मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Oct 3, 2018

संवेदना

संवेदना
-सन्तोष तिवारी
जीवन में कुछ दृश्य मुझे हमेशा चुप कर देते हैं और सोचने पर विवश कर देते हैं। ऐसे दृश्यों से कई बार तो मेरा  दूर-दूर तक कोई नाता न होने के बावज़ूद कोई रिश्ता बना लेने का मन करता है। मन अचानक द्रवित हो जाता है । पाठकों में जितने भी संवेदनशील हैं, उन्हें भी इस प्रकार के दृश्य झकझोरते होंगे। आप कहेंगे आख़िर मुद्दे पर क्यों नहीं आता मैं ? आ रहा हूँ भाई, थोड़ी भूमिका बनाने से बात जल्दी गले उतरती है।
पहला दृश्य होता है जब कोई बुज़ुर्ग कठोर परिश्रम कर जीविका चलाते दिखता है। कोई बूढ़ा सामान से लदे ठेले को धकियाते दिखे। तब सोचता हूँ, इस व्यक्ति की ऐसी क्या विवशता होगी जो इस उम्र में, जिस में उसे आराम की ज़रूरत है, इस तरह का काम करना पड़ रहा है? पसीने से तर हाँफता बदन आख़िर कौन-सी  मजबूरी ने  इसे ये हालात दिये हैं? 
एक और दृश्य होता जबमैं किसी व्यक्ति को अकेले खाना खाते देखता हूँ। सोचता हूँ इसके परिवार में जाने कितने लोग होंगे। परिवार के बीच हँसी-ठिठोली करते भोजन करता होगा। काम या सफ़र या कोई और कारण हो सकता है कि इसे इस तरह अकेले भोजन करना पड़ रहा है। मन करता है उस से पूछ ही लूँ कि- भाई! तू खाना खा, मैं तेरे पास, तेरे साथ बैठ कर तुझसे बातें करता हूँ , तुझे कंपनी देता हूँ। लेकिन कुछ ख़ुद की हिचकिचाहट और कुछ सामने वाले के अन्यथा ले लेने के भय से चुप दबा जाता हूँ।
एक  दृश्य वो भी होता है जब किसी गरीब ,मज़दूर के बच्चों को किसी पुराने टूटे खिलौने में रस्सी या धागा बाँध कर उसमें लीन हो कर खेलते देखता हूँ। सोचता हूँ जिस बच्चे ने ये खिलौना फेंका होगा उसके पास कितने सारे खिलौने होंगे लेकिन वो इस आनन्द से कितना महरूम होगा जो इस ग़रीब बच्चे को इस टूटे खिलौने में आ रहा होगा। अभाव में लगाव हो ही जाता है।
त्योहारों पर चमचमाती गाड़ियों और बड़े-बड़े मॉल या शोरूम में ख़रीदारी करते, चमचमाते लोगों के बीच निग़ाहें ठहर जाती हैं किसी छोटे बच्चे को फूल या धानी बताशे या दीये बेचते हुए देखकर। उसकी आँखों में फ्रिज, एल.ई.डी. ख़रीदने की हवस नहीं दिखती, बल्कि अपनी टपरी के सामने दो दीपक धर के पुराने कपड़ों में ही सही अपने भाई-बहनों के साथ कुछ फुलझड़ियाँ छुड़ा लेने का नन्हा-सा ख्वाब होता है। गरीबी में दिल बड़ा होता है लेकिन जेब छोटी।
ऐसे कितने ही दृश्य होते हैं, जिन्हें देखें तो लगता है इनसे मेरा क्या रिश्ता है ? मन उनके लिए क्यों पसीज जाता है जो अभी ही मिले हैं और अब के बाद शायद कभी न मिलें। शायद इसी को मानवता का रिश्ता कहते हैं।
जाने दो यार.... लिखने का तो बहुत मन है .... लेकिन आँख हैं कि साथ नहीं दे रहीं। आज आँखों की सारी नमी उन गुमनाम चेहरों के लिए, उन अनाम रिश्तों के लिए। दिल में एक गीत बज रहा है-
दुनिया में कितना ग़म है।
मेरा ग़म कितना कम है।
लोगों का ग़म देखा तो
मैं अपना ग़म भूल गया।

सम्पर्कः  12, ‘‘प्रारब्ध‘‘, शान्तिनगर, सिविल लाईन्स
खण्डवा 450001, मोबाईल- 9926571060

सात समंदर पार

कांचीपुरम मठ में विजयेन्द्र सरस्वती के साथ लेखिका
सात समंदर पार
शशि पाधा

^खुला झरोखा आई धूप
‘बदल गया जीवन स्वरूप,
मरुथल में भी छाँव मिली
प्यासे को जल पूरित कूप’
बचपन में सुना था कि जो व्यक्ति सात समन्दर पार जाता हैउसे ऐसी विदाई दी जाती है ,मानों उसके लौट आने की कोई आशा ही न हो। जाने वाला भी भारी मन से केवल कुछ नया देखने/पाने के उद्देश्य से ही अदृश्य की ओर प्रस्थान करता था।
किन्तु मेरी परिस्थितियाँ भिन्न थीं। मुझे विदेश में कुछ ढूँढने/ पाने के लिए नहीं जाना था। केवल संतान का मोह मुझे अपने देश से हजारों मील दूर सात समन्दर पार बुला रहा था।
बात वर्ष 2002 की है। पति ने सेवा निवृत्ति पाते ही निर्णय ले लिया- चलो बच्चों के पास अमेरिका में। यहाँ अकेले क्यों रहें,वहाँ जाकर कुछ उनके काम में हाथ बटायेंगे। चूँकि मैं पहले भी अमेरिका में वर्ष भर रह चुकी थी और यहाँ के वैभवकी चकाचौंध के साथ-साथ प्रियजनों से दूर होने का दुःख भोग चुकी थी; अत:  मैंने अनेकों बार यहाँ आने के लिए ‘न’ ही की। मुझे संतान का मोह तो था ;किन्तु विदेश की धरती के प्रति आकर्षण कतई नहीं था। मैं साहित्य जगत से जुड़ी थी, और जानती थी कि अमेरिका में मुझे हिन्दी की पुस्तकों, पत्रिकाओंतथा साहित्यिक गोष्ठियों की कमी खलेगी। इसी उधेड़बुन में निर्णय लेने से पहले हमने दक्षिण भारत की यात्रा की।यही सोचकर कि अपने को थोड़ा समय दे सकें और इस विषय पर कुछ और विचार कर सकें।

एक कार्यक्रम में कविता पाठ
करते हुए लेखिका
कन्या कुमारी, त्रिवेंद्रम, रामेश्वरम, महाबलीपुरम और पांडेचेरी होते हुए हम काँचीपुरम में शंकराचार्य मठ के दर्शन करने गए। वहाँ के पवित्र वातावरण में बहुत शान्ति का अनुभव हुआ।  सुबह की पूजा-अर्चना के बाद हमने मठ के अध्यक्ष शंकराचार्य से मिलने की इच्छा जताई। अधिकारियों ने हमें बताया कि प्रात:काल की पूजा अर्चना के बाद ही हम उनसे मिल सकते हैं। हमारे पास समय ही समय था। हमउनसे मिले बिना जाना नहीं चाहते थे। सौभाग्यवश वहाँ के अधिकारियों ने हमें उनके अतिथिकक्ष में आने का निमंत्रण दिया।
बातचीत करते हुए उन्हें मैंने अपने मन की दुविधा बताई और परामर्श लेना चाहा। मैंने उनसे कहा, “आदरणीय, मेरे पति विदेश में हमारे पुत्रों के परिवारों के साथ अपना बाकी जीवन बिताना चाहते हैं। मेरे मन में कई संशय हैं। क्या वहाँ के वातावरण में हम अपने आप को ढाल पाएँगे? क्या संयुक्त परिवार में रहना संभव हो सकेगा? मेरे लेखन को क्या वहाँ खाद –पानी मिलेगा? मेरे मन में इतने संशय हैं कि मन सदैव अशांत रहता है। कृपया कोई समाधान बताइए।
शंकराचार्य जी बड़े धैर्य से मेरी बात सुनते रहे। कुछ देर बाद बड़े शांत स्वर में जो उन्होंने मुझसे कहा उससे मेरे जीवन को सही दिशा मिली। उन्होंने कहा, “माँ!
तुम कहाँ जा रही हो, तुम्हारा कर्म और धर्म तुम्हें वहाँ ले जा रहा है। तुम अपनी भाषा, संस्कृति और जीवन मूल्यों को अपने गठरी में बाँधकर ले जाओ और भावी  पीढ़ी को उनसे अवगत / परिचित कराओ । तुम मातृशक्ति हो, तुम पर बहुत बड़ी जिम्मेवारी है। तुम भारतीय संस्कृति की दूत बनकर उसके प्रचार–प्रसार के लिए जा रही हो। अब यही तुम्हारे जीवन का उद्देश्य है और यही कर्तव्य। निश्चिन्त होकर जाओ, ईश्वर सदा तुम्हारे साथ रहेगा।
बहुत सरल भाषा में कहे गए उनके शब्दों को सुनते ही संशय के बादल मानों छँट गये। अब अमेरिका जाने के लिए मन और लालायित हो गया।
ठाकुर द्वारे में करवाचौथ की पूजा
लोहरी उत्सव पर दोस्तों के साथ
यहाँ आते ही सौभाग्य से हम नार्थकेरोलाइना के राली –डरहम शहर में आ गए। इस क्षेत्र में रहने वाले भारतीय लोग भारतीय कला, संस्कृति और साहित्य के विकास और प्रचार में दिन रात कुछ न कुछ आयोजन करते रहते हैं ।मुझे स्वयं नार्थ केरोलाइना के चैपल हिल विश्वविद्यालय में हिन्दी भाषा के अध्यापन का सुअवसर प्राप्त हुआ। विभिन्न कवि-गोष्ठियों में भाग लेने से यहाँ के साहित्यकारों से मित्रता हुई और लेखन को एक नई दिशा मिली।
इन सब से बढ़कर जो मेरे लिए बहुत आनन्द, गर्व और संतोष  की बात हुई,वह यह कि हमारे यहाँ परिवार में संग रहने से मेरे पोते और पोतियाँ हिन्दी भाषा में बात करते हैं, घर में पूरी भारतीय विधि से पूजा- अर्चना के साथ त्योहार मनाए जाते हैं, भारतीय  भोजन बनता है। मुझे समय-समय पर बहुत से आयोजनों में भारतीय संस्कृति के विभिन्न विषयों पर अपने विचार बाँटने का अवसर मिलता है। अत: भारत से सैंकड़ों मील दूर सात समंदर पार भी हम अपने घर में तथा सभी भारतीय मित्रों के साथ मिल कर अमेरिका में पैदा हुई नई पीढ़ी के जीवन में भारतीय संस्कृति,भाषा और जीवन मूल्यों को वही विशेष स्थान देने में सफल हुए हैं ,जो आज भारत में रहते हुए परिवार कर रहे हैं। अंतर केवल इतना है कि यहाँ के पश्चिमी वातावरण में इन सब के लिए परिश्रम अधिक करना पड़ता है।
अब रही लेखन की बात तो आज अंतरजाल ने विश्व को एक सूत्र में बाँध दिया है। अंतरजाल पर ही हम इतना साहित्य पढ़ लेते हैं कि लगता नहीं कि हम साहित्य जगत से दूर हैं। स्वयं मैं अपनी रचनाओं को अंतर्जाल की विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ भेजती रहती हूँ जिससे मेरे लेखन को विकास और विस्तार मिलता है।
अब सोचती हूँ शंकराचार्य जी ने ठीक ही तो कहा था, “माँ! तुम कहाँ जा रही हो, तुम्हारा भाग्य और कर्तव्य तुम्हें वहाँ ले जा रहा है।

shashipadha@gmail.com

कौन थी वो ?

कौन थी वो ?
डॉ.सुषमा गुप्ता
हालाँकि अब बाहर चटक कँटीली धूप है पर सुबह ऐसा नहीं था।
सुबह 5:30 जब उठी तब भी आकाश कालिमा की चादर उतारने को तैयार न था । मैं मुस्कुराई कि आज ये जनाब भी मुझ-सा आलसी हो रहे हैं। समय सरकता रहा और कालिमा कम होने की बजाय बढ़ने लगी। मंदिर जाने के समय तक बादल छमाछम बरसने लगा। चूँकि आज ऑफिस में भी जरूरी काम था और किन्हीं से मिलने का समय भी तय था, सो देर नहीं कर सकती थी। अतुल बोले -आओ बेलपत्र बाहर से मैं तोड़ देता हूँ और मंदिर भी ले चलता हूँ। अब सुबह-सुबह इतनी मदद मिल जाएतो और क्या चाहिए।
यूँ तो घर के बाहर बेलपत्र का पेड़ बहुत श्रद्धा से लगवाया थापर अब आलस है या जाने क्याचढ़ाती बस सावन-सावन ही हूँ।
सावन में रोज़ ग्यारह बेलपत्र ले जाती हूँहर पत्ते पर अँगुली से ॐ उकेरती हूँ और शिवलिंग पर चढ़ा देती हूँ। सालों से यही नियम है
आज एक आंटीजी (जाने कौन थी) मुझे देखकर बोली -"ये क्या लिख रही हो इन पर ?"
मैंने कहा-"ॐ"
"जो कर रही हो बहुत अच्छा है,पर ये आलस क्यों?"
"आलस?"
"हाँ या तो रोली से लिखो या चंदन से ।"
"प्रभु को भाव से मतलब है,पेंसिल ट्रांसपेरेंट है या कलरफुलउससे क्या फ़र्क पड़ता है ?"
आंटी जी चिढ़ गईं। बोली-"आजकल की छोरियों से तो बहस करा लो बस।"
अब मैं चुप ।
एक और नियम भी है पर इसका श्रेय सासू माँ को जाता है। शादी के बाद जब मंदिर साथ गईं‌ तो उन्होंने ताकीद की कि जो भी बड़े बुजुर्ग मंदिर में होंपूजा खत्म करके सबके पैर छुआ करो। मुझे उस वक्त वो तुग़लक़ी फरमान बहुत बुरा लगा। जान न पहचान सबके पैर छूते फिरोपर इतनी हिम्मत न थी कि उनका कहा दरकिनार करती। खैर फिर इतने स्नेहिल आशीर्वाद मिलते कि मुझे खुद ही बहुत अच्छा लगने लगा।सासूमाँ को दिल से धन्यवाद।
आज जब जल चढ़ाकर उन आंटी जी के पैर छुए (जो कुछ पल पहले चिढ़ गई थी)तो वो अचकचा गई-"अरे मेरे पैर क्यों छूए ?"
रोज़ मिलने वाली एक आंटी बोली-
"रोज़ का नियम है इसकासबके छूती है,मना करो तो भी नही मानती।"
अब ये सुनना था नई आंटी जी ने तो गले ही लगा लिया और आशीर्वाद की झड़ी लगा दी।
अपनी मुस्कान भी ये कान तक थी कि चलो आंटी जी गुस्सा नहीं गईं।
जल चढ़ाने का शिवलिंग मंदिर के आँगन में है और बाकी विग्रह अंदर।
जैसे ही अंदर गई कुछ ठिठक गई।
एक औरत माता की प्रतिमा के आगे नतमस्तक लेटी थी। बिल्कुल साष्टांग प्रणाम की मुद्रा में ।
पास खड़े मैं दुर्गा चालीसा का पाठ करने लगी पर जाने क्यों, कुछ परेशान कर रहा था।
चालीसा में मन‌ न रमा। सारा ध्यान उसी में जो था। उसके शरीर में हल्का कंपन साफ ज़ाहिर कर रहा था कि वो रो रही है। चेहरा भी इस कदर दोनों तरफ की बाजुओं में छिपा था कि कौन है किस उम्र की है कुछ न दिखा। जब तक मैं मंदिर में थी,वो वैसे ही रही।
एक पल लगा पूछूँ क्या हुआ,फिर लगा वो माँ से बात कर रही है उसकी ध्यान तोड़ना ठीक नहीं।
वैसे भी प्रभु से ऐसे संवाद कोई तब ही करता हैजब इंसानों से हार चुका होता है
मन बुझ गया। थकान ने घेर लिया। उदास कदमों से बाहर आ कार में बैठ गई। अतुल के फोन सुबह नौ से रात नौ तक बंद ही नही होतेवो फोन में व्यस्त थेफिर कहती भी क्या ।
आधा दिन गुज़र गया, न वो औरत ज़हन से उतरी न मन ठीक हुआ।
उसके शरीर की कंपन .....
मुस्कान बहुत महँगी नहीं है ज़हान में,पर बात ये है कि वो बस अपनी खुशियों तक सीमित रहे ।
जो ऐसा नही कर पाते,वो शापित होते हैं
वो हँसते तो खूब हैं,मुस्कराते नहीं हैं
काश कि सब मुस्कुरा सकें मीठा-मीठा
कौन थी वो पर...
उसको दुआ दो दोस्तों कि उसके सब दर्द फना हो जाएँ।
सम्पर्क327/सेक्टर 16A, फरीदाबाद-121002 (हरियाणा)

किसको जलाया जाए

किसको जलाया जाए
डॉ.कविता भट्ट
जब सरस्वती दासी बनलक्ष्मी का वंदन करती हो   
रावण के पद-चिह्नों का नित अभिनन्दन करती हो 
सिन्धु-अराजकभय-प्रीति दोनों ही निरर्थक हो जाएँ  
और व्यवस्था सीता-सी प्रतिपल लाचार सिहरती हो

अब बोलो राम! कैसे आशा का सेतु बनाया जाए
अब बोलो विजयादशमी पर किसको जलाया जाए

जब आँखें षड्यंत्र बुनेंकिन्तु अधर मुस्काते हों
भीतर विष-घटकिन्तु शब्द प्रेम-बूँद छलकाते हों
अनाचार-अनुशंसा में नित पुष्प-हार गुणगान करें 
हृदय ईर्ष्या से भरे हुएकंठ मुक्त प्रशंसा गाते हों

क्या मात्ररावण-दहन का झुनझुना बजाया जाए 
अब बोलो विजयादशमी पर किसको जलाया जाए  

विराट बाहर का रावणभीतर का उससे भी भारी
असंख्य शीश हैंपग-पग परबने हुए नित संहारी
सबके दुर्गुण बाँच रहे हमस्वयं को नहीं खँगाला है   
प्रतिदिन मन का वही प्रलापबुद्धि बनी भिखारी 

कोई रावण नाभि तो खोजोकोई तीर चलाया जाए
अब बोलो विजयादशमी पर किसको जलाया जाए

सम्पर्कः FDC, PMMMNMTT, द्वितीय  तल , प्रशासनिक खण्ड ll,
हे.न.ब.गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय, श्रीनगर (गढ़वाल)उत्तराखंड   -246174

धरोहरः खारून नदी की सभ्यता से आरंभ होगा छत्तीसगढ़ का इतिहास


तरीघाट
विनोद साव
सावन माह का यह पहला दिन था। थोड़ी फुहार थी इसलिए हवा ठंडी बह रही थी। पाटन का यह इलाका चिरपरिचित इलाका था। गाँव कस्बों में गौरवपथ बन गए है। इस इलाके के सेनानियों ने स्वाधीनता संग्राम में लड़ाइयाँ लड़ी थीं। गौरवपथ जिस चौराहे से शुरू होता है वह आत्मानंद चौक कहलाता है। यहाँ स्वामी आत्मानंद की मूर्ति लगी हुई है जो एक बड़े समाज सुधारक थे।
पाटन की सीमा पार करते हुए हम अटारी गाँव जाने वाली उस सड़क पर आ गए थे जिसके शिकारी पारा में कभी तीजनबाई रहा करती थी। बारह साल की उम्र में तब उनकी पंडवानी का स्वर पहले यही गूँजता था। उन्होंने यहाँ से पंडवानी गायन शुरू किया था। यहाँ से तेलीगुंडरा गाँव का एक रास्ता फूटता है जहाँ दानवीर दाऊ रामचंद साहू रहा करते थे, जिन्होंने स्कूल- निर्माण व शिक्षा के विकास के लिए अपनी बावन एकड़ जमीन बरसों पहले दान कर दी थी। अब समय है ,जब किसी स्कूल का नाम दाऊजी के नाम से कर दिया जाए। आज उनका दशगात्र कार्यक्रम था।  वहाँ सांसद ताम्रध्वज साहू और क्षेत्रीय विद्यायक भूपेश बघेल भी थे। दाऊ जी के गाँव में उन्हें अपने श्रद्धा-सुमन व्यक्त करके हम लौट रहे थे। तब एक तिराहे पर गुमठी में हमने अच्छी चाय पी ली थी। गुमठी वाले ने बताया कि बाईं ओर का रास्ता सीधे तरीघाट को जाता है।
इन कलाकृतियों को दस हजार
सालपुराना बताया जा रहा है
तरीघाट गाँव सड़क पर ही है खारून नदी के किनारे बसा गाँव। नदी के इस पार दुर्ग जिला और उस पार रायपुर जिला। यह सड़क सीधे अभनपुर राजिम जाने के लिए निकल पड़ती है। उत्खनन का क्षेत्र पूछे जाने पर एक महिला ने दाईं ओर रास्ता सुझाया तब हम लगभग किलोमीटर भर आगे बढ़ चले थे। हरियाली -भरा एक परिसर आ गया था। यहाँ देखकर सुखद आश्चर्य  हुआ ! मंदिर के प्रवेशद्वार पर गाँधी जी का सन्देश दिखा। लोहे की एक गोल पट्टी थी ,जिस पर ऊपर लाल अक्षरों से लिखा था जय महामायाऔर उसके नीचे हरे अक्षरों में लिखा था-आदमी के स्वयं के ज़मीर से बड़ी दुनिया में कोई अदालत नहीं।’- महात्मा गाँधी।
मंदिर के पुजारी ने हमें उत्खनन क्षेत्र का रास्ता दिखा दिया था।यहाँ बिजली खंभे के लिए गड्ढे की खुदाई करते हुए अचानक मजदूरों को एक ताँबे के पात्र में 200 प्राचीन सिक्के मिले। इन सिक्कों को ग्रामीणों ने कलेक्टरेट में आयोजित जनदर्शन कार्यक्रम में जिला प्रशासन को सौंपा। इन सिक्कों के मिलने के बाद तरीघाट बड़ा व्यापारिक केन्द्र होने के पुरातत्त्व विभाग का दावा और भी मजबूत हो गया है। इस दौरान ही मजदूरों को ताँबे के छोटे पात्र में प्राचीन सिक्का मिला। उप संचालक पुरातत्त्व विभाग रायपुर जे.आर. भगत ने बताया कि सिक्के मुगलकालीन व कम से कम 500 साल पुराने हैं।
खुदाई में मिले सोने के सिक्के

रावण की पुरानी मूर्ति के चारों ओर उत्खनन क्षेत्र फैला पसरा था।यहाँ देखरेख करने वाले खूंटियारे जी मिले उन्होंने बताया-वे अनुसूचित जाति के हैं। राजनीति शास्त्र में एम.ए. हैं ,पर अभी ठीक ठाक नौकरी न मिल पाने के कारण यहाँ चौकीदारी कर रहे हैं। यह छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा उत्खनन क्षेत्र है। सिरपुर, डमरू, पचराही सहित छत्तीसगढ़ के सात उत्खनन क्षेत्रों में सबसे बड़ा होगा तरीघाट का उत्खनन क्षेत्र।यहाँ चार टीले हैं, जिनमें केवल एक टीले की खुदाई हुई है।यहाँ कल्चुरी, गुप्तवंश, मौर्यकाल, सातवाहन, दुर्ग के राजा जगपाल वंश के समय की स्वर्ण मुद्राएँ, ताम्र सिक्के और ताम्बे के कलात्मक आभूषण व बर्तन प्राप्त हुए है। साथ में अन्य अवशेष हैं जो भिन्न मूर्तियों व कलाशिल्पों के हैं। जे. आर. भगत पुरातत्वविद हैं उनकी देखरेख में यहाँ खुदाई का कार्य चल रहा है। गलियारे के दोनों ओर कमरे निकले हैं। उनके अनुसार यह क्षेत्र कभी एक बड़ा व्यापारिक परिसर व केन्द्र रहा होगा जहाँ सोने, ताम्बे व अन्य धातुओं से बनी वस्तुएँ क्रय-विक्रय के लिए आती जाती रही होंगी। पिछले तीन वर्षों से यहाँ प्राप्त अवशेषों व मुद्राओं को रायपुर के घासीदास संग्रहालय में अभी रखा गया है जिसे यहाँ नए बने संग्रहालय में ले आया जाएगा तब यहाँ आने वाले इसे देख सकेंगे और तरीघाट के इतिहास एवं पुरातत्व के बारे में जानकारी ले सकेंगे।अब छत्तीसगढ़ का इतिहास डेढ़ हज़ार साल पुरानी सिरपुर सभ्यता से नहीं बल्कि ढाई हज़ार साल प्राचीन खारून नदी की सभ्यता तरीघाट से आरम्भ होगा।
नवनिर्मित संग्रहालय भवन
उत्खनन क्षेत्र में लेखक
हम रावण की जिस मूर्ति के चौरे पर खड़े हुए थे उसके बारे में बताया गया कि यह पुरातात्विक नहीं है। पहले तरीघाट गाँव के लोग यहाँ दशहरा मनाते थे। अब यह संरक्षित क्षेत्र हो गया है। तब दशहरा दूसरे स्थान पर मनाया जाता है। दस सिरों वाले रावण की यह मूर्ति युद्ध करने की मुद्रा में बनी है और विशाल धनुष बाण उनके हाथों में है।खूंटियारे बता रहे थे कि चरवाहों और मवेशियों के कारण उत्खनन क्षेत्रों को बड़ा नुकसान पहुँचता है। उनके निशान मिटने लगते हैं। इन्हें बिना किसी क्षति के सम्हाल पाना बड़ा मुश्किल होता है भैय्या।फिर चरवाहों से उनकी हुज्जत होने लग गई थी।
सभ्यता नदी किनारे पनपती है तो उत्खनन क्षेत्र के पीछे खारून नदी बह रही थी। दुर्ग जिले के संजारी क्षेत्र से निकलने वाली खारून रायपुर की सीमा से बहती हुई आगे जाकर सिमगा-सोमनाथ के पास शिवनाथ से मिल जाती है। इस मिलन स्थल पर मेरी एक कहानी है नदी, मछली और वह।तब खारून शिवनाथ में मिलकर महानदी की संपन्न जलराशि में भी अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करती है। खारुन में एक शान्ति है जो देखने वालों को अपनी ओर खींचती हैं।
खारून नदी जिसके किनारे पनपी 
ढाई हजार साल पुरानी सभ्यता

सूर्यास्त का समय था हम खारून किनारे बैठे हुए थे जिसका नाम है तरीघाट।तरीके मायने है नीचे। इसका अर्थ है नीचे का घाट। काम से लौटते मजदूरों किसानों को देख रहे थे जो नदी में बने बाँधा को पार कर रहे थे अपनी साइकलों को लेकर। हाथ में थैले और सिर पर समान रखे स्त्रियाँ चली जा रही थीं, कतारबद्ध होकर उस पार। हम देख रहे थे लोकजीवन के रंग को अपने भीतर किसी लोकगीत की धुन के साथ।
सम्पर्कः मुक्त नगर, दुर्ग मो. 9009884014