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Aug 1, 2023

लघुकथाः शांति

  -   उदय प्रकाश 

उसकी मृत्यु हो रही थी। उसने संसार को समझ लिया था, इसलिए उसमें और रहने की घोषणा या इच्छा उसके अंदर शेष नहीं थी। उसकी साँसें मंद पड़ती जा रही थीं और बहुत ही नशीली, मधुर और आत्मीय मूर्च्छा धीरे-धीरे उसे अपने भीतर के निर्वात में खींच रही थी।

उसकी आँखें बंद थीं, चेहरे पर शांति और आनन्द की आभा फैली हुई थी।

‘इस घड़ी भी वह कितना निश्चित लग रहा है, है न?’’ किसी ने कहा, ‘‘मृत्यु के क्षण भी उसके चेहरे पर कैसी खुशी दिख रही है, है न?’’

तभी किसी ने जोरों से उसका नाम लेकर पुकारा, ‘‘देखो, जरा देखो तो.....यहाँ तुमसे मिलने कौन आया है!’’

उसके माथे पर सिलवटें पड़ीं। लगा, उसकी चेतना में कहीं कोई तकलीफदेह बेचैनी पैदा हुई। आँखें थोड़ी-सी खुली। वह थोड़ा-सा छपपटाया; मुँह खुलता-सा लगा।

अंत में, मृत्यु के समय उसका चेहरा ऐसा ही रह गया था।  ■■

धरोहरः प्राचीनतम गुफा- नाट्यशाला रामगढ़



 छत्तीसगढ़
कला और संस्कृति का गढ़ माना जाता है । जहाँ की रंग-परंपरा दुनिया में सबसे पुरानी मानी जाती है। आखिर दुनिया की सबसे प्राचीन और एकमात्र  नाट्य शाला छत्तीसगढ़ में जो स्थित है।  रामगढ़ की पहाड़ी पर स्थित सीताबोंगरा और जोगमारा गुफा में प्राचीन नाट्य शाला के प्रमाण मिले है जहाँ आधुनिक थियेटर की तरह सीताबोंगरा गुफा के भीतर मंच , बैठक व्यवस्था आदि के साथ शैल चित्र भी मिले हैं ।  इसीलिए सीताबोंगरा गुफा को छत्तीसगढ़ में रंगकर्म की परंपरा का जीवंत प्रमाण के रूप में देखा जाता है।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 280 किलोमीटर दूर सरगुजा जिले के मुख्यालय अंबिकापुर से 50 किलोमीटर दूर रामगढ़ की पहाड़ियाँ हैं। इन्ही पहाड़ियों में कुछ गुफाएँ हैं। प्राप्त साक्ष्य और अध्ययन के आधार पर कहा जाता है कि यहीं भगवान राम ने अपने वनवास का कुछ समय पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ रामगढ़ के पर्वतों में बिताया था। राम के तपस्वी वेश के कारण दूसरी छोटी गुफा को जोगीमढ़ा कहा जाता है तथा तीसरी गुफा को लक्ष्मण के नाम पर ‘लक्ष्मण गुफा’ का नाम दिया गया है। अनुसंधानों से पता चला है कि लगभग दो हजार साल पूर्व यहाँ नाट्य मण्डप बनाया जाता था, जहाँ  अनुमान है कि उस काल में क्षेत्रीय राजाओं द्वारा भजन-कीर्तन और नाटक करवाए जाते रहे होंगे।

मुख्यगुफा को सीता बेंगरा के नाम से जाना जाता है, अर्थात सीता का गुफा। यही सीता बेंगरा तीन कमरों वाली विश्व की प्राचीनतम नाट्यशाला के रुप में प्रचारित है जिसे ‘रामगढ़ नाट्यशाला’ या ‘रामगिरि’ पर्वत भी कहते हैं। सरगुजा बोली में बेंगरा का अर्थ कमरा होता है। यानी यह सीता का कमरा था। प्रवेश द्वार के समीप खंभे गाड़ने के लिए छेद बनाए हैं तथा एक ओर भगवान राम के चरण चिह्न अंकित हैं। मान्यता है कि ये चरण चिह्न महाकवि कालिदास के समय भी थे। मेघदूतम् में रामगिरि पर अप्सराओं की उपस्थिति का भी उल्लेख मिलता है।

सीता बेंगरा गुफा पत्थरों को गैलरीनुमा आकार में काट कर बनाई गई है। नाट्यशाला को प्रतिध्वनि रहित करने के लिए दीवारों में छेद किया गया है। गुफा तक जाने के लिए पहाड़ियों को काटकर सीढ़ियाँ बनाई गई हैं। जहाँ लगभग 30 लोग आराम से बैठ सकते हैं। इसके प्रवेश द्वार पर बाई ओर ब्राह्मी लिपि और माघी भाषा में दो पंक्तियाँ लिखी हुई हैं।

पुरातत्वेत्ताओं के अनुसार प्राप्त शिलालेखों से पता चलता है कि सीताबेंगरा नामक गुफा ईसा पूर्व दूसरी-तीसरी सदी की है। देश ही नहीं संभवत: पूरी दुनिया में इतनी पुरानी और कोई दूसरी नाट्यशाला कहीं नहीं है। 

1848 में कर्नल आउस्ले ने इस नाट्यशाला को सबसे पहले सबके सामने लाया था। 1903-04 में डॉ. जे. ब्लाश ने इसे आकेलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में प्रकाशित किया। जिसके अनुसार नाट्यशाला की लंबाई 44.5 फीट और चौड़ाई 15 फीट है। प्रवेश द्वार गोलाकार और लगभग छह फीट ऊँचा व दीवारें लम्बवत् है।

गुफा के बाहर दो फीट चौड़ा गड्ढा भी है जो सामने से पूरी गुफा को घेरता है। मान्यता है कि यही लक्ष्मण रेखा है, इसके बाहर एक पाँव का निशान भी है। इस गुफा के बाहर एक सुरंग है। इसे हथफोड़ सुरंग के नाम से जाना जाता है। इसकी लंबाई करीब 500 मीटर है। इस पहाड़ी में भगवान राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान की 12- 13वीं सदी की प्रतिमाएँ भी मिली हैं।

1906 में पूना से प्रकाशित वी के परांजपे के शोधपरक व्यापक सर्वेक्षण के ‘ए फ़्रेश लाइन ऑफ मेघदूत’ में यह बताया गया है कि रामगढ़ (सरगुजा) ही राम की वनवास स्थली और मेघदूतम की प्रेरणास्नोत रामगिरी है।

इतिहासकार भी रामगढ़ की पहाड़ियों को रामायण में वर्णित चित्रकूट मानते हैं। साथ ही संस्कृत के विद्वान्‌ भी रामगढ़ को महाकवि कालिदास की तपोभूमि मानते हैं जहाँ बैठकर उन्होंने अपनी कृति ‘मेघ दूत’ की रचना की थी। मान्यता के अनुसार महाकवि कालिदास ने जब राजा भोज से नाराज हो उज्जयिनी का परित्याग किया था, तब उन्होंने यहीं शरण ली थी और महाकाव्य मेघदूत की रचना इन्हीं पहाड़ियों पर बैठकर की थी।

इसी मान्यता के आधार पर इस स्थान पर प्रति वर्ष आषाढ़ के महीने में बादलों की पूजा की जाती है। देश में संभवत: यह अकेला स्थान है, जहाँ बादलों की पूजा करने की परंपरा प्रचलित है।

रामगिरि के इस अनोखे और एकमात्र नाट्यशाला को देखने के लिए आप बारिश का मौसम चुनेंगे तो आप प्रकृति के बीच वहाँ की सीढ़ियों पर बैठकर उस काल में होने वाले नाट्य अभिनय की कल्पना कर भी सकेंगे। पर्यटन विभाग द्वारा यहाँ आषाड़ के माह में विभिन्न सांस्कृति कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। ( उदंती फीचर्स) ■■

प्रेरकः विनय और करुणा का पाठ

 - निशांत

एक युवक ने किसी बड़ी कंपनी में मैनेजर के पद के लिए आवेदन किया। उसने पहला इंटरव्यू पास कर लिया और उसे फाइनल इंटरव्यू के लिए कंपनी के निर्देशक के पास भेजा गया। निर्देशक ने युवक के CV में देखा कि उसकी शैक्षिक योग्यताएँ शानदार थीं।

निर्देशक ने युवक से पूछा, “क्या तुम्हें स्कूल -कालेज में स्कॉलरशिप मिलती थी”?

“नहीं”, युवक ने कहा।

“तुम्हारी फीस कौन भरता था?”

“मेरे माता-पिता काम करते थे और मेरी फीस चुकाते थे।”

“वो क्या काम करते थे?”

“वो कपड़ों की धुलाई करते थे… अभी भी यही काम करते हैं।”

निर्देशक ने युवक से अपने हाथ दिखाने के लिए कहा। युवक ने निर्देशक को अपने हाथ दिखाए। उसके हाथ बहुत सुंदर और मुलायम थे।

“क्या तुमने कभी कपड़े धोने में अपने माता-पिता की मदद नहीं की?”

“कभी नहीं। वे यही चाहते थे कि मैं बहुत अच्छे से पढ़ाई करूँ। मुझे यह काम करते नहीं बनता था और वे इसे बड़ी तेजी से कर सकते थे।”

निर्देशक ने युवक से कहा, “तुम एक काम करो… आज जब तुम घर जाओ, तो अपने माता-पिता के हाथ साफ करो और कल मुझसे फिर मिलो।”

युवक उदास हो गया। जब वह अपने घर पहुँचा, उसने अपने माता-पिता से कहा कि वह उनके हाथ धोना चाहता है। माता-पिता को सुनकर अजीब-सा लगा। वे झेंप गए; लेकिन उन्हें मिली जुली सुखकर अनुभूतियाँ भी हुईं। युवक ने इनके हाथों को अपने हाथ में लेकर साफ करना शुरु किया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

जीवन में पहली बार उसे यह अहसास हुआ कि उसके माता-पिता के हाथ झुर्रियों से भर गए थे और ज़िंदगी भर कठोर काम करने के कारण वे रूखे और चोटिल हो गए थे। उन हाथों के जख्म इतने नाज़ुक थे कि सहलाने पर उनमें टीस उठने लगी।

पहली मर्तबा युवक को यह बात गहराई से महसूस हुई कि उसे पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाने के लिए उसके माता-पिता इस उम्र तक कपड़े धोते रहे ताकि उसकी फीस चुका सकें। माता-पिता ने अपने हाथों के जख्मों से अपने बेटे की स्कूल -कालेज की पढ़ाई की फीस चुकाई और उसकी हर सुख-सुविधा का ध्यान रखा।

उनके हाथ धोने के बाद युवक ने खामोशी से धुलने से छूट गए कपड़ों को साफ किया। उस रात वे तीनों साथ बैठे और देर तक बातें करते रहे।

अगले दिन युवक निर्देशक से मिलने गया। निर्देशक ने युवक की आँखों में नमी देखी और उससे पूछा, “अब तुम मुझे बताओ कि तुमने घर में कल क्या किया और उससे क्या सीख ली?”

युवक ने कहा, “मैंने उनके हाथ धोए और धुलाई का बचा हुआ काम भी निबटाया। अब मैं जान गया हूँ कि उनकी करुणा का मूल्य क्या है। यदि वे यह सब न करते, तो मैं आज यहाँ आपके सामने साथ नहीं बैठा होता। उनके काम में उनकी मदद करके ही मैं यह जान पाया हूँ कि अपनी हर सुख-सुविधा को ताक पर रखकर परिवार के हर सदस्य का ध्यान रखना और उसे काबिल बनाना बहुत महत्त्वपूर्ण बात है और इसके लिए बड़ा त्याग करना पड़ता है।”

निर्देशक ने कहा, “यही वह चीज है, जो मैं किसी मैनेजर में खोजता हूँ। मैं उस व्यक्ति को अपनी कंपनी में रखना चाहता हूँ, जो यह जानता हो कि किसी भी काम को पूरा करने के लिए बहुत तकलीफों से गुज़रना पड़ता है। इस बात को समझने वाला व्यक्ति अधिक-से-अधिक रुपये-पैसे कमाने की होड़ में अपने जीवन को व्यर्थ नहीं करेगा। मैं तुम्हें नौकरी पर रखता हूँ।”

(~_~)

जिन बच्चों को बहुत जतन और एहतियात से पाला- पोसा जाता है और जिनकी सुख-सुविधा में कभी कोई कोर-कसर नहीं रखी जाती, उन्हें यह लगने लगता है कि उनका हक हर चीज पर है और उन्हें उनकी पसंद की चीज किसी भी कीमत पर सबसे पहले मिलनी चाहिए। ऐसे बच्चे अपने माता-पिता की मेहनत और उनके समर्पण का मूल्य नहीं जानते।

यदि हम भी अपने बच्चों की हर ख़्वाहिश को पूरा करके, उन्हें खुद से पनपने का मौका नहीं दे रहे हैं तो हम उनकी आने वाली ज़िंदगी को बिगाड़ रहे हैं। उन्हें बड़ा घर, महँगे खिलौने, और शानदार जीवन शैली देना ही पर्याप्त नहीं है, उन्हें रोजमर्रा के काम खुद से करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। उन्हें सुविधापूर्ण जीवन का गुलाम नहीं बनाना चाहिए। उनमें यह आदत डालनी चाहिए कि वे अपना भोजन कभी नहीं छोड़ें, अन्न का तिरस्कार नहीं करें और अपनी थाली खुद धोने के लिए रखने जाएँ।

हो सकता है कि आपके पास अपने बच्चों की सभी ज़रूरतें पूरा करने के लिए बहुत अधिक पैसा हो और घर में नौकर-चाकर लगें हों, लेकिन उनमें दूसरों के प्रति संवेदना पनपाने के लिए आपको ऐसे कदम ज़रूर उठाने चाहिए। उन्हें यह समझना चाहिए कि उनके माता-पिता कितने भी संपन्न हों; लेकिन एक दिन वे भी सबकी तरह बूढ़े हो जाएँगे और शायद उन्हें दूसरों की सहायता की ज़रूरत पड़ेगी।

सभी बच्चों में यह बात विकसित करनी चाहिए कि वे दुनिया के हर व्यक्ति की जरूरतों, प्रयासों, और कठिनाइयों को समझें और उनके साथ मिलकर चलना सीखें ताकि हर व्यक्ति का हित हो। (हिन्दी ज़ेन से) ■■

लघुकथाः आखिरी रास्ता

  -  अजय पालीवाल ‘नरेश’ 

‘‘बाबूजी सुबह-सुबह कहाँ  चल दिए।’’ मैंने अपने पड़ोसी को टोका जो काफी वृद्ध थे। 

‘‘पोस्ट ऑफिस।’’

‘‘क्या पेंशन नहीं आई, या फिर बेटों के भेजे मनीआर्डर नहीं मिले?’’

‘‘कुछ रूपयों की आवश्यकता हो तो मुझसे ले लो? ला दूँ  क्या?’’

‘‘रूपयों का ढेर लगा है घर में, तुझे लगते हों तो ले जा।’’ अब बूढ़ी पड़ोसन अपनी चिरपरिचित शैली में बोल पड़ी,

‘‘तुम तो जाओ जी, इसकी बातों में लगे रहे हो पोस्ट ऑफिस बन्द हो जाएगा।’’

उनके बेटे बड़े सरकारी ओहदों पर थे जिम्मेदारी, कार्य  की अधिकता, समयाभाव के कारण चाह कर भी वे गाँव नहीं आ पाते थे ऊपर से बूढ़े- बूढ़िया गाँव न छोड़ने की जिद्द पर अड़े थे, उनकी खीज मुझ पर ही उतरती थी, मैं उनके बेटों का दोस्त जो था। 

‘‘बाबूजी , आज पोस्ट ऑफिस में ऐसा क्या काम अड़ गया जो आप खुद जा रहे हैं।’’ मैं पूछ ही बैठा।

‘‘टेलिग्राम करने।’’

‘‘टेलिग्राम!’’ मैं स्तब्ध रह गया।

‘हाँ- हाँ टेलिग्राम करने....मेरे मरने का, वह भी तेरे नाम से।’’ पड़ोसन की वही आवाज गूँजी।

‘‘अब खड़ा- खड़ा मुँह  ताकेगा या हाथ भी बँटाएगा। बेटे आएँगे, बहुएँ आएँगी नाती पोते पोतियाँ आएँगे।’’ यह बड़बड़ाते बूढ़ी के चेहरे पर आनंद उभर आया...सचमुच मैं भी उस मिलन की कल्पना में खो गया। ■■


लेखकों की अजब गज़ब दुनियाः एक से अधिक भाषा में लिखने वाले लेखक

 - सूरज प्रकाश

दुनिया भर के साहित्य में ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिलते हैं जब लेखकों ने एक से अधिक भाषाओं में रचनाएँ कीं या अपनी मातृभाषा से इतर भाषा में लिखा। ऐसे भी उदाहरण में मिलते हैं जब लेखक ने पढ़ाया तो एक भाषा में और रचना दूसरी भाषा में कीं। अविभक्‍त हिंदुस्‍तान में कई राज्‍यों में कहीं उर्दू ,तो कहीं  पंजाबी अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाती थी। इसका नतीजा ये हुआ कि बहुत से पंजाबी भाषी लेखक उर्दू में लिखते रहे। भारत के पंजाब में और पाकिस्‍तान के पंजाब में खासकर लाहौर में बहुत सारे रचनाकार ऐसे हैं जिनकी मातृभाषा पंजाबी है; लेकिन वह रचना उर्दू में करते हैं। बंगाल, गुजरात और बिहार में भी उर्दू में लिखने वाले रहे।  ऐसे सभी लेखकों की सूची देना संभव नहीं है; लेकिन ऐसे कुछ लेखकों के बारे में जानना रुचिकर होगा।

• उपेन्‍द्रनाथ अश्‍क हिंदी, पंजाबी और उर्दू में लिखते थे।

• कृश्‍न चंदर कश्‍मीरी थे; लेकिन उर्दू और हिंदी में लिखते थे।

• कोनराड जोसेफ पोलिश लेखक थे लेकिन इंग्लैंड में बसने के बाद लेखन अंग्रेजी में करते रहे।

• गुलज़ार की मातृभाषा हालाँकि पंजाबी है, वे उर्दू में लिखते हैं।

• गोविंद मिश्र शुरू- शुरू में अंग्रेजी पढ़ाते रहे; लेकिन लिखते हिंदी में ही रहे।

• देवेन्‍द्र सत्‍यार्थी कई भाषाएँ जानते थे और पंजाबी तथा हिंदी में लिखते थे।

• नागार्जुन भी कई भाषाएँ जानते थे और मैथिली में भी रचनाएँ कीं।

फ़िराक गोरखपुरी
• निदा फ़ाज़ली हिंदी और उर्दू दोनों में लिखते थे। 

• निराला जी ने शुरुआती कविताएँ बांग्ला में लिखी थीं।

• प्रेमचंद पहले उर्दू में लिखते रहे और बाद में हिंदी में लिखने लगे।

• फ़िराक गोरखपुरी अंग्रेजी के अध्यापक थे और उनका सारा लेखन उर्दू में है जबकि भीष्म साहनी अंग्रेजी पढ़ाते

थे, लेकिन हिंदी में लिखते रहे।

• भुवनेश्‍वर हिंदी के लेखक थे, लेकिन उनकी अंग्रेजी कविताएँ उत्‍कृष्‍ट मानी जाती हैं।

• माइकल मधुसूदन दत्त बांग्‍ला के अलावा संस्‍कृत, तमिल, ग्रीक, लेटिन, फ्रेंच और अंग्रेजी जानते थे। वे कई भाषाओं में एक साथ डिक्‍टेशन दे सकते थे।

• मिलान कुंडेरा फ्रेंच और चेक भाषा में लिखते थे। 

• राजकमल चौधरी मैथिली और हिंदी दोनों भाषाओं के रचनाकार थे, इसी तरह अमृता प्रीतम और गुरदयाल सिंह हिंदी और पंजाबी में लिखते रहे।

• राजिन्‍दर सिंह बेदी उर्दू में लिखते थे।

• राही मासूम रज़ा उर्दू और हिंदी दोनों भाषाओं में लिखते थे।

• राहुल सांकृत्यायन कई भाषाएँ जानते थे और उनमें लिखते भी थे और अनुवाद भी करते थे।

• लोलिता के लेखक नबोकोव जन्म से रूसी थे और बाद में जर्मनी, इंग्लैंड और बाद में अमेरिका में जा बसे। ललिता 1955 में अंग्रेजी में लिखा गया था और बाद में उसका रूसी में अनुवाद हुआ।

• वेद राही और पद्मा सचदेव डोगरी और हिंदी के रचनाकार हैं।

• सैमुअल बैकेट आयरिश लेखक थे और फ्रेंच औरन अंग्रेजी में भी लिखा।

• हरिवंशराय बच्चन अंग्रेजी में पीएचडी थे; लेकिन हिंदी में ही लिखते रहे।

मरने के बाद लेखन में प्रसिद्धि

कहा जाता है कि प्रसिद्धि चाहने से नहीं मिला करती लेकिन यह भी सच है कि प्रसिद्धि अगर मिलनी होगी तो आप प्रसिद्ध होकर ही रहेंगे। बेशक यह प्रसिद्धि मृत्यु के बाद ही मिले। दुनिया भर के साहित्य में ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिलते हैं जब लेखकों को उनके लेखन के जरिए उनकी मृत्यु के बाद ही पहचाना गया। कई लेखक ऐसे रहे, जिन्‍हें अपने जीते जी लेखन में जगह बनाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा तो कइयों के मामले में दूसरे कारण काम करते रहे। उन्‍हें अपनी मृत्‍यु के बाद और कई मामलों में बहुत देर बाद उनके लेखन को प्रसिद्धि मिली।

मुक्तिबोध
सबसे पहले इस सूची में आते हैं प्लूटो। वे शायद प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार से पहले के अकेले ऐसे लेखक हैं, जिनकी किताब ‘रिपब्‍लिक’ को उनके मरने के बाद ख्‍याति मिली।

हिंदी में भी ऐसे लेखक रहे हैं जो जीते जी अपने लेखन के कारण पहचान नहीं बना सके या हमेशा उपेक्षित ही माने गये। लेकिन मृत्यु के बाद वे अपने समय के सबसे महत्वपूर्ण रचनाकार माने गये। इस सूची में  सबसे पहला नाम मुक्तिबोध का आता है। बेशक अपने जीते जी अपनी रचनाओं और अपनी अलग सोच के कारण वे साहित्‍य में अपनी जगह बनाने लगे थे और उनकी एक डायरी भी छपी थी; लेकिन वे मृत्यु के बाद ही साहित्य में अपनी स्‍थायी जगह बना पाए। उनका सही मूल्‍यांकन हुआ। 

भुवनेश्वर ऐसे दूसरे रचनाकार रहे जिनके जीते ही उनका कोई नाटक नहीं छपा; लेकिन उनकी रचनाएँ उनकी मृत्यु के बाद भी सामने आईं और बाद वाली पीढ़ियां देख कर दंग रह गयीं कि कितना समर्थ रचनाकार अपने समय में अपनी जगह न बना सका और समकालीनों द्वारा हद दर्जे तक उपेक्षित हुआ। हालाँकि आज तक उनका सही मूल्यांकन नहीं हो पाया है। 

ऐन फ्रेंक एक ऐसी लड़की रही कि दूसरे विश्‍व युद्ध के दौरान अज्ञातवास में लिखी गई उसकी डायरी संयोग से ही उसकी अकाल मृत्‍यु के बाद सामने आई और बाइबल के बाद दूसरे नंबर पर पढ़ी जाने वाली रचना मानी जाती है।

फ्रांज काफ्का का छिटपुट लेखन विषय उनके जीते जी छपने लगा था। वे अपने पीछे ढेर सारी पांडुलिपियाँ छोड़कर गए थे। उन्‍होंने अपने दोस्त से कहा था कि मेरे मरने के बाद मेरी सारी पांडुलिपियाँ जला दी जाएँ। दोस्त ने काफ्का की अंतिम इच्छा की परवाह नहीं की और हम देखते हैं कि वे अपने पीछे कितना विपुल और महत्त्वपूर्ण साहित्य छोड़ कर गए हैं।

जॉन कैनेडी टूल ने अपनी आत्‍महत्‍या से पहले अपनी एक पांडुलिपि बेचने की कोशिश की थी; लेकिन सफल नहीं हुए थे। उनकी मृत्‍यु के 11 बरस बाद उनकी माँ और मित्रों ने वह किताब छपवाई, तब पता चला कि वह कितना बड़ा काम करके गए हैं।

हैनरी डेविड थोरी जंगल में रहा करते थे। वे ज्‍यादातर समय अकेले जंगलों में रहे। मृत्यु के बाद बेहद वे लोकप्रिय लेखक माने जाते हैं।

एमिला डिकिन्‍सन कभी भी अपने कमरे से बाहर नहीं निकलीं। जीते जी उन्होंने कुछ कविताएँ छपवाई थीं; लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उनके परिवार को उनकी रद्दी में ढेरों कविताएँ और अन्य रचनाएँ मिलीं। उनकी रचनाएँ उनकी मृत्‍यु के कई बरसों के बाद छपवाई जा सकी थीं। तभी पता चला था कि वे इतना बड़ा काम छोड़ कर गई हैं।

एडिथ होल्‍डन ने भी जीते जी कुछ कविताएँ बेशक छपवाई थीं। बाद में टेम्‍स नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली थी; लेकिन उनकी मृत्यु के बाद जब उनके कागज खँगाले गए, तो पता चला कि वे कितना काम छोड़ कर गई थीं।

सिल्‍विया प्‍लैथ ने भी अपना उपन्यास प्रकाशित होते ही आत्महत्या कर ली थी; लेकिन उनकी मृत्यु के बाद जब उनके पति ने उनका कविता संग्रह छपवाया तो वह मिसाल बन गया।

एडगर एलन पो जीवन भर अपने साहित्य के बल पर नाम कमाने के लिए संघर्षरत रहे। गरीबी में जिए और गरीबी में मरे, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद ही उनका काम सामने आ पाया।

राजकमल चौधरी बेशक मैथिली और हिंदी के बड़े रचनाकार हैं लेकिन जीते जी उन्हें कोई अहमियत नहीं दी गई उनका सारा काम उनकी मृत्यु के बाद ही सामने आ पाया।

फर्नांदो पेसोआ ने बेशक 75 छद्म नामों से लेखन किया लेकिन वे अपने पीछे 27000 अप्रकाशित पन्‍ने  छोड़कर गए थे। उनके जीते जी उनकी दो तीन किताबें ही छपी थीं।  (क्रमशः)