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Jan 15, 2019

मुक्तेश्वर! नहीं भूल सकूँगी तुम्हें

मुक्तेश्वर! 
नहीं भूल सकूँगी तुम्हें
डॉ. आरती स्मित
  मुक्तेश्वर ! उत्तराखंड पर्वत -शृंखला का मनमोहक स्थल!  चीड़ और देवदार से घिरा, वन का संगीत सुनाता हुआ, अपने पास बुलाता हुआ -सा!  ऊँचाई पर गर्व से सिर उठाए मुक्तेश्वर (शिवलिंग) मंदिर! अपने आप में रहस्यमय और रहस्य- भेदन करता हुआ- सा भी! लगभग 7500 फीट की ऊँचाई पर बसा यह पर्वतीय इलाका सचमुच पर्वत पर होने का एहसास देता है। प्रकृति की हरीतिम छटा जहाँ दिन को धूप से अपना रूप संवारती हैं, वहीं रात के गहरे अँधेरे में रहस्यमयी होकर दिल में खौफ़ पैदा करती है।
      सफ़र की शुरुआत दिल्ली से नैनीताल तक के लिये हुई। अवसर अंतर्राष्ट्रीय महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय एवं महादेवी सृजन पीठ द्वारा बीसवीं सदी के अग्रगण्य साहित्यकार 'भीष्म साहनी जी की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के  आयोजन में बतौर वक्ता मेरे आमंत्रण का था। संगोष्ठी बहुत अच्छी रही । ख़ासकर वर्धा विश्वविद्यालय से आईं ,इस कार्यक्रम की संयोजक शोभा पालीवाल, वरिष्ठ साहित्यकार हरिसुमनबिष्ट, हेतु भारद्वाज, ब्रजेन्द्र त्रिपाठी एवं अन्यान्य साहित्यकारों एवं शोधछात्रों ने वातावरण रमणीक बना दिया था। तीसरे दिन कुछ साहित्यकारों एवं छात्रों की टोली चली। रास्ते में चाय बागान का विस्तृत क्षेत्र देखते ही बनता था। दृष्टि की पहुँच तक ,दूर-दूर तक फ़ैले चाय के पौधे आकर्षण का केंद्र रहे। उपयोगी पत्तियाँ तोड़ी जा चुकी थीं, इसलिए वहाँ के कामगारों से मिलना न हो सका।
       
   घोड़ाखाल गोलू देवता के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। बहादुर हमें उस मंदिर की विशिष्टता बताते हुए ले चले। मंदिर के प्रवेश द्वार से जो घंटियों का ऐसा विशाल रेला देखा, मैं हतप्रभ रह गई।बहादुर ने बताया, ये सभी घंटियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि इतनी मन्नतें पूरी हो चुकी हैं, क्योंकि यहाँ गोलू देवता  के दरबार में मुरादों की लिखित अर्जी पड़ती है, सुनवाई होती है, जिसकी मन्नत पूरी हो जाती है,वह प्रतीक रूप में घंटी बाँध जाता है। यह अपनी हैसियत की बात है कि कोई बड़ी घंटी चढ़ाए या छोटी। उसने यह भी बताया कि जब घंटी टाँगने की जगह बिलकुल नहीं बचती तो छोटे और माध्यम आकार की घण्टियों को मदिर प्रशासन की निगरानी में पिघलाकर एक बहुत बड़ा घंटा का रूप दे दिया जाता है। फिर इसे कहीं ऐसी जगह बाँध देते हैं जिससे किसी को बाधा न हो। ऐसे घंटे आकर्षण का केंद्र भी होते हैं।  कई एक बहुत बड़े घंटे को कपड़े से बाँध दिया गया था, मैं उसे बजाने की असफल कोशिश करती रही, वहाँ के रहवासी ने बताया कि इसकी आवाज़ दूर तक सुनाई देती थी और लंबे समय तक गूँजती रहती थी, इसलिए बाँध दिया गया। यह सच था। बड़े घंटे की अनुगूँज मस्तिष्क में बनी रहती थी, एक तरंग दौड़ती थी.... यह असली घंटे की पहचान का सकारात्मक पहलू है। इससे ध्वनि प्रदूषण नहीं होता, वरन मस्तिष्क कुछ पल के  लिए उस तरंग के साथ हो लेता है और नकारात्मक विचारों से मुक्त हो जाता है। मैंने कई बड़े घंटे बजाए और उस तरंग को आँख बंदकर महसूस किया, यह भी कि एहसास हुआ कि माइग्रेन और  अवसाद के मरीज़ , जिन्हें शोर, भीड़ से समस्या होती है, ऐसे किसी शांत जगह में कुछ समय  रहें और इन ध्वनि तरंगों को आत्मसात् करें ,तो उन्हें आराम मिल सकता है, मूड बदल सकता है। मुख्य मंदिर तो छोटा-सा था, प्रांगण / परिसर अर्जियों से भरा था। कुछ अर्ज़ियाँ तो स्टाम्प पेपर पर दी गई थी, कुछ सादे पन्नों पर। कुछ ने अपने लिए अर्जी डाली थी, तो कुछ ने अपनों के लिए । गोलू देवता पहाड़ पर के देवता हैं।वहाँ के  महाप्रतापी राजा मृत्यु के बाद देवता के रूप में पूजे जाने लगे। उनकी महिमा का प्रमाण ये अर्ज़ियाँ और घंटियाँ थीं।
मुक्तेश्वर में, कुमाऊँ विकास मंडल का  गेस्ट हाउस शांत, सुंदर ,रमणीक परिवेश देने में सक्षम था। दोपहर के ढलते तेवर के बीच हमारी गाड़ी गेस्ट हाउस पहुँची। अपने कमरे का पर्दा हटाते ही मैं कुहुक पड़ी। कमरे के बाहर बड़ी-सी बालकनी थी। सामने उन्नत मस्तक किए मुस्कुराता हिमालय ! बर्फ़ कम थी, हिमालय का हिमरहित चट्टानी शरीर , उसकी पूरी शृंखला आँखों के सामने थी। मैं खुली आँखों से देख पा रही थी, उसकी निकटता महसूस कर पा रही थी। शाम के चार बजे हवा में ठंडक महसूस होने लगी। शांतचित्त खड़े देवदार  कभी  प्रहरी से लगते,कभी ध्यानस्थ योगी से। देवदार से लिपटकर गले मिलने, उसकी पत्तियों को छू कर महसूसने और उस स्पर्श को कहीं अंदर तक उतर जाने देना मुझे प्रिय रहा है।
हमने तय किया कि पहले 'चौली की जाली', फिर मुक्तेश्वर मंदिर के दर्शन किए जाएँ। पहाड़ पर ट्रेकिंग का रोमांच मैं किसी क़ीमत पर खोना नहीं चाहती। सो, लोग दो हिस्सों में बँट गए, जिन्हें अच्छे बच्चे की तरह सीधे रास्ते से जाना था, दूसरे, जिन्हें बिना रास्ते के रास्ता तय करना था--- फिसलन, ढलान, उबड़-खाबड़ पत्थरों और बारिश के कारण दलदली मिट्टी को पार करते हुए, वह भी घिरते अँधेरे और बिना ग्रिप वाले जूतों के। सफ़र ख़तरनाक था, इसलिए रोमांचक था। मेरे साथ मज़बूरी में त्रिपाठी जी को साथ आना पड़ा-- अच्छे सहयात्री होने का फर्ज़ हमेशा की तरह निभाना उन्हें प्रिय है, मगर रास्ते में बार- बार उन्हें फिसलते देखकर मुझे ज़रा संकोच हो आया कि मेरी वजह से---। बहरहाल, मैंने उनका हाथ मज़बूती से पकड़ा और रास्ता बनाती हुई चली। साँझ घिर आने से दिक्कतें बढ़ गईं थीं। कई जगह कँटीली झाड़ियों में उलझने की भी नौबत आई, टॉर्च भूल गए थे, मोबाइल की रोशनी इस अधखुली आँखों -सी संध्याकालीन बेला के धुँधले उजाले में व्यर्थ साबित हो रही थी। कई बार लगता, हम गलत दिशा में आ गए, वापसी का रास्ता मालूम न पड़ता। चलते- चलते आख़िरकार वहाँ पहुँच गए , जहाँ उस पर्वत का शीर्ष था । अब बारी थी शीर्ष पर चढ़ने की, जिससे नीचे हजारों फीट गहरी खाई थी। कुछ युवा पहले से मौजूद थे। वे सीधे रास्ते से आए थे, उन्होंने बताया , बरसात में वह पगडंडी काफ़ी ख़तरनाक साबित होती है,
जिधर से हमने रास्ता तय किया था। त्रिपाठी जी उस चिकने बड़े पत्थर पर चढ़ने से झिझकने लगे, जहाँ से उस शीर्ष पर पहुँचना था और खुले आसमान के नीचे ढलती साँझ के गोधूलिपन को आत्मसात् कर भय को विदा कर अपनी इस लघु यात्रा की नगण्य सफलता पर ख़ुशी से शोर मचाना था। उन्होंने  मुझे  रोकने की कोशिश की, किंतु वे मेरी ज़िद से परिचित थे, और कहीं न कहीं मेरी ऐसी ज़िद से आनंदित भी होते थे। युवा साथी ने हाथ बढ़ाकर ज़रा सहारा दिया, मैंने अपने पाँव जमाने की कोशिश की , फिर पत्थरों को पार करती आगे बढ़ी, फिर उन्हें भी हाथ का सहारा देकर ऊपर खींच लिया। बदन से टकराती हवा रोम-रोम में स्फूर्ति का संचार करने लगी। ऊपर चढ़ते ही त्रिपाठी जी ने पहला वाक्य कहा, 'डर के आगे जीत है' और हम सब की मुक्त हँसी से वातावरण रागमय हो उठा। मुक्तेश्वर का ही एक युवा मधुर कंठ से गीत गाने लगा, हम भाव- विभोर उसे सुनते रहे। मैं धीरे से आगे बढ़ती हुई शीर्ष पत्थर पर पलटकर खड़ी हो गई, अब मेरे पीछे हजारों फीट गहरी खाई थी। मुझे बचपन से, 
ऊँचाई से गिरने का भय लगता था, यहाँ तक कि सपने में भी ख़ुद को ऊँचाई से गिरता पाती रही थी, आज इस किनारे पर खड़े होकर मैं अपने अंदर के उस डर को हमेशा के लिए विदा कर देना चाहती थी, हालाँकि मेरा यह क़दम ख़तरनाक था, ज़रा सी असावधानी या हड़बड़ाहट जानलेवा सिद्ध होती, मगर एक बार फिर मेरी ज़िद की जीत हुई, त्रिपाठी जी जबतक खौफ़ में पड़कर चीखते, मैंने इस स्मृति को कैमरे में क़ैद करवा लिया,और धीरे से पलटी, एक बार दिल उछला, टाँगे काँपीं, बस फिर क्या! अपनी बाँहें पूरी तरह फैलाए , हवा में उड़ती हुई -सी मैं बालसुलभ प्रसन्नता से भरकर ज़ोर से चिल्लाई ....,पहाड़ के शीर्ष पर खड़े होकर वादियों को पुकारना ; वातावरण में अपनी आवाज़ की गूँज और अनुगूँज से गुज़रना वाक़ई अप्रतिम आनंद देता है ।
कोहरा घिरने लगा। अँधेरे ने अपना कब्ज़ा जमा लिया था।जंगल की  ख़ामोशी का शोर बढ़ता जा रहा था। युवा साथी हमें सूखे रास्ते की ओर इशारा कर आगे बढ़ चुके थे। रह गए थे हम दोनों। मैं सुनना- समझना चाहती थी पहाड़ की ख़ामोशी, लेकिन खुले में। बंद कमरे में तो ख़ामोशी भी शीशे की खिड़की -दरवाज़ों पर सिर पटककर लौट आने को विवश होती है। मैंने इन दिनों महसूस किया था, हर पहाड़ की, पहाड़ पर उग आए हर जंगल का अपना संगीत , अपनी ख़ामोशी होती है। एक- दूसरे से एकदम अलग! उनके सन्नाटे का शोर भी एक -दूसरे से बिलकुल भिन्न, कहीं -कहीं रहस्यमय भी! मोबाइल भी बहुत देर तक साथ देने की स्थिति में न बचा। गेस्ट हाउस के मेज़बान ने ताकीद कर दी थी कि अँधेरा होने पर हम वहाँ से निकल कर मुख्य मार्ग तक आ जाएँ, क्योंकि वह पत्थरों के बीच से आड़ी- तिरछी  बे निशान पगडंडी ही थी, कोई सड़क नहीं। इसलिए इस समय बिना अपने मन की इच्छा ज़ाहिर किए मैं त्रिपाठी जी के साथ आगे बढ़ती हुई उस ओर निकल आई, जिधर मंदिर था। हालाँकि यह मंदिर गेस्ट हाउस से बहुत दूर नहीं था, किंतु जिस तरह हमने सफ़र किया, वह अब थकान से भरने लगा था। आसपास कोई नज़र न आता। मंदिर बहुत ऊँचाई पर था। दूसरे दिन हमें निकलना था, इसलिए यह लोभ संवरण नहीं कर पाए कि इस सुप्रसिद्ध मंदिर को देखे बिना लौट जाएँ। मंदिर तक जाने की सीढ़ियाँ दो ओर से बनी थीं। अँधेरे के कारण हमें बहुत समझ नहीं आया कि किधर से चले। ईश्वर का नाम लेकर हम सँकरी, मगर ऊँची सीढ़ियों वाले रास्ते से आगे बढ़े। एक स्थान पर चप्पल उतारना था, वहाँ से शिव मंदिर की ओर बढ़ते हुए अचानक मुझे लगा , जैसे दो आँखें मेरा पीछा कर रही हों। बिना बहुत सचेत हुए मैं सीढ़ियाँ चढ़ती शिव मंदिर तक पहुँची। पुजारी जी पूजा कर रहे थे। उनकी पूजा के बाद हम अंदर गए, मुझे वहाँ राहत महसूस हुई, निर्भयता का एहसास हुआ। पुजारी जी ने कहा, हम यहाँ जब तक चाहें रुकें, बस, जाते समय  मंदिर की कुंडी चढ़ा दें, वे घर जा रहे हैं, और बग़ैर हमारे उत्तर की बहुत प्रतीक्षा किए वे अपनी पत्नी के साथ चले गए। हम मुश्किल से थोड़ी देर रुके होंगे, पुजारी जी का इस तरह चले जाना और उस हिस्से में बिजली का न होना थोड़ा असहज कर गया। हालाँकि वहाँ से पूरा इलाका देखा जा सकता था, मगर अचानक बर्फीली हवा शुरू हो गई। कुछ भी दिखना मुश्किल था। रात अपेक्षाकृत अधिक गहरी लगने लगी थी। मुझे  आश्चर्य हुआ कि इतनी सारी सीढ़ियाँ वे उतर कैसे गए, शायद दूसरी ओर से गए हों! हमारे पास कोई उपाय न था, बर्फ़ीली हवा में टिकना मुश्किल हो रहा था, जिधर से आए थे, उधर से ही लौटना हमारी विवशता बन गई। कुछ सीढ़ियाँ उतरने पर अजीब-सी गंध ने मुझे बाँध लिया। सिर घुमाकर देखा तो सीढ़ी के बगल में देवी देवताओं से भरे कमरे में, जहाँ खाली जगह नाम मात्र की थी, उसी कमरे के एक हिस्से में थोड़ी ऊँचाई पर बेतरतीब रखी हुई कई छोटी- बड़ी चीज़ों के बीच एक कुरसी से चिपकी  एक गेरुआ वस्त्रधारी साधु की आकृति दिखी। आँखें बंद थीं,लगा, कोई मूर्ति है, मैं कुछ सोच पाती, अचानक उन्होंने आँखें खोल दीं और हमारी तरफ़ देखा। मेरी नज़रें टकराईं और न जाने क्यों मैं सिहर उठी।  मुझे लगा, कमरा उस मादक सुगंध से भर उठा है। सबकुछ बड़ा रहस्यमय -सा लगा।उनकी दृष्टि सह पाना मेरे लिए कठिन हो गया।मैं झटके से बाहर निकली ,तो  त्रिपाठी जी उस कमरे में घुसकर, जहाँ एक आदमी से अधिक खड़े होने भर की भी जगह न थी, उनसे कुछ कहना चाहते थे, मगर मैं बेहद डर गई थी। अँधेरा खौफ़ बढ़ा रहा था, अचानक मुझे लगा, बस भाग जाओ यहाँ से ... पलटो मत! अब यक़ीन नहीं होता ख़ुद पर, उस घटना पर! मैं त्रिपाठी जी को लगभग खींचती हुई सीढ़ियाँ उतरती गई, उन्हें रुककर जूते पहनने देने का भी मेरे पास अवकाश न था। शिव मंदिर में जहाँ सात्विकता पूर्ण  वातावरण की अनुभूति हुई थी, घंटों बैठने को जी चाह रहा था, मगर उसी मंदिर के तीन-चार सीढ़ी नीचे तांत्रिक मंत्र-प्रभाव से बंधे तामसी वातावरण की गंध मिल रही थी। मुझे ऐसा लगता, मानो वे आँखें अब भी मेरा पीछा कर रही हैं,वह गंध मुझे पागल बनाए जा रही है। काफ़ी नीचे उतर आने पर त्रिपाठी जी जूते बाँध पाए, फिर सीढ़ियाँ उतरने लगे, बाहर आकर समझ में आया, यह ऊपर मंदिर तक जाने का मुख्य मार्ग नहीं था। सड़क विधवा की माँग- सी सुनसान थी। फिर भी सड़क पर पहुँच कर मैंने राहत की साँस ली, अपने ईश्वर को धन्यवाद दिया, यह दुआ की कि कोई व्यक्ति दिख जाए तो गेस्ट हाउस का रास्ता पूछ लें। दुआ कुबूल हुई, हम असमंजस में पड़े खड़े सोच ही रहे थे कि किधर जाएँ, एक लड़का अँधेरे में से प्रकट हुआ, और उसने गेस्ट हाउस तक हमें पहुँचाया, बात- बात में उसने बताया, "वो बाबा जी सिद्ध पुरुष हैं, पहले दूसरे बाबा जी थे, वे और भी बड़े सिद्ध थे।  अभी उन्हें दाँत में दर्द है इसलिए चुप होंगे। सुबह से बहुत भीड़ होती है। " मैं उसकी बात से संतुष्ट नहीं हो पाई। मैं पहाड़ के रहस्य में उलझ गई। 'सुबह और दिन के उजाले में सौंदर्य और भक्ति का समागम करने वाला यह मंदिर रात को रहस्यमय क्यों हो उठता है?' मेरी बातें सुनकर लड़के ने कहा, “यहाँ शाम के बाद कोई भी मंदिर की तरफ़ नहीं जाता। पुजारी जी भी नहीं रहते।'',
 "मगर वो बाबा! वो इस बियावान में कैसे रहते हैं? वहाँ तो न बिस्तर, न आसपास बाथरूम ही दिखा मुझे" उसने इसपर कुछ नहीं कहा । हमें पहुँचाकर जाते समय इतना कहा, "सुबह जाकर देखेंगे तो आपको मंदिर अच्छे से दिखेगा। इस मंदिर का बहुत महात्म्य है।"                
        आज सोचती हूँ तो आश्चर्य होता है, क्या हो गया था मुझे? मैं हजारों फीट की ऊँचाई पर किनारे खड़ी रहकर नहीं घबराई, जबकि वहाँ ख़तरा था, वहाँ क्यों इतनी बेचैन हो गई थी? बेचैनी भी ऐसी कि न खाना खा पाई, न रात भर सो पाई। रह- रह सिहर उठती। मेरे भीतर का आह्लाद अचानक क्षीण हो गया। सारा रोमांच, सारी ऊर्जा निचुड़- सी गई। अतीत के काले पन्नों से निकलकर वहीं तामसी गंध एक बार फिर मुझे घेरने लगी थी। अपने बच्चों के सिवा मैं तब भी किसी को अपनी स्थिति समझा नहीं पाई थी, अब भी नहीं। रात अपने  भयावह पंजों में मुझे जकड़ने की कोशिश में लगी रही, मैं उसके खौफ़ से मुक्त होने की कोशिश में। बंद शीशे में से ठंडी हवा सेंध लगाने में सफल रही थी, लेकिन बेचैनी के कारण लिहाफ़ ओढ़कर रहना भी कठिन हो रहा था। लेटते, बैठते,कमरे में चक्कर काटते किसी तरह सुबह के तीन- चार बजने का इंतज़ार किया, फिर शॉल लपेटकर बाहर बालकनी में खड़ी हो गई।देवदार के बीच से , दूर कहीं, सफ़ेद दीवार- सी दिखी। इस अँधेरे में उस दीवार की दमक अच्छी लगी। चिड़िया की बोली सुनाई देने लगी। मैं बीती रात के मानसिक आघात को भुलाने की चेष्टा करने लगी। धीरे-धीरे वह दीवार ओझल हो गई। सुबह की हल्की सुनहरी किरणों ने मेरी चेतना लौटाई, कि यहाँ इस ऊँचाई पर सफ़ेद दीवार कहाँ से आएगी! वह हिमालय  का बर्फ़ से ढँका हिस्सा था, जो दिन में कोहरे के कारण दिखता न था, जबकि घुप्प अँधेरे में उसकी ख़ूबसूरती अलौकिक थी। यह वह क्षण था, जिसे मैंने जिया-- भरपूर जीया, मगर उसकी अनुभूति उसी प्रकार समझाने और उस स्थल को बालकनी से दिखाने में असमर्थ रही, क्योंकि उजाला फैलते ही उसका स्वरूप बदल चुका था। हिमालय के खुले बदन पर पड़ी बर्फ़ की परत अँधेरे में सफ़ेद रंग पुती दीवार लग रही थी, मगर उजाले में वह पर्वत का एक ऐसा हिस्सा था, जिसपर  न के बराबर बर्फ़ थी।
मेरे किसी साथी ने यह दृश्य नहीं देखा था, इसलिए उसे मानने को बाध्य भी नहीं थे। सुबह 10 बजे हमें वापसी की यात्रा करनी थी। काठगोदाम तक के लिए बुक की गई गाड़ी आ चुकी । मैं जिस उल्लास से आई, जिस उल्लास से ज़ीरोपॉइंट को जिया, वह कहीं छूटता नज़र आया। हाँ, मैं खामोश हो चुकी थी। वह अँधेरा मेरे अंदर उतर आया था, अव्यवस्थित  करने वाली वह गंध मेरी साँसों का हिस्सा बन चुकी थी। रोबोट की तरह नाश्ता कर, बेजान गुड़िया की तरह गाड़ी में अपनी सीट पर जा बैठी। अब चुप्पी मेरी सहयात्री थी। काठगोदाम से शताब्दी में रेल यात्रा आरंभ हुई। मैंने ठंडी साँस ली और बच्चों को फोन मिलाया, स्वर फूटे, "मैं आ रही हूँ।तुम्हें बहुत कुछ बताना है। यक़ीन करोगे न मुझपर?" 
दो वर्ष हो गए । उसके बाद पहाड़ की  कितनी ही यात्राएँ कीं। मुक्तेश्वर के पास से गुज़री भी, दोबारा जा न पाई न ही मुक्तेश्वर -यात्रा की स्मृति से कभी मुक्त नहीं हो पाई। अब तो लगने लगा है , मुक्तेश्वर!कभी न भूल सकूँगी तुम्हें!    

केवल विचारों से नहीं , व्यवहार में भी प्रतिबद्ध थे प्रभाकर चौबे

केवल विचारों से नहीं, 
व्यवहार में भी प्रतिबद्ध थे
प्रभाकर चौबे
 विनोद साव
                       
मुक्तिबोध अपने समय में अकेले अकेले से रहने वाले लेखक थे। महाराष्ट्र मंडल, रायपुर के आयोजन में तब यह बताया गया था कि ’मुक्तिबोध के नाम से रखा गया पुरस्कार इस नए राज्य (छत्तीसगढ़) में अकेला साहित्यिक पुरस्कार है।’ उस पुरस्कार को प्राप्त करने वाले प्रभाकर चौबे अपने आसपास अकेले प्रभाकर चौबे ही रहे। मुक्तिबोध सम्मान समारोह के दौरान प्रभाकर चौबे सभा भवन के बाहर अकेले ही मिले, तो विनोद शंकर शुक्ल ने कह दिया कि ’चौबे जी! सभा कक्ष से बाहर मत घूमिए, नहीं तो आपका सम्मान कोई दूसरा लेकर चम्पत हो जाएगा।’ प्रभाकर जी ने अपनी चिरपरिचित विनोद प्रियता में जवाब दिया -’मैंने आयोजकों के सामने अपनी हाजिरी लगा दी है, ताकि ऐसी कोई वारदात न हो जाए। रिटायमेंट के बाद ग्यारह हजार रुपयों का पुरस्कार मायने रखता है। लेनदारों को भी बता दिया है कि किस- किसका कितना बकाया है यहीं आकर ले जाए।’ 
उस दिन सम्मान ग्रहण करने से पहले बड़े आकर्षक दिख रहे थे प्रभाकर जी। पेंट के उपर खोंसकर पहना हुआ बढ़िया चेक शर्ट और बाल करीने से सजे हुए थे। सम्मान में बड़ी शक्ति होती है। माइक पर आते ही उन्होंने कह भी दिया था कि ’मुझे पुरस्कार मिलने पर जिन्हें प्रसन्नता हुई उनके प्रति तो मैं आभारी हॅूं ही.. और उनके प्रति भी जिन्हें प्रसन्नता नहीं हुई।‘ तुलसीदास की खल वन्दना की तरह। बड़ी बेबाकी से यह कह दिया था उन्होंने। लेकिन उस दिन महाराष्ट्र मंडल का खचाखच भरा हाल प्रभाकर चौबे की साख और उनकी रचना यात्रा के प्रभाव को प्रमाणित कर रहा था। 
प्रभाकर चौबे का जीवन एक साधक की तरह रहा है। उन्होंने जीवन का एक लम्बा कालखण्ड रायपुर में देशबन्धु परिवार के साथ बिताया और रामसागर पारा में निवास किया। देशबन्धु में उनके व्यंग्य कालम ’हॅसते हैं रोते हैं’ लगभग पच्चीस बरसों तक चला होगा। संभवतः यह किसी भी अखबार में सबसे अधिक समय तक चलने वाला साप्ताहिक स्तम्भ लेखन था। यह व्यंग्य का स्तम्भ था। इस स्तम्भ का अगर रजत जयन्ती वर्ष पूर्ण हुआ हो तो प्रभाकर जी के अवदान पर गम्भीर चर्चा होनी थी ,पर हो नहीं पायी। इस कीर्तिमान को गढ़ने का श्रेय देशबन्धु के सम्पादक ललित सुरजन और प्रभाकर चौबे दोनों को जाता है। ललित जी ने हरिशंकर परसाई के सन्दर्भ में कहा था कि ’अपने तल्ख विचारों के कारण परसाई जी को छापने का साहस तब अखबार नहीं कर पाते थे, पर बाबूजी (मायाराम सुरजन) ने परसाई जी को देशबन्धु और नई दुनिया में खूब छापा और परसाई के लोक शिक्षण से भरे विचारों को जन जन तक पहुँचाया।’ यह बात प्रभाकरजी के लिए भी लागू होती है... और जिस तरह देशबन्धु ने उन्हें अपने साथ हमेशा जोड़े रखा यह एक विचारवान और सम्प्रेषित होने वाले लेखक को मुखरित होने देने का सद्प्रयास है। यह श्रेयस्कर है। देशबन्धु के बारे में यह माना जाता रहा है कि उन्होंने इस तरह के प्रतिबद्ध और सरस लेखकों का जमावड़ा किया और उन्हें स्थापित करके छोड़ा - इनमें परसाई, प्रभाकर चौबे, राजनारायण मिश्र, रामनारायण उपाध्याय, सत्येन्द्र गुमास्ता, रमेश याज्ञिक, रमाकांत श्रीवास्तव और परदेशी राम वर्मा जैसे ढेरों लेखक रहे।
प्रभाकर चौबे परसाई की परम्परा के संवाहक रहे. तब देशबन्धु परिवार में इस परम्परा को अपनी पूरी सघनता में देखा जा सकता था। ललित सुरजन, राज नारायण मिश्र और प्रभाकर चौबे की लेखनी और उनके विचारों में परसाई का गहन प्रभाव रहा।  ललित सुरजन अपने व्याख्यानों में परसाई का नाम निरन्तर लेते रहे हैं। बाद में राज नारायण मिश्र के राइटिंग टेबल में रखे फोटो स्टेन्ड में परसाई का चित्र भी दिखा था। प्रभाकर चौबे ने अपने कालम का नाम ’हॅसते हैं रोते हैं’ रखा था जो परसाई की पहली किताब का नाम था। परसाई, मार्क्सवाद, वामपंथ और प्रगतिशील आन्दोलन पर उनकी हमेशा आस्था रहीं और वे उनमें हमेशा सक्रिय भी रहे। परसाई ने अपने विचारों के सम्प्रेषण के लिए व्यंग्य को एक शैली के रुप में अपनाया और प्रभाव पैदा किया, ऐसा प्रभाकर चौबे ने भी किया। परसाई की तरह प्रभाकर चौबे ने भी व्यंग्य को विधा नहीं माना ,लेकिन पाठकों ने उन्हें व्यंग्यकार माना। मुक्तिबोध सम्मान उन्हें प्रदान करते हुए यह बार बार कहा गया कि ’प्रभाकर चौबे व्यंग्य विधा के अत्यंत महत्वपूर्ण लेखक हैं।’

प्रभाकर चौबे एक वरिष्ठ लेखक होने के बाद भी अपने परवर्ती लेखकों की रचनाएँ पढ़ने और उन पर विस्तार से चर्चा करने की सदाशयता हमेशा दिखलाते रहे हैं। वे हर नये लेखकों की रचनाएँ पढ़ने के बाद युवा रचनाकारों को एक अच्छी रचना लिखे जाने के लिए फोन पर बधाई देते थे और रचना पर विस्तार से चर्चा करते थे। यह उनके समकालीन अन्य लेखकों के लिए भी अनुकरणीय है। ऐसे ही फोन पर एक निजी क्षण में उन्होंने मुझसे कहा था कि ’तुम मुझे क्या मानते हो मैं नहीं जानता ,पर मैं तुम्हें अपना भतीजा मानता हूँ.’ तब लतीफ़ घोंघी, त्रिभुवन पांडेय, विनोदशंकर शुक्ल जैसे नामी व्यंग्यकार मुझसे मित्रवत् व्यवहार तो करते थे पर उम्र के लिहाज़ से वे थे सभी मेरे चाचा समान।
अमूमन लेखकों में प्रतिबद्धता को लेकर एक भ्रम होता है और वे अपनी प्रतिबद्धता को केवल विचारों से लेकर जोड़ते हैं और बहुत जल्दी इस खुशफहमी में हो लेते हैं कि हम अपने विचारों के प्रति प्रतिबद्ध हैं जबकि वे अपने निजी व्यवहारों में अपने विचारों से भिन्न आचरण कर रहे होते हैं। उनके व्यवहार में उनके विचारों की प्रतिबद्धता की झलक नहीं होती। विचार और व्यवहार का यह एक अन्तर उनकी प्रतिबद्धता में आड़े आता है और वे उस मुकाम पर नहीं पहुँच पाते हैं जहां कि एक प्रतिबद्ध लेखक को पहुँचना होता है। प्रभाकर जी की प्रतिबद्धता जो उनके विचारों में रही लगभग वही उनके व्यवहार में रही। पत्रकारिता और साहित्य जगत की अपनी लम्बी मैराथन दौड़ में वे हमेशा अपनी ट्रैक पर ही दौड़ते रहे हैं।  उन्होंने दूसरों की ट्रैक पर अतिक्रमण नहीं किया। अनावश्यक स्वाभिमान और महत्वाकांक्षा की विभीषिका से अपने को बचाये रखा। सुरजन परिवार और देशबन्धु के साथ समर्पण भाव से वे जीवन पर्यन्त जुड़े रहे। साहित्यिक आयोजनों में नेताओं की मौजूदगी उन्हें रास नहीं आई। ऐसे कार्यक्रमों से वे दूर रहे। साम्प्रदायिक और कट्टरपंथी ताकतों के खिलाफ उन्होंने हमेशा अपनी कलम चलाई और उनका उपहास किया। किसी प्रकार के दुर्व्यसन से वे दूर रहे। प्रकाशन संस्थान से जुड़े रहने के बावजूद वे अनावश्यक पुस्तकें प्रकाशित करवाने का लोभ संवरण कर सके, जिसे आज के लेखकों में एक महामारी के रुप में देखा जा सकता है। अपने ही ट्रैक एण्ड फील्ड पर रहते हुए उन्होंने चौरासी वर्ष का दीर्घ जीवन सफलता से जिया और स्वस्थ्य बने रहे। अभी अंतिम समय में एम्स-रायपुर अस्पताल में जब उन्हें हम देखने गए, तब अशक्तता के बाद भी अपने कामरेडी जोश में हमसे मुस्कुराते हुए हाथ मिलाया. इस प्रकार प्रभाकर चौबे केवल विचारों से ही नहीं अपने व्यवहार में भी सदैव प्रतिबद्ध बने रहे. हमें उनसे सीखना चाहिए।
मो. 9009884014

पुस्तक- समीक्षा

स्वप्न-शृंखला 
से जोड़ते हाइकु  
डॉ. कुँवर दिनेश सिंह

पुस्तक: स्वप्न-स्वप्न-शृंखला (हाइकु संग्रह) , 
सम्पादक- रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, 
डॉ. कविता भट्ट
वर्ष: 2019, पृष्ठ144, मूल्य -300 रुपये; प्रकाशक: अयन प्रकाशन, 
1/20 महरौली, दिल्ली-110030
हाइकु मूलतः जापान की एक पारम्परिक काव्य विधा है, जो स्वल्प शब्दों में बहुत कुछ कह देती है। वास्तव में हाइकु का यही सौन्दर्य है कि यह अपने सूक्ष्म रूप में गहन दार्शनिक विचार को समाहित किए रहता है। पिछले कुछ दशकों में विश्व की कई भाषाओं में जापानी हाइकु का अनुवाद किया गया है और उन भाषाओं में इस छन्द के प्रयोग भी किए गए हैं। अंग्रेज़ी में हाइकु के छंदोबद्ध तथा छन्दमुक्त दोनों रूप देखे जा सकते हैं। उसी प्रकार हिन्दी में भी दोनों तरह के प्रयोग किए गए हैं, परन्तु वर्णिक छन्द के रूप में अधिक प्रयोग किया गया है। हिन्दी में छन्दानुशासन के साथ तीन पंक्तियों में 5-7-5 के वर्णक्रम में हाइकु सृजन किया गया है। नियमों की अनुपालना के साथ-साथ अच्छी हाइकु रचना के लिए अत्यधिक अभ्यास एवं एकाग्रता अपेक्षित होती है।
विगत कुछ वर्षों में 'हिन्दी हाइकु' ब्लॉग तथा 'हाइकु दर्पण' व 'अनुभूति' आदि ऑनलाइन पत्रिकाओं सहित 'सरस्वती सुमन', 'हिन्दी चेतना', 'हरिगंधा',  'हाइफ़न', 'उदन्ती' तथा 'अभिनव इमरोज़'  इत्यादि पत्रिकाओं के हाइकु विशेषांकों के माध्यम से हिन्दी में हाइकु के विविध प्रयोग देखने को मिलते हैं।  इनके अतिरिक्त कुछ संकलन और आलोचना/समीक्षा ग्रन्थ भी प्रकाशित हुए हैं, जिनमें हिन्दी हाइकु के स्वरूप का विशद अनुशीलन किया गया है।हाल ही में प्रकाशित संकलन "स्वप्न-शृंखला’हिन्दी में समकालीन हाइकु कविता के स्तरीय हस्ताक्षरों का संग्रह है। इस संकलन में प्रतिष्ठित एवं नवोदित हाइकुकारों की उत्कृष्ट रचनाओं की प्रस्तुति के लिए संपादक-द्वय रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' और डॉ. कविता भट्ट साधुवाद के पात्र हैं। कुल तीस कवियों की हाइकु रचनाओं में कथ्य, शिल्प व शैली की विविधता इस संग्रह को रुचिकर बनाती है। प्रकृति के विभिन्न चित्रों सहित मानव-जीवन के अनुभवों की अभिव्यक्ति हृदयग्राही है।
संग्रह की प्रथम रचनाकार डॉ. सुधा गुप्ता एक प्रतिष्ठित, सुपरिचित व सशक्त हाइकुकार हैं, जो बहुत-से नए कवियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनके हाइकु में प्रकृति और जीवनानुभूतियों का तारतम्य मर्मस्पर्शी है। चाहे पर्यावरण का चिंतन हो: "लुप्त है वापी / खो गए सरोवर / ग़ायब हंस।" (पृ. 12) या अनुत्तरित प्रेम की वेदना हो: "विधु ने छला / उछला तो सागर / स्पर्श न मिला।" (पृ. 16) या नारी विमर्श हो: "बिलख चलीं / पर्वतों की बेटियाँ / मायका छूटा।" (पृ. 15) या फिर मन की व्यथा हो: "गहरा राज़: / आकाश अकेला है / तारों के साथ।" (पृ. 18), डॉ. सुधा गुप्ता की अभिव्यक्ति गहन प्रभाव रखती है।इस संग्रह के दूसरे सशक्त हस्ताक्षर, रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' के हाइकु प्रणय की संयोग-वियोग की अनुभूतियों को बड़े प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हैं, जैसा कि इन रचनाओं में आभासित है: "सिन्धु हो तुम / मैं तेरी ही तरंग, / जाऊँगी कहाँ?" (पृ. 19), "घना अँधेरा / सिर्फ़ एक रौशनी / नाम तुम्हारा।" (पृ. 23) तथा "चैन न पाया / सागर तर आया / तुझमें डूबा।" (पृ. 25) संग्रह में सम्मिलित अन्य चर्चित हाइकुकारों में डॉ. कुँवर दिनेश सिंह, डॉ. भावना कुँअर, डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा, डॉ. कविता भट्ट, कमला निखुर्पा, सुदर्शन रत्नाकर, कुमुद बंसल, डॉ. जेन्नी शबनम, डॉ. हरदीप कौर संधू, कृष्णा वर्मा, अनिता ललित, पुष्पा मेहरा, ज्योत्स्ना प्रदीप, मंजूषा मनतथाडॉ. पूर्वा शर्माके नामउल्लेखनीय हैं।
कुल मिलाकर, 144 पृष्ठों के इस संग्रह में हाइकु के विविध रंगों को संजोया गया है। अधिकतर हाइकु पाठक को नूतन विचारों, अर्थों व आशाओं के पुलिनों पर ले जाते हैं और नि:सन्देह एक 'स्वप्न-शृंखला  ' से जोड़ते हैं। यह संकलन हाइकु-प्रेमियों तथा शोधार्थियों  के लिए रोचक एवं स्तरीय सामग्री से भरा है।
सम्पर्कः  # 3, सिसिल क्वार्टर्ज़, चौड़ा मैदान, शिमला: 171004 हिमाचल प्रदेश, ईमेल:kanwardineshsingh@gmail.com मोबाइल: +91-94186-26090

सच्चा साथी

हाइबन
सच्चा साथी 
 प्रियंका गुप्ता

उस रात जाने क्यों मन थोडा उदास सा था...अजीब सी बेचैनी...। बहुत सारी बातें थी मन में, पर समझ नहीं आ रहा था कि बेचैनी थी आखिर किस बात पर...। अजीब सा अहसास...। बहुत हद तक कारण अगले दिन समझ आ गया...जब शैडो के जाने की ख़बर मिली...।
शैडो...कहने को किसी को जो हिकारत से कहा जाता है...वो था...यानी कि गली का कुत्ता...स्ट्रीट डॉग था वो...। मेरी गली का एक वफादार बाशिंदा...। बहुत सारे इंसानों से ज्यादा भावनाएँ मैंने उसमे देखी थी...। इंसानी हिसाब से देखा जाए तो वो एक दीर्घायु जी कर गया...। तेरह साल की उम्र...जब कुत्तों की अधिकतम आयु शायद चौदह साल ही होती है...।
अंतिम के तीन दिन, जब उसने खाना-पीना छोड़ा...उसके पहले तक वो सचमुच शैडो बन कर मेरे साथ चला...। नाम उसका वैसे मोती था, पर जब वो इस मोहल्ले में आया था, जाने कैसे चुनमुन ने उसे `शैडो' बुलाना शुरू कर दिया था...। वो अपने दोनों नाम पहचानता था...। बातें समझता था...। रात को मेरे गेट का ताला बंद होने से पहले अगर किसी दिन वो कहीं लापता होता और रोटी न खा पाता, तो दूसरे दिन सुबह गेट खोलते ही एक ख़ास अंदाज़ में शिकायत होती मुझसे...और मेरे इतना कहते ही...हाँ, हाँ, समझ गए, कल खाना नहीं मिला था न...अभी देते हैं...बिलकुल शांत हो जाता था...।
लम्बाई-चौडाई यूँ थी कि अपनी जवानी के दिनों में कि मजाल है कोई अनजान मोटरसाइकिल वाला भन्नाटे से सही सलामत गली से गुज़र सके...। इसलिए बच्चों का लाडला था शैडो...क्योंकि गली क्रिकेट में फील्डिंग के साथ साथ वो इस तरह के घुसपैठियों से भी सबको बचाता था...।
एक वफादार साथी की तरह न जाने कितनी दूर तक वो अक्सर मेरे साथ चला है, एक बच्चे की तरह न जाने कितनी बार दो पैरों पर खड़े हो कर गले लगा है...और जाने कितनी बार किसी अनजान को मेरे दरवाज़े पर ऐन्वेही फटकने से भी रोका था...।
लोगो को अपनी भयानक आवाज़ से कँपा देने वाला शैडो हमारे झूटमूठ धमकाने पर यूँ दुबक जाता था कि बरबस हँसी आ जाती थी...। जिसने उसे कुछ सालों पहले तक देखा था, वो उसे `गली का कुत्ता' कहने की बजाए `गली का शेर' ही कहते थे...।
वो किसी एक का नहीं था, फिर भी सबका था । मौत को अपना बना वो तो अपने कष्टों से मुक्ति पा गया, पर आज भी जब मेरी ही तरह उसे इस गली के कई लोग याद करते हैं, तो ऐसे में मुझे उन लोगों पर तरस आता है जो अपने कर्मों के कारण ऐसी याद से भी वंचित हैं, उस प्यार से वंचित हैं, जो एक `गली का कुत्ता' पा गया...।
शैडो के जाने के बाद उसकी विदाई में बस एक ही बात दिल में गूँजी थी...तुम बहुत याद आओगे, हमेशा याद आते रहोगे...हर उस पल में जब कोई साया साथ चलेगा...।
वफ़ा की सीख
बेजुबान दे जाते
नेह से भरे ।