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Dec 3, 2025

कविताः एक प्रतिशत

  - डॉ. शैलजा सक्सेना

हर नया दिन लेकर आता है 

एक चुनौती!


ललकारता है सुबह का सूरज…

कि दिन की सड़क पर 

आज कितने कदम चलोगे 

अपने सपने की दिशा में?

सच बात तो यह है

कि 90% दिन तो मुँह, पेट और 

हाथों के नाम ही हो जाता है,

दिमाग और सपनों का नम्बर कब आता है?


बचे 10% में से 8% 

जाता है घर और परिवार के नाम,

बचे दो प्रतिशत में से एक प्रतिशत

मैं अपनी थकावट को सहलाते,

शरीर और मन के दर्द की गुफ़ाओं में घूमते

निकाल देती हूँ

तब बचे 1 प्रतिशत को दे पाती हूँ

अपने सपनों को….!


रात गए,

समय के साहूकार को 

उस दिन की उपलब्धि बताती हूँ;

चाँद के बिस्तर पर

तारों का बिछौना ओढ़,

इसी में संतुष्टि का उत्सव मनाती हूँ

कि मैं एक प्रतिशत ही सही, 

अपने सपनों की तरफ़ तो आती हूँ,

मैं एक प्रतिशत ही सही,

रोज़ अपने सपनों की तरफ़ तो आती हूँ!!

सम्प्रतिः Co- Founding Director- Hindi  Writers Guild, Canada.


पंजाबी कहानीः सुर्ख शालू

 - बलदेव सिंह ग्रेवाल, अनुवाद : सुभाष नीरव

बात बहुत पुरानी है। तब की शायद जब बाबा आदम ने वर्जित फल चख लिया था। और वह बात आज तक चली आ रही है।

इस बार भारत आया था तो यह बात, मेरे साथ ही एक हसरत बनकर आ गई थी।

... तब मैं पागलों की तरह शोर मचाता खेत में इधर-उधर भागता फिर रहा था। हाथ में पकड़ा कनस्तर डंडे से पीटे जा रहा था। आस पास के सभी खेतों में लोग मेरी तरह ही हो-हल्ला मचाते घूम रहे थे। टिड्डियाँ ही टिड्डियाँ चारों तरफ… पिछली सदी के पचासवें दशक में टिड्डियाँ… कुछ सालों बाद टिड्‌डी दल अक्सर ही हमला बोलता था। पूरा आसमान टिड्डियों से भरा हुआ। लगता था, काली आँधी आई हो। मैं शोर मचाता कतस्तर पीटता मक्की की फसल में से टिड्डियों को उड़ा रहा था। वे जहाँ कहीं भी बैठ जातीं, फसल चट कर जाती थीं। मक्की की फसल अभी बालिश्त भर ही हुई थी। मैं अकेला ही करीब छह कनाल के खेत में टिड्डियों को नीचे उतरने से रोक रहा था। तब पंजाब में चकबंदी नहीं हुई थी। कोई खेत कहीं था और कोई कहीं। सारा परिवार अलग-अलग खेतों में टिड्डी उड़ाने गया हुआ था। इस पश्चिम दिशा वाले खेत में मुझे भेजा गया था।

पूरा प्रयास रहता था कि टिड्डियों को एक जगह बैठने न दिया जाए, पर वे तो असंख्य होती थीं। उनको अपनी मरजी करने से रोकना असंभव-सा ही लगता था। मैं तब नौंवी कक्षा में पढ़ता था। मुझे मेरे माता पिता ने जैसे कहा था, हुक्म बजा रहा था। दौड़ दौड़कर खेत के कोने-कोने में जाता और अपनी फसल को बचाने की जी- तोड़ कोशिश करता। 

अचानक कानों में किसी की चीखें सुनाई दीं। मैंने देखा साथ वाले खेत में एक लड़की डर के मारे चीख रही थी। हाथ में पकड़ा हुआ उसका टीन भी नीचे गिर गया था। उसकी दर्दनाक चीख सुनकर मैं उस तरफ दौड़ा। लड़की के पूरे शरीर पर टिड्डियाँ बैठी हुई थी और वह नीचे गिरी पड़ी थी। मैंने अपना साफा मार-मार कर टिड्डियाँ हटा दीं। फिर भी कोई न कोई टिड्डी जब उसके शरीर को छू जाती तो वह सहम जाती। चीखने लगती। 

उस घड़ी पता नहीं क्यों, मेरे लिए फ़सल को नहीं, लड़की को बचाना जरूरी हो गया था। वह हमारे गाँव की लड़की थी - सीतो। मेरे से एक जमात पीछे पढ़ती थी। टिड्डियों से डरती वह मेरी ओर यूँ देख रही थी, मानो मैं कोई परोपकारी होऊँ।... चारों तरफ टिड्डी दल आँधी की भाँति साँय-साँय कर रहा था। वह टिड्डी को अपने करीब आते देख घबरा उठती थी। उस पल मेरा धर्म बन गया था कि एक भी टिड्डी सीतों के शरीर को न छूने पाए। पर मेरा वश नहीं चल रहा था। तभी मैंने उसको अपनी बाहों में उठा लिया। वह भयभीत- सी मेरी बाहों में सिमट गई।

मैं उसको लेकर साथ वाले ईंख के खेत में घुस गया। ऊँची खड़ी ईंख में टिड्डी दल का नीचे धरती तक पहुँचना कठिन था। हम दोनों नीचे सिमटकर बैठ गए। काफी देर बैठे रहे। टिड्डी दल हमारे सिर के ऊपर से गुज़रता रहा, कई घंटों तक। हम आपस में कुछ नहीं बोल रहे थे, सटकर बैठे थे। शरीरों का स्पर्श था, एक-दूजे को निहारना था।

उस घड़ी टिड्डी दल हमारे सिरों पर शामियाना बन गया और हमारे इर्द-गिर्द खड़ी ऊँची ईंख - कनातें। ठीक इन्हीं पलों में वही बात हो गई, जो बाबा आदम के वर्जित फल खाने के वक्त हुई थी। 

अँधेरा होने पर हम अपने अपने घर लौट गए। टिड्डी दल जा चुका था। कुछ दिनों बाद गाँव में शोर मचा कि टिड्डियों ने गाँव के चौए (नमी वाला क्षेत्र) में अंडे दिए हैं। उन अंडों के टिड्डी बनने से पहले-पहले धरती में से खोदकर निकालने का सरकारी हुक्म आ गया था। स्कूल के बच्चों को भी इन अंडों को निकालने के लिए जाना पड़ा। हमें अंडों के वजन के हिसाब से पैसे दिए जाने थे। हम अपने झोले उठाए खुरपियों से खोद कर अंडे निकालने चले गए। वे अंडे परस्पर जुड़े हुए उँगली जैसे प्रतीत होते थे। शाम तक मैंने अपना झोला अंडों से लगभग भर लिया। पैसों का लालच जो था! मैंने देखा, मिस्त्रियों की सीतो अंडे खोदती-खोदती मेरे पास आ गई थी। वह थोड़ा मायूस लगती थी। उसे ज्यादा अंडे नहीं मिले थे। उसका झोला मुश्किल से अभी आधा ही भरा था। जब लौटने का समय हुआ, मैंने अपने झोले में से बहुत सारे अंडे उसके झोले में डाल दिए। उस पल सीतो ने अहसान और खुशी के मिले-जुले भाव के साथ मेरी तरफ देखा था। 

और फिर हमारे बीच एक मूक दास्तान चल पड़ी थी।

जब कभी राह में, गली में हमारी नजरें मिलतीं, महीन मुस्कान का आदान-प्रदान हो जाता। वह देखती और नजरें झुका लेती… दिल के अंदर तरंगें उठने लगतीं।

…कभी दीवाली पर गुरद्वारे में दिये जलाते हुए उसका चेहरा रोशनी में दिपदिपाता नज़र आ जाता। कभी राह में सिर पर बापू के लिए रोटी उठाए जाती हुई मिल जाती। आँखें मिलतीं तो उसका रंग सिंदूरी हो जाता। कभी दिन-त्योहार पर हमारे बोल भी साझे हो जाते, बस।

उन दिनों गाँवों में ऐसे रिश्ते वर्जित ही होते थे। कभी जी भरकर मुलाकात हुई ही नहीं। टिड्डी दल रोज-रोज कब आते हैं। वो तो कभी- कभार बरसों बाद ही आते हैं।

मैं अभी कालेज में पढ़ता था, जब उसका विवाह हो गया। हम बारात के लिए चाँदनियाँ लगा रहे थे। वह शादीवाला सुर्ख शालू ओढ़े जब मेरे पास से गुजरी, तो उसने मेरी तरफ देखा। आँखें मानो आँसुओं को छिपा रही हों… अधरों पर हया का ताला।

उस पल एक टीस-सी मेरे अंदर उभरी। और वह ससुराल चली गई। फिर कभी नहीं मिली।

मैं पढ़ाई पूरी करके नौकरी पर लग गया। शादी हो गई। बच्चों वाला परिवार हो गया। हर खुशी नसीब हुई। मेरी पत्नी ने मेरा जीवन स्वर्ग बना दिया। जिन्दगी से कभी कोई शिकवा नहीं हुआ। दौलत का भी कभी अभाव नहीं रहा। जीवन में हर वांछित सुख प्राप्त हुआ। शहर में ही कोठी बना ली। माँ-बाप के परलोक सिधारने के बाद गाँव से रिश्ता ही टूट गया। बेटे अमरीका पढ़ने चले गए, वहीं सैट हो गए। मैं रिटायर हुआ, तो बेटों ने हमको अमरीका बुला लिया। इतने वर्षों के सफ़र में सब कुछ होते हुए भी सीतो हमेशा मेरे ज़हन में मौजूद रही। उसका वो निहारना, उसकी वह मुस्कान सदैव पीछा करती रही। किसी शिकवे की तरह नहीं, एक सुखद अहसास की तरह…।

जिन्दगी में उसकी एक झलक पाने की कामना हमेशा दिल में रेंगती रही है।

पिछले साल जीवन-संगिनी का साथ छूट गया। वह दिल के दौरे से चल बसी। एक झटके से बहार ख़िजाँ में बदल गई। बेटों, पोते-पोतियों के होते हुए भी अकेला हो गया। पत्नी के साथ बिताया एक-एक पल याद आता, दुखी हो जाता। इस दुख में भी सीतो का चेहरा उभरकर सामने आ जाता - टिड्डियों से डरी-सहमी… मेरे साथ सिमटकर बैठी सीतो… करीब से सुर्ख शालू ओढ़े गुजरती सीतो, होंठों पर हलकी मुस्कान… और आँसुओं को छिपाती पलकें।

मैंने इंडिया का एक चक्कर लगाने का मन बना लिया। बेटे भी सोचते कि शायद इससे मेरा दिल बहल जाएगा। मेरे दिल में सीतो को एक झलक देखने की कामना जवान हो गई थी। यह हसरत मेरे साथ ही इंडिया आ गई।

मुझे याद था, वह मेरी बुआ के गाँव में ही ब्याही थी। बुआ तो गुज़र गई थी, मैं उसके पुत्र को मिलने के बहाने उस गाँव में गया। बातों बातों में मैंने उससे पूछ लिया, “हमारे गाँव के मिस्त्रियों की लड़की तुम्हारे गाँव में ब्याही थी।”

उसके जवाब ने सीतो के सुर्ख शालू को सफ़ेद कफ़न में बदल दिया। उसने बताया, “वह तो कई साल पहले चल बसी थी”

मेरी आह निकल गई…

“वह तड़के जंगल-पानी को ईंख के खेत में गई थी। वहाँ मधुमक्खी का छत्ता लगा हुआ था। मधुमक्खियाँ उसके पीछे लग गई। वे उसके पूरे शरीर से चिपट गईं, उसका पूरा बदन ढक लिया। वह चीखती रही, चिल्लाती रही। गाँव की ओर भागी, पर मधुमक्खियों से डरता कोई उसके नजदीक न हुआ। बहुत देर बाद एक बंदा धुआँ करता उसके करीब गया और जब उसे हस्पताल ले जाया जा रहा था, वह राह में ही…।”

मैं अंदर ही अंदर तीखे दर्द से कराह उठा। सीतो का अफसोस करने लगा। बुआ का पुत्र बता रहा था, “जब मधुमक्खियों ने उसको घेर रखा था, वह किसी बब्बी का नाम ले लेकर पुकार रही थी।”

मैं उस पल बुआ के पुत्र के पास बैठा होने के बावजूद मानो उसके पास नहीं बैठा था… मैं तो खेतों में टिड्डियाँ उड़ाने जा लगा था।

बचपन में मुझे ही ‘बब्बी’ कहकर बुलाया जाता था।


लघुकथाः पेट दर्द

   - प्रभुदयाल श्रीवास्तव 

   दो मरीज अस्पताल में एक साथ दाखिल हुए। डाक्टर हड़बड़ाया हुआ पहले मरीज को देखकर कमरे से बाहर आया। लोगों ने पूछा क्या बात है डॉक्टर, क्यों हड़बड़ी में हैं।

"भीतर मंत्रीजी हैं, उनके पेट में बहुत दर्द है।" डाक्टर बोला।

अब डाक्टर दूसरे मरीज को देखने दूसरे कमरे में गया। वहाँ से भी कुछ हताश- सा वापस आया। इतने उदास !"क्या हुआ डाक्टर?"लोगों ने पूछा।

‘‘इस मरीज़ को भी पेट में भयानक पीड़ा है।"

‘‘तो क्या दोनों को एक सी बीमारी है?"

  "नहीं भाई एक ने चार दिन का खाना इकट्ठा खा लिया है।"

"और दूसरे को?"

"उसने चार दिन से कुछ नहीं खाया।"

सम्पर्कः 12 शिवम् सुन्दरम नगर छिंदवाड़ा , म. प्र. 480001, मो. 9131442512

लघुकथाः ख़ुशबू

  - सुदर्शन रत्नाकर

टिकट लेने के लिए जैसे ही मैंने अपने हैंडबैग में हाथ ड़ाला मेरा पैसों वाला पर्स उसमें से ग़ायब था । सारा बैग अच्छी तरह से देख लिया; लेकिन वहाँ था ही नहीं तो मिलता कहाँ से। घर से चलते हुए इसमें रखा ही नहीं था या फिर बस में चढ़ते समय किसी ने निकाल लिया होगा । मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था । एक तो सीट पर गाँव का कोई आदमी बैठा था, उसके मोटे कपड़ों से पसीने की गंध मेरे नथुनों में घुस कर सिर को चकरा रही थी, उस पर यह मुसीबत । स्वयं पर कोफ्त हो रही थी । लम्बा सफ़र और उस पर पैसे नहीं  । सोचा बस रुकवा कर उतर जाना ही मुनासिब होगा । एक बार फिर बैग में हाथ डाला । कुछ सिक्के खनकने लगे । उसमें झाँककर देखा काग़ज़ों के साथ एक- दो नोट भी नज़र आए । थोड़ी- सी आशा बंधी ।  तभी देखा सहयात्री मेरी हर हरकत पर नज़र रख रहा है । मैंने उसकी ओर क्रोध से देखा तो वह अटपटा गया और खिड़की से बाहर देखने लगा ।

मैंने बैग में से नोट और सिक्के निकाल कर देखे, उनतालिस रुपये थे । संयोग था कि मेरी टिकिट भी इतने की थी मैं इतमीनान से कंडक्डर का इंतज़ार करने लगी । सोचा बस से उतर कर रिक्शा कर लूँगी और किराया घर जाकर दे दूँगी । सुबह ही पता चला था कि माँ ठीक नहीं है । जल्दी- जल्दी चलने के कारण सब कुछ गड़बड़ा गया था । इधर यात्री के पसीने की गंध मुझे और परेशान कर रही थी एक हथेली में पैसे रख कर दूसरे हाथ से अपना रुमाल नाक पर रख लिया था कितने  जाहिल हैं ये लोग ।  न अच्छी तरह नहाते- धोते  हैं, न कपड़े बदलते हैं । सफ़र में दूसरे यात्री का ध्यान तो रख लेना चाहिए । मैं महीने कुनमुना रही रही थी । कंडक्डर पीछे से टिकट देकर मेरी सीट तक आ पहुँचा था मैंने उनतालीस रुपये देकर टकिट माँगा । "कहाँ का टिकट चाहिए मैडम । "

" उनतालीस रुपये तो पानीपत तक के लगते हैं । वहीं का दीजिए न । " मैंने तल्ख़ी से कहा

" मैडम सात रुपये और दें । "

" सात रुपये और कैसे! उनतालीस ही तो लगते हैं । पिछली बार इतने ही दिए थे । "

" वह पिछली बार की बात है मैडम । अब छियालीस लगेंगे । किराया बढ़ गया है। " कडंक्कर ने कहा । मेरी आवाज़ सुन कर सभी यात्री मेरी ओर देखने लगे । "पर मेरे पास तो इतने ही पैसे हैं । " मैंने रुआँसी - सी होकर कहा

" तो ऐसा कीजिए मैडम उनतालीस रुपये की टिकट दे देता हूँ । वहाँ तक चली जाएँ, बाक़ी रास्ता पैदल चली जाएँ।"

सभी यात्री हँसने लगे पर कोई सहायता के लिए आगे नहीं आ रहा था । मैं शर्मिंदगी से ज़मीन में धँसी जा रही थी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ । तभी मेरे साथ बैठे यात्री ने अपनी जेब से दस रुपये का नोट निकाल कर कडंक्कर को देते हुए कहा,"ईब चुप भी हो जा , ले बाक़ी के पीसे और मैडम को टिकट काट कर दे दे । "

मैं उसे मना करने ही जा रही थी कि उसने हाथ के इशारे से रोकते हुए कहा, "कोनो बात नहीं बैन जी मानस ही तो एक दूसरे के काम आवे है।’’

कडंक्कर ने टिकिट और तीन रुपये मेरे हाथ में थमा दिए । मैं कृतज्ञता से सहयात्री  को देख रही थी ।

मुझे अब उसके कपड़ों से पसीने की बदबू नहीं  ख़ुशबू आ रही थी ।

सम्पर्कः ई-29, नेहरू ग्राउंड, फ़रीदाबाद 121001, मोबाइल 9811251135

आँखों देखा हालः भारत और अमेरिका के कुत्ते

 - डॉ. हरि जोशी , लॉस एंजेलिस से

जब भारत में कोई व्यक्ति इधर की बात उधर करता है, तो कहावत की चपेट में आ जाता है , ‘कूकर- सा सूँघत फिरे इते उते की बात।’ यह कहावत यद्यपि भारतीय परिवेश पर ही लागू हो सकती है,अमेरिकी परिवेश पर नहीं।

 मैं इन दिनों अमेरिका में  देख रहा हूँ ,यहाँ सुअर तो देखने को भी नहीं मिलते; क्योंकि अधिकतर तो स्थानीय नागरिकों के उदरस्थ हो जाते हैं। अमेरिका में घर- घर कुत्ते होते हैं, किन्तु सड़क पर एक भी उद्दंड नहीं मिलेगा । यहाँ एक भी कुत्ता अकेले और आवारा घूमते हुए नहीं पाया जाता।

सारी अमेरिकी महिलाएँ ,पालतू को पदोन्नत कर उसे बेटा ही बुलाती हैं- ‘माय सन’। उनका आग्रह होता है उसे कुत्ता कदापि न कहें, उसे या तो नाम से बुलाएँ, अथवा बेटा कहें। कुत्ता कहकर कदापि अपमानित न करें।

अब जरा यहाँ की हरियाली पर आ जाएँ। अमेरिका में प्रत्येक घर के सामने भरपूर हरियाली रहती है। मुझे आश्चर्य होता है यह हरियाली कहाँ से आती है ? उस हरियाली का श्रेय मैं उन पेट्स को देता हूँ, जो ड्रिप इरीगेशन (बूँद- बूँद सिंचाई) करते रहते हैं। यह विशेष गुण इस प्राणी में देखा जाता है- शरीर का सारा का सारा जल, एक ही पौधे पर खर्च नहीं करता, बचा- बचाकर अनेक पौधों की सिचाई करता चलता है। अमेरिका में जो इतनी हरियाली और स्वच्छता दिखाई देती है वह इन ‘कुत्तों’, सॉरी बेटों के कारण ही रहती है।

प्रत्येक पेट को, दिन में दो, या तीन बार भी घुमाने ले जाया जाता है। पेट्स में वह विशेष गुण है, जिसके कारण एक पेट अनेक पौधों की सिंचाई करता है। प्रत्येक यात्रा में अनेक पौधों पर जलाभिषेक करता चलता है। सारा जल एक ही पौधे या वृक्ष पर नहीं डालता। शासन द्वारा इस प्रकार जल- विसर्जन की तो अनुमति है; क्योंकि उससे हरियाली बढ़ती है; किन्तु पेट के मल विसर्जन की नहीं। यदि एक बार भी पेट ने मल विसर्जन खुले में किया और उसे नहीं उठाया गया, तो कुत्ते का मालिक तो पकड़ में आ ही जाएगा, तब कूकर स्वामी को 75 डॉलर का दंड भुगतना होगा । एक दो बार लापरवाही बरती कि मालिक को 500 डॉलर तक जुर्माना भरना होगा। जिस प्रकार घर में छोटे बेटे की पॉटी का ध्यान रखा जाता है, ठीक उसी प्रकार बाहर चहलकदमी करते हुए पेट, की पॉटी का। यहाँ यदि कोई अपरिचित कुत्ता भी आमने सामने आ जाए, तो उनका परस्पर मिलन भौंककर नहीं होता, प्रेमालाप के साथ होता है।

कुत्तों का पग प्रक्षालन

“इन आँखों का यही विशेष, वह भी देखा यह भी देख।”

मैंने अपनी ग्रामीण संस्कृति में संतों के पग प्रक्षालन होते देखे हैं। जब कोई साधु संत गाँव में आ जाते थे, तो भावुक भक्त उनके पग प्रक्षालन करते थे, यानी पाँव पर स्वच्छ जल डालते और अपने हाथों से परात में मल- मलकर उनके चरण धोते थे।

जब बारात आती थी, तब भी वधू पक्ष के वरिष्ठ लोगों द्वारा, वर पक्ष के बड़े बूढ़ों के पग प्रक्षालन करने की परंपरा थी । सन 1949 से पहले हम भी अपने गाँव में सुबह- सुबह लोटा लेकर गाँव के बाहर निवृत्त होने जाते थे; क्योंकि नंगे पाँव जाते थे; इसलिए लोटे को तथा हाथ – पाँव को भी मिट्टी या राख से रगड़कर  धोते थे।

भारतीयों को यह जानकारी नहीं, कल्पना भी नहीं, अमेरिका में कुत्तों का भी दिन में दो बार पग प्रक्षालन होता है।

भारत हो या अमेरिका, कुत्तों को दो बार यानी सुबह और शाम, साथ ले जाकर घुमाना आवश्यक रहता है, हाँ घर में घुसते ही पग प्रक्षालन करना पड़ता है। कई बार मनुष्य तो बस एक बार सुबह या शाम पेट साफ़ करता है, अमेरिका में श्वान की शान यह है कि दो बार उसे शौच के बहाने घुमाने ले जाना अत्यावश्यक होता है। कुत्ते रखने वालों को मजबूरी में दो बार पदयात्रा करनी ही पड़ती है। निस्संदेह इससे मनुष्यों का स्वास्थ्य भी बेहतर होता है।