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Apr 21, 2020

कोरोना वायरस के खिलाफ दवाइयों के जारी परीक्षण

कोरोना वायरस के खिलाफ दवाइयों के जारी परीक्षण
नए कोरोना वायरस (SARS-CoV-2) ने दुनिया को संकट में डाल दिया है। इस नए वायरस की वजह से कोविड-19 नामक रोग होता है जिसके लक्षणों में बुखार, सूखी खाँसी, साँस लेने में परेशानी और थकान शामिल हैं। नाक बहना, दस्त, गले में दर्द तथा बदन दर्द इसके अन्य लक्षण हैं।
फिलहाल दुनिया भर में चार लाख (यह आलेख लिखे जाने तक) से अधिक लोग संक्रमित हैं और 10 हज़ार से ज़्यादा मौतें इस वायरस की वजह से हो चुकी हैं। फिलहाल इसके लिए कोई दवा उपलब्ध नहीं है। इसलिए स्वाभाविक रूप से पूरा ध्यान रोकथाम पर टिका है। रोकथाम का मुख्य उपाय व्यक्ति से व्यक्ति को होने वाले संक्रमण को रोकना है। इसके लिए भारत समेत कई देशों ने विविध तरीके अपनाए हैं। लॉकडाउन इसी का एक रूप है जिसके ज़रिए व्यक्तियों का आपसी संपर्क कम से कम करने का प्रयास किया जाता है।
यह सही है कि फिलहाल कोविड-19 के लिए कोई दवा नहीं है किंतु दुनिया भर में विभिन्न दवाइयों का परीक्षण चल रहा है और कुछ प्रयोगशालाएँ इसके खिलाफ टीका विकसित करने के प्रयास में युद्ध स्तर पर जुटी हैं। ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक इस समय दुनिया की अलग-अलग संस्थाओं द्वारा 86 क्लीनिकल परीक्षण चल रहे हैं और जल्दी ही सकारात्मक परिणाम की उम्मीद है। आइए ऐसे कुछ प्रयासों पर नज़र डालें।
1. जापानी फ्लू की औषधि
जापान की कंपनी फ्यूजीफिल्म टोयोमा केमिकल द्वारा विकसित एक औषधि ने कोविड-19 के कुछ हल्के-फुल्के और मध्यम तीव्रता के मामलों में उम्मीद जगाई है। यह एक वायरस-रोधी दवा है - फैविपिरेविर। जापान में इसका उपयोग फ्लू के उपचार में किया जाता है। हाल ही में इसे कोविड-19 के प्रायोगिक उपचार हेतु अनुमोदित किया गया है। अब तक इसका परीक्षण वुहान और शेनज़ेन में 340 मरीज़ों पर किया गया है और बताया गया है कि यह सुरक्षित है और उपचार में कारगर है।
यह दवा (फैविपिरेविर) कुछ वायरसों को अपनी संख्या बढ़ाने से रोकती है और इस तरह से यह बीमारी की अवधि को कम कर देती है और फेफड़ों की सेहत को बेहतर बनाती है। वैसे अभी इस अध्ययन का प्रकाशन किसी समकक्ष-समीक्षित शोध पत्रिका में नहीं हुआ है।
2. क्लोरोक्वीन और हायड्रॉक्सी- क्लोरोक्वीन
इन दवाइयों को मलेरिया, ल्यूपस और गठिया के उपचार हेतु मंज़ूरी मिली है। मनुष्यों और प्रायमेट जंतुओं की कोशिकाओं पर किए गए प्रारंभिक परीक्षण से संकेत मिला है कि ये दवाइयाँ कोविड-19 के इलाज में कारगर हो सकती हैं।
पूर्व (2005) में किए गए एक अध्ययन में पता चला था कि संवर्धित मानव कोशिकाओं का उपचार क्लोरोक्वीन से किया जाए तो SARS-CoVका प्रसार थम जाता है। नया वायरस SARS-CoV-2 इससे मिलता-जुलता है। क्लोरोक्वीन SARS-CoVको मानव कोशिकाओं में प्रवेश करके संख्यावृद्धि करने से रोकती है। हाल में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि क्लोरोक्वीन और उस पर आधारित हायड्रॉक्सी-क्लोरोक्वीन दोनों ही नए वायरस की संख्यावृद्धि पर भी रोक लगाती हैं।
फिलहाल चीन, दक्षिण कोरिया, फ्रांस और यूएस में कोविड-19 के कुछ मरीज़ों को ये दवाइयाँ दी गई हैं और परिणाम आशाजनक बताए जाते हैं। अब यूएस का खाद्य व औषधि प्रशासन इन दवाइयों का विधिवत क्लीनिकल परीक्षण शुरू करने वाला है। फरवरी में ऐसे 7 क्लीनिकल परीक्षणों का पंजीयन हो चुका था। इसके अलावा, मिनेसोटा विश्वविद्यालय में इस बात का भी अध्ययन किया जा रहा है कि क्या हायड्रॉक्सी-क्लोरोक्वीन मरीज़ की देखभाल करने वालों को रोग से बचा सकती है।
हायड्रॉक्सी-क्लोरोक्वीन से सम्बंधित एक अन्य अध्ययन फ्रांस में भी किया गया है। इसके तहत कुछ मरीज़ों को अकेला हायड्रॉक्सी-क्लोरोक्वीन दिया गया और कुछ मरीज़ों को हायड्रॉक्सी-क्लोरोक्वीन और एक अन्य दवा एज़िथ्रोमायसीन दी गई। एज़िथ्रोमायसीन एक एंटीबायोटिक है। शोधकर्ताओं का कहना है कि जिन मरीज़ों को ये दवाइयाँ दी गर्इं, उनमें SARS-CoV-2 की मात्रा में फ्रांस के अन्य मरीज़ों की अपेक्षा काफी तेज़ी से गिरावट आई। लेकिन इस अध्ययन में तुलनात्मक आकलन का कोई प्रावधान नहीं था। वैसे भी कहा जा रहा है कि इन दवाइयों का उपयोग काफी सावधानी से किया जाना चाहिए, खास तौर से गुर्दे की समस्याओं से पीड़ित मरीज़ों के संदर्भ में।
3. एबोला की नाकाम दवा
जिलीड साइन्सेज़ ने एक दवा रेमडेसिविर विकसित की थी जिसका परीक्षण एबोला के मरीज़ों पर किया गया था। अब इस दवा को कोविड-19 के मरीज़ों पर आजमाया जा रहा है। वैसे रेमडेसिविर एबोला के इलाज में नाकाम रही थी लेकिन प्रयोगशालाओं में किए गए अध्ययनों से यह प्रमाणित हो चुका है कि यह दवा SARS-CoV-2 जैसे अन्य वायरसों की वृद्धि को रोक सकती है। प्रायोगिक तश्तरियों में किए गए प्रयोगों में रेमडेसिविर मानव कोशिकाओं को SARS-CoV-2 के संक्रमण से बचाती है। अभी यूएस के खाद्य व औषधि प्रशासन ने कोविड-19 के गंभीर मरीज़ों के लिए रेमडेसिविर के अनुकंपा उपयोग की अनुमति दे दी है।
चीन व यूएस में 5 क्लीनिकल परीक्षण इस बात की जाँच कर रहे हैं कि क्या रेमडेसिविर कोविड-19 के रोग की अवधि को कम कर सकती है और उसके साथ होने वाली पेचीदगियों को कम कर सकती है। कई डॉक्टरों का विचार है कि यही सबसे कारगर दवा साबित होगी। लेकिन अध्ययनों से पता चला है कि यह तभी ज़्यादा कारगर होती है जब रोग की शुरुआत में दे दी जाए। वैसे अभी इस दवा के असर को लक्षणों के स्तर पर ही परखा गया है, खून में वायरस की मात्रा वगैरह पर इसके असर का आकलन अभी शेष है। कुछ डॉक्टरों ने इसके साइड प्रभावों पर भी चिंता व्यक्त की है।
4. एड्स दवाइयों का मिश्रण
शुरू-शुरू में तो लोपिनेविर और रिटोनेविर के मिश्रण से बनी दवा केलेट्रा ने काफी उत्साह पैदा किया था लेकिन आगे चलकर पता चला कि इससे मरीज़ों को कोई खास फायदा नहीं होता है। कुल 199 मरीज़ों में से कुछ को केलेट्रा दी गई जबकि कुछ मरीज़ों को प्लेसिबो दिया गया। देखा गया कि केलेट्रा का सेवन करने वाले कम मरीज़ों की मृत्यु हुई लेकिन अंतर बहुत अधिक नहीं था। और तो और, दोनों के रक्त में वायरस की मात्रा एक समान ही रही। बहरहाल, अभी इस सम्मिश्रण पर कई और अध्ययन जारी हैं और उम्मीद की जा रही है कि आशाजनक परिणाम मिलेंगे।
5. गौण प्रभावों के लिए दवा
कोविड-19 के कुछ मरीज़ों में देखा गया है कि स्वयं वायरस उतना नुकसान नहीं करता जितना कि उनका अपना अति-सक्रिय प्रतिरक्षा तंत्र कर देता है। इसलिए प्रतिरक्षा तंत्र पर नियंत्रण रखने के लिए उपयोग की जाने वाली दवा टॉसिलिज़ुमैब को आजमाया जा रहा है। जल्दी ही कोविड-19 निमोनिया से ग्रस्त मरीज़ों पर ऐसा परीक्षण करने की योजना है। इसी प्रकार की एक अन्य दवा सैरीलुमैब के परीक्षण पर भी काम चल रहा है।
6. रक्तचाप की दवाइयाँ
कुछ वैज्ञानिकों का विचार है कि रक्तचाप की औषधि लोसार्टन कोविड-19 के मरीज़ों के लिए मददगार साबित हो सकती है। मिनेसोटा विश्वविद्यालय ने इस दवा के दो क्लीनिकल परीक्षण शुरू किए हैं। लोसार्टन दरअसल कोशिकाओं पर उपस्थित एक ग्राही को अवरुद्ध करता है। एंजियोटेंसिन-2 नामक रसायन इसी ग्राही की मदद से कोशिका में प्रवेश करके रक्तचाप को बढ़ाता है। SARS-CoV-2 एंजियोटेंसिन-कंवर्टिंग एंज़ाइम-2 (ACE2) के ग्राही से जुड़ता है। सोच यह है कि जब लोसार्टन इन ग्राहियों को बाधित कर देगा तो वायरस कोशिका में प्रवेश नहीं कर पाएगा। लेकिन शंका यह व्यक्त की गई है कि लोसार्टन जैसी दवाइयां ACE2 के उत्पादन को बढ़ा देंगी और वायरस के कोशिका प्रवेश की संभावना बढ़ भी सकती है। इटली में 355 कोविड-19 मरीज़ों पर किए गए एक अध्ययन में पता चला कि जिन मरीज़ों की मृत्यु हुई उनमें से तीन-चौथाई उच्च रक्तचाप से पीड़ित थे। हो सकता है कि उच्च रक्तचाप ने ही इन्हें ज़्यादा खतरे में डाला हो।
कुल मिलाकर, दुनिया भर में कोविड-19 के लिए दवा की खोज के प्रयास ज़ोर-शोर से चल रहे हैं लेकिन इसमें काफी जटिलताएँ हैं। फिर भी इतनी कोशिशों के परिणाम ज़रूर लाभदायक होंगे। अलबत्ता, एक सावधानी आवश्यक है। ये दवाइयाँ अभी परीक्षण के चरण में हैं। स्वयं इनका उपयोग करना नुकसानदायक भी हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

चेहरा छुए बिना रहना इतना कठिन क्यों है?

चेहरा छुए बिना रहना इतना कठिन क्यों है?
जैसे-जैसे कोरोनावायरस का प्रकोप दुनिया में फैल रहा है, लोगों को हिदायत दी जा रही है कि वे एक-दूसरे से कम-से-कम 6 फीट दूर रहें, अपने हाथों को धोते रहें और अपने चेहरे को छूने से बचें। और लोग इन हिदायतों का पालन करने की कोशिश भी कर रहे हैं।
लेकिन नाक-आँख वगैरह में होने वाली खुजली नज़रअंदाज करने की हिदायत देना आसान है, नज़रअंदाज़ करना नहीं। यहाँ तक हिदायत देने वाले भी इसके आवेग में अपने को रोक नहीं पाते। 2015 में, अमेरिकन जर्नल ऑफ इंफेक्शन कंट्रोल में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक संक्रामक रोग की रोकथाम के लिए प्रशिक्षित मेडिकल स्कूल के छात्रों ने एक व्याख्यान के दौरान एक घंटे में 23 बार अपने चेहरे को छुआ।
तो सवाल यह उठता है कि खुद को अपना चेहरा छूने से रोकना इतना मुश्किल क्यों है? लोग अक्सर दाँतों की सफाई, बालों को सँवारने, मेक-अप करने जैसे कामों के चलते अपना चेहरा छूते रहते हैं। दिनचर्या में शामिल चेहरा छूने की ये आदतें फिर आपको निरुद्देश्य ढंग से चेहरा छूने को प्रेरित करती हैं, जैसे आँखों को मसलना।
यह प्रवृत्ति सिर्फ आदत की बात भी नहीं है। केनटकी सेंटर फॉर एन्गज़ाइटी एंड रिलेटेड डिसऑर्डर्स के संस्थापक-निदेशक और मनौवैज्ञानिक केविन चैपमैन लाइव साइंस में बताते हैं कि “यह इस बात को सुनिश्चित करने की आदत है कि हम सार्वजनिक तौर पर कैसे दिख रहे हैं।” उदाहरण के लिए, मुँह के आसपास भोजन के अंश लगे होना यह दर्शा सकता है कोई व्यक्ति गंदा है या वह अपनी प्रस्तुति का ध्यान नहीं रखता है। अपने चेहरे को छूकर लोग खुद को सँवार सकते हैं और यह भी दर्शा सकते हैं कि वे स्वयं के प्रति जागरूक हैं।
हालाँकि चेहरे को छूना कई लोगों में एक बुरी आदत बन जाती है जो चिंताग्रस्त लोगों में और भी बुरी साबित हो सकती है। चैपमैन कहते हैं कि उच्च स्तर के न्यूरोटिज़्म वाले लोग तनाव को कम करने के लिए दोहराव वाले व्यवहार करते हैं। जैसे नाखून चबाना या बालों में हाथ फेरना वगैरह। यह व्यक्ति के जीवन को प्रभावित कर सकता है, जैसे हो सकता है इसकी वजह से उसे अन्य लोगों के साथ जुड़ाव बनाने में दिक्कत हो या वह शक्तिहीन या लज्जित महसूस करे। ब्रेन रिसर्च में प्रकाशित एक छोटे नमूने पर किए गए अध्ययन के मुताबिक, कम गंभीर स्तर पर, लोग तनाव के समय में खुद को शांत रखने के लिए अपने चेहरे को छूते हैं।
रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (सीडीसी) के अनुसार, नए कोरोनावायरस से संक्रमित होने का मुख्य कारण चेहरा छूना नहीं है। फिर भी, सीडीसी नाक, मुँह या आँखों को ना छूने की सलाह देता है क्योंकि यह वायरस इस तरह से फैलता है। और यदि आपने किसी संक्रमित या दूषित सतह को छुआ है तो हाथों को साबुन और पानी से धोना या हैंड सैनिटाइज़र का उपयोग करना कदापि ना भूलें।
चैपमैन बताते हैं कि जब लोग अपना चेहरा ना छूने के लिए सतर्क होते हैं तो संभावना होती है कि वे सामान्य से अधिक बार अपना चेहरा छू लें। जैसे किसी व्यक्ति को गुलाबी हाथी के बारे में ना सोचने को कहा जाए और वह तुरंत ही गुलाबी हाथी के बारे में सोचने लगता है। इस आदत को छोड़ने के लिए यह सोचें कि आप कब-कब अपना चेहरा छूते हैं, लेकिन यदि आप अपने आपको चेहरा छूते हुए पाएं तो खुद को इसकी सज़ा ना दें।(स्रोत फीचर्स)

कोरोना संक्रमितों की सेवा में अब रोबोट

कोरोना संक्रमितों की सेवा में अब रोबोट
- जाहिद खान
दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा फिलवक्त कोविड-19 से बुरी तरह से जूझ रहा है। डॉक्टर, नर्स और तमाम स्वास्थ्य कर्मचारी कोरोना संक्रमित मरीज़ों के इलाज और देखभाल में जी-जान से लगे हुए हैं। समूची मानवजाति के ऊपर आई इस संकट की घड़ी में अब रोबोट भी इंसान के मददगार बन रहे हैं। उन्हें इस खतरनाक बीमारी से उबरने में मदद कर रहे हैं।
राजस्थान में जयपुर स्थित एसएमएस हॉस्पिटल में कोरोना संक्रमित मरीज़ों की सेवा के लिए तीन रोबोट की ड्यूटी लगाई गई है। ये रोबोट कोरोना संक्रमित व्यक्तियों तक दवा, पानी व दीगर ज़रूरी सामान ले जाने का काम करेंगे। रोबोट की ड्यूटी यहाँ लगाए जाने से कोरोना पीड़ितों के आसपास मेडिकल स्टाफ का मूवमेंट कम हो जाएगा। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि हॉस्पिटल में इंसानों की वजह से कोविड-19 वायरस के प्रसार की जो संभावना रहती है, वह काफी कम हो जाएगी। मरीज़ के संपर्क में न आ पाने से बाकी लोगों में संक्रमण नहीं फैलेगा, वे सुरक्षित रहेंगे। ज़ाहिर है, जब डॉक्टर, नर्स और तमाम स्वास्थ्य कर्मचारी सुरक्षित रहेंगे, तो वे अपना काम और भी बेहतर तरीके से कर सकेंगे। देखा जाए तो यह एक छोटी-सी शुरुआत ही है। देश भर के बाकी अस्पतालों में डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी अपने स्वास्थ्य और जान की ज़रा-सी भी परवाह किए बिना मुस्तैदी से अपने फर्ज़ को अंजाम देने में लगे हुए हैं।
‘रोबोट सोना 2.5’ नामक ये रोबोट पूरी तरह भारतीय तकनीक और मेक इन इंडिया प्रोजेक्ट के तहत जयपुर में ही बनाए गए हैं। युवा रोबोटिक्स एक्सपर्ट भुवनेश मिश्रा ने इन्हें तैयार किया है।  सबसे बड़ी खासियत यह है कि ‘सोना 2.5’ रोबोट लाइन फॉलोअर नहीं हैं बल्कि ऑटो नेविगेशन रोबोट हैं। यानी इन्हें मूव कराने के लिए किसी भी तरह की लाइन बनाने की ज़रूरत नहीं होती है। इंसानों की तरह ये रोबोट सेंसर की मदद से खुद नेविगेट करते हुए अपना रास्ता बनाते हैं और लक्ष्य तक पहुँच जाते हैं। इन्हें आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, आईओटी और एसएलएएम तकनीक का शानदार इस्तेमाल करके तैयार किया गया है।
सर्वर के कमांड मिलने पर ये रोबोट सबसे पहले अपने लिए एक छोटे रास्ते का मैप क्रिएट करते हैं। अच्छी बात यह है कि ये किसी भी फर्श या फ्लोर पर आसानी से मूव कर सकते हैं। इन्हें वाई-फाई सर्वर के ज़रिए लैपटॉप या स्मार्ट फोन से भी ऑपरेट किया जा सकता है। ऑटो नेविगेशन होने से इन्हें अंधेरे में भी मूव कराया जा सकता है।
एक खूबी और है कि इनमें ऑटो डॉकिंग प्रोग्रामिंग की गई है, जिससे बैटरी डिस्चार्ज होने से पहले ही ये खुद चार्जिंग पॉइंट पर जाकर ऑटो चार्ज हो जाएँगे। एक बार चार्ज होने पर ये सात घंटे तक काम कर सकते हैं और इन्हें चार्ज होने में तीन घंटे का समय लगता है। यानी इन रोबोट में वे सारी खूबियाँ हैं, जिनके दम पर ये अपना काम बिना रुके, बदस्तूर करते रहेंगे। विज्ञान और वैज्ञानिकों का मानवजाति के लिए यह वाकई एक चमत्कारिक उपहार है जिसे नमस्कार किया जाना चाहिए।
अकेले राजस्थान में ही नहीं, केरल में भी यह अभिनव प्रयोग शुरू किया जा रहा है। कोच्चि की ऐसी ही स्टार्टअप कंपनी ने अस्पतालों के लिए एक खास रोबोट तैयार किया है जो मेडिकल स्टाफ की मदद करेगा। तीन चक्कों वाला यह रोबोट खाना और दवाइयाँ पहुँचाने के काम आएगा। यह पूरे अस्पताल में आसानी से घूम सकता है। इसे सात लोगों ने मिलकर महज 15 दिनों के अंदर तैयार किया है। इसी तरह की पहल नोएडा के फेलिक्स अस्पताल ने भी की है।
डॉक्टरों एवं मेडिकल स्टाफ को कोविड-19 जैसे घातक वायरस से बचाने के लिए रोबोट का इस्तेमाल होगा। कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों के बीच दुनिया भर के अस्पताल काम के बोझ से दबे हुए हैं। मरीज़ों का इलाज और देखभाल करते हुए डॉक्टरों को ज़रा-सी भी फुर्सत नहीं मिल रही है। मरीज़ों की तादाद रोज़ बढ़ती जा रही है। ऐसे में ज़्यादा से ज़्यादा मेडिकल स्टाफ की ज़रूरत है।
इसी तरह की परेशानियों के मद्देनजर आयरलैंड के एक अस्पताल में भी रोबोट्स को काम पर लगाने का फैसला किया गया है। डबलिन के मेटर मिजरिकॉरडी यूनिवर्सिटी अस्पताल में रोबोट्स प्रशासनिक और कंप्यूटर का काम कर रहे हैं, जो आम तौर पर नर्सों के ज़िम्मे होता है। ये रोबोट कोविड-19 से जुड़े नतीजों का विश्लेषण भी कर रहे हैं। इन रोबोट को बनाने वाले एक्सपर्ट्स अपने काम से अभी संतुष्ट नहीं हैं। वे कोशिश कर रहे हैं कि ये रोबोट डिसइन्फेक्शन करने, टेंपरेचर नापने और सैंपल कलेक्ट करने का काम भी कुशलता से कर सकें।
मानव जैसी स्पाइन टेक्नॉलॉजी वाले दुनिया के पहले रोबोट का सबसे पहले इस्तेमाल, उत्तर प्रदेश के रायबरेली स्थित रेल कोच फैक्टरी में पिछले साल 18 नवंबर को किया गया था। ‘सोना 1.5’ नामक इस स्वदेशी ह्यूमनॉयड रोबोट का निर्माण भी रोबोटिक्स एक्सपर्ट भुवनेश मिश्रा ने किया है। इस रोबोट का इस्तेमाल दस्तावेज़ों को एक स्थान से दूसरी जगह ला-ले जाने, विज़िटर्स का स्वागत करने, टेक्निकल डिस्कशन और ट्रेनिंग में हो रहा है।
दरअसल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स के विकास के साथ मानव-रोबोटों को ऐसे कार्यों के लिए तेज़ी से इस्तेमाल किया जा रहा है, जिनमें बार-बार एक-सी क्रियाएँ करनी होती हैं। इस तरह के कामों में वे पूरी तरह से कारगर साबित होते हैं। निकट भविष्य में इसरो अपने महत्त्वाकांक्षी मिशन ‘गगनयान’ के लिए भी एक रोबोट ‘व्योम मित्र’ भेजेगा। देखना है कि रोबोट कैसे हमसफर साबित होते हैं। (स्रोत फीचर्स)

कोरोना वायरस किसी प्रयोगशाला से नहीं निकला है

कोरोना वायरस किसी प्रयोगशाला से नहीं निकला है
नए कोरोना वायरस की वजह से दुनिया परेशान है, वैज्ञानिक इसका इलाज ढूँढने में दिन-रात एक कर रहे हैं, सरकारें इसे फैलने से रोकने के कठिन प्रयास कर रही हैं। लेकिन पूरी कहानी में षडयंत्र की बू न हो तो कुछ लोगों को मज़ा नहीं आता। तो यह सुझाव दिया गया कि यह नया जानलेवा वायरस SARS-CoV-2 वुहान की प्रयोगशाला में बनाकर जानबूझकर छोड़ा गया है। हाल ही में स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने गहन विश्लेषण के आधार पर स्पष्ट कर दिया है कि SARS-CoV-2 कहीं किसी प्रयोगशाला की साज़िश नहीं है। तो उन्होंने यह कैसे पता लगाया?
उनके शोध कार्य का ब्यौरा नेचर मेडिसिन शोध पत्रिका के 17 मार्च के अंक में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों के दल ने इन नए वायरस के जीनोम (यानी पूरी जेनेटिक सामग्री) की तुलना सात ऐसे कोरोना वायरसों से की जो मनुष्यों को संक्रमित करते हैं: सार्स, मर्स और सार्स-2 (ये तीनों गंभीर रोग पैदा करते हैं), HKU1, NL63, OC43 और 229E  (जो हल्की बीमारी के लक्षण पैदा करते हैं)। शोधकर्ताओं का कहना है कि “हमारे विश्लेषण से साफ तौर पर पता चलता है कि SARS-CoV-2 प्रयोगशाला की कृति या जानबूझकर सोद्देश्य बनाया गया वायरस नहीं है।”
स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट में प्रतिरक्षा विज्ञान और सूक्ष्मजीव विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर क्रिस्टियान एंडरसन और उनके साथियों ने वायरस की सतह के उभारों के कंटक प्रोटीन का जेनेटिक सांचा देखा। कोरोना वायरस इन कंटकों का उपयोग किसी कोशिका की सतह को पकड़कर रखने और उसके अंदर प्रवेश करने के लिए करता है। शोधकर्ताओं ने इन कंटक प्रोटीन के दो प्रमुख गुणधर्मों के लिए ज़िम्मेदार जीन शृंखला को देखा। ये दो मुख्य गुणधर्म होते हैं - संडसी (हुक) और छेदक। संडसी वह हिस्सा होता है जो कोशिका की सतह पर चिपक जाता है और छेदक वह हिस्सा होता है जो कोशिका झिल्ली को खोलकर वायरस को अंदर घुसने में मदद करता है।
विश्लेषण से पता चला कि हुक वाला हिस्सा इस तरह विकसित हुआ है कि वह मानव कोशिका की बाहरी सतह पर उपस्थित ACE2 नामक ग्राहियों से जुड़ जाता है। जुड़ने में यह इतना कारगर है कि वैज्ञानिकों का ख्याल है कि यह जेनेटिक इंजीनियरिंग का नहीं बल्कि प्राकृतिक चयन का परिणाम है।
उन्हें ऐसा क्यों लगता है? SARS-CoV-2 एक अन्य वायरस का बहुत नज़दीकी सम्बंधी है जो सार्स के लिए ज़िम्मेदार होता है। वैज्ञानिकों ने इस बात का अध्ययन कर लिया है कि SARS-CoVऔर SARS-CoV-2 में क्या अंतर हैं। इनके जेनेटिक कोड में कई महत्त्वपूर्ण अंतर देखे गए हैं। लेकिन जब कंप्यूटर मॉडल तैयार किया गया तो SARS-CoV-2 के उत्परिवर्तन उसे मानव कोशिका से जुड़ने में बहुत मददगार नहीं रहे। यदि किसी प्रयोगशाला ने जानबूझकर ये परिवर्तन किए होते तो वे कदापि ऐसे उत्परिवर्तनों को नहीं चुनते जो कंप्य़ूटर मॉडल के हिसाब से मददगार नहीं हैं। अध्ययन का निष्कर्ष है कि प्रकृति कहीं अधिक चतुर है और उसने सर्वथा नए उत्परिवर्तनों को चुना है।
एक और मुद्दा है। कुल मिलाकर, इस वायरस की संरचना अन्य कोरोना वायरसों से बहुत अलग है। इसकी संरचना चमगादड़ों और पैंगोलिन में पाए जाने वाले वायरस के कहीं अधिक समान है। इन वायरसों का ज़्यादा अध्ययन नहीं हुआ है और इन्होंने मनुष्यों को हानि पहुँचाई हो, ऐसी कोई रिपोर्ट भी नहीं है।
“यदि कोई एक नया कोरोना वायरस एक रोगजनक के रूप में विकसित करना चाहता तो वह इसे किसी ऐसे वायरस की बुनियाद पर निर्मित करता जो जाना-माना रोगजनक हो।”
वायरस आया कहाँ से और कैसे? यह सवाल सिर्फ वैज्ञानिक रुचि का सवाल नहीं है बल्कि SARS-CoV-2 के भावी परिणामों से जुड़ा है। शोध समूह ने दो परिदृश्य प्रस्तुत किए हैं।
पहला परिदृश्य मानव आबादी को प्रभावित करने वाले कुछ ऐसे कोरोना वायरस से मेल खाता है जो सीधे किसी अन्य जंतु से आए हैं। सार्स के मामले में वायरस सिवेट (मुश्कबिलाव) से आया था और मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (मर्स) के मामले में वह ऊंट से मनुष्य में आया था। अनुसंधान से पता चला है कि SARS-CoV-2 चमगादड़ से मनुष्य में आया है। चमगादड़ से यह वायरस एक मध्यस्थ जंतु (संभवत: पैंगोलिन) में पहुंचा और वहां से मनुष्य में।
यदि यह परिदृश्य हकीकत है तो इस वायरस के मनुष्य में पहुँचने से पहले ही मनुष्य को संक्रमित करने की इसकी क्षमता (रोगजनक क्षमता) तैयार हो चुकी होगी।
दूसरा परिदृश्य यह है कि इसके रोगजनक लक्षण जंतु से मनुष्य में पहुंचने के बाद विकसित हुए हैं। पैंगोलिन में उत्पन्न कुछ कोरोना वायरस ऐसे हैं जिनमें हुक की संरचना SARS-CoV-2 जैसी होती है। इस तरह से पैंगोलिन ने वायरस को मनुष्य के शरीर में पहुँचा दिया और एक बार मनुष्य शरीर में प्रवेश के बाद वायरस ने बाकी के लक्षण (कोशिका के अंदर घुसने के लिए ज़रूरी औज़ार) विकसित कर लिए होंगे। एक बार कोशिका में घुसने की क्षमता आ जाए तो यह वायरस एक से दूसरे मनुष्य में फैलना संभव हो गया होगा।
इस तरह की तकनीकी जानकारी से लैस होकर वैज्ञानिक इस महामारी का भविष्य बता पाएँगे। यदि यह वायरस मनुष्य में पहुंचने से पहले ही रोगजनक था तो इसका मतलब है कि मनुष्यों में से इसके खात्मे के बाद भी यह सम्बंधित जंतु में पनपता रहेगा और फिर से हमला कर सकता है। दूसरी ओर, यदि दूसरा परिदृश्य सही है तो इसके वापिस लौटने की संभावना कम है क्योंकि तब इसे फिर से मानव शरीर में प्रवेश करके एक बार फिर नए सिरे से रोगजनक क्षमता विकसित करनी होगी।(स्रोत फीचर्स)

गर्भ में कोरोनावायरस से संक्रमण की आशंका

गर्भ में कोरोनावायरस से संक्रमण की आशंका
एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार चीन में तीन शिशुओं में जन्म से पहले कोरोनावायरस के संक्रमण की आशंका जताई गई है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह परिणाम अनिर्णायक हैं और गर्भावस्था के दौरान इस वायरस के मां से बच्चे में संक्रमित होने के कोई पुख्ता सबूत नहीं है।
एक अन्य रिपोर्ट में वुहान युनिवर्सिटी के डॉक्टर कोविड-19 से संक्रमित महिला के बारे में बताते हैं जिसने सीज़ेरियन सेक्शन से एक बच्ची को जन्म दिया था। जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार प्रसव के दौरान महिला ने एन95 मास्क पहना था और जन्म के पश्चात शिशु को मां से अलग रखा गया था। नवजात को तुरंत क्वारेंटाइन में रखा गया लेकिन उसमें कोविड-19 संक्रमण का कोई लक्षण नहीं दिखा।
जन्म के दो घंटे पश्चात किए गए परीक्षण से पता चला कि नवजात में SARS-CoV-2 के विरुद्ध दो प्रकार की एंटीबॉडी, IgG और IgM, का स्तर अधिक पाया था। गौरतलब है कि IgG एंटीबॉडी तो शिशु को गर्भावस्था में मां से प्राप्त होती है जबकि IgM एंटीबॉडी गर्भनाल को पार करने में सक्षम नहीं होती है। रिपोर्ट के मुताबिक नवजात में IgM एंटीबॉडी का होना भ्रूण में इस संक्रमण को दर्शाता है। इसके अलावा, नवजात में श्वेत रक्त कोशिकाओं के प्रतिरक्षा प्रणाली रसायन, साइटोकाइंस, के स्तर में भी वृद्धि पाई गई जो संक्रमण का द्योतक हो सकता है। एक अन्य अध्ययन में ज़्होंगनान अस्पताल के डॉक्टरों ने SARS-CoV-2 की एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए 6 नवजात के रक्त के नमूनों का विश्लेषण किया। उन्हें 5 नमूनों में IgG का उच्च स्तर प्राप्त हुआ जबकि 2 नमूनों में IgM का उच्च स्तर देखा गया। दिलचस्प बात यह रही कि सभी नवजात में SARS-CoV-2 टेस्ट निगेटिव था। ऐसे में यह बता पाना मुश्किल है कि यह नवजात वायरस से संक्रमित थे या नहीं।
ऐसी आशंका जताई जा रही है कि एंटीबॉडी के बढ़े हुए स्तर का कारण माताओं के प्लेसेंटा का क्षतिग्रस्त या असामान्य होना हो सकता है, जिससे IgM प्लेसेंटा से गुज़रकर शिशुओं में पहुंच गया हो। गौरतलब है कि IgM परीक्षण फाल्स पॉज़िटिव और फाल्स नेगेटिव परिणाम भी दे सकते हैं।
इसके अलावा, लंदन में एक SARS-CoV-2 संक्रमित महिला के नवजात में भी इस वायरस के पॉज़िटिव परिणाम देखे गए। हालांकि इस मामले में भी स्पष्ट नहीं है कि यह वायरस नवजात में जन्म लेने से पहले आया या उसके बाद। कोविड-19 से संक्रमित नौ गर्भवती महिलाओं पर किए गए प्रारंभिक अध्ययन में SARS-CoV-2 का कोई सबूत नहीं मिला है जिससे यह कहा जा सके कि यह मां से बच्चे में पहुंचा है।(स्रोत फीचर्स)