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Feb 11, 2020

लघुकथा

भाई-भाई 
- ख़लील जिब्रान , अनुवाद - सुकेश साहनी

ऊँचे पर्वत पर चकवा और गरुड़ की भेंट हुई। चकवा बोला, ‘‘शुभ प्रभात, श्रीमान्!’’
गरुड़ ने उसकी ओर देखा और रुखाई से कहा, ‘‘ठीक है-ठीक है।’’ चकवे ने फिर बात शुरू की, ‘‘आशा है, आप सानन्द हैं। ’’
गरुड़ ने कहा, ‘‘हाँ, हम मजे में हैं पर तुम्हें मालूम होना चाहिए कि तुम पक्षियों के राजा से बात कर रहे हो। जब तक हम बात शुरू न करें, तुम्हें हमसे बात शुरू करने की गुस्ताखी नहीं करनी चाहिए।’’
चकवे ने कहा, ‘‘मेरे ख्याल से हम दोनों एक ही परिवार से हैं।’’  
गरुड़ ने आँखें निकालकर घृणा से उसकी ओर देखा, ‘‘किस बेवकूफ़ ने कह दिया कि हम एक ही परिवार से हैं?’’
तब चकवे ने कहा, ‘‘मैं आपको याद दिला दूँ कि मैं आपके समान ऊँचा उड़ सकता हूँ। इसके अलावा मैं अपने सुमधुर गीतों से दूसरों का मनोरंजन भी कर सकता हूँ। आप किसी को भी सुख और खुशी नहीं दे सकते।’’
इस पर गरुड़ ने  क्रोधित होते हुए कहा, ‘‘सुख और खुशी! अबे ढीठ, मैं अपनी चोंच की एक चोट से तेरा काम तमाम कर सकता हूँ। तू तो मेरे पैर जितना भी नहीं है।’’
चकवा उड़कर गरुड़ की पीठ पर जा बैठा और उसके पंख नोचने लगा। गरुड़ भी गुस्से में था, उससे पिण्ड छुड़ाने के लिए वह तेजी से काफी ऊँचाई तक उड़ता चला गया। लेकिन उसका बस नहीं चला। हारकर वह फिर उसी चट्टान पर आ गया। चकवा अब भी उसकी पीठ पर सवार था। गरुड़ उस घड़ी को कोस रहा था, जब वह उस तुच्छ पक्षी से उलझ पड़ा था।
तभी एक कछुआ वहाँ  आ निकला। गरुड़ और चकवे की हालत देखकर उसे हँसी आ गई। वह हँसते-हँसते लोट-पोट हो गया।
गरुड़ ने कछुए की ओर देखकर कहा, ‘‘पृथ्वी पर रेंगने वाले कीड़े, हँसता क्यों है?’’
कछुए ने कहा, ‘‘क्या यह हँसने की बात नहीं है कि आपको घोड़ा बनाकर एक छोटा-सा पक्षी आपकी पीठ पर सवारी कर रहा है।’’
गरुड़ ने कहा, ‘‘अबे जा, अपना काम कर। यह तो मेरे भाई चकवे का और मेरा घरेलू मामला है।’’

जीव जगत

बया का खूबसूरत घोंसला
बया पक्षी बुनकर पक्षी समुदाय का सदस्य है इसका वैज्ञानिक नाम Ploceus philippinus  है  यह पूरे भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया में पाया जाता है। यह खासकर जंगलो और खेतों में निवास करता है। इसकी प्रजातियों का रंग अलग अलग होता है। नर पक्षी पीले और काले रंग के होते है। मादा बया का रंग भूरा होता है। कुछ ऑरेंज रंग के भी होते है। इनका आकार 5 से 10 इंच के बीच में होता है। वैसे बया पक्षी गोरैया के आकार की होती है और कुछ कुछ दिखाई भी गौरैया की तरह ही देते हैं। इनकी चोंच गौरेया से मोटी होती है।

बया एक ऐसा पक्षी है जो पेड़ की शाखाओं पर नहीं बल्कि उस की डाल पर लटकते हुए खूबसूरत घोंसले बनाता है। ये घोंसले आकार में लौकी की तरह लगते हैं। बया का घोंसला एक बेहतरीन कारीगरी होता है। घोंसला नर पक्षी बनाता है और वह मादा को इससे रिझाता है। कभी कभी मादा पक्षी नर के बनाये घोसले का निरक्षण भी करती है। मादा बया घोसले को देखकर ही नर के पास आती है।  बया के घोसले की बनावट जटिल होती है। सभी पक्षियों के घोंसले में बया पक्षी का घोसला सबसे अनोखा होता है, इसे बुनकर पक्षी भी कहा जाता है।
बया का घोंसला पत्तियों, छोटी टहनियों, घास से मिलकर बना होता है। बया अपने इस घोसले में रोशनी की व्यवस्था भी करती है। बया हर बार एक नया घोंसला बुनती है। लेकिन यह एक ही पेड़ पर बार बार घोसला बना लेती है। नर बया घोंसला बनाने के लिए करीब 500 बार उड़कर लंबी घास और पत्तियाँ लाता है, इसके बाद यह अपनी चोंच से तिनकों और लम्बी घास को आपस में बुन देता है। ये ऊपर की तरफ से पतले और बीच मे मोटे गोल होते है। इसके घोसले का निकासी भाग सकरा टयूब की तरह होता है। घोंसला पूरी तरह बनने में 28 दिन का समय लगता है।  बया अक्सर अपना घोंसला पेड़ के पूर्वी दिशा में बनाना पसंद करता है। घोंसला बनाने के बाद ही नर पक्षी मादाओं को आकर्षित करने के लिए पंखों को हिला कर मधुर आवाज़ निकालता है, नर और मादा बया पक्षी घोंसला बनने के बाद मिट्टी के गिले टुकड़े लाकर इस घोसले को और मजबूत बनाते हैं।
एक ही पेड़ पर अधिक संख्या में घोसले होने के कारण, यह पेड़ बया की कॉलोनी की तरह दिखता है। बाया एक सामाजिक पक्षी है इसलिए एक पेड़ पर 60 पक्षियों के घोंसले तक देखने को मिल जाते हैं,  बया पक्षी की एक कॉलोनी में 200 से अधिक घोसले पाए जाते हैं।
बया पक्षी-समूह में रहना पसंद करती है और काफी शोरगुल करती है। यह अपने घोसले पानी के निकट बनाती है या फिर उन टहनियों में बनाती है, जो पानी के ऊपर हों। अमूमन काँटेदार या ताड़ के वृक्षों में यह अपना घोसला बनाना पसन्द करती है; क्योंकि इसकी वजह से इसके बच्चों को परभक्षियों से सुरक्षा प्रदान होती है।
बारिश का मौसम आने से पहले यह पक्षी घोंसला बनाता है। बया को बारिश का सटीक पूर्वानुमान होता है। ये ज़्यादातार खेतों के आसपास रहते है; क्योंकि खेतों में इन्हें अनाज आसानी से मिल जाता है। ये खेतो के आसपास के पेड़ों की डालियों पर घोंसला बनाते हैं। इनके घोसले उन डालियों पर भी होते है ,जो नदियों या तालाबों के ऊपर से गुजरती हैं।  जिन पेड़ों पर यह पक्षी घोसला बनाता है, वे ज्यादातर काँटेदार होते हैं, जिससे शिकारी जानवरों से इनके बच्चों का बचाव होता है। अक्सर इस पक्षी को बबूल के पेड़ पर घोंसला बनाते देखा गया है। बया पक्षी के घोसले इतने मजबूत होते हैं कि तेज़  आँधी में भी ये डाली से नीचे नहीं गिरते है। ये घोसले अपनी पकड़ डाली से बनाए रहते है।
मादा बया दो से चार सफेद अंडे देती है, इन अंडों को 14 से 17 दिनों तक सेया जाता है, नर और मादा दोनों बया पक्षी बच्चों को खाना खिलाते हैं। केवल 17 दिन के बाद ही बच्चे घोसला छोड़ देते हैं।
बया का मुख्य भोजन अनाज होता है। बया को किसान का दुश्मन भी कहते है ; क्योंकि यह खेतों की फसलों से बीज खाती है। इससे पकी-पकाई फसल खराब हो जाती है। यह कीड़े-मकौड़े भी खाते हैं। कई प्रकार के बीज भी खाते है। बया पक्षी की आवाज चीं- चीं की होती है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई होने से इन पक्षियों का आशियाना खत्म हो रहा है और बया पक्षी विलुप्ति के कगार पर है। (उदंती फीचर्स)

चित्र

चित्र  
-शंकर पुणतांबेकर
वह चित्र बना रहा था। सामने स्‍टैंड पर फलक, हाथ में कूँची, नीचे रंग फैले हुए।
वह चित्र बना तो रहा था, पर क्‍या चित्र बना रहा था उसे नहीं मालूम! आँखों के सामने धुँधलका। धुँधलके में से वह चित्र खोजने की कोशिश करता।
दरवाजे पर दस्‍तक। वह उठकर दरवाजा खोलता है।
दरवाजा खोलने पर सामने क्‍या देखता है कि रूस के अध्‍यक्ष मिखाइल गोर्बाचेव खड़े हुए हैं।
‘आइए, आइए!’ वह उनका स्‍वागत करता है और उन्‍हें अंदर लाता है।
फलक के पास एक कुर्सी थी, उसी में वह गोर्बाचेव को बैठाता है।
‘माफ़ करना, मैंने तुम्‍हें डिस्‍टर्ब किया। तुम काम में हो।’ गोर्बाचेव बोले।
‘नहीं, नहीं, आपने डिस्‍टर्ब नहीं किया।’ वह बोला, ‘मैं काम में जरूर था। मेरे हाथ में कूँची तो थी लेकिन आँखों में दृष्टि नहीं थी। पता नहीं कूँची से क्‍या उतरता।’
‘मेरा एक काम करोगे? मुझे एक चित्र बना दो। कबूतर का चित्र।’
‘कबूतर का चित्र।’ वह बोला।
‘हाँ,’ गोर्बाचेव ने कहा। ‘अब तक हमने बड़े गलत चित्र बनाए कबूतर के। हमने से मतलब क्‍या रूस ने क्‍या अमेरिका ने। चित्र तो हम लोगों ने कबूतर का बनाया लेकिन उसके अंदर रखे शस्‍त्र… अणुशस्‍त्र। ऊपर से कबूतर अंदर से गिद्ध। ऐसा चित्र क्‍यों बनाया? इसलिए कि हम स्‍वयं ऊपर से कबूतर और अंदर से गिद्ध थे।’
‘आप क्‍या लेंगे? चाय या कॉफी? बोदका तो मेरे यहाँ है नहीं।’
गोर्बाचेव हँसे। बोले, ‘जो भी तुम पिलाओ। सही कबूतर के चित्र के साथ तो जहर भी पिलाओगे तो मैं पी लूँगा।’
उसने गोर्बाचेव के लिए कबूतर का चित्र बना दिया।
गोर्बाचेव बड़ी खुशी-खुशी उसके यहाँ से विदा हुए।
वह चित्र बना रहा था।
वह चित्र बना तो रहा था, पर क्‍या चित्र बना रहा था उसे नहीं मालूम। आँखों के सामने धुँधलका। धुँधलके में से वह चित्र खोजने की कोशिश करता।
दरवाजे पर दस्‍तक।
दरवाजा खोलने पर सामने देखता है तो धर्म की मूर्ति शंकराचार्य।
वह स्‍वागत कर उन्‍हें अंदर लाता है और फलक के पास की कुर्सी में बैठाता है।
‘क्षमा करना, मैं तुम्‍हारे पास एक काम से आया था। मुझे एक चित्र बना दो। हंस का चित्र।’
‘हंस का चित्र।’ वह बोला।
‘हाँ,’ शंकराचार्य ने कहा, ‘शुभ्र वर्ण का हंस, रक्‍त वर्ण का नहीं। मोती चुगनेवाला… राजनीति, अर्थनीति, धर्मनीति में से केवल नीति चुगनेवाला हंस। पानी-का-पानी और दूध-का-दूध कर देनेवाला हंस।’
‘लेकिन आप स्‍वयं ऐसा हंस प्रस्‍तुत करते रहे हैं। कबीर ने प्रस्‍तुत किया, नानक ने प्रस्‍तुत किया, स्‍वामी विवेकानंद ने प्रस्‍तुत किया।’
‘हाँ, किया। लेकिन लोकतंत्र में इसे अब लोक के हाथों ही प्रस्‍तुत होने दो। लोगों को हमारी कूँचियों में सांप्रदायिकता के रंग नजर आते हैं, हमारे हंसों में कौआ नजर आता है।’
‘आप क्‍या लेंगे चाय या कॉफी? दूध तो मेरे यहाँ है नहीं।’ वह बोला।
‘मैं जानता हूँ, नहीं होगा। दूध शुभ्र होता है और विडंबना यह कि शुभ्र ही इससे वंचित रह जाता है। तुम मुझे सिर्फ पानी दो।’
‘लेकिन मेरा वर्ण तो…’
‘कला का, श्रम का, चरित्र का, न्‍याय का कोई वर्ण नहीं होता। बल्कि इनका उच्‍च वर्ण होता है। हमें जो उच्‍च वर्ण अभिप्रेत है वह इन्‍हीं का वर्ण है। इन्‍हीं से विहीन शूद्र वर्ण है।’
उसने शंकराचार्य के लिए हंस का चित्र बना दिया।
शंकराचार्य बड़ी खुशी-खुशी उसके यहाँ से विदा हुए।
वह चित्र बना रहा था।
वह चित्र बना तो रहा था, पर क्‍या चित्र बना रहा था उसे नहीं मालूम। आँखों के सामने धुँधलका। धुँधलके में से वह चित्र खोजने की कोशिश करता।
दरवाजे पर दस्‍तक।
उसने उठकर दरवाजा खोला तो देखा अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस के नेता नेल्‍सन मंडेला खड़े हैं।
स्‍वागत कर वह उन्‍हें अंदर लाया और फलक के पास की कुर्सी में बैठाया।
‘मैं जरा जल्‍दी में हूँ भाई! तुम तो जानते हो मैं इसी माह (11 फरवरी, 1990) वर्षों बाद जेल से छूटा हूँ। बहुत काम पड़े हैं। मैं चाहता हूँ तुम मेरे लिए एक चित्र बना दो। एक कोकिल का चित्र।’ मंडेला बोले।
‘कोकिल का चित्र!’ उसके मुँह से निकला।
‘हाँ,’ मंडेला ने कहा, ‘कोकिल का चित्र… काली कोकिल का चित्र, जिसको अब तक सफेद चमड़ी के हंस नामी बगुलों ने कौआ समझ रखा था।’
‘हे कलाकार, तुम तो जानते हो राजनीति में केवल दो ही वर्ण होते हैं - एक सफेद, एक काला। सफेद अपने काले पर पोतने के लिए और काला औरों के सफेद पर पोतने के लिए। कलानीति में ऐसा नहीं होता। वहाँ तो वर्ण नहीं रंग होते हैं - विविध रंग। कलानीति में तो काला भी उतना ही सुंदर है जितना कोई और रंग। काला राजनीति में कौआ है तो कलानीति में कोकिल।’
‘आप महान हैं मंडेला साहब, आप महान हैं। राजनीति में रहते भी आपको कला की परख है।’
‘मेरे कलाकार, अब क्‍या बताऊँ मैं तुम्‍हें! कोकिल के चित्र बनते रहे, पर अंदर उसके तोता रहता। अंदर तोता, सो पिंजरे में बंद आराम की जिंदगी जीता और पढ़ाए हुए को ही गाता।’
‘आप क्‍या लेंगे चाय या कॉफी?’
‘दोनों ही कुछ अंतर से लूँ तो?’ मंडेला हँसते हुए बोले, ‘जेल इन्‍हीं पर तो काटी है भाई! चाय तो अभाव और गरीबी का एकमात्र सहारा है।’
उसने मंडेला के लिए कोकिल का चित्र बना दिया।
मंडेला बड़ी खुशी-खुशी उसके यहाँ से विदा हुए।
वह चित्र बना रहा था।
वह चित्र बना तो रहा था, पर आँखों के सामने धुँधलका होने से कोई स्‍पष्‍ट चित्र उसकी नजरों में नहीं था।
तभी दरवाजे पर दस्‍तक हुई।
उसने उठकर दरवाजा खोला तो पाया - महान अमेरिकी लेखक आर्थर मिलर खड़े हैं।
‘आइए, आइए!’ उसने उनका स्‍वागत किया और वहीं फलक के पास की कुर्सी पर बैठाया।
‘तुमने मुझे पहचाना इसके लिए मैं तुम्‍हारा शुक्रगुजार हूँ। लोग खिलाड़ियों और अभिनेताओं को ही पहचानते हैं।’
‘मैं शुक्रगुजार हूँ कि आप मेरे यहाँ आए। शब्‍दों का एक महान चितेरा मुझ जैसे सामान्‍य रंगकार के यहाँ!’
‘नहीं भाई नहीं, ऐसा न कहो। सच पूछो तो मैं तुम्‍हारे यहाँ मतलब से आया हूँ। तुम एक चित्र बना दो मेरे लिए। मयूर का चित्र!’
‘मयूर का चित्र!’ उसके मुँह से निकला।
‘तुम्‍हें आश्‍चर्य हो रहा है न!’ मिलर बोले, ‘सोचते होगे मुझ-जैसे को तो बंदर का चित्र बनवाना चाहिए। हम लोग कहते तो हैं कि बंदर से आदमी बनें, लेकिन आदमी बनकर अब हम प्रगति के साथ देवता बनने के स्‍थान पर पुनः बंदर ही बन रहे हैं, संपन्‍न बंदर, शक्तिशाली बंदर। बंदर की जो रेस अधिक शस्‍त्र-संपन्‍न, दुनिया को खत्‍म करने की जिसमें अधिक ताकत व अधिक प्रगति।’
‘मैं जानता हूँ, आपकी कलम ऐसे बंदरों के खिलाफ पूरी ताकत के साथ जूझ रही है।’ वह बोला। और सवाल किया, ‘आप मयूर का ही चित्र क्‍यों चाहते हैं?’
‘इसलिए कि मैं साहित्‍य को मयूर मानता हूँ। अपने रंग-बिरंगे पंख फैलाकर मयूर कितना सुंदर नृत्‍य प्रस्‍तुत करता है! ...और जानते हो मयूर नृत्‍य ही नहीं करता, वह सर्प का सफाया भी करता है।’
‘एक बात कहूँ, आप बुरा तो नहीं मानेंगे?’ वह बोला, ‘आज का साहित्‍य यथार्थ के नाम... सर्प का सफाया करने के नाम केवल डंडा नचाता है, साहित्‍य नहीं।’
‘आप ठीक कहते हैं।’ मिलर बोले, ‘डंडा... कोई वाद, फिर वह जनता से कितना ही जुड़ा हो साहित्‍य नहीं केवल डॉक्‍टरी एक्‍स-रे है।’
‘आप क्‍या लेंगे चाय या कॉफी?’
‘कुछ भी। बस गरम हो, आज के सही साहित्‍य-जैसा।’
उसने मिलर के लिए मयूर का चित्र बना दिया।
आर्थर मिलर बड़ी खुशी-खुशी उसके यहाँ से विदा हुए।
वह चित्र बना रहा था। वह चित्र बना तो रहा था पर आँखों के समाने धुँधलका होने से कोई स्‍पष्‍ट चित्र उसकी नजरों में नहीं था। पेट में चूहे बुरी तरह से दौड़ रहे थे। पत्‍नी को दो बार भोजन के लिए आवाज दे चुका था।
जब तीसरी बार आवाज दी तो पत्‍नी अंदर से ही बोली, ‘कैसे लाऊँ भोजन! पकाने को घर में कुछ नहीं है। कैसे हो सकता है जब तुम कबूतर, कोकिल, हंस, मयूर में डूबे रहोगे।’
तभी दरवाजे पर दस्‍तक हुई।
दरवाजा खोलने पर उसने देखा भेड़िया है।
‘देखो, मुझे एक चित्र बना दो तुम। भेड़ का चित्र।’
‘नहीं बनाऊँगा।’ वह बोला, ‘भेड़ को छीलने वाले, भेड़ को खा जानेवाले तुम! मैं जानता हूँ भेड़ का चित्र तुम्‍हें क्‍यों चाहिए। भेड़ से प्‍यार के दिखावे के लिए।’
‘मैं तुम्‍हें इतना दूँगा, इतना जो कोई नहीं दे सकता।’ भेड़िया बोला।
‘नहीं, मैं बिकाऊ नहीं हूँ।’
इतना कह उसने दरवाजा बंद कर दिया और अपनी जगह पर आया।
तभी पत्‍नी बोली, ‘यह तुमने क्‍या किया! रोटी दरवाजे पर आई थी, और तुमने उसे ठुकरा दिया।’
उधर पत्‍नी बोली और इधर उसके पेट की भूख भी जोर से चीखी।
वह उठा और दरवाजे की ओर भागा।

कबूतर

कबूतर 
-शबनम शर्मा

‘धांय’ की आवाज़,
मौत का खौफ़,
तूफान की तरह
सैंकड़ों कबूतर
उस सामने वाली इमारत
की आखिरी मंजिल
से उड़े,
कि आज वो बूढ़ा कबूतर
टस से मस न हुआ,
मैंने उसे इशारा कर
बुलाया, वो सधी हुई
उड़ान में उड़कर
मेरे पास आया।
मैंने पूछा, ‘‘तुम्हें डर नहीं लगा?’’
बोला, ‘‘जानती हो तुम,
बरसों पहले घना जंगल
था यहाँ,
पेड़ों पर थे हमारे आशियाने,
दिन गुटर-गूँ में,
तो रात एक दूसरे से
सटकर सोने में निकल
जाती थी,
सुबह होते ही
देखने जाते थे पास वाले
घर में निकले अंडों से
कबूतरी के बच्चे,
लिवाते थे दाना,
मनाते थे जश्न,
कट गये पेड़,
बन गई अटारियाँ,
रहने लगे लोग
चिपकाकर अपने नाम
की पट्टियाँ।
देखता हूँ मैं, रोता हूँ में,
क्योंकि इन सब कबूतरों
की उड़ान शाम को
यहीं खत्म होती है
ले जाता हूँ किसी
खाली घर की बालकनी में
सुनाता हूँ लोरी व सुला देता हूँ,
पर कब तक......
हर रोज तान देते हैं
ये बंदूक हमारी तरफ
बिन सोचे कि इन्होंने
घर बनाए हैं
हमारे घर छीन कर,
बदलते-बदलते आशियाँ
थक गया हूँ मैं।’’
दास्तान उसकी सुनकर
मेरा दिल, मेरी आँखें
रो पड़ीं,
पर जैसे ही मैंने उसे
सांत्वना देनी चाही,
झट से उड़ने को तैयार
पंख फैला उसने कहा
‘‘तुम भी तो हमारे
घर में रहती हो
कभी रोका उसे कि
बन्दूक से मत मारे हमें।’’

सम्पर्कः अनमोल कुंज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र., मो. – ०९८१६८३८९०९, ०९६३८५६९२३, shabnamsharma2006@yahoo.co.in

विश्व भ्रमण करते घुमक्कड़ परिंदे

 विश्व भ्रमण करते घुमक्कड़ परिंदे
-गोवर्धन यादव         
बच्चो!
 क्या कभी आपने किसी पक्षी को उड़ते हुए देखा है ?
 प्रश्न सुनते ही शायद आपके मन में क्रोध उत्पन्न होने लगेगा और आप झट से कह उठेंगे कि यह भी भला कोई प्रश्न हुआ? हम तो रोज पक्षियों को आसमान में उड़ते हुए देखते हैं।
इसी प्रश्न को पलटते हुए मैं दूसरा सवाल दोहराऊँ कि क्या कभी, आपमें से किसी ने, पक्षी की तरह आसमान में उड़ते हुए बहुत दूर तक जा पाने की कल्पना की है ? तब आप चुप्पी साध लेंगे। क्योंकि आपके मन में कभी भी आकाश में उड़ान भरने की कल्पना तक नहीं जागी। यदि कल्पना जागी होती तो शायद इसके परिणाम कुछ और होते।
बच्चो -आज हम सुगम, सुविधाजनक, आरामतलबी की जिन्दगी जी रहे हैं। हम अधिक से अधिक शौक-मौज से भरे दिन काटना चाहते हैं और विलासिता में निमग्न रहने का साधन ढूँढते रहते हैं। आरामतलबी जीवन जीने के लिए आलीशान बंगलों का निर्माण करते हैं और पूरी जिन्दगी उसी चार-दीवारी में काट देते हें। लेकिन पशु-पक्षी ऎसा कदापि नहीं करते। न तो वे अपने लिए कोई घर बनाने की सोचते हैं और न ही विलासिता की चीजें बटोरकर रखते हैं। शायद यही कारण है कि वे लंबी-लंबी यात्राएँ करते हुए एक देश से दूसरे देश में जा पहुँचते हैं। उन्हें न तो वीजा की जरुरत पड़ती है और न ही पासपोर्ट बनाने की जरुरत। वे खुलकर प्रकृति में आए नित बदलाव का आनन्द उठाते हैं और एक अवधि पश्चात फिर अपने पुराने ठिकाने पर आ पहुँचते है।
आरामतलबी या आलसीपन यह दोनों ही सजीव चेतन प्राणी की अन्तरात्मा की मूल प्रकृति के विपरीत है। यदि हमारे मन से इस दुर्बुद्धि के बादल छँट जाएँ, तो हमारे अन्दर सदा साहसिकता का परिचय देने की- शौर्य प्रवृत्ति उमगती दिखाई देगी। बहादुरी और वीरता का प्रतिफल ही सच्चा आनन्द और सन्तोष दे सकते हैं, इस मंत्र को तो छोटे-छोटे कीट-पतंगे और पशु-पक्षी भी भली-भांति जानते हैं।
बहुत- सी ऐसी चिड़ियाँ हैं, जो बदलती हुए ऋतुओं में आनन्द लेने के लिए दुर्गम यात्राएँ करती हैं। उन्हें काफ़ी जोखिम उठानी पड़ती है और काफ़ी श्रम भी करना पड़ता है तथा मनोयोग का प्रयोग भी करना पड़ता है। पर वे बेकार की झंझटों में न पड़ते हुए साहसिकता का परिचय देती हुई, लंबी उड़ान भरते हुए आन्तरिक प्रसन्नता एवं सन्तोष का अनुभव करती है। वे जानती हैं कि पेट तो कहीं भी भरा जा सकता है और रात कहीं भी काटी जा सकती है। मनुष्य भले ही इसे पसन्द न करे; परन्तु पशु-पक्षी से लेकर कीट-पतंगे तक कोई भी एक जगह रुकना पसंद नहीं करते।
इन पक्षियों की लम्बी यात्राएँ, ऊँची उड़ानें आश्चर्यजनक है। बागटेल 2000 मील की लम्बी यात्रा करके मुम्बई के निकट एक मैदान में उतरते हैं और फिर विभिन्न स्थानों के लिए बिखर जाते हैं। गोल्डन फ़्लावर पक्षी अमेरिका से चलते हैं। पतझड़ में विश्राम करते हैं , फिर थकान मिटाकर अटलांटिक और दक्षिण महासागर पार करते हुए दक्षिण अमेरिका जा पहुँचते हैं। आते समय वे समुद्र के ऊपर से उड़ते हैं और जाते समय जमीन के रास्ते लौटते हैं। अलास्का में उनके घोंसले होते हैं और वहीं अंडे देते हैं। हर वर्ष वे दो-ढाई हजार मील की यात्रा करते हैं। पृथ्वी की परिक्रमा केवल तीन हजार मील की है। इस प्रकार वे लगभग पृथ्वी की एक परिक्रमा हर वर्ष पूरी करते हैं।

आर्कटिका टिटहरी इन सब घुम्मकड़ पक्षियों में सबसे आगे है। उत्तरी ध्रुव के समीप उसका घोंसला होता है। पतझड़ में वह दक्षिण ध्रुव जा पहुँचती है। बसन्त में फिर उत्तरी ध्रुव लौट आती है। जर्मनी के बगुले चार माह में करीब 4000 मील का सफ़र पूरा करते हैं। रूसी बतखें भी 5000 मील की लम्बी यात्रा करती हैं। यह पक्षी औसतन 200 मील की यात्रा हर रोज करते हैं। टर्नस्टान इन सबसे अधिक उड़ती है। उसकी दैनिक उड़ान 500 मील के करीब तक होती है। साथ ही उसका 17 हजार फ़ीट ऊँचाई पर उड़ना और भी अधिक आश्चर्यजनक है। हाँ समुद्र पार करते समय उड़ने की ऊँचाई तीन हजार फ़ीट से अधिक नहीं होती।
बच्चो!- इन घुम्मकड़ पक्षियों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के ठीक बाद, हमारे मन में यह प्रश्न उठना लाजमी है कि आखिर वह कौन सा कारण है कि जिसके चलते ये पक्षी खतरनाक और कष्टदायक उड़ाने भरते हैं ? क्या इनके लिए उड़ान अनिवार्य है ? क्या वे अपने क्षेत्र में रहकर गुजारा नहीं कर सकते ? या वे थोड़ा- सा उड़कर, एक जगह रहकर अपना काम नहीं चला सकते ? आखिर ऐसा कौन सा कारण है कि वे अपनी जान जोखिम में डालने वाला ऐसा कदम, उन्हें क्यों उठाना पड़ता है ?
पक्षी विज्ञान के वैज्ञानियों ने यह पाया है कि बाह्य दृष्टि से उनके सामने कोई कठिनाई नहीं होती, जिसके कारण उन्हें इतना बड़ा जोखिम उठाने के लिए विवश होना पड़े। आहार की- ऋतु प्रभाव की घट-बढ़ होती रह सकती है, पर दूसरे पक्षी तो उन्हीं परिस्थितियों में किसी प्रकार निर्वाह करते हैं। फिर सैलानी चिड़ियों को ही ऐसी विचित्र उमंग क्यों उठती है ? इस प्रश्न का उत्तर उनकी वृक्क ग्रन्थियों में पाए जाने वाले विशेष हारमोन रसों से मिलता है। जिस प्रकार कुछ बढ़े हुए हारमोन उन्हें संतान उत्पत्ति के लिए बेचैनी उत्पन्न करती है, लगभग वैसी ही बेचैनी इस प्रकार की लम्बी उड़ान भरने के लिए इन पक्षियों को विवश करती है। वे अपने भीतर एक अद्भुत उमंग अनुभव करते हैं और वह इतनी प्रबल होती है कि उसे पूरा किए बिना उनसे रहा ही नहीं जाता। यह उड़ान हारमोन न केवल प्रेरणा देते हैं, वरन उसके लिए उनके शरीरों में आवश्यक साधन सामग्री भी जुटाते हैं। पंखों में अतिरिक्त शक्ति, खुराक का समुचित साधन न जुट सकने की क्षतिपूर्ति करने के लिए बढ़ी हुई चर्बी- साथ उड़ने की प्रवृत्ति, समय का ज्ञान, नियत स्थानों की पहचान, सफ़र का सही मार्ग जैसी कितनी ही एक से एक अद्भुत बातें हैं, जो इस लम्बी उड़ान और वापसी के साथ जुड़ी हुई हैं। उन उड़ान हारमोनों को पक्षी के शरीर, मन और अन्तर्मन में इस प्रकार के समस्त साधन जुटाने पड़ते हैं, जिससे उनकी यात्रा प्रवृत्ति तथा प्रक्रिया को सफलतापूर्वक कार्यान्वित होते रहने का अवसर मिलता रहे।
प्रकृति नहीं चाहती कि कोई भी प्राणी अपनी प्रतिभा को आलसी और विलासी बनाकर नष्ट करे। प्रकृति इन यात्रा प्रेमी पक्षियों को यही प्रेरणा देती है कि वे विभिन्न स्थानों के सुन्दर दृश्य देखें और वहाँ के ऋतु- प्रभाव एवं आहार-विहार के हर्षोल्लास का अनुभव करें। अपनी क्षमता और योग्यता को परिपुष्ट करें।
मनुष्य में आरामतलबी की प्रवृत्ति इतनी घातक है कि वह कुछ महत्त्वपूर्ण काम कर ही नहीं सकता, अपनी प्रगति के द्वार किसी को रोकने हों तो उसे काम से जी चुराने की आदत डालनी चाहिए और साहसिकता का त्याग कर विलासी बनने की बात सोचनी चाहिए। ऐसे लोगों को मुँह चिढ़ाते हुए- उनकी भर्त्सना करते हुए ही यह उड़ान पक्षी, विश्व-निरीक्षण, विश्व-भ्रमण करते रहते हैं- ऐसा लगता है।
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