Wednesday, December 28, 2011

मेरे कृष्ण मुरारी

- डॉ. जेन्नी शबनम
रोई है आत्मा
तू ही है परमात्मा
कर विचार,
तेरी जोगन हारी
मेरे कृष्ण मुरारी।
चीर हरण
हर स्त्री की कहानी
बनी द्रौपदी,
कृष्ण, लो अवतार
करो स्त्री का- उद्धार।
तू हरजाई
की मुझसे ढिठाई
ओ मोरे कान्हा,
गोपियों संग रास
मुझे माना पराई।
रास रचाया
सबको भरमाया
नन्हा मोहन,
देकर गीता- ज्ञान
किया जग- कल्याण।
तेरी जोगन
तुझ में ही समाई
थी वो बावरी,
सह के सब पीर
बनी मीरा दीवानी।
हूँ पुजारिन
नाथ सिर्फ तुम्हारी
क्यों बिसराया
सुध न ली हमारी
क्यों समझा पराया?
ओ रे विधाता
तू क्यों न समझता?
जग की पीर,
आस जब से टूटी
सब हुए अधीर।
गर तू थामे
जो मेरी पतवार,
सागर हारे
भव- सागर पार
पहुँचूँ तेरे पास।
हे मेरे नाथ
कुछ करो निदान
हो जाऊँ पार
जीवन है सागर
है न खेवनहार
तू साथ नहीं
डगर अँधियारा
अब मैं हारी,
तू है पालनहारा
फैला दे उजियारा
मैं हूँ अकेली
साथ देना ईश्वर
दुर्गम पथ,
अन्तहीन डगर
चल- चल के हारी
मालूम नहीं
मिलती क्यों जिन्दगी
बेअख्तियार,
डोर जिसने थामी
उडऩे से वो रोके!

संपर्क- द्वारा: राजेश कुमार श्रीवास्तव, द्वितीय तल 5/7 सर्वप्रिय विहार नई दिल्ली -110016
ब्लॉग- http://lamhon-ka-safar.blogspot.com, Email- jenny.shabnam@gmal.com

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