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Dec 18, 2017

एआई का मारा मैं बेचारा

एआई का मारा मैं बेचारा 
 - रवि रतलामी
(कृत्रिम बुद्धिमत्ता युक्त गूगल होम स्पीकर-स्पीकर के सामने कुछ कहें, यह आपकी बात समझने की कोशिश करेगा और तदनुसार कार्य करेगा।)
अब आप एआई का मतलब किसी इंस्पेक्टर से मत जोड़ लीजिएगा। वैसे भी अपने देश में पग -पग पर इंस्पेक्टर मिलते हैं, और उनमें से किसी न किसी एक किस्म के इंस्पेक्टर का मारा, डगडग में। बहरहाल, मैं बात कर रहा हूँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता की। सरल शब्दों में कहें तो आर्टीफ़िशल इंटेलिजेंस की। एक बात और, शीर्षक जल्द ही एआई की मारी दुनिया बेचारी! में जल्द बदलेगा। अत: थोड़ा ध्यान से।
तो, किसी बुरे दिन को मैंने डेढ़ होशियारी दिखाई और अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार ली। मैं एआई युक्त एक अदद होम असिस्टेंट ले आया। जब चहुँ ओर कोर्टाना, बिक्सबी, सिरी, अलेक्सा, गूगल होम असिस्टेंट आदि-आदि की बातें हो रही हों तो आदमी कितने दिनों तक दूरी बनाए रख सकता है भला। और इस तरह मेरे बहुत- बहुत बुरे दिनों की शुरूआत हो गई।
होम असिस्टेंट को मैंने अपने घर के नेटवर्क से जोड़कर आरंभिक सेटअप पूरा किया। एक-दो आसान से चरणों में यह पूरा हो गया। फिर यह बड़े ही नर्म किस्म के आवाज में पूछा- मैं आपका नया सहायक हूँ। मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?
कल भले ही इतवार था, परंतु मैंने इसे जाँचने परखने के लिहाज से कह दिया- ठीक है, मेरे सहायक, कल सुबह छ: बजे मुझे जगा देना।
कोई तीन बजे रात को अलार्म की कर्कश आवाज से मेरी नींद खुली। मेरा होम असिस्टेंट अपनी प्यारी मगर मॉडुलेटेड मशीनी आवाज में कह रहा था- आपको इस लिए उठाया गया है कि आपके शरीर में जल की मात्रा सामान्य से कम हो गई है, अत: तुरंत एक गिलास पानी पिएँ।
वाह! यह है बुद्धिमत्ता। मैं बड़ा प्रसन्न हुआ, कि यह सहायक तो बड़े काम का है, सोते में भी मेरा खयाल रखता है। इसने मेरे हाथ में बंधे फिटनेस बैंड से स्वचालित तरीके से संचार प्रारंभ कर लिया था, और मेरे स्लीपपैटर्न का रीयल टाइम में मॉनीटरिंग कर रहा था, और जब इसे एबनॉर्मल सिग्नल मिला कि मेरे शरीर में फ्लूइड की मात्रा कम हो रही है तो इसने मुझे जगा दिया कि भइए, एक गिलास ठंडा पानी पीने में ही भलाई है। भले ही रात के तीन बजे हों। मगर मुझे यह पता नहीं था कि मेरी प्रसन्नता क्षणिक है, और मैं बड़ी कृत्रिम किस्म की मुसीबतों में फँसने वाला हूँ!
घंटे भर बाद फिर अलार्म बजा। बढिय़ा सपने देख रहा था मैं। स्विटजरलैंड के कोमो झील में नौकायन कर रहा था सपने में, और मेरे नव सहायक का अलार्म बजा। मजा किरकिरा हो गया। क्या यह असिस्टेंट सपने में नहीं झाँक सकता? अर्थ यह कि यह तब उठाए, जब बुरे, डरावने सपने आ रहे हों? अलार्म के बीच असिस्टेंट कह रहा था- आप जिस करवट लेटे हैं उसे बदलें क्योंकि आप जरूरत से ज्यादा और बड़ी खर्राटे भर रहे हैं।
चलो, यह भी ठीक है। आदमी खर्राटे हमेशा नींद में ही निकालता है और अनजाने में लोगों की हँसी का पात्र बनता है। मेरा यह नया सहायक मेरे खर्राटे कंट्रोल करने में बड़ा सहायक होगा। मैंने उसे शाबासी देना चाही, मगर उसका पीठ कहीं दिखा नहीं। पर जब इस सहायक ने महज बीस मिनट बाद ही मुझे फिर से जगाया यह बोलकर कि नींद में आपकी गर्दन तकिये से नीचे गिर गई है और आपकी गर्दन की नसों को नुकसान पहुँच सकता है, तो मेरा पारा गर्म हो गया। एक बार मन हुआ कि इसे उठाकर कहीं दूर फेंक दूँ। और, इसने बाकायदा छ: बजे फिर से अलार्म बजा दिया- सुप्रभात। उठिए, आपके कार्य का समय प्रारंभ हो गया है- मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ। मैं बिस्तर से ही चिल्लाया- मेरे बाप! जरा शांति बनाए रख, मुझे सो लेने दे।
मेरा सहायक वापस बोला- क्षमा कीजिएगा, मैं आपकी बात समझ नहीं पाया। मुझे फिर से निर्देश दें। स्पष्ट शब्दों में बोलने का प्रयास करें ताकि मैं आपकी बात समझ सकूँ।
ये ल्लो! ये अब मुझे समझाने लगा कि मैं किस तरह और कैसे बात करूँ! हद है!
सुबह नौ बजे दरवाजे की घंटी बजी। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ कि कौन हो सकता है। आज किसी का एप्वाइंटमेंट भी नहीं था और न ही कोई मेहमान अपेक्षित था। दरवाजा खोला तो सामने अमेजन ऑनलाइन स्टोर का मिनी डिलीवरी ट्रक खड़ा दिखा। डिलीवरीमैन किराने के सामानों से भरा बास्केट लेकर खड़ा था।
मैंने आश्चर्य से उससे कहा- भाई शायद आप गलत पते पर आ गए हैं। मैंने कोई सामान नहीं मँगवाया है।
सर, ऑर्डर तो आप ही का है- यह देखिए- और उसने मेरे हाथों में बिल की कॉपी थमा दी। रात बारह बजे ऑनलाइन ऑर्डर हुआ था। मेरे घर से, मेरे खाते से।
समझने में मुझे कुछ समय लगा। तो, यह मेरे नए, कृत्रिम बुद्धिमत्ता युक्त सहायक का किया धरा है! उसने मेरे एआई युक्त फ्रिज- जिसकी क्षमताओं के बारे में मुझे भी इतना नहीं पता था, से संचार संपर्क स्थापित किया, जानकारी ली, मेरी पिछली आवश्यकताओं और कंजप्शन पैटर्न को खंगाला, और फ्रिज में उपलब्ध अनुपलब्ध सामानों तथा पिछले आर्डर और कंजप्शन के आधार पर आवश्यक सामानों की सूची बनाया और मेरे खाते से स्वयमेव आर्डर कर दिया ताकि सुबह-सुबह मेरी आवश्यकताओं का सारा सामान मुझे मिल जाए!
बाकी सामानों का तो फिर भी ठीक था, मगर दूध, मक्खन और दही जैसी जल्द खराब हो सकने वाली चीजों का मैं क्या करूंगा? वह भी इतनी मात्रा में? बीबी अभी परसों ही दो हफ्ते के लिए मायके गई थी, और मैं तो मित्र मंडली के साथ पार्टी के मंसूबे बनाया हुआ था। होम असिस्टेंट, सत्यानाश हो तेरा!
 जल्द ही मैं अपने इस एआई युक्त सहायक से भर पाया। मैंने इसे अपने होम नेटवर्क से पासवर्ड बदल कर निकाल बाहर किया, उसका पावर सप्लाई बंद किया और एक डब्बे में लपेट कर रख दिया, और ओएलएक्स पर डाल दिया ताकि जो भाव मिले, बेच दूं। मगर, ये क्या? हफ़्ते गुजर गए कोई लेवाल नहीं मिला। शायद सबके सब एआई सहायक के मारे हुए हैं। अब तो यह डर भी लगा रहता है कि कहीं यह सहायक रिनीवेबल, सेल्फसस्टेंडएनर्जी न जनरेट करने लगे और फिर से जीवित हो जाए सहायता करने को!
लेखक परिचय:रविशंकर श्रीवास्तव, उपनाम- रवि रतलामी, विगत 20 वर्षों से हिन्दी में तकनीकी/साहित्य लेखन व संपादन तथा कंप्यूटरों, आईटी के हिन्दी व छत्तीसगढ़ी भाषा में स्थानीयकरण में सक्रिय भूमिका, शासकीय विद्युत मंडल में 20 वर्ष से अधिक का प्रसाशकीय/प्रबंधन/तकनीकी अनुभव (भाषाई कंप्यूटिंग के क्षेत्र में कार्य करने हेतु 2003 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्त)  प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में तकनीकी स्तंभ व साहित्य लेखन, 10 वर्षों से नियमित हिन्दी में तकनीकी/हास्य-व्यंग्य ब्लॉग लेखन, ऑनलाइन पत्रिका रचनाकार.ऑर्ग का संपादन तथा हिन्दी की सर्वाधिक समृद्ध ऑनलाइन वर्गपहेली का सृजन। पुस्तकें- रवि रतलामी के व्यंग्य, रवि रतलामी के ग़ज़ल और व्यंज़ल, लिनक्स पॉकेट गाइड हिन्दी में आसपास की कहानियाँ (हिन्दी में सह-अनुवाद) पुरस्कार- रवि रतलामी का हिन्दी ब्लॉग (वर्तमान नाम छींटे और बौछारें)- माइक्रोसॉफ़्ट भाषा इंडिया सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग 2006, 2007-9 माइक्रसॉफ़्ट मोस्ट वेल्यूएबल प्रोफ़ेशनल, अभिव्यक्ति.ऑर्ग टेक्नोलॉजी लेखक 2007, छत्तीसगढ़ी गौरव सम्मान 2008 - सृजन सम्मान रायपुर छत्तीसगढ़, IN 2008 - Nrcfoss  (नेशनल रिसोर्स कौंसिल फ़ॉर फ्री ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर) प्रायोजित राष्ट्रीय पुरस्कार (KDE हिन्दी अनुवाद हेतु), आई टी मंथन 2009 (छत्तीसगढ़ी लिनक्स हेतु) 
सम्पर्क: 101, आदित्य एवेन्यू, एयरपोर्ट रोड, द्रोणांचल के सामने, भोपाल म.प्र. 462030, मो. 9329490014, Email- raviratlami@gmail.com,

बटन दबा सिटी बजा

बटन दबा सिटी बजा 
-डॉ.सुरेन्द्र वर्मा
साहित्यकार तो थे ही, वे भाषण-वीर भी थे। पदानुसार भी वे व्याख्याता ही थे। कम्प्यूटर और इंटरनेट विषय पर उनका व्याख्यान चल रहा था। बोले, आज कम्प्यूटर ने आम आदमी को भी साहित्यकार बना दिया है। जिसे देखो कविता करने लगा है, किसी भी बात पर अपना विरोध दर्ज करने के लिए अपनी सटीक टिप्पणियाँ वाट्सएप और फेसबुक पर डालने लगा है। अभी तक सामान्य जन केवल मौखिक रूप से स्थितियों और लोगों पर तंज कसते थे, अब ब्लॉगपर व्यंग्य लिखने लगे हैं। ये एक बड़ी भारी साहित्यिक क्रान्ति हुई है। एक मनचला विद्यार्थी हाथ उठाकर खड़ा हो गया। कहने लगा सच तो यह है सर, आज कम्प्यूटर की दुनिया लम्बा चौड़ा भाषण देने और बड़े बड़े निबंध लिखने के लिए भी हतोत्साहित करती है।
अपनी बात थोड़े में और सटीक कहिए और चलते बनिए। बात अच्छी लगे तो लाइकका बटन दबाइए और आगे बढ़ जाइए। न अच्छी लगे तो चुप रहिए। मन करे तो अपनी व्यंग्य की भड़ास निकालने के लिए उस पर भी लाइक’  का ही बटन दबा दीजिए। कौन देखता है !
इसमे संदेह नहीं, बड़ी विचित्र है कम्प्यूटर की दुनिया। इसमें कुछ भी आभासित हो सकता है। पूरी दुनिया ही आभासी है। सच झूठ लगता है और झूठ सच लग सकता है। फेसबुक पर डाली गई अपनी नागवार सेल्फी पर आपको ढेरों लाइकमिल सकते हैं और आपकी ललित कविता के लालित्य पर अँगूठा दिखाया जा सकता है। कितना ही नियम-विरुद्ध लिख दें, कोई विह्सिल बजाने वाला नहीं है,
मानो सबने सकारात्मक सोचकी कसम खा रखी है। लेकिन कुछ नकचढ़े, जिनके खून में ही तिनिया निकालना होता है, ‘लाइककी इस आभासी व्यवस्था से काफी नाराज़ और दुखी हैं। अरे, हमारी नापसंदगी के लिए भी तो कोई न कोई बटन होना चाहिए। यह क्या, पसंद है तो भी लाइक, नापसंद है तो भी लाइक। बटन दबाना है तो बस लाइक पर ही दबा सकते हैं। और कोई विकल्प है ही नहीं। अब तो इलेक्शन में भी नाटोबटन स्वीकार कर लिया गया है। कम्प्यूटर में भी कुछ इसी प्रकार का नकारात्मक बटन ज़रूरी है। स्वनामधन्य प्रूफ-रीडर- नुमा आलोचक आखिर कहाँ जाएँ! बिना उनके यह दुनिया कितनी सुनी सूनी और सपाट हो जाएगी। ज़रा इस पर भी तो गौर कीजिए। जहाँ देखो स्माइली, हर तरफ लाइक- ये भी भला कोई बात हुई! प्रजातंत्र के लिए विरोध ज़रूरी है। भारत में तो विरोध का नाम ही प्रजातंत्र है। और इंटरनेट पर विरोध के लिए कोई प्रतीकात्मक स्थान तक नहीं! बड़ी ज्यादती है!
गूगल अब थोड़ा थोड़ा मन बना रहा है। सोचा जा रहा है कि लाइक के साथ साथ अब डिसलाइकका विकल्प भी दिया जाए। नकचढ़ों की नकारात्मकता की खुजली का भी कुछ न कुछ इलाज किया जाए। डिसलाइक के बटन की संभावना ने ही पैदाइशी आलोचकों के पेट में गुदगुदी मचाना शुरू कर दी है। गूगल को वे एडवांस में धन्यवाद दे रहे हैं। कितना खुशगवार होगा वह दिन जब डिसलाइकका विकल्प हाथ लग जाएगा। फेसबुक और वाट्सएप पर खुशी की लहर दौड़ गयी है। सुन्दर से सुन्दर सेल्फी पर डिसलाइकबटन न दबाया तो कहना!
कहा गया है कि लाइकका एक विकल्प सीटी बजाना (विह्सिल) भी हो सकता है। मुझे लगता है, यह ज्यादह अच्छा रहेगा क्योंकि सीटी बजने वाले बटन में हमेशा थोड़ी अस्पष्टता की गुंजाइश रहेगी। अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में सुन्दर लड़की को देखकर लड़के सीटी मारते हैं वहीं खेल (जैसे फुटबाल) में नियम विरुद्ध खेल होने पर भी सीटी बजा दी जाती है। विह्सिल का विकल्प हमेशा भ्रम में रखेगा कि यह खुशी का इज़हार है या फिर यह फाउल के लिए है। और इसी में सीटी बजाने वाले की सफलता का राज़ है। वैसे यह बात तय है कि सीटी हो या नापसंदगी, विह्सिल हो या डिसलाइक, दोनों ही असहमति के हथियार की तरह ही आभासी दुनिया मे प्रयोग होंगे। लाइक का एकछत्र राज ख़त्म हो जाएगा।


   लेखक परिचय: डॉ. सुरेन्द्र वर्मा का जन्म 26 सितम्बर 1932 को मैंनपुरी, उ.प्र.में। इलाहाबाद विश्वविद्यालय, से दर्शनशास्त्र में  एम.ए.। विक्रम वि.वि. उज्जैन से गांधी दर्शन पर पीएच. डी.। इंदौर में शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय में दर्शन शास्त्र के प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष; मप्र के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य पद से 1992 में सेवानिवृत्त। व्यंग्य संकलन- लोटा और लिफाफा, कुरसियाँ हिल रही हैं, हंसो लेकिन अपने पर, अपने अपने अधबीच, राम भरोसे, हँसी की तलाश में, ब बँधे एक डोरी से। साहित्य कला और संस्कृति-  साहित्य समाज और रचना (उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा निबंध के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार), कला विमर्श और चित्रांकन, संस्कृति का अपहरण, भारतीय कला एवं सस्कृति के प्रतीक, कला संस्कृति और मूल्य, चित्रकार प्रो.रामचन्द्र शुक्ल पर मोनोग्राफ, सरोकार (निबंध संग्रह) कविता- अमृत कण (उपनिषदादि का काव्यानुवाद), कविता के पार कविता, अस्वीकृत सूर्य, राग खटराग (हास्य-व्यंग्य 'तिपाइयाँ), धूप कुंदन (हाइकु संग्रह), उसके लिए (कविता संग्रह), दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान पर 10 और ग्रन्थ। सम्प्रति- स्वतन्त्र लेखन तथा गाँधी दर्शन के विशेषज्ञ के रूप में इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा राजर्षि ओपन वि.वि., इलाहाबाद से सम्बद्ध। 
सम्पर्क: 10, एचआईजी/1, सर्कुलर रोड इलाहाबाद- 211001, मो. 9621222778, 

नींबू मिर्ची की जमाना

नींबू मिर्ची की जमाना 
-बी.एल. आच्छा
इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान पर लटके हुए नीबू-मिर्ची को लटके देखा तो मैं चकरा गया। मुझे लगा जैसे न्यूटन का सतरंगी पंखा उलटी दिशा में घूम गया हो। यों मेरे उन दोस्तों की कमी नहीं है, जो इन्टरव्यू में जाने से पहले कार के आगे नीबू-मिर्ची रखकर उन्हें पहिए से कुचलते हुए लक्ष्य तक पहुँचते हों। कार को आगे-पीछे करके उसे हलाल किए बगैर सुकून नहीं मिलता। यों लगता है कि जमाना ही नीबू-मिर्ची का है। शायद कोई पैर दे जाए तो विपदाओं की झोली सामने वाले के गले में डल जाए। सुधरी हुई नजरों के जमाने में आज भी नजर लग जाने का डर इस कदर समाया हुआ है कि चश्में की दुकानें भी बुरी नजर से बचने के लिए नीबू-मिर्ची के बगैर राहत का अनुभव नहीं करतीं। यों परमात्मा तक पहुँचा देने वाली सड़कों के यमदूत वाहन भी लिख ही जाते हैं- बुरी नजर वाले तेरा मुँह काला।पता नहीं चमत्कारों की छुट्टी कर देने वाले वैज्ञानिक चमत्कारों के जमाने में भी मन का विश्वास क्यों नीबू-मिर्ची में जाकर लटक जाता है, विक्रम के वेताल की तरह। नीबू-मिर्ची से विटामिन सीपाकर सड़कें तो नहीं सुधर पाईं, अलबत्ता आदमी का कमजोर विश्वास नीबू-मिर्ची में जाकर लटक गया।
अजूबा तो तब लगा, जब इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान के उद्घाटन पर वैक्यूमक्लीनर के दसियों पीस बगले झाँकते रहे और सगुनके रूप में झाड़ू प्रतिष्ठित हुई। तमाम महँगे प्रसादों के बीच चना-चिरौंजी की तरह। पास में रखी नमक की थैली ने भी झाडू से ही जुगलबन्दी कर ली और जरा-सी भीड़ बढ़ी तो नजर के डर से नीबू-मिर्ची भी दुकानदार के मन के ऑर्केस्ट्रा को संगत देते हुए लटक गए। पता नहीं, विज्ञान के चमत्कारों को यह निरीह और इकलौती झाड़ू कितनी टक्कर दे रही है कि प्रगति की इबारत रचने वाले विज्ञान को भी झाडू की अध्यक्षता में उद्घाटित होना पड़ रहा है। लगता है कि तमाम मशीनी जाँचों के बाद भी बीमारी पकड़ में नहीं आ रही है और आदमी अपने आदिम भय को नीबू-मिर्ची में टटोल रहा है।
यों देखा जाए तो जमाने की चाल ही इलेक्ट्रॉनिक हो चली है। हर काम के लिए मशीन और आदमी बेकार। कभी वॉशिंग मशीन का तो कभी आटा चक्की का मोहक संस्करण। कभी रोटी बेलने की मशीन तो कभी झाड़ू लगाने की। यों जूतों तक से मशीनी पहियों के प्रयोग जारी हैं। जापान में टूथब्रश भी बिजली से दाँतों पर दौड़ता है। जमाना शायद यह भी आए कि सड़कें खुद चलें। और आदमी भी इन्हीं इलेक्ट्रॉनिक चीजों से घर भरने लगा है। आदमी का आदमीपन है इनसे। विद्वान आदमी भी कार और कम्प्यूटर में सवार होकर ही विद्वान दिख पाता है। घर में इन सुख-सुविधाओं का अम्बार हो तो आदमी का बंगला अपनी बस्ती में टीले की तरह ऊँचा उठ जाता है।
पिछली बार मैं भी घर में वॉशिंग मशीन ले आया। वॉशिंग मशीन का वैसा ही स्वागत हुआ जैसे गोदानके होरी के घर में गाय का। मशीन पर स्वस्तिक बना। नजर के लिए काली बिन्दी लगी। पड़ोसियों की ईष्र्या से बचने के लिए प्रसाद के पेड़ों ने राहत दी। मशीन में गलबहियाँ डाले घूमते कपड़ों ने शरीर को हल्का किया। सभी खुश नजर आए। पर एक दिन श्रीमतीजी के हाथ और अँगुलियों में दर्द हुआ। घर के जतन खरे नहीं उतरे तो डॉक्टर का सहारा लिया। डॉक्टर ने दवा तो कम दी, मगर मशविरा ज्यादा दिया। बोले- 'आपके घर में कपड़े तो वॉशिंग मशीन से धुलते हैं, तो धोते रहिए। पर हाथों से कपड़े निचोडऩे का कसरती अभिनय पूरे जोर से करिए वरना इन अंगुलियों की पकड़ जाती रहेगी। हाय रे, बड़ी मुराद और मशक्कत से मशीन आई। स्वस्तिक और काजल लगे। मशीन की नजर लग गई। हाथ में गीले कपड़े लिये बिना वे कपड़े निचोडऩे की फिजियोथेरेपी करती रही।
इधर घर में कोई नया उपकरण आता है तो बाँछें खिल जाती हैं। इस बार तय किया कि गेहूँ घर में ही पिसेंगे। लोग लाखों-करोड़ों के घोटालों की सुर्खियों को पचा जाते हैं, मगर शरबती को मैक्सिकन में बदल देने की आशंकाभरी हेराफेरी से समझौता नहीं कर पाते। सो चक्की आ ही गई। कुछ महीनों बाद श्रीमती का पेट दर्द होने लगा। कमर दुखने लगी। डॉक्टर ने लम्बी पर्ची और कई जाँचों के साथ देशी नुस्खा बताया- आपने कभी पत्थर की घरेलू चक्की चलाई है?’ यों चक्की की बात सुनकर कबीर याद आ गए - ताते या चाकी भली पीस खाय संसार। मगर वे बोलीं – माँ मुझे गोदी में सुलाकर ही चक्की चलाती थीं।डॉक्टर साहब ने कहा – आप चक्की भले ही न चलाएँ, पर चक्की चलाने का कसरती अभ्यास करते हुए पेट और कमर को हिलाते रहें।बिसूरती नजरों से आटा चक्की को दुखते हुए वे पत्थर चक्की का अभ्यास करने लगीं। कभी-कभी घर के लोग इन बिन-संवादी मूक नाटकों को देखकर हँसने लगते हैं। पर इन दिनों वे बावजूद दो-दो मिक्सरों के यशोदा की तरह छाछ बिलौने का नाटकीय अभ्यास कर रही हैं। कृष्ण की जगह मशीन पर काजल का दिठौना लगा है और यशोदा इलेक्ट्रॉनिक युग में छाछ बिलौने का अभ्यास कर रही है।
यों इन दिनों मशक्कत में लगी दादी के मन में पोती के हाथ पीले करने की चिन्ता सता रही है। उनके अपने सपने हैं। हर तरह से पोती की ससुराल मल्टी हो। सुख-सुविधाओं का कुबेर उसी के घर में थमा रहे। कहती भी हैं – मैं तो अपनी पोती को सब चीजें दूँगी। घर भी ऐसा देखूँगी कि रत्तीभर  तकलीफ न उठानी पड़े।लड़की की माँ ने टोकते हुए कहा, ‘माँजी, फिर भी काम तो करना ही पड़ेगा ना, जब वह पराए घर जाएगी।दादी तपाक से बोली- मैं तो अपनी पोती को ऐसे घर में दूँगी कि उसे उठकर पानी भी न पीना पड़े।मन में आया कि माँ से कहूँ कि यह लड़की इन सुख-सुविधाओं के अम्बार में जवानी तो काट लेगी, मगर बुढ़ापे में कमर दर्द के लिए कपड़े निचोडऩे, चक्की चलाने और छाछ बिलौने का फिजियोथेरेपिकल नाटक करती रहेगी। पोती का संस्करण दादी में बदल जाएगा। मगर माँ कहीं नाराज न हो जाए, इसलिए चुप्पी साध गया।
इन दिनों टी.बी. का रोग तो मुट्ठी में आ गया है, पर आदमी टी.वी. की मुट्ठी में चला गया है। टी.वी. के सामने बिस्तर पर पड़े-पड़े ही बातों के चौके-छक्के जड़ता रहता है, मगर सलामी बल्लेबाज के रन आउट या टुच्चक-टुच्चक होते ही पाँव पटकने लगता है। बिस्तर पर पड़े-पड़े खाते और देखते उसका वजन माशाअल्ला हो गया है। कभी क्लोरोस्ट्रोल नप रहा है, तो कभी ब्लड शुगर। हार-थककर वे मॉर्निंगवॉक करने लगे हैं। जॉगिंग की वेशभूषा में फब रहे हैं। न हो तो मशीन पर लेटे-बैठे ही मोटापा घटाने की कवायद कर रहे हैं। दिनचर्या के लिए पसीना बहाने की साधना से उन्हें लगता है कि कहीं इस कर्मयोग से रिएक्शन न हो जाए। यों किसानों को भी धूप में हल चलाते देख वे तारीफ से अघाते नहीं हैं। पर बाइक पर चलते-चलते गर्दन और कान के बीच मोबाइल की घुसपैठ करवाते ही रहते हैं।  चाहे स्पॉन्डेलाइटिस जोर मार जाए, मगर वे इलेक्ट्रॉनिक दिनचर्या के मेघनादी-पाश से बाहर नहीं निकल पाएँगे। उनका बस चले तो घुमावदार सीढिय़ों से बाइक पर बैठकर किचन तक पहुँचें और उतर आएँ। जमाने को पैरों की जरूरत कहाँ है? पर जब टखने बजने लगते हैं तो पैर इलेक्ट्रॉनिक युग में पैदल चलने की आदिम माँग करने लगते हैं। पता नहीं, इस इलेक्ट्रॉनिक युग में पत्थर युग क्यों जिन्दा हाथ हिलाने लगता है। तमाम मशीनी परीक्षणों के बीच आदिम विश्वास क्यों फहराने लगता है? यह आदमी के कर्म की हार है या मशीनों की जीत - मुझे नहीं मालूम। पर इलेक्ट्रॉनिक युग के आदमी के पसीने की पुकार कहीं न कहीं आदिम माँग की तरह असरदार हो जाती है। कभी हारती है तो नीबू-मिर्ची में, कभी जीतती है तो आदमी के पसीने में।


लेखक परिचय: बी. एल. आच्छा- जन्म: 05-02-1950, स्थान -देवगढ़ मदारिया  राजस्थान , शिक्षा-एम.ए.हिन्दी, 1971 (उदयपुर विश्वविद्यालय), से.नि.प्राध्यापक हिन्दी, उच्च शिक्षा विभाग, मध्यप्रदेश शासन, प्रकाशन: 1-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यास, 2-सर्जनात्मक भाषा और आलोचना, 3 'जल टूटता हुआ' की पहचान, 4 -आस्था के बैंगन, (व्यंग्य), 5- पिताजी का डैडी संस्करण (व्यंग्य), संपादन- सृजन संवाद- लघुकथा विशेषांक। पुरस्कार: 1- देवराज उपाध्याय आलोचना पुरस्कार, राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर, 2- पं. नंददुलारे वाजपेयी आलोचना पुरस्कार, म.प्र.साहित्य अकादमी, भोपाल, 3- समीक्षा सम्मान, म.प्र.लेखक संघ, भोपाल, 4-भाषा भूषण सम्मान साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा। सम्पर्क- 36 क्लीमेंस रोड, सरवना स्टोर्स के पीछे, पुरुषवाकम्, चेन्नई (तमिलनाडु) -600007, Email-  balulalachha@yahoo.com

अगले जनम मोहे मास्टर न कीजो

अगले जनम मोहे मास्टर न कीजो


-डॉ. गीता गुप्त
वे दिन अब लद गए, जब गुरुओं की प्रशंसा में कशीदे काढ़े जाते थे। सद्गुरु की महिमा अनत, अनत किया उपगारऔर गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँयजैसी उक्तियों से प्रेरित होकर कइयों ने मास्टर बनने का स्वप्न सँजोया होगा। शायद उसी दौर में किसी महिमामण्डित शिक्षक ने निबन्ध लिखा होगा- अगले जनम भी मास्टर बनूँ।’  मुझे पूर्ण विश्वास है कि जिस समय यह निबन्ध लिखा गया होगा, उस समय लोकतन्त्र नहीं रहा होगा। वर्तमान प्रजातान्त्रिक युग में कोई भी समझदार व्यक्ति मास्टर बनने का ख्वाब नहीं देख सकता। कौन बेवकूफ़ ऐसी बात सोचना चाहेगा भला? जबकि सभी जानते हैं कि इस देश में मास्टरों की औक़ात दो कौड़ी की भी नहीं है। आँखें फोड़-फोड़कर पढ़ाई करने के बाद तो डिग्री मिलती है, फिर जाने कितनी एडिय़ाँ रगडऩे के बाद मास्टरी मिल पाती है, वह भी टेम्परेरी। लोग तब भी मास्टर बनने का हौसला रख पाते हैं, यही क्या कम है ? इस देश में तो मास्टरों की अनगिनत श्रेणियाँ बन गई हैं। संविदा शिक्षक, अध्यापक, गुरुजी, शिक्षाकर्मी वर्ग-एक, शिक्षाकर्मी वर्ग-दो इत्यादि-इत्यादि। इस छोटी-सी अस्थायी नौकरी के लिए भी मोटी फ़ीस चुकाकर प्रतियोगी परीक्षा देनी पड़ती है। जो परीक्षार्थी इसमें सफल हो जाते हैं, उनकी छाती ख़ुशी से फूल उठती है। उन्हें ऐसा लगता है मानो एवरेस्ट पर पताका फहरा आये हों।
 जाने कितने स्कूल-कॉलेज खुल गए हैं, कुकुरममुत्तों की तरह। किसी नेता या मन्त्री के दिवंगत होते ही उनके नाम से भी संस्थान खोल दिये जाते हैं। फिर भी बेरोज़गारी कम नहीं हो रही। सरकार परेशान है। जनसंख्या दिनोंदिन कीट-पतंगों की भांति बढ़ती ही जा रही है। सबके लिए शिक्षा का प्रबन्ध भी करना ही होगा। सो, मास्टरों की भर्ती आवश्यक है। लेकिन सरकारें जानती हैं-अति सर्वत्र वर्जयेत् लोग ज़्यादा पढ़-लिख लेंगे तो लोकतन्त्र के लिए ख़तरा उत्पन्न हो जाएगा इसलिए गली-गली में स्कूल भले ही खोल दिये गए हों किन्तु शिक्षकों की संख्या सीमित रखी गई है। इस देश में हज़ारों स्कूल ऐसे हैं जो एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। यह शिक्षक विद्यार्थियों को अकेले ही ज्ञान देगा और तमाम सरकारी पचड़े भी निपटाएगा।
 लोकतान्त्रिक सरकार को यह बिल्कुल पसन्द नहीं कि गुरु की महिमा नेता से बड़ी हो। इसे ध्यान में रखते हुए उसने बहुत ठोक-बजाकर नियम-क़ानून बना दिये हैं। दो कौड़ी का मास्टर क्या खाकर नेताओं से टक्कर लेगा? वह तो अपनी नौकरी पक्की करवाने के लिए ही आजीवन चप्पलें घिसता रहेगा। कभी प्राचार्य उसकी गोपनीय चरित्रावली बिगाड़ देंगे, कभी विद्यार्थी उसपर उत्पीडऩ का आरोप लगाकर जीवन दूभर कर देगा। सरकार के सामने सीधे खड़े होने की हिम्मत उसमें कभी नहीं होगी। सच मानिए, मास्टरों के कंधों पर इतनी ज़िम्मेदारियों का बोझ लाद दिया गया है कि वे स्वतन्त्र होकर कुछ सोच ही न सकें। उन्हें पूरे देश की जनगणना करवानी है, एक-एक बच्चे की सेहत का ध्यान रखना है। उन्हें पोलियो की दवा पिलवानी है, स्कूल में भरपेट पौष्टिक आहार उपलब्ध करवाना है। ग्राम-पंचायत और नगरीय निकाय से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक के चुनावों का जिम्मा उन्हीं के सिर पर है। ईमानदारीपूर्वक मतदाता सूची बनवाने से लेकर मतदान और मतगणना तक का कार्य उन्हें अपने माथे पर बिना कोई शिकन लाए निपटाना है। यदि इन कामों में तनिक भी ग़लती हुई तो नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा। उस नौकरी से, जिसके स्थायी होने के इन्तज़ार में पूरी उम्र भी निकल सकती है।
 तमाम गुरूजियों की हवा निकाल दी है सरकार ने। बहुत फूले-फूले फिरते थे। स्थायी नियुक्तियाँ ही बन्द कर दीं। शिक्षा में गुणवत्ता के नाम पर सेमेस्टर पद्धति लाद दी गई सो अलग। विद्यार्थियों की परीक्षा का तनाव ख़त्म कर दिया गया। कोई आत्महत्या न करे इसीलिए पढ़ाई आसान कर दी गई। अब एक साल में दो सेमेस्टर होंगे, दो मुख्य परीक्षाएँ और चार सतत् मूल्यांकन परीक्षाएँ होंगी। सतत् मूल्यांकन में शिक्षक किसी को अनुत्तीर्ण नहीं कर सकता, न किसी विद्यार्थी को अनुपस्थित दर्शा सकता है। सरकार का स्पष्ट आदेश है- ''विद्यार्थी जब तक उत्तीर्ण न हो, तब तक उसकी परीक्षा ली जाए। ऐसे में भला क्या मास्टर को पागल कुत्ते ने काटा है जो पहली ही बार विद्यार्थी को उत्तीर्ण न कर अनन्त काल तक उसकी परीक्षाएँ लेता रहेगा? यदि नियमों की बदौलत विद्यार्थियों की बल्ले-बल्ले’  हो गई तो शिक्षक ने अपने  बल्ले-बल्ले’  का रास्ता ख़ुद ही निकाल लिया। इसे कहते हैं- तू डाल-डाल तो मैं पात-पात।
 कलियुग में शिक्षक मन्त्रियों के स्टाफ़ में तैनात किये जाते हैं। सचिव और सहायक के तौर पर मन्त्रियों की पहली पसन्द शिक्षक ही होते हैं क्योंकि वे स्वभाव से कायर, डरपोक, विनम्र और दीन-हीन होते हैं। समाज में उनकी कोई पूछ-परख नहीं है। यह मान्यता हो गई है कि जो सर्वाधिक तुच्छ हैं, वही अब शिक्षक बन जाते हैं क्योंकि उनमें कुछ और बनने की योग्यता नहीं होती। ब्याह के बाज़ार में भी उनके दाम बहुत कम हैं। लिपिक और भृत्य के दाम उनसे अधिक हैं क्योंकि उनके पद स्थायी होते हैं और यह सर्वविदित है कि वर्तमान में ज़बरदस्त राजनीतिक पहुँच वाला प्रत्याशी ही ऐसे पदों को सुशोभित कर सकता है। अब मास्टर तोताराम को ही ले लीजिए। वे एक आदर्श शिक्षक रहे हैं। समाज में उनकी प्रतिष्ठा भी है। अपने तीन-तीन बेटों में से एक को भी उन्होंने मास्टर नहीं बनाया। बड़े बेटे को खेती-बाड़ी में लगाया। दूसरे को किराने की दुकान खुलवा दी और तीसरे को कम उम्र में ही एक नेता का चमचा बनवा दिया।
 तोतारामजी ने हाल ही में एक पुस्तक लिखी है जिसके कारण इस छोटे-से शहर में उनकी ख़ूब चर्चा हो रही है। उनकी पुस्तक को पुरस्कार मिलने की भी ख़बर है। उन्हें सड़क पर, बाज़ार में और घर पहुँचकर बधाई देने वालों की ख़ासी तादाद है। वे कभी प्रसन्न तो कभी संकुचित मुद्रा में दिखाई देते हैं। कल तो आश्चर्यजनक बात हुई। एक विद्यार्थी ने तोताराम से कहा- मास्टरजी, मैं भी आप जैसा बनना चाहता हूँ। मुझे आशीर्वाद दीजिए।’  उन्होंने तत्काल पलटकर कहा- नहीं वत्स, मास्टर नहीं। नेता बनने की सोचो। मास्टर बनकर जीवन भर कष्ट भोगना कोई बुद्धिमानी का काम नहीं। पढ़-लिखकर लांछित होना असह्य होता है। नेता बनो, इसके लिए पढऩे-लिखने की कोई ज़रूरत नहीं। दादागिरी सीखो, दुष्टों-दुराचारियों की सोहबत में रहो। कोई बड़ा अपराध करके जेल की हवा खा आओ। अख़बार में फ़ोटो-वोटो छप जाएगी तो थोड़ा नाम हो जाएगा। फिर कोई-न-कोई राजनीतिक पार्टी तुमसे स्वयं हाथ मिला लेगी। भविष्य में टिकट देकर चुनाव में भी उतार सकती है। सम्भव है कि तब तुम मन्त्री भी बन जाओ। तुम्हारी सात पीढिय़ाँ तर जाएँगी। इष्ट-मित्रों, सगे-सम्बन्धियों और तुम्हारे परिजनों का भविष्य भी सँवर जाएगा।
  ‘लेकिन मास्टरजी, लोग क्या कहेंगे?  विद्यार्थी ने साश्चर्य पूछा। किन लोगों की बात कर रहे हो तुम ? राजनेता और मन्त्री आम जन की परवाह नहीं करते। वे सिर्फ़ देश की चिन्ता करते हैं। उन्हें तो ज़मीन पर पाँव रखने की भी फुर्सत नहीं होती। वे सूरज और चाँद तक नहीं देख पाते। आरामदेह कुर्सी पर बैठे-बैठे उनका पूरा जीवन हवाई यात्राओं, वातानुकूलित भवनों, सेवकों और सुरक्षाकर्मियों की फ़ौज के बीच अलौकिक सुख भोगते हुए बीत जाता है। उस आनन्दमय जीवन की गति इतनी तीव्र होती है कि पाँच वर्षों तक पता ही नहीं चलता कि समय कैसे बीत गया? जब पाँच साल बाद पुन: चुनाव होते हैं तभी उन्हें कुछ दिनों के लिए धूल भरी सड़कों पर पैदल चलकर वोट माँगना पड़ता है, ग़रीबों के सिर पर आश्वासन भरा हाथ फेरना पड़ता है, मन्दिरों में भगवान और पुजारी से आशीर्वाद लेना पड़ता है, स्कूल के शिक्षकों के प्रति भी विनम्रता प्रदर्शित कर उन्हें अपना मार्गदर्शक स्वीकारना होता है। यह सब तो तुम पहले चुनाव में ही सीख जाओगे, फिर हर पाँचवें बरस इसे दोहराना होगा, बस। तुम भी किसी मास्टर को अपना सचिव बना लेना। वह सब कुछ नोट करके रखेगा और समय पर याद दिलाता रहेगा।
  यह सब सुनकर विद्यार्थी हैरान-परेशान था। तोताराम से वह बहुत प्रभावित था। वह उनके पास दिशानिर्देश के लिए बड़ी उम्मीद लेकर आया था। उसके पास उच्च शिक्षा के लिए पैसे नहीं थे। अपने उज्ज्वल भविष्य की चिन्ता उसे खाये जा रही थी। पर मास्टरजी ने कहा- तुम्हारा क़सूर यह है कि तुम अनुसूचित जाति, जनजाति या अल्पसंख्यक के घर पैदा नहीं हुए अन्यथा सरकार तुम्हें उच्च शिक्षा और नौकरी-दोनों में सहर्ष आरक्षण देती। तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल हो जाता। लेकिन ऊँची जाति में ग़रीब माँ-बाप के घर जन्म लेकर तुम डॉक्टर-इन्जीनियर नहीं बन सकते। ऐसे में उज्ज्वल भविष्य का एक ही मार्ग है, जो मैंने तुम्हें बता दिया।’  वे दूरभाष पर वार्तालाप में व्यस्त हो गए।
  इस वर्ष चुनाव के दौरान हृदयाघात के कारण वे ड्यूटी नहीं कर पाए इसलिए आजकल निलम्बित चल रहे थे। उनका बेटा छुटकू कह चुका है कि अब उन्हें स्कूल में पाँव रखने की ज़रूरत नहीं। वे सेवा में ससम्मान वापस लिये जाएँगे, पर अब मास्टरी नहीं करेंगे। उन्हें किसी मन्त्री के स्टाफ़ में नियुक्त किया जाएगा। जिस नेता ने छुटकू को यह आश्वासन दिया था, उसी ने साँठ-गाँठ कर तोताराम की पुस्तक को साहित्य अकादमी का पुरस्कार दिलवाया है।
  तोतारामजी पान चबाते हुए बोले- बेटा, याद रखो कि इस देश में नेता ही भगवान है। सब लोग उसी की पूजा कर अपना जीवन धन्य बनाते हैं। उससे बड़ा कोई नहीं हो सकता। समझ गए न? तुम इस देश के भविष्य हो। आज मुबारक मौक़े पर आये हो। मेरी ओर से यह भेंट लो और जाओ। सदैव प्रसन्न रहो।
  घर पहुँचकर विद्यार्थी ने उपहार का बण्डल खोला। उसमें तोताराम की पुस्तक थी, जिसका शीर्षक था- अगले जनम मोहे मास्टर न कीजो।


 लेखक परिचय- डॉ. गीता गुप्त, शासकीय हमीदिया महाविद्यालय भोपाल में हिन्दी की प्रोफ़ेसर। हिन्दी की विभिन्न विधाओं यथा- कहानी, कविता, व्यंग्य एवं समसामायिक मुद्दों पर नियमित लेखन। देश की विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। हाल ही में समसामयिक लेखों पर दो पुस्तकें- 1.कुछ विचार कुछ प्रश्न 2. धरा हमारी कहती है। लेखन के साथ  पर्यटन, पर्यावरण-संरक्षण, योग एवं हिन्दी के विकास हेतु कार्य।  समाज सेवा में रूचि। आकाशवाणी और दूरदर्शन से रचनाओं का प्रसारण। सम्पर्क: ई- 182/2, प्रोफ़ेसर्स कॉलोनी, भोपाल- 462002, मोबाइल- 9424439324, Email- drgeetabpl@gmail.com