मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Apr 16, 2019

खुद्दार

खुद्दार
-डॉ. आशा पाण्डेय
हरे-पीले, पके-अधपके आमों से लदे पेड़ों का बगीचा। बीच से निकली है सड़क । बगीचे को पार करती हुई मेरी कार एक घने आम के पेड़ के नीचे रुक जाती है। हम सभी कार से उतरते हैं।
    नीचे,पेड़ की जड़ के पास, पके हुए सात आठ आम पड़े हैं। मैं कुछ बोल पाऊँ उसके पहले ही मेरे बच्चे आम उठाकर खाना शुरू कर देते हैं। पेड़ की एक डाल आमों से लदी हुई काफी नीचे झुकी है। पति ने डाल को पकड़कर हिला दिया। तीन-चार आम टपक पड़े ।मैं मना करती हूँ। मुझे डर है कि अभी पेड़ का मालिक आकर लड़ने न लगे। इन लोगों का क्या भरोसा । लड़ने लगेंगे तो ऐसा चिल्ला-चिल्लाकर लड़ेगे कि अपनी तो बोलती ही बन्द हो जाएगी। इनका तो कुछ मान-अपमान होता नहीं, अपनी इज्जत का जरूर फालूदा बन जाएगा, किन्तु मेरी बातों का बच्चों पर असर नहींपड़ता। बच्चे आम उठाकर गाड़ी में रख लेते हैं। शहरी सभ्यताओं को ढो-ढोकर थके मेरे बच्चे यहाँ आकर स्वतंत्र हो गए हैं। मैं चुप हो जाती हूँ। मन में सोचती हूँ, बच्चों को खुश हो लेने दो। ये बाग-बगीचे, ये गाँव इन्हें कहाँ देखने को मिलते हैं। अगर पेड़ का मालिक आएगा ही तो मैं इन आमों की कीमत चुका दूँगी। यह सोचते हुए मेरे मन में दर्प भाव उमड़ उठता है।
बगीचे से कुछ फर्लांग की दूरी पर छह-सात घरों का एक छोटा-सा गाँव है। वहाँ भी इक्के-दुक्के आम, महुआ, नीम के पेड़ दिखाई दे रहे हैं।  उनमें से दो-तीन घरों का दरवाजा बाग की तरफ खुलता है। एक घर के सामने नीम की छाँव में खटिया बिछाए तीन-चार व्यक्ति ताश खेल रहे हैं। समीप ही दूसरी खटिया पर एक अधेड़ किस्म का व्यक्ति लेटा है। जब हमारी कार बगीचे में रुकी तब उन सभी की निगाह हमारी तरफ हो गई। थोड़ी देर तक हमारी तरफ देखने के बाद उस अधेड़व्यक्ति ने किसी को आवाज लगाई। घर के अन्दर से दो लड़कियाँ निकलकर पेड़ की तरफ आने लगीं। एक दस-बारह साल की है, दूसरी उससे कुछ छोटी, लगभग आठ-नौ साल की। दोनों नेफ्राक पहनी हैं, किन्तु बटन दोनों के ही फ्राक से गायब है। पीठ को उघाड़ता हुआ उनका फ्राक कन्धे से नीचे लटका जा रहा है। लड़कियाँ उसे कन्धे के ऊपर चढ़ा लेती हैं। फ्राक बार-बार लटक रहा है,लड़कियाँ बार-बार उसे कन्धे पर चढ़ा रही हैं।फ्राक को पकड़े –पकड़े  ही छोटी लड़की पेड़ के इर्द-गिर्द नजरे गड़ाए कुछ खोजने लगी।दोनों परेशान हैं,वे आपस में कुछ फुसफुसा भी रही हैं। दरअसल लड़कियों ने पेड़ के नीचे जिन आमों को इकट्ठा किया था, वे  उन्हें तलाश रही हैं। मेरी बेटी आगे बढ़कर उनसे पूछती है, ‘यहाँ जो आम गिरे थे, उन्हें खोज रही हो  क्या?’
 ‘गिरे नहीं थे, हमने उन्हें वहाँ रखा था।’जवाब में अकड़ है।
 ‘हाँ, जो भी हो, वो बड़े मीठे थे। उनमें से कुछ हमने खा लिये, कुछ गाड़ी में रख लिये हैं ।’ मेरी बेटी की आवाज में लापरवाही है ।
बड़ीलड़की के चेहरे पर कई भाव आए और गए। ऐसा तो नहीं हुआ होगा कि हमारी जबरदस्ती उसे खराब न लगी हो, किन्तु न जाने क्योंवे चुप रह गईं। मैं उसके चुप रह जाने का कारण खोजती हूँ- हमारी अकड़? हमारा शहरीपन? हमारी चमक-दमक या उसकी उदारता?...पता नहीं।मैं लड़कियों के पास आती हूँ।
            ‘ये बगीचा तुम्हारा है?’
            ‘नहीं ,पूरा बगीचा मेरा नहीं है। इसमें सिर्फ तीन पेड़ मेरे हैं।... उधर जो दो पेड़ दिख रहे हैं ,वो और ये जिसके नीचे आप लोग खड़े हैं।’बड़ी लड़की ने गर्व से जवाब दिया।
            ‘आम तो बहुत निकलते होंगे, यहाँ गाँव में बिक जाते हैं?’
            ‘गाँव में तो सभी के पास पेड़ है, यहाँ कौन खरीदेगा। हाँ, पकने पर बाबा बाजार में ले जाते हैं।... कच्चे आम की खटाई और पके आम का अमावट भी बिक जाता है।’
            ‘हम लोग खाते भी हैं। दोपहर में हमारे घर रोटी नहीं बनती, आम ही खाकर रह लेते हैं।’अब तक चुप खड़ी छोटी लड़की ने मुँह खोला।
            ‘शाम को रोटी बनती है?’मेरी जिज्ञासा बढ़ गई।
            ‘हाँ, शाम को पना (आम रस) के साथ हम लोग रोटी खाते हैं। आज शाम को हमारे घर में दाल भी बनेगी और अगर सुनीता के घर से चावल मिल जाएगा तो भात भी   बनेगा ।’छोटी  लड़कीने चहकते हुए कहा बड़ी बहन ने छोटी को घूर कर देखा। छोटी सहम कर चुप हो गई।
            ‘तुम्हारे  पास खेत भी है ?’
            ‘हाँ, है न। एक छोटा-सा खेत भी है।’बड़ी लड़की ने जवाब दिया।
            ‘बस एक ही?’
            ‘हाँ, ...... वही जो उस कुएँ के पास दिख रहा है।’लड़की ने हाथ से इशारा किया। मेरी नजरें उसके हाथ का पीछा करती हुई कुएँ के पास जाकर ठहर गईं । लगभग दो हजार स्क्वायर फिट का जमीन का एक छोटा टुकड़ा ।
            ‘इसमें क्या बोते हैं तुम्हारे बाबा?’
            ‘सब कुछ, कभी गेहूँ, कभी मूँग, कभी उड़द। सब्जियाँ भी लगाते हैं। देखिये अभी सब्जी ही लगी है ।
            ‘बाबा कह रहे थे इस बार सब्जियाँ बेचने से जो पैसे मिलेंगे उससे हम लोगों के लिए कपड़े  और चप्पल भी लाएंगे।’छोटी लड़की फिर बोल पड़ी । बड़ी ने छोटी के हाथ में चिकोटी काट ली ।छोटी थोड़ा उचक कर दर्द को भीतर ही भीतर सह गई। मैं उन दोनों लड़कियों को देखकर मुस्कुरा दी ।
      लड़कियाँ अब खेलने में लग गई हैं । आम की एक डाल काफी नीचे तक लटक रही है,छोटी लड़की उस डाल को पकड़ कर झूलने लगी । मेरे बच्चे भी उन दोनों के साथ खेल रहे हैं । लड़कियों का संकोच अब कुछ कम हो गया है,वे दोनों मेरे बच्चों के साथ घुलने का प्रयास कर रही हैं । बाग के दूसरे किनारे पर एक पेड़ के नीचे दो औरतें बैठी आपस में बतिया रही हैं , कुछ-कुछ देर पर दोनों हमारी ओर देखे जा रही हैं, लगता है उनकी बातों के केंद्र में हम लोग ही हैं ।
जिस पेड़ के नीचे हम लोग खड़े हैं, उसकी एकबड़ीजड़ जमीन के ऊपर निकल कर गोल आकार बनाती हुई फिर से जमीन के नीचे धँसी हुई है। पति उस जड़ पर बैठ गए हैं ।मैं वहीं समीप खड़ी हूँ।
 ‘ कितना सुन्दर बाग है। यहाँ का हर पेड़ कुछ न कुछ आकार बना रहा है। डालियाँ कितने नीचे तक झुकी हैं । मन कर रहा है कि पकड़ कर झूलने लगूँ । हमारे गाँव में एक ऐसा ही पेड़  था। हम सब बच्चे पूरी दोपहर उसी के इर्द-गिर्द जमा रहते थे। यहाँ आकर  मुझे अपना  गाँव याद आ गया ।’पति की आवाज कुछ गहरी और भीगी-भीगी लग रही है। ये जगह मुझे भी अच्छी लग रही है ।मैं पति से कहती हूँ -
‘ बाग तो सचमुच अच्छा है। मैं तो कुछ और ही सोच रही हूँ।’
‘ क्या सोच रही हो ?’
‘ यही कि अगर यहाँ थोड़ी-सी जमीन मिल जाए, यहाँ .... बाग से लगकर ,तब हम एक छोटा सा बंगला यहाँ बनवालें और छुट्टियों में कभी-कभी यहाँ रहने आया करें। शहर से अधिक दूर भी तो नहीं है यह जगह।’
‘ जमीन मिल जाए’का क्या मतलब ?अरे अगर हम चाहेंगे तो क्यों नहीं मिल जाएगी? पति की आवाज में दम्- भरा आत्मविश्वास है। ‘ पैसा हो तो क्या नहीं मिल सकता ?’
वो तो ठीक है, पर कोई बेचे तब न?’
‘ क्यों नहीं बेचेंगे ? .... दुगुना पैसा दे दूँगा, दौड़कर बेचेंगे। कोई खरीदने वाला तो मिले, गाँव में कौन खरीदता है जमीन ?... फिर इन्हें तो पैसा मिलेगा न ।’
‘ ऐसा हो सके तो, वह जो कुएँ के बगल वाली जमीन है, उसे ही खरीद लिया जाएगा । लड़कियाँ कह रहीं थी कि यह  जमीन उनकी है।..... बहुत गरीब हैं बेचारे.... रोज भोजन भी नहीं बनता इनके घर... ये जरूर बेंच देंगे। पैसे की इन्हें बहुत जरूरत होगी ... बेचारे, इनका भी भला हो जाएगा। ’
‘वैसे ये बात मज़ाक की नहीं है। तुम्हारी योजना मुझे अच्छी लग गई है। घर चलकर इस पर गंभीरता से विचार करूँगा। यहाँ यदि घर बनेगा तो गाँव वालों को भी घर बनते तक रोज़गार मिल जाएगा। यह एक तरह से इनकी सेवा होगी।’पति के जवाब से मैं गदगद हूँ।
मेरे बच्चे अब भी उन लड़कियों के साथ खेल रहे हैं। इन खेतों तथा इस बाग के बीच एक सुंदर सा बंगला अब मेरी आँखों में तैरने लगा है। शहर चलकर इस योजना पर विचार करना है। पति गाड़ी में बैठ चुके हैं । दोनों बच्चे भी अपनी-अपनी जगह ले चुके हैं । गाड़ी में बैठने से पूर्व मैंने बड़ी लड़की को पचास रुपये की नोट देते हुए कहा ..‘ मेरे बच्चों ने तुम्हारे आम ले लिये थे न, इसलिए ये पैसे रख लो।’नोट हाथ में पकड़ते हुए लड़की ने जवाब दिया ‘ पहले  मैं बाबा से पूछकर आती हूँ, आप यही रुकिएगा।’
मैंने कहा ‘ रख लो, पूछने की क्या बात है।’किन्तु मेरी बात को अनसुना कर वे दोनों लड़कियाँ अपने घर की तरफ भागीं ।
आम पन्द्रह-बीस रुपये से अधिक के नहीं रहे होंगे। मैं पचास रुपये  दे रही हूँ, गरीब हैं बेचारे, खुश हो जाएँगे। ऐसी अनेक बातें सोचते हुए मैं अपनी उदारता पर मन ही मन इठला रही हूँ। तभी वे दोनों लड़कियाँ दौड़ते हुए मेरे पास पहुँची और पचास का नोट मेरी तरफ बढ़ाते हुए उन्होंने कहा ‘ बाबा कह रहे हैं, हम पैसे नहीं लेंगे। अगर हम इन आमों को बेच रहे होते और तब आपने खरीदा होता ,तो हम जरूर पैसे लेते। आपने तो अपनी इच्छा से जबरदस्ती मेरे आमों को उठाया है, इसके पैसे हम नहीं लेंगे।’
मेरी दानशीलता को धक्का लगा। अति उत्साह में मैं यह नहीं सोच पाई थी कि चीजों को जबरदस्ती उठा लेना खरीदने की श्रेणी में नहीं लूटने की श्रेणी में आता है, और कोई खुद्दार व्यक्ति लूटी हुई वस्तु की कीमत पाकर खुश नहीं होता।
नोट हाथ में पकड़ कर मैं बुझे मन से गाड़ी में बैठ गई । पति के चेहरे पर मायूसी है। उन्होंने गाड़ी स्टार्ट कर दी। बाग पीछे छूट रहा है और बाग की बगल में हमारे दर्प का बंगला बिना बने ही धराशायी हो गया है।
लेखक परिचय: डॉ. आशा पाण्डेय, शिक्षा: एम् .ए .,पी. एच . डी . (प्राचीन इतिहास)
प्रकाशन: 1 धूप का गुलाब, (कहानी संग्रह), चबूतरे  का सच (कहानी संग्रह), बादल को घिरते देखा है (यात्रा वृत्तांत), तख्त बनने लगा आकाश (कविता संग्रह), खिले हैं शब्द  (हाइकु संग्रह), ये गठरी है प्रेम की (दोहा संग्रह)
विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में कहानियाँ, लेख, यात्रा वृत्तांत एवं कविताएँ प्रकाशित। कई कहानियाँउडिय़ा एवं मलयालम भाषा में अनूदित, प्रकाशित, प्रसारित।
संपर्क : 5, योगिराज शिल्प , स्पेशल आई . जी . बंगला के सामने ,कैम्प, अमरावती –444602 (महाराष्ट्र )
दूरभाष- 0721 –2660396 , मो.- 09422917252 , 9112813033,  Email-…ashapandey286@gmail.com 

किसे वोट देंगी आप ?

किसे वोट देंगी आप ?
 डॉ. रत्ना वर्मा
अब चुनाव प्रचार दरवाजे पर है। प्रत्याशी हाथ जोड़ रहे हैं और अखबार वाले मतदाताओं को टटोल रहे हैं।
जहाँ ब्यूटीपार्लर का विज्ञापन दीवार पर है, ठीक उसके नीचे हाथी छाप को प्रचंड बहुमत से विजयी बनाने का चुनावी विज्ञापन अपना दावा ठोक रहा है। व्हील छाप साबुन के व्हील का उपयोग कार्यकर्ताओं ने जिस सूझबूझ के साथ किया है, उससे तबियत प्रसन्न हो रही है। व्हील तो जहाँ था वहीं है, लेकिन साबुन पर सफेदा पोत कर कार्यकर्ताओं ने प्रत्याशी का नाम लिख दिया है और पढ़ने से लगता है सफेदी और चमक के लिये व्हील छाप साबुन ही उपयोग करें। महिलाओं में अत्यंत लोकप्रिय साबुन “व्हील छाप साबुन।”
मतदाताओं को टटोलने का सीजन शुरु हो गया है। मैंने भी सोचा कि इसी बहाने कुछ महिलाओं को टटोल लूँ।
एक बड़ा -सा मकान, गेट पर लिखा था-कुत्तों से सावधान। चुनाव चल रहा है। इसलिए मुझे इस तरह का नया विज्ञापन अच्छा लगा। मैं ठिठक गई। कोई बाहर दिखे तो मैं किसी महिला को टटोलूँ। मैं सोच ही रही थी कि एक आदमी दिखा। मुझे असमंजस में खड़ा देख कर बोला, आइए... अंदर आ जाइए। बोर्ड देखकर डर रही है आप? अभी इस बंगले में कुत्ता नहीं है। मेम साहब ने अलशेसियन पिल्ले का आर्डर बुक कर रखा है।
मेरी इच्छा हुई कि उससे कहूँ कि जब इस घर में स्वागत के लिए आपके अलावा और कोई नहीं है तो फिर इस बोर्ड की क्या जरूरत है? लेकिन उसने बीच में ही कहा, बोर्ड लगा देने से चोर और भिखारियों का डर नहीं रहता.... वे इस दरवाजे पर नहीं आते। आप तो अंदर आ जाइए।
गेट के बंगले की दूरी पार करते हुए मैं चुपचाप चल रही थी। थोड़ी दूर वह आदमी मेरे साथ चला। फिर बोला, आप मेम साहब से मिल लीजिए... मुझे गमलों में पानी डालना है।
मेरे कालबेल दबाते ही पक्षियों के चहचहाने की आवाज गूँज उठी। घरेलू- सी दिखने वाली एक महिला ने दरवाजा खोला और बोली, क्या है?
मैंने कहा- मेम साहब से कह देना टीवी वाली आई है।
टीवी की बात मैंने इसलिए की कि अपनी तस्वीर टीवी पर दिखाए जाने के लालच में मेरा आदर सत्कार सही होगा। मैं बैठक में आ गई। थोड़ी देर बाद नौकरानी नाश्ते की प्लेट और चाय ले आई तभी मेरी समझ में आ गया कि अपना इम्प्रेशन ठीक जम गया है। वह बोली, मेम साहब तैयार हो रही है... आप तब तक चाय लीजिए।
मैं जानती हूँ कि बिना सजे धजे वे बाहर नहीं आएँगी। महिलाओं के साथ यही प्राब्लम है। चाहे उन्हें मतदान में जाना हो या किसी शोकसभा में, वे बिना मेकअप किए नहीं जाती। टीवी सीरियलों ने महिलाओं को कम से कम इतना जागरूक तो किया ही है।
मेम साहब आधे घंटे के बाद चेहरे पर मुस्कान बिखेरती हुई बैठक में आ गईं। मैंने औपचारिकता और शिष्टाचार के बाद सीधा सवाल किया, आप किस पार्टी को वोट देंगी?
मेरे इस प्रश्न से वो बौखला गई। इस प्रश्न के बदले मुझे उनकी साड़ी की तारीफ करनी थी और कहना था कि आप कितनी स्मार्ट लग रही है। ऐसे प्रश्न महिलाओं को हर मौसम में प्रसन्न रखते हैं।
वह बोली- क्या पार्टी? किटी ? मैंने कहा लगता है आप किसी पार्टी में जा रही हैं?
इस बार मेरा प्रश्न सुनकर वे खुश हुई। बोली- ये पार्टियाँ न हो तो हम जैसी महिलाओं का टाइम पास ही न हो।
मैंने फिर पूछा- इस बार चुनाव में वोट आप किसे देंगी?
वह बोली- अभी कुछ सोचा नहीं है...मिसेज भटनागर और मिसेज़चंद्रा से डिसकस करेंगे आज की किटी पार्टी में। मूड हुआ तो चले जाएँगे वोट देने...
मैंने सोचा ऐसी जागरुक महिला मतदाता के पीछे समय बर्बाद करना ठीक नहीं। यही सोच कर मैंने कहा- अच्छा, आप पार्टी में जाइएमैं चलती हूँ।
वह बोली, लेकिन टीवी... बात पूरी होने के पहले ही मैं बंगले से बाहर आ गई।
थोड़ी दूर पैदल चलने के बाद एक महिला अपने घर के दरवाजे पर खड़ी बार-बार सड़क की ओर देख रही थी। मैंने सोचा उन्हें भी टटोल लूँ।
मैंने पूछा- किसी का इंतजार कर रही हैं आप?
वह बोली, जी हाँ... बच्चों का स्कूल से आने का समय हो गया है और ‘वे’ भी आते ही होंगे। जैसे ही उनकी गाड़ी और बच्चों का रिक्शा दिखेगा, मैं दूध और चाय गैस पर रख देती हूँ; क्योंकि इसमें यदि थोड़ी भी देर भी हुई तो वे पूरा घर सिर पर उठा लेते हैं।
मैं महिलाओं से इसी गृहस्थी के किस्से से डरती हूँ। कहीं यह किस्सा आगे चला तो मेरा पूरा समय बर्बाद हो जाएगा। यही सोचकर मैंने उनसे सीधा सवाल किया, इस बार आप चुनाव में किसे वोट देंगी?
तभी बच्चों का रिक्शा आता दिखाई दिया। वह बोली- बच्चे आ गए, आप अंदर आकर बैठिए मैं चाय चढ़ा देती हूँ।
मैंने कहा- लेकिन मुझे यह तो बताइए कि आप वोट किसे देंगी?
वह बोली- वे जिसे कहेंगे उसे ही दे दूँगी... हम औरतों को तो जिंदगी भर किचन में रहना है। शादी के इतने साल बाद भी मैं आज तक उनका ही कहना मानती हूँ। फिर वोट से हमें क्या करना है? किसी को भी दें, महँगाई कम होने वाली नहीं है।
मैं सोच रही थी कि महिलाओं को लेकर लंबे- लंबे सर्वेक्षण होते हैं और आज भी महिलाएँ सोचती हैं कि उनकी जिम्मेदारी किचन तक ही सीमित है। बच्चों को दूध गरम कर देने और पतियों के ऑफिस से लौटने के बाद गरम चाय पिलाने तक ही।
थोड़ी दूर जाने के बाद झुग्गी झोपडियों वाला मुहल्ला शुरु हो गया। मैंने सोचा इन गरीब महिलाओं को भी टटोल लूँ। एक झोपड़ी के सामने तीन चार धूल से सने गंदे बच्चे खेल रहे थे। एक महिला उन्हें गालियाँ दे रही थी। थोड़ी देर बाद उसका पति झोपड़ी से बाहर आया ,तो महिला उसे भी कोसने लगी। गुस्से में बोली- जब बच्चों का पेट नहीं भर सकते थे ,तो इतने बच्चे क्यों पैदा करवा दिये? मैं दिन भर काम करते मर रही हूँ और तुम दिन भर घूमते हो और रात को पीकर पड़े रहते हो... तुम्हें ना मेरी फिकर है और ना बच्चों की।
पति मुँह झुकाए चुपचाप चला गया।
मैंने सोचा देश के सही और निर्णायक मतदाता तो यही हैं। जिसे वोट दे देंगे, वे ही सरकार बना लेंगे और पाँच साल तक मौज करेंगे। मैं उसकी झोपड़ी के सामने रुक गई। मुझे देखकर वह बोली-क्या है? कौन सी पार्टी वाली हो? जल्दी बोलो... मुझे बहुत काम है।
मैंने पूछा- तुम्हारा पति कुछ काम नहीं करता है?
वह बोली- तुमको क्या करने का? मेरा पति है... काम करे कि नई करे। तुम जल्दी बोलो- क्या तुम्हारी पार्टी काम दे देगी? कोई काम देगी तो बोलो... अभीचपइसा दे दो तभीच वोट देंगे, तुम्हारी पार्टी को।
मैं समझ नहीं पा रही थी कि उसे किस तरह टटोलूँ। मैंने कहा– मैं तो पूछने आई थी कि तुम किसको वोट दोगी।
वह गुस्से में बोली- तुमको पहलेच बोला ना कि जो पईसा देगा उसीच को वोट देने का... बोल, दिलाती क्या पईसा? अभी रोज पार्टी वाला आता है लेकिन पईसा कोई नहीं देता। जो पहले देगा, उसी को वोट दे दूंगी... इस चुनाव में बच्चों का कपड़ा सिलवाना है। जल्दी बोल, कित्तापईसा देती है?
मैं उसकी बात का जवाब दिये बिना ही आगे बढ़ गई। समय कम है, मुझे अभी भी महिलाओं की मानसिकता को टटोलना है। अखबार के लिये महिलाओं की जागरूकता पर रपट तैयार करनी है।

प्रति व्यक्ति शराब की खपत दोगुनी हुई

प्रति व्यक्ति शराब की खपत दोगुनी हुई
- भारत डोगरा
वर्ष 2005 से 2016 के बीच भारत में प्रति व्यक्ति शराब उपभोग दुगने से भी ज़्यादा हो गया है। 2005 में भारत में प्रति व्यक्ति अल्कोहल उपभोग 2.4 लीटर था जबकि वर्ष 2016 में यह बढ़कर 5.7 लीटर हो गया। यह तथ्य विश्व स्वास्थ्य संगठन की वर्ष 2018 की रिपोर्ट में सामने आया है।
भारत की गिनती अब उन देशों में हो रही है जहाँ शराब की खपत बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। ये आँकड़े बहुत दुखद हैं, पर उनके लिए बहुत आश्चर्यजनक नहीं हैं जो वर्षों से दूर-दूर के गाँवों में भी शराब के ठेके खोलने की सरकार की नीति के विरुद्ध आवाज़ उठाते रहे हैं। यह बहुत दुखद स्थिति है कि गुजरात, बिहार व उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों को छोड़ दें तो शेष देश में सरकारों की अपनी नीतियों ने शराब की खपत को बढ़ाया है। शराब उद्योग व व्यापार से जुड़े व्यक्तियों को बहुत शक्तिशाली व धनी बनने दिया गया है और शराब उद्योगपतियों व व्यापारियों के राजनीति में सम्पर्क व सक्रियता तेज़ी से बढ़ी है। शराब उद्योग भ्रष्टाचार का एक बड़ा स्रोत है।
इतना ही नहीं, मौजूदा प्रवृत्तियों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि वर्ष 2025 तक भारत में प्रति व्यक्ति अल्कोहल की खपत में 2.2 लीटर वृद्धि और हो जाएगी। ये आँकड़े 15 वर्ष से अधिक आयु की जनसंख्या के संदर्भ में एकत्र किए गए हैं। संगठन ने विश्व स्तर की स्थिति पर चिंता प्रकट करते हुए बताया है कि इस समय विश्व में 230 करोड़ व्यक्ति शराब पीते हैं। जिसमें 15.5 करोड़ युवा 15-19 आयु वर्ग के हैं, जो कि इस आयु वर्ग के 27 प्रतिशत हैं। (स्रोत फीचर्स)

प्रेरक

आईने में हम
रचना गौड़ ‘भारती’
शब्दों का इस्तेमाल जब आवाज़ के साथ होता है तो उसे बोलना कहते हैं। बात दोनों प्रकार की होती है एक प्रभाव डालने वाली और दूसरी बिगाड़ने वाली। संचार की मुख्य क्रिया बोलना है। विचार विनिमय जीवन में अति आवश्यक है, दूसरों के विचार जानने और अपने विचार उन तक पहुँचाने के लिए। ये कोई नई बात नहीं है। यह तो सब जानते हैं, यहाँ हम बात करेगें मूक प्रतिक्रिया, मौन या चुप रहने पर। कहते हैं शब्द जितनी बात नहीं समझा सकते उतनी खामोशी बयां कर देती है- खामोशी बोलती है।
            बड़े बुजुर्गों को अक्सर कहते सुना है कि जब कोई झगड़ रहा हो तो उस समय चुप हो जाओ, बात आगे नहीं बढ़ेगी। मगर लोग वाद-विवाद, बहस आदि में अधिक विश्वास करते हैं। दूसरों को दबाकर जीतना एक शगल बन गया है। यहाँ सवाल हार-जीत का नहीं, बात की प्रभावोत्पादकता का है। किसी के साथ संवाद में भिड़ जाना समझदारी नहीं होती। बात को समझने या समझाने के लिए कुछ देर मौन या चुप्पी आवश्यक होती है। बात में इतना प्रभाव होना चाहिए कि आप दूसरे को समझा सकें, नहीं तो वहाँ चुप हो जाना बेहतर होता है। चुप हो जाने में यहाँ मतलब यह बिल्कुल नहीं है आप हार गए या आपकी बात में दम नहीं है। इसमें कुछ बिन्दु काम करते हैं जैसे-
1. आपने हार स्वीकार कर ली इसलिए चुप हैं-
जब कोई भी दो व्यक्ति आपस में उलझ जाते हैं और दोनों अपनी-अपनी बात पर अडिग रहते हैं तो स्थिति झगड़े का रूप ले लेती है। ऐसी परिस्थिति में एक जने को चुप हो जाना ठीक रहता है। बोलने वाला कुछ देर में अपनी भड़ास निकालकर या तो खामोश हो जाएगा या आप उससे कुछ समय के लिए दूरी कायम कर लें। स्थिति को सही अंजाम देना हमारे अपने हाथ में होता है। हाँ! यह सही है सामने आने वाला कभी-कभी यह सोचकर खुश हो जाता है कि ये चुप है मतलब इसने हार मान ली या मैंनें इसे हरा दिया। छोटी सी बात को तूल देकर लम्बा खींचना कोई समझदारी नहीं होती। चुप रहने वाला उस समय एक समझदार, शालीन व सभ्यता के दायरे में होता हैं। बोलकर चुप कराने वाला व्यक्ति अपनी वाचालता, घमण्ड और बड़बोलेपन के मद में खुश हो जाता है। दोनों व्यक्ति शांत होकर खुश हैं, मगर अपनी-अपनी सोच में। जैसे कोई दान लेकर खुश होता है तो कोई दान देकर। इंसानियत का तकाज़ा है कि जहाँ तक संभव हो क्लेश को दूर रखना चाहिए। ये एक अच्छे इंसान के गुण होते हैं। बात को आई गई करना भी एक कला है। दुनिया एक रंगमंच और हर इंसान एक कलाकार है। कोई भी कला सुख शांति व समृ़द्धि प्रदान करती है। यह बात व्यक्तिगत रूप में, सामूहिक रूप में व सामाजिक रूप में स्पष्ट नज़र आती है। हमारा जन्म गीली मिट्टी के लौंदें के समान होता है जिसे हमारे संस्कार, हमारा परिवेश व हमारी शिक्षा तराश-तराश कर एक अच्छा व्यक्ति, अच्छा नागरिक बनाते हैं। यहीं से उचित व अनुचित की कीलें हमारे मन व मस्तिष्क में ठुकनी आरम्भ होती हैं। जिसके जीवन में जितनी कड़वाहट होती है, उसी अनुपात में कीलें बढ़ती जाती हैं। कीलें यानिकुण्ठाएँ। जो धीरे-धीरे आपके व्यवहार पर हावी होती जाती हैं। जितना कुण्ठित व्यक्ति होगा वह दूसरों को उतना ही चुभेगा। आपका व्यवहार व आचरण एक कंटीले वृक्ष में परिवर्तित हो जाएगा। आप तब इंसान न होकर एक कैक्टस बन जाएँगें। आपको पता है वनस्पति में कैक्टस को घर में रखना भी अशुभ माना जाता है। यहाँ इंसान को कैक्टस इसलिए कहा है क्योंकि हमारी बातें, हमारी उपस्थिति और हमारा परिवेश अशांतिकारक, दूसरों को व्यथित करने वाला और असंतोषजनक है तो हम एक कैक्टस ही हैं।
            देखा आपने कभी-कभी की चुप्पी कितनी असरकारक होती है। जब मॉफी माँगने से कोई छोटा नहीं होता तो चुप रहने से छोटा या गलत कैसे हो सकता है। चुप रहकर वो प्रयासरत होता है बात को संभालने में, सामंजस्य बनाने और शांति स्थापित करने में।
2. आपकी बात गलत थी इसलिए चुप हैं-
वाक्युद्ध या द्वन्द में चुप हो जाना श्रेष्ठ है। सामने वाला चाहे यह सोच ले कि शायद आपको समझ आ गया है कि आपकी बात गलत थी, इसलिए आप चुप हो गए। वाद-विवाद या कोई बात आखिर क्या है-हमारे विचार। सबको अपना पक्ष और अपने विचार सदा सही लगते हैं। मगर क्या ऐसा होता है? यदि दोनों पक्ष सही होगें तो विवाद किस बात का? इसे हम ऐसे देख सकते हैं कि पक्ष और विपक्ष दोनों के विचार आपस में नहीं समझे जा रहे। दोनों को अपने विचार सही लग रहे हैं और दूसरे के गलत। कैसी भी परिस्थिति हो झगड़ा छोटा हो या बड़ा, एक बार स्वयं को दूसरे की जगह रखकर उसका दृष्टिकोण समझने की चेष्टा करनी चाहिए शायद कुछ मामला समझ आ जाए। असामान्य स्थिति में चुप रहना आपका गुण होगा, आपकी समझदारी व इंसानियत का तकाज़ा भी।  सही और गलत जब हम अपने अहम् को दूर रखकर दूसरे के स्थान व दूसरे की नज़र से देखते हैं तो स्वतः ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है।
3. आप अपनी बात समझाने में सक्षम नहीं इसलिए चुप हैं -
चुप रहकर स्थिति को नियंत्रण में बनाना, बोल-बोलकर उलझने से कहीं बेहतर होता है। कभी-कभी चुप होने का सामने वाला गलत अर्थ भी निकाल लेता है। जैसे आप अपनी बात समझा नहीं पा रहे इसलिए चुप हो गए। आपके पास चुप होने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। शिक्षित व समझदार इंसान के लिए इशारा ही काफी होता है। चुप्पी में एक अलग ही आनन्द है, विश्वास है और शांति है। चुप रहकर बात नहीं बढ़ाना अच्छा है वरना जो सामने आएगा वो शायद बहुत बुरा हो। जो आपके रिश्तो और सम्बंधों को क्षति पहुँचाने वाला हो। आपने ऐसा होने नहीं दिया अतः आपको आनन्द की अनूठी अनुभूति है। विश्वास इस बात का कि प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती अतः  कभी न कभी सच जरूर सामने आएगा जिससे सामने वालों की आँखों से गलतफहमी का पर्दा स्वतः ही उठ जाएगा। जब सारी बात ही साफ हो जाएगी तो शांति कहाँ जाएगी वो आपके पास ही पनाह लेगी। बात समझने या समझाने के लिए दिमाग शांत होना चाहिए। क्रोध में हम न समझ पाते हैं ना समझा पाते हैं। यहाँ इसलिए चुप्पी का विशेष अर्थ एवं महत्व सिद्ध होता है।
4. मानसिक स्तर में अन्तर
            जब कोई एक व्यक्ति लगातार बोले और दूसरा चुप हो जाए तो मामला स्वतः कुछ समय में ठण्डा पड़ जाता है। सामने वाला या बोलने वाला तीव्रता से अपनी बात के साथ अनर्गल बातों को जोड़कर आपको मानसिक पीड़ा पहुँचाने का प्रयास करे तो समझ लेना चाहिए उसका मानसिक स्तर गिर रहा है। इस वक्त किसी भी प्रकार वो आपकी बात नहीं समझेगा। दो व्यक्तियों की मस्तिष्क तरंगों की समानता या असमानता उनका स्तर कहलाता है। लेवल अलग-अलग होने पर विचारधाराएँ भिन्न बनतीं हैं। विचारों का टकराना ही झगड़े का कारण है। ऐसे में चुप रहना समझौते की परिधि बन जाता है। शिक्षित व्यक्ति का व्यवहार उसके लेवल को तय करता है। यहाँ शिक्षित का मतलब डिग्री प्राप्त कर लेने से न होकर बुद्धि के विकास, मानसिक विकास से है।
5. शिक्षा का अभाव, ज्ञान चक्षु का बंद होना
            वाद-विवाद में शिक्षा की अहम् भूमिका होती है। किसी भी विषय क्षेत्र में इंसान अपने ज्ञान के अनुसार बहस करता है। कभी-कभी गलत बात पर अड़ जाना भी अज्ञानता का ही प्रतिबिम्ब होता है। जिसे जितना मालूम होगा उतना ही बोलेगा। विषय की सम्पूर्ण जानकारी के बिना अपनी बात लेकर विवाद करना अनुचित है। यदि सामने वाले से हमारी बात अलग है, तो शांत मन मस्तिष्क से एक बार उसकी पूरी जानकारी हासिल कर लेनी चाहिए। कभी-कभी कुछ बातें नियमोंके अंर्तगत होते हुए भी गलत हो जाती हैं जिन्हें हम सच समझते रहते हैं। समय परिवर्तन के साथ नियम परिवर्तन का ध्यान भी रखना चाहिए। जिस नियम के बल पर हम अपनी बात पर अडिग हो रहें हैं उसके नियम भी बदल सकते हैं। जिनकी हमें जानकारी नहीं होती। ऐसी स्थिति में हम सर्वथा गलत हो जाते हैं। दूसरों की बात को किसी पूर्व धारणा के आधार से नहीं जोड़कर बुद्धि से आँकना जरूरी होता है। ऐसी परिस्थिति में चुप हो जाना बेहतर है, ये समझ कर कि सामने वाला अज्ञानता में है या उसके ज्ञान चक्षु बन्द हैं। सत्य को देखने के लिए ज्ञान चक्षु का खुला रहना अति आवश्यक है। यहाँ पूर्वाभास काम नहीं करता। आपकी बात यदि सही है तो उसे कोई समझे या ना समझे क्या फ़र्क पड़ता है। सत्यमेवजयते। जीत हमेशा सत्य की होती है। सत्य को बाहर आने में देर जरूर लगती है मगर सत्य बाहर आकर रहता है। उस समय सामने वाला यदि अच्छा इंसान है तो अपनी गलती मान लेगा अन्यथा गरूर व अहम् के मद में स्वीकार नहीं करेगा। मंुह से चाहे ना स्वीकारे लेकिन उसकी अर्न्तआत्मा जरूर जान लेगी कि वह गलत है। अतः धैर्य का आश्रय लेकर चुप रहना वक्त की मांग बन जाता है।
6. इंसानियत के कद का बौना होना
            गुण या अवगुण इंसान के होते हैं। जब किसी में इंसानियत ही नहीं होगी तो उसके गुणों और अवगुणों को हम किस कसौटी पर उतारेंगें। यदि आप उत्तरोत्तर अच्छे गुणों के विकास में लगे हैं तो आपके अंदर के इंसान का कद स्वतः बढ़ेगा। इसके विपरीत गुणों का हृास आपके इंसानी कद को बौना कर देगा। कितने लोग ऐसे हैं जो स्वार्थ को परे रख इस बात की चिन्ता करते हैं। ये जुड़ा होता है आपकी नैतिकता, आत्मा के उत्थान या पतन से। एक अच्छी आत्मा अच्छे इंसान में होगी। आजकल हम बाह्य उन्नति में दौड़ लगा रहे हैं। स्वार्थ के आगे घुटने टेक रहे हैं। हमें आवश्यकता है नैतिक उत्थान की। अन्दर से महान बनने की। जब हम किसी ऐसे धावक व्यक्ति से टकराएँ तो यहाँ चुप हो जाना समय की माँग होगी। हर तालाब पानी के ठहरने पर साफ़ नज़र आता है (जैसे हम अच्छी स्थिति में खुश व शांत) उसमें पत्थर गिरने से लहरें, नीचे बैठी गंदगी को हिलाकर पानी को गंदला कर देती हैं। ये तो खुला तालाब है, मगर हमारा मन बहुत गहरा है तथा इसको अंदर से साफ रखना हमारे हाथ में है। साफ मन का सरोवर कभी किसी के भड़काने, उकसाने से गंदा नहीं हो सकता। गन्दे पानी में साफ पानी को कितना भी मिलाएं पानी गन्दा ही होगा। जबकि साफ पानी में केवल एक मग्गा गंदा पानी उसे गंदा कर देता है। हमें अपनी चुप्पी से इस मिलावट को बंद करना होगा। यहाँ चुप होने वाला दूसरे के साथ नहीं स्वयं के साथ अच्छा करेगा। परिस्थिति कुछ भी हो कभी इंसानियत का कद बौना नहीं होना चाहिए।
7. लिंगानुगत भेद का फायदा उठाना
            अक्सर स्त्री व पुरूष के द्वन्द में, पुरूष को कहते सुना है कि तुम चुप हो जाओ। पुरूष पिता, पति, पुत्र या अफसर कोई भी हो सकता है। पुरूष अपने अहम् के आगे न तो नारी की सुनना चाहता है, न ही उसे बोलने देता है। क्या उसे डर होता है कि वह ज्ञान व समझ में उससे हार गया तो? स्त्री भी एक इंसान है, शिक्षित व समझदार है, जब नौकरी करते हुए उसके विचार वह बाह्य क्षेत्र में बेझिझक देती है तो वही विचार घर में गलत कैसे हो सकते हैं? यहाँ भी अन्तर होता है दृष्टिकोण का, हम विषय से भटक जाते हैं और रह जाती है पावर। वह पावर जो घर के मुखिया की है, एक पुरुष की है, उसके अहं की है। ऐसी स्थिति में एकमात्र उपाय चुप रहना ही क्लेश से दूर ले जाता है। नारी एक नदी है जो बहती है। उसके जल में अच्छे बुरे सब तरह के विचार आते हैं। पुरूष शुद्ध जल का फिल्टर है मगर उसकी फिल्टर वाली कैण्डल जल्दी चोक हो जाती है। यह स्वभावगत अन्तर है। बात को उसकी गरिमा से मानना चाहिए न कि आपस के ताकत प्रदर्शन से। जरूरी नहीं होता कि पुरूष सर्वदा सही और नारी गलत हो। कभी-कभी स्त्री भी सही हो सकती है, ये वहाँ होता है जहाँ उसको सुना जाता हो, बात का मूल्यांकन होता हो। जहाँ ऐसा नहीं होता वहाँ चुप रहना एक अच्छा अस्त्र होता है।सही बात की सत्यता कभी न कभी, कहीं न कहीं से सत्यापित हो ही जाती है।
8. संस्कार व रिश्तों का दबाव बनाना
            कभी-कभी विचारों की टकराहट उम्र व रिश्तों में बड़ों से हो जाती है। उस वक्त उम्र व रिश्तों का लिहाज़ कर हमें चुप हो जाना पड़ता है। यहाँ भी बात की सत्यता या उसकि मूल्यांकन को परे रखना गलत होता है। जब हम बड़ों से विचार विनिमय करते हैं और उनके विचार हमसे भिन्न होते हैं, तब भी संस्कारों के दबाव के कारण चुप रहना हमारी मज़बूरी बन जाती है। सभी लोग यदि बात की सत्यता के संदर्भ से बात करें तो शायद कहीं झगड़े ही नहीं होंगें। मैंने ऐसा कह दिया, तुम मानो। जैसे इनके कहे शब्द पत्थर की लकीर हो। एक ही शब्द जब अलग-अलग परिस्थिति में इस्तेमाल होता हो तो उसका अर्थ भी समयानुसार बदल जाता है। अच्छे व सही विचार जरूरी नहीं कि सिर्फ बड़ों के पास हों, उनपर बड़ों का एकाधिपत्य हो ऐसा बिल्कुल नहीं होता। छोटों के विचार भी सराहनीय हो सकते हैं, उनका सम्मान करना चाहिए। लेकिन जहाँ बात की महत्ता से ऊपर बड़प्पन का राज़ हो वहाँ चुप रह जाना ही श्रेष्ठ है। जहाँ संस्कार व रिश्तों का दबाव होता है वहाँ संवेदनाएँ निष्क्रिय हो जाती हैं। बड़ों के सामने चुप होना उनका सम्मान होता है मगर तब तक ही जब तक सत्य पर आँच नहीं आए। विचारों का आदान प्रदान ही संचार क्रिया है जो इन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी संवाहित करती है। बड़ों के आगे चुप रहकर उनकी इज्ज़त करना जरूरी होता है, यहाँ कोई हार जीत नहीं होती। अपनी बात धैर्य रख विनम्रता से उन्हें स्मरण कराई जा सकती है। बशर्तें आपकी बात में वज़न होना चाहिए।
9. पद-प्रतिष्ठा का सहारा लेना
            हमारे समाज में चाहे जातिगत अन्तर कम हो रहा है लेकिन पद प्रतिष्ठा का अन्तर साफ़ नज़र आता है। आज किसी अफसर के आगे कर्मचारीगण का मौन रहना अनुशासन के अर्न्तगत आता है। व्यवसाय में मालिक व मज़देरों में अन्तर देखा जा सकता है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की बात कितनी भी सही होगी, वह अफसर के आगे चुप रहता है। ऐसा होना नहीं चाहिए। सत्य बात कहने में किसी से नहीं डरना चाहिए। मगर बात अनुशासन की हो तो चुप रहना बेहतर होता है। ऐसी परिस्थिति में यदि अपनी बात अपने अफसर के समक्ष रखनी हो तो बड़े साफगोई ढंग व विनम्रता के साथ प्रस्तुत करनी चाहिए। उच्चपदाधिकारी या बॉस से आप अपनी बात जबरदस्ती नहीं मनवा सकते। विनय पूर्वक अपनी बात को सिद्ध करें अन्यथा तनाव झेलने को तैयार रहें। वक्त पर अपनी बात कहना एक हिम्मत व कौशल की बात होती है। बस, बात कहने का तरीका सही होना चाहिए। वरना विपरीत स्थिति में चुप रहना सही चुनाव होगा। चुप रहने में बड़ी ताकत होती है। जितना समय लेकर, सोच विचार के उपरान्त बात की प्रस्तुति होती है उसमें उतना ही निखार आ जाता है। चुप्पी कमज़ोरी नहीं बलकि तूफान के आने से पूर्व की खामोशी भी होती है। चुप्पी , किसी बड़े फैसले या बड़ा कदम उठाने से पूर्व भी होती है। चुप्पी अपने आप में एक ताकत है, जो आपकी टूटी हिम्मत को संग्रहित कर, समय आने पर प्रयुक्त होती है।
10. चुप्पी का जवाब वक्त के खेमे में
            अपने चुप रहने से मन में दुखी न हों क्योंकि आपकी चुप्पी का जवाब वक्त देता है। समय बड़ा बलवान होता है। जो बात आप कह नहीं सके उसे समय अपने अनुरूप सामने ला देता है। किसी को शब्दों में जवाब देकर कड़वाहट ही पैदा होती है, रिश्ते खराब हो जाते हैं। आप इंतज़ार करिए वक्त सब समझा देगा, जिससे सामने वाला या तो शर्मिन्दा होगा या अफसोस करेगा। व्यवहार सोच समझकर करना चाहिए।
सम्पर्कः 304,रिद्धि सिद्धि नगर प्रथम, बूंदी रोड, कोटा राजस्थान., मो. 9414746668

अनुक्रिया एवं प्रतिक्रिया

अनुक्रिया एवं प्रतिक्रिया
- विजय जोशी
(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल)
जीवन में हमारे साथ कोई घटना घटित होने पर केवल दो ही स्थिति उभरती हैं, प्रथम यह कि या तो हम सामने वाले के प्रति को अनुकूल क्रिया व्यक्त करते हैं या फिर प्रतिक्रिया अभिव्यक्त करते हैं.  इस में पहलेवाली स्थिति सकरात्मक या स्वस्थ है जब कि दूसरी ऋणात्मक या अस्वस्थ। पहली में जहाँ  आशावाद झलकता है, जो अंतत: स्थिति को ठीक से पूरी होने या सुलझाने में सहायता करती हैं वही दूसरी न केवल उसे उलझा देती है बल्कि कभी कभी बेहद कष्टकारी और विध्वंस का कारण भी बन सकती है।
एक बार एक रेस्टोरेंट में एक काक्रोच कहीं से आकर अचानक एक महिला पर जाकर बैठ गया। वह डरकर चीख उठी और आतंकित होकर कूद-फांद करने लगी। उसके दोनों हाथ किसी भी तरह कांक्रोच से छुटकारा पाना चाहते थे।
 उसकी प्रतिक्रिया इतनी तीव्र थी कि समस्त उपस्थित समूह भय से भर गया।
किसी तरह उसने काक्रोच से छुटकारा पाया, लेकिन अब वही काक्रोच अब दूसरी महिला को उपकृत कर रहा था। अब उसके मंच पर दूसरी महिला भी वही दृश्य दोहरा रही थी। इस तरह पूरा समूह इस प्रक्रिया में नृत्य मग्न हो गया।
 तभी वहाँ पर एक वेटर मदद के लिये आगे आया। अपनी रिले रेस के तहत अब वही काक्रोचवेटर की भी सवारी कर रहा था, लेकिन वेटर निर्भय होकर खड़ा रहा तथा उस प्राणी का व्यवहार अपनी कमीज पर देखा और स्थिति थोड़ी शांत हुई तो आत्मविश्वास पूर्वक उसे पकड़ा और होटल के बाहर छोड़ आया।
आईये अब घटना का विश्लेषण करें। क्या इस दृश्य के लिए वह अदना सा काक्रोच उत्तरदायी था, तो फिर वेटर क्यों नहीं घबराया। वेटर ने तो पूरी निपुणता से अपने काम को अंजाम दिया था।
दरअसल यह काक्रोच नहीं बल्कि उसके कारण मानस में जो उथल-पुथल हुई उस स्थिति को ढंग से निपटाने की अयोग्यता का उदाहरण था।
 कई बार हम अपने वरिष्ठ या पत्नी या बड़ों की झल्लाहट या डाँट से परेशान हो जाते हैं। वास्तव में तो यह उस परेशानी को निपटा पाने की हमारी योग्यता के अभाव की सूचक है। समस्या से अधिक तो हमारी उसके प्रति प्रतिक्रया हमारी परेशानी का मूल कारण है।
मतलब एकदम साफ है हमें जीवन में तुरंत बगैर सोचे समझे प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए। हमें विपरित परिस्थिति में भी अनुकूल या शांति से व्यवहार करने की कला  को करना सीखना चाहिये। प्रतिक्रिया (Reaction) सदा बगैर सोची समझी प्रक्रिया होती हैं, जबकि अनुकूल क्रिया (Response) अच्छी तरह सोच समझकर उठाया गया कदम। जीवन में संबंध निर्वाह के मामलों में तो यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है ताकि हम क्रोध, चिंता, तनाव या जल्दबाजी से ऊपर उठकर सही और सामायिक निर्णय ले सकें।
सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल- 462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com