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Oct 22, 2013

नवरात्र -शक्ति का आत्म साक्षात्कार!

     नवरात्र
 -शक्ति का आत्म साक्षात्कार!                                    

- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
चिरंतन है भारतीय संस्कृति और चिंतन धारा ,जिसमें लोक एवं समाज के सर्वांगीण विकास के परिप्रेक्ष्य में समय-समय पर अनेक पर्वों-उत्सवों का विधान किया गया है। वासंतिक एवं शारदीय नवरात्र भी ऐसे ही षाण्मासिक यज्ञ हैं। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में वासंतिक तथा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि पर्यन्त शारदीय नवरात्र हैं, दशमी तिथि तो विजयदशमी है ही चैत्र और आश्विन मास में ऋतु विकास होता है, नई फसलें आती हैं एतदर्थ इष्ट  को नवान्न यज्ञादि द्वारा समर्पित कर उत्साहपूर्वक पूजन आराधन किया जाता है ।
श्री भगवद्गीता में कहा गया है-
इष्टां भोगान् ही वो देवा यास्यन्ते यज्ञ भाविता,
तैर्दत्ता न प्रदायैभ्यो यो भुक्ते स्तेन एव स। ...अर्थात् यज्ञादि से सम्मानित देवता मनुष्यों की इच्छाओं को पूरा करेंगें किन्तु जो मनुष्य देवों द्वारा प्रदत्त पदार्थों को उनको अर्पित किए बिना उपभोग करे ,वह तस्कर है। अत: प्रभु से प्राप्त पदार्थ पहले अपने इष्ट -अभीष्ट देव को ही उत्साह पूर्वक समर्पित किए जाते हैं। ऐसा ही पर्व नवरात्र पर्व भी है।
अस्तु, नवरात्र पर्व में विशेष रूप से भगवती देवी दुर्गा की ही आराधना का विधान है क्योंकि नवरात्र में ही देवी दुर्गा का अवतार हुआ था। श्री दुर्गासप्तशती के प्रथम अध्याय में मेधा मुनि ने राजा सुरथ और वैश्य के प्रति इस आख्यान का निरूपण किया। ऋषि ने कहा ...
नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततं ।।
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम
देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा ।।
उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते
योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते ।।
अर्थात वास्तव में तो वह देवी नित्यास्वरूपा ही  हैं। सम्पूर्ण संसार उन्ही का रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्व को व्याप्त कर रखा है, तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकार से होता है। वह मुझसे सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं फिर भी देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए प्रकट होने पर लोक में उत्पन्न हुई कहलाती हैं। महाप्रलय के उपरान्त चारों ओर जल ही जल व्याप्त था। शेषशैया पर योग निद्रा में लीन भगवान श्री विष्णु जी की नाभि से कमल और कमल से ब्रह्मा जी का प्रादुर्भाव हुआ। तदन्तर प्रभु के कर्ण-मैल से मधु और कैटभ नामक दो असुर उत्पन्न हुए। दोनों के ब्रह्मा जी को मारने के लिए उद्यत होने पर ब्रह्मा जी ने भक्ति पूर्वक योगनिद्रा की स्तुति की। योगनिद्रा भगवान श्री विष्णु जी के अंग प्रत्यंगों से निकल कर ब्रह्मा जी को दर्शन देने के लिए उपस्थित हो गईं और प्रभु भी योगनिद्रा से मुक्त हो शेष -शय्या पर आसीन हो गए। तत्पश्चात् ब्रह्मा जी को मारने के लिए उद्यत दोनों असुरों से प्रभु का अनन्त काल  तक बाहुयुद्ध हुआ। भगवान की माया से मोहित असुरों ने भगवान से कहा कि हम तुम्हारे युद्ध कौशल से प्रसन्न हैं, इच्छित वर माँगो। भगवान ने कहा कि यदि ऐसा है तो मुझे वर दो कि तुम दोनों मेरे हाथ से मारे जाओ। प्रभु की माया से मोहित दैत्यों ने चारों ओर जल ही जल देख प्रभु से जहाँ जल न हो वहाँ उनका वध करने के लिए कहा। प्रभु ने जंघा पर दोनों दैत्यों का सिर रखकर चक्र से उनका वध किया। भगवान् से उत्पन्न होकर यही महामाया दशभुजा महाकाली के रूप में प्रसिद्ध हुईं।
एक अन्य प्रसंग में देवासुर संग्राम में देव पराजित हुए और दैत्यराज महिषासुर स्वर्ग में देवराज इंद्र के सिंहासन पर आरूढ़ हो गए। अत्यंत दुखी देवगणों ने श्री ब्रह्मा जी को अग्रसर कर श्री महादेव जी और भगवान विष्णु जी से अपनी व्यथा कही। रोष से युक्त श्री विष्णु जी के मुख से एक दिव्य तेज प्रकट हुआ। श्री दुर्गासप्तशती के दूसरे अध्याय में कहा है-
अतुलं तत्र तत्तेज: सर्वदेवशरीरजं।
एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा।।
इस प्रकार वह तेज श्री ब्रह्मा जी, महादेव एवं अन्य देवताओं से उत्पन्न तेज से मिश्रित हो एक दिव्य-शक्ति संपन्न देवी के रूप में परिणत हो गया। दैत्यराज महिषासुर से त्रस्त देवगण भगवती के दिव्य रूप तथा तेज को देख बहुत प्रसन्न हुए। पुन: श्री विष्णुजी, ब्रह्माजी, शिवजी तथा अन्य देवताओं ने अपने अपने अस्त्र-शस्त्रों से अन्य शस्त्रास्त्र प्रकट कर भगवती देवी को अर्पित किए। इस प्रकार सर्वांग पूर्ण तेजोमयी और अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित देवी ने महिषासुर और उसकी आसुरी सेना का मर्दन किया तथा आज भी अपने वचनों के अनुसार न केवल देवों के अपितु प्राणिमात्र के कल्याण के लिए समय समय पर उपस्थित होती हैं ।
और भी मार्कंडेय ऋषि द्वारा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला उपाय पूछे जाने पर परमपिता ब्रह्मा जी ने देवी कवच में देवी दुर्गा के नौ रूपों  शैलपुत्री ,ब्रह्मचारिणी , चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्री, महागौरी तथा सिद्धिदात्री के आराधन का कथन किया। नवरात्र के प्रथम दिवस शैलपुत्री के रूप में पूजित देवी तन के साथ मानसिक दृढ़ता की प्रतीक हैं। ब्रह्मचारिणी कर में कमल,अक्षमाला, कमण्डलु धारण किए तपस्विनी रूपा हैं तथा ब्रह्म स्वरूप की प्राप्ति कराने वाली हैं। आह्लादकारी चन्द्रमा को धारण करने वाली चंद्रघंटा हैं। कुत्सित ऊष्मा अर्थात् त्रिविध ताप युक्त विश्व को उदर में धारण करने वाली कूष्मांडा, स्कन्द की माता होने से स्कंदमाता ,ऋषि कात्यायन की इच्छा पर उनके घर प्रकट होकर पुत्रीवत् व्यवहार करने वाली कात्यायनी तथा सबको मारने वाले काल का भी विनाश करने वाली कालरात्री है। तपस्या द्वारा महान गौरवर्ण प्राप्त करने से महागौरी और सर्व सिद्धि प्रदायिनी होने से सिद्धिदात्री हैं।
वस्तुत: वर्तमान परिपेक्ष्य में यदि विचार करें तो अन्य पर्वों की भाँति नवरात्र भी सामाजिक चेतना का पर्व है। भगवती दुर्गा देवी की जन्म कथा के व्याज से स्मरण कराया जाता है कि भय मुक्त, सुखी, सुन्दर समाज के निर्माण के लिए प्रानिमात्र में स्थित पुरुष एवं प्रकृति तत्त्व को व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाना आवश्यक है, मन से मन मिले रहें। उसमें भी स्त्री तत्त्व का सशक्तीकरण समस्त अनिष्टकारी तत्त्वों के विनाश में समर्थ होगा। पर्वतपुत्री की भाँति शारीरिक, मानसिक दृढ़ता अनाचार के विरुद्ध उसके अस्त्र हों। अहंकार का विसर्जन कर परिवार में सबका हित साधती ब्रह्मचारिणीवत् तप ही जीवनचर्या हो। चन्द्रमा को मस्तक पर लिए दशभुजाओं में अस्त्र-शस्त्र धारिणी चंद्रघंटा की भांति सौन्दर्यमयी, शीतल तो हो परन्तु कमजोर नहीं। सिंहस्था और अंक में कार्तिकेय को धारण करने वाली स्कंदमाता की भाँति वीर संतान प्रसविनी हो। तेजस्विनी कूष्मांडा की तरह जीवन को ऊर्जा से परिपूर्ण करे। महागौरी के रूप में परम सात्विकी शक्ति, महा विदुषी जीवन को मधुरता पवित्रता से भर दे। कात्यायनी का स्मरण पुत्री को महिमा मंडित कर उसके सुखद, सुन्दर, तेजस्वी रूप को स्थापित करता है। कालरात्रि के रूप में समाज में व्याप्त अज्ञानान्धकार को मिटाने में सर्वथा समर्थ है। स्त्री ही समाज की ऐसी इकाई है जो आगत किसी भी अशुभ संकेत को सबसे पहले पकड़ती है और यदि पर्याप्त सहयोग मिले तो उसका समाधान करने की सामर्थ्य रखती है।
सिद्धिदात्री की उपासना वास्तव में स्त्री के समाज के प्रति उस योगदान का स्मरण कराती है जहाँ वह एक कुशल गृहिणी के रूप में संतान, पति एवं परिवार के साथ समाज के इतर कार्य कर्त्ताओं, कर्मचारियों के प्रति भी सहृदयतापूर्वक अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करती हुई लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायिका होती है।
यत्रनार्यस्तु...की उद्घोषणा करते भारत वर्ष में नारी की दशा आज किसी से छुपी नहीं है। नित नए हृदय विदारक समाचार कहीं न कहीं सुनाई पड़ते हैं फिर भी आकाश में उड़ान भरती फ्लाइट लेफ्टिनेंट अंजली राठी, फलाइंग आफिसर प्रीति व अदिति या फिर दुर्गा शक्ति, सुरेखा यादव, इंदिरा,अरुंधती भट्टाचार्य आदि को स्मरण करते हुए कहना आवश्यक है कि अँधेरों के साथ-साथ भोर की किरणों के संकेत हैं, दिन तेजस्वी होगा, बस, नवरात्र के व्याज से शक्ति का आत्म साक्षात्कार हो, शक्ति पर्व मने, खूब धूम से मने।

सम्पर्क: डॉ ज्योत्स्ना शर्मा , टावर एच-604, प्रमुख हिल्स , छरवडा रोड , वापी , जिला , वलसाड (गुजरात) -396191

मिट्टी का दिया

मिट्टी का दिया   
- डॉ. सुधा गुप्ता  
1.
मैं/मिट्टी का दीया
बड़ी मेहरबानी!
इस दीवाली
तुमने जला दिया
और/यूँ/अपना
जश्न मना लिया...  
2. इन्तज़ार
पलकों पर काँपते  
आँसुओं की बन्दनवार
कि/पुतली की रोशनी में
झिलमिलाते/दीयों की कतार...
3. चली गई
गुलाब की नन्हीं कली
तोड़, तुम्हारे बालों में
सजा दी
उँगली में चुभा काँटा
रहा याद दिलाता
कि तुम चली गई...
4. गुम
मुद्दत बाद
तुम्हारे शहर आना हुआ
धड़कते दिल से
मौहल्ला, गली ,मकान
खोज डाला/सब कुछ
वही था।
जस का तस
सिर्फ तुम थे गुम...      
5. गुरबानी
नहा-धोकर
ऊषा ने खोले
पावन द्वार
निराले पंछी
मधुर स्वरों में
गाते गुरबानी।
6. चिडिय़ा
घर
तिनके, धागे
कतरन, पर
नन्ही चिडिय़ा ने
बना लिया
घर।
7. रात - माँ
बड़ी, परेशान  थी
रात- माँ
सर्दी न खा जाएँ कहीं 
शरारती बच्चे तारे -
कोहरे का कम्बल ओढ़ा कर
ऊँचे पलँग पर 
बैठा दिया हैं....
8. सिर्फ
फूल का हृदय
बींधते समय
ख्याल
सिर्फ ,
अपनी अँगुली का रहा...।                                                                                                                                       सम्पर्क:  'काकली’ 120 बी/2, साकेत , मेरठ-250 003  मो. 9410029500

जीवन में रंग भरते बसंत साहू के चित्र

जीवन में रंग भरते
बसंत साहू के चित्र
  -डॉ. रत्ना वर्मा
पिछले दिनों छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक मॉल में प्रवेश करते ही मुख्य द्वार के सामने ही आयोजित एक चित्र प्रदर्शनी ने मेरा ध्यान बरबस ही खींच लिया। मेरे कदम ठिठक गए। एक तरफ गणेश जी की पेंटिंग प्रदर्शित थी। इस चित्र ने शुभ कार्य का आह्वान करते हुए मुझे अपनी ओर बुला लिया और मैं उन चित्रों की ओर खींची चली गई। वहाँ 100 के लगभग चित्र प्रदर्शित थे। एक नजर देखने के बाद सबसे पहले उत्सुकता हुई कि कौन है इन चित्रों का चित्रकार। जैसे ही चित्र के नीचे लिखा नाम पढ़ा बरबस मैं कह उठी अरे ये तो बसंत साहू के चित्रों की प्रदर्शनी है। यहाँ उनके चित्र बिक्री के लिए भी रखे गए थे। 

मैं क्रमश: आगे बढ़ते हुए एक एक चित्र को देखने लगी। मुझे उनके चित्रों में छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति के अनेक रंग नजर आए जैसे- कई चित्र छत्तीसगढ़ में तीन दिन तक चलने वाले देवारी त्योहार के कई रंग भरे हुए थे। जिसमें सुआ नृत्य करती ग्रामीण बालाएँ, गोवर्धन पूजा के दिन गाँव के दाऊ घरों के लीपे- पुते दीवारों पर हाथा देती राऊत महिला, और डंडा लेकर राऊत नाच करते ग्वाल-बाल तथा गौरा पूजा के साथ तुलसी पूजा के दिन गन्ने का मंडप तान कर तुलसी पूजा करती महिलाएँ। इतना ही नहीं गाँव के कई अन्य रंग- जैसे बैलगाड़ी में बिदा होती दुल्हन है, तो खेत में रोपा लगाती महिलाएँ, सायकिल में पीछे अपनी नई नवेली पत्नी को बैठाकर घर ले जाता युवक।  घूम -घूम कर खिलौने बेचने वाली महिला, हाट-बाजार और खरीददारी करके लौटती आदिवासी बालाएँ, पंथी नृत्य करते कलाकार आदि लोक संस्कृति की झलक प्रस्तुत करते अनेक चित्र दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित तो कर ही रहे थे।  साथ ही इन सबसे हटकर बुद्ध, कृष्ण, कबीर, मदर टेरेसा को लेकर उकेरे गए कई चित्र भी लोगों को एक पल ठहर कर देखने के लिए बाध्य कर रहे थे।  यह सब देखते हुए मेरी नजर बसंत साहू को इधर-उधर तलाशने लगी। पास ही कुछ भीड़ नजर आई। मुझे लगा हो न हो बसंत साहू इन्हीं भीड़ के बीच घिरे होंगे। मैंने झाँक कर देखा वे व्हील चेयर पर बैठे अपने प्रशंसकों के सवालों का जवाब एक के बाद एक दिए जा रहे थे। थोड़ी दूरी पर खड़ी मैं उनके आस-पास से भीड़ के छँटने का इंतजार करने लगी और हॉल के फर्श पर बिछे, वृहद् कैनवास पर उनके द्वारा बनाए बुद्ध के चित्र को निहारने लगी।   साथ ही मैं मॉल संस्कृति में रचे- बसे उन युवाओं को भी देख रही थी जो बसंत  के बनाए चित्रों को, उनकी कूँची से उपजी हमारी लोक संस्कृति की छटा को बहुत ही उत्सुकता से देख रहे थे और सराह रहे थे।
मैं सोचने लगी बसंत जैसे कलाकार, लेखक ही तो हैं ,जो हमारी लुप्त होती लोक-संस्कृति और लोक कला को अपने चित्रों और अपने लेखन के माध्यम से सँजोकर रख रहे हैं। इन माध्यमों के जरिए उन्हें बता रहे हैं कि जानों अपनी पुरातन भारतीय लोक-संस्कृति और कला को, जो धीरे- धीरे हमारे जीवन से हमारी धरती से लुप्त होते जा रही है।
तभी बसंत साहू के पास से भीड़ कुछ छँटी और मैं पँहुच गई उनके करीब। मैंने अपना परिचय दिया- उन्होंने मुस्कुरा कर मेरा स्वागत किया। मैं उनसे इससे पहले कभी रूबरू तो नहीं हुई थी,पर फोन पर उनसे उनकी कला के बारे में बातचीत कई बार हुई थी। मैं मॉल में लगी इस प्रदर्शनी के साथ उनकी चित्रकला के बारे में उनसे पूछने लगी। उन्होंने हाल ही में आरंभ किए गए अपने नए काम की जानकारी देते हुए बताया कि वे लोक संस्कृति पर तो काम करते ही हैं इन दिनों वे अध्यात्म पर काम कर रहे हैं।  वे कहते हैं- शरीर साधन है मैं आत्मा में जीता हूँ, लोककला मनुष्य को सहज ही अध्यात्म से जोड़ देती है। चूँकि मैं इन दिनों मेरा मन भी इसी ओर रमता है तो स्वाभाविक है कि मेरे चित्रों में भी अध्यात्म का रंग बिखरा हुआ नजर आता है।
22 नवंबर 1972 को धमतरी जनपद में एक कृषक परिवार के घर जन्में बसंत दरअसल जन्म से ही ऐसे नहीं थे। 1995 में हुए एक सड़क हादसे ने उन्हें व्हील चेयर पर बिठा दिया। इस हादसे ने तो उनका जीवन के प्रति नजरिया ही बदल दिया। उन्होंने अपने इस नए जीवन को रचनात्मकता से जोड़ दिया। रंग और कूँची उनके जीने का सहारा बने; जबकि इससे पहले न कभी उन्होंने चित्र बनाए न बाद में किसी से प्रशिक्षण लिया। 10वीं तक की शिक्षा बसंत ने अपने गाँव कुरूद में प्राप्त की है।
बसंत को व्हील चेयर पर देखकर और  उनका और उनकी  चित्रकला के साथ तारतम्य बिठाना आसान नहीं होता। आम मानवीय उत्सुकता के चलते यह विचार सहज ही चौंकाता है कि जो व्यक्ति हाथ-पैर दोनों से नि:शक्त हैं वह इतने बड़े-बड़े कैनवास पर चित्र किस तरह उकेरता होगा। एक कहावत है न  लेकिन जैसा कि शेरिडेन ने कहा है-  सफलता के तीन रहस्य हैं - योग्यता, साहस और कोशिश,  कुछ ऐसा ही है बसंत साहू और उनके चित्रों का रिश्ता। उनकी अदम्य जिजीविषा ने उनसे वह करवा लिया है जिसकी कल्पना शायद उन्होंने भी कभी नहीं की होगी।
आज बसंत के चेहरे पर सदा एक मुस्कान बिखरी रहती है जो उनके जिंदादिल होने का प्रमाण है। यह अनुमान हम उनके चित्रों में भरे चटक रंगों को देख कर सहज ही लगा सकते हैं, लाल, हरा, नीला और पीला रंग उनके चित्रों में प्रमुखता से इस्तेमाल हुए हैं। उनके लिए सबसे मुश्किल काम तो यह है कि वे अपने हाथों से कूँची पकड़ नहीं सकते। अपने हाथ की कलाई में कूची को एक कपड़े से बाँध लेते हैं उसके बाद आस- पास बिखरे रंग उनके कैनवास पर सहज ही उतरते चले जाते हैं।
बसंत के चित्रों की अब तक अनेक प्रदर्शनियाँ लग चुकी हैं। साथ ही अनेक सम्मान और पुरस्कार उन्हें प्राप्त हो चुके हैं। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनके चित्रों को सराहा गया है।  पिछले 16 वर्षों में हजारों चित्रों के इस रचयिता के अनेक चित्र प्रदेश, देश और विदेश के कई महत्त्वपूर्ण स्थानों संगृहीत हैं।
रंगों को उन्होंने अपने जीने का माध्यम तो बनाया ही है, साथ ही वे निरंतर दूसरों के जीवन में भी रंग भरने की कोशिश में लगे रहते हैं। कला और संवेदनशीलता एक दूसरे से जुड़े होते हैं । इस संवेदनशील कलाकार ने उड़ीसा के तूफान पीडि़तों  के लिए 22 मीटर लम्बे कैनवास पर 1857 से आज तक के महापुरुषों का चित्रांकन कर सहायता हेतु अपील की थी।  इसके अलावा सामाजिक बुराइयों, स्थानीय समस्याओं, धार्मिक जागरण, महापुरुषों के पोट्रेट संतों के पोट्रेट, बेरोजगारी, बीमारी, शिक्षा आदि के चित्र बनाकर  वे दूसरों को लगातार इनपर काम करने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। वे कई फिरके में बँट रहे समाज को एकजुट करना चाहते हैं, अपने चित्रों के माध्यम से जन जागृति लाना चाहते हैं। उनकी दिली इच्छा है कि वे शारीरिक रुप से नि:शक्त बच्चों को चित्रकाला का नि:शुल्क प्रशिक्षण दें। वैसे जब भी उन्हें समय मिलता है वे अपने आस-पास के ग्रामीण बच्चों को चित्रकला की बारिकियाँ सीखाते नज़र आते हैं।  

बसंत धमतरी जिला के सरोजनी चौक, कुरुद में निवास रहते हैं। उनसे मोबाइल नम्बर 9907765831 पर सम्पर्क किया जा सकता है।
 उनका मेल आईडी है- basantartist@gmail.com

अलसी का सेवन कैसे करें

अलसी का सेवन कैसे करें
 -जयन्ती जैन
सुपर फुड अलसी में ओमेगा थ्री व सबसे अधिक फाइबर होता है। डब्लयू एच ओ ने इसे सुपर फुड माना है। यह रोगों के उपचार में लाभप्रद है। लेकिन इसका सेवन अलग-अलग बीमारी में अलग-अलग तरह से किया जाता है।  स्वस्थ व्यक्ति को रोज सुबह-शाम एक-एक चम्मच अलसी का पाउडर पानी के साथ, सब्जी, दाल या सलाद में मिलाकर लेना चाहिए। अलसी के पाउडर को ज्यूस, दूध या दही में मिलाकर भी लिया जा सकता है। इसकी मात्रा 30 से 60 ग्राम प्रतिदिन तक ली जा सकती है। 100-500 ग्राम अलसी को मिक्सर में दरदरा पीस कर किसी एयर टाइट डिब्बे में भर कर रख लें। अलसी को अधिक मात्रा में पीस कर न रखें, यह पाउडर के रूप में खराब होने लगती है। सात दिन से ज्यादा पुराना पीसा हुआ पाउडर प्रयोग न करें। इसको एक साथ पीसने से तिलहन होने के कारण खराब हो जाता है।

खाँसी होने पर अलसी की चाय पीएँ। पानी को उबालकर उसमें अलसी पाउडर मिलाकर चाय तैयार करें। एक चम्मच अलसी पावडर को दो कप (360 मिलीलीटर) पानी में तब तक धीमी आँच पर पकाएँ जब तक यह पानी एक कप न रह जाए। थोड़ा ठंडा होने पर शहद, गुड़ या शकर मिलाकर पीएँ। सर्दी, खाँसी, जुकाम, दमा आदि में यह चाय दिन में दो-तीन बार सेवन की जा सकती है। दमा रोगी एक चम्मच अलसी का पाउडर केा आधा गिलास पानी में 12 घंटे तक भिगो दे और उसका सुबह-शाम छानकर सेवन करे तो काफी लाभ होता है। गिलास काँच या चाँदी को होना चाहिए। समान मात्रा में अलसी पाउडर, शहद, खोपराचूरा, मिल्क पाउडर व सूखे मेवे मिलाकर नील मधु तैयार करें।  कमजोरी में व बच्चों के स्वास्थ्य के लिए नील मधु उपयोगी है। डायबीटिज के मरीज को आटा गुन्धते वक्त प्रति व्यक्ति 25 ग्राम अलसी कॉफी ग्राईन्डर में ताजा पीसकर आटे में मिलाकर इसका सेवन करना चाहिए। अलसी मिलाकर रोटियाँ बनाकर खाई जा सकती हैं। अलसी एक जीरो-कार फुड है अर्थात् इसमें कार्बोहाइट्रेट अधिक होता है। शक्कर की मात्रा न्यूनतम है।
कैंसर रोगियों को ठंडी विधि से निकला तीन चम्मच तेल, छ: चम्मच पनीर में मिलाकर उसमें सूखे मेवे मिलाकर देने चाहिए। कैंसर की स्थिति मे डॉक्टर बुजविड के आहार-विहार की पालना श्रद्धा भाव से व पूर्णता से करनी  चाहिए। कैंसर रोगियों को ठंडी विधि से  निकले तेल की मालिश भी करनी चाहिए।
 साफ  बीनी हुई और पोंछी हुई अलसी को धीमी आंच पर तिल की तरह भून लें। मुखवास की तरह इसका सेवन करें। इसमें सेंधा नमक भी मिलाया जा सकता है। ज्यादा पुरानी भुनी हुई अलसी प्रयोग में न लें।
बेसन में 25 प्रतिशत मिलाकर अलसी मिलाकर व्यंजन बनाएँ। बाटी बनाते वक्त भी उसमें भी अलसी पाउडर मिलाया जा सकता है। सब्जी की ग्रेवी में भी अलसी पाउडर का प्रयोग करें।

अलसी सेवन के दौरान खूब पानी पीना चाहिए। इसमें अधिक फाइबर होता है, जो खूब पानी माँगता है।      uthojago.wordpress.com, jayntijain@gmail.com  mo.9414289437

जहाँ होती है रावण की पूजा

जहाँ होती है रावण की पूजा     
- कृष्ण कुमार यादव
 भारतीय  संस्कृति में उत्सवों और त्योहारों का आदि काल से ही महत्व रहा है। सामान्यत: त्यौहारों का सम्बन्ध किसी न किसी मिथक, धार्मिक मान्यताओं, परम्पराओं और ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा होता है। दशहरा पर्व भारतीय संस्कृति में सबसे ज्यादा बेसब्री के साथ इंतजार किये जाने वाला त्योहार है। दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द संयोजन दश व हरा से हुई है, जिसका अर्थ भगवान राम द्वारा रावण के दस सिरों को काटने व तत्पश्चात् रावण की मृत्यु रूप में राक्षस राज के आंतक की समाप्ति से है। यही कारण है कि इस दिन को विजयदशमी अर्थात् अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में भी मनाया जाता है।
दशहरे की परम्परा भगवान राम द्वारा त्रेतायुग में रावण के वध से भले ही आरम्भ हुई हो, पर द्वापरयुग में महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध भी इसी दिन आरम्भ हुआ था। पर विजया।दशमी सिर्फ  इस बात का प्रतीक नहीं है कि अन्याय पर न्याय अथवा बुराई पर अच्छाई की विजय हुई थी बल्कि यह बुराई में भी अच्छाई ढूँढ़ने का दिन होता है। रावण में कुछ अवगुण जरूर थे, लेकिन उसमें कई गुण भी मौजूद थे, जिन्हें कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में उतार सकता है। यदि रामायण या राम के जीवन से रावण के चरित्र को निकाल दिया जाए, तो सम्पूर्ण रामकथा का अर्थ ही बदल जाएगा। स्वयं राम ने रावण के बुद्धि और बल की प्रशंसा की है। रावण-वध के बाद भगवान राम ने अनुज लक्ष्मण को रावण के पास शिक्षा लेने के लिए भेजा था। पहले तो लक्ष्मण रावण के सिर के पास बैठे, पर जब रावण ने इस स्थिति में उन्हें शिक्षा देने से इन्कार कर दिया, तो लक्ष्मण ने एक शिष्य की तरह रावण के चरणों के पास बैठकर शिक्षा ली।
रावण दैत्यराज सुमाली की पुत्री कैकशी एवं विद्वान् ब्राह्मणविश्रव का पुत्र था। दैत्यराज सुमाली अपनी बेटी कैकशी का विवाह एक ऐसे व्यक्ति से करना चाहते थे जो उन्हें एक योग्य एवं अति बलवान् उत्तराधिकारी दे सके। जब दैत्यराज की इस इच्छा पर कोई भी खरा नहीं उतरा तो कैकशी ने स्वयं विद्वान ब्राह्मण विश्रव का चयन किया। विवाह के वक्त ही विश्रव ने कैकशी से कहा था कि चूँकि तुमने मेरा चुनाव गलत क्षण में किया है, अत: तुम्हारा पुत्र बुराई के मार्ग पर जाएगा। रावण के जन्म के समय उसके पिता विश्रव को जब यह ज्ञात हुआ कि उनके बेटे में दस लोगों के बराबर बौद्धिक बल है, तो उन्होंने उसका नाम 'दशानन´ रख दिया। रावण के दशानन होने के सम्बन्ध में किंवदन्ती है कि उसके विद्धान्-ब्राह्मण पिता विश्रव ने उसे एक बेशकीमती रत्नों का हार पहनाया था, जिसकी खासियत यह थी कि उससे निकलने वाले प्रकाश से लोगों को रावण के दस सिर और बीस हाथ होने का आभास होता था। अपने माता-पिता के चलते रावण में दैत्य और ब्राहमण दोनों के गुण थे। रावण को न केवल शास्त्रों बल्कि 64 कलाओं में महारत हासिल थी। यहाँ तक कि उसे हाथी और गाय को भी प्रशिक्षित करने की कला का ज्ञान था।
रावण भगवान शिव का भक्त होने के साथ-साथ महापराक्रमी भी था। इसी तथ्य के मद्देनजर आज भी कानपुर के शिवाला स्थित कैलाश मंदिर में विजयदशमी के दिन दशानन रावण की महाआरती की जाती है। सन् 1865 में शृंगेरी के शंकराचार्य की मौजूदगी  में महाराज गुरु प्रसाद द्वारा स्थापित इस मंदिर में शिव के साथ उनके प्रमुख भक्तों की मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं। कालांतर में सन् 1900 में महाराज शिवशंकर लाल ने कैलाश मंदिर परिसर में शिवभक्त रावण का मंदिर बनवाया और देवी के तेईस रूपों की मूर्ति भी स्थापित की। वस्तुत: इसके पीछे यह तर्क था कि भक्त के बगैर ईश्वर अधूरे हैं, इसीलिए भगवान शंकर के मंदिर के बाहर उनके अनन्य भक्त रावण का भी मंदिर बनाया गया। तभी से रावण की महाआरती की परम्परा यहाँ पर कायम है। कानपुर से सटे उन्नाव जिले के मौरावाँ कस्बे में भी राजा चन्दन लाल द्वारा सन् 1804 में स्थापित रावण की मूर्ति की पूजा की जाती है। यहाँ दशहरे के दिन रामलीला मैदान में 7-8 फुट ऊँचे सिंहासन पर बैठे रावण की विशालकाय पत्थर की मूर्ति की लोग पूजा करते हैं, जबकि एक अन्य पुतला बनाकर रावण दहन करते हैं।
 मध्य प्रदेश के मंदसौर में नामदेव वैश्य समाज के लोगों के अनुसार रावण की पत्नी मंदोदरी मंदसौर की थी। अत: रावण को जमाई मानकर उसकी खातिरदारी यहाँ पर भव्य रूप में की जाती है। यहाँ पर रावण के समक्ष मनौती मानने और पूरी होने के बाद रावण की वंदना करने व भोग लगाने की परम्परा रही है। हाल ही में यहाँ रावण की पैतीस फुट ऊँची बैठी हुई अवस्था में कंक्रीट की मूर्ति स्थापित की गई है। इसी प्रकार जोधपुर के लोगों के अनुसार रावण की पत्नी मंदोदरी यहाँ की पूर्व राजधानी मंडोर की रहने वाली थीं व रावण व मंदोदरी के विवाह स्थल पर आज भी रावण की चवरी नामक एक छतरी मौजूद है। हाल ही में अक्षय ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र ने जोधपुर के चांदपोल क्षेत्र में स्थित महादेव अमरनाथ एवं नवग्रह मंदिर परिसर में रावण का मंदिर बनाने की घोषणा की है। इसमें रावण की मूर्ति शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए बनाई जा रही है, जिससे रावण की शिवभक्ति प्रकट होगी और उसका सम्मानीय स्वरूप सामने आएगा।
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में स्थित रावणगाँव में रावण को महात्मा या बाबा के रूप में पूजा जाता है। यहाँ रावण बाबा की करीब आठ फीट लंबी पाषाण प्रतिमा लेटी हुई मुद्रा में है और प्रति वर्ष दशहरे पर इसका विधिवत शृंगार करके अक्षत, रोली, हल्दी व फूलों से पूजा करने की परंपरा है। चूँकि रावण की जान उसकी नाभि में बसती थी, अत: यहाँ पर रावण की नाभि पर तेल लगाने की परंपरा है, अन्यथा पूजा अधूरी मानी जाती है।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ग्रेटर नोएडा के मध्य स्थित बिसरख गाँव को रावण का पैतृक गाँव माना जाता है। बताते हैं कि रावण के पिता विश्रवामुनि इस गाँव के जंगल में शिव भक्ति करते थे एवं रावण सहित उनके तीनों बेटे यहीं पर पैदा हुए। विजय दशमी के दिन जब चारो तरफ रावण का पुतला फूँका जाता है, तो बिसरख गाँव के लोग उस दिन शोक मनाते हैं। इस गाँव में दशहरा का त्योहार नहीं मनाया जाता है। गाँववासियों को मलाल है कि रावण को पापी रूप में प्रचारित किया जाता है जबकि वह बहुत तेजस्वी, बुद्विमान्, शिवभक्त, प्रकाण्ड पण्डित एवं क्षत्रिय गुणों से युक्त था। महाराष्ट्र के अमरावती और गढ़चिरौली जिले में कोरकू और गोंड आदिवासी रावण और उसके पुत्र मेघनाद को अपना देवता मानते हैं। अपने एक खास पर्व फागुन के अवसर पर वे इसकी विशेष पूजा करते हैं।
उत्तर भारत में दशहरा का मतलब भले ही रावण दहन से अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ हो, पर भारत के अन्य हिस्सों में ही इसे अन्य रूप में मनाया जाता है। बंगाल में दशहरे का मतलब रावण दहन नहीं बल्कि दुर्गा पूजा होती है, जिसमें माँ दुर्गा को महिषासुर का वध करते हुए दिखाया जाता है।
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