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Sep 15, 2017

हिन्दी मुस्काई

हिन्दी मुस्काई
- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

बरस बीतते एक दिवस तो
मेरी सुध आई
मन हिन्दी मुस्काई।

गिट-पिट बोलें घर बाहर सब
नाती और पोते
नन्ही स्वीटी रटती टेबल
खाते और सोते
खूब पार्टी घर में अम्मा
बैठी सकुचाई
मन हिन्दी मुस्काई!

ओढ़े बैठे अहंकार की
गर्द भरी चादर
मान करें मदिरा का छोड़ी
सुधामयी गागर
पॉप, रैप के संग डोलती
बेबस कविताई
मन हिन्दी मुस्काई!

अपनों में अपनापन लगता
झूठा- सा सपना
कहाँ छोड़ आए हो बोलो
स्वाभिमान अपना
गौरव गाथा दीन-हीन की
जग ने कब गाई
मन हिन्दी मुस्काई!

एक सवारी

एक सवारी
अंकुश्री
वह बहुत जल्दीबाजी में था। तेजी में जब टैक्सी स्टैण्ड पहुँचा तो आवाज सुनाई पड़ी, 'एक सवारी, एक सवारी।उसे खुशी हुई कि टैक्सी की सवारी पूरी हो  गई  है, मात्र एक सवारी के लिए रुकी हुई है। उसके बैठते ही टैक्सी खुल जाएगी, इसी विश्वास के साथ उछल कर वह टैक्सी में बैठ गया।
आशा के विपरीत टैक्सी में उसके बैठ जाने के बाद भी टैक्सी वाले का चिल्लाना जारी रहा, 'एक सवारी, एक सवारी...
कुछ देर में एक और व्यक्ति आया अैर टैक्सी में सवार हो गया। लेकिन उसके बावजूद तो टैक्सी खुली और टैक्सीवाले का चिल्लाना ही बंद हुआ। लोग एक-एक कर आते गए और टैक्सी में सवार होते गए।
टैक्सी के सभी सवार जल्दी में थे। एक तो जल्दीबाजी के कारण वे घबराए हुए थे, दूसरे उनके शरीर का कोई कोई अंग किसी किसी यात्री से दबा हुआ था। टैक्सी में टसमस होने तक की जगह नहीं बची थी। बेसब्री और परेशानी के कारण सभी यात्रियों की हालत सोचनीय होती जा रही थी। तभी एक और सवारी आकर टैक्सी में बैठा। उसके बैठने पर सभी यात्रियों ने राहत की साँ ली कि अब टैक्सी खुल जाएगी.. लेकिन तभी टैक्सी वाला फिर चिल्लाया, 'एक सवारी, एक सवारी...
सम्पर्क: सिदरौल, प्रेस कॉलोनी, पोस्ट बॉक्स 28,  नामकुम, रांची-834 010

दो कविताएँ

 आँसू
 कृष्णा वर्मा
1.
छिपती ना भीतर की पीड़ा
आँसू चुगली खोर
झट कोरों पे आन बैठते
मौन मचाए शोर
बड़े सहोदर मन भावों के
पकड़े रखते डोर
व्यथा हृदय की लाख छिपाऊँ
पकड़ा देते छोर
हर दुख-सुख में पिघल पड़ें
दिल के हैं कमज़ोर
जन्म के पहले पल के साथी
नयन गाँव ही ठौर
दुख संताप सहें स्वजनों का
बैठ आँख की कोर
अन्तर्मन के घावों पे, करते
चुपचाप टकोर
यूँ तो जीवन यात्रा में मिले
मित्र कई बेजोड़
दिल पे पक्की यारी की बस
यही लगाए मोहर।
अंत समय तक साथ ना छोड़ें
इन सा मित्र ना और।

अभिलाषा
2. 
जब-जब चाहा इस जीवन से
इसने सब भरपूर दिया
नहीं शिकायत कोई रब से
गले-गले सुख पूर दिया।

यूँ तो सदा सरल सुगम से
जीवन की की थी अभिलाषा
करुणाकर थी विधना मुझपर
पूर्ण हुईं मनचाही आशा।

प्रीत बनी प्रिय की मेरी शक्ति
धर संसार हुआ मेरी भक्ति
सहज फूल दो खिले सहन में
हर्षित मन ज्यों चाँद गगन में।

नहीं नैराश्य का संग अपनाया
संयम ही मुझे पग-पग भाया
दिन सुन्दर बने साँझ कुनकुनी
अपनों संग रही खुशी ठुमकती।

चली निरंतर पाने गंतव्य  
मंज़िल पा गए लगभग मंतव्य
प्रिय का सुख सुत श्रवण मिले हैं
नहीं जीवन से कोई गिले हैं।

बेटी की भी कमी रही ना
जब बेटी सी बहू घर आई
बेटे के बेटे ने जन्म ले
रिश्तों में मृदु गाँठ लगाई

मिले-जुले अनुभव जिए सारे
ढली उम्र के सुखद सहारे
जीवन अतल भरा यादों से
रही शिष्ट निज के वादों से।
-0-
सम्प्रति: मूलत: डी.एल.एफ सिटी, गुडग़ाँव की निवासी और वर्ष 2001 से टोरोंटो कनेडा में निवास,  ई मेल-krishnaverma8@yahoo.ca

बॉस का गधा

बॉस का गधा
-सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली
मेरा बॉस अक्सर मुझे गधा कहता है। वैसे तो कहावत है बॉस इका ऑलवेज राइट और मैं इस कहावत को पूरे दिलो-दिमाग से स्वीकार भी करता हूँ पर वो कहते हैं न कभी-कभी कहावत भी गलत साबित हो सकती है और ये कहावत तब बिल्कुल गलत साबित होती है जब मेरा बॉस मुझे गधा कहता है। हालाँकि मैं पूरे दिन बॉस की खातिर इतनी बुरी तरह लगा, खपा और जुटा रहता हूँ कि मेरी इस कड़ी मेहनत को देखकर गधा भी मुझे पूरी इज्जत के साथ सलाम ठोंकने के लिए विवश हो जाए पर मुझे किसी के सलाम की कोई चाहत नहीं है, क्योंकि मैं मेहनती इंसान हूँ और अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए पूरा दिन जी-तोड़ मेहनत करता हूँ। मेरी मेहनत का केंद्र बिंदु सिर्फ और सिर्फ मेरा बॉस होता है। उसकी हर ऐरी-गैरी, उल्टी-सीधी, छोटी-बड़ी और टुच्ची से टुच्ची बात मानना मेरी ड्यूटी है या यूँ कहें कि मेरी मजबूरी है। लोग मजबूरी का नाम पता नहीं किसे-किसे कहते हैं पर मुझे लगता है कि मजबूरी का नाम सिर्फ और सिर्फ मैं ही हूँ। मेरी मजबूरी है अपने बॉस का हुक्म बजाते रहना और उसके इशारों पर हरदम नाचते रहना। वैसे तो मैं सरकारी सेवक हूँ और सरकार के माध्यम से जनता की नौकरी करने के लिए ही भर्ती हुआ हूँ, लेकिन जबसे मैं बड़े सरकारी सेवक यानी कि अपने बॉस के शिकंजे में आया हूँ तबसे मैं उसे ही जनता और जनता की चुनी हुई सरकार मानकर उसकी जी-हुजूरी करने में ही अपना कीमती वक्त बर्बाद कर रहा हूँ। जैसे बॉस मुझे गधा कहता है वैसे ही पूरा दफ्तर उसे गधा कहता है। मतलब कि वो मुझ अकेले को गधा कहता है और दफ्तर के सभी कर्मचारी उस अकेले को गधा कहते हैं। अब लोकतांत्रिक प्रणाली में जिसको अधिक मत मिलते हैं जीतता तो वही है। सो उसके एक मत के मुकाबले दफ्तर के सैकड़ों मत उसका गधा होना सिद्ध करते हैं। शायद इस बात को जानते हुए भी वो इसे स्वीकार नहीं करना चाहता और जब भी मौका मिलता है वो मुझे गधा बोल देता है। कभी-कभी
मेरा जी करता है उस गधे बॉस की गर्दन को किसी मजबूत रस्सी से जकड़कर  उसे उसी की कुर्सी के पाए से जाकर बाँध दूँ और उसके एक जोरदार दुलत्ती मारूँ ; लेकिन फिर मेरा दिमाग ऐसे गधेपन की इजाजत नहीं देता और मैं शांत मुद्रा में बैठकर विचार करता हूँ कि उस गधे को दुरुस्त करने के लिए कुछ न कुछ तो उपाय तो करना ही पड़ेगा लेकिन उसे सुधारने का उसके गले में रस्सी बांधके दुलत्ती जडऩे से बेहतर कोई और उपाय सूझता ही नहीं। फिर मेरे भोले से मस्तिष्क में ये यक्ष प्रश्न कौंधता है कि उस गधे के गले में रस्सी आखिर बाँधे तो बाँधे कौन? और मैं एकदम से उदास हो अपने बॉस को उसके कमरे के दरवाजे में बने गुप्त छेद से बाहर खड़े होकर चुपके-चुपके देखता हूँ और जोर से सांस भीतर खींचकर उसे धीमे -धीमे बाहर छोड़ते हुए बिल्कुल धीमी आवाज में बहुत ही गुस्से में बोलता हूँ 'गधा कहीं का!

मूर्ति विजर्सन में रसायन विज्ञान का उपयोग

मूर्ति विजर्सन में 
रसायन विज्ञान का
उपयोग 

- नवनीत कुमार गुप्ता
राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी एनजीटी ने प्लास्टर ऑॅफ पेरिस (पीओपी) प्रतिमाओं पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया है, और देश के कई हिस्सों में इस पर प्रतिबंध भी है। इसके बावजूद इसका व्यापक उपयोग चिंता का विषय है। इसलिए हमें इससे निपटने के वैकल्पिक तरीकों का विकास करना होगा।
नागपुर स्थित राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) ने पीओपी मूर्तियों के विसर्जन में अमोनियम बायकार्बोनेट नामक एक पदार्थ को उपयोगी पाया है। अमोनियम बायकार्बोनेट के उपयोग से प्लास्टर  फ पेरिस बहुत कम समय में विघटित हो जाता है।
अमोनियम बायकार्बोनेट प्लास्टर  फ पेरिस के साथ अभिक्रिया करके कैल्शियम कार्बोनेट और अमोनियम सल्फेट में विघटित हो जाता है। सबसे खास बात यह है कि विघटन के बाद बचे पदार्थों को दोबारा उपयोग किया जा सकता है। अमोनियम सल्फेट एक जाना-माना उर्वरक है जिसका उपयोग खेतों में किया जाता है। इस प्रकार प्लास्टर  फ पेरिस के विघटन से प्राप्त अमोनियम सल्फेट का उपयोग खेतों में हो सकेगा।
विघटन के बाद अमोनियम सल्फेट जल की उपरी पर्त में तैरने लगता है। इसका उपयोग मिट्टी की क्षारीयता को कम करने के लिए भी किया जाता है। प्लास्टर  फ पेरिस के विघटन से प्राप्त दूसरा पदार्थ कैल्शियम कार्बोनेट नीचे तली में बैठ जाता है जिसका उपयोग सीमेंट उद्योग में दोबारा से किया जा सकता है।
नीरी ने इस वर्ष गणेश पूजा के दौरान प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए तीन टंकियाँ बनाई हैं जिनमें से दो में इस तकनीक के उपयोग की तैयारी की जा रही है। इसके परिणामस्वरूप जो प्रतिमाएँ गलने में बहुत दिनों का समय लेती थीं वे जल्द गल जाएँगी और उनके गलने पर जो पदार्थ शेष बचेंगे उसमें से अधिकतर का उपयोग दोबारा से किया जा सकेगा। इस प्रकार इस तकनीक के उपयोग से जहाँ जल प्रदूषित होने से बचेगा, वहीं विभिन्न पदार्थों को दोबारा से उपयोग किया जा सकेगा। इस प्रकार यह तकनीक पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण साबित होगी।
नीरी द्वारा इस वर्ष प्रयोगात्मक आधार पर इस पद्धति का उपयोग किया जाएगा। जब प्लास्टर  फ पेरिस से बनी मूर्तियों को पानी में छोड़ दिया जाता है तो इसके गलने से मुक्त होने वाली अनेक भारी धातुएँ पानी में पहुँचती हैं जो जलीय जीवन के लिए हानिकारक होती हैं। इसके अलावा, पानी में घुलित ऑॅक्सीजन के स्तर में कमी आती है और जलीय जीव प्रभावित होते हैं। पिछले साल हैदराबाद और उसके आसपास के क्षेत्रों में ही करीबन एक लाख से अधिक गणेश मंडल दर्ज किए गए थे। इन सभी मंडलों की मूर्तियाँ आसपास की 141 झीलों में विसर्जित की गईं थी। औसतन प्रत्येक झील में 500 मूर्तियाँ विसर्जित हुई होंगी। इतनी बड़ी संख्या में मूर्तियों के विसर्जन के कारण जल स्रोत भी प्रदूषित हुए।
आजकल इको- फ्रेंडली तरीके से त्यौहार मनाने पर ज़ोर दिया जा रहा है। ऐसे में हम सभी को पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से ऐसे ही तरीके अपनाने चाहिए जो प्रदूषण को कम करते हों। (स्रोत फीचर्स)