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Aug 15, 2017

बस इन्सान बनना है

 बस इन्सान बनना है
        - डॉ. पूर्णिमा राय
न हिन्दू सिक्ख ईसाई न ही शैतान बनना है।
गिरा कर वैर की दीवार बस इन्सान बनना है।।

दिखे रोता अगर कोई तो-उसके पोंछ कर आँसू
खुदा के नूर के जैसी हमें मुस्कान बनना है।।

ख़ुशी रूठी है- जिन लोगों से- उनको हौसला देकर;
 सिसकते आँसुओं का खो चुका अरमान बनना है।

बहाकर प्रेम की धारा समर्पण के इरादों से;
दिलों को जीत  ले ऐसा हमें सम्मान बनना है।।

बुराई देखते हैं जो उन्हें भी खुशबुएँ देकर;
सजा दे ‘पूर्णिमा’ जो घर वही गुणवान बनना है।।

सम्पर्क: ग्रीन ऐवनियू घुमान रोड, तहसील बाबा बकाला मेहता चौंक-143114, अमृतसर (पंजाब) 7087775713

दिल बड़ा कीजिए

दिल बड़ा कीजिए
                    - विजय जोशी 
            (पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल)
जिन्दगी भव्य और विशाल है, जिसके विस्तृत मंच पर आप अपने कार्य रूप आयोजन को अंजाम देते हैं। दिल बड़ा करके साथियों के साथ संबंध निर्वाह वह अनमोल निधी है जो सबके हृदय में आपके प्रति शुभच्छाओं, संवेदना, सहानुभूति और स्नेह का संस्कार जगाकर उसे सुंदर कर देती है। छोटा दिल स्वार्थ व कंजूसी का  पर्याय है, जो आपके मार्ग में अवरोध बनकर मुश्किलें पैदा करता है।
एक बार एक गुरू ने अपने असंतुष्ट शिष्य को एक ग्लास पानी में नमक डालकर पीने के लिये कहा और पूछा- कैसा है स्वाद।
भयानक- शिष्य ने थूकते हुए कहा।
अब गुरू ने उसी मात्रा में नमक लेकर एक झील में मिलाने के लिये कहा। वे खामोशी से झील के नजदीक पहुंचे और नमक जल में डाल दिया। गुरू ने कहा- अब जल ग्रहण करो।
शिष्य ने पहला घूंट लिया ही था कि फिर पूछा गया उसी से - स्वाद कैसा है जल का।
बहुत अच्छा मीठा - शिष्य ने कहा
क्या अब भी नमक का स्वाद आ रहा है- गुरु ने पूछा।
बिल्कुल नहीं- शिष्य का उतार था।
और तब गुरू ने कहा- हमारे जीवन में दुख या दर्द की मात्रा उतनी ही रहती है, किन्तु हम उसका स्वाद किस प्रकार चखते हैं यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं।
अत: जब भी दर्द का अनुभव करने की बात हो, सिर्फ यह करें कि दिल का आकार बड़ा कर लें।
बात सिर्फ इतनी सी है हमें अपने निजी जीवन में ग्लास बनने के बजाय झील बनने का प्रयत्न करना चाहिये। इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि दर्द तो वही होगा, लेकिन उसकी तीव्रता न्यूनतम होकर हमें विचलित नहीं कर पाएगी। आपने देखा होगा बड़े दिल वाले हमेशा अलमस्त, प्रसन्न एवं खुश मिजाज़ पाए जाते हैं, जब कि होटे दिल वाले सदा अप्रसन्न एवं दुखी। दिलदार लोग छोटी मोटी समस्याओं या दुखों का कोई नोटिस ही नहीं लेते, उनकी रंचमात्र भी परवाह नहीं करते और अंतत: यही गुण उनके व्यक्तित्व की क्षमता बनकर उभरता है।

प्यार करना सीखें, घृणा से पार पाएँ

अंतस में कोमल भाव ईश्वर ने मनुष्य को इसलिये प्रदान किये हैं ताकि वह जीवन को भावपूर्ण बनाते हुए जी सके। भाव के अभाव में तो जीवन एक मशीन का कल पुर्जा बनकर रह जाता है। प्यार वह ईश्वरीय देन है जो हमें एक दूसरे के हृदय से जोड़कर रखती है। ऊपरी रिश्ता टूट सकता है, लेकिन अंतस का रिश्ता तो अजर अमर और  अविनाशी है। इसके लिये यह अनिवार्य है कि हम अपने व्यक्तित्व में प्यार की फसल उपजाएं और घृणा को विदा करें।
एक बार एक शिक्षक ने अपने छात्रों को एक खेल खेलने को कहा कि हर एक अपने साथ एक झोले में आलू लाए और हर एक एक आलू पर एक एक कर उसका नाम लिखे, जिसे वह सख्त रूप से नापंसद या घृणा करता है।
कक्षा में उपस्थित करीब करीब सब बच्चों ने ऐसा ही किया। तब शिक्षक ने वे तमाम आलू उन्हें एक झोले में रखकर उस झोले को सदा अपने पास ही रखने को लिये कहा। समय के साथ आलू सड़ते गए और उन सड़ रहे आलूओं की दुर्गध को सहना हर छात्र के लिये कठिन हो गया।
जिसके पास जितने अधिक सड़े आलू थे, वह उतना ही अधिक बेचैन था।
एक सप्ताह बाद खेल समाप्त हुआ। शिक्षक ने पूछा - कैसा रहा आलू सहजने का अनुभव। बच्चे शिकायत करने लगे।
और तब शिक्षक ने समझाया - यह जीवन के लिये अनमोल सीख है जब आप दूसरों के प्रति घृणा अपने हृदय में सहेजते हैं तो उससे आपका ही हृदय प्रदूषित होता है। जब आप केवल एक सप्ताह सड़े आलूओं का बोझ नहीं सह सके तो फिर तमाम उम्र अप्रिय घटनाओं का बोझ अपने हृदय में क्यों संजोते हैं। वे सदैव आपको व्यथित एवं  दुखी करेंगी।
इसलिये यह आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य है कि  आप घृणा के बीज का रोपण अपनी हृदय की प्यार भरी धरती पर होने ही न दें। सद्विचार व स्नेह  की फसल जब आपके अंतस में लहलहाएगी तो सोचिये आप कितनी प्रसन्नता का अनुभव करेंगे। दूसरे जो भी करें करते रहें, आप तो रामायण के अनुसार भलाई पर ही डटकर निर्भय रूप से जमे रहें -भलो भलाई ये लहई।

प्राकृतिक आपदा

 बचाव की पूर्व तैयारी 
- भारत डोगरा
मानसून का समय बाढ़, भूस्खलन व भूमि कटाव की दृष्टि से अधिक सावधानियाँ अपनाने का समय होता है। अधिक बाढ़ की संभावना को कम करने के लिए तटबंधों पर पैनी नजर रखना ज़रूरी है। तटबंधों में दरारों पर भी समुचित ध्यान देना होगा। नए तटबंध बनाने की बजाय मौजूदा तटबंधों की सही देख-रेख पर ध्यान देना बेहतर है। और इस मामले में मात्र अपने निरीक्षण से संतुष्ट रहने के स्थान पर गाँववासियों की शिकायतों पर समुचित ध्यान देना चाहिए।
बांध प्रबंधन के बारे में भी बाढ़ नियंत्रण के समुचित दिशा निर्देश ज़रूरी हैं। हाल के वर्षों की विनाशकारी बाढ़ों के बाद चले आरोप-प्रत्यारोप में कई मुद्दे बार-बार सामने आए हैं। एक मुद्दा यह रहा है कि बांध प्रबंधन में प्राय: बाढ़ नियंत्रण को उतना महत्त्व नहीं दिया जाता जितना बिजली उत्पादन को दिया जाता है। पिछले अनुभवों से सीखते हुए बाढ़ से बचाव पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
एक मुद्दा यह भी उठा है कि बाँध का पानी छोड़ते समय समुचित चेतावनी नहीं दी गई या चेतावनी लोगों तक समय पर नहीं पहुँची। इस बारे में अधिक सावधानी बरती जा सकती है।
हिमालय व पश्चिम घाट जैसे कुछ अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन को कम करने के लिए पहले से बेहतर प्रयासों की ज़रूरत है। चिंहित गंभीर भूस्खलन स्थानों पर पैनी नजर रखना होगा ताकि स्थिति अधिक विकट होने की आशंका हो तो समुचित सुरक्षा व्यवस्था समय पर की जा सके। दूर-दूराज के पर्वतीय गाँवों से लोग अपनी शिकायत व जानकारी दर्ज कर सकें, इसके लिए सरकारों को व्यवस्था बनानी चाहिए। चिंहित स्थलों के अतिरिक्त कई भूस्खलन स्थल हाल ही में उत्पन्न हुए हैं। इनकी भी उपेक्षा न हो।
भूमि कटाव से पीडि़त लोग कुछ संदर्भों में सबसे अधिक उपेक्षित हैं। जिन परिवारों की भूमि नदी छीन लेती है प्राय: उनका संतोषजनक पुनर्वास नहीं हो पा रहा है। चाहे बहराईच हो या सीतापुर या गज़ीपुर या मालदा या मुर्शिदाबाद, नदी कटान से प्रभावित स्थानों से ऐसे समाचार मिलते ही रहे हैं कि नदी द्वारा भूमि कटान से पीडि़त लोग भूमिहीन और कभी-कभी तो आवासहीन होकर रहने को मजबूर हैं। ऐसा नहीं है कि उनके पुनर्वास के लिए ज़मीन कभी उपलब्ध नहीं होती है। ऐसे कुछ स्थानों पर प्रभावित लोगों ने स्वयं बताया कि उन्हें किन स्थानों पर बसाया जा सकता है। लगता है कि प्रशासन इन लोगों की समस्याओं के प्रति उदासीन रहा है। अथवा उच्च स्तर पर उचित नीति न बनने के कारण वह समय पर निर्णय नहीं ले पाता है। अत: इस बारे में विभिन्न राज्य सरकारों को भी पहल करनी चाहिए अथवा केंद्र सरकार की ओर से ज़रूरी निर्देश आने चाहिए। इस बारे में न्यायसंगत नीति तो बनानी ही चाहिए। साथ में नदी-कटाव की अधिक संभावना वाले क्षेत्रों के प्रशासन को पहले से तैयारी रखनी चाहिए कि जो भी लोग ऐसी त्रासदी से प्रभावित हों उन्हें वर्षा के दिनों में रहने का उचित स्थान मिल सके व अन्य राहत भी उन तक पहुँच सके।
आकाशीय बिजली की आपदा हाल के वर्षों में अधिक जानलेवा हो रही है। इससे जीवन की रक्षा के लिए इसकी अधिक संभावना वाले क्षेत्रों में, विशेषकर स्कूलों जैसे सार्वजनिक स्थानों में तडि़त चालकों की व्यवस्था करनी चाहिए व इनकी उपलब्धता बढ़ानी चाहिए। इसके अतिरिक्त लोगों में बचाव के उपायों का प्रचार करना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

न काहू से दोस्ती न...

क्यूँ... मन माँगे मोर
- साधना मदान
बार- बार खाने की मेज़ पर रुचि अपने हाथों बनाई खीर सबको खिलाना चाह रही थी। नीले परदे के पास वाली कुर्सी से वाह! वाह! की आवाज़ सुनकर रुचि की आँखें जगमगा गईं पर यह आवाज़ खीर के स्वाद से भरी नहीं थी बल्कि चार वर्ष की बच्ची का चुटकुला सुनकर आई थी। फिर एक दिन काम्या ने बिना झिझक आफ़िस के दोस्तों के सामने कविता पाठ कर ही दिया। अब तालियों की गूँज सुनने के लिए उसके कान मानो बिखरते पानी से बहने लगे तब फिर कहीं से खनखनाती सी आवाज़ आई ...कुछ फिल्मी हो जाता तो बात बन जाती। अभी दो एक दिन की बात है, खूबसूरत लगने की ललक में मोहिनी ने पाँच छ: जोड़े ऑन लाइन कपड़े खरीद लिए और जब एक- एक कर पहने तो सामने वाले ने टुकुर- टुकुर देखा तो सही, पर बोलने के लिए जैसे भाषा ही भूल गया या मूक होने का अभिनय करने लगा। अब रुचि, काम्या और मोहिनी किसी अज्ञात वास में चली गईं कि हाय! किसी के मुख से दो शब्द भी प्रशंसा के न फूटे। क्या मैं व्यर्थ ही सबके लिए माथा मारती हूँ ? या मैं अब किसी के लिए कुछ नहीं करूँगी। तारीफ़ के दो शब्दों की भी मैं अब मोहताज हो गई हूँ। बस, मुझे पहले ही पता था कि मेरा कोई अपना नहीं। बस, अब कभी ये कुछ करें.. मजाल मेरी, जो देख भी जाऊँ। आज की दुनिया का हाल ही बुरा है। देखकर भी नहीं देखते।
दोस्तों! इसी उठा पटक में, वाहवाही के दो बोल की चाहना हमें अँधेरे कोठरे में बंद कर देती है। हम निराशा की धुंध में खोए- खोए से रहने लगते हैं। अपनी एक दुनिया रचते हैं जिसमें विचारों के तीखे बाण सहेज कर रख लेते हैं । फ़ेज़ बुक या वाट्स एप की गलियों में लाइक्स ढूँढने निकल पड़ते हैं। एक -एक झरोखे में दूषित निंदा-द्वेष के प्रकंपन फैलाने में जुट जाते हैं।
कई बार मन की हवाएँ बार -बार हिलोरे लेकर कुछ गुनगुनाती हैं और उन गाती तरंगों का स्वर जानते हैं आप ज़रुर वही बीते पल, जब अमुक ने मुझे ...अच्छी लग रही हो कहकर सहलाया था या फिर आज तो तुमने जो शापिंग कराई ,उसका जवाब नहीं या फिर जो भाषण दिया वाह -वाह ! हो गई या फिर सबके बीच मेरे काम , नाम और शान का राग अलापा गया ...वो पल तो मैं कभी न भूलूँ। दोस्तों! सोचती हूँ क्या मेरी खुशी का आधार मात्र यही पल हैं। मैं तभी मस्त हूँ ...जब मैं -मैं के दौर में मेरे पिलपिले अहं को हर कोई कोमलता का स्पर्श देता रहे। मेरी निंदा करने वालों के एक -एक कर नाम लेता रहे और मैं अपनी आत्म- प्रशंसा की तलवार से उन सबको धाराशायी करती रहूँ। तुम मेरे तब तक अपने हो जब तक मेरी किसी गलती पर छींटाकशी न करो। जहाँ मेरी जीवन की चलती कार में हलका गेयर बदलने की आवाज़ उठाई वहीं अहं का धुँआ फैलने लगेगा। बस ,रिश्ता केवल इतना कि हाँ में हाँ का बाजा बजाओ वरना तुम कौन हो मेरे इस जहाँ में।
  कुछ सवाल ज़हन में उठते हैं कि सबके साथ का सितार तभी बजेगा ,जब सारे तार मैं ही बजाऊँ या जो भी मैं करूँ कोई तो वाह- वाही के दो शब्द कहो। ऐसा न हो तो हमारा सारा कर्म क्षेत्र किसी अज्ञात वास में डूब जाता है। यदि इसी भाव को मैं एक सच का आइना जैसे चश्मे से देखूँ तो मैं अलग ही दृश्य देखती हूँ कि मेरे हाथ में एक कटोरा है और मैं सबसे कहती हूँ मेरी प्रशंसा में कुछ तो कह डालो पर तब देखती हूँ एक अजब नज़ारा कि कोई कुछ भी नहीं देता -पता है क्यों नहीं दे पाता क्योंकि स्वयं देने वाले के पास भी दूसरों की महिमा गाने के लिए न तो भाव है और न शब्द या फिर उत्साह, उमंग की चढ़ती कला में ले जाने की उड़ान वाले पंख। साथियों! समस्या है तो समाधान भी है। बीमारी है तो इलाज भी है। प्रश्न है तो प्रसन्नता भी है। वास्तव में प्रसन्न रहने के लिए ही प्रशंसनीय काम करने पड़ते हैं। कैसा वजूद हो मेरा कि मैं पहले स्वयं से ही संतुष्ट रहना सीख लूँ। जो भी करुँ नि:स्वार्थ होकर करुँ। किसी को छोटा दिखाने या इष्र्या द्वेष से भरे मन से न करुँ। अपने किसी काम में या बोल में या संकल्प में चित्त की चंचलता को प्रवेश न दूँ। कोई मान ले तो ठीक न माने तो अहं से परे हो जाऊँ। विवाद न हो, संवाद हो तो दोस्तों हमारे भी दिन बदलेंगे। सब हमारा भी इंतज़ार करें, कोई यह कहे आपकी ही राह देख रहे हैं। तब मेरे मन के झरोखों से बयार यह कहेगी प्रशंसा पानी है तो अपने ऊपर आप ही कृपा कर। बहसबाज़ी, अपेक्षाएँ, मैं -मैं, आवेश, क्रोध, चिढ़चिढ़ाहट, रोक-टोक और व्यर्थ के बोल ही हैं जो हमें निंदा का व दोषी होने का बाना पहनाती हैं। अपने आइने को सा$फ रखें तो और भी हमारी छवि को भली प्रकार निहार पाएँगे। अब कोई प्रशंसा करे न करे मेरा मन, बुद्धि और संस्कार तो हंस जैसा बन ही रहा है क्योंकि मैंने कंकर चुनना छोड़ दिया है। गुण और विशेषताओं का शर्बत पीती हूँ तो रूहानियत के नशे में मस्त हो जाती हूँ। ऐसे में कबीर साहब से मुलाकात के पट फिर खुल जाते हैं और कबीर कर्म का कपड़ा बुनते-बुनते मुझसे कहते हैं...न काहू से दोस्ती न काहू से बैर...तब मेरा भरपूर मन अपने कटोरे में संतोष और सहयोग का प्रसाद देख आनंद के हिलोरे लेने लगता है।

सम्पर्क: प्रवक्ता हिंदी, कुलाची हंसराज मॉडल स्कूल, अशोक विहार दिल्ली

तुझे जाना बहुत दूर है


तुझे जाना बहुत दूर है 
- अबुज़ैद अंसारी
हार कर तू हार को
क्यों अपनी हार मानता है।
बीच राह में क्यों ठिठक कर
लक्ष्यहीन हो तू खड़ा है।
लक्ष्य को आयाम दे
पंखों को उड़ान दे
तेरा लक्ष्य बहुत दूर
तुझे जाना बहुत दूर है।

उपवनों को देखकर
क्यों रुके तेरे क़दम
साथियों की महफि़लों में
कहाँ खो गए पथिक तुम
हे ! पथिक चलो बढ़ो
लक्ष्य बहुत दूर है।
तेरा लक्ष्य बहुत दूर
तुझे जाना बहुत दूर है।

कंटकों का पथ है आगे
तम से ना डरो पथिक
तुम निरंतर बढ़ चलो
पर्वतों पर चढ़ चलो
तुम अजेय बनो पथिक
तुम बनो शूर
तेरा लक्ष्य बहुत दूर
तुझे जाना बहुत दूर है।

कल जो तुझमे लालसा थी
वह कहाँ गई पथिक
क्यों रुके तेरे क़दम
चल पड़ो तुम हे! पथिक
कंटकों से, उपवनों से
पर्वतों से आगे
लक्ष्य बहुत दूर है।
तेरा लक्ष्य बहुत दूर
तुझे जाना बहुत दूर है।

abuzaid.study@gmail.com