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Feb 1, 2023

लघुकथाः सुहाग-व्रत

 - शकुन्तला किरण

सावित्री ने जब सुहाग-पूजा के लिए रोज की सूती साड़ी ही पहनी तो सत्येन झल्ला पड़ा, ‘‘वहाँ सबके सामने यह साड़ी अच्छी लगेगी? वह लाल चुनरी वाली पहन जाओ न।’’

‘‘हूँ?.....खूब बक्से भरे हैं न साड़ियों से?.....ले-देकर वही तो एक साड़ी है, उसे भी बिगाड़ दूँ, तुम्हें तो लाज-सरम नहीं......पर मुझे तो घर की इज्जत....’’

‘‘एक ही साड़ी? वह मूँगिया चैक वाली? गोटे की नीली जापानी? शादी की गुलाबी वाली?’’

‘‘और....सुना दो, सौ-दो सौ नाम? मैं कब मना कर रही हूँ? तुम तो बाबा हर दिन नई साड़ी लाते हो! हर रोज नया गहना गढ़वाते हो! करम फूटी तो मैं ही हूँ.....जो तुम्हारे पल्ले पड़ गई हूँ! तुम तो औरत का इत्ता खयाल रखते हो कि बस्स.....!!’’

‘‘सारी बात सिर्फ बदलने की थी.....उसमें कितनी बकबक......?’’

‘‘पागल कुत्ती हूँ न? तभी तो इतनी बकबक करती हूँ! पर तुम तो कवि नहीं, एक अफसर हो अफसर ! पाँच-सात हजार महीना कमाते हो, और आँख मूँद......सीधे मेरी हथेली पर धर देते हो? हुँह!....अगर दो दिन भी घर चलाना पड़े तो सारा कविपणा ठिकाणे आ जाए! भाग तो मेरे ही फूटणे थे जो तुम्हारे पल्ले....’’

और उसका सुबकना चालू हो गया।

‘‘अच्छा बाबा, माने लेता हूँ कि तुम्हारे पास एक भी साड़ी नहीं है...यहाँ तक कि यह जो पहन रखी है....वह भी नहीं। अब जाओ....नीचे औरतें आवाजें दे रही हैं!.....पर.....यह बता जाओ कि खाना कहाँ पर रखा है?’’

‘‘चूल्हे में।’’

और सावित्री आँसू पोंछती, उसी साड़ी में, चिरसुहाग का वर देने वाले ईसर-गणगौर के व्रत-पूजन को चल दी।

कविताः एक समुद्री लहर- सा

   - लिली मित्रा

कभी कभी खुद को

एक समुद्री लहर- सा

पाती हूँ...

 

कई मनोभावों का एक

समग्र गठा हुआ रूप

जो किसी ठोस अडिग

चट्टान से टकरा जाने

को तत्पर है...

 

क्षितिज की अवलम्बन

रेखा से बहुत कुछ भरे हुए

खुद में, लहराती बलखाती

तरंगित होती,एक लम्बा

सफर तय करती हुई

'मैं' चली आ रही हूँ..

मैं बही आ रही हूँ..

 

कई बार टूटी हूँ,

कई बार जुड़ी हूँ,

यह मेरा व्यक्तित्व

यूँ ही नहीं गढ़ गया,

असंख्य छोटी बड़ी लहरों में घुली  हूँ

भंवर में खींची हूँ, तब कहीं

अनुभवी हिंडोलों संग

तट तक पहुँचती, देखो!

मैं चली आ रही हूँ..

मैं बही आ रही हूँ..

 

बहुत कुछ बर्फ के शिला

खंडों में जमा दिया मैंने

फिर भी बढ़ती रही शेष

के अवशेष को समेटे

किनारे पर धँसी हुई मेरी

चट्टान से टकराने को व्यग्र

मैं चली आ रही हूँ..

मैं बही आ रही हूँ..

 

एक गहन शोर है उल्लास का

एक जोश है आनंदानुभूति का

जो बहुत तेज़ है,शान्त किए दे

रहा है यह निनाद,

आसपास का सब कुछ,

एक वेग से टकरा कर छिटक जाने को..

जो भर कर लाई हूँ दूर से,

उसे असंख्य जलबिन्दुओं में फैला

कर छितरा देने को,देखो!

मैं चली आ रही हूँ..

मैं बही आ रही हूँ..

 

मुझे है दृढ़ विश्वास कि तुम

सह जाओगे मेरा वेग,

लेट जाओगे 'शिव' से शान्त

होकर धरा पर,'काली' के

प्रचण्ड, रौद्र को सह लोगे

अपने वक्षस्थल पर, और

कर दोगे सब शान्त, देखो !

मैं चली आ रही हूँ

मैं बही आ रही हूँ

 

लौट जाऊँगीं फिर मैं एक

शांत 'गौरी' बनकर 'शंकर' की

पुनः नव निर्माण करने,

बस यही आस लिए, तुमसे

मिलकर खुद को विखंडित कर

पुनः निर्मित करने,

देखो !मैं चली आ रही हूँ

मैं बही आ रही हूँ

लघुकथाः औकात

- कृष्णानंद कृष्ण

पद के मद में आकंठ डूबे श्यामसुंदर दास ने कभी किसी को तरजीह नहीं दी। सबको एक ही लाठी से हांकते रहे। क्या घर, क्या बाहर सब जगह एक ही जैसा व्यवहार। चाहे वो मातहत कर्मचारी हो या पदाधिकारी या दोस्त, सबको वे अपनी रियाया से ज्यादा महत्त्व नहीं देते थे। कोई कुछ कहता या सुझाव देता तो उसे डांट देते और कहते–‘‘तुमको समझ में नहीं आता है तो चुप रहा करो। जाओ! खाओ–पीओ और मौज करो। यह तो मेरे प्रताप का फल है, भोगो।’’ और हो–हो कर के हँस देते। सारे के सारे लोग हाँ में हाँ मिलाते रहते।

एक बार उनकी सल्तनत को थोड़ा- सा झटका लगा। उन्होंने अपने सिक्योरिटी ऑफिसर को पीकदान उठाने का इशारा किया, किंतु उसने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। वह चुपचाप अपने मातहतों को हिदायतें देता रहा। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच रहा था। सामने बैठे एक उच्च पदाधिकारी ने आगे बढ़कर पीकदान बढ़ा दिया।

‘‘ ऐ मिस्टर! आपको कुछ बुझाता–वुझाता है कि नहीं? तू कइसे कंपीट कर गया जी? ’’ कहते हुए उन्होंने उस अधिकारी को डाँटा।

‘‘मैंने कुछ समझा नहीं।’’ उसने उत्तर दिया।

‘‘लगता है, तुमको सब कुछ समझाना पड़ेगा।’’ उनकी त्योरियाँ चढ़ गई थीं।

सामने खड़े उच्चधिकारी ने नव–नियुक्त सिक्योरिटी ऑफिसर को समझाना चाहा। उसकी लल्लो–चप्पो वाली बातों पर वह बिदक उठा। उसने संयत स्वर में कहा, ‘‘ माइंड योर ओन बिजनेस प्लीज!’’

‘‘ऐ सक्सेरिया साहब, अभी इसको यहाँ का बिजनेस रूल नहीं मालूम है। जब समझ जाएगा तब सब ठीक हो जाएगा। नया खून है न!’’ कहते हुए उन्होंने पान की पीक पिच्च से उगल दी।

‘ऐ मिस्टर! जरा थरमस इधर बढ़ाइए तो।’’

उनकी बातों पर ध्यान न देते हुए वह चुपचाप खड़ा रहा। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। तमककर बोले,‘‘अरे! आप ही से कह रहा हूँ। आप बहरे–वहरे नहीं न हैं?’’

इस बार सिक्योरिटी ऑफिसर के चेहरे का रंग बदला। उसने थोड़ी–सी तल्ख आवाज में कहा, ‘‘मैं सिक्योरिटी ऑफिसर हूँ। चपरासी नहीं हूँ। मैं अपनी ड्यूटी कर रहा हूँ।’’

‘‘लगता है, आप हमें जानते नहीं हैं।’’कहते हुए उनका चेहरा तमतमा उठा।

‘‘जानता हूँ। अच्छी तरह पहचानता हूँ। इसलिए कि आपका सिक्योरिटी ऑॅफिसर हूँ।’’ उसने दृढ़तापूर्वक कहा।

उसकी दृढ़–इच्छाशक्ति के सामने वे निरुत्तर थे। चुपचाप उठकर भीतर कमरे में चले गए। बाहर सन्नाटा पसर गया था।

किताबें - लोक संवेदना में रचे बसे मधुर-कर्णप्रिय लोकगीत

 -  डॉ. उपमा शर्मा

  पुस्तकः खड़ी बोली के लोकगीत ( लोकगीत-संग्रह): संकलन- वीर बाला काम्बोज, पृष्ठ: 40, मूल्य: 80 रुपये (पेपर बैक), ISBN:978-93-94221-55-0, प्रकाशक- अयन प्रकाशन, जे-19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059

ढोलक की मधुर थाप, स्त्रियों का समूह और कानों में माधुर्य घोलते इस समूह के कर्णप्रिय मधुर गीत। बहुत पुराने समय से लोक की संवेदनाओं को प्रखरता से उभारते यह गीत भले ही छंद की कसौटी पर खरे न उतरते हों, लेकिन आज भी वैवाहिक कार्य हों या पुत्र-पुत्री  प्राप्ति पर होने वाले रीति -रिवाज,  इन गीतों के बिना कार्यक्रम की मधुरता खोई सी रहती है। अपनी परंपराओं के वाहक अपनी संस्कृति की मिठास को सहेजते यह गीत लोकरंजन एवं लोक मंगल के महत्त्वपूर्ण उपादान हैं। लोकगीत का इतिहास सम्भवतया उतना ही पुराना है, जितना मानव। लोकगीतों में अमराई की ख़ुशबू भी है। चूल्हे पर पकते सौंधे पकवानों की मिठास भी है, हरे-भरे खेत भी हैं, कुएँ बावड़ी पनघट भी हैं। सास-बहू की मीठी नोक-झोंक भी है। ननद -भाभी के खट्टे-मीठे संबंध भी हैं। परदेसी पिया के विरह भी इनमें गुथे हैं, तो सावन के झूलों की पींग भी इनमें रची-बसी है।

वीर बाला काम्बोज जी द्वारा संकलित 'खड़ी बोली के लोकगीत' के इस संकलन में 23 लोकगीत संकलित हैं। लोकगीतों की बात हो और राधा-कृष्ण की मीठी- मधुर नोंक-झोंक न हो, कैसे संभव है? इन लोकगीतों में ब्रज की मिट्टी की सौंधी महक आती है। मस्तिष्क पटल पर कृष्ण की  लीलाओं का वर्णन कौंध जाता है।

संकलन के पहले ही गीत में कृष्ण मनिहार का वेश बनाकर आते हैं; लेकिन राधा जी भला कान्हा को कैसे न पहचानती? खड़ी बोली की मिठास से परिपूर्ण इस लोकगीत का प्रवाह देखते ही बनता है।

राधा जाण गई / कोई छलिया है ये/छलिए ने छल दिखलाया/ब्रज चूड़ी बेचने आया

लोक का तात्पर्य उस वर्ग से है जो एक परम्परा के प्रवाह में जीवित रहता है।'गीत' शब्द का अर्थ प्रायः उस कृति से है जो गेय हो। लोकगीत में संगीत एवं लय इसका प्राण है, इसी कारण लोकगीत को स्वत: स्फूर्त संगीत कहा गया है। ये गीत सरल, स्वच्छन्द एवं मधुर इसलिए होते हैं कि इनका निर्माण लोक समाज द्वारा शान्त स्वच्छन्द वातावरण में प्रकृति के सान्निध्य में स्वाभाविकता के साथ होता है।

सावन की ॠतु आते ही हरियाली तीज के अवसर पर रिवाज के अनुसार नई विवाहित स्त्रियाँ मायके आती हैं। तीज पर हर लड़की और स्त्री एक अलग ही उल्लास में होती है। झूले की पींगे बढ़ाते हुए मधुर सम्मिलित स्वरों में गाए गए ये झूला गीत बरबस ही मन को मोह लेते हैं ।इन गीतों में लोक व्यवहार का पूरा चित्र खिंच जाता है। इन गीतों में अक्सर चुहल और वाक्पटुता का तीखा मिश्रण होता है। इस पुस्तक के संकलित गीत में बहू मनिहार को चूड़ी पहनने को बुलाती है और सारे रंगों को मना कर देती है कि रंग इन-इन  कारणों से नहीं पहनूँगी। सास समझ जाती है और ससुर से कहती है बहू बड़ी चकचाल है। कहीं इन गीतों में विरह का वर्णन बड़ी मार्मिकता से किया है। पति कमाने के लिए परदेस है अब झूला किसके साथ झूलूँ। तुम परदेस चले जाओगे तो मैं किसके सहारे रहूँगी।

और समझाकर कहती है मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगी।

पीहर मैं न जाऊँगी जी राजा जी

भाई -भौजियों का राज सै… . / थारी गैलों जाऊँगी राजा जी

तुम मेरे भरतार सै… .।।

लोकगीत का रचयिता अज्ञात ही हैं;  लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि इनकी रचना किसी ने की ही नहीं या इनकी उत्पत्ति किसी देवयोग से हुई है। वीर बाला काम्बोज जी ने इन गीतों को संगृहीत कर लोक का कार्य किया है।

लोकगीत मौलिक परम्परा में जीवित रहते हैं। लोक कवि साधारण एवं जनसमूह का प्रतिनिधि होता है। गीत का सृजन करते समय वह लेखनी से अधिक अपने कण्ठ तथा जिह्वा का उपयुक्त प्रयोग करता है। यह गीत लुप्त होती परंपराओं और दृश्यों को जीवित रखते हैं। आज की पीढ़ी के लिए पनघट और बंटा टोकणी नितान्त अपरिचित से शब्द हैं। पहले पानी के लिए कुएँ पर ही जाते थे। गगरी में रस्सी बाँध कुँए में लटकाई जाती थी, फिर गगरी भरने पर रस्सी से उसे ऊपर खींच लेते थे। उसी काम को हँसी-ख़ुशी करने को स्त्रियाँ लोकगीत रचकर गाते-बजाते मनोरंजन कर लेती थीं। पनघट दूर होते थे। नई बहू अकेले कैसे जाए, इसीलिए सास ननद को साथ भेज देती थीं। इसी दृश्य को इस लोकगीत में कितनी अच्छी तरह दर्शाया है। कौन कहेगा यह गाँव की अनपढ़ स्त्रियों के रचे गीत हैं। ऐसे सरस, मधुर गीत लिखने वाली यह छन्द शास्त्र को जानती भी नहीं।

सासू पनिया कैसे जाऊँ, रसीले दोऊ नैना।

बहू ओढ़ो चटक चुनरिया, सर पै राखो गगरिया

बहू मेरी छोटी नणद लो साथ, रसीले दोऊ नैना

वैवाहिक मांगलिक कार्यक्रम के शुरू होते ही विवाह गीत, फेरे गीत, हल्दी गीत आदि आदि कानों में गूँजने लगते हैं। ढोलक की मधुर थाप और गाने वाले गीतों से सहज ही समझ आ जाता है कि इस घर में विवाह के मांगलिक कार्यक्रम हो रहे हैं। बन्ना-बन्नी के गीतों से घर ही नहीं पूरा मोहल्ला गुंजायमान रहता है। किसी के घर सोहर के गानों से ही पता चल जाता है इस घर में नव जीवन ने आँखें खोली हैं। विदाई गीत की मार्मिकता पड़ोसियों की आँखों से आँसू की अविरल धारा बहा देती है। ऐसे हैं हमारी संस्कृति के द्योतक यह लोकगीत।

लोकगीतों का कई दृष्टि से बड़ा महत्त्व है। हमारी इन अमूल्य निधियों को आधुनिकता नाश करने पर लगी है। विवाह - कार्यों में बजते पश्चिमी संगीत और फिल्मी गानों ने हमारी नवपीढ़ी को भ्रमित ही किया है। जब चक्की, चूल्हे ही नहीं रहेंगे और हमारी नव पीढ़ी खेत -खलिहान, बाग पनघट जानेगी ही नहीं, तो गाएगी क्या और क्या हमारी संस्कृति को समझेगी। लोकगीत हमारी लोक-संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं। इसलिए लोकगीतों की इस संक्रमणकालीन अवस्था में ही हमें इनकी रक्षा में सतत प्रयत्नशील होना चाहिए। इन लोकगीतों को संगृहीत कर बीर बाला जी ने महत् कार्य किया है। हमारी संस्कृति की धरोहर समेटे यह किताब किताबों की दुनिया में निश्चय ही एक अलग स्थान बनाएगी।

सम्पर्कः  बी- 1/248, यमुना विहार, दिल्ली-110053, 8826270597

सॉनेटः प्रेम है अपना अधूरा

- प्रो. विनीत मोहन औदिच्य

मेघ संतापों के काले, व्योम पर छाए

और पीड़ा भी सघन सी, साथ में लाए

सोचता ही रह गया मैं पी गया हाला

अंग में प्रत्येक मेरे चुभ रहा भाला।

 

पुष्प सा महका न जीवन, कष्ट है भारी

नेत्र करके बंद बैठे, रैन भर सारी

धमनियों में रक्त बहता, पर निराशा है

श्वाँस है अवरुद्ध मेरी, दूर आशा है।

 

प्रेम अपना है अधूरा, सच अटल जानो

है तृषा का वास उर मे, यह सहज मानो

हार कर बाजी डगर में, रुक नहीं जाना

ध्येय हो मिल कर हमारा, लक्ष्य को पाना।

 

है यही अब चाह उर में, बस तुम्हें पाऊँ।

भाग्य पर अपने सदा ही, नित्य इतराऊँ।।

 

सम्पर्कः सागर, मध्यप्रदेश, Mail id - <nand.nitya250
@gmail.com, दूरभाष- 7974524871