपनी पोहे की पुड़िया अपने हाथों में ले ली। इसके बावजूद खोलने की कोई जल्दी नहीं थी। ये आश्चर्य की बात थी। दरअसल सबकों नीम्बू की कमी खटक रही थी। पाँच में से तीन तो ऐसे थे जिन्हें नींबू का स्वाद बड़ा भाता था। उनमें से एक , जो लीडर टाइप था या उसकी अगुवाई वही करता था, (कुछ लोग यों ही कहते हैं कि गरीब ईमानदार नहीं होते)/(कौन कहता है गरीबी ईमानदार नहीं होती?) उसने ईमानदारी से जलेबी के पाँच हिस्से करके सबकों देते हुए कहा - ‘‘अब बिना नींबू के ही खाले रे... मिला , जो ही भोत है।’’

‘‘रुक जरा...’’ नींबू के लिए जिसने दुकानदार से कहा था वो बच्चा बोला - ‘‘रुकना सब... मैं अब्बी आया...’’

और वो एक ओर भाग लिया। मिनट भर में लौटा तो उसके हाथ में चार फांक कटे कुछ नींबू थे।

‘‘वाह...’’ सबको मजा आ गया।

‘‘कां से लाए रे फत्तू...? वो अंकल से...?

‘‘नई रे... वो कां देता...!’’ विजयी मुस्कान से वो बोला। आखिर नींबू तो वो ही लाया था ना।

‘‘अपन वो चौराहे से आ रहे थे ना... तभी मैंने देखा था। सड़क पे पड़े थे... कोई डाल गिया था। वो ही उठा लाया।’’

मैले थेले से नींबू पोंछकर पोहे में निचोड़ते हुए वो बोला। और पहला कौर खाते ही उसने अपार तृप्ति से आँखे बंद करते हुए नींबू का स्वाद लिया।

इस सारे घटनाक्रम का साक्षी पार्किंग में खड़ा उन दोस्तों का ग्रुप था जिसने इन बच्चों को नाश्ता दिलवाया था। वे सब पर्किंग के पास ही खड़े बतिया रहे थे। और अब सब खामोश थे।

उन सबसे वे बेखबर वे भिक्षुक बच्चे नींबू पोहे व जलेबी का आनन्द ले रहे थे।

‘‘यार... क्या लाइफ़ है ना इनकी...’’ पलक का गला भर आया था।

‘‘हाँ यार... बेचारे... अपन तो कितनी अच्छी जगह है ना...? हमें , जो मिला है, उसके लिए भगवान का धन्यवाद करना चाहिए।’’ इंदर बोला।

‘‘पर एक बात बता यार...’’ अंकित असमंजस में था। ‘‘ये , जो नींबू उठाकर लाए वे किसी ने नजर उतारने के बाद चौराहे पर लाकर काटकर डाले होंगे... इन्हें तो नजर नहीं लग जाएगी?’’

‘‘नहीं लगेगी... तन्मय का स्वर गंभीर था...’’ ‘‘जिन्हें गरीबी लगी हो, उन्हें कोई और नजर क्या लगेगी...?

ठण्डी सांस ले उसल पोहे का स्वाद भूल वे दोस्त अब जिन्दगी के विभिन्न स्वाद के बारे में बात कर रहे थे और इन सबसे बेखबर वे भिक्षुक बच्चे नजर बट्टू नींबू का स्वाद ले रहे थे।

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सम्पर्कः 1432/24, नन्दानगर, इन्दौर-452011, मो.93003-18182, e-mail : jyotijain218@gmail.com


कविताः बकरी

 - हरभगवान चावला





बकरी - 1

बकरी ने कभी शहर नहीं देखा था 

पर उसने जाये थे, जितने भी मेमने 

वे सब शहर गए थे 

और कभी लौटकर नहीं आए थे ।

बकरी - 2

अचानक किसी दिन 

बकरी के देखते-देखते 

ग़ायब हो जाता है 

उसका बच्चा 

बकरी उसे खोजती है 

हर संभावित जगह पर 

नहीं मिलता तो 

उसकी जान की ख़ैर मनाती है

और मनाती ही रहती है 

उसके मर जाने के बाद भी ।

सम्पर्कः 406, सेक्टर-20, सिरसा-125055 ( हरियाणा)

किताबें - उदासी की चुप्पी को झकझोरती संवेदना की गूँज

  - अरुणेन्द्र नाथ वर्मा

तुम क्यों उदास हो (कहानी संग्रह- कुलबीर  बड़ेसरों) हिन्दी में अनुवाद : सुभाष नीरव, संस्करण: 2023, पृष्ठ संख्या 128,  मूल्य 200/-, प्रकाशक : नीरज बुक सेंटर,  सी-22, आर्यनगर, सोसायटी , प्लॉट -91, दिल्ली-110092

कुलबीर बड़ेसरों मूलतः पंजाबी साहित्य व अभिनय कला से जुड़ी हुई हैं। ‘तुम क्यों उदास हो’ पंजाबी भाषा में लिखे गए उनके कहानी संग्रह का हिन्दी- अनुवाद है। अनुवादक हैं सुपरिचित कथाकार एवं कवि सुभाष नीरव।

‘तुम क्यों उदास हो’ संग्रह की कहानियाँ तीन अलग-अलग पृष्ठभूमियों के कथानकों पर आधारित हैं। तीनों कुलबीर के भोगे हुए यथार्थ को प्रतिध्वनित करती हैं। कुलबीर  का निजी जीवन एक विशाल फलक पर उकेरे गए चित्रों से मिलकर बना है, जिनके सारे रंग इन्द्रधनुषी नहीं हैं। कई चित्र भूरे और धूमिल रंगों में भी हैं; लेकिन उनका अपना विशिष्ट सौन्दर्य है। बचपन बिताया उन्होंने धरती की सोंधी महक से गमकते पंजाब में अपने काव्यरसिक पिता की कविताओं का आस्वादन करते हुए। कविता के अंकुर उनके संवेदनशील मन में स्वतः फूट पड़े थे लेकिन कविता का भावनात्मक पक्ष उन्हें बहुत अधिक बाँधकर नहीं रख पाया। यथार्थ की कड़ी भूमि पर चलते जाना उन्हें स्वप्निल उड़ानें भरने से अधिक प्रिय लगा, तभी शब्दों से खेलने की जगह वह पंजाब के रेडियो और दूरदर्शन के नाटकों से गुज़रती हुई मुंबई की फ़िल्मी दुनिया तक का सफ़र पूरा करने के लिए चल पड़ीं। बहुत सारी फिल्मों में अभिनय किया उन्होंने; लेकिन हिन्दी और पंजाबी फिल्मों की रूमानी दुनिया के पीछे छुपे हुए संघर्षों, आँसुओं, ध्वस्त अभिलाषाओं और निष्ठुर चूहादौड़ ने उनके संवेदनशील हृदय को बार-बार झिंझोड़ा। जगमगाते रजतपट की आड़ में जूनियर कलाकारों के आत्मसम्मान और आकांक्षाओं को निष्ठुरता से ठोकर मारती निष्ठुर फ़िल्मी दुनिया का असली चेहरा उनकी कई कहानियों में जीवंत हुआ है।

 इनका एक अन्य संसार भी है, जो पंजाब में जिला होशियारपुर के गाँव बड़ेसरों को कुलबीर के नाम के साथ जोड़कर बहुतों के संज्ञान में आया है। इस पंजाब की सीमाएँ बड़ी भरजाई जी के लन्दन के व्हाईटहाल और मासी जी के कैनेडा तक फैली हुई हैं। कुलबीर की कहानियों का दूसरा आयाम है यह विशाल पंजाब , जो कभी अथक श्रम से कमाए यूरो की थैली हाथों में थामकर घमंड से देखता है, पीछे छूटे अपनों को तो कभी घुट्टी में पिलाई हुई आत्मीयता के चलते स्वजनों की पीड़ा महसूस करके मजबूर हो जाता है। ऐसे बहुरंगी रचना संसार ने कुलबीर  की कहानियों को सहज पठनीय बना दिया है। विषय वैविध्य से इस संग्रह की कहानियों बहुत जीवंत बन गई हैं।

कुलबीर  का तीसरा संसार है, एक नारी का। लेखक हो, अभिनेता हो या दुनिया घूमता हुआ एक सैलानी, इन सारे मुखौटों के पीछे एक संवेदनशील नारी का चेहरा है। कुलबीर  के इन तीनों संसारों का जायजा लेने पर सबसे अधिक मर्मस्पर्शी लगती हैं फ़िल्मी दुनिया वाली कहानियाँ। वे उस बेमुरव्वत संसार की कहानियाँ हैं , जो फर्श से अर्श तक पहुँचने के सपने देखती लाखों आँखों में आँसू भर देने से झिझकता नहीं। जगमगाते सितारे बन पाने की जगह जुगनुओं की तरह टिमटिमा कर रह गए अभागों के आक्रोश को एक झन्नाटेदार थप्पड़ में समेट लेने वाली कहानी ‘आक्रोश’ हो या ‘मजबूरी’ में हर तरह की हेठी सहने वाली जूनियर कलाकार नीति की मन मसोसती दास्तान, दोनों कड़वे यथार्थ को खूबसूरती से दिखाती हैं। खूबसूरती और कड़वापन परस्पर विरोधी तत्त्व लग सकते हैं; लेकिन सोने और सुहागे को अलग अलग करके देखना समझदारों का काम नहीं।

फ़िल्म-जगत से जुड़ी इस लेखिका की कहानियों में आज के पंजाब की माटी की सुगंध भी है; लेकिन इस पंजाब की सीमाएँ ‘कैनेडा’ से लेकर होशियारपुर के ‘पिंड’ बडेसरों तक फैली हुई हैं। सात समन्दरों के बीच की दूरी कुलबीर की किस्सागोई में सिमटकर नामालूम-सी हो जाती है। नारी-विमर्श का झंडा फहराते हुए विद्रोह के स्वर गुँजाना कुलबीर की शैली नहीं। कुछ कहने को आतुर; लेकिन कुछ भी न कह पाने की विवशता में जकड़ी हुई नारी पात्र के मन में गहरी डुबकी लगाने वाला ही किसी कहानी का अंत इन शब्दों में कर सकता है- “पहली बार मेरे एक्सीडेंट की बात सुनते हुए किसी ने कहा है ‘फिर’, नहीं तो –‘उसके होंठ काँपे और आँखें भर आईं। बेड पर लेटे हुए उसको लगा सामने बैठी हुई औरत और कोई नहीं, वह खुद ही थी.’ न कह पाना बहुत कुछ कह पाने से अधिक प्रभावशाली कैसे हो सकता है इसे ‘फिर’ कहानी को पढ़कर ही महसूस किया जा सकता है। असल में, इस संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ समझी जाने वाली नहीं अपितु महसूस की जाने वाली हैं। नारी मन की परतों को भेदकर उसकी उच्छवास संवेदना की सतह पर लाना ही कुलबीर  का नारी-विमर्श है। मद्धिम आग में पकाई हुई संवेदना की ऊष्मा नारी-विमर्श के कई गरजने-बरसने वाले झंडाबरदारों की गरज-बरस पर भारी पड़ सकती है, इसका एहसास कुलबीर की कई कहानियों से होता है।

पुरुष पात्रों की तरह इन कहानियों के नारी पात्र भी तरह तरह के साँचों में ढले हुए हैं। एक तरफ है ‘बहू-सास’ की उदास तरुणी बलबीर और दूसरी तरफ है ‘दो औरतें’ की हरलीन। दोनों की मानसिकता बहुत फर्क है, समानता है,तो बस यह कि दोनों को एक सशक्त कलम ने अपनी नायिका चुना है। इस संग्रह की सारी कहानियाँ पठनीय हैं। पाठक के मन को छू लेने का सिलसिला पहली कहानी ‘तुम क्यों उदास हो’ से लेकर लगभग अंत में आई ‘बकबक’ तक बना हुआ है।

पंजाबी की इन कहानियों को हिन्दी भाषी पाठकों तक लाने में अनुवादक सुभाष नीरव ने उनकी मौलिक सुन्दरता खूब बनाए रखी है। पंजाबी हो या हिन्दी, टकसाली शब्दों का इस्तेमाल सुन्दर शैली को सहज पठनीयता की चुन्नी ओढ़ाकर और खूबसूरत बना देता है। सुभाष इस सच्चाई से परिचित हैं।

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. व्यंग्यः ट्रेम्पोलीन में कूद झमाझम

 - बी. एल. आच्छा

मजेदार होता है ट्रेम्पोलिन | बड़े होने पर तो कूदना शरमा देता है। मगर शादी में यह महाखिलौना मुफ्त झमाझम कूद का आनन्दोत्सव बन जाता है। उसके भीतर का स्पंज इतना उचकाता है,  गिराता है और उठाता है कि बच्चों की रग-रग खिल जाती है। सोशल मीडिया के ट्रेम्पोलिन सरीखे प्लेटफार्म पर कुछ ऐसा ही, मगर कई किलोवाट का स्पंज होता है। खींचता है, उचकाता है, बहुत कुछ बटोर लाता है। अलबत्ता मीडिया का तहखाना विज्ञापनों के बाजार की कैश जुगत से ही इसे तौलता है। ट्विटर की चिड़िया आकाश नपवा देती है- लड़न्त-भिड़न्त चोंचों का शाब्दिक कोलाहल। टी वी टी टुट् टुट्, चल हुट | वाट्सएप तो प्रकोष्ठ- सा टुच्चक टुच्चक गेंदबाजी की तरह।

असली ट्रेम्पोलिन तो फेसबुक है। चाहे जितना कूदो। वर्तमान में कुदाओ । इतिहास की स्मृतियों को बार-बार कुदाओ। घर-भर को कुदाओ। कभी थकने का नाम ही नहीं लेता। यह स्पंज जितना गहरे धँसाता है, उतना ही कंचनजंघा के शिखर पर भी पहुँचा देता है। कुछ छपा नहीं कि मैं झट फेसबुक पर अपलोड कर देता हूँ- 'आज मैं यहाँ, आज मैं वहाँ।' फिर फटी आँखों से अपनी कूद को लाइक्स-कमेंट्स से निहारता- तौलता रहता हूँ। सुबह सुबह के अनिवार्य कर्म से भी अधिक अनिवार्य  मुक्तिदायक कर्म | और रिश्ते ऐसे कि इधर पोस्ट , उधर से लाइक्स | कायमचूर्ण की तरह पाचक- बहुत खूब ।बहुत बढ़िया | क्या बात है! और कमेंट लंबा आ जाए तो तकदीर खुली । फिर  रिटर्न  गिफ्ट में धन्यवाद का  सिलसिला टोटल लाइक्स का प्रसाद बन जाता है।

मजहब और इलाकों से निरपेक्ष दोस्ती का अनजाना बिनअर्थशास्त्र का समाजशास्त्र फेसबुकिया लाइक्स में कुलांचे भरता है।' कामायनी' 'में' क का प्रयोग फेसबुकिया बधाइयों की संख्या से कम पड़ जाएगा। महाकाव्यों-महाउपन्यासों को बधाई के पेस्ट  से खड़े खड़े निपटा देता है। इधर मेरे मित्र कह रहे हैं -" कितनों को विनम्र श्रद्धांजलि देते जाओगे?"मैने कहा- "किसी भी शवयात्रा में जाते हैं तो तीन घंटे पूरे ! मगर फेसबुकिया रिश्तों में शवऔर श्मशान के जलते चित्रों के साथ इतनी देर में दो चार सौ को निपटाया जा सकता है। न नहाना, न धोना ।विनम्र श्रद्धांजलि  के साथ केवल ऊपर पहुँचाना।

 इधर सेटेलाइट से मेरे दिवंगत पिता मैसेज दे रहे हैं- "कभी हमें भी याद कर लिया कर बेटे !बीस-तीस साल पुराने मित्र-पिताजियों और माताजियों को नमन करते जा रहे हो तो हम भी.... ?" इधर मेरे साला- श्री व्यंग्यात्मक फरमान जारी कर रहे हैं- "हिमाचल- मेघालय, टोरंटो डच-गुयाना के अनजाने मित्रों के पड़पोतों को बधाई दिए जा रहे हो और मेरे बेटे के लिए एक भी पोस्ट नहीं ? "धन्य हैं वे लोग , जो फेसबुकिया नाट्य मंचन पर अपने दाम्पत्य की कूटनीति को साध लेते हैं। धन्य हैं वे, जो संपादक जी को हृदयतल से आभार व्यक्त करते हैं। उन्होंने संपादक जी का हृदयतल छू लिया, हम तो हृदय- नली में भी नहीं अटक पाए।

मुझे भी देखा-देखी रोग लग गया है। शादी के बाद जिस एल्बम को निहारा तक नहीं, उसके पुराने फोटो 'इतिहास में आज' की तरह पोस्ट करने के लिए फेसबुक के हेलीपेड पर खड़ा हूँ।  किसी की रचना छपी हो तो तड़ से लिख देता हूँ- "याद आया, 1984 में हमारी भी इसी विषय पर रचना छपी थी। और पीलीपट्ट कतरन चिपका दी। उस जमाने का बिन फेसबुकिया यौवन इस चौथेपन में ब्याज सहित झमाझम। नेताओं के तो ट्रेम्पोलिन ही दस-बीस । इस पार्टी के ट्रेम्पोलिन से दूसरी -छठी के। पर बचपन की तरह इस ट्रेम्पोलिन पर पोतों-पड़पोतों सहित और इतिहास बनी पीली कतरनों- अभिनंदनों के साथ कूदने को हर सुबह मैं फेसबुक हेलीपैड पर तैयार।

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सम्पर्कः फ्लैटनं-701टॉवर-27, स्टीफेंशन रोड, (बिन्नी मिल्स), पेरंबूर, , चेन्नई (तमिलनाडु), 600012, , मो. 9425083335


. लोककथाः इतना महँगा नाश्ता


 एक बहुत बड़े मुल्क का सुलतान कहीं दूर की यात्रा पर एक गाँव से गुज़रा। रास्ते में वह एक बहुत मामूली चायघर में नाश्ता करने के लिए रुक गया। उसने खाने में आमलेट की फरमाइश की। 

चायघर के मालिक ने बहुत सलीके से उसे चायघर के मामूली बर्तनों में आमलेट परोसा। मालिक ने टूटे-फूटे टेबल कुर्सी और मैले बिछावन के लिए सुलतान से माफ़ी माँगी और कहा – “मुझे बेहद अफ़सोस है हुज़ूर-ए-आला कि यह मामूली चायघर आपकी इससे बेहतर खातिरदारी नहीं कर सकता”।

“कोई बात नहीं” – सुलतान ने उसे दिलासा दी और पूछा – “आमलेट के कितने पैसे हुए?”

“आपके लिए सुलतान इसकी कीमत है सिर्फ सोने की हज़ार अशर्फियाँ” – चायघर के मालिक ने कहा।

“क्या!” – सुलतान ने हैरत से कहा – “क्या यहाँ अंडे इतने महँगे मिलते हैं? या फिर यहाँ अंडे मिलते ही नहीं हैं क्या?”

“नहीं हुज़ूर-ए-आला, अंडे तो यहाँ खूब मिलते हैं” – मालिक ने कहा – “लेकिन आप जैसे सुलतान कभी नहीं मिलते”। ■

(यह मध्य-पूर्व की लोक कथा है) हिन्दी ज़ेन से