मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Oct 14, 2019

लोक- संस्कृति


 विलुप्त होती लोक संस्कृति 
को बचाना होगा
 -ब्रजेश सिंह, वर्षा रानी एवं संतोष कुमार सिंह
बदलते वैज्ञानिक युग में शनै:-शनै: हमारी संस्कृति का स्वरूप बदलता जा रहा है। गाँव नगरों में बदल रहे हैं, नए-नए कल कारखाने, उद्योग, मिलें, फैक्ट्रियाँ स्थापित किए जा रहे हैं। वैज्ञानिक तकनीकों से बेमौसम कृत्रिम फसलें, फल आदि उगाए और पकाए जाने लगे हैं। पाश्चात्य आधुनिक संस्कृति प्राचीन भारतीय संस्कृति के मूल रूप को बदल रही है। पृथ्वी पर व्याप्त पर्यावरण प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ वरदान है। मनुष्य इसी पर्यावरण की सर्वोत्कृष्ट कृति है। प्रकृति और मनुष्य परस्पर पूरक हैं। मनुष्य जैसे प्राकृतिक परिवेश में रहता है, उसका व्यवहार, रहन-सहन, वेशभूषा, खानपान, भाषा इत्यादि उसी के अनुसार विकसित होती है। यथा- गर्म प्रदेश में रहने वाले मनुष्य सूती वस्त्र पहनते हैं, ये वस्त्र कपास से बनते हैं और कपास की खेती योग्य भूमि गर्म प्रांतों में पाई जाती है। इसी प्रकार ठण्डे प्रदेशों के लोग ऊनी वस्त्र पहनते हैं। यह ऊन ठण्डी जलवायु के जानवरों (याक, भेंड़) के बालों से बनती है। तात्पर्य यह है कि किसी भी देश की संस्कृति उसके पर्यावरण पर निर्भर करती है। यदि पंजाब प्रांत में लोग गेहूँ अधिक खाते हैं, तो उसका स्पष्ट कारण है कि वहाँ की भूमि गेहूँ की खेती के लिये सर्वथा उपयुक्त है। इसी प्रकार बंगाल में चावल की उपज अधिक होने के कारण बंगाली लोग चावल अधिक खाते हैं। यदि भाषा का व्याकरणिक अध्ययन किया जाए तो भाषा भूगोल के अनुसार अलग-अलग जलवायु के लोगों की भाषा भी भिन्न-भिन्न होती है।
हमारी भारतीय संस्कृति इन तथ्यों से भली भाँति अवगत है। इसीलिये हमारी संस्कृति में प्राकृतिक शक्तियों को देवी-देवताओं का स्थान प्राप्त था और इनकी पूजा की जाती थी। मिट्टी को मातृ देवी, वायु को देवता और जल को पवित्र देवी, अग्नि को देवता कहा जाता था। भारतीय लोग संस्कृति तो पूर्णत: प्रकृति परक है। यहाँ का ग्राम्य जीवन प्रकृति से अत्यधिक प्रेम करता है। भारत गाँवों का देश है और भारतीय संस्कृति कृषक संस्कृति कहलाती है। यहाँ के किसान अपनी धरती से अत्यधिक लगाव रखते हैं। यहाँ की उपजाऊ भूमि में मौसम के अनुसार फसलें, फलों के वृक्ष, पुष्प आदि उगाए जाते हैं। अर्थात खेती पूर्णत: प्रकृति पर निर्भर है। यहाँ ऋतु गीत गाये जाते हैं। रोग ग्रस्त होने पर पेड़, पौधों, वनस्पतियों से भाँति-भाँति की औषधियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं। जैसे- खाँसी आने पर तुलसी दल का काढ़ा, चोट लगने पर हल्दी का लेप, चेचक होने पर नीम की पत्ती का रखना, दुग्ध पान कराने वाली माताओं को पीपर, सतावर खिलाना आदि।

‘‘कपिला के दूध पिलायो, बाबुल नहलायों,
 झारी पिताम्बर ओढ़ायो, लाल के सोआयो।
लाल क लुटुर-लुटुर बरवा बहुत नीक लागे,
बहुत छवि लागे ए हो!
माइ नी गूंथे जसोमतिमने मन बिहँसें...।’’


भारत विकास कर रहा है। यहाँ विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक उपकरण ऊँची-ऊँची इमारतें, बड़े-बड़े उद्योग ग्रामीण संस्कृति में प्रयुक्त छोटे-छोटे उपकरणों (खुरपी, कुदाल, हल), सनई से बने झोपड़ियों और हस्तशिल्प के छोटे-छोटे उद्योगों को विस्थापित कर रहे हैं। लोक गीतों के स्थान पर पाश्चात्य पॉप गायन, लोग नृत्य के स्थान पर डिस्को का प्रचलन बढ़ गया है। अब शायद ही कोई बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी या साइकिल से चलता हो, इनका स्थान पेट्रोल और डीजल से चलने वाली तेज़ रफ्तार गाड़ियों ने ले लिया है। इस प्रकार भारत विकासशील है, किंतु यह विकास जिसने हमारी संस्कृति को प्रभावित किया है, हमारे पर्यावरण को भी प्रभावित कर रहा है। ज्ञातव्य है कि भारतीय संस्कृति और पर्यावरण परस्पर आश्रित हैं। यहाँ का किसान ऋतुओं के अनुसार फसलें बोता, उगाता और काटता है। स्त्रियाँ बुवाई, कटाई के गीत गाती हैं।
‘‘बादल बरसे बिजुरी चमके, जियरा ललचे मोर सखिया।
सइंया घर ना अइले पानी बरसे लागल मोर सखिया।।’’
यहाँ ऋतु संबंधी गीत- कजली (सावन मास में), फगुआ (फागुन मास में), चैता (चैत्र मास में), और पावस ऋतु में बारहमासा गाए जाते हैं। वाद्य यंत्रों में बाँसुरी जो बाँस से निर्मित होती है, वीणा जो वृक्ष के तने से निर्मित होती है, आदि प्रमुख वाद्य यंत्र हैं। वस्तुत: भारतीय लोक संस्कृति में प्रकृति वैसे ही समाहित है, जैसे- शरीर में आत्मा। हरे-भरे खेतों में लोग काम करते हैं, आम के पेड़ों के नीचे बैठकर ये रखवाली करते हैं। महुआ के पेड़ से कोइना एकत्र कर अँधेरे में घर में प्रकाश का प्रबंध करते हैं। घर के आंगन में बोई गई जमिरिया की गछिया उन्हें आनन्द देती है। चंदन का पेड़ सुगंध बिखेरता है। रावना और महुआ के फूल शीतला माता की पूजा के लिये खिले हुए दिखाई पड़ते हैं। तुलसी का पेड़ तो ग्रामीण स्त्रियों का चिर साथी है। हमारी संस्कृति में विवाहिता स्त्री को चंदन और लवंग के वृक्षों की लकड़ी से बने पलंग, लोहे और स्टील के बने पलंग से अधिक सुहावने लगते हैं। वे गाती हैं-
‘‘मोरे पिछुवरवा लवंगिया की बगिया, लवंगा फूले आधी राति रे।
तेहि तर उतरे दुलही दुलरवा, तरहिं लवंगिया के फूल रे।।’’
प्रकृति में रची बसी यह लोक -संस्कृति धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है। हम प्रकृति से कोसों दूर ईंट पत्थरों की दुनिया में प्रवेश कर गये हैं। आधुनिक समाज प्रकृति से प्रेम नहीं, उसका दोहन करना जानती है। कम्प्यूटर युग कहे जाने वाले आज के समय में हमारी संस्कृति प्राकृतिक से कृत्रिम हो गई है। विकास की दौड़ में हम पर्यावरण को शुद्ध रचाने वाली भारतीय संस्कृति के क्रियाकलाप (हवन, यज्ञादि) से हटकर प्रकृति को दूषित करने वाली संस्कृति (प्लास्टिक को जलाना, नदियों में अपशिष्ट बहाना, पेट्रोल, डीजल चालित वाहनों का प्रयोग) को अपना रहे हैं। प्रदूषण का अर्थ है- पर्यावरणीय असंतुलन, और इस असंतुलन का कारण है हमारी बदलती संस्कृति। आधुनिक विकासशील भारत की उपभोक्तावादी संस्कृति में पर्यावरण प्रदूषण के निम्नलिखित कारण प्रमुख रूप से उल्लिखित हैं-
1. वनों को काटकर उनके स्थान पर फैक्ट्रियाँ, मिलें, औद्योगिक प्रतिष्ठानों का निर्माण तथा वृक्षों का समुचित मात्रा में पुन: रोपण न करने से वृक्षों की कमी हो रही है। इससे वायुमण्डल में वृक्षों से प्राप्त ऑक्सीजन की कमी, भूमि की उर्वरता में कमी, बाढ़ का खतरा और वर्षा की कमी जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो रही हैं।
2. तेज़ रफ्तार वाहनों से विकास की गति बढ़ी है, हम अगम्य सुदूर स्थानों तक बड़ी आसानी से कम समय में पहुँचने लगे हैं। देशों की दूरियाँ कम हुई हैं। किंतु दूसरी तरफ वाहनों में प्रयुक्त पेट्रोल, डीजल से निकलने वाला धुआँ पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है। इस धुएँ से लेड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें हमारी त्वचा, नेत्र, फेफड़ों को विकारग्रस्त कर रही हैं। आकाश में उड़ने वाले हेलीकॉप्टर और हवाई जहाज एक ओर हमें अतिशीघ्र अधिक दूरी तक पहुँचा देते हैं और समय की बचत, कार्य गति बढ़ती है तो दूसरी और इनके ईंधन से निकलता धुआँ आकाशीय वायुमण्डल को प्रदूषित कर देता है।
3. वातावरण को नियंत्रित करने वाले यंत्र रेफ्रीज़रेटर, ए.सी. आदि में क्लोरो फ्लोरो कार्बन नामक कृत्रिम गैस प्रयुक्त होती है। कारखानों (शीतगृह) में उपयोग के बाद इसका एक चौथाई भाग अपशिष्ट के रूप में वायुमण्डल में घुल जाता है, और ओजोन गैस के क्षरण का कारण बनता है। ओजोन की परत सूर्य की हानिकारक किरणों को पृथ्वी तक आने से रोकती है। इनके क्षरण से ये किरणें पृथ्वी के जीव जन्तुओं, पेड़-पौधों आदि को नुकसान पहुँचा सकती है। इसी कारण से पृथ्वी का तापमान भी बढ़ने लगा है।
4. आधुनिकतावादी संस्‍कृति में औद्योगिक कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट, भारी धात्विक पदार्थ (पारा, सीसा, जस्ता, तांबा आदि) का रासायनिक कचरा नदियों में बहाया जाता है। अपनी शारीरिक स्वच्छता के लिए उपयोग में लाए गये साबुन, डिटर्जेंट, घर की नालियों की साफ सफाई में प्रयुक्त कीटनाशक, खेतों में प्रयुक्त उर्वरक, मलमूत्र, कचरा, मृत शरीर आदि का निष्कासन नदियों में किया जाता है, जिससे उसका जल प्रदूषित हो जाता है। जिस नदी को पवित्र कहकर हम तीज त्यौहारों पर उसकी आरती पूजा करते हैं, उसी में साबुन, डिटर्जेंट, पॉलीथीन, फूल, बोतल, आदि बहाकर क्या हम पाप के भागी नहीं बन रहे हैं?
5. वैज्ञानिक विकास ने प्लास्टिक की थैलियाँ, बोतल जैसे कभी नष्ट न होने वाले संसाधन तो उपलब्ध करा दिए, किंतु इनके कचरे के दुष्परिणामों पर विचार नहीं किया। मिट्टी में इकट्ठा होकर ये नष्ट न होने वाले कचरे मृदा के सूक्ष्म जीवों (भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने वाले बैक्टीरिया) का विनाश कर रहे हैं। इन्हीं कारणों से भूमि का ताप और दाब बढ़ने लगा है। यह ज्वालामुखी विस्फोट तक का कारण बन सकता है।
6. नगर और कारखानों के प्रदूषित जल, अपशिष्ट, कूड़ा आदि खाली भूमि में बहा दिया जाता है इसमें निहित रसायन, धातु, ताप, विषैली गैसें आदि मृदा में प्रवेश कर जाती है और कृषि योग्य उर्वरा भूमि भी बंजर हो जाती है।
7. पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से तीव्र ध्वनि से बजने वाले वाद्य यंत्रों, चीखते स्वर में लाउडस्पीकर, माइक, इलेक्ट्रॉनिकवूफरसाउण्ड वाले बड़े-बड़े स्पीकर आदि संयंत्रों में गाये जाने वाले गीतों, वाहनों के हार्न आदि से ध्वनि प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। ध्वनि प्रदूषण से बहरापन, दिल का दौरा, दिमागी बीमारियाँ जैसे माइग्रेन, अनिद्रा, कार्यक्षमता में ह्रास आदि का खतरा बढ़ रहा है।
इस प्रकार भारती लोक संस्कृति आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति में परिवर्तित होकर पर्यावरण प्रदूषण का कारण बन गई है। कामायनी जैसा महाकाव्य लिखकर कवि जयशंकर प्रसाद ने मानव संस्कृति को पर्यावरणीय असंतुलन के प्रलयंकारी दुष्परिणामों के प्रति बार-बार सचेत किया है- यदि हम इसी प्रकार प्रकृति का दोहन करते रहे तो एक दिन देव संस्कृति की भाँति यह मानव संस्कृति भी प्रकृति के कोप का भाजन बन जाएगी...
“आह! सर्ग के अग्रदूत! तुम असफल हुए विलीन हुए
भक्षक या रक्षक जो समझो, केवल अपने मीन हुए
देव दम्भ के महामेघ में सब कुछ ही बन गया हविष्य
अरे अमरता के चमकीले पुतलों तेरे वे जयनाद
काँप रहे हैं आज प्रतिध्वनि बनकर मानों दीन विषाद
प्रकृति रही दुर्जेय पराजित हम सब थे भूले मद में
भोले थे हा! उतरते केवल सब विलासिता के नद में
वे सब डूबे, डूबा उनका विभव, बन गया पारावार
उमड़ रहा था देव सुखों पर दु:ख जलाधि का नाद अपार।
शक्ति रही हा! शक्ति प्रकृति थी पदतल में विनम्र विश्रांत
कँपती धरती उन चरणों से होकर प्रतिदिन ही आक्रान्त
स्वयं देव थे हमसब तो फिर क्यों न विशृंखल होती सृष्टि
अरे अचानक हुई इसी से कड़ी आपदाओं की वृष्टि
 भरी वासना सरिता का वह कैसा था मदमत्त प्रवाह
प्रलय जलधि संगम जिसका देख हृदय था उठा कराह।।’’

अत: हमे उस अपसंस्कृति से बचना होगा जो प्रकृति का दोहन करना जानती है और उस भारतीय संस्कृति को विलुप्त होने से बचाना होगा जिसमें प्रकृति प्रेम कूट-कूट कर भरा है। यह तभी संभव है जब हम अपने पर्यावरण को स्वच्छ और संतुलित रखें। जितना हम विकास के लिये प्रकृति से लेते हैं, उतना ही हमें देना भी होगा। यदि हम वनों को काटकर औद्योगिक प्रतिष्ठान बना रहे हैं, तो उसी अनुपात में वृक्षारोपण भी करना होगा। वाहनों से निकलने वाले धुँओं को प्रदूषण मुक्त बनाना होगा। मृदा प्रदूषण को रोकने के लिये प्लास्टिक बैग, थैलों और बोतलों का प्रयोंग बंद करना होगा। कृत्रिम वर्षा, परमाणु बम, आदि विस्फोटक हथियारों का निर्माण और प्रयोग रोकना होगा। वैज्ञानिक प्रयोगों में प्रकृति के साथ होने वाले खिलवाड़ को बंद करना होगा। (विज्ञान शोध पत्रिका 2015 से साभार)

संदर्भ
1. कृष्णदेव, उपाध्याय (2002) भोजपुरी ग्रामगीत, भाग-1, पृ. 334।
2. त्रिपाठी, रामनरेश (1999), ग्रामगीत, पृ. 69।
3. सिंह, परमेश्वर (2001) प्रकृति, मानव एवं पर्यावरण, पृ. 80।
4. प्रसाद, जयशंकर (1993) कामायनी, चिंता सर्ग, पृ. 17।

सम्पर्कः
ब्रजेश सिंह, वर्षा रानी एवं संतोष कुमार सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर, रसायन विज्ञान, राजकीय महाविद्यालय, भदोही- 221404, यूपी, भारत
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, राजकीय महाविद्यालय, भदोही- 221404, यूपी, भारत
असिस्टेंट प्रोफेसर, रसायन विज्ञान, जयनारायण पीजी कॉलेज, लखनऊ- 226001, यूपी, भारत
santoshsinghjnpg@gmail.com
सम्पर्कः रमानर्सिंग होम, मेन रोड, राँची, झारखंड-834001

गाँधी जी के आदर्श और विश्व शांति


गाँधी जी के आदर्श और विश्व शांति      
- श्रीमन्नारायण अग्रवाल
अपने विश्वभ्रमण में मैंने देखा कि यूरोप के कई देशों में एक और तो पिछले महायुद्ध के घावों को भरने को कोशिश की जा रही है- टूटी  इमारतों की मरम्मत चल रही है और निराश्रितों को फिर बसाया जा रहा है , दूसरी और यह दृश्य भी देखा कि तीसरे महायुद्ध की तैयारियाँ गंभीरतापूर्वक और तेजी से चल रही हैं। इस तरह के दयनीय व करुणाजनक चित्र विशेषकर जर्मनी, आस्ट्रिया, इटली, ग्रीस और टर्की में देखने को मिले। यह स्पष्ट है कि हर एक देश की आम जनता युद्ध नहीं चाहती। युद्ध के भयानक परिणामों को वे अच्छी तरह जानते हैं और समझते हैं कि तीसरे महायुद्ध का नतीजा संसार का प्रलय ही होगा ; लेकिन अमरीका और रूस की तनातनी के वातावरण में अन्य देशों के लिए अछूता बना रहना करीब- करीब नामुमकिन हो गया हैं। अमरीका की जनता कहती हैं कि रूस महायुद्ध शुरू करना चाहता है और दुनियाभर में साम्यवाद फैलाने की कोशिश कर रहा है। रूस के नेताओं का आरोप हैं कि अमरीका व अन्य पूँजीवादी राष्ट्र रूस को नष्ट कर डालने पर तुले हुए हैं और साम्यवाद को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहते हैं। इस प्रकार पारस्परिक अविश्वास और घृणा के कारण दिन-दिन राजनैतिक संघर्ष और मनमुटाव बढ़ता चला जा रहा हैं  और लड़ाई के बादल चारों और से आसमान में घिरते आ रहे हैं। यह काले भयानक बादल किस दिन फटकर बरसने लगेंगे और दुनिया में प्रलय मचा देंगे, कौन जाने ? किन्तु यह तो साफ नजर आता है कि अगर एक महायुद्ध फिर शुरू हो गया तो इस बार मनुष्य मात्र की खैर नहीं हैं।

इस निराशापूर्ण वातावरण में करीब सभी देशों में कई संस्थाएँ विश्वशांति के लिए दिन -रात लगन से काम कर रही हैं । क्वेकर सम्प्रदाय अमरीका व यूरोप में प्रशंसनीय कार्य कर रहा हैं । वे लड़ाई में भरती होने से इन्कार करते हैं और सब तरह की यातनाएँ सहते हैं।
'वार रजिस्टर्सइन्टरनेशनल’ संस्था के सदस्य भी यूरोप में महत्त्वपूर्ण प्रयत्न कर रहे हैं कि संसार में युद्ध न हो, विश्व-शांति स्थापित हो । नैतिक शस्त्रीकरण का आंदोलन भी काफी सफलतापूर्वक कई देशों के बीच मैत्रीभाव पैदा करने की भरसक कोशिश कर रहा हैं  ‘यूनो’ और ‘यूनेस्को' तो स्थापित ही इसलिए किए गए हैं कि दुनिया में' लड़ाई-झगड़े न हों और सारे संघर्ष शांतिपूर्वक ढंग से सुलझाए जा सकें। और भी कई ऐसी संस्थाएँ हैं जो ऐसे ही आदर्श अपने सामने रखती हैं और श्रद्धापूर्वक इस कठिन कार्य को पूरा करने में व्यस्त हैं।
 किन्तु प्रश्न यह उठता है कि क्या इसी तरह कार्य करने से तीसरा युद्ध टल सकेगा ? इस प्रश्न की चर्चा करने के लिए ही दिसम्बर के प्रथम सप्ताह में विश्व-शांति सम्मेलन का प्रारंभिक अधिवेशन शांति-निकेतन में हो रहा है और बाद में दिसम्बर के आखिरी सप्ताह में यही सम्मेलन सेवाग्राम में होगा। इस सम्मेलन में जो व्यक्ति पधार रहे हैं  इनमें से कई सज्जनों से मुझे अपनी यात्रा में मिलने का अवसर भी मिल चुका हैं । विश्व-शांति की स्थापना के बारे में महात्मा गाँधी के क्या विचार थे, इस सम्बन्ध में उनसे बातचीत हुई । दुनिया के शांति-सैनिकों को भारत से बड़ी-बड़ी आशाएँ हैं ; क्योंकि उनकी निगाह में भारत गाँधी की पुण्य-भूमि है, इसीलिए इतने देशों के प्रतिनिधि भारत में एकत्र हो रहे हैं शान्ति का मार्ग खोजने के लिए।
बापू के आदर्शों के अनुसार यह शांति मार्ग कौन-सा हैं? गाँधीजी किस प्रकार संसार में शांति स्थापित करने की आशा रखते थे ? वे जानते थे  कि केवल युद्ध में भरती न होने से युद्ध टाला नहीं जा सकता। जिस समय लड़ाई शुरू हो जाती हैं, उस वक्त उसे रोकना-थामना अशक्य हो जाता हैं। युद्ध को जड़ से नष्ट करने के लिए तो हमें समाज की आर्थिक व राजनैतिक रचना व संगठन ही बदलना होगा । बापू का विश्वास था कि अगर अहिंसा व प्रेम की बुनियाद पर विभिन्न देशों में एक तरह की नवीन समाज रचना खड़ी की जा सके, तो फिर युद्ध समूल नष्ट किया जा सकता हैं। इस अहिंसक समाज की नींव विकेन्द्रीकरण, प्रादेशिक स्वावलम्बन व जीवन की सादगी पर आधारित रह सकती है। केन्द्रीकरण,युद्ध को जन्म देता हैं। विकेन्द्रीकरण युद्ध के स्रोत को सुखा डालता हैं और शांति की गंगा को बहाने में  सफलता प्राप्त कर सकता हैं। इसीलिए गाँधीजी औद्योगिक विकेन्द्रीकरण, पर जोर देते थे और कहते थे कि खादी और ग्रामोद्योगों के द्वारा ही भारत शांतिपूर्वक स्वराज्य प्राप्त कर सकता हैं और अपनी स्वतन्त्रता को टिका सकता हँ। राजनैतिक क्षेत्र में भी केन्द्रीकरण के बजाय ग्राम-पंचायतों के व्यापक संगठन की आवश्यकता हैं। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में पारस्परिक व्यवसाय व लेन-देन कम-से-कम किया जाए, ताकि आर्थिक संघर्ष की नौबत न आए। हाँ, सांस्कृतिक क्षेत्र में आपसी सम्बन्ध घटाने की बजाय अधिक बढ़ाने का प्रयत्न करना हमारा धर्म हो जाता हैं। सामाजिक क्षेत्र में धर्म, जाति, वर्ग तथा अन्य किसी भी प्रकार का भेद-भाव संघर्ष का कारण बन जाता हैं। अमरीका में जिस तरह हब्शियों के प्रति बरताव किया जाता हैं, वह दुनिया की संस्कृति की शान के बिलकुल खिलाफ़ हैं। अगर उसमें समय पर सुधार न किया गया ,तो वही एक महायुद्ध का कारण बन सकता है। दक्षिण अफीका और आस्ट्रेलिया में भी काले-गोरे का जो भेद-भाव बढ़ रहा हैं, वह विश्व-शांति के लिए बहुत खतरनाक हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़ी सावधानी की आवश्यकता हँ। अगर ठीक तरह की तालीम न दी जाए, तो वह लड़ाई का सबब बन सकती है। यही वज़ह थी कि बापूजी बुनियादी शिक्षा पर इतना जोर देते थे।
इस तरह गाँधीजी के आदर्शों के अनुसार विश्वशांति की स्थापना अंहिसा की बुनियाद पर ही हो सकती हँ । आर्थिक क्षेत्र में अहिंसा का अर्थ हँ औद्योगिक विकेन्द्रीकरण, राजनैतिक क्षेत्र में अहिंसा का अर्थ है पंचायती विकेन्दित राज्य, सामाजिक संगठन की दृष्टि से अहिंसा का तात्पर्य हैं समानता व भेदभाव का उन्मूलन और शिक्षा-क्षेत्र में अहिंसा का मतलब है शारीरिक व बौद्धिक समतोल । इन सभी क्षेत्रों में अहिंसा के प्रयोग करने पर ही शांति की स्थापना में सफलता मिल सकती हँ। युद्ध के कारणों को अगर समूल न उखाड़ फेंका गया तो सारी कोशिशें अकारथ जाएँगी और किसी-न-किसी रूप में फिर महायुद्ध अपने सिर को उठाए बिना न रहेगा।
अब सवाल यह हैं कि अहिंसक समाज किस तरह स्थापित किया जाए? किस प्रकार औद्योगिक विकेन्द्रीकरण व पंचायती राज्यों को कायम किया जाए? यह कार्य आसान नहीं हैं। इस कार्य को पूरा करने के लिए हमें निरंतर जो तोड़कर मेहनत करनी होगी। अपने व्यक्तिगत जीवन को अहिंसक बनाने का सतत प्रयत्न करना होगा। हमें यह बराबर धयान रखना होगा कि हम अपने स्वार्थ के लिए किसी दूसरे व्यक्ति , समाज या देश का अनुचित शोषण तो नहीं कर रहे हैं? इसके लिए हमें शारीरिक श्रम का महत्त्व बढ़ाना चाहिए। आज समाज में एक ऐसा वर्ग है, जो श्रम करता हैं और दूसरा ऐसा वर्ग है, जो दूसरों के श्रम को भोगता हैं। इसी तरह अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में कुछ ऐसे देश हैं, जो गुलाम बनाए जाते हैं और उनके नागरिकों की मेहनत का फायदा दूसरे देश अपने ऐश व आराम के लिए उठाते हैं। यह सर्वथा अनुचित है; क्योंकि उसमें हिंसा भरी हुई हैं। अहिंसक समाज को बनाने के लिए उक्त प्रकार का शोषण बन्द होना नितान्त आवश्यक हँ। जीवन में सादगी लाए बिना और श्रम की प्रतिष्ठा बढ़ाए बिना यह संभव नहीं है।
हम यह आशा नहीं रख सकते कि किसी भी देश की सरकार अहिंसक समाज की रचना को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेगी और स्वयं उस और तेजी व लगन से कदम उठाएगी। भारत में भी हम यह उम्मीद नहीं रख सकते। इसलिए यह भी जरूरी हैं कि जिन लोगों को अहिंसा में विश्वास है, वे कुछ गाँवों को लेकर अहिंसक समाज के संगठन का प्रयत्न करें।  इस तरह के प्रयोग कई देशों में हो भी रहे हैं। अमरीका, इंगलैड व यूरोप के कुछ देशों में, विशेषकर स्वीटजरलै'ड में, इस तरह की कई कॉलोनी स्थापित की गई है, जहाँ शोषण को स्थान नहीं हैं और हरेक व्यथित समाज के सुख व प्रगति के लिए परिश्रम करता हैं। अगर इस तरह की अहिंसक कॉलोनी सफलता-पूर्वक चलाई जाए,तो उनका प्रभाव विभिन्न देशों की जनता व सरकारों पर पड़े बिना न रहेगा और धीरे-धीरे संसार में शांति व सहयोग का वातावरण बनने की संभावना स्पष्ट दीख पड़ेगी।
 अहिंसक समाज अपना रक्षण किस तरह करेगा, यह प्रश्न भी सहज ही उठता हैं। इस सवाल का जवाब सचमुच बहुत कठिन हैं। महात्मा गाँधी ने सुझाया था कि सशस्त्र सेना को धीरे-धीरे हटाने के लिए शांति-सेना (peace brigades ) कायम करनी चाहिए। यह शान्ति-सेना सिर्फ युद्ध के समय ही काम न करेगी,  बल्कि दिन-प्रतिदिन अहिंसक समाज को रचना में रचनात्मक कार्य करते हुए पूरा हिस्सा लेगी। लड़ाई के वक्त इस सेना के अहिंसक सिपाही अपना बलिदान करने को तैयार रहेंगे  युद्ध की आग को रोकने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देंगे। यह काम आसान नहीं हैं; किन्तु मेरा निश्चित मत हैं कि शान्ति-सेना का संगठन किये बिना मिलिटरी को हटाने की सिफारिश करना अशक्य हैं। मुझे आशा हैं कि विश्व-शान्ति-परिषद इस सम्बन्ध में गंभीरता से विचार करेगी और कुछ व्यावहारिक मार्ग खोज निकालेगी।
(मासिक पत्रिका- जीवन साहित्य, वर्ष-11, अंक 1-2, जनवरी-फरवरी 1950 में प्रकाशित- पत्रिका का यह अंक विश्व शांति सम्मेलन पर केन्द्रित था, जो शांति निकेतन और सेवाग्राम में सम्पन्न हुआ था)

प्रेरक

मेरा जीवन ही मेरा संदेश है
मो. दासकरमचंद गाँधी
महात्मा गाँधी का जन्म आज से 150 साल पहले 2 अक्टूबर1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। गाँधी जयंती को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के तौर पर मनाया जाता है। गाँधीजी ने कहा था, "मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।" यहाँ गाँधी जी अपने  जीवन से जुड़ी 5 बातें बता रहे हैं, जिन्हें आप अपने जीवन में अपना कर सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
खुद पर रखें भरोसा
खुद पर विश्वास करें।  इससे आप अपने हर लक्ष्य का हासिल कर सकते हैं। कभी खुद पर संदेह नहीं करें। अगर आपको पहले ही यह लगेगा कि मैं यह काम नहीं कर पाऊँगा तो इससे आपका आत्मविश्वास कम हो जाएगा। इसके उलट अगर आपको विश्वास होगा कि आप यह काम कर लेंगे तो आप जरूर उसे पूरा कर पाएँगे।
बाधाओं से हार नहीं मानें
"पहले वे आपकी उपेक्षा करेंगे। उसके बाद वे आप पर हँसेंगे और फिर वे आपसे लड़ेंगे और अंतत: आपकी जीत होगी।" भारत जैसे विशाल देश की आजादी की लड़ाई आसान काम नहीं है और वह भी अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए।
क्षमा ​करना सीखें
"कमजोर लोग कभी क्षमा नहीं करते, क्षमा करना या भूलना मजबूत लोगों की विशेषता है। " महात्मा गाँधी को जेल में डाला गया, सड़कों पर पीटा गया, कई लोगों ने उन्हें मारने की साजिश रची। लेकिन उन्होंने सभी को माफ कर दिया।
गलतियों से सबक लें
"अपनी गलतियों से सबक लेना बिल्कुल झाड़ू की तरह है, जिससे सफाई के बाद कमरे की गंदगी एकदम साफ हो जाती है और कमरा चमकने लगता है। मैं अपनी त्रुटियों को स्वीकार करके अपने आप को मजबूत बनाता हूँ ।"
चरित्र की मजबूती

"दुनिया में सात तरह के पाप हैं: बिना काम के धन, विवेक के बिना खुशी, चरित्र के बिना ज्ञान, नैतिकता के बिना धन, मानवता के बिना विज्ञान, बलिदान के बिना पूजा और सिद्धांत के बिना राजनीति।" अपने चरित्र को मजबूत बनाने के साथ ही इन अवगुणों से बचना चाहिए।

गाँधी जी की हाजिरजवाबी

गाँधी जी की हाजिरजवाबी 
विजय जोशी
(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल)
सलीके से पूरित संवाद जीवन में सफलता की कुंजी है। समझदार व्यक्ति मूर्खतापूर्ण सवालों का चतुराई-भरा उत्तर देकर प्रश्नकर्ता को निरुत्तर कर देता है। और कई बार तो उपहास का पात्र भी बना देता है। विपरीत परिस्थिति में भी सटीक संवाद व्यर्थ के विवाद को न केवल टाल देता है, अपितु समाज में आपकी छवि को निर्विवाद बनाने में सहायक सिद्ध होता है। बुद्धिमान व्यक्ति का सामयिक उत्तर क्रोधपूर्ण वार्तालाप में अप्रिय प्रसंग का प्रवेश बाधित कर देता है।
इस मामले में महात्मा गाँधी का संवाद संप्रेषण सर्वोत्तम था। वे कभी भी मानसिक संतुलन नहीं खोते थे और अपने तर्कपूर्ण उत्तर से सामनेवाले को कई बार झेंपने पर मजबूर कर देते थे।
अंग्रेज गाँधीजी से बहुत चिढ़ते थे। एक बार पीटर नामक एक ऐसे ही सज्जन प्रोफेसर विश्वविद्यालय के रेस्टोरेंट में भोजन कर रहे थे। उसी समय गाँधी भी अपनी ट्रे लेकर उनकी बगल में जा बैठे।
पीटर ने अप्रसन्नतापूर्वक कहा – एक सूअर और पक्षी कभी भी साथ बैठकर खाना नहीं खाते।
महात्मा गाँधी ने कहा – सत्य कहा आपने। पर मैं तो कुछ ही पलों में भोजन करके उड़ जाऊँगा। और यह कहकर वे दूसरी टेबल पर जाकर बैठ गए।
पीटर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया और वे तुरंत प्रतिशोध का दूसरा अवसर ढूँढने में व्यस्त हो गए। लेकिन महात्मा वैसे ही पूरी तरह शांत भाव से भोजन करते रहे।
पीटर ने संवाद के धनुष से दूसरा बाण छोड़ा – गाँधी समझो हम सड़क पर पैदल चल रहे हैं और हमें अचानक दो पैकेट राह में पड़े मिल जाते हैं। एक पर लिखा है बुद्धि और दूसरे पर पैसा। आप किसे लेना पसंद करेंगे।
बगैर एक पल गँवाए गाँधीजी का उत्तर था – वह पैकेट जिस पर पैसा लिखा है।
पीटर मुस्कुराकर बोले –अगर मैं आपकी जगह होता ,तो बुद्धि शब्द से अंकित पैकेट उठाता।
सही कहा आपने–गाँधीजी ने उत्तर दिया – आखिरकर आदमी वही तो उठाएगा जिसकी उसके पास कमी है।
अब तो अति हो गई। प्रोफ़ेसर ने अगली चाल चली और परीक्षा स्थल पर  गाँधीजी को उत्तर पुस्तिका देते समय पहले पन्ने पर इडियट शब्द लिख दिया और मुस्कुराने लगे। गाँधीजी ने शांत भाव से उत्तर पुस्तिका ग्रहण की तथा बैठ गए। कुछ पल बीत जाने पर वे अपनी जगह से उठे और प्रोफ़ेसर से कहा – मिस्टर पीटर आपने मेरी उत्तर पुस्तिका पर अपने आटोग्राफ तो कर दिये लेकिन मुझे ग्रेड देना भूल गए।
बात का सारांश मात्र यही है कि कुतर्की का वैसा ही उत्तर देना न केवल विवाद को बढ़ाता है; अपितु अप्रिय स्थिति भी उत्पन्न कर सकता है। शांतचित्त से बुद्धिमतापूर्ण उत्तर न केवल सामनेवाले को लज्जित कर सकता है, बल्कि समाज में आपकी प्रतिष्ठा में अभिवृद्धि भी करता है। इसलिए ऐसी स्थिति की उपस्थिति से सामना होने पर व्यर्थ के विवाद से बचते हुए जहाँ तक संभव हो सार्थक एवं समझदारी से सामयिक उत्तर देने का यत्न करें। इससे आपकी मानसिक शांति भी बनी रहेगी और समाज में प्रतिष्ठा भी।

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल- 462023, मो.09826042641, E-mail- v।joshi415@gmail.com

मेरे राम का मुकुट भीग रहा है


मेरे राम का मुकुट भीग रहा है
विद्यानिवास मिश्र
महीनों से मन बेहद-बेहद उदास है। उदासी की कोई खास वजह नहीं, कुछ तबीयत ढीली, कुछ आसपास के तनाव और कुछ उनसे टूटने का डर, खुले आकाश के नीचे भी खुलकर साँस लेने की जगह की कमी, जिस काम में लगकर मुक्ति पाना चाहता हूँ, उस काम में हज़ार बाधाएँ; कुल ले-देकर उदासी के लिए इतनी बड़ी चीज नहीं बनती। फिर भी रात-रात नींद नहीं आती। दिन ऐसे बीतते हैं, जैसे भूतों के सपनों की एक रील पर दूसरी रील चढ़ा दी गई हो और भूतों की आकृतियाँ और डरावनी हो गई हों। इसलिए कभी-कभी तो बड़ी-से-बड़ी परेशानी करने वाली बात हो जाती है और कुछ भी परेशानी नहीं होती, उल्टे ऐसा लगता है, जो हुआ, एक सहज क्रम में हुआ; न होना ही कुछ अटपटा होता और कभी-कभी बहुत मामूली-सी बात भी भयंकर चिंता का कारण बन जाती है।
अभी दो-तीन रात पहले मेरे एक साथी संगीत का कार्यक्रम सुनने के लिए नौ बजे रात गए, साथ में जाने के लिए मेरे एक चिरंजीव ने और मेरी एक मेहमान, महानगरीय वातावरण में पली कन्या ने अनुमति माँगी। शहरों की आजकल की असुरक्षित स्थिति का ध्यान करके इन दोनों को जाने तो नहीं देना चाहता था, पर लड़कों का मन भी तो रखना होता है, कह दिया, एक-डेढ़ घंटे सुनकर चले आना।
रात के बारह बजे। लोग नहीं लौटे। गृहिणी बहुत उद्विग्न हुईं, झल्लाईं; साथ में गए मित्र पर नाराज होने के लिए संकल्प बोलने लगीं। इतने में ज़ोर की बारिश आ गई। छत से बिस्तर समेटकर कमरे में आया। गृहिणी को समझाया, बारिश थमेगी, आ जाएँगे, संगीत में मन लग जाता है, तो उठने की तबीयत नहीं होती, तुम सोओ, ऐसे बच्चे नहीं हैं। पत्नी किसी तरह शांत होकर सो गईं, पर मैं अकुला उठा। बारिश निकल गई, ये लोग नहीं आए। बरामदे में कुर्सी लगाकर राह जोहने लगा। दूर कोई भी आहट होती तो, उदग्र होकर फाटक की ओर देखने लगता। रह-रहकर बिजली चमक जाती थी और सड़क दिप जाती थी। पर सामने की सड़क पर कोई रिक्शा नहीं, कोई चिरई का पूत नहीं। एकाएक कई दिनों से मन में उमड़ती-घुमड़ती पँक्तिया गूँज गईं :
"मोरे राम के भीजेमुकुटवा
लछिमन के पटुकवा
मोरी सीता के भीजैसेनुरवा
त राम घर लौटहिं।"
(मेरे राम का मुकुट भीग रहा होगा, मेरे लखन का पटुका (दुपट्‍टा) भीग रहा होगा, मेरी सीता की माँग का सिंदूर भीग रहा होगा, मेरे राम घर लौट आते।)
बचपन में दादी-नानी  एक गीत गातीं, मेरे घर से बाहर जाने पर विदेश में रहने पर वे यही गीत विह्वल होकर गातीं और लौटने पर कहतीं - 'मेरे लाल को कैसा वनवास मिला था।' जब मुझे दादी-नानी की इस आकुलता पर हँसी भी आती, गीत का स्वर बड़ा मीठा लगता। हाँ, तब उसका दर्द नहीं छूता। पर इस प्रतीक्षा में एकाएक उसका दर्द उस ढलती रात में उभर आया और सोचने लगा, आने वाली पीढ़ी पिछली पीढ़ी की ममता की पीड़ा नहीं समझ पाती और पिछली पीढ़ी अपनी संतान के सम्भावित संकट की कल्पना मात्र से उद्विग्न हो जाती है। मन में यह प्रतीति ही नहीं होती कि अब संतान समर्थ है, बड़ा-से-बड़ा संकट झेल लेगी। बार-बार मन को समझाने की कोशिश करता, लड़की दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में पढ़ाती है, लड़का संकट-बोध की कविता लिखता है, पर लड़की का ख्याल आते ही दुश्चिता होती, गली में जाने कैसे तत्त्व रहते हैं! लौटते समय कहीं कुछ हो न गया हो और अपने भीतर अनायास अपराधी होने का भाव जाग जाता, मुझे रोकना था या कोई व्यवस्था करनी चाहिए थी, पराई लड़की (और लड़की तो हर एक पराई होती है, धोबी की मुटरी की तरह घाट पर खुले आकाश में कितने दिन फहराएगी, अंत में उसे गृहिणी बनने जाना ही है) घर आई, कहीं कुछ हो न जाए!
मन फिर घूम गया कौसल्या की ओर, लाखों-करोड़ों कौसल्याओं की ओर, और लाखों करोड़ों कौसल्याओं के द्वारा मुखरित एक अनाम-अरूपकौसल्या की ओर, इन सबके राम वन में निर्वासित हैं, पर क्या बात है कि मुकुट अभी भी उनके माथे पर बँधा है और उसी के भीगने की इतनी चिंता है? क्या बात है कि आज भी काशी की रामलीला आरम्भ होने के पूर्व एक निश्चित मुहुर्त में मुकुट की ही पूजा सबसे पहले की जाती है? क्या बात है कि तुलसीदास ने 'कानन' को 'सत अवध समाना' कहा और चित्रकूट में ही पहुँचने पर उन्हें 'कलि की कुटिल कुचाल' दीख पड़ी? क्या बात है कि आज भी वनवासी धनुर्धर राम ही लोकमानस के राजा राम बने हुए हैं? कहीं-न-कहीं इन सबके बीच एक संगति होनी चाहिए।
अभिषेक की बात चली, मन में अभिषेक हो गया और मन में राम के साथ राम का मुकुट प्रतिष्ठित हो गया। मन में प्रतिष्ठित हुआ, इसलिए राम ने राजकीय वेश में उतारा, राजकीय रथ से उतरे, राजकीय भोग का परिहार किया, पर मुकुट तो लोगों के मन में था, कौसल्या के मातृ-स्नेह में था, वह कैसे उतरता, वह मस्तक पर विराजमान रहा और राम भीगें तो भीगें, मुकुट न भीगने पाए, इसकी चिंता बनी रही। राजा राम के साथ उनके अंगरक्षक लक्ष्मण का कमर-बंद दुपट्‍टा भी (प्रहरी की जागरूकता का उपलक्षण) न भीगने पाए और अखंड सौभाग्यवती सीता की माँग का सिंदूर न भीगने पाए, सीता भले ही भीग जाएँ। राम तो वन से लौट आए, सीता को लक्ष्मण फिर निर्वासित कर आए, पर लोकमानस में राम की वनयात्रा अभी नहीं रुकी। मुकुट, दुपट्‍टे और सिंदूर के भीगने की आशंका अभी भी साल रही है। कितनी अयोध्याएँ बसीं, उजड़ीं, पर निर्वासित राम की असली राजधानी, जंगल का रास्ता अपने काँटों-कुशों, कंकड़ों-पत्थरों की वैसी ही ताजा चुभन लिये हुए बरकरार है, क्योंकि जिनका आसरा साधारण गँवार आदमी भी लगा सकता है, वे राम तो सदा निर्वासित ही रहेंगे और उनके राजपाट को सम्भालने वाले भरत अयोध्या के समीप रहते हुए भी उनसे भी अधिक निर्वासित रहेंगे, निर्वासित ही नहीं, बल्कि एक कालकोठरी में बंद जिलावतनी की तरह दिन बिताएँगे।
सोचते-सोचते लगा की इस देश की ही नहीं, पूरे विश्व की एक कौसल्या है; जो हर बारिश में विसूर रही है - 'मोरे राम के भीजेमुकुटवा' (मेरे राम का मुकुट भीग रहा होगा)। मेरी संतान, ऐश्वर्य की अधिकारिणी संतान वन में घूम रही है, उसका मुकुट, उसका ऐश्वर्य भीग रहा है, मेरे राम कब घर लौटेंगे; मेरे राम के सेवक का दुपट्‍टा भीग रहा है, पहरुए का कमरबंद भीग रहा है, उसका जागरण भीग रहा है, मेरे राम की सहचारिणी सीता का सिंदूर भीग रहा है, उसका अखंड सौभाग्य भीग रहा है, मैं कैसे धीरज धरूँ? मनुष्य की इस सनातन नियति से एकदम आतंकित हो उठा ऐश्वर्य और निर्वासन दोनों साथ-साथ चलते हैं। जिसे , ऐश्वर्य सौंपा जाने को है, उसको निर्वासन पहले से बदा है। जिन लोगों के बीच रहता हूँ, वे सभी मंगल नाना के नाती हैं, वे 'मुद मंगल' में ही रहना चाहते हैं, मेरे जैसे आदमी को वे निराशावादी समझकर बिरादरी से बाहर ही रखते हैं, डर लगता रहता है कि कहीं उड़कर उन्हें भी दुख न लग जाए, पर मैं अशेष मंगलाकांक्षाओं के पीछे से झाँकती हुई दुर्निवार शंकाकुल आँखों में झाँकता हूँ, तो मंगल का सारा उत्साह फीका पड़ जाता है और बंदनवार, बंदनवार न दिखकर बटोरी हुई रस्सी की शक्ल में कुंडली मारे नागिन दिखती है, मंगल-घट औंधाई हुई अधफूटी गगरी दिखता है, उत्सव की रोशनी का तामझाम धुओं की गाँठों का अम्बार दिखता है और मंगल-वाद्य डेरा उखाड़ने वाले अंतिम कारबरदार की उसाँस में बजकर एकबारगी बंद हो जाता है।
लागति अवध भयावह भारी,
मानहुँकालराति अँधियारी।
घोर जंतु सम पुरनरनारी,
डरपहिंएकहि एक निहारी।
घर मसान परिजन जनुभूता,
सुत हित मीत मनहुँजमदूता।
वागन्हबिटपबेलिकुम्हिलाहीं,
सरित सरोवर देखि न जाहीं।
कैसे मंगलमय प्रभात की कल्पना थी और कैसी अँधेरी कालरात्रि आ गई है? एक-दूसरे को देखने से डर लगता है। घर मसान हो गया है, अपने ही लोग भूत-प्रेत बन गए हैं, पेड़ सूख गए हैं, लताएँ कुम्हला गई हैं। नदियों और सरोवरों को देखना भी दुस्सह हो गया है। केवल इसलिए कि जिसका ऐश्वर्य से अभिषेक हो रहा था, वह निर्वासित हो गया। उत्कर्ष की ओर उन्मुख समष्टि का चैतन्य अपने ही घर से बाहर कर दिया गया, उत्कर्ष की, मनुष्य की ऊर्ध्वोन्मुख चेतना की यही कीमत सनातन काल से अदा की जाती रही है। इसीलिए जब कीमत अदा कर ही दी गई, तो उत्कर्ष कम-से-कम सुरक्षित रहे, यह चिंता स्वाभाविक हो जाती है। राम भीगें तो भीगें, राम के उत्कर्ष की कल्पना न भीगे, वह हर बारिश में हर दुर्दिन में सुरक्षित रहे। नर के रूप में लीला करने वाले नारायण निर्वासन की व्यवस्था झेलें, पर नर रूप में उनकी ईश्वरता का बोध दमकता रहे, पानी की बूँदों की झालर में उसकी दीप्ति छिपने न पाए। उस नारायण की सुख-सेज बने अनंत के अवतार लक्ष्मण भले ही भीगते रहें, उनका दुपट्‍टा, उनका अहर्निशिजागर न भीजे, शेषी नारायण के ऐश्वर्य का गौरव अनंत शेष के जागर-संकल्प से ही सुरक्षित हो सकेगा और इन दोनों का गौरव जगज्जननीआद्याशक्ति के अखंड सौभाग्य, सीमंत, सिंदूर से रक्षित हो सकेगा, उस शक्ति का एकनिष्ठ प्रेमपाकर राम का मुकुट है, क्योंकि राम का निर्वासन वस्तुत: सीता का दुहरा निर्वासन है। राम तो लौटकर राजा होते हैं, पर रानी होते ही सीता राजा राम द्वारा वन में निर्वासित कर दी जाती हैं। राम के साथ लक्ष्मण हैं, सीता हैं, सीता वन्य पशुओं से घिरी हुई विजन में सोचती हैं - प्रसव की पीड़ा हो रही है, कौन इस वेला में सहारा देगा, कौन प्रसव के समय प्रकाश दिखलाएगा, कौन मुझे सँभालेगा, कौन जन्म के गीत गाएगा?
कोई गीत नहीं गाता। सीता जंगल की सूखी लकड़ी बीनती हैं, जलाकर अँजोर करती हैं और जुड़वाँ बच्चों का मुँह निहारती हैं। दूध की तरह अपमान की ज्वाला में चित्त कूद पड़ने के लिए उफनता है और बच्चों की प्यारी और मासूम सूरत देखते ही उस पर पानी के छीटे पड़ जाते हैं, उफान दब जाता है। पर इस निर्वासन में भी सीता का सौभाग्य अखण्डित है, वह राम के मुकुट को तब भी प्रमाणित करता है, मुकुटधारी राम को निर्वासन से भी बड़ी व्यथा देता है और एक बार और अयोध्या जंगल बन जाती है, स्नेह की रसधार रेत बन जाती है, सब कुछ उलट-पलट जाता है, भवभूति के शब्दों में पहचान की बस एक निशानी बच रहती है, दूर उँचे खड़े तटस्थ पहाड़, राजमुकुट में जड़ें हीरों की चमक के सैकड़ों शिखर, एकदम कठोर, तीखे और निर्मम -
पुरायत्र स्रोत: पुलिनमधुनातत्रसरितां
विपर्यासंयातोघनविरलभाव: क्षितिरुहामू।
बहो: कालाद्दृष्टंह्यपरमिवमन्येवनमिंद
निवेश: शैलानांतदिदमितिबुद्धिंद्रढयति।
राम का मुकुट इतना भारी हो उठता है कि राम उस बोझ से कराह उठते हैं और इस वेदना के चीत्कार में सीता के माथे का सिंदूर और दमक उठता है, सीता का वर्चस्व और प्रखर हो उठता है।
कुर्सी पर पड़े-पड़े यह सब सोचते-सोचते चार बजने को आए, इतने में दरवाजे पर हल्की-सी दस्तक पड़ी, चिरंजीवी निचली मंजिल से ऊपर नहीं चढ़े, सहमी हुई कृष्णा (मेरी मेहमान लड़की) बोली - दरवाजा खोलिए। आँखों में इतनी कातरता कि कुछ कहते नहीं बना, सिर्फ इतना कहा कि तुम लोगों को इसका क्या अंदाज होगा कि हम कितने परेशान रहे हैं। भोजन-दूध धरा रह गया, किसी ने भी छुआ नहीं, मुँह ढाँपकर सोने का बहाना शुरू हुआ, मैं भी स्वस्ति की साँस लेकर बिस्तर पर पड़ा, पर अर्धचेतन अवस्था में फिर जहाँ खोया हुआ था, वहीं लौट गया। अपने लड़के घर लौट आए, बारिश से नहीं संगीत से भीगकर, मेरी दादी-नानी के गीतों के राम, लखन और सीता अभी भी वन-वन भीग रहे हैं। तेज बारिश में पेड़ की छाया और दुखद हो जाती है, पेड़ की हर पत्ती से टप-टप बूँदें पड़ने लगती हैं, तने पर टिकें, तो उसकी हर नस-नस से आप्लावित होकर बारिश पीठ गलाने लगती है। जाने कब से मेरे राम भीग रहे हैं और बादल हैं कि मूसलाधार ढरकाए चले जा रहे हैं, इतने में मन में एक चोर धीरे-से फुसफुसाता है, है, राम तुम्हारे कब से हुए, तुम, जिसकी बुनाहट पहचान में नहीं आती, जिसके व्यक्तित्व के ताने-बाने तार-तार होकर अलग हो गए हैं, तुम्हारे कहे जानेवाले कोई भी हो सकते हैं कि वह तुम कह रहे हो, मेरे राम! और चोर की बात सच लगती है, मन कितना बँटा हुआ है, मनचाही और अनचाही दोनों तरह की हज़ार चीजों में। दूसरे कुछ पतियाएँ भी, पर अपने ही भीतर प्रतीति नहीं होती कि मैं किसी का हूँ या कोई मेरा है। पर दूसरी ओर यह भी सोचता हूँ कि क्या बार-बार विचित्र-से अनमनेपन में अकारण चिंता किसी के लिए होती है, वह चिंता क्या पराए के लिए होती है, वह क्या कुछ भी अपना नहीं है? फिर इस अनमनेपन में ही क्या राम अपनाने के लिए हाथ नहीं बढ़ाते आए हैं, क्या न-कुछ होना और न-कुछ बनाना ही अपनाने की उनकी बढ़ी हुई शर्त नहीं है?
तार टूट जाता है, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है, यह भीतर से कहा पाऊँ? अपनी उदासी से ऐसा चिपकाव अपने सँकरे-से-दर्द से ऐसा रिश्ता, राम को अपना कहने के लिए केवल उनके लिए भरा हुआ हृदय कहाँ पाऊँ? मैं शब्दों के घने जंगलों में हिरा गया हूँ। जानता हूँ, इन्हीं जंगलों के आसपास किसी टेकड़ी पर राम की पर्णकुटी है, पर इन उलझानेवाले शब्दों के अलावा मेरे पास कोई राह नहीं। शायद सामने उपस्थित अपने ही मनोराज्य के युवराज, अपने बचे-खुचे स्नेह के पात्र, अपने भविष्यत् के संकट की चिंता में राम के निर्वासन का जो ध्यान आ जाता है, उनसे भी अधिक एक बिजली से जगमगाते शहर में एक पढ़ी-लिखी चंद दिनों की मेहमान लड़की के एक रात कुछ देर से लौटने पर अकारण चिंता हो जाती है, उसमें सीता का ख्याल आ जाता है, वह राम के मुकुट या सीता के सिंदूर के भीगने की आशंका से जोड़े न जोड़े, आज की दरिद्र अर्थहीन, उदासी को कुछ ऐसा अर्थ नहीं दे देता, जिससे जिंदगी ऊब से कुछ उबर सके?
और इतने में पूरब से हल्की उजास आती है और शहर के इस शोर-भरे बियाबान में चक्की के स्वर के साथ चढ़ती-उतरती जँतसारगीति हल्की-सी सिहरन पैदा कर जाती है। 'मोरे राम के भीजैमुकुटवा' और अमचूर की तरह विश्वविद्यालयीय जीवन की नीरसता में सूखा मन कुछ जरूर ऊपरी सतह पर ही सही भीगता नहीं, तो कुछ नम तो हो ही जाता है, और महीनों की उमड़ी-घुमड़ी उदासी बरसने-बरसने को आ जाती है। बरस न पाए, यह अलग बात है (कुछ भीतर भाप हो, तब न बरसे), पर बरसने का यह भाव जिस ओर से आ रहा है, उधर राह होनी चाहिए। इतनी असंख्य कौसल्याओं के कण्ठ में बसी हुई जो एक अरूपध्वनिमयीकौसल्या है, अपनी सृष्टि के संकट में उसके सतत उत्कर्ष के लिए आकुल, उस कौसल्या की ओर, उस मानवीय संवेदना की ओर ही कहीं राह है, घास के नीचे दबी हुई। पर उस घास की महिमा अपरम्पार है, उसे तो आज वन्य पशुओं का राजकीय संरक्षित क्षेत्र बनाया जा रहा है, नीचे ढँकी हुई राह तो सैलानियों के घूमने के लिए, वन्य पशुओं के प्रदर्शन के लिए, फोटो खींचनेवालों की चमकती छवि यात्राओं के लिए बहुत ही रमणीक स्थली बनाई जा रही है। उस राह पर तुलसी और उनके मानस के नाम पर बड़े-बड़े तमाशे होंगे, फुलझड़िया दगेंगी, सैर-सपाटे होंगे, पर वह राह ढँकी ही रह जाएगी, केवल चक्की का स्वर, श्रम का स्वर ढलती रात में, भीगती रात में अनसोए वात्सल्य का स्वर राह तलाशता रहेगा - किस ओर राम मुड़े होंगे, बारिश से बचने के लिए? किस ओर? किस ओर? बता दो सखी।