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Sep 9, 2018

चर्चित कविताएँ



 अटल बिहारी वाजपेयी की

 चर्चित कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी जी का अपना एक विशाल राजनीतिक कद था जिसका लोहा न सिर्फ भारत के बल्कि दुनिया के अन्य देश भी मानते हैं। लेकिन उनके व्यक्तित्व का एक अलग पहलू भी रहा है जिसके भी मुरीद तमाम लोग रहे हैं और वह पहलू है उनके कवि हृदय का। कवि अटल बिहारी वाजपेयी की कविताएँ जीवन के हर पहलू को छूती हैं और लोगों के दिलों में घर कर जाती थीं। राजनीतिक व्यस्तता के बीच अटलजी का कविता के प्रति मोह किसी से छिपा नहीं था। उनकी कविताएँ दिल की गहराइयों से लिखी होती थीं। उनके राजनीतिक भाषणों में भी उनका यह व्यक्तित्व उजागर होता था। अपने काव्य कौशल के लिए मशहूर कवि अटल बिहारी वाजपेयी की कविताएँ ना केवल जोश और भावनाओं से भरी होती हैं बल्कि वे बेहद सारगर्भित भी होती हैं और उसके पीछे कोई ना कोई संदेश या प्रेरणादायक बात जरूर होती है। प्रस्तुत है उनकी कुछ चर्चित रचनाएँ।
1. मौत से ठन गई!
ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफऱ,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।
मौत से ठन गई।
2. यक्ष प्रश्न
जो कल थे,
वे आज नहीं हैं।
जो आज हैं,
वे कल नहीं होंगे।
होने, न होने का क्रम,
इसी तरह चलता रहेगा,
हम हैं, हम रहेंगे,
यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा।

सत्य क्या है?
होना या न होना?
या दोनों ही सत्य हैं?
जो है, उसका होना सत्य है,
जो नहीं है, उसका न होना सत्य है।
मुझे लगता है कि
होना-न-होना एक ही सत्य के
दो आयाम हैं,
शेष सब समझ का फेर,
बुद्धि के व्यायाम हैं।
किन्तु न होने के बाद क्या होता है,
यह प्रश्न अनुत्तरित है।

प्रत्येक नया नचिकेता,
इस प्रश्न की खोज में लगा है।
सभी साधकों को इस प्रश्न ने ठगा है।
शायद यह प्रश्न, प्रश्न ही रहेगा।
यदि कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहें
तो इसमें बुराई क्या है?
हाँ, खोज का सिलसिला न रुके,
धर्म की अनुभूति,
विज्ञान का अनुसंधान,
एक दिन, अवश्य ही
रुद्ध द्वार खोलेगा।
प्रश्न पूछने के बजाय
यक्ष स्वयं उत्तर बोलेगा।

3. ऊँचाई
ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।

जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफऩ की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूँद-बूँद- रोती है।

ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,

किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-माँदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

ज़रूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूँठ सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कली न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।

4. गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात

प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूँ
गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूँगा,
रार नई ठानूँगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ

5. जीवन की ढलने लगी साँझ

जीवन की ढलने लगी साँझ
उमर घट गई
डगर कट गई
जीवन की ढलने लगी साँझ।

बदले हैं अर्थ
शब्द हुए व्यर्थ
शान्ति बिना खुशियाँ हैं बाँझ।

सपनों में मीत
बिखरा संगीत
ठिठक रहे पांव और झिझक रही झाँझ।
जीवन की ढलने लगी साँझ।

6. हिरोशिमा की पीड़ा
किसी रात को
मेरी नींद अचानक उचट जाती है
आँख खुल जाती है
मैं सोचने लगता हूँ कि
जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का
आविष्कार किया था
वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण
नरसंहार के समाचार सुनकर
रात को कैसे सोए होंगे?
क्या उन्हें एक क्षण के लिए सही
ये अनुभूति नहीं हुई कि
उनके हाथों जो कुछ हुआ
अच्छा नहीं हुआ!

यदि हुई, तो वक़्त उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं करेगा
किन्तु यदि नहीं हुई तो इतिहास उन्हें
कभी माफ़ नहीं करेगा!

7. न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

सवेरा है मगर पूरब दिशा में
घिर रहे बादल
रूई से धुंधलके में
मील के पत्थर पड़े घायल
ठिठके पाँव
ओझल गाँव
जड़ता है न गतिमयता

स्वयं को दूसरों की दृष्टि से
मैं देख पाता हूं
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

समय की सदर साँसों ने
चिनारों को झुलस डाला,
मगर हिमपात को देती
चुनौती एक दुर्ममाला,

बिखरे नीड़,
विहँसे चीड़,
आँसू हैं न मुस्कानें,
हिमानी झील के तट पर
अकेला गुनगुनाता हूँ।
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ
8. आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अँधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

सीधे सरल सच्चे इंसान

सीधे सरल सच्चे इंसान
 वाणी के धनी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी से जुड़े कुछ बेहद दिलचस्प किस्से हैं जो बाजपेयी जी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को दर्शाते हैं। गंभीर से गंभीर परिस्थिति में भी वे शांत बने रहते थे।
और वे दोबारा सो गए...
- अटल बिहारी वाजपेयी की जीवनी 'हार नहीं मानूँगा’ में पत्रकार विजय त्रिवेदी एक किस्सा बयान करते हैं- एक बार हिमाचल प्रदेश में एक चुनावी सभा को संबोधित करने के लिए एक छोटे विमान से वाजपेयी धर्मशाला जा रहे थे। उनके साथ वरिष्ठ पत्रकार और राज्यसभा सांसद रहे बलबीर पुंज भी सफर कर रहे थे। यात्रा के दौरान वाजपेयी सो गए। इसी बीच विमान का सह-पायलट कॉकपिट से बाहर आया और उसने पुंज से पूछा कि क्या वे इससे पहले कभी धर्मशाला आए हैं? पुंज द्वारा ऐसा पूछने की वजह पूछे जाने पर सह-पायलट ने कहा कि एयर ट्रैफिक कंट्रोल से हमारा संबंध टूट गया है और हमें धर्मशाला मिल नहीं रहा है। विमान चालकों के पास बहुत पुराना नक्शा था और नीचे जो दिख रहा था, वह उस नक्शे से मेल नहीं खा रहा था। इतने में बाजपेयी जी की आँख खुली। जब पुंज ने उन्हें सारी बात बताई तो अटल जी बोले 'अगर जागते हुए क्रैश होगा तो बहुत तकलीफ होगी इसलिए फिर से सो जाता हूँ।‘यह कहकर वे दोबारा सो गए। बाद में इस विमान का संपर्क इंडियन एयरलाइंस के एक विमान से हुआ और उसकी मदद से उसे धर्मशाला की जगह कुल्लू में सुरक्षित उतार लिया गया।
फटा हुआ कुर्ता
दूसरा दिलचस्प किस्सा उन दिनों का है जब अटल बिहारी बाजपेयी राजनीति की शुरुआत कर ही रहे थे। 1953 में उन्हें मुम्बई में जनसंघ की एक जनसभा को संबोधित करना था। जब वे सभा के लिए तैयार हुए तो देखा कि जो कुर्ता उन्होंने पहना है ,वह आस्तीन के पास से फटा हुआ था। उन्होंने अपना दूसरा कुर्ता निकाला। लेकिन वह भी गले के पास फटा हुआ निकला। वाजपेयी बस दो ही कुर्ते लेकर बंबई गए थे और वे दोनों के दोनों फटे हुए थे। अब कोई रास्ता नहीं था;लेकिन अटल जी की त्वरित बुद्धि ने वहाँ काम किया उन्होंने फटे हुए कुर्तों में से एक के ऊपर जैकेट पहन ली। इसके बाद सभा में फटे कुर्ते के बारे में किसी को पता तक नहीं चला।
नेहरू की तस्वीर फिर से लगाने का आदेश
 आपातकाल के बाद 1977 में बनी मोरारजी देसाई की सरकार में अटल बिहारी बाजपेयी विदेश मंत्री बने थे। विदेश मंत्री बनने के बाद जब वे पहले दिन विदेश मंत्रालय पहुँचे तो उन्होंने देखा कि दफ्तर की एक दीवार से कुछ गायब है। बाजपेयी ने अपने सचिव से कहा कि यहाँ तो पंडित जवाहरलाल नेहरू की तस्वीर लगी होती थी। पहले भी कई बार मैं इस दफ्तर में आया हूँ, अब कहाँ गई? पता चला कि जब गैर कांग्रेसी सरकार बनी तो विदेश मंत्रालय के अफसरों को लगा कि जनसंघ से आने वाले नए विदेश मंत्री को नेहरू की तस्वीर अच्छी नहीं लगेगी, इसलिए उन्हें खुश करने के लिए अधिकारियों ने नेहरू की तस्वीर हटा दी थी। इसके बाद बाजपेयी ने विदेश मंत्रालय के अफसरों को जितनी जल्दी हो सके उस तस्वीर को फिर से लगाने का आदेश दिया।
...और उन्होंने पठानी सूट का तोहफा पहन लिया
मोरारजी सरकार में विदेश मंत्री के तौर पर बाजपेयी पाकिस्तान में भी बेहद लोकप्रिय थे। मोरारजी सरकार बहुत दिनों तक चल न सकी। सरकार गिरने के कुछ दिनों बाद की बात है- बाजपेयी जी अपने घर पर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। तभी पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल सत्तार उनके यहाँ एक तोहफा लेकर पहुँचे। सत्तार ने बाजपेयी जी को कहा कि आप तो पाकिस्तान में इतने लोकप्रिय हैं कि वहाँ से चुनाव लड़ें तो दूसरों की जमानत जब्त हो जाएगी। सत्तार ने बाजपेयी को बताया कि यह उपहार जनरल जिया उल हक ने उनके लिए भेजा है। उस पैकेट में एक पठानी सूट था। बाजपेयी पैकेट लेकर अंदर गए और कुछ ही देर में पठानी सूट पहनकर बाहर निकले और सत्तार को कहा कि जनरल साहब को बता देना कि मैंने उनका तोहफा पहन लिया है।
ग्वालियर में उन्हें गाड़ी की जरूरत नहीं पड़ती...
 ग्वालियर से बाजपेयी का बड़ा गहरा नाता रहा है। बाजपेयी अक्सर दिल्ली से ग्वालियर बिना किसी को कुछ बताए चले जाते थे और वहाँ की सड़कों पर यहाँ-वहाँ घूमते रहते थे। यह बात उन दिनों की है जब राजमाता सिंधिया बाजपेयी की पार्टी में आई ही थीं। एक दिन उन्हें खबर मिली कि अटल जी छाता लगाए ग्वालियर के पाटनकर बाजार से गुजर रहे हैं। यह सुनते ही राजमाता सिंधिया ने एक स्थानीय नेता को फोन लगाकर कहा कि कैसी पार्टी है आपकी, पार्टी के सबसे बड़े नेता सड़क पर पैदल घूम रहे हैं, क्या उनके लिए गाड़ी का इंतजाम नहीं हो सकता? थोड़ी देर बाद राजमाता सिंधिया के पास उस नेता का फोन आया। उसने उन्हें बताया कि बाजपेयी जी ने गाड़ी सधन्यवाद वापस भेज दी है और कहा है कि ग्वालियर में उन्हें गाड़ी की जरूरत नहीं पड़ती।
इंदिरा को व्यंग्य में दिया जवाब
1971 में एक सभा में उन्होंने कहा था कि इंदिरा गाँधी आज कल मेरी तुलना हिटलर से करती हैं। एक दिन उन्होंने इंदिराजी से पूछा कि वो उनकी तुलना हिटलर से क्यों करती हैं।
तो इंदिरा गाँधी ने जवाब दिया कि आप बाँह उठा उठाकर सभाओं में बोलते हैं, इसलिए मैं आपकी तुलना नाजी से करती हूँ।
इस पर वाजपेयी जी ने टिप्पणी की और लोगों ने खूब ठहाका लगाया। उन्होंने कहा कि तो क्या मैं पैर उठा उठाकर भाषण दूँ।
ये उनके व्यंग्य का तरीका था। इस तरह के व्यंग्य उनके भाषण को रोचक बनाता था। उनके भाषण में रोचकता के साथ-साथ गंभीर मुद्दे होते थे, चिंताएँ होती थी, जो किसी भी राष्ट्रीय नेता के भाषण में होना चाहिए।
1957 की बात है। दूसरी लोकसभा में भारतीय जन संघ के सिर्फ़ चार सांसद थे। इन सासंदों का परिचय तत्कालीन राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन से कराया गया।
तब राष्ट्रपति ने हैरानी व्यक्त करते हुए कहा कि वो किसी भारतीय जनसंघ नाम की पार्टी को नहीं जानते। अटल बिहारी वाजपेयी उन चार सांसदों में से एक थे।
 इस घटना को याद करते हुए कहते उन्होंने कहा था कि आज भारतीय जनता पार्टी के सबसे ज़्यादा सांसद हैं और शायद ही ऐसा कोई होगा जिसने बीजेपी का नाम न सुना हो। 

हाजिरजवाब अटल

हाजिरजवाब अटल
अटल बिहारी बाजपेयी ने अपने राजनीतिक करियर के दौरान मीडिया को कई बेहतरीन साक्षात्कार दिए। यहाँ प्रस्तुत है उनसे समय समय पर लिए गए साक्षात्कार के कुछ ऐसे अंश जो अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तिगत जीवन के साथ ही उनके राजनैतिक जीवन के बारे में भी बताते हैं।
 रजत शर्मा के साथ
रजत शर्मा- अटल जी, आपके नाम में विरोधांतर है। जो अटल है वह बिहारी कैसे हो सकता है?
अटल बिहारी वाजपेयी- मैं अटल भी हूँ और बिहारी भी हूँ। जहाँ अटल होने की आवश्यकता है वहाँ अटल हूँ और जहाँ बिहारी होने की जरूरत है वहाँ बिहारी भी हूँ। मुझे दोनों में कोई अंतर्विरोध दिखाई नहीं देता।
रजत शर्मा- अपने जब राजनीतिक करियर शुरू किया था तब आप कम्युनिस्ट भी थे और आर्यसमाजी भी थे?
अटल बिहारी वाजपेयी- एक बालक के नाते मैं आर्यकुमार सभा का सदस्य बना। इसके बाद मैं आरएसएस के संपर्क में आया। कम्युनिज्म को मैंने एक विचारधारा के रूप में पढ़ा। मैं कभी कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य नहीं रहा लेकिन छात्र आंदोलन में मेरी हमेशा रुचि थी और कम्युनिस्ट एक ऐसी पार्टी थी जो छात्रों को संगठित करके आगे बढ़ती थी। मैं उनके संपर्क में आया और कॉलेज की छात्र राजनीति में भाग लिया। एक साथ सत्यार्थ और कार्ल मार्क्स पढ़ा जा सकता है, दोनों में कोई अंतर्विरोध नहीं है।
रजत शर्मा-  कवि होकर आप कविता लिखते हैं फिर दूसरी तरफ राजनीति के कठोर रास्ते पर आप चलते हैं?
अटल बिहारी वाजपेयी- मैं इसे अंतर्विरोध नहीं मानता हूँ। बचपन से मैंने कविता लिखना आरंभ किया। मैं पत्रकार बनाना चाहता था। लेकिन जब श्रीनगर के सरकारी अस्पताल में नज़रबंदी की अवस्था में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का निधन हो गया तो उनके अधूरे काम को पूरा करने के लिए मैंने राजनीति के क्षेत्र में कूदने का फैसला किया. राजनीति के रेगिस्तान में मेरी कविता की धारा सूख गयी है। कभी कभी मैं कविता लिखने की कोशिश करता हूँ लेकिन सच्चाई यह है कि मेरा कवि मेरा साथ छोड़ गया है और मैं कोरी राजनीति का नेता बनकर रह गया हूँ।  मैं उस दुनिया में लौटना चाहता हूँ लेकिन स्थिति वही है कि व्यक्ति कंबल छोडऩा चाहता है लेकिन कंबल व्यक्ति को नहीं छोड़ता है। इस समय तो राजनीति को छोड़ा नहीं जा सकता लेकिन राजनीति मेरे मन का पहला विषय नहीं है। राजनीति में जो कुछ हो रहा है, मेरे मन में कभी-कभी पीड़ा पैदा होता है। लेकिन इस समय छोड़कर जाना पलायन माना जाएगा और मैं पलायन का दोषी नहीं बनना चाहता हूँ। कर्तव्य की पुकार है लड़ूँगा और संघर्ष करूँगा।
राजीव शुक्ला के साथ
राजीव शुक्ला-  एक भ्रम आप के बारे में ज़रूर है। आप उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं या मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं, कभी आप ग्वालियर से चुनाव लड़ते हैं, कभी लखनऊ से लड़ते हैं?
अटल बिहारी वाजपेयी- हमारा पैतृक गाँव उत्तर प्रदेश में है। लेकिन पिताजी अंग्रेजी पढ़ऩे के लिए गाँव छोड़कर आगरा चले गए थे, फिर उन्हें ग्वालियर में नौकरी मिल गई। मेरा जन्म ग्वालियर में हुआ था। इसलिए मैं उत्तर प्रदेश का भी हूँ और मध्य प्रदेश का भी हूँ।
राजीव शुक्ला- तो आपके पिताजी सिंधिया दरबार में नौकरी करते थे? तो उसी सिंधिया परिवार के बेटे के खिलाफ आपने चुनाव लड़ा?
अटल बिहारी बाजपेयी- जी हाँ,  राज्य की शिक्षा सेवा में थे और बहुत पराक्रमी पुरुष थे। बेटे को मैंने भारतीय जनसंघ में शामिल भी करवाया था। बेटा पहले हमारे साथ था, माँ को छोड़कर बेटा चला गया तो बेटे के खिलाफ चुनाव लड़ऩा जरूरी हो गया।
राजीव शुक्ला- आप अकेला महसूस करते हैं इसीलिए लिखते हैं?
अटल बिहारी वाजपेयी- हाँ, अकेला महसूस तो करता हूँ, भीड़ में भी अकेला महसूस करता हूँ।
राजीव शुक्ला- शादी क्यों नहीं की आपने?
अटल बिहारी वाजपेयी-  घटनाचक्र ऐसा ऐसा चलता गया कि मैं उसमें उलझता गया और विवाह का मुहूर्त नहीं निकल पाया।
राजीव शुक्ला- अफेयर भी कभी नहीं हुआ ज़िदगी में?
अटल बिहारी वाजपेयी- अफेयर की चर्चा की नहीं जाती है सार्वजनिक रूप से।
तवलीन सिंह के साथ 
अटल बिहारी वाजपेयी- मैं जब लोकसभा के लिए पहली बार चुना गया था तो उस समय अशोक होटल बनना था। लोकसभा में एक दिन बहस होने लगी और नेहरू जी मौजूद थे। होटल बनाया जाए या न बनाया जाए, घाटे में रहेगा या फायदे में रहेगा। मैं खड़ा हो गया और बोला, 'सरकार का काम होटल बनाना नहीं, अस्पताल बनाना है।‘नेहरू जी नाराज़ हो गए और बोले यह नए मेंबर आए हैं,  बातें समझते तो हैं नहीं। नेहरू जी बोले,  हम होटल भी बनाएँगे और होटल से हुए फायदे से अस्पताल भी बनाएँगे लेकिन होटल नुकसान में चल रहा है।’
तवलीन सिंह- आप क्या-क्या खाना बनाना पसंद करते हैं?
अटल बिहारी वाजपेयी- मैं खाना अच्छा बनाता हूँ, मैं खिचड़ी अच्छी बनाता हूँ, हलवा अच्छा बनाता हूँ, खीर अच्छी बनाता हूँ। वक्त निकालकर खाना बनाता हूँ। इसके सिवा घूमता हूँ और शास्त्रीय संगीत भी सुनता हूँ, नए संगीत में भी रुचि रखता हूँ।
डॉ. प्रणय रॉय के साथ
अटल बिहारी वाजपेयी- अयोध्या में जो कुछ हुआ वह दुर्भाग्यपूर्ण है। यह नहीं होना चाहिए था। हम उसे रोकना चाहते थे लेकिन रोक नहीं पाए। हम उसके लिए माफी माँगते हैं।
डॉ. प्रणय रॉय- आप क्यों सफल नहीं हुए, क्या हुआ?
अटल बिहारी वाजपेयी- क्योंकि कुछ कारसेवक हमारे कंट्रोल से बहार निकल गए। वह कुछ ऐसा कर गए जो नहीं करना चाहिए था। पूरी तरह साफ़ आश्वासन दिया गया था कि किसी भी हालत में विवादित स्थल पर कोई भी तोडफ़ोड़ नहीं होने दी जाएगी ,लेकिन इस आश्वासन का पालन नहीं किया गया। इसलिए हम माफ़ी माँगते हैं।

जीवन के दो रंग

1. बड़ी मुद्दत के बाद मिले हैं दीवाने...
जनवरी 1977 की एक सर्द शाम। दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी नेताओं की एक रैली थी। रैली यूँ तो 4 बजे शुरू हो गई थी, लेकिन अटल बिहारी बाजपेयी जी की बारी आते- आते रात के साढ़े नौ बज गए थे। जैसे ही बाजपेयी जी बोलने के लिए खड़े हुए, वहाँ मौजूद हज़ारों लोग भी खड़े हो कर ताली बजाने लगे।
अचानक बाजपेयी जी ने अपने दोनों हाथ उठा कर लोगों की तालियों को शान्त किया। अपनी आँखें बंद कीं  और एक मिसरा पढ़ा-
'बड़ी मुद्दत के बाद मिले हैं दीवाने...’
बाजपेयी जी थोड़ा ठिठके। लोग आपे से बाहर हो रहे थे। बाजपेयी जी ने फिर अपनी आँखें बंद कीं। फिर एक लम्बा पॉज़ लिया और मिसरे को पूरा किया-
'कहने सुनने को बहुत हैं अफ़साने।‘
इस बार तालियों का दौर और लंबा था। जब शोर रुका तो बाजपेयी जी ने एक और लंबा पॉज़ लिया और दो और पंक्तियाँ पढ़ीं-
 'खुली हवा में ज़रा साँस तो ले लें,
 कब तक रहेगी आज़ादी कौन जाने?’
उस जनसभा में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह बताती हैं- ''ये शायद 'विंटेज वाजपेयी’ का सर्वश्रेष्ठ रूप था। हज़ारों -हज़ार लोग कड़कड़ाती सर्दी और बूँदा-बाँदी के बीच बाजपेयी जी को सुनने के लिए जमा हुए थे। इसके बावजूद कि तत्कालीन सरकार ने उन्हें रैली में जाने से रोकने के लिए उस दिन दूरदर्शन पर 1973 की सबसे हिट फिल्म 'बॉबी’ दिखाने का फ़ैसला किया था;लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ था। बॉबी और बाजपेयी जी के बीच लोगों ने बाजपेयी को चुना। उस रात उन्होंने सिद्ध किया कि उन्हें बेबात ही भारतीय राजनीति का सर्वश्रेष्ठ वक्ता नहीं कहा जाता।‘’
2. राखी की वह अनुपम सौगात
 बाजपेयी जी जहॉँ जाते, एक अपनेपन का रिश्ता स्वत: ही जुड़ जाता था। फतेहाबाद में भी करीब 43 साल पहले वह एक आदर्श रिश्ता जोड़ गए। वह रिश्ता था, धर्म भाई का। अपने स्तर पर वह इस रिश्ते को बखूबी निभाते रहे। उस सुखद पल को याद करती हुई डॉ. एन रॉय की बेटी डॉ. रमेश चक्रवर्ती बेहद भावुक हो जाती हैं।
वह बताती हैं कि वर्ष 1975 में भारतीय जनसंघ के कट्टर समर्थक डा. एन रॉय के घर कार्यकर्ताओं की मीटिंग रखी गई थी। डॉ. मंगल सेन सरीखे कद्दावर जनसंघ के पदाधिकारियों की मौजूदगी वाली इस बैठक की अध्यक्षता अटलजी को करनी थी। वह समय से आए। मैंने उनका स्वागत किया। इसके बाद अटलजी की कलाई पर राखी बाँधी और फिर तिलक लगाया। अटलजी ने मेरे सिर पर स्नेह-भरा हाथ रखते हुए सौ रुपये दिए थे। उस सौ के नोट को मैंने वर्षों तक सहेज कर रखा।
डॉ. रमेश चक्रवर्ती कहती हैं, धर्म-भाई स्वीकारते हुए उन्होंने पत्राचार करते रहने के लिए कहा। इस तरह करीब 15 साल तक चिट्ठियाँ लिखने का सिलसिला जारी रहा। अटलजी उनके हर पत्र का जवाब देते थे। उनका जवाब देश के प्रति ईमानदार रहने के आदेश से ही शुरू होता था। इसके बाद ही हालचाल पूछा जाता था। डॉ. चक्रवर्ती कहती हैं कि अपने भाई के व्यक्तित्व पर ताउम्र नाज करती रहूँगी। जन-जन के प्रिय भाई अटलजी को शत-शत नमन...।

आलेखः देवसत्ता को चुनौती देने वाले कृष्ण

देवसत्ता को चुनौती देने वाले कृष्ण
- प्रमोद भार्गव
वसुदेव-देवकी का जैविक पुत्र, तो नंदगोप-यशोदा का पालित चंचल पुत्र! ईश्वर भक्तों ने विष्णु के नौवें अवतार के रूप में कृष्ण को स्वीकारा, तो ज्ञानियों ने एक चिंतक व विचारक के रूप में देखा। योद्धाओं ने सुदर्शन चक्रधारी वीर पराक्रमी कहा, तो शासकों ने कृष्ण को कूटनीतिज्ञ ठहराया। रसिक जनो ने गोपियों के मध्य नृत्य करने वाले रसिया के रूप में देखा। ऐसे उदात्त प्रेमी के रूप में जाना, जिसकी बाँसुरी से निकली जादुई धुन से ब्याहता गोपियाँ समस्त मर्यादाओं को लाँघ खिंची चली आती हैं। वह कृष्ण ही थे, जब कामरूप के अधिपति यवनासुर को पराजित कर उसके कारागार में बंद 16 हजार स्त्रियों को बंधन-मुक्त कराया। उनके पतियों व परिजनों ने जब उन्हें स्वीकार नहीं किया, तो कृष्ण ने ही उन्हें सम्मान देने के लिए उनसे प्रतीकात्मक विवाह किया। इस कारण कामी भी कहा गया, किंतु उन्होंने परवाह नहीं की। कृष्ण ने इन्द्र को चुनौती दी ,तो उन्हें देवसत्ता के विरोधी के रूप में देखा गया। योगियों ने कृष्ण को योगी-कृष्ण के रूप अवलोकित किया। मथुरा छोड़ी तो कृष्ण को रणछोड़दास तक कहा गया। छल-कपट से प्रतिपक्षी को पराजित करने के विशेषण तो कृष्ण से इतने जुड़े हैं कि कृष्णशायद स्वयं ही सफाई देने में असमर्थ हैं। दरअसल सृजनकताओं ने कृष्ण के इतने रूप, इतनी विधाएँ और इतने आयाम रचे दिए हैं कि उनकी व्याख्या करना ही कठिन है।
 जब कृष्ण शिशु थे, तब उनके जन्म के साथ ही हत्या की प्रत्यक्ष भूमिका रच दी गई थी। उनके छह नवजात भ्राताओं की माता-पिता की खुली आँखों के सामने ही एक-एक कर हत्या कर दी गई। उनकी जान बचाने के लिए भी एक निर्दोष सद्यजात बालिका को बलि-वेदी की भेंट चढ़ना पड़ा। कृष्ण के बड़े होने के साथ-साथ कानों में जब ये जानकारियाँ आईं होंगी, तब वे कितने उहापोहों, विषाद और तनाव से गुजरा होंगे ? इस दौर का अहसास एक अनुभवी ही कर सकता है। सामान्य जन होता तो अवसाद में पगला गया होता ? उन्हें जैविक माँ-बाप के वात्सल्य की छाँव से विलग कर ऐसे लोगों की गोद में डाल दिया, जिनसे उनका कोई रक्त संबंध नहीं था। यह विरल संयोग है कि उन्होनें कृष्ण को इतने लाड़-प्यार और जतन से पाला कि शायद उनके असली माता-पिता भी न पाल पाते ? तत्पश्चात् पल-पल षड्यंत्रकारी दुष्टोंसे सामना होता रहा। आयु के अनुपात से कहीं ज्यादा सतर्कता, चैतन्यता और संघर्ष के दौर से गुजरना पड़ा! ऐसे विकट और विषाक्त परिवेश में अपनी, अपने समाज की प्राण रक्षा के लिए छल-कपट और लुका-छिपी कृष्ण नहीं खेलते तो क्या बच पाते ? वह तो दादा बलदाऊ साथ थे, जो हर संकट में संकटमोचक बने रहे। इसमें कोई विस्मय नहीं, कि जब लोकतंत्र से राजतंत्र की भिडंत होती है, तो जड़ हो चुकी स्थापित मान्यताओं के परिवर्तन की माँग उठती ही है। प्राण खतरे में डालकर कठोर संघर्ष करना ही पड़ता है। इतिहास साक्षी है, इन्हीं संकट और षड्यंत्रों से सामना करने वाले साहसी ही ईश्वर, नायक और नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरे हैं।
 ब्रह्माण्ड में उपलब्ध समस्त प्राणी-जगत में एकमात्र मनुष्य ही ऐसा जीवधारी है, जो उत्थान के चरम और पतन की निम्नतम यात्रा कर सकता है। मनुष्य का असीम उत्कर्ष हो सकता है, तो पराभव भी इतना हो सकता है कि लोग उसका नाम लेने में भी सकुचाएँ। भारतीय धर्मग्रंथों के युग परिवर्तन और बदले संदर्भों में जितनी व्याख्याएँ हुई हैं, उतनी शायद दुनिया के अन्य धर्मग्रंथों की नहीं हुई हैं। इन ग्रंथों में श्रीमद् भगवद गीता सबसे अग्रणी ग्रंथ है। इसका महत्त्व धर्मग्रंथ के रूप में तो है ही, प्रबंधन के ज्ञान भंडार के रूप में भी इसे पढ़ा व समझा जा रहा हैं।
       कृष्ण बाल जीवन से ही जीवनपर्यंत सामाजिक न्याय की स्थापना और असमानता को दूर करने की लड़ाई इंद्र की देव व कंस की राजसत्ता से लड़ते रहे। वे गरीब की चिंता करते हुए खेतीहर संस्कृति और दुग्ध क्रांति के माध्यम से ठेठ देशज अर्थ व्यवस्था की स्थापना और विस्तार में लगे रहे। सामारिक दृष्टि से उनका श्रेष्ठ योगदान भारतीय अखण्डता के लिए उल्लेखनीय है। इसीलिए कृष्ण के किसान और गौपालक कहीं भी फसल व गायों के क्रय-विक्रय के लिए मंडियों में पहुँचकर शोषणकारी व्यवस्थाओं के शिकार होते दिखाई नहीं देते ? कृष्ण जड़ हो चुकी उस राज और देव सत्ता को भी चुनौती देते हैं, जो जन विरोधी नीतियाँ अपनाकर लूट-तंत्र और अनाचार का हिस्सा बन गये थे ? भारतीय लोक के कृष्ण ऐसे परमार्थी थे, जो चरित्र भारतीय अवतारों के किसी अन्य पात्र में नहीं मिलता।
 16 कलाओं में निपुण इस महानायक के बहुआयामी चरित्र में वे सब चालाकियाँ बालपन से ही थीं, जो किसी चरित्र को वाक्पटु और थोड़ी उद्दण्डता के साथ निर्भीक नायक बनाती हैं। लेकिन बाल कृष्ण जब माखन चुराते हैं, तो अकेले नहीं खाते, अपने सब सखाओं को खिलाते हैं और जब यशोदा मैया चोरी पकड़े जाने पर दण्ड देती हैं, तो उस दण्ड को अकेले झेलते हैं। वे दण्ड का भागीदार उन सखाओं को नहीं बनाते, जो चाव से माखन खाने में भागीदार थे। चरित्र की यह विलक्षणता किसी उदात्त नायक की ही हो सकता है।
       कृष्ण का पूरा जीवन समृद्धि के उन उपायों के विरूद्ध था, जिनका आधार लूट और शोषण रहा। शोषण से मुक्ति, समता व सामाजिक समरसता से मानव को सुखी और संपन्न बनाने के गुर गढ़ने में कृष्ण का चिंतन लगा रहा। इसीलिए कृष्ण जब चोरी करते हैं, स्नान करती स्त्रियों के वस्त्र चुराते हैं, खेल-खेल में यमुना नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए कालिया नाग का मान-मर्दन करते हैं तो उनकी ये सब चंचलता रूपी हरकतें अथवा संघर्ष उत्सवप्रिय हो जाते हैं। नकारात्मकता को भी उत्सवधर्मिता में बदल देने का गुरुमंत्र कृष्ण चरित्र के अलावा दुनिया के किसी अन्य इतिहास नायक के चरित्र में विद्यमान नहीं है ?
       भारतीय मिथकों में कृष्ण के अलावा कोई दूसरी ईश्वरीय शक्ति ऐसी नहीं है, जो राजसत्ता से ही नहीं, उस पारलौकिक सत्ता के प्रतिनिधि इन्द्र से विरोध ले सकती हो, जिसका जीवनदायी जल पर नियंत्रण था? यदि हम इन्द्र के चरित्र को देवतुल्य अथवा मिथक पात्र से परे मनुष्य रूप में देखें तो वे जल प्रबंधन के विशेषज्ञ थे। लेकिन कृष्ण ने रूढ़, भ्रष्ट व अनियमित हो चुकी उस देवसत्ता से विरोध लिया, जिस सत्ता ने इन्द्र को जल प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी हुई थी और इन्द्र जल निकासी में पक्षपात बरतने लगे थे। किसान को तो समय पर जल चाहिए, अन्यथा फसल चौपट हो जाने का संकट उसका चैन हराम कर देता है। कृष्ण के नेतृत्व में कृषक और गौपालकों के हित में यह शायद दुनिया का पहला आंदोलन था, जिसके आगे प्रशासकीय प्रबंधन नतमस्तक हुआ और जल वर्षा की शुरूआत किसान हितों को दृष्टिगत रखते हुए शुरू हुई।
       पुरुषवादी वर्चस्ववाद ने धर्म के आधार पर स्त्री का मिथकीकरण किया। इन्द्र जैसे कामी पुरुषों ने स्त्री को स्त्री होने की सजा उसके स्त्रीत्व को भंग करके दी। देवी अहल्या के साथ छलपूर्वक किया गया दुराचार इसका शास्त्र सम्मत उदाहरण है। आज नारी नर के समान स्वतंत्रता और अधिकारों की माँग कर रही है, लेकिन कृष्ण ने तो औरत को पुरुष  के बराबरी का दर्जा द्वापर युग में ही दे दिया था। राधा विवाहित थीं, लेकिन कृष्ण की मुखर दीवानी थी। ब्रज भूमि में स्त्री स्वतंत्रता का परचम कृष्ण ने फहराया। जब स्त्री चीर हरण (द्रौपदी प्रसंग) के अवसर आया तो कृष्ण ने चुनरी को अनंत लंबाई दी। स्त्री संरक्षण का ऐसा कोई दूसरा उदाहरण दुनिया के किसी अन्य साहित्य में नहीं है ? इसीलिए वृंदावन में यमुना किनारे आज भी पेड़ से चुनरी बाँधने की परंपरा है । जिससे आबरू संकट की घड़ी में कृष्ण रक्षा करें। जबकि आज बाजारवादी व्यवस्था ने स्त्री की अर्ध निर्वस्त्र देह को विज्ञापनों का एक ऐसा माल बनाकर बाजार में छोड दिया है, जो उपभोक्तावादी संस्कृति का पोषण करती हुई लिप्साओं में उफान ला रही है। स्त्री खुद की देह को बाजार में उपभोग के लिए परोस रही हैं। स्त्री शुचिता की ऐसी निर्लज्जता के प्रदर्शन, कृष्ण साहित्य में देखने को नहीं मिलते।

       कृष्ण युद्ध कौशल के महारथी होने के साथ देश की सीमाओं की सुरक्षा संबंधी सामरिक महत्त्व के जानकार थे। इसीलिए कृष्ण पूरब से पश्चिम अर्थात मणिपुर से द्वारका तक सत्ता विस्तार के साथ उसके संरक्षण में भी सफल रहे। मणिपुर की पर्वत शृंखलाओं पर और द्वारका के समुद्र तट पर कृष्ण ने सामरिक महत्व के अड्डे स्थापित किए, जिससे कालांतर में संभावित आक्रांताओं यूनानियों, हूणों, पठानों, तुर्कों, शकों और मुगलों से लोहा लिया जा सके। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हमारे यही सीमांत प्रदेश आतंकवादी घुसपैठ और हिसंक वारदातों का हिस्सा बने हुए हैं। कृष्ण के इसी प्रभाव के चलते आज भी मणिपुर के मूल निवासी कृष्ण भक्त हैं। इससे पता चलता है कि कृष्ण की द्वारका से पूर्वोत्तर तक की यात्रा एक सांस्कृतिक यात्रा भी थी।
       सही मायनों में बलराम और कृष्ण का मानव सभ्यता के विकास में अद्भुत योगदान है। बलराम के कंधों पर रखा हल इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर है। वहीं कृष्ण मानव सभ्यता व प्रगति के ऐसे प्रतिनिधि हैं, जो गायों के पालन से लेकर दूध व उसके उत्पादनों से अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाते हैं। ग्रामीण व पशु आधारित अर्थव्यवस्था को गतिशीलता का वाहक बनाए रखने के कारण ही कृष्ण का नेतृत्व एक बड़ी उत्पादक जनसंख्या स्वीकारती रही। जबकि भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में हमने कृष्ण के उस मूल्यवान योगदान को नकार दिया, जो किसान और कृषि के हित तथा गाय और दूध के व्यापार से जुड़ा था। बावजूद पूरे ब्रज-मण्डल और कृष्ण साहित्य में कहीं भी शोषणकारी व्यवस्था की प्रतीक मंडियों और उनके कर्णधार दलालों का जिक्र नहीं है। जीवित गाय को आहारी मांस में बदलने वाले कत्लखानों का जिक्र नहीं है। शोषण मुक्त इस अर्थव्यवस्था का क्या आधार था, हमारे आधुनिक कथावाचक पंडितों और प्रबंधन का गुर सिखाने वाले गुरुओं को इसकी पड़ताल करनी चाहिए ?
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