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Apr 1, 2023

चार लघुकथाएँ

1. मरुस्थल के वासी

- श्याम सुन्दर अग्रवाल

गरीबों की एक बस्ती में लोगों को संबोधित करते हुए मंत्रीजी ने कहा, “इस साल देश में भयानक सूखा पड़ा है। देशवासियों को भूख से बचाने के लिए जरूरी है कि हम सप्ताह में कम से कम एक बार उपवास रखें।”

मंत्री के सुझाव से लोगों ने तालियों से स्वागत किया।

हम सब तो हफते में दो दिन भी भूखे रहने के लिए तैयार हैं। भीड़ में सबसे आगे खड़े व्यक्ति ने कहा।

मंत्रीजी उसकी बात सुनकर बहुत प्रभावित हुए और बोले, “जिस देश में आप जैसे भक्त लोग हों, वह देश कभी भी भूखा नहीं मर सकता।

मंत्रीजी चलने लगे जैसे बस्ती के लोगों के चेहरे प्रश्नचिह्न बन गए हों।

उन्होंने बड़ी उत्सुकता के साथ कहा, ‘अगर आपको कोई शंका हो तो दूर कर लो।’

थोड़ी झिझक के साथ एक बुजुर्ग बोला, ‘साब! हमें बाकी पाँच दिन का राशन कहाँ से मिलेगा ?’

2. पाँव का जूता 

- डॉ. सतीश दुबे

बैसाख की सन्नाटे–भरी दोपहरी में कभी एड़ी तो थोड़ी देर बाद पंजे ऊँचे करके चलते हुए वे दुकान के अहाते में पसरी हुई छाइली के बीच खड़े हो गए। क्षण–भर बाद थकान और पीड़ा से भरी हुई निगाह उन्होंने दुकानदार की ओर घुमाई, ‘‘भइया! ये दवाई दे दो। देख लेना जरा, पेट–दरद की ही है ना, बूढ़ी दरद से तड़फ रही है।’’

लाठी टेकते हुए धीमी–धीमी चाल से आ रही इस आकृति के क्रियाकलाप को बड़ी देर से देख रहा दुकानदार अपने को संयत नहीं कर पाया तथा आर्द्रभाव से बोला, ‘‘बाबा! यह क्या? पैरों में जूते–चप्पल तो डाल लिए होते। ऐसी तेज घूप में नंगे पैर, जूते कहाँ गए आपके?’’

‘‘जूते.....’’ उन्होंने धीरे–धीरे अपनी गर्दन ऊँची करके दुकानदार की ओर देखा तथा पूरा वजन लाठी पर टिकाते हुए बोले, ‘‘बबुआ, जब से बेटे के पाँव मेरे पाँव के बराबर हुए हैं, जूते वह पहनने लगा है।’’

उनका जवाब सुनकर दुकानदार को एहसास हुआ, मानो गरम लपट का कोई झोंका आहत करके गुजर गया हो। उसकी निगाह उनके तपे हुए चेहरे, जले हुए पाँवों तक फिसली तथा वह सिहर उठा। उसने दवाई चुपचाप उनकी ओर खिसका दी तथा अपने जूतों को पैरों में जोरों से भींच लिया।

3. जानवर भी रोते हैं

 - जगदीश कश्यप

चोर निगाहों से बन्तो ने देखा कि सरदारजी बार–बार उसकी ओर देख रही थी। उसने चाहा कि वह पूछ ले– कोई तकलीफ तो नहीं। कहीं सरदारनी पहले की तरह फिर से न बिफर पड़े–‘‘नी बन्तो, मैं हाँ जी....तू की खाके मेरे सामणे बोलेगी...’’ चाहती तो बन्तो भी उसे खरी–खरी सुना देती पर औरतों ने समझाया कि लड़ाका कुलवन्त कौर के मुँह लगना तो अपना चैन खोना है।

‘‘तुसी वाज (आवाज) दिती मैनूं?’’ बन्तो ने छत से खड़े होकर पुकारा। आँगन में खड़ी भैंस बार–बार बिदक रही थी। कुलवन्त ने इस अन्दाज से सिर हिलाया कि उसने कोई मदद नहीं मांगी है। फिर भी बन्तो जोर से बोली–‘‘ठैर बीजी मैं आनियाँ...’’

उस समय कुलवन्त खेतों में था। पुरबिए भैसों के साथ खर–पतवार साफ कर रहे थे। इधर सिरफिरों ने उसके बीमार पति, पुत्रवधू, उसके दोनों बच्चों को गोलियों से भून डाला था। पुत्र तेजिन्दर इस हत्याकाण्ड से पगलाया हुआ फिरता है। सरकार ने नौकरी देने की बात कही, पर कुछ नहीं हुआ।

बन्तो ने भैंस को सहलाया तो कुलवन्त को लगा कि उसकी पीठ सहलाई जा रही है। गाँव से झगड़ा करके वह सुखी नहीं रह सकी, यह अन्दाजा उसे अब हो रहा था। सिरफिरों की गोलियों से भैंस का कटड़ा भी मारा जा चुका था, जिस कारण भैंस कूदने लगी थी। बन्तो ने बाल्टी के पानी के छींटे भैंस के थन में मारे और धार काढ़ने लगी। कुलवन्त ने देखा–भैंस उसकी ओर इस अन्दाज से देखती हुई जुगाली–सी कर रही थी, मानों कह रही हो–‘‘बन्तो का भी सारा परिवार गोलियों का शिकार हो गया। चलो तुम लोगों से सिरफिरों ने जो भी बदला लिया हो पर मैंने आतंकवादियों का क्या बिगाड़ा था जो मेरे कटड़े को मार गिराया।’’

भैंस ने देखा कुलवन्त कौर बन्तो के नजदीक बैठ गई और उसकी पीठ से सिर टिकाकर रोने लगी। ‘काश! कोई उसका भी रोना देख पाए,’ गुमसुम भैंस ने सोचा।

4. अंतहीन  सिलसिला  

-  विक्रम सोनी

दस वर्ष के नेतराम ने अपने बाप की अर्थी को कंधा दिया, तभी कलप–कलपकर रो पड़ा। जो लोग अभी तक उसे बज्जर कलेजे वाला कह रहे थे, वे खुश हो गए। चिता में आग देने से पूर्व नेतराम को भीड़ सम्मुख खड़ा किया गया। गाँव के बैगा पुजारी ने कहा, ‘‘नेतराम...!’’साथ ही उसके सामने उसके पिता का पुराना जूता रख दिया गया, ‘‘नेतराम बेटा, अपने बाप का यह जूता पहन ले।’’

‘‘मगर ये तो मेरे पाँव से बड़े हैं।’’

‘‘तो क्या हुआ, पहन ले।’’ भीड़ से दो–चार जनों ने कहा।

नेतराम ने जूते पहन लिये तो बैगा बोला, ‘‘अब बोल, मैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं।’’

नेतराम चुप रहा।

एक बार, दूसरी दफे, आखिर तीसरी मर्तबा उसे बोलना ही पड़ा, ‘‘मैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं।’’ और वह एक बार फिर रो पड़ा।

अब कल से उसे अपने बाप की जगह पटेल की मजदूरी–हलवाही में तब तक खटते रहना है, जब तक कि उसकी औलाद के पाँव उसके जूते के बराबर नहीं हो जाते।

आधुनिक बोध कथाः पुनर्मूल्यांकन

 - सीताराम गुप्ता 

एक मछुआरे ने नदी में जाल डाला। जाल डालने के बाद काफी देर तक वह बैठा रहा लेकिन कोई मछली उसके जाल में नहीं फँसी। कुछ और समय गुज़र जाने के बाद उसे अहसास हुआ कि जाल कुछ भारी हो गया है। उसने जाल को ऊपर उठा कर देखा तो पाया कि उसमें एक सुंदर-सी मछली फँसी हुई है। मछुआरे ने जाल को बाहर निकाला। पास से देखने पर पता चला कि ये मछली आम मछलियों जैसी नहीं है। उसका रंग-रूप अत्यंत आकर्षक तथा आँखें सम्मोहक थीं। मछुआरा तो जैसे सम्मोहित ही होने लगा। उसके मन में मछली के प्रति करुणा के भाव जाग्रत होने लगे। उसने फैसला किया कि वह मछली को वापस पानी में डाल देगा। मछली भी जल के अभाव में बैचेन हो चली थी।

     मछुआरे ने जैसे ही मछली को पानी में पुनः प्रवाहित करने का प्रयास किया मछली ने मछुआरे से पूछा, ‘ मैं तो बहुत सारे जल के बीच थी वह जल कहाँ गया?’ ‘जल तो जाल के अंदर से बह गया,’ मछुआरे ने बतलाया। इस पर मछली ने कहा कि वह दोबारा जल में नहीं जाना चाहती। ‘मगर क्यों ?’ मछुआरे ने पुनः पूछा। मछली ने कहा, ‘मेरा और जल का पुराना संबंध था। जब जाल बाहर आया तो जल मुझे छोड़कर बह गया। ऐसे निष्ठुर जल के पास दोबारा जाने की अपेक्षा मैं उसके वियोग में तड़प-तड़प कर मरना अधिक पसंद करूँगी। अतः मुझे वापस पानी में मत फेंको।’ मछुआरा मछली की बात सुन कर हैरान रह गया। जल से ऐसा प्यार करने वाली मछली उसने इससे पहले कभी नहीं देखी थी। यदि वह मछली को पानी में नहीं फेंकता है तो मछली कुछ ही क्षणों में प्राण त्याग देगी।

     मछुआरा मछली को हर हाल में बचाना चाहता था अतः उसने एक बार फिर उसे समझाते हुए कहा, ‘देखो, तुम सुंदर और स्वाभिमानिनी ही नहीं भावुक भी बहुत हो। तुमने जल से प्रेम किया लेकिन जल तुम्हारे प्रेम की पराकाष्ठा को समझने में असमर्थ रहा अतः उसके लिए जीवन का बलिदान करना किसी भी प्रकार से उचित नहीं। वैसे भी एक मछली पानी के बिना जीवित नहीं रह सकती। पानी उसके लिए अनिवार्य ही नहीं उसमें रहना उसका अधिकार भी है। तुम्हें अपना यह अधिकार हर्गिज़ नहीं छोड़ना चाहिए। अतः काल्पनिक मोह और मानापमान का ख़याल किए बिना तुम्हें वापस पानी में चले जाना चाहिए। यदि जीवन ही नहीं रहा तो जीवन-मूल्यों का क्या महत्त्व है?’ जीवित रह कर ही हम जीवन-मूल्यों की रक्षा कर सकते हैं तथा अनुपयोगी अथवा विकास में बाधक जीवन-मूल्यों को बदल सकते हैं।

सम्पर्कः .डी. 106-सी., पीतमपुरा, दिल्ली - 110034, मो. 9555622323, Email : srgupta54@yahoo.co.in


कविताः लौट भी आओ

 - सुरभि डागर 








लौट भी आओ अब

झरोखों से झाँकती

हैं बूढ़ी आँखें ....


इन्तज़ार में हो जाती हैं गीली

और ताकती रहती हैं किसी 

आहट को ...........


डाकिया भी नहीं लाता 

कोई चिट्ठी....

कि तुम आओगे

खाली गलियाँ भी 

बेताब हो उठती हैं

तुम्हारे पाँव के स्पर्श को 

लौट भी आओ अब,.....


चौखट को पकड़कर ही 

लाँघते थे,

तुम्हारी अँगुलियों की

 छुअन को

व्याकुल हो उठती हैं ।

वायुयान देखने को 

दौड़कर बाहर आती है 

तुम्हारी बूढ़ी माँ 

निराश हो पकड़ लेती है

खाट के पाये को ......


अब चुभने लगा घर का 

सन्नाटा, जहाँ तुम्हारी

किलकारियाँ गूँजती थी,

बरसों से नहीं बजती 

अब तुम्हारे फोन की घंटी


कमजोर पड़ गए 

तुम्हारे पिता के कंधे

अब लौट भी आओ ....

सम्पर्कः इंद्रलोक कालोनी, नजीबाबाद रोड, बिजनौर- 246-701

किताबेंः ‘मैं लहर तुम्हारी’ मानवीय चेतना को उज्जवित करती कविताएँ

  -  अनिमा दास 

पुस्तक-  मैं लहर तुम्हारी  ( काव्य-संग्रह) : रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ , पृष्ठ संख्या- 95, मूल्य - ₹ 240, वर्ष: 2022  प्रकाशक - अयन प्रकाशन, जे -19/39, राजपुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली -110059

लघुकथाकार, हाइकुकार, छंद विशेषज्ञ श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी की ऐसी लेखनी है जिनकी प्रशंसा में हम जितने भी शब्द कहेंगे वे पर्याप्त नहीं होंगे। उनकी कई पुस्तकों में से 'मैं लहर तुम्हारी' एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। कविता सदैव उनकी प्रिय विधा रही है, अतएव अपनी कविता में उन्होंने समस्त पारम्पारिक छंदों का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है। पुस्तकों में लिखी भूमिका सदैव आकर्षित करती है, काम्बोज जी भूमिका में जीवन की वास्तविकता को अद्भुत विचारधारा तथा कई युक्तियों एवं विशेष तथ्यों के साथ ही संप्रेषित करते हैं। संपूर्ण पुस्तक का अध्ययन करने के पश्चात् प्रति क्षण भूमिका में उल्लिखित उनका जीवन-विश्लेषण मस्तिष्क में उदभासित होता रहा । प्रथमतः, काम्बोज जी भारतीय संस्कृति, कला-शिल्प, संस्कार एवं इतिहास को लेकर अत्यंत संवेदनशील रहे हैं। यही तत्त्व यथार्थ रूप में उनकी रचनाओं में प्रतिफलित भी होता है।

मैं लहर तुम्हारी काव्य संग्रह में उनकी कविताएँ वर्ष 1976 से लेकर 2022 पर्यंत संगृहीत हैं। प्रत्येक कविता में निजस्व सिद्धांत है एवं भारतीय भावनाओं में मानव चरित्र चित्रित है। ऐसा कोई तथ्य नहीं, जो उपयुक्त बिम्बों में प्रतिपादित न हुआ हो। एक नितांत अनुभवी लेखक को पढ़ना पाठकों तथा समाज के लिए अत्यंत सौभाग्यपूर्ण है।

रामेश्वर जी की निर्भीक लेखनी प्रेम, हर्ष-उल्लास, विरह, पीड़ा, प्रकृति ही नहीं लिखती अपितु कई सामाजिक स्थितियों तथा शासन-तंत्र पर भी उनके स्वातंत्र्य लिये उचित एवं श्रेयस्कर मनोभाव को निश्चित रूप से उकेरती है।

 दिग्भ्रष्ट मानव-समाज के लिए कहा है, पृष्ठ 18 की कविता 'आज आदमी' में -

बहुत बढ़ गया आज आदमी

शोर गली-गली है...

इस कविता में दिया गया बिंब अत्यंत प्रभावी है एवं अधुना मानवीय स्तर निम्नगामी है, यह बिंबित किया गया है।

राजनीतिक विषय पर कवि हिमांशु जी अत्यंत मुखर हो कर प्रखरता से लिखते हैं। पृष्ठ 21,23,29 की कविताएँ-'दर्द की जाति' , 'न्याय की नाव' एवं  'इंकलाब' अत्यंत संवेदनशील हैं। इनका कथ्य हृदय को न केवल आंदोलित करता है, अपितु एक नग्न सत्य को सम्मुख रखता है।

मनुष्यता जैसे दैवीय उपादान का महत्त्व समझाते हुए कविवर ने अपनी पीड़ा को क्षताक्त शब्दों में अभिव्यक्त किया है कि (पृष्ठ 31 की यह मानव, मानव रह पाता कविता में)-

पाण्डव बनने की धुन किसको

कौरव बनना जहाँ सरल है

अमृतपान की प्यास सभी को

पीना रुचिकर किसे गरल है।......

संपूर्ण कविता में व्याप्त संदेश अत्यंत हृदयस्पर्शी है। यह कविता लिखी गई है 1981 में। इस कविता में यह अनुभूत होता है कि कवि का भाव तरुणावस्था में जगत की .. संसार की प्रतिकूल परिस्थितियों को समेटने में प्रयासरत रहा।

कई वास्तविक विषयों पर लिखित कविताएँ पाठकों को नीतिवाद, संघवाद, जातिवाद,तर्कवाद इत्यादि से परे जाकर केवल सरल एवं समस्यारहित जीवन शैली सिखातीं हैं। कोई भी कवि प्रेम की उपेक्षा नहीं कर सकता। प्रेम एवं पीड़ा कविता के प्रथम श्वास होते हैं। अतएव, कविताकार में स्वच्छ शाश्वत प्रेम का निदर्शन देते हुए रामेश्वर जी कहते हैं, उदाहरण स्वरूप पृष्ठ 82,83 एवं 84 से :-

(10)

जग बरसे जब बन ओला वृष्टि, तुम अमृत बन जाते हो

उर के अंकुर जब-जब झूलसे, तुम अमृत घन बरसाते हो।

(14)

पथ तुम्हारा कंटकों का संग में चलना मुझे

सुमन खिलाते हैं जहाँ तक आँचल तुम्हारा है।

(18)

मैं तो रहा अकिंचन जग में, कुछ भी क्या दे पाया तुमको

तुमने तो सातों जन्मों का, मुझको प्यार अमर दे डाला।

इतनी गहराई से भावों के मोतियों को समेटकर कथा-वस्तु का रूपांतर नदी सी कलकल कविता में करना, अत्यंत रमणीय है।

संपूर्ण संग्रह में समस्त कविताओं को आत्मा का स्पर्शन देते हुए पृष्ठ 89 की क्षणिका राजनीति में तिर्यक् उक्ति पढ़कर यह अनुभूत हुआ कि कवि वर्ष 1981 में कितने मननशील रहें होंगे । उन्मुक्त चिंताशक्ति से सम्पन्न कवि समग्र जगत की पीड़ा को कविताधीन करने में सफल हो पाए हैं।  इस लघु कविता का अंश :

राजनीति जब घुप्प अँधेरे में

पहुँची वेश्या के कोठे पर,

बाँह पकड़कर दलाल

उसे नीचे ले आए —

भले आदमियों की जगह यह

यहाँ से जाओ!......

इस कविता में राजनीति कितनी भयावह है, कैसे कूट- कपट से मानव के मूल्यबोध को नष्ट किया है, कैसे परिजनों को शत्रु बनाया है, कैसे विभक्तीकरण से मेरुदंड को ध्वस्त किया है.. यह अल्प शब्दों में प्रतिपादित किया है एवं उच्चकोटि के बिम्बों में अपनी अभिव्यक्ति का सुंदर चित्रण किया है, कविश्री रामेश्वर जी ने।

यह संग्रह विशेष रूप से संग्रहणीय है। तरुणावस्था से अर्थात् 1976 से 2022 पर्यंत की इस काव्य-यात्रा में मौलिक भावों का न्यायिक एवं वैधिक चिंतन यात्री बन पाठकों के मन को अवश्य काव्य-लहरों को स्पर्श करने को प्रेरित करेगा। विभिन्न विधा में उपयुक्त मानवीय चेतना को उज्जीवित करने में सफल हुए हैं कवि रामेश्वर जी।

उनकी लेखनी समस्त पीढ़ी का मार्गदर्शक बन श्रेष्ठ साहित्य को विस्तार दें, यह कामना करती हूँ।


तीन बाल कविताएँ

- प्रभुदयाल श्रीवास्तव






1. खुद सूरज बन जाओ न

चिड़िया रानी, चिड़िया रानी,

फुरर-फुरर कर कहाँ चली।

दादी अम्मा जहाँ सुखातीं,

छत पर बैठीं मूँगफली।


चिड़िया रानी चिड़िया रानी,

मूँगफली कैसी होती।

मूँगफली होती है जैसे,

लाल रंग का हो मोती।


चिड़िया रानी चिड़िया रानी,

मोती मुझे खिलाओ न।

बगुला भगत बने क्यों रहते,

बनकर हंस दिखाओ न।

चिड़िया रानी चिड़िया रानी,

हंस कहाँ पर रहते हैं।

काम भलाई के जो करते,

हंस उन्हीं को कहते हैं।


चिड़िया रानी चिड़िया रानी,

भले काम कैसे करते।

सूरज भैया धूप भेजकर,

जैसे अंधियारा हरते।


चिड़िया रानी चिड़िया रानी,

सूरज से मिलवाओ न।

अपना ज्ञान बाँटकर सबको,

खुद सूरज बन जाओ न।







2. रोटी कहाँ छुपाई

लगे देखने टेलीवीज़न,

चूहे घर के सारे।

देख रोटियाँ परदे पर,

उछले खुशियों के मारे।


सोच रहे थे एक झपट्टे,

में रोटी लें बीन।

लेकिन बिजली बंद हुई तो,

रोटी हुई विलीन।


लिए कई फेरे टी वी के,

बड़ा गज़ब है भाई।

बिजली बंद हुई, टीवी ने

रोटी कहाँ छुपाई?








3. करने दो 
आबाद हमें घर

काँधे बस्ता लादे- लादे ,
हालत हो गई खस्ता जी ।

नहीं छुएँगे बस्ता जी ।
नाम न लो पुस्तक कॉपी का,
फेको रबर पेन्सिल दूर ।
सन्डे की छुट्टी में पढ़ने,
लिखने का हो दूर फितूर ।
हमको ख़ा लेने दो छककर,
गरम-समोसे खस्ताजी ।

 होम वर्क जैसे शब्दों को ,
 करो प्रवाहित निर्झर में ।
 कूदम-फादम, हल्लम-गुल्लम
 का आरक्षण हो घर में ।           
 स्कूलों की कूट-चाल में,
 ना फँसने दें बस्ता जी ।

खेल कबड्डी, गुल्ली डंडा ,
खो -खो-का आयोजन हो । 
हर घंटे रसगुल्ले-चमचम ,  
मालपुओं का भोजन हो ।
करने दो आबाद हमें घर 
दिन भर मस्ता-मस्ता जी ।

सम्पर्कः 12 शिवम सुन्दरम नगर छिन्दवाड़ा मध्य प्रदेश 480001