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Feb 1, 2023

स्वास्थ्यः स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी है पर्याप्त निद्रा

 - डॉ. आर. बी. चौधरी
साइंस डेली में छपे एक अध्ययन के अनुसार 5 घंटे से कम सोने से शरीर में कई बीमारी पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है। दी न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, 50 साल की उम्र के आसपास पाँच घंटे या उससे कम सोने वालों को सात घंटे सोने वालों की तुलना में कहीं अधिक बीमारियों घेर लेती हैं।
एक अध्ययन में पाया गया कि 50 प्रतिशत से कम नींद किसी भी व्यक्ति के लिए बड़ा खतरा हो सकती है। ब्रेन कम्यूनिकेशंस के अनुसार नींद की कमी से अल्ज़ाइमर विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है। इसी प्रकार, वाशिंगटन स्टेट युनिवर्सिटी के एक अध्ययन में भी बताया गया है कि नींद की गुणवत्ता का सीधा प्रभाव महिलाओं के मूड, उनकी महत्वाकांक्षा और करियर आगे बढ़ने पर पड़ता है। इसके विपरीत, नींद की गुणवत्ता पुरुषों की भावनाओं पर ज़्यादा असरकारी नहीं पाई गई। 
कई सर्वेक्षणों में स्पष्ट हुआ है कि कोरोना की महामारी ने हमारे सोने के पैटर्न को गड़बड़ा दिया है। सोशल मीडिया कम्यूनिटी प्लेटफॉर्म द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि अध्ययन में शामिल 52 प्रतिशत भारतीयों ने यह स्वीकार किया कि महामारी के बाद उनकी नींद के पैटर्न में बदलाव आया है।
प्रत्येक 2 भारतीयों में से एक ने कहा कि उसे हर रात 6 घंटे से भी कम नींद आती है जबकि 4 में से एक व्यक्ति 4 घंटे से कम सो रहा है। कोविड से प्रभावित लोग मानसिक और शारीरिक रूप से तनावग्रस्त होते हैं। यह काफी हद तक नींद के पैटर्न को प्रभावित करता है। मन में भय पैदा हो जाता है और ऐसे लोग अलग-थलग पड़ जाते हैं और सामान्य दिनचर्या नहीं व्यतीत कर पाते हैं। यह सब बहुत अधिक मानसिक दबाव के कारण होता है। अध्ययन में यह भी बताया गया है कि अगर कोई ठीक से नहीं सोता है तो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता और मस्तिष्क की संज्ञानात्मक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 
अच्छी नींद तंदुरुस्ती बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। जिसके लिए रात का खाना समय पर लेना चाहिए और सोने तथा अंतिम भोजन के बीच कम से कम 2 घंटे का अंतराल होना चाहिए। सोने से कम से कम एक घंटे पहले से मोबाइल फोन, लैपटॉप का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। जिस बिस्तर पर सोते हैं उसे केवल सोने के लिए ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए; कार्यालय के काम के लिए इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। दिन के दौरान झपकी से बचना चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार रोज़ाना व्यायाम ज़रूरी है तथा हल्का भोजन करना चाहिए। अच्छी नींद के लिए शराब और कैफीन का सेवन नहीं करना चाहिए। ये सामाजिक सम्बंधों को प्रभावित कर सकते हैं और कार्डियोवैस्कुलर और चयापचय सम्बंधी जटिलताओं और बीमारियों में वृद्धि का कारण बन सकते हैं। इनसे शरीर में कमज़ोरी आती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता लगातार घटती जाती है।
दिन का करीब एक तिहाई हिस्सा सोने के लिए उपयोग किया जाना चाहिए। 1950 के दशक से पहले, ज़्यादातर लोगों का मानना था कि नींद एक ऐसी अवस्था है जिसके दौरान शरीर क्रिया और मस्तिष्क निष्क्रिय रहता है। इस दौरान मस्तिष्क कई प्रक्रियाओं से गुज़रता है और मस्तिष्क में होने वाली गतिविधियों का सीधा सम्बंध हमारी दिनचर्या से होता है। शोधकर्ता इन प्रक्रियाओं के बारे में अधिक जानने की कोशिश कर रहे हैं ताकि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त की जा सके। नींद पर अनुसंधान कर रहे वैज्ञानिकों का मानना है कि सोते समय मस्तिष्क दो अलग-अलग प्रकार की निद्राओं के माध्यम से मस्तिष्क की प्रक्रिया के कई चक्रों को पूरा करता है। इसमें रैपिड-आई मूवमेंट (आरईएम) नींद और गैर-आरईएम नींद को प्रमुख माना जाता है।
इस चक्र का पहला भाग गैर-आरईएम नींद है, जो चार चरणों से बना है। पहला चरण जागने और सो जाने के बीच आता है। दूसरा है हल्की नींद, जब हृदय गति और श्वास नियंत्रित होते हैं और शरीर का तापमान गिर जाता है। तीसरा और चौथा चरण है गहरी नींद। हालांकि आरईएम नींद को पहले सीखने और स्मृति के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण चरण माना जाता था, नए आँकड़ों से पता चलता है कि इन कार्यों के लिए गैर-आरईएम नींद अधिक महत्वपूर्ण है। साथ ही अधिक आरामदायक नींद और पुनर्स्थापना चरण की नींद भी शामिल है। जैसे ही कोई व्यक्ति नींद में जाता है तो आँखें बंद होने लगती हैं और आँखों की पुतलियां पलकों के पीछे तेज़ी से गति करती हैं। हालांकि, मस्तिष्क तरंगें जागृत अवस्था के समान होती हैं। जब कोई व्यक्ति सपना देखता है तो सांस की गति बढ़ जाती है और शरीर अस्थायी रूप से शून्य जैसी अवस्था में चला जाता है। यह चक्र कई बार दोहराया जाता है। इस प्रकार सामान्यत: रात में चार या पाँच चक्र होते हैं।
अमेरिका की जॉन्स हापकिंस युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2014 में फ्रूट फ्लाई पर किए गए प्रयोगों के माध्यम यह पता लगाया था कि न सो पाने वाली फ्रूट फ्लाई के अंदर एक खास उत्परिवर्ती जीन नींद का नियंत्रण करता है। इस जीन को उन्होंने वाइड अवेक नाम दिया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यह उत्परिवर्ती वाइड अवेक जीन जैविक घड़ी को अनियमित करके नींद उड़ाने का काम करता है। उन्होंने पाया था कि यह सामान्य वाइड अवेक जीन एक प्रोटीन बनाता है जो रात में नींद के लिए ज़िम्मेदार होता है और नींद के चक्र को नियंत्रित करता है। 
इसी क्रम में यह भी पाया गया कि मनुष्यों और चूहों में भी ऐसा ही निद्रा जीन मौजूद होता है। हमारे अंदर एक जैविक घड़ी होती है जिसके द्वारा मस्तिष्क को समय की सूचना मिलती है। इसका काफी सम्बंध हमें मिलने वाले प्रकाश से होता है जैसे भोजन के बिना हमें भूख लगती है और उसकी आपूर्ति ज़रूरी हो जाती है, उसी प्रकार से नींद की कमी की दशा में पूरे दिन नींद की इच्छा बनी रहती है और हमें सोने की ज़रूरत महसूस होती है। अलबत्ता, नींद और भूख के बीच एक अंतर भी है। भूख लगने पर हमारा शरीर भोजन के लिए सीमा से परे मजबूर नहीं कर सकता है। लेकिन थका व्यक्ति सोने को बाध्य हो जाता है। आँखें अपने आप बंद होने लगती हैं। भले ही आँखें खुली हो लेकिन नींद पूरी न होने की दशा में कुछ मिनट के लिए झपकी मजबूरन आ जाती है। पर्याप्त नींद स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है।         

जीवन दर्शनः सेवक का सम्मान

 -विजय जोशी (पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

  कहा है कि श्रम  से बड़ा कोई कर्म नहीं और सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं बशर्ते सेवा हो अहंकार रहित। सेवा में अहंकार का कोई स्थान नहीं। यह तो मन में उपजा पवित्र भाव है। पर सेवा इतनी सरल भी नहीं। इसीलिए तो कहा भी गया है सेवा धरम कठिन मैं जाना। और जो इसे सफलतापूर्वक समर्पित भाव से संपन्न कर लेता है उसके आभारी तो स्वयं ईश्वर तक हो जाते हैं।

   एक बार नारद नारायण नारायण करते -करते राम के द्वार दर्शन करने पहुँचे तो पहरा दे रहे हनुमान द्वारा रोक लिए गए।

नारद बोले – मैं तो प्रभु से मिलने आया हूँ। वे क्या कर रहे हैं।

            पता नहीं – हनुमान बोले – कुछ बही- खाता लिख रहे हैं। और चूँकि व्यस्त हैं; अतः आप अंदर नहीं जा सकते।

            नारद को यह नागवार गुजरा और वे हनुमान को परे हटाकर अंदर प्रवेश कर गए। अंदर जाकर उनके आश्चर्य की सीमा नहीं रही- जब नारद ने देखा कि वे कुछ लिख रहे हैं।

            प्रभु आप स्वयं – नारद ने जिज्ञासा वश पूछा। किसी और को कह देते।

            नहीं नारद मेरा काम मुझे ही करना है। और यह तो विशेष कार्य है – प्रभु बोले।   

      भला बताइये ऐसा क्या लिख रहे थे – अब तक नारद उत्सुक हो चुके थे।

      उन भक्तों के नाम जो मुझे हर पल भजते हैं। उनकी मैं हर दिन हाजिरी लगाता हूँ – प्रभु ने उत्तर दिया।

      तो प्रभु बताइये भला इसमें मेरा नाम कहाँ है - और जब सूची देखी तो स्वयं का नाम सबसे ऊपर पाया।

            अब नारद के मन में अहंकार इसलिए भी  उपज आया कि इसमें हनुमान का नाम  कहीं नहीं था। बाहर आकर यही बात उन्होंने हनुमान से कही। पर हनुमान वैसे ही बने रहे तथा बोले – कोई बात नहीं। प्रभु ने शायद मुझे इस लायक नहीं समझा। पर वे एक दैनंदिनी और भी रखते हैं।

            आप शायद एक दैनंदिनी और रखते हैं। उसमें क्या लिखते हैं – अब नारद ने पुन: राम के पास जाकर पूछा।

            वह तुम्हारे काम की नहीं - प्रभु बोले।

            नारद ने विनय की - पर मैं तो जानना चाहता हूँ।

            मुनिवर मैं उसमें उन लोगों के नाम लिखता हूँ, जिनको मैं भजता हूँ– अब प्रभु ने समापन किया संवाद का और यह कहते हुए सूची आगे बढ़ाई, तो नारद ने देखा कि उसमें हनुमान का नाम सबसे ऊपर था। नारद का सारा अभिमान तत्क्षण तिरोहित हो गया।

            मित्रो! यही है अहंकार से रहित निर्मल, निःस्वार्थ भक्ति का वह भाव जिसके अंतर्गत ईश्वर भी भक्त के प्रति समर्पित हो जाते हैं।

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,  मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

Jan 1, 2023

उदंती.com, जनवरी 2023

वर्ष- 15, अंक- 5

मुड़-मुड़कर क्या देखना, पीछे उड़ती धूल ।

फूलों की खेती करो, हट जाएँगे शूल ।। 

                             - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

इस अंक में 

अनकहीः नया साल, नया दिन, नया संकल्प  - डॉ. रत्ना वर्मा

आलेखः मकर संक्रांति- भारतीय संस्कृति में सूर्य - प्रमोद भार्गव

दोहेः सुबह सुहानी धूप - शील कौशिक

धरोहरः सिरपुर में है विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध विहार - डॉ. रत्ना वर्मा

संस्मरणः पचासी पतझड़ - निर्देश निधि

चोकाः मैं सूरज हूँ - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

आलेखः युवा भारत का अमृत महोत्सव - डॉ. जेन्नी शबनम

बाल कहानीः दादा जी की नसीहतें - पवित्रा अग्रवाल

कहानीः अजनबी - प्रियंका गुप्ता  

तीन लघुकथाएँः वर्तमान का दंश, खूबसूरत, पहेली - डॉ . सुषमा गुप्ता

कविताः दुआ का पौधा  - रश्मि विभा त्रिपाठी

दो लघुकथाएँः 1. पपेट शो, 2.देवो भवः - दीपाली ठाकुर

बाल कविताः खुद सूरज बन जाओ न - प्रभुदयाल श्रीवास्तव

व्यंग्यः भैया जी - शंकर लाल माहेश्वरी

कविताः हो उदय अब सूर्य कोई - मीनाक्षी शर्मा ‘मनस्वी’

आलेखः मनुष्यता का विचार देने वाले स्वामी विवेकानंद - प्रमोद भार्गव

जीवन दर्शनः माटी कहे कुम्हार से: निर्णय से नियति - विजय जोशी

अनकहीः नया साल, नया दिन, नया संकल्प

 - डॉ. रत्ना वर्मा

...तो आप कैसे शुरूआत कर रहे हैं नए साल के दिन और क्या नया करने का सोचा है इस साल, कोई नया संकल्प, नया काम आदि आदि? साल के खत्म होते- होते सबकी जुबान पर इसी तरह का सवाल होता है। पर खुशियाँ मनाने के सबके अपने- अपने तरीके होते हैं। कोई दोस्त के साथ या परिवार के साथ बाहर छुट्टियाँ मनाने जाता है, तो कोई पार्टी करके खुश होता है, बहुत से ऐसे हैं, जो कहते हैं नए साल का पहला दिन परिवार के साथ बिताएँगे। अधिकतर तो घर पर रहकर टीवी देखते हुए नए साल का स्वागत करते हैं। कहने का तात्पर्य यही कि स्वागत सब करते हैं, तरीके चाहे सबके कितने ही अलग क्यों न हो। 

हम सबने देखा है कि पिछले दो साल से आम लोगों ने अपने जीवन को देखने का नज़रिया बदल दिया है। कहते हैं- जिंदगी के हादसे, मुसीबतें और परेशानियाँ व्यक्ति को सबक सिखाती हैं। यही सबक हम सबने पिछले सालों में आई स्वास्थ्य सम्बंधी मुसीबतों से सीखा है कि जीवन, सिर्फ भाग- दौड़ करते हुए जीने का नाम नहीं है; बल्कि जितना जीवन हमें मिला है, उसको अपनों के साथ खुशियाँ मनाते हुए स्वस्थ मानसिकता से जीने का नाम है। कोरोना जैसी महामारी ने हम सबके जीवन में उथल- पुथल मचाकर एक नए नजरिए से जीवन को जीने का संदेश दिया है, बहुतों ने इसे गंभीरता से लिया भी है और अपने नजरिए में बदलाव करते हुए जीवन को सहज, सरल और ज्यादा खुशहाल बनाने की दिशा में सोचना शुरू भी कर दिया है।

जीवन की राह बहुत कठिन है, जहाँ अनगिनत उतार- चढ़ाव आते हैं। खुशियाँ हैं, तो दुःख भी कम नहीं है। दरअसल सुख और दुःख दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। पर इन दोनों के बीच संतुलन बनाकर ही जीने का आनंद उठाया जा सकता है। किसी एक पल में दुःख आ जाने से हम निराश हो जाते हैं और जीने की सारी उम्मीद छोड़ देते हैं, बस यहीं एक गलती कर बैठते हैं । पर यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह पिछली मुसीबतों को बहुत जल्दी भूल जाता है। ‘बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध लेय’ की तर्ज पर लोग बस आगे बढ़ना चाहते हैं । यह सही भी है कि दुःखों को भूल कर खुशियों को साथ लेकर आगे बढ़ना ही जिंदगी है;  परंतु पिछली गलतियों से बिना सबक लिये, आगे बढ़ना गलत होगा।

जो व्यक्ति यह कहते हुए केवल धन कमाने में लगा रहता है कि परिवार के लिए, बच्चों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए धन कमा रहा हूँ, ऐसे लोगों को अब लोग नसीहतें देने लगे हैं कि यह सब तो ठीक है;  पर इसके पीछे अपने आपको खत्म मत करो कि अपनों के साथ दो पल खुशियों के भी न बीता पाओ या फिर दूसरों के लिए जीते – जीते ऐसा न हो कि स्वयं आपके अपने सपने, आपकी इच्छाएँ, चाहते सब दबी रह जाएँ और अंत में आपको पछताना पड़े कि अरे इतना सब समझौता करके जीने से तो अच्छा था कि थोड़ा समय अपनी खुशियों को भी दे देते। पैसा ही महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना आपके पास है, उतने में खुश रहना सीखना होगा। गलत तरीके से धन कमाना या दिन रात बस धन कमाने में ही लगे रहना, तो बेहतर जीवन जीने का तरीका नहीं है।

इन सबके बीच आज यहाँ सिर्फ एक बात कहना चाहूँगी। जिस युवा पीढ़ी की ओर उम्मीद भरी नजरों से  पूरा भारत देख रहा है, यह कहते हुए कि यही वह पीढ़ी है जो हमारे देश को विकास की ऊँचाइयों पर ले जाएगी, वह कुछ भटकता सा नजर आ रहा है।  पिछले दिनों हमने देखा कि युवाओं में डिप्रेशन के मामले बढ़ते जा रहे हैं, यही नहीं  बात आत्महत्या तक पहुँच जाती है।  इसका एक अहम कारण परिवार और समाज से दूर जिंदगी के थपेड़ों में उनका अकेले पड़ जाना। है। दरअसल बहुत जल्दी आगे बढ़ने की होड़ में वे सही रास्ता नहीं चुन पाते।  गलत राहों पर चलकर वे कुहरे- भरी जिंदगी में घिर जाते हैं कि वहाँ से उनका निकलना मुश्किल होता है।  कहने का तात्पर्य यहाँ यही है कि हम एक सामाजिक प्राणी हैं, परिवार समाज और दोस्तों के बिना अकेले जीवन नहीं गुजार सकते; इसलिए न तो माता पिता को अपने बच्चों को अकेला छोड़ना चाहिए और न ही बच्चों को सब छोड़कर अकेले निकल जाना चाहिए।

        ऐसे में बेहतर जीवन जीने के लिए हमें बस कुछ छोटी- छोटी बातों को अपने जीवन में ढालना होगा- खुशी छोटी हो या बड़ी,  उसमें खुश होना सीखना होगा, जिंदगी को जीने के लिए रिश्ते को अहमियत देना होगा- चाहे वे दोस्त हों या परिवार। सफलता के लिए मेहनत करना होगा, दूसरों के साथ अपनी खुशी और दुःख को साझा करने की आदत डालनी होगी, किसी ने हमारे साथ गलत किया, तो हम भी उसके साथ गलत करें यह सोच बदलनी होगी।

सार यही कि जिंदगी के हर पल को खुशी के साथ, सबके साथ मिलकर जीना सीखें और इस जिंदगी में मिले इस उजाले के लिए भगवान का शुक्रिया व्यक्त करना न भूलें। जीवन को सकारात्मकता, आशा और उम्मीद के साथ जिएँ। नए वर्ष पर सबका जीवन सुखमय हों, उज्ज्वल हो,  शुभ हों इन्हीं कामनाओं के साथ- नासिर राव के शब्दों में- 

जब उजाला गली से गुज़रने लगा, 

सब अँधेरों का चेहरा उतरने लगा ।

                    

आलेखः 14 जनवरी मकर संक्रांति- भारतीय संस्कृति में सूर्य

- प्रमोद भार्गव 

आमतौर से सूर्य को प्रकाश और गर्मी का अक्षुण्ण स्त्रोत माना जाता है, लेकिन अब वैज्ञानिक यह जान गए हैं कि यदि सूर्य का अस्तित्व समाप्त हो जाए तो पृथ्वी पर विचरण करने वाले सभी जीव-जंतु तीन दिन के भीतर मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे। सूर्य के हमेशा के लिए अंधकार में डूबने के भीतर वायुमण्डल में मौजूद समूची जलवाष्प ठण्डी होकर बर्फ के रूप में गिर जाएगी और असहनीय शीतलता से कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह पाएगा। करीब 50 करोड़ साल पहले से प्रकाशामन सूर्य की प्राणदायिनी ऊर्जा की रहस्य-शक्ति को हमारे ॠषि-मुनियों ने पांच हजार साल पहले ही जान लिया था और वे ऋग्वेद में लिख गए थे, 'आप्रा द्यावा पृथिवी अंतरिक्षः सूर्य आत्मा जगतस्थश्च।' अर्थात विश्व की चर तथा अचर वस्तुओं की आत्मा सूर्य ही है। ऋग्वेद के मंत्र में सूर्य का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व उल्लेखित है। प्रकृति के रहस्यों के प्रति जिज्ञासु ऋषियों ने हजारों साल पहले जिस सत्य का अनुभव किया था, उसकी विज्ञान- सम्मत पुष्टि अब 21वीं सदी में वैज्ञानिक प्रयोगों से संभव हो रही है।

सौर मंडल के सौर ग्रह, उपग्रह और उसमें स्थित जीवधारी सूर्य से ही जीवन प्राप्त कर रहें हैं। पृथ्वी पर जीवन का आधार सूर्य ही है। सभी जीव-जंतु और वनस्पति जगत का जीवन चक्र सूर्य पर ही पूर्ण रूप से आश्रित है। सूर्य के इन्हीं गुणों के कारण वैदिक काल में अनेक काव्यात्मक सूक्तों की रचना की गई और ऐतिहासिक काल में सूर्य मंदिरों का निर्माण कराया गया। आदिमानव को सूर्य इसलिए चमत्कृत व प्रभावित करता था, क्योंकि वह अंधकार से मुक्ति दिलाता था और ठण्ड से बचाता था। सूर्य के प्रदेय में कोई भेद नहीं है। काल -गणना का दिशा बोध भी मनुष्य को सूर्य ने ही दिया। इसलिए दुनिया की सभी जातियों और सभ्यताओं ने सूर्य को देवता के रूप में पूजा और अपनी-अपनी कल्पनाओं व लोकानुरूप मिथक गढ़े, जो किंवदंतियों के रूप में हमारे पास आज भी सुरक्षित हैं।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में वैदिक काल में सूर्योपासना ज्ञान और प्रकाश के एकीकरण के लिए की जाती थी। तैतरीय-संहिता में उल्लेख है कि सूर्य के प्रकाश से ही चंद्रमा चमकता है। 'छांदोग्य उपनिषद्' में सूर्य को ब्रह्म बताया गया है। गायत्री मंत्र में सूर्य को तेज और बुद्धि का पर्याय माना गया है। रामायण में राम, रावण से युद्ध का श्रीगणेश करने से पहले सूर्य की स्तुति करते हैं। महाभारत में तो कर्ण को सूर्य-पुत्र ही बताया गया है। कनिष्क तथा हुविष्क के सिक्कों पर सूर्य का अंकन है। कुषाणों ने अनेक नयनाभिराम सूर्य प्रतिमाओं का निर्माण कराया। हर्ष के राजकवि मयूर ने सूर्य की वंदना में सौ श्लोकों की रचना की। सूर्य की किरणों से चिकित्सा पर कई पुस्तकें लिखी गई हैं। यजुर्वेद में स्पष्ट कहा गया है कि अंतरिक्ष में व्याप्त सभी विकीरणों में सूर्य की किरणें ही जीव जगत के लिए लाभदायी हैं। 1582 में मुगल सम्राट अकबर ने एक नए धर्म 'दीन ऐ इलाही' की शुरूआत की थी, जिसमें सूर्य पूजा का ही सर्वाधिक महत्व दर्शाया गया था।

वैदिक रूप में सूर्य को काल गणना का कारण मान लिया गया था। ऋतुओं में परिवर्तन का करण भी सूर्य को माना गया। वैदिक समय में ऋतुचक्र के आधार पर सौर वर्ष या प्रकाश वर्ष की गणना शुरू हो गई थी, जिसमें एक वर्ष में 360 दिन रखे गए। वर्ष को वैदिक ग्रंथों में संवत्सर नाम से जाना जाता है। नक्षत्र, वार और ग्रहों के छह महीने तक सूर्योदय उत्तर-पूर्व क्षितिज से, अगले छह माह दक्षिण पूर्व क्षितिज से होता है। इसलिए सूर्य का काल विभाजन उत्तरायण और दक्षिणायन के रूप में है। उत्तरायण के शुरू होने के दिन से ही रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। यही दिन मकर तथा कर्क राशि से सूर्य को जोड़ता है। इसलिए उस दिन भारत में मकर-संक्रांति का पर्व मनाने की परंपरा है। वेदकाल में यह साफ तौर से पता लगा लिया था कि प्रकाश, उर्जा, वायु और वर्ष के लिए समस्त भूमण्डल सूर्य पर ही निर्भर है। वेदकालीन सूर्य में सात प्रकार की किरणें और सूर्य रथ में सात घोड़ों के जुते होने का उल्लेख है। सूर्य रथ का होना और उसमें घोड़ों का जुता होना अतिरंजनापूर्ण लगता है। हालाँकि सूर्य रथ की कल्पना काल की गति के रूप में की गई। सात प्रकार की किरणों को खोजने में आधुनिक वैज्ञानिक भी लगे हैं। नए शोधों से ज्ञात हुआ है कि सूर्य किरणों के अदृश्य हिस्से में अवरक्त और पराबैंग्नी किरणें होती हैं। भूमण्डल को गर्म रखने और जैव रासायनिक क्रियाओं को छिप्र रखने का कार्य अवरक्त किरणें और जीवधारियों के शरीर में रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ाने का काम पराबैंग्नी किरणें करती हैं।

वेदकालीन सूर्यलोक में दो देवियों की भी कल्पना की गई है। ये हैं, उषा और सूर्या। ऋग्वेद में उषा की वंदना सूर्यों के साथ बीस सूक्तों में की गई है। सूर्योदय के समय अंधेरे और उजाले के बीच जो संधिवेला है, वही उषा की प्रतीक है। सौर देवी सूत्रों की ऋग्वेद में पूरे सूक्त में स्तूति की है। भूमण्डल को प्रकाशित करने का कारण उषा ही मानी जाती है।

दुनिया के सबसे बड़े मेले सिंहस्थ और कुंभ भी सूर्य के एक निश्चित स्थिति में आने पर लगते हैं। सिंहस्थ का पर्व तब मनाया जाता है, जब सिंह राशि में सूर्य आता है। इसमें स्नान एक निश्चित मुर्हूत्त में किया जाता है। वैदिक ग्रंथों के अनुसार देव और दानवों ने समुद्र-मंथन के दौरान अमृत कलश प्राप्त किया था। इसे लेकर विवाद हुआ। तब विष्णु ने सुंदरी रूप रखकर देवताओं को अमृत और दानवों को मदिरा पान कराया। राहु ने यह बात पकड़ ली। वह अमृत कलश लेकर भागा। विष्णु ने सुदर्शन चक्र छोड़कर राहु का सिर धड़ से अलग कर दिया। इससे सिर 'राहु' और धड़ 'केतु' कहलाया। इस छीना-झपटी में जहाँ-जहाँ अमृत की बूंदें गिरीं, वहाँ-वहाँ सिंहस्थ और कुंभ के मेले लगने लगे।

इस वैदिक घटना को वैज्ञानिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है। इस आख्यान एवं वैज्ञानिक शोध के बीच सामंजस्य बिठाया जा रहा है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक डां राम श्रीवास्तव का इस सिलसिले में कहना है, 'हमारे सौर मंडल में एमएस 403 का एक तारा है। यह हमारे सूर्य से दस हजार गुना बड़ा सूर्य है। इसे एक ब्लैक होल निगल रहा है। जिस तरह से शेर के मुँह से अपने को छुड़ाने को जानवर भागता है, ठीक उसी तरह यह दस हजार गुना बड़ा सूर्य ब्लैक होल के चारों ओर छूटकर भागने के लिए चक्कर काट रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में जैसे किसी अनारदाने से आतिशबाजी की चिंगरियाँ  निकलती हैं, एम एस 433 के दोनों ओर यह अतिशबाजी निकल रही है। वैज्ञानिकों ने इसके प्रकाश का जब परीक्षण किया तो पाया कि 433 में ऐसे अनेक तत्व हैं, जिन्हें हमारा विज्ञान आज भी नहीं पहचानता। आज भी ऐसे तत्व अन्य किसी तारे में मौजूद नहीं हैं। यह भी एक विचित्र संयोग है, जब सिंहस्थ का मेला लगता है तो एसएस 433 सूर्य के साथ सिंह राशि में बीचों-बीच स्थित रहता है और सिंहस्थ व कुंभ स्नान के समय इससे निकलने वाला प्रकाश तथा आतिशबाजी सीधे पृथ्वी की ओर इंगित रहते हैं। मसलन हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य के अनेक रहस्यों को जानने के साथ मनुष्य के लिए उसकी उपयोगिता भी जान ली थी। इसलिए सिंहस्थ और कुंभ जैसे मेलों की शुरूआत हुई।


ऋग्वेद में सूर्यग्रहण का भी उल्लेख है। प्रसिद्ध ऋषि अत्रि सूर्य को सूर्यग्रहण से मुक्त कराने का उपाय भी जानते थे।  ऋग्वेद में उल्लेख है कि अंधकार रूपी स्वर्भानू असुर ने सूर्य को ग्रस लिया
, तब अत्रि ने उसे अपने प्रताप के ग्रहण से छुड़ाया। ब्रह्माण्ड में घटी इस तरह की घटनाओं के प्रतिफलस्वरूप  ही लोक जीवन से पुराकथाओं और मिथकों का जन्म हुआ। इसी तारतम्य में भारतीय संदर्भ में प्रमुख कथा है, '
एक बार गणेश जी भरपूर आहार ग्रहण करने के बाद आराम कर रहे थे। इसी समय उन्होंने सूर्य और चंद्रमा को अपने ऊपर हँसते पाया। इससे गणेश क्रोधित हो गए और उन्होंने कमर में लिपटे अजगर को आदेश दिया की वह ब्रह्माण्ड में पड़े इन पिण्डों को निगल जाए। अजगर  ने सूर्य को निगलना शुरू कर दिया और पूरी दुनिया अंधकार में डूब गई। चराचर में हाहाकर मचने लगा। तब भूलोकवासियों ने गणेश से इस संकट से मुक्त कराने की प्रार्थना की। गणेश पिघल गये। लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी की
, सूर्य व चंद्र को अपने किए का आभास कराने के लिए वे कुछ निर्धारित दिनों में आंशिक रूप से फिर सूर्य को निगल लिया करेंगे। इस मिथक के आधार पर ही संभवतः सूर्य ग्रहण देखने की जिज्ञासा जनमानस में उत्पन्न हुई।

इस कथा के पीछे वैज्ञानिक मत है कि पूर्ण सूर्यग्रहण से करीब 30 सैकेण्ड पहले आकाश में एकदम अंधेरा छा जाता है और सूर्य कि किरणें ग्रहण के एक कोने से मुक्त होने लगती हैं, तब आकाश में ऐसी तरंगें फैल जाती हैं, जैसे कि लाखों साँपों के उलझे हुए गुच्छे फैल गए हों। पूर्ण ग्रहण समाप्त होने के बाद ऐसा ही अनुभव होता रहता है। करीब छह हजार साल पहले किए एक पूर्ण सूर्यग्रहण के अध्ययन से अनुमान लगाया गया कि दो धुरियाँ  हैं, पहली जिस पर धरती घूमती है और सूर्य का चक्कर लगाती है, दूसरी धुरी जिस पर चंद्रमा धरती का चक्कर लगाता है। जिन बिंदुओं पर आकर वे एक दूसरे से मिलते हैं, उन्हें राहु और केतु कहा जाता है। ग्रहण का प्रभाव तभी सामने आता है जब सूर्य और चंद्रमा एक सीध में आमने-सामने आकर परस्पर निकट से निकलते हैं।  

सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 09981061100