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Jun 1, 2022

किताबेंः बारह खिड़कियों से झाँकते अनुभव

- कामिनी रावत

पुस्तकः बंद कोठरी का दरवाजा ( कहानी-संग्रह), लेखिकाः रश्मि शर्मा, प्रथम संस्करण: 2022, पृष्ठ: 200, मूल्य: रु.260, प्रकाशक: सेतु प्रकाशन, 305, प्रियदर्शिनी अपार्टमेण्ट, पटपटगंज, दिल्ली-110092

युवा कहानीकार रश्मि शर्मा के कहानी संग्रह 'बन्द कोठरी का दरवाजा' में संकलित 12 कहानियों में हमारे आस-पास की वास्तविकता के विविध रंग समाहित हैं।

‘मनिका का सच’ गाँव में प्रचलित अँधविश्वास की क्रूरता की चरम सीमा को दर्शाती है, किस तरह एक विधवा औरत को डायन बता कर उसका समाज से बहिष्कार किया जाता है, एक स्त्री के जीने के बुनियादी अधिकार तक की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। वर्चस्वशाली समाज का कहा माने और दबे-ढके ढंग से पुरुषों की मर्जी पर चले, तो सब ठीक है। अपनी शर्तों पर अपने दम पर जीने लगे, तो वह चरित्रहीन या डायन कहलाती है । उसके इंसान होने पर, इंसानों के बीच रहने पर, इंसानों जैसी जिंदगी जीने पर प्रश्नचिह्न लगाए जाते हैं। वस्तुतः कौन दुश्चरित्र है और किसके मन में खोट है, इस सच का पर्दाफाश भी कहानी में किया गया है। मर्दवादी पाखंड और गाँव वालों की कूपमंडूक मानसिकता अंततः उसकी जान लेकर ही छोड़ती है।

‘निर्वसन’ कहानी कहने का अंदाज़ एकदम जुदा है। रामायण के मुख्य चरित्रों को आधार बनाकर आधुनिक समय के हिसाब से लिखी गई है, लेकिन परिस्थितियों में बहुत अंतर अब तक नहीं आया है। तब भी राम ने सीता पर अविश्वास किया और प्रजा की सोच को अधिक महत्त्व दिया और आज भी पत्नी की सोच को पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया जाता है। क्यों यह जरूरी माना जाता है कि एक स्त्री के आसपास परिवेश का जो तानाबाना बुना गया हो, उसके आधार पर ही उसकी पहचान हो? अपने सच की सामाजिक स्वीकृति के लिए स्त्री तब भी लड़ रही थी और आज भी संघर्षरत है। कहानी यह भी दिखाती है कि सूझ-बूझ और आत्मविश्वास की दीप्ति स्त्री में अधिक है। सीता बिना संसाधनों के भी अपनी समृद्ध संवेदना और विवेक के सहारे वह कर डालती है, जो राम-लक्षमण कदाचित् न कर पाते। प्रकृति का महाराग तो कहानी की शुरूआत से ही सीता के साथ था, पुरखों का आशीर्वाद भी अपने गुणों से वह अपनी ओर मोड़ लेती है। मिथकीय परिधि में आबद्ध यह कहानी इस सीमा के भीतर रहते हुए भी स्त्री के अस्तित्व की अनेक परतें खोलने में सक्षम है।

 ‘नैहल छुटल जाए’ स्त्री के संपत्ति के अधिकार के महत्त्व को रेखांकित करती है। कहानी की मुख्य किरदार कोयलिया धीरे -धीरे सही-गलत को पहचानने की दृष्टि विकसित करती है। पिता की मृत्यु के बाद विवाहित कोयलिया को भाई-भाभियों द्वारा जब मायके में पर्याप्त प्रतिष्ठा और देखभाल नहीं मिलती, तब उसे अपने कानूनी अधिकार पहली बार ध्यान में आते हैं और अधिकार की बात पर घर वालों की प्रतिक्रिया से यह साबित हो जाता है कि अधिकारों को जीवन में लागू किए बिना, आत्मसम्मान भी नहीं बचाया जा सकता। परिणामस्वरूप संपत्ति पर अपने हक़ के लिए लड़ने की हिम्मत जुटा पाती है।

 ‘घनिष्ठ परिचित’ में पार्किंसन की बीमारी से जूझ रहे एक बुजुर्ग के कारण घर-गृहस्थी में रोजाना की होने वाली परेशानियों को दिखाया गया है । मगर बीमारी कहानी का मुख्य विषय नहीं है। अधिकारों और महत्त्व का जो बँटवारा एक आम भारतीय परिवार में पाया जाता है, उसकी खाइयाँ और चौड़ी होकर भीतर की बदसूरती बाहर आने लगती है। जब पार्किंसन बीमारी से बिगड़े मानसिक असंतुलन के कारण सभ्यता का लबादा गिरता है। बहू परिवार में बाहर से आई सदस्य होती है। वह कितनी ही संवेदनशील हो, उसके साथ परिवार उस आत्मीय ढंग से नहीं जुड़ पाता, जैसे अन्य सदस्यों से। इसलिए तो स्वस्थ पति के मन में भी इस आशंका का बीज पड़ जाता है कि बहू ससुर के साथ कोई बेजा हरकत करे, यह अस्वाभाविक बात नहीं।

कहानी ‘जैबो झरिया लैबो सड़ियाँ’ रोजगार की तलाश में, अपनी आर्थिक स्थिति को थोड़ा बेहतर बनाने की कोशिश में अपनी जन्मस्थली छोड़कर कोयला-खदानों में अपने जीवन को गिरवी रख काम करने के लिए मजबूर मजदूर वर्ग की दास्तान बयान करती है। एक ओर ऐसा जीवन है जिसमें कोई भी सपना पूरा नहीं हो सकता, दूसरी ओर छोटे-छोटे सपनों को साकार करने के लिए दाव पर लगी जिंदगी। दोनों ही स्थितियाँ भयावह हैं। समाधान कहीं भी नहीं है। कहानी कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूर परिवारों की स्थिति का मार्मिक चित्रण करती है। कोयला हो या कोई भी संसाधन, अमीर को और अमीर तो बना सकता है मगर जिन मजदूरों का श्रम इन चीजों को धरती के गर्भ से निकालता है, काम लायक बनाता है, उनकी किस्मत में तो वंचना में जीना या जोखिम में रहना या जान गँवा देना ही आता है।

‘हादसा’ कहानी में दहशत पैदा करने वाली खबरों के बीच में पलती हुई बच्ची के मनोविज्ञान को दिखाया गया है। कहानी मार्मिक और रोचक ढंग से असुरक्षा बोध के साथ रहने वाले अभिभावकों और कोमलमना लड़की की मनोदशा का चित्रण करती है। उसके सामने हुए एक लड़की के अपहरण और घटना के खौफ से बच्ची के जख्मी मन से पाठक पूरी संवेदना से खुद को जोड़ पाता है। अंत में पता चलता है- ऐसी कोई घटना बच्ची के सामने नहीं घटी थी। उस पर तारी खौफ से उसे ऐसा भ्रम हुआ करता है।

‘चार आने की खुशी’ में गाँव की विधवा स्त्री की बदहाल स्थिति का चित्रण है। अपने एकमात्र चाय के शौक को पूरा करने के लिए वह बच्चियों को उनका मनपसंद फल शरीफा चारआने में बेचा करती थी। अब युवा हो चुकी वह बच्ची कहानी की वाचक है। जब उसे पता चलता है कि शरीफे के प्रति उसका लालच ‘बड़ा’ के चाय के शौक को पूरा करने का माध्यम बना। चाय की चुस्की में उसके भीतर शरीफे का रस उतरने लगता है। छोटे से घटनाक्रम पर आधारित यह एक प्यारी -सी कहानी है।

‘बंद कोठरी का दरवाजा’ में समलैंगिक पुरुष सामाजिक बाध्यता के चलते शादी कर लेता है; मगर पत्नी को समागम का सुख नहीं देता। जब यह राज पत्नी को पता चलता है, तो वह उससे तलाक लेकर अलग हो जाना चाहती है; मगर पति के विनम्र आग्रह से कुछ समय के लिए रुक जाती है। इस बीच धारा 377 में सरकार द्वारा लाए गए बदलाव की खबर अखबार में पढ़कर वह तय करती है कि अब झूठी शान की खातिर अपने आप से लड़ने की और जरूरत नहीं है।

‘उसका जाना’ में माँ की बीमारी और देहांत का किशोर बेटे के मनोभावों पर पड़े असर को दिखाया गया है। वह चाहता है कि कम से कम अब तो माँ की रुचि के अनुसार हो। आजीवन तो माँ पिता की पसंद के हिसाब से कपड़े पहनती और सब कुछ करती रही।

‘महाश्मशान राग-विराग’ दो शहरों में छुटपन और युवावस्था में हुए प्रेम की कहानी है। एक कश्मीर की वादियों में शिकारे में हुआ बाल लगाव है, दूसरा बनारस के मणिकर्णिका घाट में हुआ युवा प्रेम। लड़की के लिए ये जीवन के दो स्वाभाविक चरण हैं, जो एक-दूसरे को नहीं काटते। मगर प्रेमी का ध्यान यहाँ अटका रहता है तो साथ रहते हुए भी साथ छूटने लगता है। स्त्री का प्रेम बड़ी से बड़ी बाधा को प्यार कर सकता है मगर संशय उसके मन को दुविधा में डाल देता है।

‘मैंग्रोव वन’ प्रेम की वर्तमानता और प्रेम के अनुभव के नैरंतर्य की कहानी है। ‘लाली’ इस संकलन की कमजोर कहानी है। जिसमें कहानीकार का आशय ठीक से संप्रेषित नहीं होता।

इन 12 कहानियों को जीवन जगत में देखने की 12 खिड़कियाँ माना जा सकता है। रश्मि शर्मा का यह पहला कहानी संग्रह है। इस हिसाब से देखें, तो कहानियों में विषय-वैविध्य है, अलग-अलग परिवेश और किरदारों के लिए अलग भाषा प्रयुक्त की गई है। सादगी से सहज ढंग से कहानीकार अपनी बात प्रामाणिक बोली में कह ले जाती हैं।

प्रेरकः सुविधाओं की असली कीमत

 - निशांत

पिछले सौ सालों में मानव और समाज की गति की दिशा के बारे में विचार करता हूँ तो पाता हूँ कि यह केवल सुविधा की ओर दौड़ा जा रहा है। पिछले सौ सालों में हुई खोजों और अविष्कारों पर नज़र डालें तो पाएँगे कि वाशिंग मशीन और ड्रायर, डिशवाशर, मोटरगाड़ियाँ, हवाई जहाज, टीवी, माइक्रोवेव, कम्प्युटर, ई-मेल, इन्टरनेट, फास्ट फ़ूड, लंच पैक्स और ऐसी हजारों चीज़ों ने हमें आधुनिक तो बनाया पर बेहद सुविधाभोगी भी बना दिया।

किसी और बात से भी अधिक हमारा समाज सुविधा पर आश्रित है और उसी पर जीता है। इस सुविधा की क्या कीमत चुकाते हैं हम?

ग्लोबल वार्मिंग। कहते हैं कि हमारे सुविधाभोगी व्यवहार ने ही ग्लोबल वार्मिंग रुपी दैत्य को जन्म दिया है जो देर-सबेर पृथ्वी को निगल ही जाएगा। ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए जो उपाय बताये जा रहे हैं वे सुविधा को और भी सुप्राप्य और सस्ती बना देंगे जैसे विद्युत् चालित मोटर वाहन, स्वच्छ ऊर्जा, स्मार्ट फोन, ऑर्गेनिक फ़ूड… ऐसे में मुझे लग रहा है कि हमें अपने सुविधा के प्रति अपने प्रेम पर पुनः विचार करना चाहिए।

मोटापे की महामारी का जन्म भी सुविधाभोगी बनने का ही नतीजा है। फास्ट फ़ूड, माइक्रोवेव फ़ूड, रेडी-टु-ईट पैक्ड फ़ूड के साथ ही ऐसे भोज्य पदार्थ जिनमें कृत्रिम फ्लेवर और प्रोसेसिंग एजेंट मिलाये जाते हैं वे खाने में इतने एंगेजिंग और हलके होते हैं कि उनकी आवश्यक से अधिक मात्रा पेट में पहुँच जाती है। बहुत बड़ा तबका इन भोज्य पदार्थों को अपने दैनिक भोजन का अंग बना चुका है। लोगों के पास समय कम है और अपना खाना खुद बनाना उनके लिए सुविधाजनक नहीं है। मुझे दिल्ली में रेड लाईट पर रुकी गाड़ियों में जल्दी-जल्दी अपना नाश्ता ठूंसते कामकाजी लोग दिखते हैं। चलती गाड़ी में सुरुचिपूर्ण तरीके से थाली में परोसा गया खाना खाना संभव नहीं है और ऐसे में सैंडविच या पराठे जैसी रोल की हुई चीज़ ही खाई जा सकती है। कभी-कभी तो चलती गाड़ी में बैठी महिला अपने पति को खाना खिलाते हुए दिख जाती है। यह सब बहुत मजाकिया लगता है पर आधुनिक जीवन की विवशतापूर्ण त्रासदी की ओर इंगित करता है। आराम से खाने का वक्त भी नहीं है!

सभी लोग पोषक भोजन करना चाहते हैं पर ऐसा जो झटपट बन जाये या बना-बनाया मिल जाये। पहले फुरसत होती थी और घर-परिवार के लोग बैठे-बैठे बातें करते हुए साग-भाजी काट लेते थे। आजकल सब्जीवाले से ही भाजी खरीदकर उसी से फटाफट कटवाने का चलन है। भाजी के साथ इल्ली और कीड़े-मकोड़े कटते हों तो कटने दो। खैर, जब टीवी पर सीरियल न्यूज़ देखते समय खाने से पेट का आकार बढ़ता है तो ज्यादा कुशल मशीनें बनाई जाती हैं जो कसरत को बेहद आसान बना दें सबसे कम समय में। यदि आप घर से बाहर दौड़ नहीं सकते तो घर के भीतर ट्रेडमिल पर दौड़िए। ट्रेडमिल पर दौड़ना नहीं चाहते तो मोर्निंग वाकर भी उपलब्ध है। यह भी नहीं तो स्लिमिंग पिल्स, यहाँ तक कि स्लिमिंग चाय भी मिल जाएगी। सबसे जल्दी दुबला होना चाहते हों तो अपने पेट में मोटी नालियाँ घुसवाकर सारी चर्बी मिनटों में निकलवा लीजिए। घबराइए नहीं, इसमें बिलकुल दर्द नहीं होता और आप उसी दिन उठकर काम पर भी जा सकते हैं!

मैं खुद तो कसरत नहीं करता इसलिए मुझे किसी को पसीना बहानेवाली कसरत करने का लेक्चर नहीं देना चाहिए। लेकिन मैं लगभग रोज़ ही सामान लाने के बहाने लंबा चलता हूँ, लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करता हूँ, अपने कपडे खुद ही धोता हूँ… इसमें बहुत कसरत हो जाती है। असली कसरत तो वही है जिसमें कमरतोड़ मेहनत की जाय और जिसे करने में मज़ा भी आये। ये दोनों ही होना चाहिए। और ऐसी कठोर चर्या के बाद खुद ही अपना खाना बनाकर खाने में जो मजा है वह पिज्जा हट या डोमिनोज को फोन खड़खड़ाने में नहीं है। एक बात और, सादा और संतुलित भोजन बनाने में अधिक समय नहीं लगता है और उसे चैन से बैठकर खाने का आनंद ही क्या!

मोटर कार भी आवागमन का बहुत सुविधाजनक साधन है हाँलाकि किश्तें भरने, सर्विस करवाने, साफ़ करने, पेट्रोल भरवाने, धक्का लगाने, ट्रेफिक में दूसरों से भिड़ने, और पार्किंग की जगह ढूँढने में कभी-कभी घोर असुविधा होती है। इस सुविधा का मोल आप अपनी और पर्यावरण की सेहत से चुका सकते हैं जो शायद सभी के लिए बहुत मामूली है।

यदि आप बारीकी से देखें तो पायेंगे कि सुविधाएँ हमेशा हिडन कॉस्ट या ‘कंडीशंस अप्लाई’ के साथ आती हैं। कभी-कभी ये हिडन कॉस्ट तीसरी दुनिया के देश भुगतते हैं या पर्यावरण को उनका हर्जाना भरना पड़ता है। उनका सबसे तगड़ा झटका तो भविष्य की पीढ़ियों को सहना पड़ता है लेकिन इसके बारे में भला क्यों सोचें? ये सब तो दूसरों की समस्याएं हैं!

मैंने कभी यह कहा था की हम सबको अस्वचालित हो जाना चाहिए। इसपर विचार करने की ज़रुरत है। चिलचिलाती धुप में बाल्टीभर कपड़े उठाकर उन्हें छत में तार पर टांगकर सुखाने का आइडिया बहुतों को झंझट भरा लग सकता है पर इसमें रोमानियत और वहनीयता है। घर के किचन गार्डन में ज़रुरत भर का धनिया या टमाटर उगा लेना किसी को टुच्चापन लग सकता है पर मैं इसे बाज़ार में मिलनेवाले सूखे पत्तों और टोमैटो प्यूरी पर तरजीह दूँगा। पैदल चलना, सायकिल चलाना, और मैट्रो में जाना आरामदायक भले न हो पर मोटर गाड़ी में अकड़े बैठे रहने की तुलना में ज्यादा रोमांचक और चिरस्थाई है।

और हमारे दैनिक जीवन की ऐसी कौन सी असुविधाएँ है जो वास्तव में हमारे लिए वरदान के समान हैं? मेरे पास केवल प्रश्न हैं, उत्तर नहीं ( हिन्दी जे़न से)

कविताः मैं वही पेड़ हूँ

- डॉ. विभा रंजन (कनक)

मैं वही पेड़ हूँ..

जब तुम्हारी माँ को..

सवारी नहीं मिली..

यहीं ठहर..

आगे बढ़ी थी..

आज तुम मुझे..

काटने आए हो..

मेरी बाहों को पकड़..

झूला-झुला था तुमने..


यौवन की दहलीज पर..

घने छाँव तले..

मेरे हरित प्रागंण में निर्बाध..

अपनी प्रेयसी से..

प्रेमालाप किया करते थे..

तुम दोनों को मैंने..

हाथों में डाले हाथ..

घंटो बैठे देखा है..

मेरे मोटे तने को छील..

एक दूजे का नाम लिखा था..

 

अब मैं विस्तृत हो गया हूँ..

मुझे काट कदाचित..

निर्माण कार्य चलेगा..

मेरी इन टूटती शाखाओं से..

तुम एक शाख ले जाना..

उम्र के पड़ाव पर..

तन थकने लगे..

पाँव चलने से ठिठके..

तब मेरे शाख से..

एक छड़ी र्निमित कर लेना..

जीवन संध्या के उस पल भी..

मैं काम आ जाऊँगा...

सम्पर्कः B/37 Ground floor, Soami nager, South Delhi. New Delhi 110017, mo. 911809003

जीवन दर्शनः पारस्परिक प्रेम का प्रतिसाद

 -विजय जोशी  (पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

प्रेम प्रार्थना की तरह इक मंदिर का दीप

जिसको यह मोती मिले वह बड़भागी सीप

 सहयोग, सद्भावना तथा सहानुभूति जीवन के वे तीन अवयव हैं जो हमें आपस में एक दूसरे से निर्मल मन से जोड़ते हैं। इसमें  एक दूसरे पर पारस्परिक निर्भरता भी एक ऐसा पहलू है जो हमारी शक्ति, स्वाभिमान एवं साहस को परिभाषित करता है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण यदि कहीं है तो वह है दंपत्ति यानी पति- पत्नी का जोड़ा अस्तु एक छोटा सा प्रसंग-

75 वर्ष आयु प्राप्त एक वरिष्ठ पति की उनसे 5 वर्ष छोटी पत्नी के आपसी मेलजोल और परस्पर प्रेम से प्रभावित एक नौजवान उनसे नियमित रूप से मिलने हर रविवार जाया करता था। उसने देखा कि पति अपनी पत्नी से स्नेहपूर्वक कॉफी पीने की जब मंशा जाहिर करते तो पत्नी कॉफी बाटल लाकर उनसे खोल देने के आग्रह सहित उपस्थित हो जाया करती थीं। यह एक सतत प्रवाहित होने नियमित प्रक्रिया थी।

 नौजवान ने सहायता की दृष्टि से उन्हें एक कॉफी  मेकर बाटल ओपनर के साथ भेंट किया उनकी सुविधा के मद्देनजर, लेकिन उसके लिए आश्चर्य की बात तो यह हुई कि अगले विज़िट पर उसने पत्नी को फिर से वही आग्रह करते पाया। वह अचंभित हो गया। उसे लगा शायद वे भेंट भूल गए हैं।

तत्पश्चात उसे एक दिन दोनों से अलग- अलग मिलने का अवसर मिला तो उसने इस बाबद जिज्ञासा प्रकट की और जो उत्तर मिला वह हम सबके जीवन में प्रेम की परिभाषा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

 उन महाशय ने कहा- हाँ, मैं स्वयं भी कॉफी बना सकता हूँ बगैर किसी सहायक, किन्तु ऐसा करता नहीं और वह इसलिये कि मैं अपनी पत्नी को यह एहसास कराता रहता हूँ कि मैं अपने जीवन में उस पर कितना निर्भर हूँ।  वह मेरे जीवन के लिए आवश्यक नहीं, अपितु अनिवार्य है। उसके पास एक ऐसी प्रतिभा है जो मेरे पास नहीं। मेरे जीवन की निरंतरता में अंतरंगता उर्फ निकटता सबसे बड़ा अंग है।

और जब उसने पत्नी से कारण जानना चाहा तो उत्तर मिला- हांँ मैं खुद भी बाटल खोल सकती हूँ तुम्हारे उपकरण की सहयता के बगैर, किन्तु कभी नहीं करूँगी, क्योंकि मैं अपने पति में यह एहसास ज़िंदा और जाग्रत रखना चाहती हूँ कि वे आज भी शक्ति संपन्न हैं। हमारे सफल एवं सुखी जीवन का यही सबसे बड़ा सूत्र है।

संदेश : अब देखिए हम कई बार जीवन में आत्मनिर्भर होने का दंभ भरते हैं, किन्तु यह भूल जाते हैं कि ऐसा करके हम उन लोगों की प्रसन्नता छीन लेते हैं जो हमारे लिए कुछ करने की चाहत रखते हैं। जरूरी यह नहीं है कि आप क्या कर सकते हैं, बल्कि यह है कि आप उन लोगों को कितना सुख पहुँचा सकते हैं जो कुछ थोड़ा भी आपके लिए कर सकते हैं। सो कभी मत भूलिए कि दूसरों की प्रसन्नता में ही आपका भी सुख समाहित है भले ही वह कितना ही छोटा क्यों न हो और आसानी से आपके बस में हो। यही वह सूत्र है जो हमारे सम्बन्धों को मूल्यवान तथा चिर स्थायी बनाता है। सो आज से आप भी कद्र करें अपनों की, सच होने वाले सपनों की।

इक पलड़े में प्यार रख दूजे में संसार,

तौले से ही जानिये किसमें कितना भार।

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,  मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

May 1, 2022

उदंती.com, मई – 2022

वर्ष – 14 अंक - 9

ये कह के दिल ने मिरे हौसले बढ़ाए हैं

ग़मों की धूप के आगे ख़ुशी के साए हैं

             - माहिर-उल क़ादरी

इस अंक में

अनकहीः   सबसे बड़ा दान विद्या दान - डॉ. रत्ना वर्मा

शिक्षाः निजी स्कूलों से अभिभावकों का मोहभंग - डॉ. महेश परिमल

आलेखः पीछे छूटते मानवीय संवेदना के ऑर्गैनिक मूल्य - शशि पाधा

स्वास्थ्यः कम खाएँ, स्वस्थ रहें - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

आलेखः आपकी नज़र में भारत की नई तस्वीर - साधना मदान

यात्रा संस्मरणः लक्षद्वीप की सुरम्य यात्रा - गोवर्धन यादव

आधुनिक बोध कथा- 5ः मदद भरा हाथ - सूरज प्रकाश

जीव- जगतः कौआ और कोयल: संघर्ष या सहयोग - कालू राम शर्मा

प्रकृति से संवादः करके देखिए अच्छा लगेगा - सीमा जैन

नवगीतः बदले हुए परिवेश में - क्षितिज जैन 'अनघ'

कविताः मातृत्व दिवस 8 मईः ...और वे चली गईं चुपचाप - डॉ. रत्ना वर्मा

कहानीः खोज - आशा पाण्डेय

व्यंग्यः श्यामलाल जी का अभिनन्दन  - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

लघुकथाः चौराहे पर - डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति

लघुकथाः 1. विकलांग, 2. परिवार की लाड़ली - माधव नागदा

प्रेरकः प्रतीक्षा करें… धीरज धरें…  - निशांत

परामर्शः कभी सोचा है  - प्रगति गुप्ता

किताबेंः यथार्थ से साक्षात्कार कराती लघुकथाएँ  - नमिता सचान सुंदर

कविताः चार गुना सुन्दर दृश्य - केशव शरण

जीवन दर्शनः मार्श मेलो थ्योरी - धैर्य की धारणा  - विजय जोशी