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Jul 11, 2010

प्रेरक

गाँधी जी ने थोरौ से पाया सदगी भरे जीवन का फलसफा

थोरौ ने लगभग 250 वर्ष पूर्व भविष्य के भागदौड़ भरे जीवन की कल्पना करते हुए जीवन को साधारण बनाने और प्रकृति के करीब रखने की जरूरत पर बल दिया था। उन्होंने लंबे समय तक प्रकृति के करीब रह कर अहिंसा, जीवन की सादगी और विचारों की शुद्धता संबंधित कई किताबें लिखीं, जिनमें 'वाल्डेन' और 'ऑन सिविल ओबीडियंस' सबसे ज्यादा चर्चित है।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक महात्मा गाँधी के जीवन और विचारों पर जिन चंद लोगों का जबरदस्त प्रभाव था उनमें अमेरिकी लेखक एवं विचारक थोरौ भी शामिल थे। उनकी कृतियों के कारण बापू को सादगी भरे जीवन का फलसफा मिला।
महात्मा गाँधी ने 1902 में जोहांसबर्ग में अमेरिकी पत्रकार वैब मिलर से कहा था कि दक्षिण अफ्रीका में मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में काम करने के दौरान उन्होंने अमेरिकी लेखक और विचारक हेनरी डेविड थोरौ की 'वाल्डेन' को पढ़ा जिसके बाद उन्हें उनके सादा जीवन के विचारों से बहुत प्रेरणा मिली। उन्होंने कहा था कि वह भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने के दौरान इनका पालन करेंगे और उनके जो साथी इस काम में सहयोग कर रहे हैं, उन्हें भी थोरौ को पढऩे को कहेंगे।
यही कारण है कि थोरौ के जन्मदिवस 12 जुलाई पर पूरी दुनिया में 'सिंपलिसिटी डे' (सादगी दिवस) मनाया जाता है।
महात्मा गाँधी से जुड़ी रहीं स्वतंत्रता सेनानी रुक्मिणी दास के अनुसार महात्मा गाँधी देश-दुनिया के उन सभी लेखकों को पढ़ते थे, जिनके विचार उनसे मिलते-जुलते थे।
रुक्मिणी ने बताया कि उनके पास पश्चिमी लेखकों का बहुत बड़ा संग्रह था, जिनसे वे जीवन से जुड़ी छोटी-बड़ी चीजों की प्रेरणा लेते थे। थोरौ के आदर्शो पर चलने वालों में महात्मा गांधी के अलावा मार्टिन लूथर किंग जूनियर का भी नाम है। मार्टिन ने अपनी आत्मकथा में इस बात का उल्लेख किया है कि उन्हें अहिंसा के रास्ते से विरोध करने का विचार 1944 में थोरौ को पढऩे के बाद आया।
थोरौ ने लगभग 250 वर्ष पूर्व भविष्य के भागदौड़ भरे जीवन की कल्पना करते हुए जीवन को साधारण बनाने और प्रकृति के करीब रखने की जरूरत पर बल दिया था। उन्होंने लंबे समय तक प्रकृति के करीब रह कर अहिंसा, जीवन की सादगी और विचारों की शुद्धता संबंधित कई किताबें लिखीं, जिनमें 'वाल्डेन' और 'ऑन सिविल ओबीडियंस' सबसे ज्यादा चर्चित है।
थोरौ अमेरिका के पहले ऐसे विचारक थे, जिन्होंने अमेरिका में 'सादा जीवन, उच्च विचार' की कल्पना को देशवासियों के बीच पहुंचाने का प्रयास किया।
अपने पूरे जीवनकाल के दौरान उन्होंने पश्चिमी देशों के निवासियों को विलासिता के साधनों, मांसाहार और आधुनिकता से परे होकर विचारों की शुद्धता और जीवन को साधारण बनाने के लिए प्रेरित किया। थोरौ के आदर्शों की बदौलत अमेरिका में आज भी बड़ी संख्या में लोग 12 जुलाई के दिन मांसाहार और मशीनी जीवन त्याग कर प्रकृति के करीब होने का अहसास करते हैं।

यात्रा- वृत्तान्त

किसी रोज बनजारों की तरह
- प्रिया आनंद
मौसम में अब बस गुलाबी ठंडक बाकी रह गई थी जब मुझे प्रबाल प्रमाणिक के यहां से फोन आया। काफी दिनों से वे मुझे बुला रहे थे। हां, ना करते पूरा एक साल गुजर गया। इस बार भी जैसे मैं संकोच से घिर गई। कितना तो काम था। सिलसिलेवार ही सारे काम निपटते थे। ऐसे में चार दिन की छुट्टी निकाल लेना मुश्किल ही था।
-शायद छुट्टी नहीं मिलेगी मैंने हिचकते हुए कहा।
-छोड़ दीजिए ऐसी नौकरी, यह स्लेवरी है।
यह सुनने के बाद मैंने एक दिन का ऑफ लगाया और दो दिन की छुट्टी लेकर चल दी। चक्की के स्टाप पर उतरने के बाद मैंने देखा वहां धार ब्लाक जाने वाली बस खड़ी थी या यों कहें कि यात्रियों का इंतजार कर रही थी।
-बस कब तक चलेगी? मैंने वहां खड़े एक आदमी से पूछा।
-11 बजे... कहकर उसने मुंह फेर लिया। थोड़ी ही देर में बस पूरी तरह भर गई। हंसी तब आई जब सवारियों के साथ बकरियां भी बस में आ गईं। पहले तो उन्हें सीट के नीचे ठूंसने की कोशिश की गई। जब वे वहां बैठने को तैयार नहीं हुईं, तो बकरी वाले उन्हें गोद में लेकर बैठ गए। बस आहिस्ता चलती एक- एक सवारी उठाती- उतारती धार ब्लाक पहुंची। सामने एक बड़ा सा छतनार पेड़ था। वहीं एक आईस्क्रीम का ठेला था और एक छोटा सा रेस्तरां। कुछ सवारियां उतरकर होटल में चाय पीने चली गईं। बाकी आराम से पेड़ की छाया में बातें करने लगे। धार पहुंच कर आधी बस खाली हो गई थी। धूप की चमक तेज थी यह एरिया हिमाचल की ठंडक से थोड़ी दूर भी था इसलिए हवा में गर्मी थी।
-कहां पहुंचीं आप...? प्रबाल लाइन पर थे
-बस धार पर खड़ी है, हिलने का नाम नहीं ले रही।
-ऐसे ही चलती है, पर इसका एक फायदा है कि यह सीधे मेरे घर के सामने आपको उतारेगी।
सचमुच बस ने मुझे ठीक उनके घर के सामने उतार दिया। प्रबाल प्रमाणिक की अकादमी काफी बड़ी है। अंदर से लगातार कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी। बस की आवाज सुनते ही प्रबाल बाहर निकल आए। बताया कि मेरे रहने के लिए उनके सहयोगी अरूप चंद्रा के घर इंतजाम किया गया था। बंगाली होने के कारण प्रबाल का हिंदी उच्चारण बेहद फनी और लुभावना लगता है।
- अभी मैं कुत्तों का खाना बना रहा हूं, थोड़ी देर में वहां आऊंगा। ये आदमी आपको वहां ले जाएगा। तब तक आप रेस्ट करें। उन्होंने यह कह कर मुझे एक आदमी के साथ भेज दिया।
घर अच्छा था दो कमरों का छोटा सा फ्लैट। दीपाली ने मुस्कुरा कर मेरा स्वागत किया। दीपाली अरूप की पत्नी हैं। वह हिंदी समझ तो लेती हैं, पर बोल नहीं पाती।
शाम तक अरूप भी आ गए। वह भी किचन में दीपाली का हाथ बंटाने चले गए। खाने की मेज पर सब साथ थे। प्रबाल, अरूप और दीपाली। सभी एक जैसे मस्त मौला। यह बेलौस मस्ती और कहां...? पहली बार मुझे लगा कि काम के तनाव से बाहर निकलने के लिए ऐसी जगहों पर जरूर जाना चाहिए। कितनी अजीब बात थी कि प्रबाल ने कोलकाता से यहां आकर बसेरा बनाया था। शायद इसके पीछे हेरिटेज के प्रति उनका आकर्षण रहा हो। हिमाचल ने उन्हें जमीन नहीं दी थी इसलिए उन्होंने हिमाचल बार्डर पर जमीन ले ली थी और बीस कमरों का मकान डाल लिया था।
बीस कमरों का मकान... सुनने में अजीब लगता है, पर कुछ कमरे तो उन लावारिस कुत्तों के लिए थे, जो स्ट्रीट डॉग्स थे। जो सड़क पर घायल हो जाते थे। प्रबाल उनकी मरहम पट्टी करते और फिर उन्हें अपने पास रख लेते थे। अब वहां 17 कुत्तों का झुंड है। उनका खाना पकाना, सफाई सब प्रबाल के जिम्मे था। प्रबाल एक अच्छे पेंटर हैं। ग्लोबल पहचान वाले आर्टिस्ट, पर उनका ज्यादा नाम उनकी देवस्थान कला के कारण है। पेपर कटिंग से समूचा परिदृश्य निर्मित करने वाले प्रबाल अपने काम में दक्ष हैं और मशहूर भी। मथुरा के मंदिरों की चौखटों पर रंगीन कागजों और पन्नियों की कटिंग की सजावट को उन्होंने अपनी कला में ढाल लिया। अब यह कला देवस्थान कला के नाम से चर्चित हो चुकी है। अरूप कोलकाता में साफ्टवेयर इंजीनियर थे। वे भी कोलकाता को नमस्ते कर यहां आ गए थे। फोटोग्राफी और डाक्यूमेंट्रीज बनाने में उनकी स्पेशिएलिटी है और वे इसी काम में यहां आकर जुट गए थे। उसी शाम हम रणजीत सागर वाटर रिजर्वायर देखने गए।
चप्पूवाली नाव किनारे पर ही थी।
मदन हमें सैर कराने ले चलोगे? प्रबाल ने नाविक से कहा।
-क्यों नहीं आइए। मदन ने खुश होकर कहा।
सभी नाव में बैठ गए। मैं शायद पंद्रह सालों बाद ऐसी नाव में बैठी थी। बोटिंग ऐसी ही नाव में अच्छी लगती है। मोटर बोट का सफर बहुत जल्दी खत्म हो जाता है।
धीरे- धीरे नाव बीच झील में पहुंच गई। शाम होने को थी। पूरा आकाश सिंदूरी था और पानी पर भी उसकी लाल छाया थी। कुछ ही क्षणों के अंतराल में आकाश स्लेटी रंग में तबदील हो गया।पूर्व के पहाड़ों के पीछे से चांद निकला।
-यह पूर्णिमा की रात है... प्रबाल ने कहा और गुनगुनाने लगे।
-आपने कभी बाउल संगीत सुना है?
-नहीं...
-कोलकाता में ऐसे गीत आम हैं। बहुत खूबसूरत और मधुर।
अरूप और दीपाली बातों में मस्त थे। पूरे एक घंटे की बोटिंग के बाद हम वापस लौटे। चांद पूरे जोश से निकला था और चांदनी पूरी झील पर लहरियों में फैली हुई थी।
पहाड़ी के पीछे से मोर की आवाज आई। तुरंत झील के उस पार की पहाड़ी से दूसरे मोर ने जवाब दिया
-आहा! केका ध्वनि ... प्रबाल खुश होकर बोले।
-ये एक दूसरे को संदेश दे रहे हैं... रोमांटिक मैसेज
- हो सकता है यह अपनी टीम को बुला रहा हो कि चलो शिकार पर चलते हैं आखिर भोजन उन्हें भी तो ढूंढना है... अरूप ने कहा।
- तुम बेहद अनरोमांटिक हो कहकर प्रबाल फिर गीत गुनगुनाने लगे।
शाम को मशरूम सूप और -ब्राउन ब्रेड का शानदार डिनर था, साथ में मिठाई। खाने के बाद देर तक सब बातें करते रहे फिर गुड नाइट कर सोने को चल दिए।
अगली दोपहर छोटी- छोटी पूरियां सब्जी, दाल और बंगाल से आया खजूर का दानेदार गुड़। शायद मैंने जिंदगी में पहली बार खाया। शाम हमने वे डाक्यूमेंट्रीज देखी, जो प्रबाल और अरूप ने शेखावटी पेंटिंग्स से सजी हवेलियों पर बनाई थी। कमेंट्री करने वाली महिला का उच्चारण एकदम स्पष्ट पर कांशस था, जबकि पुरुष की आवाज बेलौस थी।
यह प्रिया मैडम की और मेरी आवाज है प्रबाल ने बताया।
प्रिया प्रवाल की पत्नी, जो अब बंगलूर में रहती हैं। उस रात डिनर पर प्रबाल ने बार- बार प्रिया को याद किया। शाम हम बसोहली की ओर चल पड़े। प्रबाल कोई चित्र बनाना चाहते थे। रास्ते में हमने शाल बनती देखी। अंगोरा ऊन की शाल भी यहां बनती है। 500 से 1500 तक की अच्छी शालें मिल जाती हैं। वहां उस समय कारीगर गोपाल सिंह खड्डी पर थे और काम कर रहे थे।
उससे आगे दोनों तरफ सरसों से पीले फूलों वाले खेतों की लंबी चौड़ी पट्टी थी। यह रणजीत सागर का वेटलैंड एरिया था और इस बार यहां बंपर फसल हुई थी। गाड़ी आगे बढ़ती गई और झोपडिय़ों के आकार में बदलाव आ गया। ढेरों लंबी चौड़ी झोपडिय़ां और जुगाली करती भैंसें।
क्या हम पंजाब में हैं ...? मैंने पूछा।
- हां यह एरिया पंजाब में ही है।
आकाश खुला नीला और विस्तृत था।
- जब सन्नी दोओल की गदर की शूटिंग हो रही थी यहां, तो मैं रोज ही देखने आता था। ड्राइवर मुन्ना ने कहा। पहाड़ दूर थे और हम हरे खेतों की बीच खड़े उस मंदिर को देख रहे थे, जो कम से कम तीन बार टूटा और बना था यह मंदिर। रणजीत सागर बांध की डूब में आ गया था पर अब बाहर था। मंदिर का निचला आधार दक्षिण के उत्कृष्ट वास्तु का परिचय देता था। नक्षत्र के आकार वाले चबूतरे पर मंदिर स्थित था। इससे ऊपर का हिस्सा पहाड़ी वास्तु पर बना था। सबसे ऊपर अनभ्यस्त हाथों की छाप थी। हां शिखर का आमलक पुराना ही था। मंदिर के द्वार पर पहाड़ी शैली में बने दो गंधर्वों की सुंदर मूर्तियां थीं, जिनके चेहरे पर अब कालिख पोत दी गई थी। टेराकोटा में बनी इन मूर्तियों का शिल्प खूबसूरत था पर इसके मुकाबले प्राचीन संरचना उत्कृष्ट थी।
- मंदिर के अंदर आले बने थे। भगवान वहां नहीं थे। शायद डूूब के वक्त लोगों ने यहां से उन्हें हटाकर कहीं और स्थापित कर दिया था। अब इस मंदिर में पशु बांधे जाते हैं। गोबर की गंध से मेरा सिर घूमने लगा, तो मैं बाहर आ गई। नदी घाटी-परियोजनाओं में रावी पर बना यह बांध विशालकाय है। पहले इसे थीन बांध कहा जाता था। इस पर 1982 में जब काम शुरू हुआ तब उसका कहर जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और पंजाब ने समान रूप से झेला।
डूब की संपदा का आकलन लगभग 3800 करोड़ किया गया। रोचक यह हर बिंदु पर पंजाब सरकार ने हिमाचल सरकार को आश्वासन दिया कि मुआवजे के साथ हर विस्थापित परिवार के एक व्यक्ति को नौकरी मिलेगी। वादे वफा नहीं हुए। आज यह प्रोजेक्ट लाखों रुपए प्रतिदिन की कमाई कर रहा है। पर जो गया... वह तो गया, हरे-भरे खेत बसे बसाए घर... देवी-देवताओं के मंदिर.. जिसमें से एक मंदिर हमारे सामने था।
कितने विस्थापन झेलेगा हिमाचल...? अब रेणुका बांध की तैयारी है, फायदा दिल्ली का और तबाही हिमाचल की। विस्थापितों को मुआवजा और जमीनें मिलने के बीच कितने दशक गुजर जाएंगे, पता नहीं। अगले दिन मैं वापस लौट आई। इन तीन दिनों में मैंने बनजारों जैसे जिंदगी जी थी और तनावमुक्त हो गई थी। हां, एक और विस्थापन की आहट सुनाई देने लगी है।

पता- दिव्य हिमाचल, पुराना मटौर कार्यालय, कांगड़ा पठानकोट मार्ग,
कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)176001
मोबाइल- 09816164058

फिल्म

विमल राय
ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना....
- एन. के. राजु
फिल्म निर्देशक का माध्यम होता है पर विमल राय जैसे चंद ही भारतीय फिल्मकार हुए हैं जिनकी अपनी फिल्मों के फिल्मांकन, पटकथा, संगीत, नृत्य आदि तमाम पक्षों पर गहरी पकड़ रही है। उनकी फिल्मों के हर दृश्य पर उनकी एक विशिष्ट छाप होती थी और इसी ने विमल राय को फिल्म निर्माण का ऐसा स्कूल बना दिया जिसका कमोबेश आज भी पालन किया जाता है।
मुख्यधारा में रहकर भी जिन फिल्मकारों ने सिनेमा की कलात्मक ऊंचाइयों को बरकरार रखा, उनमें सबसे सम्मानित और अहम नाम है- विमल राय। सिनेमैटोग्राफर से डायरेक्टर और प्रोड्यूसर बने विमल राय ने फिल्मों के जरिए धन कमाने की बजाय सामाजिक सरोकार को सबसे ऊपर रखकर हमेशा सार्थक फिल्मों का निर्माण किया।
सिनेमा की अप्रतिम समझ रखने वाले विमल दा का जन्म 12 जुलाई 1909 में पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में एक जमींदार परिवार में हुआ था। वह ढाका के जगन्नाथ कालेज में पढ़ाई कर ही रहे थे कि उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। पहले पिताजी का निधन हो गया फिर धोखाधड़ी का शिकार हुए और पारिवारिक संपत्ति से महरूम कर दिए गए। परिवार के भरण पोषण के लिए मां तथा छोटे भाइयों के साथ वह कलकत्ता आ गए। कहा जाता है कि इस घटना की छाप उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्म दो बीघा जमीन में भी मिलती है। फोटोग्राफी के प्रति उनके लगाव हो देखते हुए दिग्गज फिल्मकार पीसी बरूआ ने उन्हें बतौर पब्लिसिटी फोटोग्राफर रख लिया और यहीं से उनका फिल्मी सफर शुरू हो गया जो निरंतर नयी ऊंचाइयों को छूता गया।
विमल दा की फिल्मों में एंट्री बतौर कैमरामैन हुई। वह कैमरामैन के तौर पर न्यू थिएटर्स प्राइवेट लिमिटेड में शामिल हुए। उन्होंने न्यू थिएटर्स की दस से ज्यादा हिंदी और बंगाली फिल्मों का छायांकन किया। इस दौरान उन्होंने 1935 में प्रदर्शित हुई पीसी बरुआ कीफिल्म देवदास और 1937 में प्रदर्शित मुक्ति के लिए फोटोग्राफी की। लेकिन बिमलदा ने बहुत अधिक समय तक कैमरामैन के तौर पर काम नहीं किया।
1944 में विमल राय को न्यू थिएटर्स की बांग्ला फिल्म उदयेर पाथे का निर्देशन का मौका मिला। बतौर निर्देशक विमल राय की पहली फिल्म उदयेर पाथे ही थी जो सामाजिक कुरीतियों पर आधारित थी। यह फिल्म बेहद कामयाब रही। इस फिल्म ने ही दर्शा दिया कि सिनेमा जगत को बेहतरीन फिल्मकार मिल गया है। एक साल बाद ही इस बांग्ला फिल्म का हमराही टाइटल से हिंदी संस्करण बनाया गया। हमराही का निर्देशन भी विमल राय ने ही किया था, लेकिन इसे वैसी सफलता नहीं मिली। इसके बाद विमलदा ने न्यू थिएटर्स के लिए तीन हिंदी फिल्मों- अंजनगढ (1948), मंत्रमुग्ध (1949) और पहला आदमी (1950) का निर्देशन किया। ये तीनों फिल्में साहित्यिक कृतियों पर आधारित थीं, जो परदे पर क्लासिक साबित हुर्ई। साहित्य से उन्हें गहरा लगाव था, जो उनकी हर फिल्म और हर फ्रेम में नजर आता है।
वर्ष 1950 में इधर कोलकाता में न्यू थिएटर्स बंद होने की कगार पर था, तो उधर मुंबई में बॉम्बे टॉकीज का भी परदा गिरने वाला था। के.एल. सहगल और पृथ्वीराज कपूर जैसे अदाकार और नितिन बोस और फणि मजमूदार जैसे प्रतिष्ठित निर्देशक मुंबई आ गए थे। बॉम्बे टॉकीज को जीवनदान देने के लिए विमल राय को मुंबई बुलाया गया। यहां उन्होंने 1952 में बांबे टाकीज के लिए मां (1952) का निर्देशन किया। जो असफल रही।
विमल राय कोलकाता से अकेले नहीं आए थे, उनके साथ पूरी टीम थी। जिसमें ऋ षिकेश मुखर्जी, नबेंदु घोष, पाल महेंद्र, असित सेन और नजीर हुसैन शामिल थे। विमलदा ने खुद की फिल्म कंपनी विमल राय प्रोडक्शन की स्थापना कर 1953 में पहली फिल्म दो बीघा जमीन का निर्माण किया। इस फिल्म से संगीतकार सलिल चौधरी भी विमलदा से जुड़ गए। दो बीघा जमीन की कहानी सलिलदा की ही लिखी हुई थी। भारतीय किसानों की दुर्दशा पर केंद्रित इस फिल्म को हिंदी की महानतम फिल्मों में गिना जाता है। इटली के नव-यथार्थवादी सिनेमा से प्रेरित बिमल दा की दो बीघा जमीन एक ऐसे गरीब किसान की कहानी है जो शहर चला आता है। शहर आकर वह रिक्शा खींचकर रुपया कमाता है ताकि वह रेहन पड़ी जमीन को छुड़ा सके। गरीब किसान और रिक्शा चालक की भूमिका में बलराज साहनी ने जान डाल दी है। व्यावसायिक तौर पर दो बीघा जमीन भले ही कुछ खास सफल नहीं रही लेकिन इस फिल्म ने बिमल दा की अंतरराष्ट्रीय पहचान स्थापित कर दी। इस फिल्म के लिए उन्होंने कान और कार्लोवी वैरी फिल्म समारोह में पुरस्कार जीता।इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा में विमल राय के पैर जमा दिये। दो बीघा जमीन को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं फिल्म फेस्टिवल्स में व्यापक सराहना मिली। देश के पहले पॉपुलर फिल्म पुरस्कार फिल्म फेअर अवार्ड 1953 में शुरू किए गए थे। दो बीघा जमीन के लिए विमल राय को सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का पहला फिल्मफेअर अवार्ड दिया गया।
उसी साल विमलदा ने अशोक कुमार के बैनर के लिए परिणीता और हितेन चौधरी के लिए बिराज बहू का निर्देशन किया। ये दोनों फिल्में शरतचंद्र के उपन्यासों पर आधारित थीं। 1955 में शरतचंद्र के पॉपुलर उपन्यास देवदास पर इसी नाम से फिल्म बनाकर विमलदा देशभर में छा गए। दो बीघा जमीन की तरह यह भी एक क्लासिक कृति साबित हुई। इससे बीस साल पहले विमलदा न्यू थिएटर्स की के.एल. सहगल स्टारर देवदास (1935) का छायांकन कर चुके थे। विमल राय ने अपने होम प्रोडक्शन के तहत 1953 से 1964 तक 14 फिल्मों का निर्माण किया। इनमें से छह फिल्मों का निर्देशन उन्होंने अपने सहयोगियों से करवाया, लेकिन उन फिल्मों को उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। विमल राय ने अपने बैनर की आठ फिल्मों दो बीघा जमीन (1953), नौकरी (1954), देवदास (1955), मधुमती (1958), सुजाता (1959), परख (1960), प्रेमपत्र (1962), बंदिनी (1964) और बाहर के बैनर की तीन फिल्मों परिणीता (1953) ,बिराज बहू (1954) और यहूदी (1958) का सफल निर्देशन किया था।
1958 में पुनर्जन्म पर आधारित मधुमति तथा यहूदी का निर्देशन किया। दोनों ही फिल्में जबर्दस्त हिट रहीं। संगीतकार सलिल चौधरी ने मधुमति के लिए ऐसी धुन रची कि उसके गाने आज भी लोगों की जुबां पर हैं। इस फिल्म में स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर द्वारा गाया गया गीत आजा रे परदेसी... उनके सर्वश्रेष्ठ दस गीतों में शुमार किया जाता है।
विमल राय ने 1960 में साधना को लेकर परख नाम की फिल्म बनाई। कम बजट की इस फिल्म ने बाक्स आफिस पर कामयाबी हासिल की और यह बात साबित कर दी कि किसी फिल्म की सफलता के लिए बड़ा बजट होना अनिवार्य शर्त नहीं है। यह बात आज की पीढ़ी के फिल्मकारों के लिए भी एक जरूरी सबक बन सकती है। इसके अलावा 1962 में प्रेम पत्र नाम की फिल्म का निर्देशन किया।
इस तरह अपने जीवन काल में ही मिथक बन चुके महान फिल्मकार विमल राय ने कलात्मक और लोकप्रिय फिल्मों की विभाजन रेखा को मिटा दिया था। इसके अलावा उन्होंने ऋ षिकेश मुखर्जी, नवेन्दु घोष, सलिल चौधरी और गुलजार जैसे तमाम बेशकीमती सौगात हिन्दी फिल्म उद्योग को दिए। कहते हैं कि फिल्म निर्देशक का माध्यम होता है पर विमल राय जैसे चंद ही भारतीय फिल्मकार हुए हैं जिनकी अपनी फिल्मों के फिल्मांकन, पटकथा, संगीत, नृत्य आदि तमाम पक्षों पर गहरी पकड़ रही है। उनकी फिल्मों के हर दृश्य पर उनकी एक विशिष्ट छाप होती थी और इसी ने विमल राय को फिल्म निर्माण का ऐसा स्कूल बना दिया जिसका कमोबेशआज भी पालन किया जाता है।
बिमल दा की सर्वाधिक यादगार फिल्मों में बंदिनी (1963) का नाम लिया जा सकता है। यह फिल्म हत्या के आरोप में जेल में बंद एक महिला की कहानी है। इस फिल्म में अभिनेत्री नूतन ने शानदार भूमिका अदा की है। विमल राय के फिल्मांकन का बेजोड़ उदाहरण बंदिनी का वह दृश्य हैं जिसमें नूतन अस्पताल में एक दरवाजे के सामने खड़ी है और बगल में वेल्डिंग के कारण चिंगारियों का एक सैलाब फूट रहा है। चिंगारियों के माध्यम से विमल राय ने नायिका की मनोदशा को जिस प्रकार पेश किया वह किसी भी दर्शक के मन पर अमिट छाप छोड़ सकता है। इसके अलावा उन्होंने छूआछूत की समस्या पर आधारित सुजाता फिल्म का निर्देशन किया। इस फिल्म में भी एकबार फिर उन्होंने नूतन को अभिनेत्री के तौर पर लिया जबकि अभिनेता की भूमिका निभाई सुनील दत्त ने।
आस्कर पुरस्कार से सम्मानित सत्यजीत राय ने कहा था कि विमल दा ने अपनी पहली ही फिल्म से सिनेमा की परंपराओं के मकडज़ाल को दरकिनार कर दिया और ऐसे यथार्थवादी दौर की शुरुआत की जिसे दर्शकों ने भी भरपूर सराहा। फीचर फिल्मों के अलावा उन्होंने कई डाक्यूमेंट्री फिल्में भी बनायी। उनमें एक गौतम द बुद्घा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुयी। पुरस्कार जीतने मे भी विमल दा का कोई सानी नहीं था।
बिमल दा ने सात बार सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्म फेयर पुरस्कार जीता। उन्हें यह पुरस्कार 1954 में दो बीघा जमीन, 1955 में परिणीता, 1956 में बिराज बहू, 1959 में मधुमति, 1960 में सुजाता, 1961 में परख तथा 1964 में बंदिनी के लिए यह पुरस्कार मिला। 1940 और 1950 के दशक में समानांतर सिनेमा के प्रणेता रहे बिमल दा के प्रोडक्शन की आखिरी फिल्म रही बेनजीर (1964)। इसका निर्देशन एस खलील ने किया था।
बंदिनी के बाद विमल राय शिखर पर थे। हिंदुस्तानी सिनेमा को उनसे बहुत उम्मीदें थी, लेकिन आठ जनवरी 1966 को लंबी बीमारी के बाद 56 साल की उम्र में विमल राय के निधन से ये उम्मीदें अधूरी रह गई और हिंदी सिनेमा को नई ऊंचाई देने वाले एक रत्न को फिल्म जगत ने खो दिया। अपने तीन दशकों के फिल्मी जीवन में विमलदा ने हिंदी सिनेमा को जिन ऊंचाइयों पर पहुंचाया, वह फिल्मी इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। इतनी कम उम्र में ही वे वहां चले गए जहां के लिए यही कहा जा सकता है- ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना...।
क्लासिक फिल्मों का रचनाकार
देश के पहले पॉपुलर फिल्म पुरस्कार फिल्म फेअर अवार्ड 1953 में शुरू किए गए थे। दो बीघा जमीन के लिए विमल राय को सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का पहला फिल्मफेअर अवार्ड मिला। उन्होंने सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के फिल्मफेयर पुरस्कारों की दो बार हैटट्रिक बनायी। 1953 में दो बीघा जमीन, 1954 में परिणीता, 1955 में विराज बहू के लिए। बीच में दो साल के अंतराल के बाद 1958-59 और 60 में भी उन्हें यह सम्मान दिया गया। एक बार फिर 1963 में बंदिनी के लिए वह इस पुरस्कार से नवाजे गए।

प्रकृति

छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय उद्यान व अभयारण्य
आओ प्रकृति के इन 
अनमोल धरोहर को बचाएँ
औद्योगिक प्रदूषण में बेतहाशा वृद्धि ने विश्व के लिए एक गंभीर समस्या उत्पन्न कर दी है, जो मानव जीवन के लिये चुनौती बनती जा रही है। देश में लगातार हो रहे वनों के विनाश के कारण वन्यजीवों की सैकड़ों प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर है। छत्तीसगढ़ में भी कुछ स्तनपायी जीव लुप्त होने की स्थिति में है जिसमें शेर व वन भैंसा प्रमुख है। लेकिन प्रदेश में स्थापित अनेक राष्ट्रीय उद्यानों एवं अभयारण्यों के माध्यम से वन्यजीवों के संरक्षण का निरंतर प्रयास जारी है।
छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जहां सबसे अधिक वन एवं वन्यप्राणी है जहां तीन राष्ट्रीय उद्यान- कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान, गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान एवं 11 अभयारण्य हैं। प्रदेश के हमारे ये राष्ट्रीय उद्यान ऐसे संरक्षित वन है जहां वन्यजीव और वनस्पति दोनों ही सुरक्षित रहते हैं। साथ ही राष्ट्रीय उद्यान पर्यटकों के मनोरंजन, ज्ञानवर्धन, पर्यावरण में जागरूकता के साथ शोध कार्य एवं अध्ययन के लिये भी उपयुक्त स्थान होते हैं। आज जबकि पूरी दुनिया में विकास के नाम पर प्रतिवर्ष करोड़ों वृक्ष काटे जा रहे है ऐसे में हमारा यह कर्तव्य है कि वन एवं जीव जन्तुओं को नष्ट होने से बचाएं। इन राष्ट्रीय उद्यानों एवं अभयारण्यों के माध्यम से वन एवं वन्य प्राणियों को बचाने के लिए सरकार तो प्रयासरत है ही वहीं हमें भी प्रकृति की इन अमूल्य धरोहरों को बचाने के लिए आगे आना चाहिए। तभी हमारी धरती मानव के जीने लायक बची रहे।
कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान-
जगदलपुर से 24 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान रंग- बिरंगी तितलियों, गुफाओं एवं झरनों के लिए विख्यात है। यह घाटी भारत के सर्वाधिक सुंदर और मनोहारी नेशनल पार्कों में से एक है। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता और अनोखी तथा समृद्ध जैव विविधता के कारण मशहूर है। कांगेर घाटी को 1982 में नेशनल पार्क का दर्जा दिया गया था। कांगेर घाटी 34 किलो मीटर लंबी तराई में स्थित है। इस राष्ट्रीय उद्यान में कांगेर नदी की विभिन्न शाखाएं साल भर बहती हैं। ऐसी मान्यता है कि देश का सघनतम वन इस राष्ट्रीय उद्यान में सुरक्षित है। यहां के जंगलों में 90 फीसदी वृक्ष साल वनों के हैं। यह एक बायोस्फीयर रिजर्व है। छत्तीसगढ़ का राजकीय पक्षी पहाड़ी मैना यहीं पाई जाती है। पहाड़ी मैना इंसान के आवाज की हू-ब-हू नकल करती है।
वन्य जीवन और पेड़ पौधों के अलावा इस नेशनल पार्क के अंदर पर्यटकों के लिए अनेक भ्रमण के स्थान हैं जिसमें प्रमुख हैं कुटुमसर की गुफाएं, कैलाश गुफाएं, डंडक की गुफाएं। यहां स्थित तीरथगढ़ जल- प्रपात तो पर्यटकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करता है। कांगेर धारा और भीमसा धारा, (घडिय़ालों का एक पार्क) जैसे दो पिकनिक रिजॉर्ट भी हैं।
अनेक वनस्पतियों से मिश्रित इस वन में मुख्यत: साल, टीक और बांस के पेड़ हैं। कांगेर घाटी नेशनल पार्क में पाए जाने वाले प्रमुख जीव जंतुओं में बाघ, चीता, माउस डीयर, जंगली बिल्ली, चीतल, सांभर, बार्किंग डीयर, भेडि़ए, लंगूर, रीसस मैकाक, स्लॉथ बियर, उडऩे वाली गिलहरी, जंगली सुअर, पट्टीदार हाइना, खरगोश, अजगर, कोबरा, घडिय़ाल, मॉनिटर छिपकली तथा सांप आदि शामिल हैं। इस पार्क में मुख्य रूप से पहाड़ी मैना, चित्तीदार उल्लू, लाल जंगली बाज़, रैकिट टेल्ड ड्रोंगो, मोर, तोते, स्टैपी इगल, लाल फर वाला फाल, फटकार, भूरा तीतर, ट्री पाइ और हेरॉन पक्षी पाए जाते हैं।
इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान
यह छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल बस्तर संभाग के अंतर्गत दो हजार 800 वर्ग किलोमीटर में पसरा हुआ है। यह जिला मुख्यालय बीजापुर से भोपालपट्टनम मार्ग पर 50 किलोमीटर की दूरी पर है। इस राष्ट्रीय उद्यान का नाम बस्तर अंचल की जीवनदायिनी इंद्रावती नदी के नाम पर रखा गया है जो इस उद्यान से होकर बहती है। यह उद्यान वनभैंसो का निवास स्थल है। वर्तमान में देश में केवल काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान असम तथा छत्तीसगढ़ के उदंती और पामेड़ अभयारण्य में ही वन भैंसे मिलते हैं। इंद्रावती उद्यान क्षेत्र में बाघों की अच्छी संख्या होने के कारण इसे प्रोजेक्ट टायगर योजना में शामिल किया गया है। वनभैंसा और बाघ के अलावा यहां तेन्दुआ, नीलगाय, चीतल, सांभर, भालू, जंगली सुअर, गौर, मोर आदि वन्यप्राणी देखे जा सकते हैं।
इस संरक्षित क्षेत्र में सागौन एवं मिश्रित प्रजाति के वन पाये जाते है जिनमें 102 प्रकार के वृक्ष 28 प्रकार की लताऐं 46 प्रकार की झाडिय़ां बांस फर्न एवं ब्रायोफाईट पाये जाते है। जैसे - सागौन, शीशम, साजा, सलई, हल्दू, सेन्हा, तिनसा, जामुन, तेन्दू, धावडा, बीजा, साल, चार आदि। भोपालपटनम से 70 कि.मी. की दूरी पर भद्रकाली नामक स्थान पर इंद्रावती एवं गोदावरी नदी का संगम है। यह स्थान बहुत ही खूबसूरत है। पर्यटक इस स्थान पर पिकनिक का आनंद लेते हंै।
गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान
बैकुण्ठपुर जिला कोरिया में बैकुण्ठपुर- सोनहत मार्ग पर 35 किलोमीटर दूरी पर स्थित है यह राष्ट्रीय उद्यान। राज्य बनने के बाद वर्ष 2001 में इस राष्ट्रीय उद्यान का निर्माण किया गया था। ऊंची- ऊंची पहाडिय़ों और नदियों से घिरे इस उद्यान का क्षेत्रफल एक हजार चार सौ वर्ग किलोमीटर है। इस राष्ट्रीय उद्यान से होकर हसदेव, गोपद एवं लोधार नदियां बहती हैं। हसदेव नदी का उद्गम इस राष्ट्रीय उद्यान के अंदर है। अन्य दर्शनीय स्थलों में हसदेव नदी का उद्गम स्थल आमापानी, खेकड़ा माड़ा हिलटॉप, नीलकंठ जल- प्रपात, च्यूल जल- प्रपात, गांगीरानी माता की गुफा, आनंदपुर, बीजाधुर, सिद्धबाबा की गुफा, खोहरा पाट, छतोडा की गुफा, नेउर नदी प्रमुख हैं।
ग्यारह अभयारण्यों से भरा पूरा प्रदेश
इन तीन राष्ट्रीय उद्यानों के अलावा प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में ग्यारह ऐसे अभयारण्य हैं जो विभिन्न तरह की वनस्पतियों और जीव जन्तु के लिए प्रसिद्ध हैं। प्रकृति के ये अमूल्यों धरोहर कहीं खो न जाएं आइए इन्हें संजो लें-
बारनवापारा अभयारण्य
राज्य की राजधानी रायपुर से सबसे नजदीक लगभग सौ किलोमीटर दूर बारनवापारा अभयारण्य स्थित है। अभयारण्य के बीच स्थित बार और नवापारा वन्यग्रामों के आधार पर इसका नामकरण बारनवापारा अभयारण्य हुआ है। सन् 1976 से अस्तित्व में आए इस वन्य प्राणी संरक्षित क्षेत्र का कुल क्षेत्रफल 245 वर्ग किलोमीटर है। रायपुर से बारनवापारा पहुंचने के लिए रायपुर- सराईपाली राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-6 पर रायपुर से 72 किलोमीटर पर स्थित ग्राम पटेवा से 28 किलोमीटर कच्चे मार्ग पर चलकर अभयारण्य के मुख्यालय तक पहुंचा जा सकता है। बारनवापारा अभयारण्य में बाघ, तेन्दुआ, गौर, भालू, सांभर,
कांगेर के जंगलों में 90 फीसदी वृक्ष साल वनों के हैं। यह एक बायोस्फीयर रिजर्व है। छत्तीसगढ़ का राजकीय पक्षी पहाड़ी मैना यहीं पाई जाती है। पहाड़ी मैना इंसान के आवाज की हू-ब-हू नकल करती है।
चीतल, नीलगाय, कोटरी, चौसिंघा, जंगली कुत्ता, मूषक मृग जैसे वन्य प्राणी बहुतायत में पाए जाते हैं एवं आसानी से दिखाई भी देते हैं। इसके आसपास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल होने के कारण बारनवापारा अभयारण्य की नैसर्गिक पर्यटन क्षमता में और वृद्धि हो जाती है।
उदन्ती अभयारण्य
रायपुर से कोई डेढ़ सौ किलोमीटर दूर उड़ीसा से लगा उदन्ती अभयारण्य एक छोटा किन्तु महत्वपूर्ण वन्य जीवन अभयारण्य है। उदंती अभयारण्य दुर्लभ वनभैंसा का प्राकृतिक आवास स्थल है। इसकी स्थापना 1983 में की गई थी। यह अभयारण्य लगभग 232 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है। इस अभयारण्य के बीच मैदानी हिस्सों के साथ छोटी- छोटी असंख्य पहाडिय़ां हैं। यह सुंदर अभयारण्य पश्चिम से पूर्व के ओर बहने वाली उदंती नदी के नाम पर बनाया गया है जो इस अभयारण्य के अधिकांश भाग में बहती है। उदंती अभयारण्य जंगली भैंसों की आबादी के लिए प्रसिद्ध है जो इन दिनों खतरे में है। इसे बचाए रखने के लिए वर्तमान में सरकार ने विशेष प्रयास आरंभ किए हैं। उदंती अभयारण्य के दौरे पर जाकर आप ढेर सारे जंतुओं और पक्षियों को इनकी प्राकृतिक स्थिति में देखने का आनंद उठा सकते हैं।
सीतानदी अभयारण्य
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में स्थित सीतानदी अभयारण्य मध्य भारत के सर्वाधिक प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण वन्य जीवन अभयारण्यों में से एक है। इसकी स्थापना 1974 में की गई थी, इस अभयारण्य में 556 वर्ग किलो मीटर के क्षेत्रफल में अत्यंत ऊंचे नीचे पहाड़ और पहाड़ी तराइयां हैं जिनकी ऊंचाई 327-736 मीटर के बीच है। यह सुंदर अभयारण्य सीतानदी नदी के नाम पर बनाया गया है, जो इस अभयारण्य के बीच से बहती है और देव कूट के पास महानदी नामक नदी से जुड़ती है। सीता नदी अभयारण्य अपने हरे भरे पेड़ पौधों और विशिष्ट तथा विविध जीव जंतुओं के कारण जाना जाता है सीतानदी अभयारण्य की वनस्पति में मुख्यत: नम पेनिनसुलर साल, टीक और बांस के वन शामिल हैं। सीतानदी में प्रमुख वन्य जंतुओं के साथ अनेक प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं। सीतानदी अभयारण्य को इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बाघ अभयारण्य के रूप में विकसित करने की तैयारी भी की जा रही है।
अचानकमार अभयारण्य
बिलासपुर जिले में मैकल पहाडिय़ों के बीच साढ़े पांच सौ वर्ग किलोमीटर इलाके में अचानकमार अभयारण्य फैला हुआ है। बिलासपुर जिला मुख्यालय से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस अभयारण्य के साल वनों की गिनती देश के सर्वश्रेष्ठ साल वनों में की जाती है। सघन वनों से आच्छादित इस अभयारण्य में बाघ और तेंदूआ जैसे मांसाहारी वन्य जीवों के अलावा गौर, सांभर, चीतल, चौसिंघा, बार्किग डियर, भालू, उडऩे वाली गिलहरी,सोनकुत्ता बहुतायत से पाए जाते हैं।
तमोर पिंगला अभयारण्य
आदिवासी बहुल सरगुजा जिले में जिला मुख्यालय अम्बिकापुर से सौ किलोमीटर की दूरी पर तमोर पिंगला अभयारण्य है। ये पूरा क्षेत्र पहाड़ी, घने जंगलों और नदियों से घिरे होने के कारण मनोरम है। बाघ, तेंदूआ और अन्य शाकाहारी वन्य प्राणियों के अलावा राष्ट्रीय पक्षी मोर, तोता, जंगली मुर्गा, दूधराज, तीतर मैना आदि अभयारण्य के लिए खास आकर्षण का केन्द्र होते हैं।
सेमरसोत अभयारण्य
अम्बिकापुर- रामानुजगंज मार्ग पर 58 किलोमीटर की दूरी पर सेमरसोत अभयारण्य है। सेमरसोत नदी के कारण इस अभयारण्य का नाम सेमरसोत पड़ा है। अभयारण्य के प्राकृतिक सुंदरता का अवलोकन करने के लिए यहां अनेक स्थानों पर वॉच टावरों का निर्माण किया गया है।
भोरमदेव अभयारण्य
कवर्धा से 22 कि.मी. की दूरी पर स्थित भोरमदेव अभयारण्य जैव विविधता एवं वन्य प्राणी के लिए अपना विशिष्ट स्थान रखता है। इस अभयारण्य का नाम सुविख्यात भोरमदेव मंदिर के नाम से रखा गया है। जिसका निर्माण 11वीं सदी में नागवंशी राजा गोपालदेव द्वारा कराया गया है। इस अभयारण्य का गठन 2001 में किया गया है, इसका कुल क्षेत्रफल 163.80 वर्ग कि.मी. है।
भोरमदेव अभयारण्य मैकल पर्वत श्रृंखला में समुद्र सतह से लगभग 600 मीटर से 894 मीटर की ऊंचाई में स्थित है। इसमें मुख्यत: साल तथा मिश्रित प्रजाति के वन है, इस अभयारण्य में कुछ स्थानों पर सागौन के प्राकृतिक वन भी पाये जाते हैं। यह अभयारण्य विश्व विख्यात कान्हा टाईगर राष्ट्रीय उद्यान एवं चिल्फी बफर जोन के साथ जुड़ी होने के कारण और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
गोमर्डा अभयारण्य
रायगढ़ से 52 कि.मी. दूर सारंगढ़ के पास गोमर्डा अभयारण्य में वन्य प्राणियों की बढ़ती हुई संख्या एवं उसके विस्तार को देखते हुए अभयारण्य क्षेत्र का विस्तार 1983 में किया गया। वर्तमान में गोमर्डा अभयारण्य का कुल क्षेत्रफल 277.82 वर्ग कि.मी. है। अभयारण्य का अधिकांश भाग पहाड़ी है। राठन बुढ़ाघाट, गोमर्डा, दानव करवट दैहान जैसी पहाडिय़ां इस अभयारण्य के सौन्दर्य को और भी बढ़ाती है। लात, मनई जैसी छोटी-छोटी जल प्रवाही नदियां इस क्षेत्र के वन्य जीवों की प्यास बुझाती हैं। इस अभयारण्य में यूं तो अनेक प्रकार के वन्य प्राणी पाये जाते हैं लेकिन भालू जो सर्वभक्षी माना जाता है, इस अभयारण्य में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।
बादलखोल अभयारण्य
जशपुर जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूरी पर स्थित यह आरक्षित वनखण्ड कभी जशपुर महाराज का शिकारगाह था। बादलखोल अभयारण्य कुल 32 वनकक्षों से मिलकर बना है, जिसका कुल क्षेत्रफल 104.454 वर्ग किलोमीटर है। अभयारण्य का संपूर्ण क्षेत्र ईब एवं डोड़की नदी का जलागम क्षेत्र है। यह अभयारण्य 1975 में बनाया गया था। अभयारण्य में बिहार एवं उड़ीसा से आने वाले हाथियों के झुण्ड इस वनक्षेत्र को कोरिडोर के रूप में इस्तेमाल करते है। इस अभयारण्य के आसपास अनेक पर्यटन स्थल है- जैसे अम्बिकापुर नगर से पूर्व दिशा में 60 कि.मी. पर स्थित सामरबार नामक स्थान हैं, जहां प्राकृतिक वन सुषमा के बीच कैलाश गुफा स्थित है। इसे संत रामेश्वर गहिरा गुरू ने पहाड़ी चट्टानों को तराश कर निर्मित करवाया है। इस गुफा में शिव-पार्वती मंदिर बाघमाडा एवं अनेक लोक देवी- देवता के स्थान हैं। यहां महाशिवरात्रि पर विशाल मेला लगता है। इस गुफा से लगा हुआ दो पहाडिय़ों के बीच गुल्लू जलप्रपात, छुरी जलप्रपात पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।
भैरमगढ़ अभयारण्य
बीजापुर जिले से 48 कि.मी. दूर भैरमगढ़ नामक स्थान पर स्थित है यह अभयारण्य। इस अभयारण्य का नाम ग्राम भैरमगढ के नाम पर पड़ा है। इसका कुल क्षेत्रफल 138.95 वर्ग कि.मी. है। इस अभयारण्य से इंद्रावती नदी बहती है। यहां सागौन, अर्जुन, आंवला, जामुन, तिन्सा, धावडा, तेन्दु, बिजा, हर्रा, हल्दु, सलई, सेन्हा आदि के अतिरिक्त बांस एवं औषधीय पौधे भी पाये जाते हैं। इंद्रावती नदी के किनारे घास के मैदान पाये जाते हैं, जिसका उपयोग वन भैसों के द्वारा किया जाता है। यह अभयारण्य वन भैसा के कारण प्रसिद्ध है। वन भैसे के अतिरिक्त इस अभयारण्य में शेर, तेन्दुआ, गौर, नीलगाय, चितल, साभंर, काकड, लोमडी, भालू, खरगोश, जंगली सुअर आदि वन्य प्राणी एवं विभिन्न प्रकार के पक्षी भी पाये जाते हैं।
पामेड़ अभयारण्य
यह अभयारण्य बीजापुर जिले के आवापल्ली ग्राम से 33 कि.मी. दूर जगदलपुर -निजामाबाद पर स्थित है। इसका कुल क्षेत्रफल 442.23 वर्ग कि.मी. है। इस अभयारण्य का नाम पामेड ग्राम के नाम से रखा गया है। यह अभयारण्य पांच पहाड़- मेटागुंडंम, कोरागुटटा, बलराजगुटटा, कोटापल्ली एवं डोलीगुटटा से घिरा हुआ है। इस अभयारण्य में तलपेरू, चिंतावगु नदी बहती है नदी के किनारे घास के मैदान पाये जाते हैं, जिसका उपयोग वन भैसे के द्वारा किया जाता है। साल, सागौन, अर्जुन, आंवला, जामुन, तिन्सा, तेन्दु, बिजा, हर्रा, हल्दु, सलई, सेन्हा आदी के वृक्ष यहां बहुतायत से पाए जाते हैं। किनारे- किनारे घास के मैदान पाये जाते हैं, जिसका उपयोग वन भैसे के द्वारा किया जाता है। यह अभयारण्य वन भैसा के पाये जाने के कारण प्रसिद्ध है। वन भैसे के अतिरिक्त इस अभयारण्य में शेर, तेन्दुआ, गौर, नीलगाय, चितल, सांभर, काकड़, लोमड़ी, भालू, खरगोश, जंगली सुअर आदि वन्य प्राणी एवं विभिन्न प्रकार के पक्षी भी पाये जाते हैं।

(उदंती फीचर्स)

रंग- बिरंगी दुनिया

ऐसे मशहूर हो गई यह तस्वीर
द्वितीय विश्व युद्ध के खात्मे पर मनाए जा रहे जश्न के दौरान एक अमेरिकी नाविक का चुंबन लेते हुए अनजाने में इस बहुचर्चित तस्वीर का हिस्सा बनीं पूर्व नर्स एडिथ शेन की 23 जून 2010 को 92 साल की उम्र में मौत हो गई।
एडिथ की यह तस्वीर उस समय खींच ली गई ती जब द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने पर अपनी खुशी का इजहार करने के लिए न्यूयार्क में एक सैनिक ने गर्मजोशी के साथ उनका चुम्बन ले लिया था। तब उन्हें इसका अहसास भी नहीं रहा होगा कि उनकी तस्वीर इस तरह खींच ली जाएगी और एक भयावह युद्ध के इतिहास की सबसे यादगार तस्वीरों में से एक बन जाएगी।
एडिथ 14 अगस्त 1945 को न्यूयॉर्क में नर्सिंग की पढ़ाई कर रही थीं और यही वह तारीख थी जब रेडियो नेटवर्क की मदद से पता चला कि जापानियों ने आत्मसमर्पण कर दिया है। तब एडिथ युद्ध के खात्मे का जश्न मनाने के लिए टाइम्स स्क्वायर पर गई थीं। वहां जश्न मनाने के दौरान एडिथ नौसेना के एक नाविक की बांहों में चली गईं। एडिथ की ओर से किए गए इस किस को फोटोग्राफर एल्फ्रेड आइजेनस्टाड्ट ने अपने कैमरे में कैद कर लिया और बाद में यह तस्वीर मैगजीन में प्रकाशित होकर दुनिया भर में मशहूर हो गई।
कई साल पहले जब एडिथ से इस तस्वीर के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा- मैं डॉक्टर्स हॉस्पिटल से टाइम्स स्क्वायर गई थी क्योंकि जंग खत्म हो चुकी थी। एक न्यूयॉर्क निवासी और कहां जा सकता था? वहां इस व्यक्ति ने मुझे पकड़कर किस किया और फिर हम अलग- अलग दिशाओं में चले गए। वह कौन था, यह जानने का कोई तरीका नहीं था। लेकिन मुझे जरा भी बुरा नहीं लगा क्योंकि वह उनमें से था जिसने हमारे लिए जंग लड़ी थी। कई पुरुष दावा करते रहे हैं कि चित्र में नर्स को चुम्बन करते हुए उनका चित्र है, परंतु ऐसे सभी वादे विवादास्पद रहे हैं।
10 हजार रुपये कमाने वाला लंगूर
दिल्ली में कुछ वर्ष पूर्व बंदरों के आतंक से लोग त्रस्त थे तब इस समस्या से निजात पाने के लिए लंगूरों का सहारा लिया गया था। आज दिल्ली ही नहीं, देश के कई शहरों में लोग बंदरों के आतंक से दुखी हैं। इनमें से एक शहर कानपुर भी है। यहां एस्टेट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन का ऑफिस जिस जगह है वहां बंदरों ने काफी उत्पात मचा रखा है। वे न लोगों के घरों से खाना, कपड़े आदि उठा लेते हैं तथा घर में रखे गमलों आदि को भी तोड़- फोड़ देते हैं यहां तक तो फिर भी ठीक है पर जनाब ये लंगूर एस्टेट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफिस से फाइलें भी उठा कर ले जाते थे और उसे फाड़ देते थे।
कई लोगों को ये काट भी चुके हैं इन सब कारणों से लोगों का सुबह- शाम बाहर निकलना भी मुश्किल हो रहा था। कई स्तर पर इन बंदरों को यहां से भगाने का प्रयास किया गया पर हर प्रयास विफल रहा तो वहां के लोग लंगूर की शरण में आ गए। इस लंगूर से बंदर डर कर दूर ही रहते हैं। अब इस लंगूर की इस मुहल्ले और ऑफिस के गेट पर ड्यूटी लगा दी गई है। बिलकुल किसी मुस्तैद चौकीदार की तरह यह लंगूर यहां तैनात रहता है।
इंश्योरेंस के डिप्टी डायरेक्टर प्रकाश चन्द शर्मा के अनुसार अब काफी राहत है। कोई बंदर यदि निकट आता भी है तो उसे यह लंगूर डरा कर भगा देता है। दिन में यह लंगूर अपने मालिक के साथ मुहल्ले के दो- चार चक्कर भी लगा आता है।
लेकिन यह लंगूर यहां कोई फ्री में काम नहीं कर रहा है। बाकायदा इसे दस हजार महीने की तनख्वाह दी जाती है। इसके मालिक का कहना है इससे ही इसका खाना-पीना चलता है। यानी लंगूर भी खुश, मालिक भी और लोग तो हैं ही खुश।