June 12, 2009

मुकुन्द कौशल के नवगीत

तार-तार जिंदगी हुई
जार-जार चांदनी हुई
तार-तार जिंदगी हुई
योजनाएं अर्थ खो चुकीं
लो बहुत विकास हो गया
गांव-गांव धूल से सने
खेत में किसान अनमने
झोपड़ी गरीब की जली
हर तरफ उजास हो गया।

बूंद-बूंद भाप बन उड़ी
दर्द को न छांव मिल सकी
खिल सकी न नेह की कली
मन बहुत उदास हो गया।
बात-बात स्वार्थ से सनी
लोग सिर्फ बात के धनी
आदमी रहा न आदमी
आदमी का दास हो गया।
        पत्र तुम्हारा 
 पत्र तुम्हारा मुझे प्रेम के,
ढाई आखर सा लगता है।
यूं तो तुमने इस चिट्ठी में
ऐसा कुछ भी लिखा नहीं है
सब स्पष्ट समझ आ जाए
ऐसा भी कुछ दिखा नहीं है
किंतु भाव-भाषा से उठती
इसमें जो रसमय तरंग है
उस तरंग का रंग बहुत ही
सुंदर-सुंदर सा लगता है।
कहते हैं चिन्तन के पथ पर
जो चलता है वह अरस्तु है
जीवन की हर एक लघुकथा
उपन्यास की विषय वस्तु है
अर्थ बड़ा व्यापक होता है
संकेतों में लिखे पत्र का
कम शब्दों के पानी में भी
गहरे सागर सा लगता है।
आकर्षण के प्रश्नपत्र को
कब किसने जांचा है अब तक
स्पर्शों की लिपियों को भी
अनुभव ने बांचा है अब तक
टेटू से अंकित की तुमने
उड़ते पंछी की आकृतियां
तबसे मुझको अपना मन भी,
नीले अम्बर सा लगता है।
ठग रही हैं पत्रिकाएं
खिलखिलाकर हंस रही हैं वर्जनाएं
टूटकर बिखरी पड़ी हैं मान्यताएं।।
बिक रही है मंडियो में आधुनिकता
और नारी देह, ऊंचे दाम पर
छापकर निर्वस्त्र काया के कथानक
संस्कारों के क्षरण के नाम पर
पाठकों को ठग रहीं हैं पत्रिकाएं।
प्रेस की बलिवेदियों पर हो रहा है
सर्जना का सामूहिक संहार अब
छुप गया विद्रोह जाकर कन्दरा में
 कोई भी करता नहीं प्रतिकर अब
मुत्युशय्या पर पड़ी हैं सभ्यताएं।
पुत्रियों के पर्स से कुछ चित्र निकले
मच गया परिवार में हड़कम्प सा
पुत्र ले आया बिना ब्याहे बहू को
और घर में आ गया भूकंप सा
हो रही हैं पीढिय़ों साधनाएं।
यह नई झुग्गी
यह नई झुग्गी,
बहुत तनकर खड़ी तो है-
लग रहा है टूटकर गिर जाएगी इक दिन।
कामनाएं देर तक सोयी हुईं
वेदनाएं रात भर रोयी हुईं
हर हथेली पर उभरते आबले
पांव के नीचे लरजते •जलजले
गुदगुदी करती,
समय की खिलखिलाहट भी -

मौन होकर दर्द के घर जाएगी इक दिन।
बस्तियां बोझिल उनींदी भोर में
पीर डूबी क्रन्दनों के शोर में
बन्द रोशनदान वाली जिन्दगी
सब्र में लिपटी हुई शर्मिन्दगी
नीति की दुर्गति,
भयावहता गिरावट की
हर किसी की आंख में तिर जाएगी इक दिन।
घर गिरे, उजड़ी पुरानी बस्तियां
फिर उठी चौरास्तों से गुमटियां
बन्द आंखों में सुलगती आग है
आंसुओं में अग्निधर्मा राग है
आंधियां शायद,
सभी कुछ ध्वस्त कर देंगी
किंतु मेहनत फिर उसे सिर जाएगी इक दिन।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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