June 12, 2009

यूनीकोड से भारतीय भाषा को मिली विश्व स्तर पर पहचान

- नितीन जे. देसाई
कम्प्यूटर जब भारत में आया तो हमने उसका स्वागत किया।  कम्प्यूटर को तो हम अपने अनुरूप नहीं बना पाए, लेकिन हमने स्वयं को उसके अनुरूप ढाल लिया।  यहां तक कि हमारा जो काम हम स्थानीय भाषाओं में किया करते थे, उसे अंग्रेजी में अपना लिया।

आज हम कम्प्यूटर की पांचवी पीढ़ी में विचरण कर रहे हैं।  इससे हम अनुमान लगा सकते हैं कि इस क्षेत्र में हम कितना आगे बढ़ चुके हैं। कम्प्यूटर हमारे दैनंदिन जीवन और हमारी समाज व्यवस्था का अंग बन गया है। अब इस मुकाम से पीछे हटना लगभग असंभव है। किसी भी क्षेत्र में विकास करना मानव का स्वभाव रहा है जो आवश्यक भी है। लेकिन विकास की दौड़ में कहीं हम अपने बुनियादी मूल्यों का हनन तो नहीं कर रहे? इस पर विचार करना आवश्यक है।
कम्प्यूटर जब भारत में आया तो हमने उसका स्वागत किया।  कम्प्यूटर को तो हम अपने अनुरूप नहीं बना पाए, लेकिन हमने स्वयं को उसके अनुरूप ढाल लिया।  यहां तक कि हमारा जो काम हम स्थानीय भाषाओं में किया करते थे, उसे अंग्रेजी में अपना लिया। कालांतर में हमारी अंतरात्मा की आवाज कहो, वाणिज्यिक आवश्यकता कहो या सरकारी आदेश, स्थानीय भाषाओं पर हमारा ध्यान गया और हमने कम्प्यूटर को भारतीय भाषाओं के अनुरूप बनाने की कोशिश की।  इसमें कुछ हद तक हमें सफलता भी मिली। कम्प्यूटर भारतीय भाषाओं में काम करने लगा।  कम्प्यूटर क्षेत्र में इसे एक क्रांति माना जाने लगा। वाकई वह एक क्रांति थी। अब इस व्यवसाय में होड़ शुरू हो गई। कई सॉफ्टवेयर कंपनियों ने भारतीय भाषाओं में काम करने लायक सॉफ्टवेयर और फॉन्ट बना डाले।  इधर केंद्र सरकार ने सरकारी कार्यालयों, उपक्रमों और बैंकों में हिंदी के उपयोग के लिए और राज्य सरकारों ने स्थानीय भाषाओं का कम्प्यूटर में उपयोग करने के लिए आदेश जारी कर दिए। फलस्वरूप हिंदी और देशीय भाषाओं के सॉफ्टवेयरों के लिए भारत में एक अच्छा खासा बाज़ार तैयार हो गया। कालांतर में इन हिंदी सॉफ्टवेयरों की कमियां उभरकर सामने आने लगीं।
 हिंदी सॉफ्टवेयरों के संबंध में सबसे पहली समस्या यह आई कि इनके फॉन्ट आपस में मेल नहीं खाते थे। अर्थात, यदि किसी एक कंपनी के हिंदी फॉन्ट में कोई टेक्स्ट बनाया गया हो तो वह दूसरी कंपनी के हिंदी सॉफ्टवेयर में नहीं खुलता था। यह टेक्स्ट केवल उसी कम्प्यूटर में खुलता था जिसमें उसी कंपनी का हिंदी सॉफ्टवेयर लगा होता था। अत: किसी कंपनी विशेष द्वारा तैयार किए गए सॉफ्टवेयर में लिखित पाठ उसी स्थिति में पढ़ा जा सकता था जब दूसरे कम्प्यूटर में भी वहीं सॉफ्टवेयर लगा हो।  इसका मूल कारण था हिंदी फॉन्टों के निर्माण का आधार। उदाहरणस्वरूप, आप अपने ट्रांजिस्टर या केल्कुलेटर में किसी भी कंपनी का पेन्सिल सेल इस्तेमाल कर सकते हैं, भले ही वे विश्व में कहीं भी बना हो। यह इसलिए संभव है क्योंकि सभी कंपनियां इसका उत्पादन विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त मापदंडों के अनुसार ही करती हैं जिसके कारण उनकी बाहरी साज- सज्जा को छोड़कर उनका मूल ढांचा एक समान रहता है। यही सूत्र  अंग्रेजी फॉन्टों पर भी लागू है। अंग्रेजी के लगभग सभी फॉन्ट अमरीका में बने हैं और एक ही कोडिंग प्रणाली पर आधारित हैं जिन्हें आस्की  कहा जाता है।  इसलिए ये फॉन्ट आपस में एक-दूसरे के अनुरूप होते हैं और एक कम्प्यूटर से दूसरे कम्प्यूटर में अंग्रेजी टेक्स्ट भेजने पर वह ठीक दिखाई देता है।
अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यूनिकोड प्रणाली पर फॉन्ट विकसित किए जा रहे हैं। इससे यह संभव हो गया है कि कोई भी फॉन्ट, भले ही वह विश्व में कहीं भी निर्मित हो, आपके कम्प्यूटर पर खुल जाएगा, यदि वह यूनिकोड में बना हो।
हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए फॉन्ट विकसित करने के लिए इस प्रकार की मानक कोडिंग के लिए उस समय कोई विचार नहीं किया गया था। पुणे स्थित सी-डैक ने इस ओर कुछ प्रयास किए थे और डस्की कोडिंग (ISCII इंडियन स्टैंडर्ड कोड फॉर इन्फॉर्मेशन इंटरचेंज) प्रणाली स्थापित करने के प्रयास किए। लेकिन इसे लागू करने में सफलता नहीं मिली। निजी कंपनियां अपने स्वयं की सुविधानुसार, बिना किसी मानक कोडिंग प्रणाली के, नए-नए फॉन्ट विकसित करती गईं और ग्राहकों को अपने साफ्टवेयर बेचती रहीं।  परिणामस्वरूप, हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के लिए ग्राहकों को अपने सभी कम्प्यूटरों के लिए एक ही कंपनी का सॉफ्टवेयर खरीदना पड़ता था ताकि फॉन्ट की समस्या का सामना न करना पड़े। सबसे बड़ी समस्या सरकारी कार्यालयों और सरकारी कंपनियों को थी। स्थानीय भाषाओं के लिए यह समस्या उतनी गंभीर नहीं थी और किसी प्रकार सुलझाई  जा सकती थी।  लेकिन हिंदी के मामले में एक तो भारत सरकार के राजभाषा नियमों और आदेशों का पालन करना था, तो दूसरी ओर कार्यालय के सैंकड़ों कम्प्यूटरों में फॉन्ट की एकरूपता भी बनाए रखनी थी। परिणामस्वरूप उन्हें किसी एक ही कंपनी का  साफ्टवेयर खरीदना पड़ता था ताकि फॉन्ट की समस्या न रहे।  इससे सॉफ्टवेयर कंपनियों की अपने-अपने क्षेत्र में मोनोपली बनने लगी।  यही स्थिति कई वर्षों तक बनी रही। हिंदी सॉफ्टवेयर कंपनियों का एक प्रकार से इन कार्यालयों पर एकाधिकार सा बन गया।  अत: इन कंपनियों को एक-समान कोडिंग पद्धति पर कभी विचार करने की आवश्यकता नहीं पड़ी।  इस ओर न किसी का ध्यान गया और न ही कोई ठोस प्रयास हुए।  व्यावसायिक एकाधिकार बनाए रखना भी इसका एक कारण को सकता है। इधर कम्प्यूटर क्षेत्र में तेज़ी से विकास होता रहा।  पहले पेंटियम-।, फिर पेंटियम-।।, पेंटियम-।।। और पेंटियम –ढ्ढङ्क आदि-आदि। इसी प्रकार ऑपरेटिंग सिस्टम में भी विकासात्मक परिवर्तन होते गए। इसके चलते हिंदी फॉन्टों की समस्या और भी बढ़ गई क्योंकि ऑपरेटिंग सिस्टम और एम.एस.ऑफिस जैसे सॉफ्टवेयर बदलने पर इन फॉन्टों के उपयोग में कठिनाइयां आने लगीं। उधर कार्यालयों के कामकाज में भी भारी परिवर्तन हुए। इंटरनेट और ई-मेल का उपयोग बढ़ गया। इससे हिंदी में किए जाने वाले कार्य में अड़चनें उत्पन्न होने लगीं।  इन फॉन्टों का न तो इंटरनेट साइट बनाने के लिए उपयोग हो पाता था और न ही ई-मेल आदि भेजने के लिए।
सरकारी कार्यालयों और उपक्रमों को भारत सरकार की राजभाषा नीति संबंधी आदेशों का पालन करने में दिक्कतें आने लगीं।  सरकार ने इस समस्या पर गौर किया। अंत में कम्प्यूटर क्षेत्र के विशेषज्ञों की सहमति से यह निर्णय लिया गया कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए यूनिकोड प्रणाली अपनाई जाए और यूनिकोड आधारित फॉन्ट विकसित कराए जाएं ताकि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में किए गए कार्य का आदान- प्रदान आसानी से हो सके। भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने यूनिकोड कंसोर्शियम और भारतीय भाषाओं पर काम करने वाली  कुछ प्रमुख साफ्टवेयर कंपनियों के साथ मिलकर यूनिकोड प्रणाली पर आधारित फॉन्ट विकसित करने के प्रयास शुरू किए। परिणामस्वरूप सितंबर 2005 में सरकार की ओर से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए नि:शुल्क यूनिकोड फॉन्ट उपलब्ध कराए गए। पहली बार यह एक सुसंगठित और ठोस प्रयास था। माइक्रोसॉफ्ट जैसे सॉफ्टवेयर जायंट ने भी इसके महत्व को पहचाना और अपने ऑपरेटिंग सिस्टम में इसे शामिल किया और फॉन्ट का नाम रखा मंगल। यह फॉन्ट ऑपरेटिंग सिस्टम 2000 और उससे उच्चतर वर्जन में पहले से विद्यमान है। भारत सरकार ने हिंदी के लगभग सौ यूनिकोड फॉन्ट अपनी वेबसाइट www.ildc.in पर उपलब्ध कराए हैं।
फॉन्ट के अलावा अन्य कई सुविधाएं इस साइट पर उपलब्ध हैं। अनुरोध करने पर कोई भी व्यक्ति अपने नाम का पंजीकरण करके इसकी सीडी नि:शुल्क प्राप्त कर सकता है। माइक्रोसॉफ्ट ने भी www.bhashaindia.com पर हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के लिए कई सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। सीडैक, साइबरस्केप, मॉड्यूलर जैसी भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियों का इसमें सराहनीय योगदान रहा है। अब कहा जा सकता है कि भारत में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए यूनिकोड आधारित फॉन्ट उपलब्ध हो गए हैं। जहां तक यूनिकोड फॉन्ट विकसित करने और उसकी उपलब्धता का प्रश्न था उसका काफी हद तक समाधान हो गया।
किंतु इस समस्या के दूसरे पक्ष का समाधान होना अभी बाकी था और वह था इसे लागू करने का।  सबसे बड़ी समस्या तो यह थी कि गैर यूनिकोड फॉन्टों में पहले से जो सामग्री तैयार की जा चुकी थी उसका क्या होगा।  इसके लिए सॉफ्टवेयर निर्माताओं ने कन्वर्टर दिए थे जो गैर-यूनिकोड फॉन्टों को यूनिकोड फॉन्टों में परिवर्तित करते थे।  अभी इसमें पूरी तरह सफलता नहीं मिली है।  दूसरा गंभीर प्रश्न यह था कि यूनिकोड में काम करने के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम विंडोज़ 2000 या एक्स.पी. की आवश्यकता होती है।  सरकारी कार्यालयों और बैंकों में अभी भी कई कम्प्यूटर ऐसे हैं जिनमें विंडोज़ 98 का उपयोग हो रहा है।  इस कम्प्यूटरों को विंडोज़ 2000 या विंडोज़ एक्स.पी. में अपग्रेड करना होगा जिसमें काफी खर्च निहित है। लेकिन अब यह समस्या समाप्त होती जा रही है क्योंकि लगभग सभी सरकारी कार्यालयों, बैंकों आदि में अपग्रेडेशन हो रहा है। इसके अलावा एक अन्य समस्या की-बोर्ड की थी जो अभी भी बनी हुई है।  विविध कार्यालयों में विविध प्रकार के की-बोर्ड उपयोग में लाए जा रहे हैं, जैसे कहीं सामान्य हिंदी टाइपराइटर की-बोर्ड का इस्तेमाल हो रहा है तो कहीं भारत सरकार सरकार द्वारा विकसित इन्सक्रिप्ट की-बोर्ड का।  कई उपयोगकर्ता ध्वनि आधारित फोनेटिक की-बोर्ड को पसंद करते है क्योंकि इससे उन्हें अलग से किसी टाइपराइटर को सीखने की आवश्यकता नहीं पड़ती और उसमें अंग्रेजी टाइपराइटर की-बोर्ड से सीधे हिंदी में टाइप किया जा सकता है।  कहीं-कहीं की-बोर्ड अपनी सुविधानुसार अलग से भी बनवाए गए हैं।  इतनी विविधता के चलते हमें यूनिकोड फॉन्टों के साथ-साथ यह सुविधाएं भी उपलब्ध करानी होंगी।  अंत में एक संवेदनशील मसला बच जाता है वैयक्तिक दृष्टिकोण का। यदि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को विश्व स्तर की अन्य भाषाओं के समकक्ष स्थापित करना है तो यूनिकोड को अपनाना ही होगा। इसके लिए हमें मानसिक रूप से तैयार होना पड़ेगा और अपना दृष्टिकोण भी बदलना होगा।
हिंदी और हमारी क्षेत्रीय भाषाएं यूनिकोड मंच पर पहुंच जाने से उन्हें एक अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिली है। अब विश्व स्तर पर इन भाषाओं का प्रचलन संभव हो सकेगा। भारतीय संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए यह जो सशक्त माध्यम हमें प्राप्त हुआ है उसे अनदेखा नहीं करना है। शुरूआत स्वयं से करनी है।

3 Comments:

श्याम कोरी 'उदय' said...

... ज्ञानवर्धक जानकारी, धन्यवाद !!!!

प्रो० डा. जयजयराम आनंद said...

lekh se pataa chalaa ki unicode keprayog se bhartiy bhashyo ki inernatinal level pr pahichan banne lgi hai.dhanybad.
Dr jai jai Ram Anand

प्रो० डा. जयजयराम आनंद said...

lekh achchaa lagaa.aur bhi aise lekh den

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष