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Apr 20, 2017

मौसमी बाल मृत्यु में लीची की भूमिका

         मौसमी बाल मृत्यु में लीची की भूमिका 
मुजफ़्फरपुर (बिहार) देश का सबसे बड़ा लीची उत्पादक क्षेत्र है। ताज़ा शोध बताता है कि यही लीची उस इलाके में मौसमी बाल मृत्यु का कारण है। भारत के राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र और यूएस के राष्ट्रीय रोग नियंत्रण व रोकथाम केंद्रों ने संयुक्त रूप से मुज़्जफ़रपुर में होने वाले रहस्यमय तंत्रिका-रोग पर शोध किया है। यह रोग 1995 से हर वर्ष कई बच्चों की जान लेता आ रहा है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि लीची फल पर दो विषैले पदार्थ चिपके होते हैं - हायपोग्लायसीन-ए तथा मीथायलीन-सायक्लोप्रोपाइलग्लायसीन (एमसीपीजी)। यही तंत्रिका रोग व मृत्यु के लिए जि़म्मेदार हैं। पहली बार मनुष्यों से लिए गए जैविक नमूनों में इन विषों के विघटन से बने पदार्थों, मानव चयापचय पर इन विषों के असर का अध्ययन हुआ है। शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि इन विषों के प्रभाव पर शाम के समय भोजन लेने का क्या असर होता है।
उपरोक्त दोनों संस्थाओं के शोधकर्ताओं ने पहले तो अस्पतालों में प्रयोगशाला जांच के माध्यम से पता किया कि क्या इस रहस्यमय रोग का कोई संक्रामक या गैर-संक्रामक कारक पता चलता है। इसके बाद लीची की जांच की गई जिसमें रोगजनक सूक्ष्मजीवों, विषैली धातुओं तथा अन्य गैर-संक्रामक कारकों का विश्लेषण किया गया। इनमें फल-आधारित विष हायपोग्लायसीन और एमसीपीजी भी शामिल थे। 2014 में अस्पतालों में भर्ती 390 मरीज़ों की जांच से पता चला कि एनसेफेलोपैथी के प्रकोप के पीछे इन्हीं दो विषों की भूमिका है। ये विष शरीर में चयापचय को प्रभावित कर हायपोग्लायसेमिया की स्थिति निर्मित कर देते हैं। हायपोग्लायसेमिया उस स्थिति को कहते हैं जब रक्त में ग्लूकोज़ का स्तर बहुत कम हो जाता है।
उत्तरी बांगलादेश, उत्तरी वियतनाम सहित दुनिया के कई हिस्सों में इसी तरह के रोग के प्रकोप होते रहे हैं और वे सब लीची उत्पादक क्षेत्र हैं।

शोधकर्ताओं का मत है कि इस तंत्रिका रोग के प्रकोप के कारण होने वाली मत्यु से बचाव का तरीका यह है कि लीची का उपभोग कम किया जाए, और रोग के लक्षण प्रकट होते ही बच्चों को शाम के समय अतिरिक्त भोजन दिया जाए ताकि उनके खून में ग्लूकोज़ के स्तर को ठीक किया जा सके। (स्रोत फीचर्स)

वसीयत

              वसीयत 
                                                - डॉ.किरण वालिया
आज पूरी हो गई मेरी वसीयत
कई दिनों से
मेरे काँपते हाथ
कलम का बोझ
सह नहीं पा रहे थे...

मेरी आँखों को
न जाने क्यों
धुँधला धुँधला दिखता था....
मेरा यह मन
न जाने कौन से जन्मों का
दर्द समेटे था ...
पर आज सब कर्ज़
उतार दिए मैंने।

दे डाले सारे अंगारे
उड़ेल दिया सारा प्यार
अपनी ममता
अपना विश्वास
अपनी पीड़ा
अपना उल्लास
अपना उन्माद
अपना संघर्ष
अपने रिश्ते
सारे नाते
सब तुम्हें निभाने हैं अब
लो लिख डाला है मैंने अपना
वसीयतनामा।

सम्पर्क: प्राचार्या, कमला नेहरू कॉलेज फार विमेन, फगवाड़ा, पंजाब

बिचौलिए

 बिचौलिए  
- मीना गुप्ता
दिसम्बर का महीना था ...ठण्ड अपनी जोरों पर थी। आस-पास की चीजों को अपदस्थ  करके कोहरे ने जबरदस्त अधिकार जमा रखा था .सुबह के पाँच बज चुके थे। पति ने कहा आज कॉलोनी में सुबह चार बजे से चार संदिग्ध लोग दिख रहे हैं.... मैंने व्यस्तता में जवाब दिया- तो पूछा लेना था आप लोग कौन हैं ?  कहकर मैं मॉर्निंग-वाक के लिए निकल पड़ी धुंधलका था। गली के मोड़ पर पहुँची ही थी कि स्टाफ के कई लोग एक साथ झुण्ड बनाए हुए नजर आए। मैंने माजरा समझना चाहा... क्या हो गया सिन्हा सर?
...मैडम एकदम शुद्ध शहद है, ले लीजिए। हम सभी ने ली है ..पाण्डेय जी ने एक किलो लिया, बिसेन जी ने एक किलो लिया, बड़े बॉस ने भी दो किलो लिया है।
आप कैसे कह सकते है कि एकदम शुद्ध है ?
हमारे सामने ही निकाला है... समवेत स्वर में वे बोल उठे।
अच्छा तो ये वही लोग है... जो सुबह से कॉलोनी में घूम रहे हैं?
हाँ मैडम हम चार बजे से लगे हैं ....शहद निकलने वालों में से एक बोला।
अपने खाद्य के साथ चिपकी उन बेदम मक्खियों को देख मेरा मन लेने से इनकार कर गया।
मैंने पूछा आप लोग कहाँ से आए हैं ?
बोले-  मैडम हम बहुत दूर के रहने वाले हैं ....
मुझे उन पर तरस आ गया... ठीक है दे दो- क्या रेट है? उसके बोलने से पहले ही स्टाफ के एक मेंबर ने चुपचाप उँगली से इशारा किया तीन। एक किलो शहद का तीन सौ देकर मैं घर आई। मैं खुश थी शुद्ध शहद तीन सौ में।
थोड़ी देर में बाहर से आवाज आई मैडम शहद ले लीजिए।
खिड़की से ही मैंने उन्हें बताया मैं ले चुकी हूँ . ...उनकी भरी हुई बाल्टी खाली हुई देख मैंने पूछा कितनी कमाई हुई?
उनमें से एक ने कहा ....तीन सौ।
मगर ... तुम्हारी बाल्टी तो भरी हुई थी!
हाँ ... भरी थी बीच में खाली हो गई।
मतलब?
कॉलोनी के बड़े सर ने पैसे नहीं दिए
क्यों?
बोले-  हमने तुम्हें अन्दर आने को परमिट किया है...
बाकी ने?
बाकी बोले- हम तुम्हें लेकर आए हैं।
कहकर चारो जल्द ही कॉलोनी से बाहर हो गए कि कहीं बिचौलिए फिर न घेर लें।

शोध

  एक झूठ सौ बार बोला जाए तो...
यह काफी पुरानी कहावत है कि एक झूठ को सौ बार बोला जाए तो वह सच लगने लगता है। सोशल मीडिया के ज़माने में यह बात और भी सही साबित हो रही है। फर्जी खबरों से परेशान होकर गूगल और फेसबुक ने वादा किया है कि वे इस समस्या से निपटने के प्रयास कर रहे हैं। मगर सवाल यह है कि क्या यह वाकई एक समस्या है और क्या लोग वाकई इतने भोले-भाले होते हैं कि झूठ को बार-बार बोलने से उस पर यकीन करने लगें?
कुछ अध्ययनों से तो लगता है कि सचमुच ऐसा ही होता है। यू.एस. के एक पत्रकार क्रेग सिल्वरमैन ने कुछ ऑनलाइन झूठी खबरों का विश्लेषण करने पर पाया कि झूठी खबरों को ज़्यादा तवज्जो मिलती है , बनिस्बत उन आलेखों के जो इन खबरों का पर्दाफाश करने की कोशिश करते हैं।
शायद आपको लगे कि आप ऐसी झूठी खबरों के जाल में नहीं फँस सकते। मगर 1940 में किए गए एक अध्ययन का निष्कर्ष था कि - कोई अफवाह जितनी ज़्यादा बार कही जाए, वह उतनी ही संभव लगने लगती है।  इसका मतलब है कि कोई अफवाह सिर्फ प्रसार के दम पर लोगों के विचारों और अभिमतों को प्रभावित कर सकती है।
इसके बाद 1977 में एक और अध्ययन ने इसी बात को थोड़ा अलग ढंग से प्रस्तुत किया था। यूएस के कुछ शोधकर्ताओं ने कॉलेज के विद्यार्थियों से किसी वक्तव्य की प्रामाणिकता को लेकर पूछताछ की। उन्हें बताया गया था कि वह वक्तव्य सही भी हो सकता है और गलत भी। शोधकर्ताओं ने पाया कि यदि उसी वक्तव्य को कुछ दिनों बाद फिर से दोहराया जाए ,तो इस बात की संभावना बढ़ती है कि विद्यार्थी उस पर यकीन करने लगेंगे।
वर्ष 2015 में वान्डरविल्ट विश्वविद्यालय (टेनेसी) की लिज़ा फेजिय़ो ने एक अध्ययन में देखा कि चाहे विद्यार्थी जानते हों कि कोई कथन गलत है, मगर यदि उसे दोहराया जाए, तो काफी संभावना बनती है कि वे उस पर विश्वास कर लेंगे। फेज़ियो का कहना है कि झूठी खबरें लोगों को तब भी प्रभावित कर सकती हैं ,जब वे जानते हैं कि वह झूठी है। वही खबर या वही सुर्खियाँ बार-बार पढऩे पर लगने लगता है कि शायद वह सच है। लोग प्राय: जाँच करने की कोशिश भी नहीं करते।
मसलन, हाल में किए गए एक अध्ययन में यूएस के हाई स्कूल छात्रों को एक तस्वीर दिखाई थी। इसमें बताया गया था कि दुर्घटना के बाद फुकुशिमा दाइची परमाणु बिजली घर के आसपास पौधों पर विकृत फूल उग रहे हैं। जब यह पूछा गया कि क्या वह तस्वीर बिजली घर के आसपास की स्थिति का प्रमाण माना जा सकता है, तो मात्र 20 प्रतिशत छात्रों ने ही इस पर शंका ज़ाहिर की जबकि 40 प्रतिशत ने तो माना कि यह स्पष्ट प्रमाण है। तस्वीर के साथ यह नहीं बताया गया था इसे प्रस्तुत किसने किया है।
कुछ अध्ययनों से यह भी पता चला है कि आजकल लोग सर्च इंजिन्स पर काफी भरोसा करते हैं और उसमें भी जो पहली प्रविष्टि होती है, उसे ही सच मान लेते हैं।
ऐसी स्थिति में आलोचनात्मक सोच विकसित करने का महत्त्व बहुत बढ़ जाता है ,अन्यथा हम झूठ और सच का फैसला किए बगैर अफवाहों के जंगल में हाथ-पाँव मारते रहेंगे। (स्रोत फीचर्स)

प्रेरक

    कुछ बेहतरीन लाइफ़-हैक आप सबके लिए  
0 किसी भी लेटेस्ट गैजेट, बाइक या कार को मार्केट में आते ही फौरन मत खरीदिए। ऐसे बहुत से प्रोडक्ट हैं, जो बहुत धूम-धाम से लांच होते हैं लेकिन लोगों को पसंद नहीं आते; क्योंकि वे उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते। गाडिय़ों के कई मॉडल फेल हो जाते हैं। कई लेटेस्ट मोबाइल्स भी शुरुआत में लोगों को बहुत दिक्कतें देते हैं। मार्केट में नया प्रोडक्ट आते ही कम-से-कम तीन महीने इन्तज़ार कीजिए। एक्सपर्ट रिव्यूज़ पढि़ए और उन लोगों से बात कीजिए, जो इन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके साथ ही यदि आप थोड़ा ठहरकर इन्हें खरीदेंगे, तो उनपर अच्छी डील और डिस्काउंट भी मिलेगा।
0 आप किसी नई नौकरी को ज्वाइन करें, तो नए ऑफिस में चल रही गलतियों और किए जा सकने वाले सुधारों की बातें तुरंत ही नहीं करने लगें। कुछ दिन शांत रहकर अपने सहकर्मियों और वहाँ के माहौल को समझने का प्रयास करें। नए लोगों के बीच स्वयं को स्थापित करें और उनका भरोसा जीतें। इसके बाद यदि आप उन्हें कोई कुछ सुझाएँगे, तो वे आपकी बातों को अन्यथा नहीं लेंगे।
0 किसी फिक्स प्राइस स्टोर या मॉल में भी सेल्समेन से कुछ डिस्काउंट माँगें। बहुत सम्भव है कि आपको कोई डिस्काउंट नहीं मिले; लेकिन इससे आपको भीतर आत्मविश्वास बढ़ेगा। और क्या पता आपको वाकई कुछ डिस्काउंट मिल जाए!
0 आपका बॉस या आपका कोई कलीग किसी मीटिंग या प्रेज़ेंटेशन में सराहनीय बात करे,  तो ताली बजाकर उनकी प्रशंसा करें। उन्हें यह देखकर बहुत अच्छा लगेगा। हर व्यक्ति यह चाहता है कि लोग उसकी सराहना करें। मीटिंग या सेमिनार वगैरह में कई बार लोग भीतर-ही-भीतर डर रहे होते हैं। यदि वे आपको अपने पक्ष में पाएँगे,  तो आप दोनों के सम्बम्ध मजबूत बनेंगे।
0 किसी टीनेजर या अपने से छोटे व्यक्ति को सलाह देते समय अपने जीवन के प्रसंगों का उल्लेख कर यह बताएँ कि आपने भी जीवन में कई गलतियाँ कीं, गलत चुनाव किए और गलत निर्णय लिये। उन्हें यह बताइए कि आपको इस सबसे क्या-क्या नुकसान हुए और आप यह क्यों नहीं चाहते कि उसे भी उन बातों का सामना करना पड़े।
0 आपको किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति से कोई खास काम या बिजनेस हो और वह व्यक्ति आपको कहीं राह चलते या किसी मार्केट/जिम/मॉल/लिफ़्ट में मिल जाए, तो उस काम का ज़िक्र मत कीजिए। उससे सामान्य शिष्टाचार के नाते अभिवादन और बात कीजिए। वे इस बात की कद्र करेंगे और आपका काम बाद में सफलतापूर्वक हो जाने की संभावना बढ़ जाएगी।
0 किसी भी व्यक्ति से या उसके सामने किसी दूसरे व्यक्ति की बुराई मत कीजिए। सुननेवाला व्यक्ति अपने अवचेतन में उन नकारात्मक बातों को आपपर आरोपित करके आपकी बुरी छवि गढ़ लेगा। उसके मन में यह बात बैठ जाएगी कि आप इसी तरह किसी दूसरे का सामने उसकी बुराई कर सकते हैं। hindizen.com