मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Aug 1, 2022

लघुकथाः गुरु

- डॉ. उपमा शर्मा 
  हर साल प्रथम आने वाली रितु नई विद्यार्थी साक्षी के उसकी कक्षा में आ जाने से अब दूसरे नम्बर पर रह जाती थी।
आज परीक्षा का परिणाम आने वाला था। रितु सुबह से ही बेसब्री से परिणाम की प्रतीक्षा कर रही थी।

“रितु! नाश्ता ठीक से क्यों नहीं कर रही हो? क्या बात है रिजल्ट  एंक्जाइटी?” रितु की मम्मी ने रितु से कहा

“हाँ माँ! थोड़ी सी। लेकिन इस बार प्रथम मैं ही आऊँगी। आपकी वह प्रिय शिष्या साक्षी नहीं। देख लीजिए। ”

“जिसने ज्यादा मेहनत की होगी, वही प्रथम आएगा रितु। तुम मेरी बेटी हो, मैं चाहती हूँ मेरी बेटी भी साक्षी की तरह मेहनत करे और पहले के जैसे प्रथम आए। ”

“माँ! मेहनत मैं हर बार बहुत करती हूँ। न जाने साक्षी कैसे मुझसे ज्यादा नम्बर ले आती है; लेकिन इस बार मैं ही प्रथम आऊँगी। आप देख लेना। ” गर्व से बोली रितु।

“अच्छी बात है। तुमने मेहनत की है तो अवश्य आओगी। 

“माँ! देखो परिणाम घोषित हो गया।   मेरे 95+प्रतिशत हैं। ” रितु चहकते हुए बोली। अब साक्षी के नम्बर भी देख लेते हैं।” कहते हुए रितु ने साक्षी के नम्बर देखने लिए फिर से परिणाम पत्र खोला। साक्षी के नम्बर देखते ही पल भर में रितु का सारा उत्साह खतम हो गया। इस बार भी साक्षी ही प्रथम थी।

“कोई बात नहीं रितु। थोड़ी और मेहनत करना। अगली बार तुम अवश्य प्रथम आ जाओगी। “माँ ने बेटी का कंधा प्यार से थपथपाया।

रितु मायूस हो उठ गई। स्टोर में जाकर कुछ खोजने लगी।

“कहीं तुम ये तो नहीं खोज रहीं रितु?” -माँ के हाथ में साक्षी की कॉपी देख रितु हड़बड़ा गई।

“ये वही कॉपी है, जो साक्षी ढूँढ रही थी। चेक करने के लिए मेरी घर लाई कॉपीज से तुमने यह कॉपी निकालकर यहाँ छुपा दी, थी जिससे साक्षी पढ़ न सके।”

” माँ! आप चाहती तो मैं प्रथम आ सकती थी।” रितु ने मायूसी से कहा।

“रितु बेटा! मैं गुरु द्रोणाचार्य नहीं जो अर्जुन के लिए एकलव्य का अँगूठा काट लूँ। ”

 ●

सम्पर्कः B-1/248 , यमुना विहार, दिल्ली-110053

कविताः फिर भी बाबूजी कहते हैं

  - रश्मि लहर

शूल सजे पथ, घायल हर पग

बेबस पीड़ा, साथ-साथ है ।

फिर भी बाबू जी कहते  हैं..

यहाँ तो सब कुछ ठीक-ठाक है!

 

कुएँ की सूखी दीवारें भी

चीत्कारती मिलती हैं..

सूखी शाखें नीम की अनगिन

बाट जोहती सिसकी हैं।

 

पिछली बार बसंत गया जो

लौट कहाँ आ पाया है…

सिंदूरी शामों से उठता

अब सपनों का साया है!

नन्हे बच्चे भूख से मिटते

नहीं हाथ में स्लेट–चाक है!

फिर भी बाबू जी कहते हैं..

यहाँ तो सब कुछ ठीक-ठाक है..

 

हाथों की रेखा–रेखा में

अनुभव दर्द भरे लौटा है..

दृग के झिलमिल - से कोनों पर

आकृति बन बचपन चौंका है!

 

था उजास जिनकी वाणी से

वो गूँगे बन डरवाए है..

फटी–फटी आँखों में उनकी

लहू के कतरे भर आए हैं।

सोंधेपन की खुशबू गुम है

निर्धनता से ढका ताख है

फिर भी बाबू जी कहते हैं

यहाँ तो सब कुछ ठीक-ठाक है

तीन कविताएँ-

- गोलेन्द्र पटेल

1. उठो वत्स!

उठो वत्स!

भोर से ही

जिंदगी का बोझ ढोना

किसान होने की पहला शर्त है

धान उगा

प्राण उगा

मुस्कान उगी

पहचान उगी

और उग रही

उम्मीद की किरण

सुबह सुबह

हमारे छोटे हो रहे

खेत से....!

2. गाँव से शहर के

 गोदाम में गेहूँ?

गरीबों के पक्ष में बोलने वाला गेहूँ

एक दिन गोदाम से कहा

ऐसा क्यों होता है

कि अक्सर अकेले में अनाज

सम्पन्न से पूछता है

जो तुम खा रहे हो

क्या तुम्हें पता है

कि वह किस जमीन का उपज है

उसमें किसके श्रम की स्वाद है

इतनी ख़ुशबू कहाँ से आई?

तुम हो कि

ठूँसे जा रहे हो रोटी

निःशब्द!

3. ठहराव

जिंदगी के सफर में

संवेदना को है

अपने पंथ की पहचान

मुसाफिर ठहरो

चौराहा है

पूछ लो सम्भावना से सही दिशा

ले लो थोड़ा ज्ञान

पता तो पता है

चुप्पी और चीख की चिंता है

संवेदनशील सुनो!

चलते चलते चिंतन करो

काँटें बिछे हैं

पैर धीरे धीरे धरो

कछुए के धैर्य-सा

हर यात्रा में होना चाहिए-

ठहराव।

रचनाकार के बारे मेंः जन्म: ग्राम- खजूरगाँव, पोस्ट- साहुपुरी, जिला- चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत, 221009, शिक्षा: काशी हिंदू विश्वविद्यालय में स्नातक अंतिम वर्ष का छात्र (हिंदी आनर्स) सम्पर्कः मो.नं. : 8429249326, ईमेल : corojivi@gmail.com

किताबेंः रतौना आन्दोलन- हिन्दू-मुस्लिम एकता का सेतुबंध

- डॉ. गजेन्द्र सिंह अवास्या

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक 

पुस्तक : रतौना आन्दोलन : हिन्दू-मुस्लिम एकता का सेतुबंध, लेखक : लोकेन्द्र सिंह, दीपक चौकसे एवं परेश उपाध्याय, पृष्ठ : 182, मूल्य : 200 रुपये, प्रकाशक : माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (म. प्र.)

भारत में पत्रकारिता का एक गौरवशाली इतिहास है। समाज जागरण से लेकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता की चेतना जगाने में पत्रकारों एवं समाचारपत्रों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। भारत में पत्रकारिता के विजयी प्रसंगों में से एक है-‘रतौना आन्दोलन’। गो-संरक्षण के जुड़ा यह आन्दोलन वर्ष 1920 में मध्यप्रदेश के सागर जिले के समीप रतौना नामक स्थान से शुरू हुआ, जिसे प्रखर संपादक पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की कलम ने शीघ्र ही राष्ट्रव्यापी आन्दोलन में परिवर्तित कर दिया। पत्रकारिता के सशक्त भूमिका के कारण यह आन्दोलन अपने परिणाम को प्राप्त कर सका। तत्कालीन मध्यभारत प्रान्त में अंग्रेजों को पहली बार पराजय का सामना करना पड़ा। ब्रिटिश सरकार को अपने निर्णय को वापस लेना पड़ा। जिस जगह प्रतिमाह ढाई लाख गोवंश के क़त्ल की योजना थी, आज वहां गोवंश की नस्ल सुधार का बड़ा केंद्र है। जहाँ गोवंश के खून की नदी बहती थी, वहाँ आज इतना दुग्ध उत्पादन हो रहा है कि आस-पास के लोग शुद्ध दूध पी रहे हैं। इस सम्पूर्ण विवरण को हमारे सामने लेकर आती है, पुस्तक ‘रतौना आन्दोलन : हिन्दू-मुस्लिम एकता का सेतुबंध’।

पुस्तक का प्रकाशन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ने किया है। मध्यप्रदेश सरकार के पूर्व जनसंपर्क अधिकारी एवं विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलाधिसचिव लाजपत आहूजा के संपादन में इस पुस्तक को लिखा है, लेखक लोकेन्द्र सिंह, दीपक चौकसे और परेश उपाध्याय ने। यह एक शोधपूर्ण पुस्तक है। पुस्तक में इस आन्दोलन के समर्थन में रतौना से रंगून तक और लखनऊ से लाहौर तक आयोजित हुई सभाओं का जिक्र है। आन्दोलन के भूमिका और परिणाम के साथ ही यह पुस्तक आन्दोलन के प्रभाव को भी पाठकों के सामने लाती है। इस आन्दोलन पर इससे पूर्व बहुत विस्तार से कभी लिखा नहीं गया है। कुछ आलेख एवं संक्षिप्त टिप्पणियाँ जरूर प्रकाशित होती रही हैं। यह पहली पुस्तक है, जो इस महत्त्वपूर्ण आन्दोलन को विस्तार से देश-समाज के सामने लेकर आई है।  

पुस्तक में विस्तार से उन मुस्लिम पत्रकारों का भी विवरण है, जिन्होंने इस आन्दोलन की अगुवाई की। माखनलाल चतुर्वेदी ने स्वयं लिखा है कि इस गो कत्लखाने का सबसे पहला विरोध जबलपुर से प्रकाशित उर्दू समाचारपत्र ‘ताज’ के संपादक मिस्टर ताजुद्दीन ने किया। बाद में, ब्रिटिश सरकार ने इसके लिए उन्हें जेल में भी बंद कर दिया था। इसी तरह सागर के पत्रकार भाई अब्दुल गनी ने भी आगे रहकर पत्रकार के रूप में और आंदोलनकर्ता के रूप में कत्लखाने का विरोध किया। पुस्तक में बताया गया है कि हिन्दू-मुस्लिम समुदाय ने जब मिलकर इस कत्लखाने का विरोध किया, तो उसके कारण स्थानीय स्तर पर एक सामाजिक समरसता एवं सांप्रदायिक सौहार्द का वातावरण बन गया। इस वातावरण का प्रभाव यह रहा कि स्थानीय स्तर पर पूर्व से संचालित अन्य कत्लखाने स्वतः ही बंद कर दिए गए।

पुस्तक में कुल नौ अध्याय हैं। पहले अध्याय में अंग्रेज सरकार की महाकत्लखाने की योजना पर प्रकाश डाला गया है। दूसरे और तीसरे अध्याय में गोवध के विरुद्ध आवाज उठाने वाले मुस्लिम पत्रकार मौलवी ताजुद्दीन एवं भाई अब्दुल गनी की भूमिका पर लिखा गया है। चौथे अध्याय में बताया गया है कि कैसे यह आन्दोलन सामाजिक समरसता का प्रतीक बन गया। पाँचवें अध्याय में ब्रिटिश सरकार की पराजय का जिक्र है। छठे अध्याय में दादा माखनलाल चतुर्वेदी के समाचार पत्र ‘कर्मवीर’ की भूमिका पर सामग्री है। इस अध्याय में उस समय कर्मवीर में प्रकाशित समाचार, आलेख, अपील और अन्य सामग्री को पुनः प्रकाशित किया गया है। सातवें अध्याय में रतौना प्रकरण के सन्दर्भ में माखनलाल चतुर्वेदी की पत्रकारिता पर किए गए शोध अध्ययन को शामिल किया गया है। अंतिम अध्याय ‘परिशिष्ट’ है, जिसमें रतौना के विरोध में दिया गया भाषण, विस्मृत की स्मृति और चित्रों में रतौना : कल और आज, को शामिल किया गया है।

यह एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है, जो आज की पत्रकारिता को दिशा दे सकती है। गो-हत्या और गो-संरक्षण के विषय आज की पत्रकारिता का प्रबोधन यह पुस्तक कर सकती है। भारत के पत्रकारीय इतिहास, आन्दोलन की पद्धति-प्रकृति और सामाजिक मुद्दों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए यह पुस्तक महत्त्वपूर्ण है। कुल मिलाकर यह पुस्तक इतिहास के एक स्वर्णिम पृष्ठ को हमारे सामने प्रस्तुत करती है। 

स्वास्थ्यः जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य

 - सुदर्शन सोलंकी

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर दिखने लगा है। अतिसार, हैजा, पेचिश, तथा मियादी बुखार जैसी संक्रामक बीमारियाँ बढ़ने लगी है। तापमान में वृद्धि के कारण कई बीमारियाँ, ऐसे क्षेत्रों में फैलने लगी हैं जहाँ पहले नहीं होती थीं। जैसे डेंगू बुखार फैलाने वाले मच्छर सामान्यतः समुद्र तल से 2000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर नहीं पाए जाते थे, किंतु अब ग्लोबल वार्मिंग के कारण ये कोलंबिया में 4500 मीटर ऊंचाई तक वाले स्थानों में भी पाए जाने लगे हैं।

जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित शोध से पता चला है कि विशेष रूप से महिलाएँ और युवा बढ़ती गर्मी और उमस से कहीं अधिक प्रभावित हुए हैं। वातावरण में बढ़ती नमी उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है। वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण लू और नमी की तीव्रता में भी वृद्धि हो रही है।

ये नतीजे 1979 से 2016 तक के 60 देशों के आँकड़ों के आधार पर निकाले गए हैं। इस शोध के अनुसार 40 देशों में आत्महत्या और आर्द्रता के बीच मज़बूत सम्बंध देखा गया है। इसकी वजह से तनाव और चिंता में वृद्धि हो सकती है और आक्रामकता और हिंसा तक बढ़ सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी आँकड़ों के मुताबिक विश्व में प्रति वर्ष 7.03 लाख लोग आत्महत्या कर रहे हैं, अर्थात हर 45 सेकंड में एक आत्महत्या हो रही है। आत्महत्या का मुख्य कारण निराशा या मानसिक अशांति को माना जा सकता है जो जलवायु परिवर्तन के कारण प्रभावित हो रही है। वैसे तो मानव शरीर अपने वातावरण के अनुसार स्वयं ढाल लेता है;  किंतु इसकी भी एक सीमा है। एक सीमा के बाद वातावरण व जलवायु के परिवर्तन मानव शरीर पर प्रभाव डालने लगते हैं।

बाढ़, जंगल की आग और तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं से कुछ मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इन गंभीर आपदाओं से प्रभावित लोग चिंता, तनाव, व्यसन और अवसाद का अनुभव कर सकते हैं। चरम मौसम अनुभव करने से उपजा तनाव अनिद्रा का कारण बन सकता है।

हाल ही में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन से अगले 50 वर्षों में स्तनधारी जीवों के बीच वायरस संचरण के 15,000 से अधिक नए मामले सामने आ सकते हैं। अनुमान है कि नए वायरस के संचरण की संभावना सबसे अधिक तब होगी जब बढ़ते तापमान के कारण जीवों का प्रवास ठंडे क्षेत्रों की ओर होगा और वे स्थानीय जीवों के संपर्क में आएँगे।

बढ़ती गर्मी और उमस हमें कई तरह से प्रभावित करेगी। पहले से मानसिक परेशानी से गुज़र रहे लोगों की मानसिक परेशानी बढ़ सकती है। इसलिए अब जलवायु परिवर्तन के प्रति हमें अत्यधिक गंभीर होना होगा एवं इसके नियंत्रण के लिए सामूहिक व व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास करने होंगे। (स्रोत फीचर्स)