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Sep 15, 2017

हिन्दी का व्यवहार और विस्तार

हिन्दी का 
व्यवहार
और  विस्तार
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
सितम्बर का महीना आता है , तो हिन्दी के लिए हिन्दी का ज्वार उमड़ आता है। इसके  बाद फिर गहन शीत निद्रा में चले जाते हैं। इस तरह हिन्दी का विस्तार सम्भव नहीं। यूनिकोड के प्रचलन ने टंकण की सुविधा प्रदान की है। मेरे सम्पर्क में ऐसे भी कई साथी हैं, जो 73-83 की अवस्था के हैं । वे अपने  लेखन में यूनिकोड को अपनाकर धड़ल्ले से काम कर रहे हैं। कुछ ऐसे भी हिन्दी -प्रेमी हैं, जो बड़ी शान से कहते हैं कि मैंने कम्प्यूटर सीखा ही नहीं। एक तो ऐसे साथी भी मिले, जिन्होंने अन्तर्जाल पर प्रकाशन का  सरेआम विरोध किया । कई तरह के फोण्ट -परिवर्तक मौजूद हैं , फिर भी कुछ लोग दोषपूर्ण  अप्रचलित फोण्ट में टंकण करके न जाने कितने सम्पादकों का सिर दर्द बने हुए हैं। वे किसी भी हालत में अपने बनाए घेरे से बाहर नहीं आना चाहते।
प्रेम का अर्थ आत्मीयता होता है। आत्मीयता हवा में प्रकट होना वाला जादू नहीं। हिन्दी के ऐसे बहुत से प्रेमी मिल जाएँगे , जो साधन सम्पन्न होने पर भी हिन्दी का अखबार तक नहीं खरीदना चाहते। पत्रिकाओं के पूरे पते, मूल्य, मूल्यराशि भेजने के लिए बैंक की जानकारी होने पर भी यह पूछेंगे कि अमुक पत्रिका कैसे मँगाए। उनका मतलब मुफ़्त में प्राप्त करने के सिवाय दूसरा नहीं।उनके  ड्राइंग रूम में महँगा टी वी तो मिलेगा, लेकिन पुस्तक नहीं मिलेगी। बहुत सारे ऐसे लेखक हैं , जो केवल लेखक हैं। वे न किसी की किताब खरीदेंगे, न पढ़ेंगे। मुफ़्त में मिल जाए ,तो लपक लेंगे। कभी यह सूचित करने  का कष्ट भी नहीं करेंगे कि उनको वह पुस्तक कैसी लगी। लोग उनको पढ़ें, वे इतने बड़े होते हैं किसी को पढ़ना ,पढ़कर सराहना करना तौहीन समझते हैं। जन-मन को कैसा साहित्य चाहिए , इसके लिए ज़रा भी श्रम नहीं करेंगे। जिस वर्ग के लिए वे लिख रहे हैं, क्या वे उनकी पठन अभिरुचि से परिचित हैं। कुछ लिखते या छपते बाद में हैं, पहले यह योजना बनाना चाहते हैं कि उनकी पुस्तक को पुरस्कार मिले तो कैसे ? उनके लिए यह जुगाड़-धर्म ही साहित्य की सेवा है।
कुछ का काम है ,हिन्दी की संस्थाएँ बनाकर चन्दा उलीचना।  गली -मुहल्ले या शहर में संस्थाएँ बनाकर यश-पिपासु साहित्यकारों को पुरस्कार देना या सम्मानित करना। शॉल और नारियल और  पाँच रुपये का प्रमाण-पत्र देकर हिन्दी का कल्याण कर लेते हैं। यह संक्रामक रोग भारत से बाहर भी अपने पैर पसार चुका  है। खुद ही अध्यक्ष, खुद ही सचिव ,संस्था के नाम से पहले अन्तरराष्ट्रीय शब्द जोड़ दीजिए। साल में एक बार कविता पाठ कर दीजिए। बस हो गया हिन्दी का विकास। लोगों में चर्चित होना हो, तो ट्रक पर लदकर कविता में दहाड़ते हुए नगर -परिक्रमा कर लीजिए। कुछ लोग तरह -तरह की प्रतियोगिताएँ कराएँगे,पंजीकरण के नाम पर कुछ राशि अग्रिम ले लेंगे, खुद ही निर्णायक बन जाएँगे। । वे जिस विधा में न लेखन करते हैं, न कोई उनको जानता है, उस विधा में प्रतिभागियों को  प्रथम , द्वितीय, तृतीय और सान्त्वना पुरस्कार देकर हिन्दी की सेवा कर लेते हैं। इन छद्म हिन्दी सेवियों को पहचाने की आवश्यकता है।
कुछ संस्थाओं में ऐसे लोग भी घुस जाते हैं, जिनका उद्देश्य येन केन प्रकारेण सरकारी   अनुदान झटकना है। तब यह प्रश्न उठता है कि हिन्दी की सच्ची सेवा कौन कर  रहा है? आज भी ग्रामीण अंचल में जाकर देखिए, कबीर सूर , तुलसी और मीरा की वाणी  से अनपढ़ भी अनजान नहीं है। लोक भाषा और बोलियों में लोकगीत , लोककथाएँ   अनगिन लोगों का हृदय-हार बनी हैं। हिन्दी भाषा और साहित्य को उन्नत करना है , तो हमें ‘लोक’ से जुड़ना पड़ेगा, उसकी धड़कन से परिचित होना पड़ेगा। छोटी-छोटी सरिताएँ अगर गंगा या यमुना में आकर नहीं मिलेंगी वे सदानीरा नहीं रह पाएँगी। हमें हिन्दी की लोक-भाषा -बोली से भी कुछ ग्रहण करना पड़ेगा, उसकी  चेतना को  समझना पड़ेगा। गाँव से निरन्तर पलायन के कारण कल अगर ये बोलियाँ गुम होती हैं , तो हिन्दी की सम्पन्नता घटेगी।
हिन्दी को आगे बढ़ाने के लिए केवल हिन्दी से अनुराग ही पर्याप्त नहीं, उसका सम्मान भी ज़रूरी है। जिन विद्यालयों में हिन्दी बोलने पर छात्रा दण्डित किए जाते हैं, अब उनको दण्डित करने का समय  आ गया। जो राजनेता भाषायी दुराग्रह खड़ा करके भारतीय भाषाओं को जोड़ने की बजाय सौहार्द को समाप्त करना चाहते हैं, उनको किनारे करने का समय आ गया। हिन्दी का अधिकतम व्यवहार ही उसके विस्तार को सुनिश्चित करेगा।
सम्पर्क - सी-1702,जे एम अरोमा , सेक्टर-75, नोएडा-201301 , उत्तरप्रदेश, मोबा-09313727493

संस्कृत हमारी महारानी है हिन्दी बहूरानी

संस्कृत हमारी महारानी है 
हिन्दी बहूरानी
- सत्या शर्मा ' कीर्ति '
गुजरे हुए सालों को हम देखें ,तो आज का दौर  हिन्दी  के स्वर्णकाल का दौर कहा जा सकता है।
हमारी  हिन्दी आज सिर्फ देश की ही भाषा नहीं रही;बल्कि पूरी दुनिया में फैल चुकी है।
एक सर्वे के आधार पर हम गर्व कर सकते हैं कि आज हिन्दी एक ऐसी भाषा है ,जो दुनिया में सर्वाधिक बोली जाती है,जिसकी लोकप्रियता भारत के अलावा तमाम पड़ोसी देशों में है।
 हिन्दी  के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि यह बिना किसी सत्ता के सरंक्षण के जनभाषा के रूप में आगे बढ़ रही है।
आज वैश्वीकरण का दौर है,अर्थात्  सीधे - सीधे बाजारबाद । अब हर संस्कृति , हर विचार एक उत्पादन में तब्दील हो बाजार में बिकने को तैयार हैं। जाहिर है बेचने के लिए उस भाषा की जरूरत होती है, जो आम भाषा हो।
आज हिन्दुस्तान बहुत बड़ा बाजार है , अतः  हिन्दी  अपनी पैठ बना रही है ।इसकी लोकप्रियता का अनुमान इस तरह भी लगाया जा सकता है कि आज दुनिया भर के विश्व विद्यालयों में  हिन्दी  पढाई जा रही है।इसके लिए हमारे  हिन्दी  सिनेमा के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता ,जो विश्वपटल पर अपनी साख बना रहा है।
इंटरनेट ने भी आज क्रांति -सी ला दी है।  अब अनेक लेखक , पाठक और  हिन्दी  प्रेमी बेहिचक अपनी बातों का आदान-प्रदान कर रहे हैं।
ब्लॉग और वेवसाइट  हिन्दी  की नयी कहानी लिख रहे हैं। आज  हिन्दी  के ग्राहकों की संख्या बढ़ी है अधिकतर लोगों की रोज़ी -रोटी की भाषा बन चुकी है।
मैं तो इतना ही कहूँगी कि मैं  हिन्दी  को माँ जैसा ही प्यार करती हूँ। हिन्दी  में सोचती हूँ ,  हिन्दी  में बात करती हूँ  हिन्दी  में गुनगुनाती हूँ ।
 हिन्दी  पर गर्व करती हूँ।
अंत में  हिन्दी  के साधक और कर्मयोगी कॉमिक बुल्के का कथन- ‘संस्कृत हमारी महारानी है, हिन्दी  बहूरानी।’
सम्पर्क डी-2, द्वितीय तल, महाराणा अपार्टमेण्ट, पी पी कम्पाउण्ड, राँची-834001( झारखण्ड), मो- 8083986263

आस्था का खौफनाक चेहरा

   आस्था का खौफनाक चेहरा
 - डॉ. महेश परिमल
कहा गया है कि धर्म का नशा अफीम से भी खतरनाक होता है। हमारे देश में धर्म के नाम पर बहुत कुछ ऐसा होता रहा है, जो नहीं होना चाहिए। धर्म की राजनीति क्या होती है, यह सभी जानते हैं, पर राजनीति का धर्म क्या होता है, यह कोई नहीं जानता। आज धर्म को राजनीति से ऐसे जोड़ दिया गया है कि पता ही नहीं चलता कि कब धर्म की बात हो रही है, कब राजनीति की बात हो रही है। वास्तव में हमारे देश में जितने भी आस्था के केंद्र हैं, वे सभी राजनीति के शिकार हैं। नहीं भी हैं, तो उसे बना लिया जाता है। अभी तो दो बाबा जेल में हैं, पर सभी बाबाओं पर ईमानदारी से कार्रवाई हो, तो देश के जेलें छोटी पड़ने  लगेंगी। देखा जाए, तो बाबाओं के ये डेरे वास्तव में आस्थाओं के खौफनाक चेहरे हैं। जो कभी राजनीति में चमकते हैं, तो कभी धर्म के नाम पर लोगों के दिलों में जगह बनाते हैं। देश के सारे बाबाओं को राजनीति का संरक्षण मिलता ही रहता है, तभी ये इतने फलते-फूलते हैं। बिना राजनीतिक संरक्षण के ये आगे बढ़ ही नहीं सकते।
राजनीति का संरक्षण पाकर पहले तो ये कथित बाबा अपना आश्रम बनाते हैं। इसके लिए जमीन शासन की तरफ ही मुहैया की जाती है। फिर ये अपने अनुयायी बनाना शुरू करते हैं, इसके बाद वे अपनी ही समानांतर सरकार बनाने लगते हैं। अनुयायियों की संख्या के आधार पर बाबाओं का रुतबा बढ़ने लगता है। इसके बाद प्रदेश में जो भी सरकार हो, बिना इस सरकार के कुछ भी होना संभव नहीं हो पाता। प्रादेशिक स्तर पर इन बाबाओं का इतना प्रभाव होता है कि सरकार ही पलटकर रख दें। इन बाबाओं पर सीधे हाथ भी नहीं डाला जा सकता ; क्योंकि धर्म के आड़ में इनके यहाँ अस्पताल, कॉलेज, सेवाभावी संस्थाएँ चलती हैं। अनजाने में वे सरकार की सहायता ही करते रहते हैं। ऐसे में उन्हें छेड़ना सरकार को उचित नहीं लगता। वास्तव में जो काम सरकार को करना चाहिए, वह इन बाबाओं की सरकार करती है। एक आम आदमी को आखिर क्या चाहिए? तमाम सुविधाएँ। सरकारी कार्यालयों में उनके काम आसानी से हो जाएँ। ऐसा सरकार कर नहीं पातीं, क्योंकि सरकारी कर्मचारी ही कामचोर हैं। इससे इन बाबाओं के अनुयायी बन जाने पर उसे वे तमाम सुविधाएँ मिल जाती हैं, जो अब तक उनसे दूर थीं। बाबाओं के अस्पताल में इलाज, उनके स्कूल-कॉलेज में बच्चों की पढ़ाई, उसके बाद बाबा के ही कहने पर नौकरी और शादी भी हो जाती है। इससे बाबाओं के भक्तों की संख्या भी बढ़ती और उधर बाबाओं का रुतबा भी। जो सरकारी कर्मचारी आम आदमी के कामों को करने में आना-कानी करते, वही कर्मचारी इन बाबाओं के अनुयायियों का काम बिना किसी हुज्जत के करते हैं। तो ऐसे में साधारण आदमी क्यों न बने इन बाबाओं का अनुयायी।
जहाँ सरकारी तंत्र विफल होता है, वहीं से शुरू हेती है बाबाओं की सरकार। सरकारी तंत्र की विफलता का यह बाबा पूरा लाभ उठाते हैं। देश में नक्सली आतंकवाद बढऩे के पीछे भी यही कारण है। जो काम सरकार को करना चाहिए, वह नक्सली या फिर ये कथित बाबा करते हैं। ऐसे में उनकी तरफ झुकाव स्वाभाविक है। जब आम आदमी देखता है कि मंत्री, अफसर, नेता जब बाबाओं के दरवाजे पर मत्था टेकते हैं, तो फिर वे टेकें, तो बुरा क्या है? यही आम आदमी गच्चा खा जाता है। मंत्री-नेता-अफसर तो अपने स्वार्थ के कारण इन बाबाओं की शरण में जाते हैं, पर आम आदमी इनकी शरण में जाकर पहले तो खूब पाता है, बाद में काफी कुछ खो देता है। उसका पाना सभी को दिखाई देता है, पर उसका खोना किसी को भी दिखाई नहीं देता। वह कानून की सहायता लेना चाहे, तो भी नहीं ले सकता। क्योंकि बाबाओं के आदमी चारों तरफ होते हैं। बाबाओं की तरफ उठने वाली उँगली काट दी जाती है। उनकी तरफ उठने वाली आँखें निकाल दी जाती हैं। इन बाबाओं के विशाल आश्रम में श्मशान और कब्रिस्तान भी होते हैं, जहाँ कई लाशें दफना दी जाती हैं या फिर जला दी जाती हैं। इसका कोई हिसाब-किताब नहीं होता। आस्था के नाम पर इन आश्रमों में वह सब-कुछ होता है, जो नहीं होना चाहिए। बाहर से दिखाई कुछ और देता है, पर अंदर जो होता है वह बहुत ही वीभत्स होता है।
सरकार वोट के कारण इन बाबाओं की शरण में होती है। जिस बाबा के जितने अधिक अनुयायी, उसका उतना ही दबदबा सरकार पर होता है। बाबा के एक इशारे पर लाखों वोट नेताओं को मिल जाते हैं, तो फिर नेता क्यों न इन बाबाओं के पिछलग्गू बनें? इन कथित आश्रम से ही सरकार चलती है। कई बाबाओं को आज भी वीआईपी ट्रीटमेंट मिलता है। आखिर किस वजह से? हर नेता का अपना एक बाबा होता ही है और हर बाबा के कई नेता उनके चंगुल में होते हैं। इन लोगों का चोली-दामन का साथ होता है। जनता के सामने ये बाबा चमत्कार करते हैं, जनता उनकी अनुयायी हो जाती है। इसी जनता के नाम पर ये बाबा नेताओं को ब्लेकमेल करते हैं। जनता को मिलने वाली सारी सरकारी सुविधाएँ बाबाओं को मिलने लगती है। फिर बाबा अपनी सरकार बनाकर ये सुविधाएँ जनता को देते हैं। सरकार की नाकामी का नतीजा हैं बाबाओं की सरकार।
इस समय देश में बाबाओं के न जाने कितने आश्रम चल रहे हैं, आज तक किसी भी सरकार ने इन आश्रमों पर छापा नहीं डाला। न केंद्र सरकार की हिम्मत हुई और न ही राज्य सरकार ने साहस दिखाया। अधिकतर नेताओं का काला धन इन्हीं आश्रमों में ही है। सरकार, नेता, पुलिस को अच्छी तरह से मालूम होता है कि इन आश्रमों में क्या हो रहा है? पर हिम्मत नहीं होती, इन बाबाओं पर हाथ डालने की। हाथ डाला, तो सरकार जा सकती है, नेतागिरी खत्म हो सकती है और अफसरों की अफसरी खत्म हो सकती है। इसी डर के कारण ये आश्रम फल-फूल रहे हैं। देश में धर्म के नाम पर एक समानांतर सरकार चल रही होती है। इन्हें छेड़ने का साहस कोई नहीं कर पाता। हाँ, जब ये आश्रम एय्याशी का अड्डा बन जाते हैं, जब अति होने लगती है। बाबा सरकार को चुनौती देने लगते हैं, तब कानून की आड़ में सरकार उस बाबा की सल्तनत को ध्वस्त करने की कोशिश करती है। आसाराम-गुरमीत तो मोहरा मात्र हैं, इनके पीछे के कनेक्शन को जिस दिन ये आम जनता जान जाएगी, तो कई सफेदपोश खौफनाक चेहरे समाज के सामने आएँगे, जिसके बारे में किसी ने अभी तक सोचा ही नहीं था।
Email- parimalmahesh@gmail.com

पर्व- संस्कृति

पितरों का तर्पण विष्णु की नगरी गया में
हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष का 15 दिन पितरों के लिए समर्पित होता है। इस समय में पितरों को पिंडदान देना उनको मोक्ष प्राप्ति सहज बनाता है। वैसे तो पितरों को तर्पण आदि घर पर भी किया जा सकता है, लेकिन गया में पितरों को पिंड दान देने का ख़ास महत्त्व है। ऐसा माना जाता है कि गयासुर को भगवान विष्णु के वरदान के कारण यहाँ से पिंड दान पाकर पितर मोक्ष को प्राप्त होते हैं। यहाँ पर स्वयं माता सीता ने अपने स्वसुर दशरथ जी को पिंड दान दिया था।
क्यों करते हैं गया में पितृ-पक्ष का पिंडदान
 गया की चर्चा मोक्ष की नगरी के रूप में विष्णु पुराण और वायु पुराण में की  गई  है। इसे विष्णु का नगर भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है की भगवान विष्णु यहाँ स्वय पितृ देवता के रूप में विराजमान हैं इसलिए गया को पितृ तीर्थ भी कहा गया है। गया में फल्गु नदी और पुनपुन नदी में पिंड दान करने का विधान है।
एक कथा के अनुसार भस्मासुर के वंशज गयासुर ने कठोर तप कर ब्रम्हा जी को प्रसन्न कर लिया और ब्रम्हा जी से यह वरदान माँगा की मेरा शरीर देवताओं को तरह पवित्र हो जाये और मेरे दर्शन मात्र से जीव सभी पापों से मुक्त हो जाएँ और उसे स्वर्ग की प्राप्ति हो। इस वरदान से स्वर्ग की व्यवस्था विगड़  गई  और स्वर्ग में लोगों की संख्या बढऩे लगी। लोगों में पापों की प्रवृत्ति बढ़  गई  और लोग यह सोचकर कि गयासुर के दर्शन से सभी पाप नष्ट हो जाएँगे कहकर पाप कर्म करने से डरते नहीं थे।
इससे अव्यवस्था से बचने के लिए देवताओं ने गयासुर से यज्ञ के लिए पवित्र भूमि की याचना की। देवताओं को गयासुर ने अपना पवित्र शरीर ही दान कर दिया। उसने समझा मेरे शरीर से पवित्र कोई भूमि नहीं हो सकती। अत: वह ज़मीन पर लेट गया और उसके शरीर पर यज्ञ हुआ; लेकिन गयासुर के मन से लोगों को पवित्र करने की इच्छा नहीं गई। उसने देवताओं और विष्णु से वरदान माँगा की जो कोई इस पवित्र भूमि में पूजन करे उसको मोक्ष की प्राप्ति हो। जो भी लोग यहाँ किसी को पिंडदान करे उसे मोक्ष की प्राप्ति हो। देवताओं ने गयासुर को यह वरदान सहर्ष दे दिया। गयासुर जब धरती पर लेटा ,तो उसके शरीर ने पाँच कोस के क्षेत्रफल को ढक लिया। और इस प्रकार यह स्थान पवित्र पितृ तीर्थ गया के नाम से विख्यात हुआ। यही कारण है की पितरों को पिंडदान देने यहाँ देश विदेश से लोग आते हैं
विष्णुपद मंदिर की कथा और गयासुर
एक और कथा इस प्रकार है- एक बार दैत्य राज गयासुर ने कठोर तप कर वरदान प्राप्त कर लिया था की जो कोई उसको देखेगा उसको मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी। मोक्ष की प्राप्ति  के लिए जीवन पर्यन्त सही कर्म करने होते हैं। गयासुर के इस वरदान के कारण लोग पाप कर्म करने लगे और गयासुर के दर्शन कर पापरहित होकर वैकुण्ठ पहुँच जाते थे। यमराज को इस बात की चिंता हुई। इस अव्यवस्था से बचने के लिए उन्होंने विष्णु की स्तुति की। भगवान विष्णु ने बुरे कर्म करने वालों को मोक्ष की प्राप्ति रोकने के लिए गयासुर को पाताल लोक में जाने को कहा। इसके लिए विष्णु ने अपने चरण गयासुर के छाती पर रख दिया।  गयासुर धरती के अंदर चला गया। आज भी गया सुर के शरीर पर विष्णु पद चिह्न है। उस स्थान पर भव्य  विष्णु पद मंदिर बना है।  यह पद चिह्न 9 प्रतीकों से युक्त है जिसमे शंख चक्र और गदा शामिल हैं।
धरती के अंदर समाहित गयासुर ने भगवान विष्णु से अपने लिए आहार की याचना की और भविष्य में अपने लिए उपयुक्त कर्म भी पूछे। भगवन विष्णु ने उसे वरदान दिया कि प्रत्येक दिन कोई न कोई तुम्हें भोजन दे जाएगा। जो कोई तुम्हें भोजन कराएगा ,उसे स्वर्ग या मोक्ष की प्राप्ति होगी। ऐसी मान्यता है कि जिस दिन गयासुर को भोजन नहीं मिलेगा ,वह धरती से बाहर निकल आएगा।
प्रत्येक दिन इस मंदिर में देश -विदेश से लोग आतें हैं और अपने पितरों की शान्ति के लिए विष्णुपद की पूजा करते हैं।

प्रेरक

                  जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण क्या है?
             संतुलन
इसे हम तीन युवकों के उदाहरण से समझने की कोशिश करेंगे। मान लें कि तीनों की उम्र 25 साल है।
पहला युवक एक साल में 24 लाख कमाता है (2 लाख रुपए प्रतिमाह)।
दूसरा एक साल में 12 लाख कमाता है (1 लाख रुपए प्रतिमाह)
और तीसरा एक साल में 3 लाख कमाता है (25 हजार रुपए प्रतिमाह)
क्या आप बता सकते हैं कि इन तीनों में से सबसे सुखी कौन होगा?
क्या पहले युवक को इतने अच्छे पैकेज पर काम करने के कारण सबसे अधिक सुखी नहीं होना चाहिए?
हो सकता है। लेकिन हमें अभी और डेटा चाहिए। हमारी जानकारियाँ पर्याप्त नहीं हैं। हम और अधिक सूचना एकत्र करेंगे।
पहला युवक अपने घर-परिवार से दूर रहता है। उसे सप्ताह में सातों दिन चौबीसों घंटे कारूरी फोन कॉल्स और असमय मीटिंग्स के लिए तैयार रहना पड़ता है।
दूसरा युवक अपने परिवार के साथ रहता है और उसे हर वीकेंड पर छु्ट्टी मिलती है। तीसरे युवक के साथ भी यही होता है।
अब बताइए कि इन तीनों में सबसे सुखी कौन है?
अब आपको लग रहा होगा कि पहले और दूसरे युवक में ही सबसे सुखी होने की खींचतान होगी, नहीं क्या?
लेकिन अभी हम थोड़ा और डेटा जुटाएंगे। हम इन तीनों के बारे में थोड़े और फैक्ट कलेक्ट करेंगे।
पहले युवक का परिवार बहुत अच्छा है लेकिन वह काम के दबाव के कारण उनके साथ बिल्कुल भी वक्त नहीं बिता पाता। वह ज्यादातर समय फ्रस्ट्रेटेड रहता है।
दूसरे युवक के घर का वातावरण बहुत खराब है। उसे घर खाने को दौड़ता है। काम जल्दी खत्म करके घर जाने को उसका कभी मन ही नहीं करता। वह भी ज्यादातर फ्रस्ट्रेटेड रहता है।
तीसरे व्यक्ति के घर में बहुत अच्छा पारिवारिक माहौल है ,लेकिन वह पैसों की कमी होने से सबकी ज़रूरतें पूरी नहीं कर सकता। वह भी अक्सर फ्रस्ट्रेटेड  रहता है।
अब बताइए कि इन तीनों में से सबसे सुखी कौन है? शायद कोई भी नहीं।
ये सभी व्यक्ति अपने-अपने कारणों से दुखी हैं। हर एक के दुखी होने की वज़ह दूसरे व्यक्ति से पृथक् है।
लेकिन एक कॉमन चीज है जो इन तीनों युवकों के मामले में मिसिंग है। कौन सी चीज?
उस चीज को हम ‘संतुलन’ कहते हैं। संतुलन अर्थात बैलेंस। शास्त्रों में इसे ‘समता’ कहा गया है।
जीवन के हर पक्ष में संतुलन का होना हमें सुखी, स्वस्थ, और प्रसन्न रखता है। अपने जीवन में संतुलन को बनाए रखने के लिए हर व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुरूप कर्म करना है। इस संतुलन को साधना बहुत कठिन है। जब एक पलड़ा भारी होता है तो दूसरा हल्का हो जाता है। जब दाँत होते हैं तो चने नहीं होते, जब चने होते हैं तो दाँत नहीं होते।
तीन युवकों के इस उदाहरण को आप जीवन में संतुलन के स्थान पर किसी और बात को समझने के लिए भी प्रयुक्त कर सकते हैं। लेकिन हर एनालिसिस में आप यही पाएँगे कि दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसे कोई दु:ख न हो। हर व्यक्ति की अपनी प्राथमिकताएँ और अपनी समस्याएँ हैं। अमीर हो या गरीब, कोई भी इनसे अछूता नहीं है।
किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन से क्या चाहिए ,इसे केवल वही व्यक्ति पहचान सकता है। किसी के लिए यह संतुलन हो सकता है, किसी के लिए कुछ और।
अपनी प्राथमिकताएँ डिफ़ाइन कीजिए। अपनी समस्याओं को पहचानिए। सामना हर चुनौती का कीजिए लेकिन यह भी जानिए कि आप हमेशा जीत नहीं सकते। जीत नहीं पाएँ तो दूसरी राह पकड़ लें, किसी नई दिशा और दशा की ओर। चलते रहने के सिवा कोई चारा नहीं है। है क्या? (हिन्दी ज़ेन से)