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Nov 1, 2024

किताबेंः व्यक्तित्व एवं कृतित्व का सम्यक मूल्यांकन ‘अपने अपने देवधर’

 -  डॉ. राघवेंद्र कुमार दुबे

पुस्तक:  ‘अपने अपने देवधर’, संपादक:  बसंत राघव, प्रकाशक: बुक्सक्लिनिक पब्लिशिंग,  (बिलासपुर - छ. ग.), मूल्य : 1000, पृष्ठ : 368

छत्तीसगढ़ महतारी की पावन भूमि, संस्कृति की विशिष्ट महत्ता रही है, जिसके सुवास को बिखरने का महत्त्वपूर्ण कार्य छत्तीसगढ़ के माटीपुत्र कर रहे हैं, जिसकी आज आवश्यकता है । इसी क्रम में एक नाम छत्तीसगढ़ के सशक्त हस्ताक्षर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. देवधर महंत जी का भी है, जिन्होंने यहाँ की संस्कृति, साहित्य, और साहित्यकारों की महत्ता को उजागर करने में अपना महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, वहीं हिन्दी एवं छत्तीसगढ़ी साहित्य की श्रीवृद्धि कर रहे हैं । 
 वर्तमान में इसकी आवश्यकता है कि जो माटीपुत्र, छत्तीसगढ़ की संस्कृति, साहित्य की सेवा कर रहे हैं, उनके भी व्यक्तित्व एवं कृतित्व का सम्यक मूल्यांकन करने की, तथा उनकी साधना का सम्मान करने की। यही महत्त्वपूर्ण कार्य युवा कवि साहित्यकार श्री बसंत राघव रायगढ़ ने किया है- छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. देवधर महंत जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का सम्यक् मूल्यांकन करने वाली कृति ‘अपने अपने देवधर’ का प्रणयन करके। इसमें छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध प्रभृत साहित्यकारों ने डॉ. देवधर महंत जी के व्यक्तित्व के साथ उनके समग्र साहित्यिक अवदान  को दिग्दर्शित किया है । 
   संपादकीय में युवा साहित्यकार श्री बसंत राघव ने उनकी पंक्तियों को उद्धृत करते हुए लिखा है –“कविता मेरी आत्मा साँस की तरह लेखन  मैं कबीर का वंशधर कहता आँखिन देखी।’’
 किसी के लिए लेखन शौक या आत्म प्रदर्शन हो सकता है; लेकिन किसी के लिए लेखन साँस लेने की तरह होता है। ऐसे ही शब्द शिल्पी हैं -देवधर महंत । आगे उन्होंने लिखा है-  “ ऐसे वरिष्ठ साहित्य का डॉक्टर देवधर महंत पर केंद्रित कृति “अपने-अपने देवधर” का संपादन करते हुए मैं अभिभूत हूँ । इसके लिए मुझे अनेक सुधी हस्ताक्षरों के आलेख उपलब्ध हुए, जिनका मधु संचय है यह किताब ।  डॉ बलदेव के बाद वे मेरे साहित्यिक गुरु भी हैं । देवधर महंत जी की विनम्रता, सहजता बौद्धिक ना होकर छत्तीसगढ़ निवासी होने के नाते स्वाभाविक है । यही उनकी संस्था उनके साहित्य में भी विद्यमान है । उनकी भाषा एवं काव्य शिल्प अद्भुत एवं अनुशासित है । उनकी कविताओं एवं आलेखों से गुजरते हुए उनकी सधी हुई भाषा व भाव प्रवणता हमें चकित कर देती है । उनकी रचनाओं से रूबरू होते हुए एक चुंबकीय प्रभाव से हम अपने आप को नहीं बचा पाते हैं, उससे मुक्ति संभव भी नहीं । यही कारण है कि उनकी कविताएँ हमारे अंतस्  में हमेशा के लिए रच बस जाती हैं । वे अपनी बातों को प्रांजल भाषा में बेहतर तरीके से प्रस्तुत करते हैं । उनकी भाषिक संप्रेषणीयता अर्थगर्भित होती है । वे अपनी बातों को पूरी समग्रता एवं कलात्मकता के साथ पाठकों के समक्ष रखते हैं । छत्तीसगढ़ी कविता में व्यंग्यपरक यथार्थ उद्घाटित करने में उन्हें महारत हासिल है।’’  वहीं इस कृति में देश के सुविख्यात  समीक्षक एवं भाषाविद् डॉ विनय कुमार पाठक पूर्व अध्यक्ष छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग एवं कुलपति थावे विद्यापीठ गोपालगंज बिहार का एक आलेख ‘छत्तीसगढ़ी काव्य और बेलपान’ को भी शामिल किया गया है, जिसमें उन्होंने छत्तीसगढ़ी काव्य का ऐतिहासिक परिचय देते हुए डॉक्टर देवधर महंत के सुप्रसिद्ध काव्य- संग्रह ‘बेलपान’ के लिए के लिए लिखा है–  “ ऐतिहासिक क्रम में ‘अकादशी’ संग्रह के बाद ‘बेलपान’ की कविताएँ सांस्कृतिक संस्पर्श और मौलिक सांस्कृतिक उपमानों  को लेकर अवतरित हुई हैं । ‘बेलपान’ का कवि छत्तीसगढ़ी कृषक- पुत्र है, अतः ग्रामों को, ग्रामीण कृषक भाइयों को उसने गहराई और सच्चाई के साथ देखा परखा है । स्वाभाविकता के कारण ग्राम को ईश्वरकृत और कृत्रिमता के कारण शहर को मनुजकृत मानना कवि की उचित सूझबूझ और गहन चिंतन का परिचायक है—
मोर गाँव वाला गढ़िन भगवान, शहर सिरजिन मनखे मन।
 ऐसे में ग्राम में कृषक की स्थिति साक्षात भगवान की हो जाती है< जिसकी लीला भूमि में पैरी पहनकर वर्षा रानी और रंग बिरंगे परिधानों से सज्जित  होकर आकाश शोभन पाते हैं –
आगे पैरी पहिरे बरखा रानी, बादर कुरता पहिरे आनी बानी।
     ग्रामीण नायिका जब तुलसी चबूतरा बन जाती है, तो नायक इसकी आराधना- साधना के लिए उसके गुणों  से सम्मोहित भ्रमर बनकर प्रेम का स्पष्ट गुनगुना अलापता है । कवि प्रसिद्धि में भ्रमर  स्वार्थी माना गया है,  किंतु यहाँ पर कवि के प्रयोग ने उसे निस्वार्थ प्रेमी बना दिया है । यही कवि का वैशिष्ट्य है –
मैं बनेव पुजारी तैं तुलसी के चौराहे
 ममहाके मोला तैं बनाय हस भौंर॥
     किंतु ऐसा ही जीवन जब आलसी मनुज के भाग्य में आता है तो उसका जीवन दुरूह दुर्गम हो जाता है । इसी भावना को अपने ढंग से सोचता है, अपने रंग से रँगता है–
आलस के ढेंकी मा जिनगी कनकी रे ।
 बोटका कस जिनगानी के कहिनी रे ।
  इस तरह अन्य कविताओं में भी सांस्कृतिक संस्पर्श और नवीन चिंतन की छटा देखने को मिलती है। ‘बेलपान’ निश्चित: छत्तीसगढ़ी साहित्य के बेल के पौधे की तरह अपना महत्त्व रखता है । आशा है- ‘बेलपान’ ग्रहण कर लोग सात्विकता का अनुभव करेंगे।’’
इस तरह युवा हस्ताक्षर श्री बसंत राघव द्वारा संपादित कृति ‘अपने-अपने देवधर’ डॉक्टर देवधर दास महंत जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का सम्यक मूल्यांकन करने में सफल रहा है ।
 इस कृति के प्रकाशन के लिए मैं संपादक श्री बसंत राघव को हार्दिक बधाई देते हुए आदरणीय डॉक्टर देवधर दास महंत जी को हार्दिक बधाई देते हुए उनके स्वस्थ सुखी जीवन की कामना करता हूँ ।

वन्य जीवनः जंगली जानवर सिखाते हैं प्रकृति को अक्षुण्ण बनाए रखने की कला

  - सीताराम गुप्ता

   पिछले दिनों हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत की जन्मस्थली व गांधीजी के चौदह दिवसीय प्रवासस्थल अनासक्ति आश्रम को देखने की तीव्र इच्छा के वशीभूत कौसानी जाना तय हुआ। दिल्ली से ड्राइविंग करते हुए सीधे कौसानी जा पहुँचे। कौसानी से बागेश्वर व बागेश्वर से नैनीताल होते हुए दिल्ली वापसी की। नैनीताल से दिल्ली के लिए प्रमुख रूप से दो रास्ते हैं। एक काठगोदाम व हल्द्वानी होते हुए और दूसरा कालाढूंगी होते हुए। कालाढूंगी के रास्ते पर कालाढूंगी के पास छोटी हल्द्वानी नामक स्थान है जहाँ पर एक छोटा-सा अत्यंत व्यवस्थित संग्रहालय है जिसका नाम है जिम कॉर्बेट संग्रहालय। इसमें जिम कॉर्बेट के जीवन से संबंधित घटनाओं और वस्तुओं को अक्षुण्ण रखने का प्रयास किया गया है।

     जिम कॉर्बेट एक कुशल शिकारी थे जंगल जिनके लिए दूसरा घर था। बाद में उन्होंने शिकार करना छोड़ दिया और एक पर्यावरण व प्रकृति प्रेमी, वन संरक्षक तथा कुशल छायाकार बन गए। आज जिम कॉर्बेट के नाम से जो जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क है वह जिम कॉर्बेट के प्रयासों का ही परिणाम है। जिम कॉर्बेट के प्रयासों से सन् 1935 में वन्य पशुओं को बचाने के उद्देश्य से यह संरक्षित पार्क बनाया गया था और तत्कालीन गवर्नर मालकम हेली के नाम पर इस पार्क का नाम हेली नेशनल पार्क रखा गया था। स्वतंत्रता के बाद इस पार्क का नाम रामगंगा नेशनल पार्क रख दिया गया। बाद में सन् 1957 में इस पार्क का नाम जिम कॉर्बेट के सम्मान में ‘जिम कार्बेट नेशनल पार्क’ रख दिया गया।

     जिम कॉर्बेट एक महान शिकारी, पर्यावरण एवं प्रकृति प्रेमी, वन संरक्षक, कुशल छायाकार ही नहीं एक प्रसिद्ध लेखक भी थे। संग्रहालय में एक छोटी सी सुवनीर शॉप भी है, जहाँ जिम कॉर्बेट की लिखी पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। मैंने वहाँ उपलब्ध जिम कॉर्बेट की सभी पाँचों पुस्तकें ख़रीद लीं और घर आकर सभी पढ़ डालीं। जिम कॉर्बेट के बारे में जानने पर ऐसा लगा कि हिंदी भाषा और साहित्य में फादर कामिल बुल्के का जो स्थान व सम्मान है, कुछ वैसा ही स्थान व सम्मान पर्यावरण, प्रकृति व वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में जिम कॉर्बेट का है। जिम कॉर्बेट अपनी पुस्तक ‘जंगल लोर’ में लिखते है, ‘‘प्रकृति में न तो कोई दुख होता है और न ही कोई अफ़सोस। झुंड में से कोई पक्षी बाज़ का शिकार बन जाता है अथवा कोई चौपाया शेर या तेंदुए का शिकार हो जाता है, तो बाक़ी बचे हुए पक्षी और जानवर इस बात की ख़ुशी मनाते हैं कि चलो आज हमारा वक्त नहीं आया। उन्हें आने वाले कल का भी कोई एहसास नहीं होता।’’

     काश हम मनुष्यों को भी आने वाले कल का एहसास नहीं होता। यदि ऐसा होता तो कितना अच्छा होता। हम भी आने वाले कल अथवा भविष्य की चिंता किए बिना निश्चिंत व निर्द्वंद्व होकर मज़े से वर्तमान में जीते। जानवरों को आने वाले कल की कोई चिंता नहीं होती; इसलिए वे मज़े से जीवन व्यतीत करते हैं। उनकी स्वाभाविक मस्ती में कभी कोई कमी नहीं आती। भूख लगने पर ही भोजन के लिए हाथ-पैर मारते हैं। कोई भी मांसाहारी जंगली जानवर अथवा परिंदा बिना भूख के शिकार नहीं करता। पेट भरा होने पर कोई किसी दूसरे जानवर को नहीं मारता। एक बार शिकार करने के बाद, जब तक उस पूरे शिकार को उदरस्थ नहीं कर लेता, दूसरा शिकार हरगिज नहीं करता। उनके जीवन में तनाव नामक तत्त्व होता ही नहीं। जहाँ तक भूख लगने पर शिकार करने का प्रश्न है, यह प्राकृतिक भोजन शृंखला का अंग है, जो वन और वन्यजीवन में संतुलन के लिए अनिवार्य है।

     लेकिन मनुष्य? वह आज या वर्तमान की चिंता करने की बजाय आने वाले कल अथवा भविष्य की चिंता में अधिक डूबा रहता है। इसी से आज तनाव बहुत बढ़ गया है। यह ठीक है कि मनुष्य अपने विकास की उस अवस्था में पहुँच गया है जहाँ उसके लिए भविष्य के बारे में विचार करना भी अनिवार्य है। भविष्य की उचित प्लानिंग तो ठीक है; लेकिन चिंता किसी भी तरह से उचित नहीं मानी जा सकती। कल की चिंता में हम आज में जीवन जीना भूलते जा रहे हैं, जिसके कारण हमेशा तनावयुक्त रहते हैं। यह तनाव भविष्य के सुख को भी, जो एक तरह से काल्पनिक है, चट कर जाता है। हम कई बार देश में कई स्थानों पर जंगल राज की बात करते हैं। शहरों में चाहे जो हो जंगलों में कुछ भी अव्यवस्थित नहीं है। कुछ भी काल्पनिक नहीं है। सब कुछ स्वाभाविक रूप से चलता है। वहाँ परस्पर शोषण की प्रक्रिया नहीं है। वहाँ संग्रह की प्रवृत्ति भी नहीं पाई जाती। वहाँ कोई छोटा या बड़ा नहीं है। कोई प्रतिशोध की आग में नहीं सुलगता। कोई बदला लेने के फ़िराक़ में नहीं घूमता। वहाँ मान-अपमान जैसी काल्पनिक स्थितियाँ भी नहीं मिलतीं।

     अपनी पुस्तक ‘जंगल लोर’ में जिम कॉर्बेट आगे लिखते है, ‘‘जब मैं नादान था तब नन्हे पक्षियों और हिरणशावकों को बाज़ों, चीलों व दूसरे जानवरों के पंजों से छुड़ाने की कोशिश करता था; लेकिन जल्दी ही मुझे पता चल गया कि एक की जान बचाने से दो की जान जाती है। शिकारी पक्षियों अथवा जानवरों के ज़हरीले पंजों की वजह से उनमें से एक प्रतिशत पक्षी अथवा दूसरे नन्हे जानवर ही जीवित रह पाते थे। दूसरी ओर शिकारी जानवर अपना अथवा अपने बच्चों का पेट भरने के लिए फ़ौरन ही दूसरा शिकार कर लेता था। जंगल में कुछ पक्षियों और जानवरों का उत्तरदायित्व प्रकृति में संतुलन बनाए रखने का होता है, जिसके लिए प्रकृति में संतुलन बनाए रखने के साथ-साथ अपना पेट भरने के लिए शिकार करना भी अनिवार्य हो जाता है।’’

     जहाँ तक संतुलन की बात है जीव-जंतुओं की जितनी भी गतिविधियाँ हैं, वे सब प्रकृति के संतुलन को बनाए रखती हैं। उससे प्राकृतिक संतुलन को कोई हानि नहीं पहुँचती। मनुष्य को जंगली जीव-जंतुओं को बचाने की नहीं; अपितु उनका आवास न छीनने की ज़रूरत है। आज मनुष्य न केवल प्रकृति के संतुलन को नष्ट करने पर आमादा है; अपितु स्वयं की सुव्यवस्था को भी नष्ट कर रहा है। मनुष्य जीव-जंतुओं के प्राकृतिक आवास को नष्ट करके ख़ुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चला रहा है। हम चाहें तो इन जंगली जानवरों से न केवल चिंता व तनाव से मुक्त रहने का सूत्र सीख सकते हैं अपितु अपरिग्रह व सीमित उपभोग द्वारा प्रकृति व पर्यावरण को नष्ट होने से बचाने की कला भी सीख सकते हैं।

सम्पर्कः ए.डी. 106 सी., पीतमपुरा,दिल्ली - 110034, मो. 9555622323, Email : srgupta54@yahoo.co.in

लघुकथाएँ

 - उपमा शर्मा

1. अनावरण

देश-विदेश के शिल्पकार अपनी प्रतिमाओं की प्रदर्शनी लगा रहे थे। प्रतिमा से परदा हटता और जगमगा जाता शिल्प का अप्रितम नमूना। आज की थीम थी ‘नारी और नारी का अप्रतिम सौन्दर्य’ हर प्रतिमा से छलक रहा था। सारी प्रतिमाएँ अजन्ता-एलोरा की कलाकृतियों पर भारी पड़ रही थीं। हर कलाकृति बेजोड़ थी। दिख रहा था तो बस पुरुष की नजरों में नारी का अप्रतिम सौन्दर्य और उसकी विशेष संरचना। प्रत्येक प्रतिमा के अनावरण के साथ तालियों की गूँज बढ़ती जाती और चर्चा बढ़ जाती कला के उत्कृष्ट नमूने पर।

फिर महिला शिल्पकारों की बनाई प्रतिमा का अनावरण होना शुरू हुआ। किसी प्रतिमा में नारी दुल्हन के रूप में थी, तो किसी प्रतिमा में माँ का रूप में। दुल्हन बनी प्रतिमा शरमा रही थी तो माँ बनी प्रतिमा के चेहरे पर ममता के भाव बेहद खूबसूरती से उकेरे गए थे। अंत में प्रसिद्ध कलाकार अनु की प्रतिमा के अनावरण की बारी थी। पर्दा हटा और प्रतिमा देख सब चौंक गए। नारी के सौष्ठव का ऐसा रूप देखकर सबकी आँखें चौंधिया गईं।

“और आज का पुरस्कार जाता है अनु जी को।” मंच से हुई इस उद्घोषणा के साथ ही मूर्तियों से सजा संवरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। तालियों की गूँज में अचानक एक आवाज आई “द्रौपदी के वस्त्र खींचने के लिए क्या कौरव ही काफी नहीं थे, जो आज तुमने भी मेरा चीरहरण कर दिया।”

यह आवाज प्रतिमा के कानों में पड़ी और वह भरभराकर कर गिर गई। ■

2. तरकीब 

“बहू, देख ले बेटा। सब्जी और दूध ले आया हूँ। ला रजत का होमवर्क मैं करा दूँ। तू और कोई काम देख ले।”

दादाजी की चहकती आवाज सुन मुस्कुरा दी अनु। अब दादाजी के चेहरे पर छाई उदासी उड़न-छू हो गई थी। पिछली बार जब हॉस्टल से वापस आई  थी अनु तो उसने दादाजी में एक अजीब-सा परिवर्तन देखा था। दादाजी एक कमरे में चुपचाप लेटे या बैठे रहते थे। अनु अपने प्यारे दादाजी को यूँ चुपचाप पड़े देखकर दुःखी हो गई  थी। मम्मी-पापा भी परेशान थे।

“माँ, दादाजी को क्या हुआ? ऐसे चुपचाप तो कभी नहीं रहते थे।” उसने पूछा था।

“पता नहीं बेटा। हम लोग भी परेशान हैं। बाबूजी चल फिर भी कम ही पाते हैं। घर में उदासी-सी छाई रहती है...बेटा, हम तो बाबूजी की पूरी सेवा करते हैं। किसी काम के लिए भी नहीं कहते।” मम्मी भी दादाजी की बीमारी को लेकर उदास थी।

अनु दादाजी के कमरे में जाकर बोली थी, “दादाजी, मेरे साथ मार्निंग वाक पर चलिए न।”

“नहीं बेटा। क्या करोगी मुझे साथ लेजाकर। मैं तो अब बेकार हूँ बेटा। ज्यादा चल-फिर भी नहीं पाता। अब मेरी कोई उपयोगिता नहीं।”

अनु को दादाजी की उदासी का कारण मिल गया था। मम्मी-पापा दादाजी को कोई काम नहीं करने देते थे। इससे दादाजी अपने को बेकार मान अवसाद का शिकार हो गये थे। फिर अनु दादाजी को अपने छोटे-छोटे कामों के लिए भी बुलाने लगी थी। बाबूजी की उदासी का कारण उसकी माँ की भी समझ आ गया। बाज़ार के काम माँ ने बाबूजी को सौंप दिये थे। ■

कविताः तुम यहीं कहीं हो

  - शुभ्रा मिश्रा


मुझे तो कुछ भी सूना नहीं लगता

ना अपना घर

ना ही तुम्हारा कमरा

मैं तो जब भी आती हूँ

बरामदे में लगी कुर्सी पर

तुम्हें बैठे हुए पाती हूँ

पेड़ों से बात करते हुए देखती हूँ तुम्हें

कभी- कभी क्यारियों की घास

निकालते हुए भी तुम्हें पाती हूँ

अपने लगाए  फूलों को खिलता  देखकर

कितना खुश होते हो तुम!

एक असीम आनंद से तृप्त दिखते हो तुम!

अपने बनाए घर को अपलक निहारते रहते हो

लगता है जैसे हर एक ईंट से कर रहे हो बात तुम

सहलाते हो उन्हें 

उनके ऊंचे बढ़ते हुए कद को देखकर     

 निश्चिंत होते हुए देखती हूँ तुम्हें

हमारी बातें होती रहती हैं

हमेशा की तरह

रात में हॉल की लाइट जला देती हूँ रोज

ताकि तुम उठो, तो ठोकर ना लगे तुम्हें 

घर के चारों तरफ की लाइट 

रात में जरूर जला देती हूँ

मुझे भी अँधेरा नहीं है पसंद

बिल्कुल तुम्हारी तरह!

भीतर हो या बाहर

सदैव उजाला ही बना रहे!

तुमने सदैव यही सिखाया                               

बाँटने से बढ़ती हैं अच्छी चीजें                       

मैं बाँटती रहती हूँ उजालों को                         

और रश्मियों को, हर क्षण!

पर्यावरणः ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने काष्ठ तिज़ोरियाँ

वैसे तो इस बात पर आम सहमति है कि ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन कम करना सर्वोत्तम तरीका है लेकिन कई लोग मानते हैं कि सिर्फ उत्सर्जन कम करने से बात नहीं बनेगी। कार्बन डाईऑक्साइड को वायुमंडल में से हटाकर भंडारित करना भी ज़रूरी होगा।

इसी सिलसिले में कनाडा में 3775 साल पुराने संरक्षित लाल देवदार के लट्ठे की खोज ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के एक नए तरीके में रुचि उत्पन्न की है: लकड़ी की तिज़ोरियाँ (वुड वॉल्ट)। इस तकनीक में लकड़ी को इस तरह दफनाया जाता है कि वह सड़कर वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड न छोड़े। गौरतलब है कि कार्बन डाईऑक्साइड ग्लोबल वार्मिंग में एक प्रमुख योगदानकर्ता है।

यह विचार मैरीलैंड विश्वविद्यालय के जलवायु वैज्ञानिक निंग ज़ेंग का है, जिनके अनुसार मिट्टी की परतों के नीचे दबा हुआ यह प्राचीन लट्ठा दर्शाता है कि कैसे लकड़ी को कम ऑक्सीजन वाले वातावरण में रखा जाए तो उसका कार्बन अक्षुण्ण रहता है। ज़मीन के ऊपर पड़ी लकड़ियाँ तो जल्दी से सड़ जाती है, और कार्बन डाईऑक्साइड मुक्त होती है। लेकिन जब उसी लकड़ी को मिट्टी या कीचड़ के नीचे दफनाया जाता है, जहाँ ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं होती, तो वह बहुत धीरे-धीरे विघटित होती है और कार्बन सदियों तक कैद रहता है।

ज़ेंग और उनके सहयोगियों का अनुमान है कि दुनिया भर में एक-दो बार इस्तेमाल की जा चुकी लकड़ी के 4.5 प्रतिशत बायोमास को इस तरह दफनाने से वायुमंडल से सालाना 10 गीगाटन तक कार्बन डाईऑक्साइड को हटाया जा सकता है। 

अलबत्ता, इस उपाय की प्रभाविता पर कुछ विशेषज्ञों को चिंता है। इस रणनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि दबी हुई लकड़ी में कार्बन सदियों तक कैद रहता है या नहीं। अब तक, समुद्री मिट्टी के नीचे क्यूबेक लॉग का संरक्षण वैज्ञानिकों को उम्मीद देता है कि इसी तरह के परिणाम बड़े पैमाने पर प्राप्त किए जा सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या अन्य किस्म की मिट्टियां भी ऐसी सुरक्षात्मक परिस्थितियां प्रदान कर सकती हैं।

एक चिंता यह है कि कहीं यह तकनीक जंगलों को काटने की प्रेरणा न बन जाए क्योंकि वह जैव विविधता के लिए खतरे की घंटी होगी। एक और चुनौती पेड़ों को दफनाने की व्यावहारिकता और अर्थशास्त्र है। लकड़ी का उपयोग निर्माण कार्य, कागज़ और फर्नीचर बनाने में किया जाता है, और इसे दफनाने से वनों की कटाई और जैव विविधता के नुकसान सम्बंधित चिंताएं बढ़ सकती हैं। हालांकि, ज़ेंग का सुझाव है कि इन जोखिमों से बचने के लिए केवल बेकार लकड़ी को दफनाया जा सकता है। ज़ेंग के अनुसार बेकार लकड़ी के ढेर आग का खतरा भी बन सकते हैं, इसलिए उन्हें दफनाने से कई लाभ मिलेंगे।

अभी के लिए, काष्ठ तिज़ोरियाँ जलवायु परिवर्तन के खिलाफ व्यापक लड़ाई में एक आशाजनक रणनीति दिख रही है। यद्यपि पर्यावरण सम्बंधी चिताओं के मद्देनज़र इस पर और शोध की आवश्यकता है। (स्रोत फीचर्स)