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Oct 1, 2025

कविताः आत्मदीप

  - हरिवंश राय बच्चन







मुझे न अपने से कुछ प्यार,

मिट्टी का हूँ, छोटा दीपक,

ज्योति चाहती, दुनिया जब तक,

मेरी, जल-जल कर मैं उसको देने को तैयार ।


पर यदि मेरी लौ के द्वार,

दुनिया की आँखों को निद्रित,

चकाचौध करते हों छिद्रित

मुझे बुझा दे बुझ जाने से मुझे नहीं इंकार ।


केवल इतना ले वह जान

मिट्टी के दीपों के अंतर

मुझमें दिया प्रकृति ने है कर

मैं सजीव दीपक हूँ मुझ में भरा हुआ है मान ।


पहले कर ले खूब विचार

तब वह मुझ पर हाथ बढ़ाए

कहीं न पीछे से पछताए

बुझा मुझे फिर जला सकेगी नहीं दूसरी बार ।

व्यंग्यः अमीर बचाइए, सिस्टम बचेगा

  - जवाहर चौधरी  

एक न एक दिन मरना तो सबको पड़ता है । आया है सो जाएगा, राजा रंक फकीर । कोई विकल्प तो है नहीं।  अस्पताल चलें हम । अस्पताल में आदमी कायदे से मरता है। अस्पताल के पास सुपर स्पेशलिटी होती है। वे अपना काम जानते हैं और करने में दक्ष होते हैं। घरों में लोगों को नहीं मालूम होता हैं कि कब क्या करना चाहिए। मरीज की सांस उखड़ने लगती है तो दौड़कर बुआ जी को फोन करते हैं कि जल्दी आ जाओ बाबूजी की साँस उखड़ रही है। जो भी होना है बुआजी के सामने हो तो अच्छा होता है वरना बाद में केस बिगड़ सकता है। अस्पताल में ऐसा नहीं है। 

जब किसी की सांस उखड़ने लगती है , तो वह डिपॉजिट की रकम बढ़ाकर जमा करवा लेते हैं। इससे जमा बॉडी के जिन्दा रहने की उम्मीद बढ़ जाती है। लोगों को लगता है कि इतना रुपया जमा करवा रहे हैं तो अच्छा इलाज करेंगे। मरीज यानी जमा बॉडी को इतना आराम हो जाता है कि उसकी तरफ से साँस भी मशीन लेती है। इधर आत्मा यमराज के दरबार में पेश हो चुकती है, उसके करम चेक हो चुकते हैं, स्वर्ग या नरक में उसको खोली मिल चुकती है और बंदा अस्पताल में बाकायदा साँसें ले रहा होता है। अब इसे भी आप चमत्कार नहीं कहोगे तो मरो घर पे।

   हम एक खाँटी लोकतांत्रिक देश हैं और सिस्टम उसे जिंदा मानता है जो वोट दे देता है। मजबूरी है, क्या किया जा सकता है। अमीर आदमी का रुतबा अलग है वह वोट नहीं देता फिर भी बकायदा जिंदा माना जाता है। इसका रहस्य है कि वह चंदा देता है। राजनीतिक दल चंदे से जिंदा रहते हैं। अमीर लोग राजनीतिक दलों के ऑक्सीजन सिलेंडर होते हैं। सत्ता की साँसें अमीरों की तिजोरी में होती है। अमीर ना हों तो ऊपर बैठे मालिक का कारोबार भी ठीक से नहीं चले। आप समझ गए होंगे कि अमीर की इच्छा ही सिस्टम की जान होती है। इसलिए अमीरों को बचाना सिस्टम को बचाना है।  बड़े और समझदार आदमी हर काम कायदे से करते हैं; इसलिए अमीरों के अस्पताल अलग और गरीबों के अलग होते हैं । कायदे चाहे अस्पताल के हों, न्यायालय के हों या फिर धरम के हों, कोई भी कायदा गरीब अफोर्ड नहीं कर पाता है। वो अक्सर अच्छे अस्पताल और इलाज की कामना करते हुए मर जाता है। वैसे कामना का क्या है, लोग हूरों की भी करते ही हैं । गालिब ने कहा है कि ‘दिल को बहलाने के लिए खयाल अच्छा है।’ बहुत से कार्ड वाले गरीब अस्पताल के दरवाजे तक पहुँचकर कैसे तो भी मर लेते हैं। दरअसल अपने गरीब को भ्रम होता है कि वे जिंदा है। अस्सी करोड़ को सरकार से मुफ़्त राशन और पेड़ों से मुफ़्त ऑक्सीजन मिल रही  है । कुल मिल कर साँस चल रही हो तो लोग भी मान लेते हैं कि आदमी जिंदा है। 

सरकारें अस्पताल बनवाती हैं, ताकि आदमी जिंदा रहे और गरीबी भी । गरीबों के अस्पताल भी खासे गरीब होते हैं। गरीब से गरीब की मेचिंग होती है और ये संबंध बुरा नहीं  लगता है । यहाँ कोई ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए नहीं दौड़ता, ताबीज और भभूत के लिए पेरेरल दौड़ता दिखता है । गरीब अस्पताल में जब तब रोने चीखने की आवाज गूँजती है, तो जमीन पर पड़े मरीज के घर वाले खुश होते हैं कि शायद अब बेड मिल जाएगा। हूरों वाली कामना आखरी में आ कर एक बेड पर सिमट जाती है । बेड पर मरने को मिले तो गरीब की मुक्ति हो गई मानी जाती है। 

सम्पर्कः BH 26 सुखलिया, भारतमाता मंदिर के पास, इंदौर- 4520 10 , मो.  940 670 1 670          

नज़्में: दीवाली के दीप जले

  - फ़िराक़ गोरखपुरी





नई हुई फिर रस्म पुरानी दीवाली के दीप जले

शाम सुहानी रात सुहानी दीवाली के दीप जले


धरती का रस डोल रहा है दूर-दूर तक खेतों के

लहराए वो आँचल धानी दीवाली के दीप जले


नर्म लबों ने ज़बानें खोलीं फिर दुनिया से कहन को

बेवतनों की राम कहानी दीवाली के दीप जले


लाखों-लाखों दीपशिखाएँ देती हैं चुपचाप आवाज़ें

लाख फ़साने एक कहानी दीवाली के दीप जले


लाखों आँसू में डूबा हुआ खुशहाली का त्योहार

कहता है दुःखभरी कहानी दीवाली के दीप जले


कितनी मँहगी हैं सब चीज़ें कितने सस्ते हैं आँसू

उफ़ ये गरानी ये अरजानी दीवाली के दीप जले


मेरे अँधेरे सूने दिल का ऐसे में कुछ हाल न पूछो

आज सखी दुनिया दीवानी दीवाली के दीप जले


जुग-जुग से इस दुःखी देश में बन जाता है हर त्योहार

रंजोख़ुशी की खींचा-तानी दीवाली के दीप जले


रात गये जब इक-इक करके जलते दीये दम तोड़ेंगे

चमकेगी तेरे ग़म की निशानी दीवाली के दीप जले


जलते दीयों ने मचा रखा है आज की रात ऐसा अँधेर

चमक उठी दिल की वीरानी दीवाली के दीप जले


कितनी उमंगों का सीने में वक़्त ने पत्ता काट दिया

हाय ज़माने हाय जवानी दीवाली के दीप जले


लाखों चराग़ों से सुनकर भी आह ये रात अमावस की

तूने पराई पीर न जानी दीवाली के दीप जले


लाखों नयन-दीप जलते हैं तेरे मनाने को इस रात

ऐ किस्मत की रूठी रानी दीवाली के दीप जले


ख़ुशहाली है शर्ते ज़िंदगी फिर क्यों दुनिया कहती है

धन-दौलत है आनी-जानी दीवाली के दीप जले


बरस-बरस के दिन भी कोई अशुभ बात करता है सखी

आँखों ने मेरी एक न मानी दीवाली के दीप जले


छेड़ के साज़े निशाते चिराग़ां आज 'फ़िराक़' सुनाता है

ग़म की कथा ख़ुशी की ज़बानी दीवाली के दीप जले


किताबेंः ‘कुछ रंग’ ग्राम्य जीवन की संवेदनाओं का रंगमंच

 -  डॉ. पूनम चौधरी

कुछ रंग (चोका -संग्रह ): भीकम सिंह, प्रथम संस्करण: 2025, पृष्ठ:136, मूल्य:380 रुपये, अयन प्रकाशन, जे-19/39, उत्तम नगर, नई दिल्ली 110059

हिंदी कविता के इतिहास में जब भी किसी रचनाकार ने प्रचलित विधाओं की सीमाओं को पार करने का साहस किया है, तब तब साहित्य के नए द्वार खुले है। भीकम सिंह जी का कुछ रंग चोका- संग्रह इसी साहसिक परंपरा का प्रतिफल है। यह संग्रह मात्र काव्य संकलन नहीं है, बल्कि हिंदी काव्य में एक नई विधा ‘चोका’ का प्रयोग और उसके माध्यम से जीवन-जगत के अनुभवों का संवेदनशील दस्तावेज़ है। ‘चोका’ वस्तुतः जापानी काव्य परंपरा की विधा से प्रेरित होकर विकसित हुआ, परंतु भीकम सिंहजी ने इसे हिंदी की कलेवर से जोड़कर कुछ रंग दे दिए और साथ ही लोक-संस्कृति और भारतीय जीवन-दर्शन से इसका रूपांतरण कर दिया। यह संग्रह इसलिए विशेष महत्त्वपूर्ण है कि यह न केवल विधा की दृष्टि से नवीन है, बल्कि भावनात्मक दृष्टि से अत्यंत परिपक्व और मार्मिक भी है।

‘कुछ रंग’ काव्य संग्रह में  - आनंद, पीड़ा,संघर्ष,स्मृति और आशा जैसे रंगों को शब्दबद्ध करने का कवि का यह भावुक और संवेदना-पूर्ण प्रयास है। ये रंग केवल बाहरी जीवन के दृश्य नहीं हैं, बल्कि आत्मा की गहराइयों में अनुभव किए गए सजीव बिंब हैं, जो इस संग्रह का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य है।

भीकम सिंह जी की काव्य -दृष्टि का केंद्र ग्रामीण जीवन है —वहाँ की प्रकृति, वहाँ के खेत-खलिहान, पशु-पक्षी, श्रम, संघर्ष और जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी संवेदनाएँ । गाँव यहाँ केवल भौगोलिक इकाई नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण सांस्कृतिक संरचना है, जिसमें श्रम की गरिमा, प्रकृति का आत्मीय सान्निध्य और सामूहिक जीवन की धड़कनें सुनाई देती हैं। कहते हैं-

अटका चाँद/गाँव  के सिवानों पे/

तारें छिटके/खेत क्यारियों पर/झिलमिल से।

यह प्राकृतिक छटा मात्र का चित्र नहीं है, बल्कि ग्रामीण जीवन की संतोष, आत्मीयता और उस आकाश से जुड़े रहने की अनुभूति है ।

भीकम सिंह का भाव-जगत् ग्राम्य जीवन के यथार्थ से गहराई से जुड़ा, इसलिए  वे गाँव का सौंदर्य चित्रित करना नहीं भूलते खेत, मेंड, गलियारे,पगडंडियाँ, फसले इन सब का जीवंत और मनोहरी चित्रण एक सरल और गाँव के प्रेम में डूबा मन ही कर सकता है इस कसौटी पर भीकम सिंह जी की कविता खरी उतरती है।

 इन कविताओं का दूसरा पक्ष भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कवि की दृष्टि से गाँव का संघर्ष, उनकी समस्याएँ, उनकी जिजीविषा कहीं ओझल नहीं होती। दुख जीवन का हिस्सा है, परंतु उसके बीच भी सुख की सम्भावना नष्ट नहीं होती। यही कारण है कि वे कहते हैं—

बसंती हवा उम्मीद की तरह/और घास भी/

मस्त मौला बावली/ है सुखों की वजह।

यहाँ हवा महज़ मौसम का बोध नहीं कराती, बल्कि मानवीय मनोविज्ञान की जिजीविषा का प्रतीक बन जाती है।  उनकी कविता में आए वृक्ष और पौधे केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं है: बल्कि वे जीवंत प्रतीक है स्मृतियों के, संघर्षों के,जो धीरे-धीरे सामूहिक चेतना के प्रतीक बन जाते हैं-

पानी की गंध/ओढ़ के बरगढ़ /

खड़ा उदास/पास कही है प्यास।

इसी प्रकार खेत की जुताई, ठूँठों पर सुबह-सुबह का श्रम, और फसल की आशंका—ये सब मिलकर ग्राम्य जीवन की आत्मकथा बुनते हैं और इसकी छटा अद्भुत हो जाती है। भीकम सिंहजी के काव्य का भाव-पक्ष केवल सुख-दुख के वर्णन सीमित नहीं है, बल्कि उसमें एक गहरी संवेदनात्मक मार्मिकता है। उनकी कविता में दुख पाठक के मर्म को छूता है, करुणा की उत्पत्ति करता है; किंतु निराशा से उसका कोई संबंध नहीं है-

बीता बसंत/तो देह का मोह- / 

भी कम हो गया/मन तैरता रहा/ होकर रीता

तो यहाँ देह और मन दोनों की थकान का चित्र है।

इस संग्रह में कई स्थानों पर कवि का स्वर आत्ममंथन का भी है। खेतों की थकान, दुर्घटनाओं की आशंका, श्रम की कठिनाई—ये सब केवल बाहरी यथार्थ नहीं हैं, बल्कि कवि के भीतर भी एक बेचैनी उत्पन्न करते हैं। 

घास के जैसी/खेतों की पीठ पर/ 

उग रही है / मुद्रादायिनी जड़े/

हदें लाँघ के/नागफनी- सी बढ़ी/

इसी प्रश्नवाचकता से उनकी कविता का स्वर और अधिक मार्मिक हो उठता है। इस मार्मिकता में पाठक केवल दर्शक नहीं रहता, बल्कि स्वयं उस अनुभव का सहभागी बन जाता है। जैसे-जैसे संग्रह की कविताएँ आगे बढ़ती हैं पाठक का विश्वास कवि की संवेदना पर प्रबल होने लगता है। कवि जीवन की छोटी-छोटी बातों को बड़े प्रतीकों में बदल देते हैं। घास, ओस, अँखुआना, बीज बोना—ये सब न केवल कृषि-प्रक्रियाएँ हैं, बल्कि मानवीय जीवन की गहरी संवेदनाओं का रूपक हैं। 

भीकम सिंह जी का काव्य-संसार केवल ग्रामीण जीवन के सौंदर्य और आत्मीयता तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें गाँव की समस्याओं का मार्मिक और गहन उद्घाटन भी है। यदि एक ओर उनकी कविता खेतों की हरियाली, नदियों की कलकल ध्वनि और गाँव के सामूहिक श्रम को जीवन का उत्सव बनाकर प्रस्तुत करती है, तो दूसरी ओर उसी जीवन के भीतर पनपती विडंबनाओं, संघर्षों और विसंगतियों का यथार्थ चित्रण करती है। कवि का यह दूसरा पक्ष विशेष रूप से संवेदनात्मक, मार्मिक और तार्किक है, जो पाठक के अंतर्मन को गहराई से छू लेता है। गाँव की सबसे बड़ी समस्या है – शहरीकरण का बढ़ता हुआ प्रभाव-

गाँव  में थी/क्या कहीं कोई सड़क/ 

पगडंडी थी/सड़के जैसे आई/ 

 दूध घी गए/मैगी पिज्जा बर्गर/ जैसे जहर आए।

गाँव की सहजता और सरलता अब स्पर्धा की अंधी दौड़ में डगमगाने लगी है। कवि का आक्रोश और दुःख यहाँ केवल गाँव के लिए नहीं; बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है – 

खेतों के बाद/शुरू होगा बाजार/ 

कहाँ जाएँगे/विस्थापित सियार/ 

कोर्ट में होंगे/ तारीखों से बाहर।

कविता का दूसरा बड़ा प्रश्न है – खेती और मिट्टी का संकट। कवि ने खेतों की समाप्त होती उर्वरता की स्थिति को प्रतीकात्मक बिंबों में व्यक्त किया है – ‘मिट्टी में घुला रसायन’, ‘उड़ती हुई रेत’, ‘थके खेत’– ये केवल शब्द नहीं, बल्कि उस जीवन का सजीव दृश्य हैं, जो हज़ारों किसानों की हताशा और निराशा से भरा हुआ है।

 मिट्टी में घुला/रसायन देखके/सहमें खेत/ 

  थकने लगे/कुछ दिनों से खेत/ उड़ने लगी रेत।

कुछ रंग काव्य संग्रह का संवेदना पक्ष जितना प्रबल है, कलात्मक दृष्टि से भी यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भीकम सिंहजी का चोका विधा को स्थापित करने का यह प्रयास उल्लेखनीय है। ‘चोका’ मूलतः जापानी काव्य-परंपरा की लंबी कविताओं की एक विधा है, जिसमें गेयता और संक्षिप्तता का अद्भुत संतुलन होता है। कवि ने इस विधा को अपनी लोक-संस्कृति की भूमि पर उतारते हुए इसे भारतीय जीवन की संवेदनाओं के अनुकूल रूप दिया है।

उनके चोका में पंक्तियों की लय और प्रवाह विशेष महत्त्व रखते हैं। प्रत्येक पंक्ति में विचार और भाव का घनत्व है, परंतु भाषा सहज और लोक-जीवन से निकली हुई है। उदाहरण के लिए-

शाम झाड़के/खलिहान से उठा/ कंधे पे रखा/संतोष का अंगोछा।

शैल्पिक स्तर पर प्रयुक्त बिम्ब योजना अत्यंत प्रभावशाली है। कवि ने गाँव के दृश्यों का इतना संजीव और जीवंत चित्रण किया है की पाठक उन्हें पढता ही नहीं, बल्कि दृश्य की तरह घटित होते देखता है । खेत, ओस, खरपतवार, कांस, नीम, बसंती हवा—ये सभी बिंब ग्रामीण जीवन के सूक्ष्मतम अनुभवों को मूर्त कर देते हैं। यही कारण है कि उनका चोका दृश्यात्मकता के कारण एक अनोखा प्रभाव छोड़ता है। 

भाषा की दृष्टि से भी यह संग्रह विशेष महत्त्व रखता है, सहज़ सरल लोक जीवन की भाषा में जिस तरह कवि ने यह संसार रचा है वह सीधा पाठक के हृदय को छूता है । भाषा न तो अत्यधिक अलंकारिक है, न ही कृत्रिम। वह ग्राम्य जीवन की सहजता से निकली हुई है, किंतु साथ ही उसमें साहित्यिक परिष्कार भी है।  वे क्लिष्ट और गूढ शब्दावली प्रयुक्त नहीं करते बल्कि साधारण शब्दों में असाधारण अनुभव व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि उनकी भाषा में एक ओर लोक की सजीवता है, तो दूसरी ओर काव्य की परिष्कृति।

निष्कर्ष रूप से कह सकते हैं ‘कुछ रंग’ हिंदी साहित्य में एक नई विधा का आरंभ है और एक संवेदनशील कवि की परिपक्व अभिव्यक्ति का उदाहरण भी। भीकम सिंह ने चोका विधा को हिंदी के सांस्कृतिक संदर्भों में इस प्रकार ढाल दिया है कि वह आत्मसात् प्रतीत होती है। यह संग्रह भाव-पक्ष में जितना मार्मिक है, शिल्प-पक्ष में उतना ही सुदृढ़ और परिपक्व है।

इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह पाठक को केवल कविता पढ़ने का अवसर नहीं देता, बल्कि उसे जीवन की गहरी संवेदनाओं में सहभागी बना देता है। गाँव के सुख-दुख, खेतों की थकान, श्रम की ऊर्जा, और भविष्य की आशा—ये सब मिलकर पाठक को ऐसा अनुभव कराते हैं मानो वह स्वयं उस जीवन का हिस्सा हो।  किसी भी रचना की कसौटी है- पाठक को जीवन के अनुभव से जोड़ देना।

कविताः जगमग जगमग

  - सोहनलाल द्विवेदी






हर घर, हर दर, बाहर, भीतर,

नीचे ऊपर, हर जगह सुघर,

कैसी उजियाली है पग-पग?

जगमग जगमग जगमग जगमग!


छज्जों में, छत में, आले में,

तुलसी के नन्हें थाले में,

यह कौन रहा है दृग को ठग?

जगमग जगमग जगमग जगमग!


पर्वत में, नदियों, नहरों में,

प्यारी प्यारी सी लहरों में,

तैरते दीप कैसे भग-भग!

जगमग जगमग जगमग जगमग!


राजा के घर, कंगले के घर,

हैं वही दीप सुंदर सुंदर!

दीवाली की श्री है पग-पग,

जगमग जगमग जगमग जगमग!