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Nov 1, 2021

व्यंग्यः लक्ष्मी नहीं आई, आ गई महँगाई !

- गिरीश पंकज

दिवाली निकट थी, पर स्थिति बड़ी विकट थी। कारण यह कि हमारे जीवन का दिवाला पिटा हुआ था और हम दीवाल से सिर सटाकर यही सोच रहे थे कि इस (कमरतोड़ नहीं) हृदयतोड़ महँगाई के बीच खुशियों के दीप जलें तो जलें कैसे! तभी किसी ने द्वार खटखटाया। रात का समय था । हम अतिरिक्त उत्साह से भर गए, क्योंकि सुन रखा था कि दिवाली के आसपास लक्ष्मी  मैया कभी भी दरवाजा खटखटाके घर के भीतर प्रवेश कर सकती है । हमने एक विज्ञापन भी सुना था जिसमें लॉटरी बेचने वाला बार-बार यही कहता था, ‘लक्ष्मी आपके घर का दरवाजा खटखटा रही है।’  हमने कोई लॉटरी तो नहीं खरीदी थी;  लेकिन यह सोचकर दरवाजा खोलने के लिए उठ खड़े हुए कि हो सकता है आज लॉटरी लग जाए,  यानी लक्ष्मी मैया आकर कहे - ‘बेटे! बता, तेरे घर की तिजोरी कहाँ है, मैं उसमें समाना चाहती हूँ।’  लेकिन जैसे ही दरवाजा खुला, मैंने देखा, वहाँ कोई नहीं था।  तब मुझे किसी कवि की रचना याद आ गई, जिसमें कवि ने कहा है-  ‘न कोई आया था, न कोई आया होगा/ तुम्हारा दरवाजा हवाओं ने खटखटाया होगा।’ हालाँकि बाहर ऐसी कोई हवा नहीं चल रही थी कि दरवाजा अपने आप खटकने लगे । थोड़ी देर बाद फिर खटखट की आवाज हुई तो मैंने फिर अति उत्साह के साथ दरवाजा खोला, तो देखा, बाहर एक ‘कूपसी’ खड़ी है। ( रूपसी का विलोम कूपसी)

मुझे देखकर कूपसी मुस्काई; लेकिन उसकी मुस्कान मुझे रत्ती भर नहीं भाई, क्योंकि उसका चेहरा सामान्य नारियों जैसा बिल्कुल नहीं था। मुझे रामायण काल की शूर्पणखा की याद हो आई। बिल्कुल उसकी तरह ही कूपसी का चेहरा नज़र आ रहा था। उसे देख कर मैं मन-ही-मन घबरा रहा था:  हे भगवान! भला, यह कौन-सी बला टपक पड़ी है। मैंने उसकी मुस्कान का ज़वाब मुस्कान से देते हुए खानदानी शिष्टाचार निभाया और हाथ जोड़कर फरमाया, ‘बताइए देवी!  मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?’
कूपसी  कुछ कुछ कविता पढ़ने के अंदाज़ में बोली-

 ‘क्या तुमने मुझे नहीं पहचाना?
अरे भाई, मैं महँगाई हूँ।
तुम्हारा हालचाल

जानने के लिए आई हूँ।
कैसी कट रही है
मेरे राज में?
कुछ स्वाद आ रहा है
आलू और प्याज में?
या फिर जिंदगी जीने के लिए
हमेशा की तरह
पैसे उठा रहे हो ब्याज में?’
मैंने कहा, ‘तुम तो इस देश के मध्यम और निम्न मध्यमवर्गीय लोगों का हाल-चाल जानती ही हो। तुम्हारे कारण हम सबकी जो दुर्गति हो रही है, उसे देख कर यही लगने लगा है कि बहुत जल्दी हम 'सद्गति' को प्राप्त हो जाएँगे।’
मेरी बात सुनकर कूपसी हँसी और बोली, ‘हम तुम्हें जीने नहीं देंगे और सरकार तुम्हें मरने नहीं देगी। वह ऐसे-ऐसे लोक लुभावन वादे करेगी कि उसी प्रत्याशा में तुम लोग जिंदा रहोगे। इतने साल से तुम सब सरकार के वादों पर ही तो जिंदा हो। हालाँकि तुम सब बार-बार यह गाना भी गाते हो कि वादे पे तेरे मारा गया अब बंदा ये सीधा-सादा, वादा तेरा वादा । लेकिन एक बात तो है कि सरकारी वादे इस देश के आम आदमी को उत्साह से भर देते हैं और वह मगन होकर सोचने लगता है कि अब आएँगे अच्छे दिन। अब दूर होगी गरीबी; लेकिन ऐसा होता नहीं है।  वैसे सच्चाई यह है कि जो लोग गरीबी हटाओ का नारा देते हैं, सबसे पहले उनकी गरीबी दूर हो जाती है। जो लोग कहते हैं, अच्छे दिन आएँगे, सत्ता में आने के बाद उनके अच्छे दिन शुरू हो जाते हैं । तो एक तरह से वे गलत भी नहीं कहते । उनकी गरीबी तो हट गई न! उनके अच्छे दिन आ गए न!! आखिर वे भी तो इस देश के नागरिक हैं । उन्हें भी जीने-खाने का हक है । चलो करोड़ों के अच्छे दिन नहीं आए तो क्या हुआ, मुट्ठी भर लोगों के तो आ गए।’
मैंने कहा, ‘ओ रूपसी की डुप्लीकेट बहन कूपसी! यह सब तुम्हारी कृपा के कारण हो रहा है। देशभर में तुम्हारा जलवा है। तुम जिस चीज पर हाथ रख दो, उसकी कीमत बढ़ जाती है। विपक्ष को तुम्हारी आड़ लेकर सरकार की खिंचाई करने का मौका मिल जाता है।  जो दल सरकार में रहता है, उसे विपक्ष वाले बस इसी बात पर कोसते हैं कि हाय- ‘हाय! देखो, इस नालायक सरकार के कारण देश में महँगाई बढ़ गई है।.. लोगों का जीना दूभर हो गया है’ । मगर जैसे ही विपक्ष सत्ता के घोड़े पर सवार होता है, वह भी तुमसे (यानी महँगाई से) इश्क लड़ाने लगता है।  और शुरू हो जाता है खुला खेल फर्रुखाबादी । हे डायनश्री,  तुम्हारे साथ सरकार का ऐसा गठबंधन होता है कि मत पूछो। तुम्हारे हुस्न के जलवे ऐसे  बिखरते हैं कि लोग बस आहें भर के रह जाते हैं।  तब तुम यही गाना गाती हो, आहें न भर ठंडी-ठंडी खतरे की है यह घंटी, गरम-गरम चाय पी ले।’
महँगाई बाई हँसी और  आश्चर्यचकित होकर कहने लगी, ‘अच्छा ! तो लोग इस महँगाई के ज़माने में चाय भी पी लेते हैं? क्या शक्कर सस्ती हो गई है? मैंने तो हर तरफ अपना शिकंजा फैला कर रखा है। पेट्रोल की कीमतें आकाश छू रही हैं। डीजल उसके पीछे-पीछे भागा चला जा रहा है । घरेलू गैस भी सबसे आगे निकल चुकी है। सब्जी, अनाज हर कहीं मेरा जलवा नज़र आता है । आम आदमी कुछ खरीदने के पहले सौ बार सोचता है। अपनी जेब देखता है, तब आगे बढ़ता है । कई बार तो बेचारा सामान के दूर-दर्शन करके ही घर लौट जाता है। ऐसा भयंकर आतंक मैंने फैला कर रखा है।’
मैंने महँगाई को प्रणाम करते हुए कहा, ‘हे कु-देवी!  तुम इस देश से जाने का क्या लोगी? तुम्हारे कारण हम लोग ठीक से त्यौहार भी नहीं मना सकते । अब देखो न, दिवाली पर दिवाला पिटने जैसी स्थिति है।  मिठाई खरीद नहीं सकते। वह इतनी महंगी हो गई है। ले- दे कर एकाध पाव खरीद लिया, तो बड़ी बात। और उस पर भी डर लगता है कि कहीं उसमें मिलावट  न हो।  एक तो महँगी मिठाई और उस पर मिलावटी! मतलब हम पर दोहरी मार । उधर पटाखे भी इतने महंगे कि कीमत  सुनकर ही आदमी ‘बम’ हम हो जाता है । कहने का मतलब यह है कि तुम्हारे कारण  दिवाली केवल धनवालों का त्योहार होकर रह गई है। लेकिन ऐसा नहीं है कि
केवल धन वाले ही
दिवाली मनाते हैं
हम जैसे दिलवाले भी
दिवाली मना लेते हैं ।
और दो-चार मिट्टी के दीयों में
अपने आँसू भर कर
उन्हें जला देते हैं।’
मेरी पीड़ा सुनकर महँगाई एक बार फिर हँसी और बोली, ‘तुम लोगों के हिम्मत की दाद देती हूँ। जानलेवा महँगाई के दौर में भी तुम लोग मुस्कुरा लेते हो ? खुश रहने की कोशिश करते हो ! मिठाई का एकाध टुकड़ा खाकर ही जीवन को स्वादिष्ट बना लेते हो । पेट्रोल खर्च न हो इसलिए लंबी-लंबी पदयात्रा भी कर लेते हो!  तुम लोगों की बात निराली है । यह और बात है कि भ्रष्ट सरकारी व्यवस्था के कारण ही तुम लोग की किस्मत काली है।  यही कारण है कि सिस्टम को याद करके तुम सब के होठों पर गाली-ही-गाली है।  लेकिन चिंता मत करो । बहुत जल्दी तुम्हारे अच्छे दिन आने वाले हैं।’
महँगाई की बात सुनकर मैंने कहा,  ‘अच्छे दिन की याद मत दिलाओ।  यह जुमला बड़ा खतरनाक है । जब सरकार कहती है, अच्छे दिन आएँगे, तो इसका मतलब यह है कि जनता के बुरे दिन शुरू होने वाले हैं । बहुत पहले जब सरकार ने कहा था, गरीबी हटाओ तो लगा था,

सचमुच गरीबी हटेगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं । गरीब ही मिटते चले गए और सभी जगह अमीर-ही-अमीर बढ़ते चले गए।  तो, हे देवी ! कृपा करके अच्छे दिन का वास्ता मत दो।  बस, तुम से करबद्ध प्रार्थना है कि अपना सुरसा जैसा आकार बढ़ाना बंद कर दो, तो हम सब के अच्छे दिन शुरू हो जाएँगे।’
मेरी बात सुनकर कूपसी बोली, ‘मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा।  यह सरकार पूँजीपतियों के साथ जिस तरह से नैन-मटक्का या रोमांस कर रही है, उसे देखते हुए लगता है कि उसी ने सब कुछ छूट देख दे रखी है कि देश को जितना चाहो, उतना लूटो । हम तुम को अभय दान देते हैं । बस, तुम अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा हमारी जेबों को समर्पित करते रहो, फिर चाहे नंगा नाच करो। हमें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। रही जनता की बात,  तो उसे हम हर बार की तरह झाँसा देकर बहला- फुसला लेंगे और सत्ता पर काबिज रहेंगे।’
महँगाई की दो टूक बात सुनकर मैं सोचने लगा कि आखिर इस बाई ने मेरा दरवाजा क्यों खटखटाया। क्या यह मुझे और कंगाल बनाना चाहती है? या फिर खुद से यानी महँगाई से निपटने का कोई खास फार्मूला देना चाहती है ? इसलिए मैंने पूछ लिया, ‘अच्छा, यह तो बताओ कि तुम इस दिवाली के मौके पर मेरे घर किसलिए तशरीफ लाई?’
मेरी बात सुनकर महँगाई  पहले मुस्कुराई फिर थोड़ा-सा सकुचाई, शरमाई और उसके बाद उसने फरमाया, ‘दरअसल मैं यही देखने आई हूँ कि तुम लोगों के जीवन में दिक्कत में कोई कमी तो नहीं है। अगर तुम्हारी दिक्कत कुछ कम हो रही हो, तो मैं उसे कैसे बढ़ा सकती हूँ। इसका सर्वे करने निकली हूँ। मैं सरकार की खास प्रवक्ता हूँ। सरकार की मंशा भी यही है कि जनता को अधिक-से-अधिक तकलीफ में रखा जाए। शायद इसके पीछे उसकी मंशा यही हो कि लोग भक्ति-भाव में डूबे रहें। किसी कवि ने कहा है न- ‘दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय’, तो सरकार चाहती है कि लोग भगवान का नाम लेते रहें। इसलिए देश की जनता को वह महँगाई के बोझ तले दबाए रखना चाहती है । एक तरह से सरकार बड़ा काम कर रही है कि वह सबके हृदय में भक्ति की गंगा प्रवाहित कर रही है।’
महँगाई कि बात सुनकर मुझे हँसी आ गई। मैंने कहा, ‘देवी ! तुमको और इस सरकार को बारंबार प्रणाम है, जिसने हमें दुख सहने का आदी और दुख सहते हुए भगवान का भक्त भी बना दिया है। अब तुम आगे बढ़ जाओ ताकि मैं दीपक जलाकर अपने जीवन में उजाला कर लूँ।’
महँगाई चौंक कर बोली, ‘तो तुम्हारे घर में तेल भी है?आश्चर्य!!’
मैंने कहा, ‘हम गरीब लोग तेल से नहीं, आँसुओं से दीपक जलाते हैं और पटाखे फोड़ कर नहीं, उसकी आवाज सुनकर दिवाली मनाते हैं ।’
मेरा उत्तर सुनकर महँगाई का चेहरा उतर गया और वह आगे बढ़ गई। फिर हमने दरवाजा बंद कर दिया और इंतजार करने लगे कि शायद भूले-भटके ही सही, लक्ष्मीदेवी आकर मेरा दरवाजा ज़रूर खटखटाएगी।

सम्पर्कः सेक़्टर -3, एचआईजी - 2/ 2 , दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर- 492010, मोबाइल :  87709 69574

रामेश्वर शुक्ल 'अंचल' की दो कविताएँ


1. दीपक माला

इन दीपों से जलते झलमल,
मेरे मन के गीत अधूरे।
इन दीपों से जलते मेरे स्वप्न,
हुए जो कभी न पूरे।
केवल एक रात जल कर,
बुझ जाएगी यह दीपक माला।

पर मरते दम तक न बुझेगा,
मुझमें तेरा रूप-उजाला।

तेरी रूप-शिखा में मेरे
अंधकार के क्षण जल जाते।
तेरी सुधि के तारे मेरे
जीवन को आकाश बनाते।
आज बन गया हूँ मैं इन दीपों का
केवल तेरे नाते।
आज बन गया हूँ मैं इन गीतों का
केवल तेरे नाते।






2. दीपक मेरे, मैं दीपों की

दीपक मेरे, मैं दीपों की
सिंदूरी किरणों में डूबे
दीपक मेरे
मैं दीपों की!

इनमें मेरा स्नेह भरा है
इनमें मन का गीत ढरा है
इन्हें न बुझने देना प्रियतम
दीपक मेरे मैं दीपों की!

इनमें मेरी आशा चमकी
प्राणों की अभिलाषा चमकी
हैं ये मन के मोती मेरे
मैं हूँ इन गीले सीपों की

इनको कितना प्यार करूँ मैं
कैसे इनका रूप धरूँ मैं
रतनरी छाँहों में डूबे
दीपक मेरे मैं दीपों की

जीवन दर्शनः ईश्वर का हाथ : सदा रखें साथ

-विजय जोशी  
( पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहि

सब अंधियारा मिटी, जब दीपक देखा माहि

  ईश्वर जीवन का एक अनिवार्य अंग है भले वह आकार रूपी हो या निराकार रूपी। यहाँ हम ईश्वर के अस्तित्व, उसके होने या न होने की बहस में पड़ने के बजाय मानव जीवन में उसकी अनिवार्यता की बात कर रहे हैं। नास्तिक भी भले ही ईश्वर के अस्तित्व को नकारे, लेकिन वे भी यह तो स्वीकारने से इनकार नहीं कर सकते कि उनके अपने निजी जीवन में भले ही वे पूजा उपासना के उस स्वरूप को न प्राप्त कर सके जो सर्वमान्य है, पर उन्हें भी कठिनाई के क्षणों में एक मनोवैज्ञानिक सहारे की आवश्यकता अनुभव होती है।

  बात और आगे बढ़ाएँ तो पाएंगे कि जीवन में एक न एक खूंटे की जरूरत रहती है। जैसे पशु सारे दिन चरकर संध्या समय फिर खूँटे पर लौट आते हैं खुद ब खुद बँध जाने के लिये। यह खूँटा ही उनके मन में सुरक्षा की भावना उपजाता है। बच्चे के लिए उसकी माँ का आँचल ही उसका खूँटा है, जिसमें मुँह ढाँककर वह संसार की सारी दुश्चिंता से सुरक्षा पा लेता है। हरेक का अपना एक खूँटा होता है जो उसे मनोवैज्ञानिक रूप से सुरक्षित रखता है और हर कठिनाई या दुख के पल में उसे उसकी याद पूरी शिद्दत से आने लगती है। हरेक का आश्रय स्थली या आसरा यही है। यही बात तो संत कबीर ने भी कही है – उड़ी जहाज को पंछी पुनि जहाज पे आए।

  अब इसको थोड़ा और आगे बढ़ाएँ तो पाएँगे कि जीवन का जो स्थायी खूँटा है वह ईश्वर ही है। हर मुश्किल के पल में वह अदृश्य होते हुए भी सदा हमारे साथ खड़ा रहता है। याद कीजिए कठिनाई के क्षणों में हम जब प्रार्थना करते हैं, तो कितनी शांति तथा साहस प्राप्त होता है। हमारा परिवेश,  वातावरण मात्र जीवन का भौतिक पक्ष है तथा जितनी आवश्यकता भौतिक संसाधनों की होती है उतनी ही या उससे अधिक मनोवैज्ञानिक सहारे की। साहस शरीर से अधिक मन का होता है और इसके लिये आत्मा की मजबूती अनिवार्य है।

  धर्म कोई भी हो पर हर एक का एक न एक आस्था, विश्वास व श्रद्धा का केन्द्र होता है। उसे किसी ने नहीं देखा और न ही वह हमारे दैनिक जीवन में किसी भी प्रकार की बाधा पैदा करता है, पर फिर भी जब आप कोई गलत कार्य करते हैं तो आपकी आत्मा आपको धिक्कारती है। उस समय आपके ज़मीर में आपका ईश्वर ही होता है। आपने देखा होगा ईश्वर के अस्तित्व को नकारने घोर सें घोर नास्तिक भी सार्वजनिक रूप से चाहे जो कहते हों पर व्यक्तिगत जीवन में पूरी तरह धार्मिक होते हैं। परंपराओं का पालन करते हैं।

  प्रगतिशीलता का चोला ओढ़कर भले ही आप ईश्वर को नकार दें, पर हजारों के विश्वास की थाती को नकारना तो उचित नहीं। इस संदर्भ में गाइड फिल्म के राजू का छोटा सा वाक्य मुझे आज भी अपील करता है। जब उस पर साधु उपाधि थोपकर अनशन पर बैठा दिया गया, तब एक पत्रकार द्वारा उसे ईश्वर पर विश्वास के संदर्भ में पूछे जाने पर देवानन्द ने कहा था - मैं नहीं जानता ईश्वर है या नहीं। लेकिन उस पर इतने लोगों का  विश्वास है और इनके विश्वास में ही मेरा विश्वास है। यह विश्वास ही हमारी थाती है।

  एक नवयुवक का विवाह हुआ, वह अपनी दुल्हन को लेकर समुद्री जहाज से यात्रा पर निकला। कुछ ही दिन बाद समुद्र में तूफान आ गया, जहाज काफी पुराना था, सो तूफान के वेग के आगे डगमगाने लगा। सब यात्रियों में भय व्याप्त हो गया। लगने लगा कि जहाज अब डूबा, तब डूबा। मौत का मंजर सामने आने लगा तो सबकी आँखों में खौफ व्याप्त हो गया। उस सबसे बेखबर वह नवयुवक सहज बैठा हुआ था। उसकी नई नवेली पत्नी जीवन के सफर की शुरुआत में ही ऐसा संकट देखकर घबराने लगी और थर-थर काँपने लगी।

    उसने अपने पति से पूछा - जहाज डूबने वाला है, मौत सामने खड़ी है और आप शांत चित्त कैसे बैठे हो।

 उसका पति हँस पड़ा उसने अपनी म्यान में से तलवार निकाली और अपनी पत्नी के गले पर रख दी। उसकी पत्नी हँसने लगी, नवयुवक कहने लगा - तुम्हारी गर्दन पर मैं नंगी तलवार रखे हुए हूँ और फिर भी तुम हँस रही हो।

  उसकी पत्नी ने कहा - मुझे तुमसे प्रेम है, तो तुम्हारी तलवार से भय मालूम नहीं होता।

  नवयुवक ने कहा - मुझे भगवान से प्रेम है, इसलिए तूफान से या मौत से भय मालूम नहीं होता। सच है जहाँ प्रेम है वहाँ भय की कोई संभावना नहीं है। मनुष्य के व्यक्तित्व के केन्द्र पर हजारों सालों से भय का अधिकार छाया हुआ है। भय चूँकि नकारात्मक स्थिति है, इसलिए यह मनुष्य के व्यक्तित्व को भी नकारात्मक बना देता है। जो मनुष्य इस स्थिति से उबरकर अपना व्यक्तित्व निखारता है, वही जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में कामयाब होता है।

    इसलिए आप ईश्वर पर विश्वास अवश्य रखें एवं और यदि उसके अस्तित्व पर ही आपको यकीन न हो, तो भी उसे जो भी नाम देना चाहे, उसे उसी रूप में स्वीकारें। आखिरकर जीवन की जंग में अंदर के साहस तथा आत्म विश्वास की आवश्यकता तो होगी ही और उसके लिये कोई न कोई आसरा आपको ढूँढना ही होगा। जब आप प्रार्थना में रत होते हैं, तब वह उस तक पहुँच ही रही है, यह तो किसी ने नहीं देखा, पर उन क्षणों में आपका तन, मन दोनों स्थिर होते हैं। बैचेनी कम होने लगती है तथा धैर्य आपके सोच को बलवान बनाकर आपको आत्म विश्वास प्रदान करते हुए परिस्थिति से सामना करने हेतु मानसिक रूप से तैयार करता है। और यही है वह संबल, आसरा, आश्रय या खूँटा। जिस नाम से भी आप पुकारना चाहें उसके लिए आप स्वतंत्र हैं, लेकिन एक न एक ऐसे मानसिक सहारे की खोज अवश्य करें। इससे आपको गहन दुख के क्षणों में गहन शांति का अनुभव होगा।

 सलीका ही नहीं उसे महसूस करने का

जो कहता है कि खुदा है तो दिखाई देना ज़रूरी है

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023, मो. 09826042641, E-mail- v।joshi415@gmail।com

छत्तीसगढ़ की दीवालीः लोक संस्कृति में ग्वालिन पूजा

दीपावली पर्व की तैयारी तभी से दिखाई देने लगती है,  जब कुम्हारों के घर चाक पर मिट्टी के दीये बनने शुरू हो जाते हैं। आपने देखा होगा,  मिट्टी के दीयों के साथ – साथ कुम्हार ग्वालिन की मूर्तियाँ भी बड़ी संख्या में बनाते हैं। दीयों के साथ- साथ  विभिन्न रंगों से रँगी तरह – तरह की ग्वालिन की मूर्तियाँ  बाजार में नज़र आने लगती हैं। क्या आप जानते हैं कि दीपावली पर्व में इन ग्वालिनों का क्या महत्व है। ग्वालिन मात्र एक दीये का प्रकार नहीं है;  बल्कि यह ग्वालिन के रूप में लक्ष्मी का प्रतीक है। जिसको दीपावली के दिन  पूजा जाता है। 
छत्तीसगढ़ में अधिकतर गाँव के घर आँगन वाले होते हैं, जहाँ प्रत्येक आँगन में तुलसी चौरा रखने की परम्परा है। इसी तुलसी चौरा में दीये वाली एक मूर्ति आपको अवश्य दिखाई दे जाएगी। दीप धारण की हुई यह मूर्ति ही ग्वालिन कहलाती है। यह मूर्ति  तीन, पाँच, सात या नौ दियों वाली बनाई जाती है।  नौ दिये वाली ग्वालिन को नौ ग्रहों से जोड़कर देखा जाता है। प्रत्येक दीपक को एक ग्रह का सूचक माना जाता है। इस मिट्टी की मूर्ति को लक्ष्मी के समकक्ष ही पूजा जाता है।  मिट्टी के दियों के साथ- साथ कुम्हार हर साल दीपावली के समय मिट्टी की ग्वालिन की मूर्तियाँ  भी बनाते हैं। तुलसी चौरा में रखी इस मूर्ति को दूसरी दीवाली आने तक रखा  जाता है। पहली वाली मूर्ति  विसर्जित कर दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि यह ग्वालिन घरों में क्लेश, विघ्न-बाधाओं और दोष को दूर कर खुशहाली लाती हैं।

आधुनिकता के साथ परिवर्तन स्पष्ट दिखाई दे  रहा है। फिर भी कुछ पुरानी परम्पराएँ आज भी किसी न किसी रूप में हमारे समाज में विद्यमान हैं। लक्ष्मी यानी  ग्वालिन का पूजा भी उन्हीं परम्पराओं में से एक है ग्वालिन पूजा। कई  दीपों को धारण करने वाली यह ग्वालिन धन-धान्य व समृद्धि की प्रतीक मानी जाती है। ऐसा मान्यता है कि ग्वालिन घरों से कलह, दोष आदि को दूर करती हैं। छत्तीसगढ़ी लोक में दीवाली के जो प्रतीक हम देखते हैं, वह कृषि आधारित श्रमिक वर्ग के उत्सव के अधिक करीब हैं। इस लिहाज से ग्वालिन पूजा का महत्त्व ग्रामीण क्षेत्रों में बहुतायत से दिखाई देता है।

लक्ष्मी के वैसे तो हजारों रूप हैं, लेकिन मूल अठारह रूपों में इनकी पूजा होती है। महालक्ष्मी इनकी प्रधान देवी कही गई हैं। इन रूपों में एक दरिद्र लक्ष्मी भी हैं, जो कि समूचे बुंदेलखंड, महाकोशल, छत्तीसगढ़ व महाराष्ट्र सहित अनेक हिन्दी भाषी राज्यों में पूजी जाती हैं।

ग्वालिन पूजा के संदर्भ में इतिहासकारों का मत है कि-  ‘ग्वालिन पूजन की परंपरा कल्चुरी काल से भी पुरानी है। मूल रूप से यह परंपरा बुंदेलखंड की मानी जाती है, जो आस-पास के दूसरे प्रदेशों में भी प्रचलित होती चली गई।  पहले सम्पन्न लोग सोने- चाँदी और पीतल से बने लक्ष्मी-गणेश का पूजन करते थे, लेकिन गरीब व निचला तबका इस पूजन के योग्य नहीं माना जाता था, या कह सकते है उनकी हैसियत इतनी नहीं होती थी कि वे सोने- चाँदी की मूर्तियाँ बनवा सकें।  संभवतः इसके बाद ही  दरिद्र लक्ष्मी या ग्वालिन के पूजन का प्रचलन प्रकाश में आया होगा। और इसे दरिद्र लक्ष्मी का नाम दे दिया गया। दरिद्र लक्ष्मी गरीबों व निचले तबकों को सुख समृद्धि प्रदान करने वाली मानी। इस तरह ग्वालिन की पूजा करने की यह परम्परा चली आ रही है।’

समाजशास्त्री और ज्योतिष शास्त्रियों का भी यही कहना है कि लक्ष्मीपूजन के दिन ग्वालिन की पूजा करने की परम्परा इसलिए शुरू हुई; क्योंकि प्राचीन काल में लक्ष्मी पूजा सिर्फ सम्पन्न वर्ग ही अपना अधिकार मानता था । इसलिए, सामाजिक - आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग ने मिट्टी के दीयों के साथ ग्वालिन बनाकर उसको ही लक्ष्मी का प्रतिरूप मान कर पूजा करना शुरू किया होगा; जो कालान्तर में एक परम्परा के रूप में  विकसित हो गई।

इसमें कोई दो मत नहीं कि लोक की दीवाली का अपना अलग ही महत्त्व है । समय के अनुसार बदलाव आते जा रहे हैं परंतु कुछ परम्पराएँ आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिल जाती हैं ।  छत्तीसगढ़ में लक्ष्मी पूजा के दिन को ‘सुरहुती’ के रूप में मनाया जाता है। उसके बाद गोवर्धन पूजा और फिर ‘मातर’ मनाया जाता है। इन तीनो दिनों में गौपालक यानी रावत समाज की सबसे बड़ी भूमिका होती है। हैं। यही ग्वाला समाज समाज दीवाली के दिन मिट्टी की बनी ग्‍वालिनों को लाकर पूजते है।

पारंपरिक रूप से ग्वालिन पूजा का महत्त्व अब कम होते जा रहा है। जिसे आज बचाए रखने की आवश्यकता है। जिस प्रकार मिट्टी के दीपक का महत्त्व कम होता जा रहा है और उसी प्रकार ग्वालिन बनने में कम होते जा रहे है । आज लोग सिर्फ परम्परा के नाम पर मिट्टी के कुछ दीये खरीदकर ले आते हैं और  अपने पूरे घर को बिजली के लट्टूओं से रोशन करते हैं  और मिट्टी का दिया किसी एक कोने में टिमटिमाता जलते रहता है। ऐसे में भला हमारे पारम्परिक कला और व्यवसाय समाप्त तो होंगे ही।

यह खुशी की बात है कि राज्य सरकारें वर्तमान में लोक कला और पारंपरिक कला को बढ़ावा देने के लिए लोक व्यवसायों के संरक्षण, संवर्धन  की दिशा में काम कर रही हैं। पर यह सिर्फ पर्यटकों को लुभाने के लिए मात्र न होकर पूरे देश के लिए उन्नति में सहायक हो और हमारी सांस्कृतिक पहचान को जिंदा रखने के लिए हो । ( उदंती फीचर्स) 

आलेखः बड़ा महत्त्वपूर्ण है शब्दों का चयन

-डॉ. आशीष अग्रवाल

शब्दों में कमाल की ऊर्जा होती है

हमारे मुँह से बोले हुए शब्द हमारे व्यक्तित्व के बारे में बताते हैं। आपने अकसर  कुछ लोगों को क्रोधित होते हुए देखा होगा। क्रोध के आवेश में वे लोग, ना जाने क्या-क्या बोल जाते हैं, और वो, जिस व्यक्ति पर क्रोधित हो रहे होते हैं, (चाहे वो उनके घर में, उन्हीं के ऊपर आश्रित कोई व्यक्ति हो, या फिर उनका अधीनस्थ कर्मचारी हो), वे सभी लोग जिनके लिए ऐसे शब्द बोले गये हैं, उन कटु शब्दों को सदैव याद रखते हैं। दूसरी ओर, कुछ लोग काफी कम बोलते हैं और सोच-समझकर बोलते हैं, इसलिए उनके द्वारा बोले गए मीठे और मधुर शब्दों का प्रभाव, सुनने वाले व्यक्ति के हृदय पर हमेशा-हमेशा के लिए अंकित हो जाता है। इसी वजह से कहा जाता है कि ‘शब्दों का चयन बड़ा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि शब्दों में कमाल की ऊर्जा होती है’। उस ऊर्जा का प्रयोग आपको कैसे करना है, किसी को प्रेरित करने के लिए या किसी को हतोत्साह करने के लिए, ये आपको निर्णय लेना है । इसीलिए, आप चाहें तो कम बोलें, परंतु हमेशा सधे हुए, संतुलित और अच्छे शब्दों का ही प्रयोग करें। अमरीका के प्रसिद्ध ‘इन्वेस्टमेंट गुरु’ श्री वारेन बफेट ने एक बार कहा था कि ‘बोलना भी शेयर बाजार में निवेश (इन्वेस्टमेंट) करने जैसा है। जैसे आप सोच-समझ कर, संतुलित मात्रा में अपना पैसा चुनिंदा स्टॉक्स / शेयर्स में लगाते हैं, उसी प्रकार बोलते समय, आपको बहुत सोच-समझ कर, केवल चुनिंदा शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।’

शब्दों को ‘ब्रह्म स्वरूप’ माना जाता है।

आज हमारे पास ईश्वरीय वाणी, वेदों, उपनिषदों, महा ग्रंथों एवं महाकाव्यों के रूप में उपलब्ध है। ईश्वर द्वारा बोली गई बातें, आज भी हमारा मार्ग दर्शन करती हैं। हम आज भी, भाषा की मर्यादा को, अपने पुरातन ग्रंथों को पढ़कर सीख सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि शब्द, ब्रह्मांड में सदैव गूँजते रहते हैं। हम यह भी जानते हैं कि कुछ व्यक्तियों के स्वर्गवास हो जाने के बाद भी हम उनको याद रखते हैं, उसका एक कारण है कि उस व्यक्ति के मधुर बोल / शब्द,  आज तक हमारे मन-मस्तिष्क और हमारे कानों में गूँजते रहे हैं। इसीलिए कबीर दास जी ने कहा था कि ‘मीठी वाणी बोलिए, जो मन का आपा खोए, औरों को भी शीतल करे, स्वयं भी शीतल होय’। मीठी-वाणी शहद के सामान होती है जो हमारे मन को शांति देती है, जबकि कटु-वचन तीर के समान कानों से प्रवेश करके, हमारे मन-मस्तिष्क और शरीर को पीड़ा पहुँचाते हैं।

उत्साहित / हतोत्साह करने वाले शब्द

ऐसा कहा जाता है कि आपके द्वारा बोले गए शब्द, किसी बच्चे / छात्र को सफल भी बना सकते हैं और असफल भी। अगर आप उसे सफल बनाना चाहते हैं तो इसके लिए बस आपको सकारात्मक सोच और उत्साहित करने वाले शब्दों का प्रयोग करना होगा। और दूसरी ओर, आपके द्वारा बोले गए कटु और हतोत्साह करने वाले शब्द, उसी बालक को जीवन भर के लिए असफलता की गर्त में धकेल सकते हैं। और हाँ, आपको यह भी स्मरण रखना चाहिए, कि किसी बच्चे / छात्र के ‘सफल हो जाने के बाद’, उसकी प्रशंसा में कहे गए हजारों शब्दों से अच्छा है कि उस बच्चे / छात्र के ‘संघर्ष के दिनों' में, आप उसको उत्साहित करने के लिए जो ‘कुछ शब्द’ बोलें, यही ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। विभिन्न शोध इस बात को सिद्ध (साबित) कर चुके हैं कि अपने जीवन में असफल हुए बच्चों की असफलता, उन बच्चों के मां-बाप द्वारा बोले गए कटु शब्द ही थे, जो उनके लिए श्राप बन गए। दूसरी ओर, अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने वाले बच्चों के माता-पिता द्वारा बोले गए उत्साहित करने वाले शब्द, उन बच्चों के लिए वरदान स्वरूप बन गए थे।

वाणी के कारण ही लड़ाई-झगड़े बढ़ रहे हैं

आपने अनुभव किया होगा कि, दो व्यक्तियों / पड़ोसियों के द्वारा, किसी समस्या के समाधान हेतु किया जा रहा वार्तालाप, एक लड़ाई का रूप भी ले सकता है, और वही वार्तालाप एक सौहार्दपूर्ण तरीके से, उस समस्या का समाधान भी कर सकता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि शब्दों के विवेकपूर्ण उपयोग से, हम एक वातावरण (माहौल) को अच्छा भी बना सकते हैं और शब्दों के अमर्यादित प्रयोग  से ही, उसी वातावरण को दूषित माहौल में भी बदला जा सकता है। या यूँ कहूँ की हमारे ‘शब्द’ ही किसी उत्सव का कारण हैं और हमारे ‘शब्द’ ही किसी युद्ध का कारण भी बन सकते हैं। आपने अनुभव किया होगा कि किसी व्यक्ति को मीठा बोलते हुए देखकर, अनायास ही हमारे मुँह से निकल जाता है कि ‘तुम्हारी वाणी में माँ सरस्वती का वास है’। इसके अतिरिक्त, हमारे देश में, मीठी वाणी की तुलना कोयल से भी की जाती है और कड़वी बोली की तुलना कौवे से। आपको यह भी याद होगा कि, ऐसा माना जाता है कि कटु-शब्द या कटु-वाणी के कारण ही महाभारत का युद्ध हुआ था। अच्छे व्यवहार और मीठी बोली के कारण दो पड़ोसी देश आपस में प्रेम पूर्वक भी रह सकते हैं और दुर्व्यवहार के कारण आपस में युद्ध भी कर सकते हैं। आज हमारे पड़ोस में या हमारे परिवारों में, कटु शब्दों / वाणी के कारण ही लड़ाई-झगड़े बढ़ रहे हैं। हमें इस ओर ध्यान अवश्य देना चाहिए।

‘जेनरेशन गैप’ भी एक कारण

हम सब सामाजिक प्राणी हैं, और भारतीय होने के नाते, संयुक्त परिवार में रहा करते हैं, और आप सब का अनुभव रहा होगा कि ‘पहली’ और ‘तीसरी’ पीढ़ी के बीच में जो गहरा प्रेम है, उसका कारण भी शायद ‘प्रिय-शब्द’ ही हैं और ‘पहली’ और ‘दूसरी’ पीढ़ी के बीच में जो दूरी है, उसका कारण भी ‘कटु-शब्द’ ही हैं। अगर आप, उस ‘पीढ़ी-का-अंतर’ (जेनरेशन गैप) जैसे विदेशी सोच-विचारों को दूर करना चाहते हैं तो अवश्य ही अपने माता-पिता से मर्यादित, करुणापूर्ण एवं प्रेमपूर्ण शब्दों में ही बातें करें। वैसे भी, यदि आप सफल होना चाहते हैं, तो आपको पुरानी और नई पीढ़ी के बीच, एक ‘सही-संतुलन’ बना कर ही रखना पड़ेगा और इस बहाने आप नई और पुरानी पीढ़ी के बीच इस दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे ‘अंतर’ को कम भी कर पाएँगे ।

‘कलयुग’ में वाणी का महत्त्व

आज ‘कलयुग’ के समय में, शब्दों (वाणी) का महत्व और अधिक बढ़ गया है। आज अगर हम 'कलयुग' को ‘घोर कलयुग’ होने से बचाना चाहते हैं, तो हमें मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम एवं द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण की बातें (वाणी) को फिर से सुनना और समझना होगा। उनके द्वारा कही गई बातें 'ब्रह्म वाक्य' हैं और उन बातों (वाणी) को हम तक पहुँचाने का एक ही मार्ग है - शब्द या वाणी। अंतरात्मा की आवाज को भी अमृतवाणी ही कहा जाता है, परंतु इस अमृतवाणी को सुनने के लिए हमें साधना करनी होगी, जो कि ‘योग’ द्वारा ही संभव है। वैसे भी, ‘योग साधना’ करने से हमारे सोने, जागने, उठने, बैठने, खाने, पीने और वाणी (बोलने) इत्यादि पर अनुशासन आ जाता है, इसलिए योग अपनाइये और अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना सीखिए।

सम्पर्कः १२०, साकेत, मेरठ