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Oct 3, 2021

नवगीत- बौराहिन लछमिनिया

-शिवानन्द सिंह सहयोगी’ 

सूखे पत्तों पर सोते हैं 

धुँधले उजले दिन।


नई सुबह ने केवल बदला 

है अपना परिधान,

उसने पढ़ा नहीं है अब तक

गणित, जीवविज्ञान,

नहीं निकाल रही है सुविधा

चुभी पैर में पिन।

 

जहाँ गरीबी के पाँवों में

बँधी हुई है छान

और उठाकर ले जाती हैं 

सूदखोरियाँ धान,

ऐसी लचर व्यवस्था पर है,

लानत, छी-छी, घिन।

 

मौलिक अपने अधिकारों को 

नहीं सकी जो जान,

ऐसे साइलेंसर बोली की 

गई कहाँ है तान,  

हल्की जलन और पीड़ा का

लुप्त हुआ क्या छिन।

 

लोकतंत्र के सजग पहरुए,

नहीं सके यह सोच,

आम आदमी के जीवन में,

कहाँ- कहाँ है लोच,

बौराहिन लछमिनिया जीवित

दाना-दुनका बिन।

किताबें- विविध भावों से युक्त हाइकु

- रमेशकुमार  सोनी

पुस्तक - भाव-प्रकोष्ठ  (हाइकु संग्रह) डॉ. सुरंगमा यादव, अयन प्रकाशन, 

महरौली- नई दिल्लीसन- 2021,  पृष्ठ-112, मूल्य-230 रुपये 

     हिन्दी हाइकु एक ऐसी विशिष्ट विधा है जिसे अपनाना तो सभी चाहते हैं; लेकिन इसकी लघुता के समक्ष लोग घुटने टेककर इसे विधा मानने से इनकार करते हुए इससे दूरी बना लेते हैं।इस विकट  दौर में जब साहित्य लेखन एक फैशन हो चुका है, तब समाज को सही दिशा देने, इसकी अच्छाइयों को सहेजने, प्रेम जैसे सहज उपलब्ध भावों को दीर्घकाल तक जीवित रखने का बीड़ा उठाने इस मातृशक्ति ने कमर कसी है।

    हिन्दी साहित्य को देश-विदेशों में गौरवान्वित करने वाली एक प्रमुख विधा के रूप में हाइकु का योगदान प्रशंसनीय है, जिसमें इस जीवन की सभी गतिविधियों को अपने आँचल में समेटकर प्रस्तुत होने की अद्भुत क्षमता है। यही वह विधा है जिसकी विविध पत्र-पत्रिकाओं ने अपने अंक निकालकर इसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की है तथा इसे संपोषित करने का स्तुत्य कार्य किया है।

     ‘भाव प्रकोष्ठ’ में विविध भावों के 467 हाइकु ,कुल 6 उपशीर्षकों – भाव प्रकोष्ठ, प्रेम कस्तूरी, नारी समिधा,मेघों का गाँव,समय-सरगम एवं लॉकडाउन के अंतर्गत प्रस्तुत हुए हैं । सभी हाइकु के वर्णक्रम अनुशासित हैं तथा विषयों से भटकाव नहीं है। इन दिनों प्रकृति के अलावा अन्य विषय पर भी हाइकु रचे जा रहे हैं इसी कड़ी में डॉ.सुरंगमा जी की संवेदना इस खंड को उकेरने में कामयाब हुई है जिसमें आपने वियोग से उपजे दर्द के किस्से और इनसे सम्बंधित विविध भावों का सम्प्रेषण बखूबी किया है। प्रेम कस्तूरी- सा है जिसकी सुवास पर ही यह दुनिया केन्द्रित है। आप लिखती हैं- रनिवास एक प्रतीक्षालय है और मन एक महाकाव्य है, जिसे बाँचने की प्रतीक्षा है , तुम्हारे साथ खिली धूप भी चाँदनी लगती है , पीड़ा का हिमखण्ड पिघल कर नैनों में बाढ़ ले आता है। प्रेम का यह भाग सुन्दर इसलिए बन पड़ा है क्योंकि इसमें पाने का भाव द्वितीय होता है और न्योछावर /समर्पण का भाव प्रमुख होता है।

       शब्द हैं मौन/आँसू हुए मुखर/समझे कौन!

     बंद किवाड़े/फिर भी आ जाती हैं/पीड़ाएँ द्वारे।

          प्रेम के सुन्दर दृश्यों पर फ़िल्मी दुनिया की काली छाया से इसकी विकृति यदा-कदा समाज एवं परिवारों को भोगनी पड़ती है, जिसमें इन दृश्यों के अंतर्गत वर्णित दृष्टिकोण का सर्वथा अभाव होता है। ऐसे ही भावों को  आपने इन हाइकु के माध्यम से बचाने की एक अच्छी कोशिश की है।

       प्रीत के पाँव/बिन पायल बाजें/सुनता गाँव।

      प्रिय का मुख/तिल बनके चूमूँ /रूप सजाऊँ।

      मन- पतंग/लाज की डोर संग/पिया को ढूँढे।

        प्रेम- पतंग/सहज न उड़ती/फँसते पेंच।

     इन दिनों वैश्विक गाँव और हमारे भारतवर्ष की आत्मा वाले गाँव में अंतर बढ़ा है ,हमारे यहाँ जहाँ रिश्तों का तात्पर्य उसे निभाना होता हैत्याग और समर्पण की प्रवृत्ति होती है ठीक इसके उलट वहाँ रिश्तों को सिर्फ भुनाया जाता है,अपेक्षाओं की भाषा में। रिश्तेदारियों में उलझी नारियों को कई प्रकार के रिश्तों को अपने आँचल में सँभालना होता है इसी की अनुगूँज इन हाइकु में सुनाई पड़ती है।

      रिश्तों में बँधा/बोनसाई-सा हुआ/प्रेम का पौधा।

      करे उजाड़/अहंकार की बाढ़/रिश्तों का गाँव।

          सामाजिक जीवन में नारी अब अपनी भूमिका तलाशते समिधा होकर रह गई है, जिसका जब चाहे जैसे पुरुषवादी सोच ने उपयोग किया है। ग्लोबल दुनिया में सौन्दर्य के बाज़ार की लार टपकाती जीभ बड़ी लम्बी है। रोज ही होते चीरहरण और मौन खड़े समाज पर प्रश्न चिह्न लिये प्रकट हुए हैं ये हाइकु;।  बंद हो अब अग्निपरीक्षा और विविध सामाजिक समस्याएँ जैसे– दहेज़ प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या एवं घरेलू हिंसा;  क्योंकि ये नारी के मन में पीड़ा का सागर बनाते हैं।ये हाइकु ऐसे ही भावों के साथ प्रस्तुत हुए हैं -

      नवोढा कलि/अधखिली बिखरी/उजड़ा भाग्य!।

      लूट का धन/समझते दरिन्दे/नारी का तन।

      तितली देख/पकड़ने को बढ़े/हाथ अनेक।

        मेघों का गाँव के अंतर्गत मौसम का वर्णन अत्यंत सुन्दर बन पड़ा है यहाँ प्रकृति की सुन्दरता सर्वत्र बिखरी हुई नज़र आती है जिसे इन हाइकु ने चोला पहनाया है। यहाँ पुष्पों का मेला है , ऋतुओं का वर्णन है,चिरौरी करते हुए मेघ धूप के संग लुकाछिपी खेलते हैं,धरती के फटे सीने को देख बादल पसीज जाते हैं।

मेघ कहार हैं जो वर्षा की डोली लिये आते हैं एवं जल की सेना मेघों के रथ पर सवार होकर आती है।इन सबके साथ और भी बहुत कुछ दिखाने की कोशिश करते हुए ये हाइकु मनभावन हैं-

      मेघ जौहरी/बाँटे खोले तिजोरी/बूँदों के मोती।

      मेघों की धूप/घूँघट से झलके/गोरी का रूप।

      निशा सुंदरी/झींगुर पायल से/करें झंकार।

      धूप- चादर/कोहरे पर फैली/हो गई गीली।

    समय सरगम खंड के तहत इस चार दिन की जिंदगी में मिले समय के साथ इंसानी गतिविधियों का कदमताल है। दुनिया की तमाम समस्याओं और उसकी धमाचौकड़ी , सुख-दुःख, धरा का दोहन,भ्रमित युवा एवं भूखे मजदूर को अपने साथ लिए हाइकु की यह यात्रा अच्छी है-

      फैल रही है/द्वेष-घृणा की आग/मानव जाग।

      वर्षा की झड़ी/मजदूर के घर/ठण्डी सिगड़ी।

    कोरोना की विभीषिका से उपजी समस्या - लॉकडाउन के दौरान का अकेलापन ,अपनों को खोने का दुःख , अपनी रिश्तेदारियों को न निभा पाने का कष्ट इस पूरी दुनिया ने भोगा है । यह दर्द इस हाइकुकार ने भी भोगा और उसे हाइकु में पिरोया; क्योंकि कोई भी रचनाकार अपने अनुभवों की स्याही में अपनी संवेदनाओं को शब्दांकित करता है। अपने गाँवों की ओर पैदल लौटते छाले वाले भूखे पाँव, स्वास्थ्य कर्मियों, स्वच्छता कर्मियों का समर्पण, सूनी सड़कें, आयुर्वेद के चमत्कार के साथ मदद के लिए उठने वाले भामाशाह के हाथ सभी ने देखे हैं। ऐसे ही कुछ भावों को प्रकोष्ठ में लिए ये हाइकु अपना ध्यानाकर्षण करने में सक्षम हुए हैं-

       घूमे कोरोना/दुनिया के माथे पे/आया पसीना।

       प्रकृति हँसी/आज सुविधाभोगी/बना है योगी।

      भीतर भूख/बाहर है कोरोना/जाएँ तो कहाँ।

       वक्त ने दिया/आज इतना वक्त/कटता नहीं।

          ‘भाव प्रकोष्ठ’ में विदुषी प्राध्यापक/विविध विधाओं की रचनाकार डॉ. सुरंगमा यादव सफल रही हैं विशेषतः सामाजिक और पारिवारिक सरोकारों से जुड़े हाइकु उत्कृष्ट उदाहरणों के लिए याद किए जाएँगे। हिंदी  साहित्य की इस अमूल्य निधि से अब नवलेखकों का उत्साहवर्धन एवं मार्गदर्शन होगा।

सम्पर्कः LIG-24 कबीर नगर फेज-2, रायपुर ,छत्तीसगढ़ 493554

कलाकार- पंथी का देदीप्यमान सितारा- राधेश्याम बारले

संजीव तिवारी 

विश्व के सबसे तेज नृत्य के रूप में प्रतिष्ठित छत्तीसगढ़ के लोक कला पंथी नृत्य के ख्‍यात नर्तक पंथी सम्राट स्व. देवदास बंजारे के साथ डॉ. आर.एस. बारले का नाम देश-विदेश में चर्चित है। सतनामी समाज के धर्म गुरु परम पूज्य गुरु बाबा घासीदास जी ने संपूर्ण मानव समाज को सत्य, अहिंसा, भाईचारा, सद्भावना, प्रेम, दया, करुणा, विश्व बंधुत्व के साथ-साथ मनखे-मनखे एक समानजैसे अद्भुत संदेश दिया है। इन्‍होंनें छुआछूत भेदभाव को मिटाकर संपूर्ण मानव में सत्य का रास्ता दिखाया है। समाज नें बाबा के इन्‍हीं संदेशों को भावभक्ति से पंथीनृत्य के माध्यम से प्रचार प्रसार किया, कालांतर से यह नृत्य प्रदेश के लोकमंच का सिरमौर बना हुआ है। राधेश्याम बारले  लगभग साढ़े चार सौ साल पुरानी विधा, इस पारम्पारिक लोकनृत्य की साधना में विगत 40 वर्षो से साधनारत हैं एवं इसे आगे बढ़ाने हेतु कृतसंकल्पित हैं।
राष्ट्रीय चेतना के विकास मे लोक गीतों उवं नृत्यों की अहम भूमिका रही है। छत्‍तीसगढ़ का पंथी लोक नृत्य गीत लोक जीवन का ऐसा महाकाव्य है जिसमें जीवन धारा के साथ ही अंलकारो की मधुर झंकार भी है। पंथी गीत नृत्य में अतीत के दृश्यपटल में वर्तमान के संघर्षो का रंगबिरंगा चित्र भी है। लोकचेतना के उन्नयन में इसकी उल्लेखनीय भूमिका रही है। छत्तीसगढ़ तथा देश में सांस्कृतिक अस्मिता के संरक्षण और संवर्धन में पंथी नृत्य ने एक विशेष पहचान बनाई है। पंथी आज देश ही नहीं विदेशों में प्रख्यात हो चुका है। डॉ. आर.एस. बारले की कला साधना और उसकी मेहनत से आज छत्तीसगढ़ में इस विधा की लगभग 200 से ज्यादा कला मंडलियों के 65 हजार पंथी नृत्य के कलाकार हैं। पंथी नृत्य भारत ही नहीं, अपितु विश्व के 70 देशों में अपनी पहचान बना चुका है, इसके नेपथ्‍य में डॉ. आर.एस. बारले के कला गुरु पंथी सम्राट स्व. देवदास बंजारे का अहम योगदान है।

डॉ. आर.एस. बारले नें भी अपने कला गुरु की इस मुहिम को आगे बढ़ाया है एवं अमेरिका एवं मैक्सिकों के पर्यटकों को छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति, लोक नृत्य पंथी का विशेष प्रशिक्षण देकर देश एवं प्रदेश का नाम रोशन किया है। इसके अलावा जाट कालेज, रोहतक (हरियाणा), सिक्किम, नामची, असांगथांग, गुवाहाटी, कालाहांडी, संबलपु, सिद्धि कॉलेज मध्य प्रदेश, नाट्य कॉलेज सतना मध्य प्रदेश आदि शहरों के स्कूली, कॉलेज के छात्र - छात्राओं को लोक कला पंथी नृत्य का प्रशिक्षण देकर कला के प्रति रचि पैदा कर राष्ट्रीयता एवं आत्मसम्मान तथा देश प्रेम की भावना को जाग्रत करने का अनुकरणीय पहल किया है। इसके साथ ही छत्तीसगढ़, महाराष्‍ट्र, उड़ीसा, झारखण्ड आदि राज्यों के नक्सली क्षेत्रों में भी अपनी या से नक्सलियों को सही दिशा में जोड़ने के लिए हजारों कार्यक्रम प्रस्तुत कि हैं। जिससे प्रेरित कर आदिवासी अपने मूल जीवन में लौटकर खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं

9 अक्टूबर 1966 को ग्राम खोला, पोस्ट - धमना, तह. पाटन, जिला - दुर्ग में जन्‍मे डॉ. आर.एस. बारले का पूरा नाम डॉ. राधेश्‍याम बारले है।  इनके पिता का नाम स्व. समारू राम बारले एवं माता का नाम श्रीमती गैंदी बाई बारले है। इनके परिवार में पत्‍नी श्रीमती महेश्वरी बारले के साथ एक बेटी और दो बेटे हैं। वर्तमानमें वे एच.एस.सी.एल. कॉलोनी, मड़ोदा स्टेशन, पो. नेवई, जिला दुर्ग में रहते हैं। इन्‍होंनें एम.बी.बी.एस.(बायो.) के साथ ही इंदिरा कला संगीत विश्‍व विद्यालय से लोक संगीत में डिप्लोमा भी किया है। वे आकाशवाणी रायपुर के बी. हाई ग्रे एवं दूरदर्शन के नियमित कलाकार हैं। इन्‍होंनें पंथी नृत्य की शुरुआत सितम्बर 1978 से किया था। इन्‍हें राज्य अलंकरण गुरु घासीदास सामाजिक चेतना एवं दलित उत्थान सम्मान, राज्य अलंकरण प्रथम देवदास बंजारे सम्मान, राज्य अलंकरण डॉ. भवर सिंह पोते आदिवासी सेवा सम्मान प्राप्‍त हो चुका है। डॉ. आर.एस. बारले को भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा प्रथम देवदास बंजारे सम्मान, सामाजिक समरसता सम्मान, कलासाधक सम्मान, दाऊ महासिंग चंद्राकर सम्मान, जिला युवा पुरस्कार, सामाजिक कार्य एवं जन चेतना सम्मान, कला श्री सम्मान, पंथी रत्न सम्मान, कला रत्न सम्मान, लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड, सतनाम फेलोशिप आवार्ड, धरती पुत्र सम्मान एवं छत्तीसगढ़ सतनामी रत्न सम्मान आदि सैकड़ों सम्मान प्राप्‍त हो चुके है।

डॉ. आर.एस. बारले नें विभिन्‍न जनकल्याणकारी कार्यक्रमों की प्रस्तुति पारंपरिक पंथी के माध्‍यम से दिया है जिसमें नशाबंदी, दहेज प्रथा, स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओं-बेटी पढ़ओं, परिवार नियोजन, साक्षरता, कुष्ट उन्मूलन, पर्यावरण, पल्‍स पोलियो, आयोडीन युक्त नमक, राष्ट्रीय सद्भाव, स्तनपान, महिला सशक्तीकरण, आतंकवाद, अलगाववाद, नक्सलवाद, इंद्रधनुष अभियान, पंचायती राज, कैंसर एवं एड्स आदि विषयों पर लगभग 200 मंचीय प्रस्तुति के माध्यम से प्रेम, दया, अहिंसा, सद्भाव एवं राष्ट्रीय एकता का संदेश प्रदेश एवं देश के कोने-कोने में पहुँचाने का अनूठा कार्य किया है। इसके अलावा गीत एवं नाटक प्रभाग सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, खेल युवा कल्याण विभाग, नेहरू युवा केन्द्र के माध्यम से सैंकड़ों राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय कैंप में सहभागिता के साथ कार्यक्रम प्रस्तुत कर राज्य एवं देश के नाम को गौरवान्वित किया है।
डॉ. आर.एस. बारले पंथी के साथ ही नाट्य विधा के भी सिद्धस्‍थ कलाकार हैं इन्‍होंनें छत्तीसगढ़ के कई रंगमंचों पर स्‍व. प्रेम साइमन एवं पारकर लिखित सैकड़ों नाटकों का निर्देशन एवं उसमें अभिनय भी किया है। जिसमें पानी की जगह खून बहा, शहीद वीर नारायण सिंह, छत्तीसगढ़ समग्र दर्शन, असकट के दवई, बिन आखर पशु समान (साक्षरता पर अधारित), देश में दहेज की हुकुमत,शृंगी ऋषि का शिहावा (बस्तर दर्शन), भरम के भूत, लेड़गा देवार की दशमत कैना, प्रेम साइमन की आत्म कथा, देवदास बंजारे की आरुग फूल, सत्य ही सत्य, डाकू विक्रम सिंह, नाम के तहसीलदार आदि नाटकों में रंगमंची प्रशिक्षण एवं अभिनय किया है। देश के प्रमुख महोत्सव एवं राज्यों में भी इन्‍होंनें नाटकों का मंचन किया है जिसमें राजिम कुम्भ, शिरपुर महोत्सव, देवबलोदा महोत्सव, नागोद महोत्सव सतना (म.प्र.), बुरला उत्सव उड़ीसा गोदिंया महाराष्ट्र, नांमची सिक्कीम, सोनारी जमशेदपुर, उत्सव पुर्वाचंल गुवाहाटी, युवा उत्सव आदि महोत्सव प्रमुख हैं।

जीवन दर्शन- प्रार्थना से प्रेम

 - विजय जोशी  ( पूर्व ग्रुप महाप्रबंधकभेलभोपाल (म. प्र.)

उल्टा नाम जपत जग जाना

वाल्मीकि भये ब्रम्ह समाना

 प्रार्थना एक अद्भुत समाधान है क्षण संकट के हों या फिर अन्यथा। दरअसल बाहरी तौर पर जब हम ईमानदारी पूर्वक ईश्वर की आराधना करते हैं तो आंतरिक तौर पर स्वयं से साक्षात्कारआत्मा का अवलोकन। चिंता से सर्वथा मुक्त चिंतन। निर्मल मन से मनन। पर इसके लिये चाहिये आत्मचिंतन की चाहत। और इसमें किसी आडंबर का स्थान नहीं फिर भले ही वह हो शब्दों का या दिखावे का। ऐसी किसी भी चीज की कोई आवश्यकता ही नहीं। प्रार्थना जितनी सरलसहज उतनी ही सफल।

चर्च में हर दिन एक नन्हीं बच्ची ईश्वर के सम्मुख खड़ी हो दोनों हाथ जोड़े बंद आँखों से कुछ शब्द बुदबुदाने के पश्चात आँखें खोलकर ईश्वर से मुस्कान सहित विदा लिया करती थी। इस क्रम को लगातार घटित होते देख पादरी के लिये अब यह कौतूहल का विषय था कि इतनी छोटी सी बच्ची को प्रार्थना का भावार्थ और धर्म का ज्ञान भला कैसे हो सकता है।

सो एक दिन अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिये वे समय पूर्व चर्च पहुँचे तथा बच्ची के प्रवेश करते ही पूछ लिया – मेरी बच्ची मैं तुन्हें हर दिन यहाँ आकर आँखें बंद कर कुछ कहते हुए सुनता हूँ। भला तुम क्या करती हो ईश्वर के समक्ष।

बच्ची ने कहा – फादर मैं प्रार्थना करती हूँ।

पादरी ने संशय से पूछा – तुम्हें कोई प्रार्थना याद भी है

नहीं फादर – बच्ची बोली

अब तक तो पादरी जो और उत्सुक हो चुके थे बोले – तो फिर तुम आँखें बंद करके क्या करती हो

 बच्ची ने मासूमियत के साथ कहा – फादर मुझे तो कोई प्रार्थना याद नहीं हैकिंतु चूंकि वर्णमाला के ए से लेकर ज़ेड तक सब शब्द याद हैंसो मैं उन्हें ही पाँच बार दोहराती देती हूँ और फिर ईश्वर से कहती हूँ कि हे ईश्वर मुझे तुम्हारी कोई प्रार्थना नहीं आतीपरंतु यह भी ज्ञात है कि कोई भी प्रार्थना वर्णमाला के इन शब्दों से बाहर नहीं हो सकतीइसलिये आप उन्हें खुद ही अपनी इच्छानुसार पुनर्व्यवस्थित कर लीजिये। यही आपसे विनती है। और यह कहते हुए वह प्रसन्नतापूर्वक कूद फांद करती हुई चर्च से बाहर चली गई।

पादरी यह सब सुनकर हक्का बक्का खड़े रह गए और उस दिशा में लंबे समय तक नि:शब्द ताकते रहे जिस ओर वह बच्ची गई थी। वे इतनी छोटी सी बच्ची की इतनी गूढ़ बात को सुनकर भावुकता के सागर में प्रवाहित हो रहे थे। उनकी आँखें भर आईं थीं।

बात बहुत सरल है। हम भी जब प्रार्थना रत होते हैं तो क्या हमारे मन मेंहमारे शब्दों में ईश्वर के प्रति वह भाव समाहित होता है जो उस बच्ची के मन में था। ईश्वर के प्रति शर्तहीन वह भाव जो उस ऊँचाई तक पहुँच सके। याद कीजिये सप्तर्षियों ने जब वाल्मीकि को डाकू धर्म छोड़कर ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण हेतु प्रेरित करते हुए राम नाम के जप के दीक्षा दी थी तो वाल्मीकि ने भी अज्ञानतावश अनजाने में पूरी श्रद्धा सहित राम नाम का उल्टा उच्चारण करते हुए जाप आरंभ कर दिया था और कालांतर में अपने श्रद्धा भाव की प्रतीक स्वरूप आज तक याद किये जाते हैं।   

वाल्मीकि के जाप से मिला एक परिणाम

श्रद्धा होनी चाहिये चाहे गलत उच्चारो नाम

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,

 मो। 09826042641, E-mail- vjoshi415@gmailcom

















Sep 3, 2021

उदंती.com, सितम्बर- 2021

वर्ष -14, अंक -1

एक पल एक दिन को बदल सकता है,

एक दिन एक जीवन को बदल सकता है

और एक जीवन इस दुनिया को बदल सकता है।

                                         - गौतम बुद्ध

अनकहीः छोटे सपने ऊँची उड़ान - डॉ. रत्ना वर्मा

आलेखः औचित्य खोते वैश्विक संगठन – देवेन्द्र प्रकाश मिश्रा

नीतिजनसंख्या वृद्धि दर घट रही है - सोमेश केलकर

आलेखसमाधान में समस्या तलाशते लोग - डॉ. महेश परिमल

संस्मरणः मेरे पिता का डेस्क - शशि पाधा

विज्ञानः बड़े शहर अपने बादल बनाते हैं - स्रोत फीचर्स

बातचीतः मस्तानी आवाज़ की मलिका उल्लास की नाव में - रचना श्रीवास्तव

कविताः 1.खामोश हवाएँ 2. सोच की लड़ाई  - शिखा सिंह

कहानी देवी  - माला वर्मा

नवगीतः होम करते हाथ जलें  क्षितिज जैन ‘अनघ’

बाल कहानीः चोरनी - सुधा भार्गव  

व्यंग्यः शब्द सुधार गृह - अखतर अली

दो ग़ज़लः - विज्ञान  व्रत

लघुकथाः जहाँ जागे वहीं सवेरा - डॉ. विभा रजंन 

पुस्तकः कैटवॉक वह भी कबूतर की!!! - अरुण शेखर

प्रेरकः ज़िन्दगी जीने में और जीवित रहने में बहुत बड़ा अंतर है -निशांत

सेहतः तनाव की पहचान और बचाव - मंजूषा मन

जीवन दर्शनः टाटा संस्कृति से साक्षात्कार - विजय जोशी