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Oct 1, 2026

किताबेंः रचना के आंतरिक सौंदर्य और संवेदना का रेखांकन

  - डॉ. सुरंगमा यादव

पुस्तकः सृजन- दृष्टि (समीक्षा- संग्रह): डॉ. शिवजी श्रीवास्तव, पृष्ठ - 192, मूल्य - 550/- , प्रकाशन - अयन प्रकाशन, उत्तम नगर, नई दिल्ली -110059

साहित्य जगत से लेकर सिनेमा कला या कोई अन्य रचनात्मक क्षेत्र क्यों न हो समीक्षक की भूमिका निर्विवाद है । समीक्षक किसी रचना के गुण-दोषों का विश्लेषण मात्र नहीं करता है, बल्कि वह  समीक्ष्य  रचना  की उपयोगिता या  श्रेष्ठता को विभिन्न पहलुओं से जाँच - परखकर पाठक के समक्ष रखता है, ताकि पाठक दिन-  प्रतिदिन प्रकाशित हो रही अनगिनत पुस्तकों में से अपनी रुचि के अनुसार   गुणवत्तापूर्ण सामग्री का चयन कर सके।   एक तटस्थ और गंभीर  समीक्षक केवल पाठकों की ही सहायता नहीं करता, अपितु रचनाकार का मार्ग भी प्रशस्त करता है। वह  रचना के कमजोर पक्षों को उजागर  करके रचना  प्रक्रिया का परिष्कार  करता है तथा खूबियों का उल्लेख करके उसका मनोबल भी  बढ़ाता  है।

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव जी  की पुस्तक  ‘सृजन दृष्टि’  समकालीन  साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन पर आधारित है ।  शिवजी श्रीवास्तव जी  बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं । अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ आप  गद्य और पद्य  में समान रूप से  लेखन कार्य कर रहे  है। ‘अखिल भारतीय कृष्ण प्रताप  स्मृति कहानी प्रतियोगिता’ में लगातार तीन बार एवं रेडियो नाट्य लेखन प्रतियोगिता में भी आप विजेता रहे हैं ।  भारतीय एवं जापानी काव्य शैलियों में   आप समान रूप से भावपूर्ण सृजन कर रहे हैं यथा - हाइकु, ताँका, क्षणिका, कविता, ग़ज़ल, संस्मरण ,नाटक एवं नवगीत। जीवनी विधा में लिखी आपकी पुस्तक ‘क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर’ वर्ष 2025 में प्रकाशित एक महत्त्वपूर्ण कृति है।  पटकथा लेखन  एवं सम्पादन कार्य भी आपने किया है । एक संवेदनशील रचनाकार होने के साथ- साथ आप  सहृदय पाठक  और कुशल समीक्षक भी हैं। आपने अपनी इस पुस्तक में विभिन्न विधाओं की 33 पुस्तकों का तटस्थ मूल्यांकन किया है, समय- समय पर प्रकाशित इन पुस्तकों का अध्ययन और उनकी सारगर्भित समीक्षा करके उन्हें एक पुस्तक के रूप में संकलित करना श्रम साध्य कार्य  है।

शिवजी श्रीवास्तव  जी के समीक्षक रूप के विषय में डॉ. कुँवर दिनेश सिंह ने  फ्लैप पर लिखा है, “समीक्षक के रूप में  श्रीवास्तव जी की एक विशेषता यह  है कि वे  समकालीन  विमर्शों और काव्यशास्त्र के सिद्धांतों का उपयोग तो  करते हैं ;किंतु उनकी समीक्षा कदापि उन विमर्शों व सिद्धांतों से बोझल  नहीं होती। वे किसी ‘विचार’ या ‘वाद’ से प्रतिबद्ध होकर आग्रही दृष्टि  से किसी कृति का मूल्यांकन  नहीं करते।” वास्तव में एक सच्चे समीक्षक का महत्त्व उसकी निरपेक्ष दृष्टि  एवं  नीर-क्षीर विवेक में निहित होता है । शिवजी श्रीवास्तव जी की समीक्षाएँ   रचना के आंतरिक सौंदर्य और संवेदना को रेखांकित  करने पर  बल देती  हैं ।

आपने प्रत्येक समीक्ष्य कृति में व्यक्त भावों और विचारों के आधार पर अत्यंत सटीक शीर्षक के साथ कृति  को आलोचना के मापदंडों पर परखा है। ‘सृजन दृष्टि’ की समीक्षा करना वास्तव में समीक्षा की समीक्षा करना है। इस पुस्तक में शिवजी श्रीवास्तव जी ने जिन कृतियों को सम्मिलित  किया  है उनमें एक जीवनी, दो उपन्यास, तीन समालोचना, सात काव्य कृतियाँ, एक सेदोका कृति, पाँच हाइकु कृति, एक तांका, सेदोका एवं चोका संग्रह, छः कहानी संग्रह, एक नवगीत संग्रह,दो गज़ल संग्रह,एक छंद   संबंधी कृति, तीन संपादित कृतियाँ । इनमें सबसे अधिक संख्या क्रमशः काव्य कृतियों एवं कहानी  संग्रहों की है । इस पुस्तक में सम्मिलित कृतियाँ हैं- जीवनी-  मेरे भगत सिंह, लेखक- पंकज चतुर्वेदी, उपन्यास - क्रांतिवीर मदारी पासी- ब्रजमोहन, अंगूठे पर वसीयत- डॉ. शोभनाथ शुक्ल,  समालोचना- लघुकथा- लघुकथा का वर्तमान परिदृश्य-रामेश्वर कांबोज हिमांशु, निकष – डॉ. स्मृति शुक्ल, विभाजन की त्रासदी- मुनीश त्रिपाठी, काव्य संग्रह- लम्हों का सफर- डॉ. जेन्नी शबनम, तेरे इश्क में गिरफ्तार हुआ- डॉ. लालित्य ललित, घुंघरी- डॉ. कविता भट्ट, तुम सर्दी की धूप- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, आलोक के क्षणों में - डॉ.  कुंवर दिनेश सिंह, एक यात्रा ऐसी भी- कैलाश नाथ खंडेलवाल, नहीं रहना मुझे पिंजर बद्ध - शिप्रा मिश्रा, सेदोका संग्रह- मन मल्हार गाए - सुदर्शन रत्नाकर , हाइकु  संग्रह- बंद कर लो द्वार- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, वर्ण सितारे- ऋता  शेखर मधु, खिले हैं शब्द- डॉ.  आशा पांडेय, प्रवासी मन- डॉ. जेन्नी शबनम, झील दर्पण- पुष्पा मेहरा, ताँका, सेदोका एवं चोका संग्रह- तीसरा पहर- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ कहानी संग्रह- जब तक जिंदा हैं – डॉ.  कुँवर दिनेश सिंह, पिंजड़ा- डॉ. पूरन सिंह, सफेद गुलाब- हरपाल सिंह अरूष, दहलीज के उस पार -अरुण कमल, सपनों के ढ़ाई आखर -रश्मि शर्मा, दोष इसका था- सुदर्शन रत्नाकर, नवगीत- संग्रह-  रोटी का अनुलोम विलोम- श्री शिवानंद सिंह, गज़ल संग्रह- सोच का मौसम गर्म है- हरेराम समीप, भूल बैठा हूँ जिसे- विज्ञान व्रत,काव्यशास्त्र - छंद विधान एवं सृजन रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

संपादित संग्रह- भावनाओं के घरौंदे (काव्य संग्रह ) -सं. डॉ. कुँवर दिनेश सिंह, स्वर्ण शिखर (हाइकु  संग्रह) सं. रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ एवं  डॉ. हरदीप कौर संधु , स्त्री- पुरुष संबंधों की लघुकथाएँ- सं.  सुकेश साहनी

सृजन दृष्टि में संकलित  पुस्तकों की समीक्षाएँ पाठकों के मन में पुस्तक पढ़ने की रुचि जागृत करती हैं; क्योंकि इनका शीर्षक आकर्षक है । इन पुस्तकों की समीक्षा में समीक्षक ने किसी काव्यशास्त्रीय सिद्धांत अथवा ‘वाद’ को अनिवार्य रूप से आधार नहीं बनाया है, बल्कि आवश्यकतानुसार उनका उपयोग किया है।  समीक्षक एक तटस्थ द्रष्टा  होता है और साक्षी की भाँति कृति से प्राप्त अनुभव को विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से जोड़ कर पाठक के समक्ष रखता है। कभी-कभी समीक्षक की पैनी दृष्टि ऐसे -ऐसे तथ्यों एवं भावों को ढूँढ़ लाती है, जिन पर  शायद लिखते समय रचनाकार ने ध्यान भी न दिया हो । समीक्षक  यदि पूरी तरह  रचनाकार की सृजन दृष्टि एवं भावभूमि पर उतर कर समीक्षा करेगा, तो कई पक्ष अनछुए रह जाएँगे; इसीलिए शिवजी श्रीवास्तव जी ने एक सहृदय पाठक की  भाँति लेखक के भाव-जगत और संवेदना को गहराई से आत्मसात करते हुए पूर्वाग्रहों, से मुक्त होकर केवल कृति का  गुण-दोष के आधार पर मूल्यांकन किया है । कृति की मूल आत्मा, शिल्पविधान, भाषाई बारीकियों और अंतर्निहित संदेशों को आपने गहराई से परखा है। समीक्षा में उठाए गए बिंदुओं को आपने सोदाहरण प्रस्तुत किया है। शिव जी श्रीवास्तवजी ने समीक्ष्य कृति को समकालीन  सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के संदर्भ में रखकर भी उसकी प्रासंगिकता की परख की  है तथा दार्शनिक एवं आध्यात्मिक सत्यों को भी उद्घाटित किया है, ‘बंद कर लो द्वार’ की समीक्षा में हम बखूबी  देख सकते हैं । ‘सृजन दृष्टि’ में  विभिन्न पुस्तकों पर आपने अपनी बेबाक टिप्पणी दी  हैं, उदाहरणार्थ -

‘मेरे भगत सिंह’ निस्संदेह भगत सिंह के जीवन पर लिखी  एक ऐसी अमूल्य  कृति है, जो भगत सिंह के जीवन के लगभग समस्त अध्याय को खोलती है ....हर क्रांति चेता देश भक्त के लिए ये एक अनिवार्य और पठनीय कृति  है.। इसे पढ़ने के पश्चात महान क्रांतिकारी के जीवन से समग्र रूप से साक्षात्कार किया जा सकता है। ‘लम्हों का सफर’ सात शीर्षकों में विभक्त इस पुस्तक का हर शीर्षक जीवन का एक यादगार लम्हा है।  एक- एक लम्हे की अपनी कई कहानियाँ  हैं, कहीं दर्द है, कहीं प्रेम है, कहीं नारी नियति के चित्र हैं, कहीं उलहाने हैं, कहीं दायित्वबोध है, तो कहीं घनीभूत पीड़ा की चरमावस्था  है । ‘मन मल्हार गाए’  के समस्त सेदोंका भावपूर्ण मनःस्थितियों को प्रतिबिंबित करने वाले सरस सेदोका हैं ।  विषय कोई भी हो कवयित्री का संवेदनशील मन प्रत्येक सेदोका के पीछे से झाँकता है। ‘तेरे इश्क में गिरफ्तार हुआ’ डॉ. लालित्य ललित जी की कविताएँ  सर्वथा अलग ढंग की कविताएँ  होती हैं।  वे साधारण शब्दों में असाधारण रचते हैं। लालित्य जी किसी ‘वाद’ या ‘घेरे’ के कवि  नहीं हैं । उनकी प्रतिबद्धताएँ  जीवन के प्रति है, उनकी कविताएँ जीवन में आनंद खोजने की कविताएँ  हैं । ‘बंद कर लो द्वार’ अभिनव कल्पनाओं और बिंबों से संयुक्त 662 हाइकु का संग्रह है... कवि की चेतना लोक जीवन की ही चेतना होती है। कवि  का जो कुछ निजी होता है, वह लोक का ही सुख- दुःख होता है, इस दृष्टि से यह संग्रह लोक जीवन के सुख- दुःखों की अभिव्यक्ति के हाइकु का संग्रह है... इसमें भारतीय काव्यशास्त्र के समस्त गुण विद्यमान हैं। ‘जब तक जिंदा हैं’  बेजोड़ शिल्प एवं अनूठे कथ्य  वाली समस्त कहानियाँ  रोचक एवं कथा रस से परिपूर्ण हैं। ‘क्रांतिवीर मदारी पासी’ मदारी पासी के ‘ऐका आंदोलन’ को केंद्र में रखकर लिखे गए उपन्यास में रोचकता और पठनीयता के साथ ही इतिहास को भी सुरक्षित रखा गया है।

समीक्षा  की सीमा को देखते हुए  हर  पुस्तक के विषय में यहाँ उल्लेख करना संभव नहीं है, लेकिन इतना अवश्य है कि इस पुस्तक को पढ़ने के पश्चात पाठकों की अच्छे साहित्य की तलाश काफी हद तक पूरी हो जाएगी; क्योंकि 33 पुस्तकों की गहन समीक्षा करके शिव जी श्रीवास्तव जी ने यह कार्य सुगम कर दिया है।

2 comments:

  1. समीक्षा संग्रह की बेहतरीन समीक्षा, हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  2. इतनी सारी किताबों की समीक्षा एक किताब में, और उस किताब की भी समीक्षा वाह वाह बहुत बढ़िया डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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