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May 14, 2020

तीन लघुकथाएँ

1.    इन्तज़ार
-शबनम शर्मा
   रात गहराती जा रही थी। मेरा मन बहुत घबरा रहा था। मेरी बेटी शाम 4 बजे से यह कहकर गई थी कि वो 2-2) घंटे में वापस आ जायेगी। मैंने उसे अनगिनत फोन कर डाले। फोन मिलने का नाम ही नहीं ले रहा था। ‘अनरिचेबल’ की टोन ने मुझे और भी परेशान कर दिया। आखिर माथे पर हाथ रखकर, थक हार कर, एक पिटे ज्वारी की तरह मैं अपने कमरे में बैठ गई। पर मनगडंत प्रश्नों-उत्तरों का सिलसिला मुझे बार-बार झकझोर रहा था। एक पल भी मुझे एक बरस की तरह लग रहा था। ज़माना कितना खराब है? लड़की की जात, ऊपर से सर्दियों के दिन, ये दिल्ली जैसा शहर और अकेली लड़की। बेचैनी बढ़ती जा रही थी कि दरवाजे पर घंटी बजी। मैं बिजली की तरह दरवाज़े की ओर लपकी। दरवाज़ा खोला कि सामने मेरी बेटी हाथ में फूल का गुलदस्ता व कुछ पैकेट, मुस्कान होठों पर लिये खड़ी थी। उसको मुस्कुराता देख मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। मैंने एक जोरदार थप्पड़ उसके मुंह पर मार दिया व लगी बोलने। वह अवाक सी खड़ी सुनती रही। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे, पर मैं अपनी पूरी बात कह कर ही चुप हुई। उसने फिर भी मुझे बाँहों में भरा और कहा, ‘‘माँ, तू इतनी परेशान हुई, इसके लिए मुझे माफ़ कर दे। पर सुन, आज जब मैं गई तो रास्ते में मेरा फोन किसी ने निकाल लिया और तू कल वापस जा रही है। तुझे पता है, मुझे आज पहली पगार मिली थी, मैं तेरे लिये ये तोहफा लेने गई थी, मुझे देर हो गई, तो मैंने अपनी सहेली को बुला लिया, जो अभी दरवाज़े के बाहर ही खड़ी है। माँ, चुप हो जा, शाँत हो जा और देख, खोल इस पैकेट को, कैसा लगा तुझे।’’ इतने में उसकी सहेली भी अन्दर आ गई, बोली, आँटी, ‘‘इसे कुछ पसंद ही नहीं आ रहा था, बार-बार कह रही थी, अम्मा को ऐसी चीज़ दूँगी कि वो खुश हो जायें।’’ मैंने उन दोनों को गले लगा लिया और ताकने लगी शून्य में।
2. समझौता
   अध्यापिका हूँ। हर रोज़ अलग-अलग बच्चों से वासता पड़ता है। कक्षा में जाना, पढ़ाना, बच्चों से बतियाना, उनकी नन्हीं-नन्हीं समस्याओं को सुलझाना मेरा शौक है। इस कक्षा में जाते मुझे करीब 6 माह हो गये थे। दो जुड़वाँ भाई-बहन को पढ़ाती हूँ। जहाँ बहन अति शान्त, कुशल व स्नेही वहीं भाई शरारती, बातूनी व कभी-कभी लापरवाह। उससे मेरी उम्मीदें कुछ ज्यादा ही बढ़ने लगी। हमेशा उसमें सुधार लाने की इच्छा ने मुझे उसके करीब ला दिया। परन्तु बात न मानना तो जैसे उसका संकल्प सा हो। वह अपनी मनमानी करता परन्तु पलटकर न तो कभी जवाब देता न ही सही काम करता। परीक्षा हुई। परिणाम भी मेरी आशा से कम था। उसकी कुशाग्र बुद्धि से ज़्यादा उम्मीद की जा सकती थी। मैंने उसके माता-पिता को संदेश भिजवा कर मिलने का आग्रह किया। निश्चित समय पर उसके माता-पिता अपने बच्चों के साथ मेरे पास आए। पिता ने पूछा, ‘‘मैम, आपने बुलाया था, क्या कोई समस्या है?’’ मैंने बच्चों की ओर देखा, दोनों के चेहरे पीले हो गये थे। मैंने कहा, ‘‘इन्होंने क्या कहा?’’ पलटकर पिता ने कहा, ‘‘ये क्या कहेंगे, रात को बताया कि कल रिजल्ट है और मैम ने आपको बुलाया है। मैडम मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ इससे पहले कि आपकी सुनू। मैंने 7 माह पहले शादी की है। ये बेटी मेरी पहली पत्नी की है, जो पिछले बरस गुजर गई और लड़का इनका है (अपनी पत्नि की और इशारा करते हुए) इसका पापा भी पिछले बरस गुजर गया। मेरी बहन ने यह रिश्ता सुझाया और हमने ब्याह कर लिया। जाने वाले तो चले गये, अब आगे की भी तो सोचनी है। हाँ, मैडम कहिए आप क्या बता रही थीं?’’ मैं उनकी बातें सुनकर स्तब्ध थी। मैंने दोनों बच्चों की ओर देखा जो अभी भी वैसे ही सहमे से खड़े थे। मैंने कहा, ‘‘बस यूं ही बुलाया आपको, आपके बच्चे नए हैं इस स्कूल में। पूछना था इन्हें कैसा लगा?’’ वह बोले, ‘‘ओर, शुक्रिया।’’ देख सकती थी अब मैं उन दोनों अधूरे बच्चों के मुँह पर लौटती रौनक।
3. माँ
    आदत है हर रोज़ शाम को मन्दिर जाकर कुछ समय बिताने की। दिवाली थी उस दिन। पूरा दिन काफ़ी व्यस्त रही, शाम को भी काम खत्म नहीं हो रहा था। पर मन था कि एक चक्कर मन्दिर का काट आऊँ। जैसे-तैसे काम निबटाकर मैं मन्दिर चली गई। मन्दिर का पुजारी उस अहाते में ही छोटी सी कुटिया में रहता था। मन्दिर में माथा टेक कर मैं पुजारी जी के पास कुछ देने चली गई। देखा पुजारी जी घर में पूजा कर रहे थे व उनकी आँखों से बरबस आँसू टपक रहे थे। मैं भी जूते उतार कर धीरे से वहां बैठ गई। 5-10 मिनट बाद उन्होंने आँखें खोली। मुझे देखकर बोले, ‘‘माफ़ करना बिटिया, कुछ भावुक हो गया। देखो ये मेरी माँ की तस्वीर, मैं आज के दिन इसकी पूजा करता हूँ। आपको बताऊँ, हम 9 भाई-बहन थे, मेरा बाप शराबी था, दिवाली से 4 दिन पहले ही जुआ खेलने बैठ जाता था, मेरी गरीब माँ, फटे-पुराने कपड़ों में, प्लास्टिक की चप्पल पहने, कमज़ोर सी देह में लोगों के घरों में बासन माँजती, झाडू-फटका करती। इन दिनों लोग उससे बहुत काम लेते, घर साफ़ करवाते, कपड़े धुलवाते, बासन मंजवाते, फिर कहीं मिठाई का डिब्बा और 5 रू. देते। वह सारी थकान भूल जाती व सामान लाकर हमारे सामने खोलकर रख देती। हम सब भाई-बहन बिन कुछ महसूस किये खुश हो-होकर, शोर मचाकर खाते। बस हमारी दिवाली मन जाती। आज सब कुछ है पर माँ नहीं है।’’ कहकर वे फिर से रोने लगे।
सम्पर्कः अनमोल कुंज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र. – 173021, मोब. - 09816838909, 09638569237

समाजवाद की प्रतीक्षा

 समाजवाद की प्रतीक्षा
-उर्मि कृष्ण    
        गाँववाले जानते थे कि अफसर की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी बुरी होती है, इसलिए उस दल के पहुँचने पर गाँववालों ने आपस में कुछ कानाफूसी तो की, पर उनका उद्देश्य पूछने की हिम्मत किसी की नहीं हुई।
        अगली सुबह उन्होंने स्वयं डोण्डी पिटवाकर सारे गाँव को पंचायत के मैदान में इकट्ठा होने का आदेश दिया गाँववाले आशंका से त्रस्त हो उठे।
        उन्होंने बताया, ‘‘समाजवाद आ रहा है। अब तुम लोगों के दिन पलटेंगे। हम इसीलिए आए हैं कि तुम सब समाजवाद के स्वागत के लिए तैयार हो जाओ और उसे लाने में पूरा सहयोग दो।’’
        ‘‘समाजवाद आने पर सबको भरपेट रोटी मिलेगी।… कई भूखी आवाजें विस्मय से चिल्लाई।
        ‘‘हाँ’-हाँ भरपेट, और सूखी रोटी नहीं, चुपड़ी हुई। यानी डालडा भी मिलेगा।’’ लोग खुशी से झूमने लगे।
        तभी उन्होंने घुड़ककर कहा, ‘‘अच्छा, हमारे डेरे पर रसद पहुँचाओ।’’
        लोग सहमकर आँखों -आँखों में एक-दूसरे की ओर देखने लगे। एक बूढ़े ने साहस बटोरकर कहा, ‘‘पर हमारे पास फालतू रसद बिलकुल नहीं है।’’
        ‘‘तुम कंजूस, नीच और निकम्मे हो। समाजवाद को लाने में हाथ नहीं बँटाना चाहते।’’ अफसर गुर्राया, ‘‘मूर्खों, कल चुपड़ी और दो-दो मिलें, इसके लिए आज एक रोटी का बलिदान आवश्यक है।’’
        हर घर से उन्हें रसद पहुँचा दी गई और गाँववाले उस रात खाली पेट सो गए। अफसरों के डेरे में जश्न रहा।
        सब तन-मन से समाजवाद की अगवानी में जुट गए। ग्रामीणों को हाँक-हाँककर गाँव में आनेवाली सड़क की सफाई कराई गई। उस पर चूना-सुर्खी बिछा दी गई। रंग-बिरंगी झण्डियाँ और द्वार बनाए गए। सब गाँववाले समाजवाद की प्रतीक्षा में सड़क के किनारे आँखें बिछाए खड़े रहते। अपनी आधी रसद अफसरों को पहुँचाने से वे तेजी से दुबले होते जा रहे थे। तिस पर दिनभर धूप, हवा, बारिश में खड़े रहना। उनकी ठठरियाँ निकल आई थीं और आँखें धँस गई थीं।
कभी-कभी कोई अफसर कुछ कागजों का पुलिन्दा लाने या ले जाने के लिए शहर जाता। एक बार सफेद खादी पहने कुछ और भी चिकने-चुपड़े व्यक्ति आए। उनके आने पर अफसर लोग दबे-दबे स्वरों में या सिर्फ इशारों में बातें करने लगे, पर उस दिन गाँववालों को और भी ज्यादा रसद देनी पड़ी, और जश्न और भी जोरदार रहा। अफसरों ने उन्हें एक ओर बुलाकर समझाया,‘‘अब समाजवाद आया ही समझो। यह समाजवाद का हरावल दस्ता है।’’
फिर वे बोले, ‘‘रसद तो ठीक पहुँच रही है,पर हमारे डेरे कमजोर हैं और घिस गए हैं। इनमें हवा,धूप बारिश घुसती है। तुम सब अपने धोती-गमछे हमें दो ताकि डेरों की मरम्मत की जा सके। समाजवाद लाने के लिए अभी हमे यहाँ रहना है। हरावल दस्ते का तो खास खयाल रखना है। ’’
वे फिर सहमकर आँखों-आँखों में एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
अफसर ने घुड़ककर कहा, ‘‘तुम नीच ओर जाहिल हो। अपने मैले-फटे चीथड़े भी नही छोड़ सकते जबकि कल कपड़ों के थान मिलनेवाले है।’’
उन्होंने एक-दूसरे से नजरें बचाते हुए अपने-अपने कपड़े उतारकर उन्हें थमा दिए, जिन्हें लेकर वे चलते बने।
तब से ग्रामीण समाजवाद की प्रतीक्षा में सड़क के किनारे ही खड़े हैं।
अपनी शर्म ढकने के कारण वे हाथ ऊपर नहीं उठा पाते। उनकी आँखें पथरा गई हैं और गर्दनें अकड़ गई हैं।

Apr 21, 2020

उदंती.com, अप्रैल 2020

उदंती.com, अप्रैल 2020
वर्ष-12, अंक-9९


खुद के लिये जीने वाले की ओर कोई ध्यान नहीं देता पर जब आप दूसरों के लिये जीना सीख लेते हैं तो वे आपके लिये जीते हैं।     
                           - परमहंस योगानंद



कोरोना विशेष


कोरोना .... देखना हम जीतेंगे

 कोरोना .... देखना हम जीतेंगे

 –डॉ. रत्ना वर्मा
पिछले कुछ दशकों से हम सब सुनते आ रहे हैं  कि महाप्रलय आने वाला है और एक दिन पूरी दुनिया खत्म हो जाएगी। पिछले वर्षों में एक के बाद एक बहुत सारी प्रकृतिक आपदाएँ दुनिया भर में आती रहीं- चाहे वह सुनामी हो , भूकंप हो,  बाढ़ हो, गर्मी हो या सूखा। ये आपदाएँ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आती रही हैं और दुनिया के अलग अलग हिस्से में आपदा रूपी प्रलय से नुकसान होता रहा है। इस बार कोरोना वायरस नामक इस आपदा ने पूरी दुनिया में तबाही मचा दी है।
बाकी सभी आपदाओं में तो तबाही के बाद बचे हुए लोगों को सहायता पहुँचाने का इंतजाम पूरी दुनिया के लोग कर लेते हैं और तबाही वाला इलाका फिर से साँसें लेने लगता है,  लेकिन कोरोना जैसी महामारी में कोई किसी को सहायता नहीं पहुँचा पा रहा है। यह एक ऐसा प्रलय है,  जिसमें इंसान को खुद ही अपनी सहायता करनी होगी। इस आपदा से बचने का एकमात्र उपाय मानव से मानव की दूरी ही है। संक्रमित व्यक्ति की पहचान के बाद उसे बाकी लोगों से अलग कर देना ही इस बीमारी से बचने का अभी तक का अकेला तरीका है।
आज जब कोरोना का कहर प्रलय बनकर मानव जीवन को खत्म करने पर उतारू है और बचने का कोई और उपाय दिखाई नहीं दे रहा है, तब सबको घर में कैद रहना ही इस वायरस के संक्रमण से  बचने का सबसे बड़ा उपाया नज़र आता है। यही वजह है कि सब घरों में कैद हैं कोरोना से अपने को दूर रखने का प्रयास कर रहे हैं।
आज हम सब जिस मानसिकता में जी रहे हैं, उससे  हम सबको अपने और अपनों के  जीवन का मोल समझ में आ रहा है। यह बात अलग है कि इन सबके बाद भी कुछ लोग जीवन का मतलब समझना नहीं चाहते और अपने साथ- साथ दूसरों को भी मुसीबत में डाल रहे हैं। यदि  जमात और तबलीग के मामले नहीं होते, तो आज भारत अधिक सुरक्षित होता। भारत में इतने लम्बे समय तक लॉकडाउन की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। तब हमें बस इतना करना होता कि बाहरी देशों के यात्रियों को भारत आने से रोक दिया जाता। इतनी-सी सावधानी हम भारतवासियों को  कोरोना से मुक्त रख सकती थी; पर अफसोस ऐसा न हो सका।
इसके बाद भी  भारत ने जो उपाय  करोना से बचने के लिए अपनाए हैं, उसकी सराहना पूरी दुनिया कर रही है। ऐसी विकट घड़ी में भारतवासियों ने जिस धैर्य और शांति के साथ इस आपदा का सामना किया है और  वे शासन द्वारा जारी गाइडलाइन का पालन  कर रहे हैं,वह सराहनीय है। चूँकि इस वायरस से बचाव के लिए कोई दवाई नहीं है; अतः सामाजिक दूरी इससे बचाव का एकमात्र उपाय है। इस विषम संकट की घड़ी में, जब तक लाकडाउन  है, जब तक हम घरों में हैं, तब तक इस वायरस से बचे रहेंगे। लेकिन प्रश्न फिर भी उठता है कि कब तक?  क्या कुछ समय में इस वायरस से बचाव की दवाई खोज ली जाएगी? क्या यह वायरस कुछ समय बाद खत्म हो जाएगा? चीन में  जहाँ इस वायरस के खत्म होने का दावा किया जा रहा था, वहाँ फिर इस बेमुराद ने  पाँव पसार लिये हैं। 
दूसरी तरफ हम सब देख ही रहे हैं कि विश्व के सबसे विकसित देशों में कोरोना से लगातार बढ़ते मौत के आँकड़ें इस बात की ओर इशारा करते हैं कि आर्थिक प्रगति के मायने सुरक्षित जीवन नहीं होता। एक दूसरे से होड़ लगाते हुए आगे बढ़ते जाना, उन्नति का प्रतीक नहीं है। ऐसी उन्नति, ऐसी प्रगति किस काम की,  जिससे जीवन ही खतरे में पड़ जाए। लोग बस धन कमाने में लगे रहते हैं बगैर यह सोचे समझे कि इस धन को जोड़ते हुए, वे कौन-सा  बहुमूल्य धन खो रहे हैं!
कोरोना ने आज सबको जीवन का एक बहुत बड़ा सबक दिया है कि जितनी आवश्यकता हो, उतना अर्जन करते हुए, प्रकृति के अनुकूल जीवन जीना ही असली जीवन है। कोरोना के चलते जीवन कितना सहज हो चला है, सब अनुभव कर रहे हैं। वाहनों का चलना बंद हैं , ट्रेन बंद हैं, हवाई जहाज बंद हैं और पर्यावरण के लिए सबसे नुकसानदेह कल-कारखाने बंद हैं, तो जाहिर है कि जानलेवा प्रदूषण भी बंद है। लोगों ने अपनी आवश्यकताएँ कम कर ली हैं। घर के सारे काम सब मिलकर खुद कर रहे हैं। बाहर के जंक फूड बंद हैं, तो लोगों की सेहत अच्छी हो गई है। डाक्टर, नर्स, पुलिस , प्रशासन सब कोरोना से लड़ाई लड़ रहे हैं । खबरों की ओर नज़र दौड़ाओ तो लूट -खसोट, मार -काट, चोरी डकैती सब जैसे अपराध कम हो गए हैं। है न अच्छी बात! जब हम अपने देश के लिए लड़ते हैं, तो सिर्फ देश नजर आता है, ऐसे ही हालात अभी भी हैं, हम इस समय भी देश के लिए लड़ रहे हैं। मन्दिर, गुरुद्वारे , धार्मिक संस्थान, स्वयंसेवी संस्थाएँ  हज़ारों लोगों को भोजन करा रहे हैं या राशन भिजवा रहे हैं। प्रशासन अपने स्तर से जनसेवा के लिए जुटा है। डॉकटर, पुलिस , सफ़ाई कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों की सहायता कर रहे हैं। पुलिस का आज जैसा समर्पण कभी देखने में  नहीं आया। बस दु:ख  है तो इस बात का कि जब आशाराम, राम रहीम से लेकर  रामपाल तक तथाकथित धर्मगुरु सलाखों के पीछे  पहुँचा दिये, तो राष्ट्र्द्रोही गतिविधियों में लिप्त लोग लुकाछिपी  का खेल क्यों खेल रहे हैं! कोरोना योद्धा पत्थर खा रहे हैं, मानवता के तथाकथित छद्म बुद्धिजीवियों की बोलती बन्द है। इसके विरोध में अब कोई पुरस्कार  नहीं लौटा रहा। धनराशि को लौटाने की हिम्मत इन लोगों ने कभी नहीं दिखाई। अब यह संकट एक सकारात्मक सोच भी लेकर आया है, वह है एकजुटता। हमारा दृढ़  विश्वास है कि भारत कोरोना को पछाड़ने में ज़रूर सफल होगा।

भारत सबसे बेहतर

भारत सबसे बेहतर 

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कोरोना से पीड़ित सारे देशों के आँकड़ें देखें तो भारत शायद सबसे कम पीड़ित देशों की श्रेणी में आएगा। दुनिया के पहले दस देशों में अमेरिका से लेकर बेल्जियम तक के नाम हैं लेकिन भारत का कहीं भी जिक्र तक नहीं है। यदि भारत की जनसंख्या के हिसाब से देखा जाए तो माना जाएगा कि कोरोना भारत में अभी तक घुस नहीं पाया है, उसने बस भारत को छुआ भर है, जैसे उड़ती हुई चील किसी पर झपट्टा मार देती है। भारत की आबादी अमेरिका से लगभग पाँच गुना ज्यादा है। वहां 16000 से ज्यादा लोग मर गए लेकिन भारत में यह आँकड़ा दो-ढाई सौ तक ही पहुँचा है, वह भी सरकारी ढील और जमातियों की मूर्खता के कारण। अमेरिकी गणित यदि भारत पर लागू करें तो यह आंकड़ा 80 हजार तक पहुँच सकता था लेकिन भारत ने कोरोना के सांड के सींग जमकर पकड़ रखे हैं। वह उसे इधर-उधर भागने नहीं दे रहा है। इसके लिए भारत की अनुशासित और धैर्यवान जनता तो श्रेय की पात्र है ही, हमारी केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारें भी अपूर्व सतर्कता का परिचय दे रही हैं। हमारे देश के दानदाताओं ने अपनी तिजोरियों के मुँह खोल दिए हैं। किसी के भी भूखे मरने की खबर नहीं है। सबका इलाज हो रहा है। हमारे डॉक्टर और नर्स अपनी जान खतरे में डालकर मरीजों की सेवा कर रहे हैं। हरियाणा सरकार ने उनके वेतन और दुगुने करके एक मिसाल पेश की है। सभी सरकारों को हरियाणा का अनुकरण करना चाहिए। यही सुविधा सरकारी कर्मचारियों और पुलिसकर्मियों को भी दी जानी चाहिए। ठीक हुए मरीजों के ‘प्लाज्मा’ से यदि केरल में सफलता मिलती है तो देश के सारे कोरोना-मरीजों को यह तुरंत उपलब्ध करवाया जाए। पिछले हफ्ते कई मुख्यमंत्रियों से इस बारे में मेरी बात हुई थी। जिन जिलों में कोरोना नहीं पहुँचा है, उनमें किसानों को अपनी फसलें कटवाने और उन्हें बाजारों तक पहुँचवाने के बारे में सरकारें कुछ ठोस कदम उठा सकती हैं। कोरोना की जाँच के लिए हमारे वैज्ञानिक डॉक्टरों ने कई सस्ते और प्रामाणिक उपकरण ढूँढ निकाले हैं। सरकार भीलवाड़ा पद्धति पर लाखों लोगों की जाँच प्रतिदिन क्यों नहीं करवा सकती है ? शहरों में अटके हुए मजदूरों को अगर यात्रा करना है तो पहले उनकी जाँच का इंतजाम भी जरुरी है। मुझे आश्चर्य है कि हिन्दी के कुछ बड़े अखबारों के सिवाय कोई भी सरकारी और गैर-सरकारी टीवी और रेडियो चैनल हमारे घरेलू नुस्खों पर जोर नहीं दे रहा है। इसी तरह भारत में एक-दूसरे से दूरी बनाए रखने, ताज़ा खाना खाने, नमस्ते या सलाम करने की परंपरा का भी प्रचार ठीक से नहीं हो रहा हे। भारतीय संस्कृति के इन सहज उपायों का लाभ सारे संसार को मिले, ऐसी हमारी कोशिश क्यों नहीं है ? 
भारत का विश्व रुप
कोरोना कमोबेश दुनिया के सभी देशों में फैल गया है। चीन और भारत दुनिया के सबसे बड़े देश हैं लेकिन जब हम सारी दुनिया के आँकड़ें देखते हैं तो हमें लगता है कि इस कोरोना के राक्षस से लड़ने में भारत सारी दुनिया में सबसे आगे है। इस कोरोना-विरोधी युद्ध का आरंभ यदि फरवरी या मार्च के पहले सप्ताह में ही हो जाता तो भारत की स्वस्थता पर सारी दुनिया दाँतों तले अपनी उँगली दबा लेती। अब भी भारत के करोड़ों लोग जिस धैर्य और संयम का परिचय दे रहे हैं, वह विलक्षण हैं। लाखों प्रवासी मजदूर अपने गाँवों की तरफ लौटते-लौटते रास्ते में ही अटक गए। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के आदेश का पालन किया और पिछले दो हफ्तों से वे तंबुओं और शिविरों में अपना वक्त गुजार रहे हैं। सारी सरकारें और स्वयंसेवी संगठन दिन-रात उनकी मदद में लगे हुए हैं। हमारे नेता लोग काफी दब्बू और घर-घुस्सू सिद्ध हो रहे हैं लेकिन उनकी तारीफ करनी पड़ेगी कि इस संकट के समय में वे घटिया राजनीति नहीं कर रहे हैं। क्या यह कम महत्त्वपूर्ण खबर है कि लगभग सारे गैर-भाजपाई मुख्यमंत्रियों ने तालाबंदी बढ़ाने की बात आगे होकर कही है ? देश में जहाँ-जहाँ कर्फ्यू लगा हुआ है, वहाँ-वहाँ सरकारी कर्मचारी और स्वयंसेवक लोग घरों में जाकर मुफ्त सामान बाँट रहे हैं। लाखों लोगों को रेसाई की गैस-टंकी और खाद्य-सामग्री घर-बैठे मिल रही है। कोरोना-मरीजों की एकांत चिकित्सा के लिए दर्जनों शहरों और रेल के डिब्बों में हजारों जगह बना ली गई हैं। कोरोना के सस्ते जाँच-यंत्र, सांस-यंत्र, सस्ती मुखपट्टियाँ, घरेलू नुस्खे और दवाइयाँ भी लोगों को मिलने लगी हैं। दुनिया के कई देश अब भारत से दवाइयाँ मँगा रहे हैं। भारत इन सब कोरोनाग्रस्त देशों का त्राता-सा बन गया है। दूसरी तालाबंदी के दौरान भारत जो ढील देगा और सख्तियाँ करेगा, दुनिया के दूसरे देश उससे प्रेरणा लेंगे। यह कोरोना-संकट तीसरे विश्व-युद्ध की तरह पृथ्वी पर अवतरित हुआ है। दुनिया की महाशक्तियों का इसने दम फुला दिया है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रुस और चीन जैसी महाशक्तियाँ आज त्राहि-माम, त्राहि-माम कर रही हैं। ऐसे विकट समय में भारत विश्व की आशा बनकर उभर रहा है। इस मौके पर भारत की सांस्कृतिक परंपराओं, (नमस्ते और स्पर्श-भेद), ताजा और शाकाहारी भोजन-पद्धति तथा घरेलू नुस्खों का अनुशीलन सारा संसार करना चाहेगा। 
कोरोना को भारत मात देकर रहेगा
सरकार ने घोषणा की है कि आवश्यक माल ढोनेवाले ट्रकों पर कोई पाबंदी नहीं होगी। उनके ड्राइवरों को तंग नहीं किया जाएगा। मालगाड़ियाँ चल ही रही हैं। राज्य सरकारें अपने-अपने किसानों को फसल काटने और बेचने की सुविधा देने पर विचार कर रही हैं। यदि शहरों के कारखाने भी कुछ हद तक चालू कर दिए जाएँ तो प्रवासी मजदूरों की समस्या भी सुलझेगी। जो अपने गाँवों में लौटना चाहते हैं, उनका इंतजाम भी किया जाए। करोड़ों गरीबी रेखावाले लोगों को राशन और नकद रुपए सरकार ने पहुँचा दिए हैं। समाजसेवी संस्थाओं ने भी अपने खजाने खोल दिए हैं। दो लाख से ज्यादा लोगों की जाँच हो चुकी है। सैकड़ों कोरोना मरीज स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं। करोड़ों मुखौटे बंट रहे हैं। लोग शारीरिक दूरी बनाकर रखने में पूरी सावधानी बरत रहे हैं। कुछ प्रतिबंधों के साथ रेलें और जहाज भी चलाए जा सकते हैं। अगले दो हफ्तों में भारत कोरोना को मात देकर ही रहेगा।  
कोरोनाः हार की शुरुआत
कोरोना पर भारत ने जैसी लगाम लगाई है, वह सारी दुनिया के लिए आश्चर्य और ईर्ष्या का विषय हो सकता है। सारी दुनिया में इस महामारी से लगभग डेढ़ लाख लोग मर चुके हैं और 22 लाख से ज्यादा संक्रमित हो चुके हैं। जिन देशों में हताहतों की संख्या भारत से कई गुना ज्यादा है, उनकी जनसंख्या भारत के मुकाबले बहुत कम है। यदि वे देश भारत के बराबर बड़े होते तो हताहतों की यह संख्या उन देशों में भारत से कई सौ गुना ज्यादा हो जाती। आज तक भारत में मृतकों की संख्या लगभग 450 है और संक्रमितों की संख्या 15 हजार से भी कम है। 80 प्रतिशत से अधिक लोग ठीक हो चुके हैं। यदि जमाते-तबलीग की मूर्खता नहीं होती तो अभी तक तो तालाबंदी कभी की उठ गई होती। अब भी पता नहीं क्यों, हमारे कुछ मुसलमान भाई अफवाहों और गलतफहमियों के शिकार हो रहे हैं। कोरोना तो उनको मार ही रहा है, वे भी खुद को मौत के कुंए में ढकेल रहे हैं। हमारे नेता लोग उनसे सीधा संवाद क्यों नहीं करते ?
लगभग साढ़े तीन सौ जिलों में तो एक भी संक्रमित रोगी नहीं मिला है। कुछ दर्जन जिले जिनमें मुंबई, दिल्ली, इंदौर जैसे जिले शामिल हैं, उनमें ठीक समय पर कार्रवाई हो जाती तो भारत सारी दुनिया के लिए आदर्श राष्ट्र बन जाता। यह तब होता जबकि भारत संपन्न राष्ट्र नहीं है। उसकी स्वास्थ्य सेवाएं इटली, फ्रांस और अमेरिका के मुकाबले बहुत कमजोर हैं। उसमें साफ-सफाई की भी कमी है। इसके बावजूद भारत में यह कोरोना वायरस क्यों मात खा रहा है ? इसका मूल श्रेय भारत की जनता और हमारी सरकारों को है। केंद्र और राज्यों की सरकारों ने जो तालाबंदी घोषित की है, उसका लोग जी-जान से पालन कर रहे हैं। कुछ जमातियों द्वारा फैलाई जा रही अफवाहों को छोड़ दें तो सभी मज़हबों, सभी जातियों, सभी वर्गों, सभी प्रांतों और सभी दलों के लोग एकजुट होकर कोरोना का मुकाबला कर रहे हैं।
अब कोरोना के जांच यंत्र लाखों की संख्या में भारत में आ चुके हैं। हमारे डाक्टर और नर्सें जिस वीरता और त्याग का परिचय दे रहे हैं, वह सारी दुनिया के लिए आदर्श है। किस देश में मरीज उन पर हमला कर रहे हैं ? भारत की कुनैन की दवाई अब दुनिया के 55 देशों में पहुँच गई है। अब शीघ्र ही भारत सरकार किसानों, मजदूरों और व्यापारियों के लिए समुचित सुविधाएं मुहय्या करनेवाली है। रिजर्व बैंक ने देश के काम-धँधों में जान फूंकने के लिए 50 हजार करोड़ रु. की राशि की घोषणा की है। जाहिर है कि कोरोना की हार की शुरुआत हो चुकी है।