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Feb 19, 2017

बाल कथा

बाल हृदय
का हाहाकार
- सुधा भार्गव

कुश और राधा की खुशी का ठिकाना न था उनके बेटे हैपी को प्रसिद्ध नर्सरी स्कूल में दाखिला मिल गया था। बस एक ही मुश्किल आन पड़ी थी राधा की पिछले माह ही नौकरी लगी थी सुबह की निकली-निकली शाम को ही घर में घुसना होता। स्कूल की बस घर से थोड़ी दूर पर आकर रुकती थी वहाँ से घर तक का रास्ता हैपी अकेले नहीं तय कर सकता था। उसे बस तक छोडऩे और लाने के लिए एक का होना जरूरी था । मियां- बीबी  घर में होते हुए भी आफिस जाने की जल्दी  में होते  ।
घर में  हैप्पी की दादी माँ भी थी पर वृद्ध। बेंत के सहारे ही चल पाती थीं। घर की देखरेख के लिए तो पहले से एक नौकर था पर बच्चे के लिए अन्य एक साफ सुथरी और तमीजदार नौकरानी की तलाश होने लगी जो बच्चे का ध्यान माँ की तरह रखे। जल्दी ही उनके माली ने अपनी विधवा बहन  को लाकर कुश और राधा को उबार दिया ।
जिस दिन हैपी को स्कूल जाना थ राधा जल्दी उठी। बेटे को तैयार कर उसने उसकी मन पसंद का टिफिन भी लगा दिया। इतने में चन्दा नौकरानी भी आ गई।
-चन्दा तू समय  पर आ गई । स्कूल बस भी आती होगी। हैपी को छोडऩे जा ।
हैपी ठिठक गया और लगा माँ को घूरने ।
-क्या हो गया! स्कूल क्यों नहीं जाता। अभी तो तू बड़ा खुश नजर आ रहा था ।
-मैं नहीं जाऊँगा ।
-क्यों नहीं जाएगा ?
-आप छोडऩे चलो ।
-मैं- मैं कैसे जा सकती हूँ। मुझे आफिस निकलना है । देरी हो जाएगी। चन्दा जल्दी हैपी के साथ जा ।
चन्दा उसका हाथ पकड़े बाहर निकली और खींचती हुई ले जाने लगी। वह भी डरी हुई थी कि कहीं बस न छूट जाए । हैपी का स्कूल जाने का सारा उत्साह फीका पड़ गया। पहली बार वह घर से इस तरह काफी देर के लिए अकेला अलग हो रहा था। चाहता था माँ से टाटा करते हुए बस में चढ़े और माँ उसकी चुम्बी ले । वह  अपने को किसी तरह बस की ओर घसीट रहा था, लग रहा था मानो  दोनों पैरों से 1-1 किलो के पत्थर लटक रहे है ।
बस स्टॉप पर हैपी ने देखा - कोई दोस्त अपनी माँ के साथ आ रहा है तो कोई बतियाते हुये अपने बाबा का हाथ थामे हुए हैं। उसके दिल में कुछ चुभ-सा गया और उदासी की परतें गहरी हो गईं। वह बस में बैठ तो गया ; लेकिन जैसे ही बस चली उसकी रुलाई फूट पड़ी। बच्चों का ध्यान रखने के लिए बस में स्कूल की एक कर्मचारी महिला थी। उसने कुछ देर तक तो फुसलाया- बेटा चुप हो जा स्कूल में तुझे सब बहुत प्यार करेंगे। लेकिन जब उसने चुप होने का नाम नहीं लिया तो गुर्रा पड़ी- अरे चुप हा जा वरना अभी बस से नीचे उतार दूँगी। हैपी भयभीत हो चुप तो हो गया पर स्कूल तक सिसकियाँ भरता रहा ।
स्कूल आने पर बच्चों को एक -एक करके बहुत सावधानी से उतारा गया। हर बस के पास एक टीचर ड्यूटी पर तैनात थी। प्रिन्सिपल भी उन पर नजर रखे हुए थी। इस कारण उनके व्यवहार और आवाज में कोमलता का पुट कुछ ज्यादा ही था ।
कुछ बच्चे माँ से अलग होने के कारण दुखी से थे, कुछ नए वातावरण से घबराए हुए थे, पर हैप्पी तो माँ की बेरुखी से दु;खी था। माँ की मजबूरी समझने के लायक उसकी उम्र न थी ।बस उसे तो नौकरानी की जगह माँ चाहिए ।
कक्षा में टीचर्स ने हँस हँसकर उनका स्वागत किया। एक- दूसरे की तरफ दोस्ती के नन्हें-नन्हें हाथ बढ़ने लगे । कुछ देर के लिए हैपी सब कुछ भूलकर नए साथियों में मग्न हो गया ।
टिफिन का समय होने पर आवाज लगी- बच्चों नैपकिन निकालकर अपना- अपना टिफिन खाओ। कुछ ने अपना टिफिन बॉक्स खोला, कुछ की मदद की गई पर हैपी गुम-सा बैठा रहा ।
-बेटा, तुम्हें भूख नही नहीं लग रही। महिला कर्मचारी ने पूछा ।
-नहीं ।
-कुछ तो खा लो, चलो मैं खिलाती हूँ ।
उसने दो- तीन गस्से पूरी के खिलाए ,फिर उसे उठना पड़ा। उसे दूसरे बच्चे जो देखने थे। इतने में घंटी बज गई और हैपी भूखा ही रह गया।
स्कूल से छुट्टी मिली, तो बच्चे पंक्तिबद्ध बस में बैठने लगे। घर जाने की खुशी में, माँ से मिलने की खुशी में चेहरे कमल की तरह खिले हुए थे। बस स्टॉप आने से पहले ही हैपी माँ की एक झलक पाने को खिडक़ी से झाँक -झाँककर देख रहा था। माँ की जगह नौकरानी को खड़ा देख वह मन ही मन उबल पड़ा। बस रुकने पर बोला-मैं नहीं उतरूँगा। नौकरानी ने उसे जबर्दस्ती उतारा और एक हाथ पकडक़र उसे खींचने लगी। खींचातानी में उसके कंधे में झटका लगा और वह दर्द से चीख पड़ा। नौकरानी ने उसे गोद में लेना चाहा पर वह तो  रोता हुआ उसके हाथों से सरककर भाग निकला। आगे- आगे हैपी पीछे-पीछे चन्दा। बच्चे की तरह तो क्या भागती- हाँ भागते- भागते हाँफने जरूर लगी ।
पोते के रोने की आवाज सुन दादी माँ तड़प उठी ।
-दादी- दादी मेरे हाथ में बहुत दर्द हो रहा है कहकर उससे चिपट गया मानो एक अरसे के बाद मिला हो। प्यार की गरमाई पा वह दादी के बिछौने पर भूखा ही सो गया ।
चन्दा  भी हैपी के दर्द को देख परेशान थी। उसे अपनी नौकरी खतरे में नजर आई। जल्दी से जल्दी उसने वहाँ से निकल जाना ठीक समझा। मालकिन के आते ही बोली- मेमसाहब मुझे थोड़ा जल्दी घर जाना है
-ठीक है ,मैं तो आ ही गई हूँ पर कल समय से आ जाना।
-हाँ में हाँ मिलाते हुए चन्दा तो खिसक गई ।
कुछ देर बाद हैपी सोकर उठा। पापा ने प्यार से उठाना चाहा पर वह तड़प उठा- पापा बहुत दर्द---।
राधा भागी- भागी आई-क्या हुआ बेटा !
-चन्दा ने मेरा हाथ बहुत ज़ोर से खींचा। माँ तुम बस स्टॉप पर मुझे लेने आ जाती, तो ऐसा नहीं होता। माँ- कल मुझे छोड़ने चलोगी--- बोलो न माँ । हैपी का गला भर्रा उठा ।
राधा का रोम- रोम आहत हो उठा और हैपी को कलेजे से चिपकाते हुए बोली- हाँ बेटा जरूर चलूँगी ।
-मज़ाक करती हो! कैसे छोडऩे जाओगी? अभी- अभी तो आफिस जाना शुरू किया है। नहीं गईं तो बॉस नाराज हो जाएगा।
-होने दो। मुझे उसकी चिंता नहीं! चिंता है अपने हैपी की। अगर वह गुस्सा हो गया तो--। वाक्य पूरा होने से पहले ही खुशियाँ घर की देहली पार कर अंदर आ गईं।

एक कली आँगन में चिटकी

एक कली आँगन में चिटकी
- रंजना त्रिखा

 एक कली आँगन में चिटकी -
मन- उपवन  को  महकाया।
मेरी- बगिया में फिर सावन -
उमड़- घुमड़ कर घिर आया।।

        उसकी- चितवन में नव- जीवन
की हैरानी झाँक रही।
         सब कुछ  से परिचय पाने की -
   उत्कंठा- भी- नाच रही।।

 कभी नयन का द्वार खोल -
 चहुँ ओर ताकती पड़ी -पड़ी।
   कभी मूँद नयनों  को अपने -
पिरो रही सपनों की लड़ी।।

        कभी  विहँसती  अँखियाँ  मूँदे -
      जाने  किन  यादों  में  घिरी।
     कभी बिसूरे मुख में दिखती -
       जाने   क्या   फटकार   पड़ी।।

       चकित ताकती चित्र लिखित सी -
 क्या ईश्वर- की- माया है !
      आज की बिटिया ने हर कल में -
यह- संसार- रचाया है !!

         नहीं अगर कोई बेटी जन्मी -
     क्या होगा संसार कहो ??
   कोख कहाँ से पाओगे -
        ऐ जग के पालनहार कहो ???

      बिना शक्ति के शिव - शव है -
    बिन- नारी के नर नहीं बना!
     यूँ- ही गाल बजाता  फिरता -
  फोड़- न- पाये भाड़ चना!!

एक- गाड़ी के दो- पहिये,
      एक- सिक्के के दो- फलक बने !
      एक- दूजे के बिना नहीं कुछ  ,
   क्यों- अहंकार- से रहो तने !!

      आने दो- जग में बेटी को -
 माता- ये कहलायेगी !
 सृष्टि- इसी से चलेगी -
         वरना मनुज जाति मिट जायेगी !!

सम्पर्क: 25, स्टेट बैंक कॉलोनी, टौंक फाटक, जयपुर- 302015

दो ग़ज़लें

               अपना बना लिया
                                          - आशीष दशोत्तर

उतर के सबके दिलों में उसने सभी को अपना बना लिया है
लबों पे जिसने अगर मुहब्बत का कोई नग़मा सजा लिया है।

हमारा रूतबा, हमारी रौनक, हमारी चाहत नहीं मिटीं है
भले ही पानी में घुल के हमने वजूद अपना मिटा लिया है।

मिटे हैं दुनिया के ग़म हज़ारों नकार में आए सभी नज़ारे
नक़ाब जितने पड़े हुए थे सभी को जब से हटा लिया है।

बना वो हमदम भी, हमसफर भी, बनाई उसने ही रहगुज़र भी
हमारे सपनों को उसने देखो हमीं से कैसे चुरा लिया है।

नहीं किसी को बचा सका है, वो नाखुदा भी, या कोई कश्ती
किसी को तिनकों के ही सहारों ने डूबने से बचा लिया है।

उसी पे बरसा है नूर बेशक़, उसी पे रब की हुई इनायत
घने अंधेरों में गर किसी ने ज़रा सा दीपक जला लिया है।

जहाँ पे रिश्ते ही छूट जाएँ- जहाँ से गिरकर सँभल न पाएँ
मुझे तो आशीष उसने ऐसी बुलन्दियों से बचा लिया है।

               कभी मुस्कुराता है

कभी ख़ामोश रहता है, कभी वो मुस्कुराता है
इसी अंदाज़ ही से वो सदा मिलता-मिलाता है।

यहाँ खुद को भुलाकर जो किसी में डूब जाता है
समन्दर से वही इक दिन खज़ाने ढूँढ़ लाता है।

मेरी उम्मीद उजली है मेरे सब रास्ते रोशन
मेरे क़िरदार का सूरज तभी तो जगमगाता है।

हमें ईमान का ऐजाज़ हासिल हो गया जब से
तभी तो झूठ हमको देख कर यूँ तिलमिलाता है।

नहीं मिलने के यूँ तो हैं बहाने दोस्तों, लेकिन
हमें जो चाहता है वो हमारे पास आता है।

भला आशीष क्यूँ कोई करे उम्मीद क़ातिल से
कभी ज़ालिम भी क्या अम्नो-अमा के गीत गाता है?

सच बोलने का साहस

सच बोलने का साहस
- विजय जोशी
(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक भेल, भोपाल)

सत्य शाश्वत तथा सुंदर है तथा हर स्थिति में प्रासंगिक है, किन्तु विपरित परिस्थितियों में अनिष्ट की आशंका के मद्देनजर आदमी सच बोलने से कतरा जाता है और झूठ का सहारा लेने लगता है। लेकिन याद रहे झूठ के पैर नहीं होते। वह अधिक दिन चल नहीं पाता और एक दिन एक्सपोज हो जाता है। ऐसी स्थिति में आदमी अधिक बड़े संकट से घिर जाता है।
एक बार एक राजा ने अपने उत्तराधिकारी को परिवार या दरबारियों के मध्य से ही चुनने की परंपरा को तिलाजंली देते हुए नगर के नौजवानों को आमंत्रित किया। हर एक को एक एक बीज देते हुए एक वर्ष बाद अपने योगदान सहित लौटने हेतु कहा।
सब प्रसन्नतापूर्वक अपने घरों को चले गए तथा उनको गमलों में रोप दिया। कस्बई मनोवृत्ति वाले एक नौजवान ने यही उपक्रम किया तथा रोज गमले में पानी देने लगा। दिन बीतते रहे, वह पूरा जतन से नियमपूर्वक पानी देता रहा लेकिन परिस्थिति पूर्ववत् ही रही। उसके गमले में कोई पौधा नहीं  उगा।
एक वर्ष बाद दरबार में प्रसन्न मुद्रा में सब एकत्र हुए रंग बिरंगे सुंदर पुष्प सज्जित गमलों वाले अपने पौधों के साथ, मात्र उस कस्बई युवक के जो केवल अपने गमले के साथ कोने में निराशा के भाव से मन मसोसकर खड़ा हुआ था।
राजा का पर्दापण हुआ। सबको देखने के बाद उनकी दृष्टि कोने में छुप रहे उस युवक की ओर गई। उन्होंने सैनिकों से उसे आगे लाकर खड़ा करने को कहा। वह सबके उपहास का पात्र बन गया। राजा ने सबको डाँटते हुए चुप रहने को कहा तथा घोषणा की कि यही बालक राज्य का अगला उत्तराधिकारी है।
राजा ने अपना कथन जारी रखा- एक वर्ष पूर्व मैनें सबको जो बीज दिये थे ,वे उबले हुए थे तथा उनमें अकुंरण संभव ही नहीं था। सबने अपनी प्रगति को देखकर स्वार्थवश उन्हें नये बीजों से बदल दिया, केवल इस युवक के , जिसने न तो सच्चाई का मार्ग छोड़ा और न प्रयत्न करना।
सबके सर शर्म से झुक गए।
बात का सारांश मात्र इतना है कि कठिनाई के मार्ग में जब आप सत्य का दामन न छोड़ते हुए अपने प्रयत्न ईमानदारी से जारी रखते हैं तो सफलता निश्चित है, लेकिन इसके लिए आवश्यक है धैर्य तथा सत्य में विश्वास। अमूमन लोग सच बोलने का अहंकार पाल लेते हैं, जबकि सच बोलने का तो साहस होना चाहिए। सत्यकाम की माँ ने उसे यही सिखाया था और उसी निर्भीकता से उसने सत्य का साथ दिया। यही कारण है कि आज भी उसका नाम चिर स्थायी है। कहा ही गया है- सत्यमेव जयते। अंतत: सत्य की ही जीत होती है।
सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास) भोपाल- 462023, मो. 09826042641
E-mail- v.joshi415@gmail.com

मन में सजाके प्रीत

मन में सजाके प्रीत
-      - डॉ. शरद सुनेरी

मन में सजाके प्रीत, प्यार का जलाके दीप,
आरती मैं आपकी उतारने को आया हूँ।

भावों के चमन में, खिले हैं फूल प्यार के जो,
सुरभि समेट सारी, गीतों में ले आया हूँ।

शीतल बयार में, छंदों की बौछार से,
सोए हुए भावों को जगाने चला आया हूँ।

गीत तो सुनाना बस एक है बहाना यहाँ,
प्यार की बदरिया को बरसाने आया हूँ।

सम्पर्कः102/ निर्माण शेल्टर्स,पेट्रोल पंप के पास,यादव नगर,नागपुर- 26