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Apr 16, 2019

छत्तीसगढ़ के जसगीत

छत्तीसगढ़ के जसगीत
-संजीव तिवारी
छत्तीसगढ़ में पारंपरिक रूप में गाये जाने वाले लोकगीतों में जसगीत का अहम स्थान है। छत्तीसगढ़ का यह लोकगीत मुख्यत-  क्वांर व चैत्र नवरात में नौ दिन तक गाया जाता है। प्राचीन काल में जब चेचक एक महामारी के रूप में पूरे गांव में छा जाता था तब गांवों में चेचक प्रभावित व्यक्ति के घरों मै इसे गाया जाता था। आल्हाउदल के शौर्य गाथाओं एवं माता के श्रृंगार व माता की महिमा पर आधारित छत्तीसगढ़ के जसगीतों में अब नित नये अभिनव प्रयोग हो रहे हैं, हिंगलाज, मैहर, रतनपुर व डोंगरगढ, कोण्डागांव एवं अन्य स्थानीय देवियों का वर्णन एवं अन्य धार्मिक प्रसंगों को इसमें जोडा जा रहा है, नये गायक गायिकाओं, संगीत वाद्यों को शामिक कर इसका नया प्रयोग अनावरतचालु है।
पारंपरिक रूप से मांदर, झांझ व मंजिरे के साथ गाये जाने वाला यह गीत अपने स्वरों के ऊतारचढाव में ऐसी भक्ति की मादकता जगाता है जिससे सुनने वाले का रोमरोम माता के भक्ति में विभोर हो उठता है । छत्तीसगढ़ के शौर्य का प्रतीक एवं मॉं आदि शक्ति के प्रति असीम श्रद्धा को प्रदर्शित करता यह लोकगीत नसों में बहते रक्त को खौला देता है, यह अघ्यात्मिक आनंद का ऐसा अलौकिक ऊर्जा तनमन में जगाता है जिससे छत्तीसगढ़ के सीधे साधे सरल व्यक्ति के रग रग में ओज उमडपडता है एवं माता के सम्मान में इस गीत के रस में लीन भक्त लोहे के बने नुकीले लम्बे तारों, त्रिशुलों से अपने जीभ, गाल व हाथों को छेद लेते हैं व जसगीत के स्वर लहरियों में थिरकते हुए 'बोलबम' 'बोलबम' कहते हुए माता के प्रति अपनी श्रद्धा प्रदर्शित करते हुए 'बाना चढाते' हैं वहीं गांव के महामाया का पुजारी 'बैइगा' आनंद से अभिभूत हो 'माता चढे' बम बम बोलते लोगों को बगई के रस्सी से बने मोटे रस्से से पूरी ताकत से मारता है, शरीर में सोटे के निशान उभर पडते हैं पर भक्त बम बम कहते हुए आनंद में और डूबता जाता है और सोंटे का प्रहार मांदर के थाप के साथ ही गहराते जाता है ।
छत्तीसगढ़ के हर गाँव में ग्राम्या देवी के रूप में महामाया, शीतला मां, मातादेवाला का एक नियत स्थान होता है जहाँ इन दोनों नवरात्रियों में जंवारा बोया जाता है एवं नौ दिन तक अखण्ड'योति जलाया जाता है, रात को गाँव के पुरूष एक जगह एकत्र होकर मांदर के थापों के साथ जसगीत गाते हुए महामाया, शीतला, माता देवाला मंदिर की ओर निकलते हैं -
अलिन गलिन मैं तो खोजेंव,
मइया ओ मोर खोजेंव
सेऊकनइ तो पाएव,
मइया ओ मोर मालनिया
मइया ओ मोर भोजलिया.........
रास्ते में माता सेवा जसगीत गाने वाले गीत के साथ जुडते जाते हैं, जसगीत गाने वालों का कारवां जस गीत गाते हुए महामाया मंदिर की ओर बढता चला जाता है । शुरूआत में यह गीत मध्यम स्वर में गाया जाता है गीतों के विषय भक्तिपरक होते हैं, प्रश्नोत्तर के रूप में गीत के बोल मुखरित होते हैं -
कउने भिंगोवय मइया गेहूंवा के बिहरी
कउने जगावय नवराते हो माय...
सेऊक भिंगोवय मइया गेहूंवा के बिहरी
लंगुरे जगावय नवराते हो माय...
जसगीत के साथ दल महामाया मंदिर पहुंचता है वहाँ माता की पूजा अर्चना की जाती हैं फिर विभिन्न गांवों में अलग अलग प्रचलित गीतों के अनुसार पारंपरिक छत्तीसगढ़ी आरती गाई जाती है -
महामायलेलो आरती हो माय
गढ हींगलाज में गढे हिंडोलना
 लख आवय लख जाय
माता लख आवय लख जाय
एक नहीं आवय लाल लंगुरवा
जियरा के प्राण आधार...
जसगीत में लाल लंगुरवा यानि हनुमान जी सातों बहनिया माँ आदिशक्ति के सात रूपों के परमप्रिय भाई के रूप में जगह जगह प्रदर्शित होते हैं जहाँ माता आदि शक्ति लंगुरवा के भ्रातृ प्रेम व उसके बाल हठ को पूरा करने के लिये दिल्ली के राजा जयचंद से भी युद्ध कर उसे परास्त करनें का वर्णन गीतों में आता हैं । जसगीतों में दिल्ली व हिंगलाज के भवनों की भव्यता का भी वर्णन आता है -
कउन बसावय मइया दिल्ली ओ शहर ला,
कउन बसावय हिंगलाजे हो माय
राजा जयचंद बसावय दिल्ली शहर ला,
 माता वो भवानी हिंगलाजे हो माय
कउने बरन हे दिल्ली वो शहर हा,
कउने बरन हिंगलाजे हो माय
चंदन बरन मइया दिल्ली वो शहर हा,
बंदन बरन हिंगलाजे हो माय
आरती के बाद महामाया मंदिर प्रांगण में सभी भक्त बैठकर माता का सेवा गीतों में प्रस्तुत करते हैं । सभी देवी देवताओं को आव्हान करते हुए गाते हैं - 
पहिली मयसुमरेव भइया चंदा- सुरूज ला
दुसरे में सुमरेंव आकाश हो माय......
सुमरने व न्यौता देने का यह क्रम लंबा चलता है ज्ञात अज्ञात देवी देवताओं का आहवान गीतों के द्वारा होता है । गीतों में ऐसे भी वाक्यों का उल्लेख आता है जब गांवों के सभी देवी- देवताओं को सुमरने के बाद भी यदि भूल से किसी देवी को बुलाना छूट गया रहता है तो वह नाराज होती है गीतों में तीखें सवाल जवाब जाग उठते हैं - -
अरे बेंदरा बेंदराझन कह बराइन मैं हनुमंता बीरा
मैं हनुमंता बीरा ग देव मोर मैं हनुमंता बीरा
जब सरिस के सोन के तोर गढ लंका
कलसा ला तोर फोरहॉं, समुंद्र में डुबोवैं,
कलसा ला तोरे फोरहाँ ...
भक्त अपनी श्रद्धा के फुलों से एवं भक्ति भाव से मानस पूजा प्रस्तुत करते हैं, गीतों में माता का श्रृंगार करते हैं मालिन से फूल गजरा रखवाते हैं । सातों रंगो से माता का श्रृंगार करते हैं - -
मइयासांतों रंग सोला हो श्रृंगार हो माय...
लाल लाल तोरे चुनरी महामाय
लालै चोला तुम्हारे हो माय...
लाल हावै तोर माथे की टिकली
 लाल ध्वजा तुम्हारे हो माय....
खात पान मुख लाल बाल है
सिर के सेंदूर लाल हो माय...
मइया सातों रंग...
पुष्प की माला में मोंगरा फूल माता को अतिप्रिय है। भक्त सेउक गाता है - 
हो माय के फूल गजरा,
गूथौ हो मालिन के धियरी फूल गजरा
कउनेमाय बर गजरा कउने माय बर हार,
कउने भाई बर माथ मटुकिया
सोला हो श्रृंगार...
बूढी माय बर गजरा धनईया माय बर हार,
लंगुरे भाई बर माथ मटुकिया
सोला हो श्रृंगार ...
माता का मानसिक श्रृंगार व पूजा के गीतों के बाद सेऊक जसगीत के अन्य पहलुओं में रम जाते हैं तब जसगीत अपने चढाव पर आता है मांदर के थाप उत्तेजित घ्वनि में बारंबार ता बढाते हैं गीत के बोल में तेजी और उत्तेजना छा जाता हैं -
अगिन शेत मुख भारत भारेव,
भारेव लखन कुमारा
चंदा सुरूज दोन्नो ला भारेव,
तहूं ला मैं भारेहौं हां
मोर लाल बराईन,
तहूं ला मैं भरे हंव हाँ ...
गीतों में मस्त सेऊक भक्ति भाव में लीन हो, वाद्य यंत्रों की धुनों व गीतों में ऐसा रमता है कि वह बम बम के घोष के साथ थिरकने लगता है, क्षेत्र में इसे देवता चढना कहते हैं अर्थात देवी स्वरूप इन पर आ जाता है । दरअसल यह ब्रम्हानंद जैसी स्थिति है जहाँ भक्त माता में पूर्णतया लीन होकर नृत्य करने लगता है सेऊक ऐसी स्थिति में कई बार अपना उग्र रूप भी दिखाने लगता है तब महामाई का पुजारी सोंटे से व कोमल बांस से बने बेंत से उन्हें पीटता है एवं माता के सामने 'हूमदेवाता' है ।
भक्ति की यह रसधारा अविरल तब तक बहती है जब तक भगत थक कर चूर नहीं हो जाते। सेवा समाप्ति के बाद अर्धरात्रि को जब सेऊक अपने अपने घर को जाते हैं तो माता को सोने के लिये भी गीत गाते हैं -
पउढौ पउढौ मईयां अपने भुवन में,
सेउक बिदा दे घर जाही बूढी माया मोर
दसो अंगुरी से मईया बिनती करत हौं,
 डंडा ओ शरण लागौं पायें हो माय ...
आठ दिन की सेवा के बाद अष्टमी को संध्या 'आठे’ में 'हूम हवन’ व पूजा अर्चना पंडित के .द्धारा विधि विधान के साथ किया जाता है । दुर्गा सप्तशती के मंत्र गूंजते हैं और जस गीत के मधुर धुन वातावरण को भक्तिमय बना देता है । नवें दिन प्रात-  इसी प्रकार से तीव्र चढावजस गीत गांए जाते हैं जिससे कि कई भगत मगन होकर बाना, सांग चढाते हैं एवं मगन होकर नाचते हैं । मंदिर से जवांरा एवं जोत को सर में उढाए महिलाएं कतारबद्ध होकर निकलती है गाना चलते रहता है । अखण्ड'योति की रक्षा करने का भार बइगा का रहता है क्योंकि पाशविक शक्ति उसे बुझाने के लिये अपनी शक्ति का प्रयोग करती है जिसे परास्त करने के लिये बईगा बम बम के भयंकर गर्जना के साथ नीबूचांवल को मंत्रों से अभिमंत्रित कर 'योति व जवांरा को सिर पर लिए कतारबद्ध महिलाओं के उपर हवा में फेंकता है व उस प्रभाव को दूर भगाता है । गीत में मस्त नाचते गाता भगतों का कारवां नदी पहुंचता है जहाँ 'योति व जवांरा को विसर्जित किया जाता है । पूरी श्रद्धा व भक्ति के साथ सभी माता को प्रणाम कर अपने गांव की सुख समृद्धि का वरदान मांगते हैं, सेऊक माता के बिदाई की गीत गाते हैं -
सरा मोर सत्तीमाय ओ छोडी के चले हो बन जाए
सरा मोर सत्ती माय वो ...
सम्पर्कः ए 40, खण्डेलवाल कालोनी, दुर्ग, मो. 09926615707

छत्तीसगढ़ में माता की उपासना

छत्तीसगढ़ में माता की उपासना
- सुशील भोले
सतबहिनिया माता की पूजा परंपरा...
छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति इस देश में प्रचलित वैदिक या कहें शास्त्र आधारित संस्कृति से बिल्कुल अलगहटकर एक मौलिक और स्वतंत्र संस्कृति है। आप सभी जानते हैं, कि नवरात्र में वैदिक मान्यता के अनुसार माता के नौ रूपों की उपासना की जाती है। जबकि छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति में माता के सात रूपों की पूजा-उपासना की जाती है,  जिन्हें हम सतबहिनिया माता के नाम से जानते हैं। यहाँ की संस्कृति प्रकृति पर आधारित संस्कृति है, इसलिए यहाँ प्रकृति पूजा के रूप में जंवारा बोने और उसकी पूजा-उपासना करने की परंपरा है।
हमारे यहाँ सतबहिनिया माता के जिन सात रूपों की उपासना की जाती है,  उनमें मुख्यतः - शीतला दाई,  मावली दाई,  बूढ़ी माई,  ठकुराईन दाई, कुंवर माई,  मरहीमाई, दरश माता आदि प्रमुख हैं।  इनके अलावा भी अलग- अलग लोगों से और कई अन्य नाम ज्ञात हुए हैं,  जिनमें -कंकालीन दाई,  दंतेश्वरीमाई,  जलदेवती माता,  कोदाई माता या अन्नपूर्णा माता आदि-आदि नाम बताए जाते हैं।
हमारे यहाँ सतबहिनिया माता की पूजा-उपासना आदि काल से होती चली आ रही है, इसीलिए यहाँ के प्राय: सभी गाँव,  शहर और मोहल्ले में शीतला माता,  मावली माता, सतबहिनिया माता आदि के मंदिर देखे जाते हैं। 
माँ गंगा मैया मंदिर, झलमला... 
छत्तीसगढ़ के बालोद जिला मुख्यालय से महज तीन किलोमीटर पर स्थित ग्राम पंचायत झलमला का प्रसिद्ध देवी मंदिर है। मंदिर ऐसा कि दर्शन मात्र से ही जीवन धन्य हो जाए। माता की अदभुत प्रतिमा को देखकर ही भक्त जनों का रोम-रोम पुलकित हुए बिना नहीं रहता।
प्राचीन कथा जुड़ी देवी माँ के मंदिर से..
धार्मिक स्थल माँ गंगा मैया की कहानी अंग्रेज शासन काल से जुड़ी हुई है। उस समय जिले की जीवन दायिनीतांदुला नदी के नहर का निर्माण चल रहा था, करीब 125 साल पहले। उस दौरान झलमला की आबादी महज 100 के लगभग थी, जहाँ सोमवार के दिन ही यहाँ का बड़ा बाजार लगता था। जहाँ दूर-दराज से पशुओं के विशाल समूह के साथ बंजारे आया करते थे। उस दौरान पशुओं की संख्या अधिक होने के कारण पानी की कमी महसूस की जाती थी। पानी की कमी को पूरा करने के लिए बांधा तालाब नामक एक तालाब की खुदाई कराई गई। माँ गंगा मैय्या के प्रादुर्भाव की कहानी इसी तालाब से शुरू होती है।
बार-बार जाल में फंसती रही मूर्ति...
किवदंती अनुसार एक दिन ग्राम सिवनी का एक केवट मछली पकडऩे के लिए इस तालाब में गया, लेकिन जाल में मछली की जगह एक पत्थर की प्रतिमा फँस गई, लेकिन केवट ने अज्ञानतावश उसे साधारण पत्थर समझ कर फिर से तालाब में डाल दिया। इस प्रक्रिया के कई बार पुनरावृत्ति से परेशान होकर केवट जाल लेकर घर चला गया।
स्वप्न में कहा मुझे निकालें बाहर...
देवी माँ की प्रतिमा को लेकर कई किवदंतियां प्रचलित हैं। केवट के जाल में बार-बार फंसने के बाद भी केवट ने मूर्ति को साधारण पत्थर समझ कर तालाब में ही फेंक दिया। इसके बाद देवी ने उसी गांव के गोंड़ जाति के बैगा को स्वप्न में आकर कहा कि मैं जल के अंदर पड़ी हूं। मुझे जल से निकालकर मेरी प्राण-प्रतिष्ठा करवाओ।
माता के स्वप्न के बाद प्रतिमा को निकाला बाहर...
स्वप्न की सत्यता को जानने के लिए तत्कालीन मालगुजार छवि प्रसाद तिवारी, केंवट तथा गांव के अन्य प्रमुख को साथ लेकर बैगा तालाब पहुँचा, उसके बाद केंवट द्वारा जाल फेंके जाने पर वही प्रतिमा फिर जाल में फंसी। प्रतिमा को बाहर निकाला गया, उसके बाद देवी के आदेशानुसार तिवारी ने अपने संरक्षण में प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा करवाई गई। जल से प्रतिमा निकली होने के कारण गंगा मैय्या के नाम से जानी जाने लगी।
शक्ति लहरी सतधरा धाम दर्शन...
छत्तीसगढ की शक्तिपीठों में अब शक्ति लहरी सतधरा धाम का नाम भी प्रमुखता से जुड़ने लगा है। लगभग पिछले एक शताब्दी पूर्व से स्थापित माता के इस मंदिर में भक्तजनों का आना निरंतर बढता जा रहा है।
सात नदियों के एक साथ मिलने से सतधरा या सप्तधारा के नाम से जाने जाना वाला यह स्थल गरियाबंद जिला महासमुंद जिला और रायपुर जिला की सीमारेखा पर ग्राम हथखोज के अंतर्गत स्थित है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ महानदी, सोढुल नदी और पैरी नदी की तीन धाराओं के साथ सूखा नदी, सरगी नदी, केशवा नदी और बगनई नदी आपस में एक साथ मिलती हैं, इसीलिए इस विराट भू-भाग में फैले संगम को सप्तधारा या सतधराकहते हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि संभवतः समूचे छत्तीसगढ में नदियों का संगम स्थल इतना विस्तारित कहीं पर नहीं है, जितना विस्तारित यहाँ का संगम पाट है।

माता जी के यहाँ पर स्थापित होने के संबंध में बताया जाता है, कि माता की यह बिना शीश वाली प्रतिमा नदी में बहकर आयी है, एक यादव को यह प्राप्त हुई है। बताया जाता है कि वह व्यक्ति अपनी भैंसोथ को लेकर संगम स्थल पर जाया करता था, वहाँ उसकी भैंस एक स्थान विशेष पर हमेशा चमक जाती थी। यादव को आश्चर्य होता था कि आखिर भैंस यहाँ पर चमक या झिझक क्यों जाती है। उसने उस स्थल को ठीक से देखकर रेत में टटोलने लगा कि आखिर यहाँ है क्या? तब यह प्रतिमा उसके हाथों में आयी।
बताया जाता है, कि तब माता ने उस यादव को स्वप्न दिया कि मुझे यहाँ से निकालकर अन्य स्थल पर स्थापित करवा दो। उन्होंने बताया कि मुझे उठाकर ले जाते समय हर कदम पर एक-एक नारियल रखते जाना और जहाँ पर नारियल अपने आप फूट जाए उस स्थल पर मुझे स्थापित कर देना। वर्तमान में स्थापित जगह पर ही नारियल के फूटे जाने का जिक्र किया जाता है।
वर्तमान में यह स्थल देवी उपासना के प्रमुख पीठ के रूप में विकसित हो रहा है। राजिम से महासमुंद को जोड़ने वाले इस मार्ग पर स्थित सूखा नदी पर भव्य पुल बन जाने के कारण यहाँ से होकर गुजरने वालों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है, इसका प्रतिफल मंदिर के दर्शनार्थियों के लिए भी सार्थक रहा है, उनकी संख्या में भी वृद्धि हुई है।
यहाँ पर प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर तीन दिनों का मेला भरता है। मेला का स्वरूप दिनों दिन बढता ही जा रहा है। इसी अवसर पर यहाँ सूखा लहरा लिया जाता है। बताया जाता है, कि संगम स्थल की रेत पर लोग लोट कर लहरा लेते हैं। जिसके भाग्य में होता है, वह उंगली के स्पर्श मात्र से काफी दूर तक लुढकते हुए चला जाता है, और निढाल होने के पश्चात ही रुकता पाता है।
माता के इस स्थल पर नवरात्र के दोनों ही अवसर पर ज्योति कलश की स्थापना की जाती है, जहाँ श्रद्धालु अपनी मनोकामना को लेकर ज्योति प्रज्वलित करते हैं।
जंगल के बीच जतमाई माता का बसेरा... 
जतमई छत्तीसगढ़ के प्रमुख तीर्थ आैर पर्यटन स्थलों में से एक है। ये प्रकृति की गोद में बसा हुआ है। यह स्थान अब देवी का एक चर्चित तीर्थ का रूप धारण कर चुका है। जतमाई छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 65 किमी की दूरी पर स्थित एक प्राकृतिक स्थल है आैर यह जंगल के बीचों-बीच बना हुआ है। जतमाई अपने कल कल करते प्राकृतिक सदाबहार झरनों के लिए भी प्रसिद्ध है। गरियाबंद जिले में प्रकृति की गोद में बसा, वनों से आच्छादित यह अत्यंत सुंदर स्थान है, जहाँ वर्षा ऋतु में कल कल करते झरने बहते रहते हैं। यही शहर के प्रदूषण से मुक्त शांत जगहों मेंसे एक जतमई धाम है। यहाँ माँजतमाई का प्रसिद्घ मंदिर है जो की पहाड़ों की देवी है। माता के मंदिर के ठीक सटी हुई जलधाराएं उनके चरणों को छूकर चट्टानों से नीचे गिरती हैं। इसमें युवा नहाने से नहीं चूकते हैं। स्‍थानीयमान्‍यताओं के अनुसार, ये जलधाराएं माता की सेविकाएं हैं जो देवी माँ के भक्‍तों को नहलाती हैं। यहाँ आने वाला हर शख्स यही कहता है कि वह जन्नत में आ गया।
बहुत मशहूर है यह स्थान...
वैसे तो यहाँ साल भर ही भक्तों की भीड़ आती है और माँ के दर्शनों का लाभ उठाती है, परंतु प्रतिवर्ष चैत्र और कुवांर के नवरात्र में मेला भी लगता है। जतमाई में दूर दूर से लोग माता के दर्शन करने आते हैं तथा पिकनिक का भी आनंद उठाते हैं। जतमई वनों के मध्य में स्थित होने के कारण एक खूबसूरत पिकनिक स्थल के रूप में भी प्रसिद्ध है। यहाँ के झरने लोगों के मन मोह लेते हैं और लोग झरने में भीगने से आपने आप को रोक नहीं पाते हैं। जतमाई से लगा हुआ घटारानी भी जतमाई की तरह ही एक प्राकृतिक पर्यटन स्थल है। यहाँ भी जतमाई की तरह ही झरने बहते हैं और माँ घटारानी का मंदिर है, जतमाई के पास ही एक छोटा सा बांध भी है जिसे पर्यटक देखना नहीं भूलते।
सम्पर्कः संजय नगर,  रायपुर, मो.
982699281

विक्रम सोनी की चार लघुकथाएँ

विक्रम सोनी की
 चार लघुकथाएँ
1-कारण
चमचमाती, झंडीदार अंबेसडर कार बड़े फौजी साज–सामान बनानेवाली फैक्टरी के मुख्य द्वार से भीतर समा गई। नियत स्थान पर वे उतरे। अफसरान सब पानी जैसे होकर उनके चरणों को पखारने लगे। कुछ गण्यमान्य कहे जानेवाले खास लोग विनम्रता के स्टूच्यू सरीखे खड़े हो गए। फैक्टरी के इंजीनियर स्वचालित मशीनों की तरह चल पड़े। उनकी निगाहे बाई ओर घूमीं।
‘‘इधर विद्युत् संबंधी काम होता है सर!’’
उन्होंने दाईं ओर देखा।
‘‘इधर टूलरूम है महोदय!’’
वे आगे बढ़ गए।
‘‘सामने बारूद का काम होता है सरकार!’’
वे बारूद के ढेर में सम्मिलित हो गए।
सुबह अखबारों ने मुँह खोल दिए। जब मैंने निकाले गए मजदूर तथा तकनीशियनों से उनके निकाले जाने के कारण जानना चाहा तो सात छोटे–बड़े पारिवारिक बेटों के मुखिया ने कहा, ‘‘भइया जी, कल हमारे कारखानों में लोकतंत्र घुस आया था।’’
2-अंतहीन सिलसिला
दस वर्ष के नेतराम ने अपने बाप की अर्थी को कंधा दिया, तभी कलप–कलपकर रो पड़ा। जो लोग अभी तक उसे बज्जर कलेजे वाला कह रहे थे, वे खुश हो गए। चिता में आग देने से पूर्व नेतराम को भीड़ सम्मुख खड़ा किया गया। गाँव के बैगा पुजारी ने कहा, ‘‘नेतराम…!’’साथ ही उसके सामने उसके पिता का पुराना जूता रख दिया गया, ‘‘नेतराम बेटा, अपने बाप का यह जूता पहन ले।’’
‘‘मगर ये तो मेरे पाँव से बड़े हैं।’’
‘‘तो क्या हुआ, पहन ले।’’ भीड़ से दो–चार जनों ने कहा।
नेतराम ने जूते पहन लिये तो बैगा बोला, ‘‘अब बोल, मैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं।’’
नेतराम चुप रहा।
एक बार, दूसरी दफे, आखिर तीसरी मर्तबा उसे बोलना ही पड़ा, ‘‘मैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं।’’ और वह एक बार फिर रो पड़ा।
अब कल से उसे अपने बाप की जगह पटेल की मजदूरी–हलवाही में तब तक खटते रहना है, जब तक कि उसकी औलाद के पाँव उसके जूते के बराबर नहीं हो जाते।
3-मुआवजा
वह बोझिल कदमों से अस्पताल की सीढि़याँ उतर रहा था। उसके पीछे–पीछे उसकी पत्नी बिसूरती हुई चली आ रही थी। उसके दोनों हाथों के समानंतर फैलाव पर उसके सातेक साल के बच्चे की लाश बेकफन पसरी हुई थी। बाहर अब भी वर्षा हो रही थी।
पिछले कई दिनों से वर्षा थमी नहीं थी। और वह था तेज का मजदूर। चौथे दिन के ढलते–ढलते बच्चा भूख और तेज ज्वर से बिलबिलाने लगा था। घर में बचा–खुचा जो भी था, दाना–दाना लील लिया गया। बच्चे को पोलीथिन की छप्पर तले अधिक देर तक नहीं रखा जा सकता था। भीगी कथरी में बच्चे को लपेटकर सुबह ही वह सरकारी अस्पताल जा पहुँचा। बच्चे को भरती कर लिया गया। अभी उसके हाथों में दवाई की पर्ची तथा दूध, फल देने की हिदायतें पकड़ाई ही गई थीं कि बच्चे ने दम तोड़ दिया। डॉक्टर ने लाश जल्दी उठाने को कहते हुए सलाह दी, ‘‘करीब ही सरकारी राहत पड़ाव है। वहाँ चले जाओ। बरसात से हुई हानि का मुआवजा मिल जाएगा और तुम दोनों भी सुरक्षित रहोगे।’’
वह बच्चे को उठा ही रहा था कि नर्स ने कुढ़ते हुए–सा कहा, ‘‘बच्चा बरसाती पानी में डूबकर मरा होता तब तो मुआवजा मिलता। यह तो भूख से मरा है।’’
अंतिम सीढ़ी पर पहुँचते–पहुँचते उसकी पत्नी के खाली पेट में जमकर मरोड़ उठा। रुलाई की वजह से नस–नस में ऐंठन–सी हो रही थी। उसने पत्नी को दिलासा दी और दोनों भीगते हुए ही घुटने भर पानी में चल पड़े। सड़क जनशून्य थी। सामने से एक लॉरी आदमी, औरतों, बच्चों से ठसाठस भरी आ रही थी। उसने उसे रोकना चाहा, मगर तभी लॉरी लड़खड़ाई तथा बाईं ओर बनी दीवार से टकराकर अधउलटी रुक गई। कई जिस्म नीचे पानी में गिरकर छटपटाने लगे। कोहराम मच गया। वह बच्चे की लाश को फेंककर छटपटाते लोगों के बीच खड़ा हो चिल्ला पड़ा ‘‘हाय मेरा बच्चा, मेरी औ…..र…त।’’
उसकी निगाहें पीछे आती पत्नी को ढूँढ रही थीं और उसकी पत्नी अपने ही करीब तैरती बच्चे की लाश से परे हिलोरें खाती डबलरोटी को झपटने की कोशिश कर रही थी।
4-सर्वशक्तिमान
उस नवनिर्मित के द्वार पर दिन–ब–दिन भीड़ बढ़ती जा रही थी। चौबीसों घंटे श्रद्धालुओं की उपस्थिति से मंदिर का मुख्य द्वार कभी बंद नहीं हो पाता था। पूजन–अर्चन के बाद लौटते हुए इतनी संतुष्टि,आज से पहले दुनिया के किसी भी धर्मगढ़ से निकलते लोगों के चेहरों पर नहीं देखी गई। खास बात तो यह कि इस मंदिर में सभी धर्मों और समुदायों के लोग आ–जा रहे थे।
किसी से पूछते कि इस मंदिर में किसकी मूर्ति रखी हुई है तो लोग एक ही उत्तर देते, ‘सर्वशक्तिमान की,’ और श्रद्धा–भक्ति से आँख मूँद लेते।
सरकार एक दिन खुद ताव खाते मंदिर में घुस पड़े। आखिर उनसे ज्यादा ताकतवर यह कौन सर्वशक्तिमान अवतरित होकर एक धर्म साम्राज्य पर फावड़ा चला रहा है? वे पहुँचे। दर्शन पाते ही उनकी गर्दन झुक गई। वे फर्श से माथा टेककर बड़बड़ाए, ‘‘हे सर्वशक्तिमान, मुझ दरिद्र पर कृपा करो।’’ दरअसल वहाँ स्वर्ण–सिंहासन पर चाँदी का एक गोल सिक्का रखा हुआ था।

गीत बना गा लेना

क्षणिकाएँ
गीत बना गा लेना
 प्रियंका गुप्ता
1
तुमने
शब्द कहे थे;
मैंने
अर्थ जी लिया।
2
सूरज
कतरा कतरा पिघल के
बह गया,
धरती बूँद बूँद
पीती गई;
ऐसे ही तो
सृष्टि बनी।
3
मुझे
गीत बना गा लेना,
या
नज़्म की तरह
लिख लेना;
मैं हवा की तरह
तुम्हारे आस- पास रहूँगा,
बिखर जाऊँगा
खुश्बू की तरह;
इश्क करने से ज़्यादा
बेहतर होगा
इश्क में घुल जाना।
4
उसने धरती पर
फसल लिखी,
पौधों में
ज़िन्दगी पढ़ी,
और एक दिन
आसमान ताकते हुए
उसने मौत चुनी;
इस तरह
कहानी मुकम्मल हुई।
5
ज़िन्दगी मुझे
विष देती रहे
तुम छू के मुझे
अमृत कर देना;
खेल ऐसे ही तो
जीतते हैं न ?