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Mar 14, 2014

दो ग़ज़लें

किस कदर

-ज़हीर कुरैशी

किस कदर अहतियात करते हैं,
कूट- भाषा में बात करते हैं!
दूसरों को परास्त करने में,
हम स्वयं को भी मात करते हैं।
ये गुरिल्लों की युद्ध-शैली है,
लोग पीछे से घात करते हैं!
ऐसे छाए हैं द्वंद्वके बादल,
दोपहर में ही रात करते हैं।
प्यार से बात भी नहीं करते,
प्यार अक्सर बलात् करते हैं।
चाह कर भी न झील कर पाई,
काम जो जल-प्रपात करते हैं!
हर सुबह सैर पर निकलते ही,
सबसे हम शुभ प्रभात करते हैं।

संहार
झूठ पर धार कर नहीं पाए,
सच का संहार कर नहीं पाए!
जो चमत्कार करने आए थे,
वो चमत्कार कर नहीं पाए।
बढ़ रही है दरार रिश्तों में,
ठोस आधार कर नहीं पाए।
लोग साँपों के साथ रह कर भी,
विष का व्यापार कर नहीं पाए!
मन में भाटा-सा उठ रहा है कहीं,
हम उसे ज्वार कर नहीं पाए।
कूप-मंडूक, चाह कर भी...कभी,
देहरी पार कर नहीं पाए।
मन के मंदिर में बैठी मूरत को,
हम निराकार कर नहीं पाए!
सम्पर्क: 108, त्रिलोचन टॉवर, संगम सिनेमा के सामने, गुरुबख्श की तलैया, स्टेशन रोड, भोपाल- 462001 (म.प्र.), मो.09425790565, Email- poetzaheerqureshi@gmail.com

प्रेरक

भय और साहस
एक दिन, अफ्रीका के मैदानों में रहने वाले एक शिशु गौर (जंगली भैंसा) ने अपने पिता के पूछा, मुझे किस चीज से सँभलकर रहना चाहिए?
तुम्हें सिर्फ शेरों से बचकर रहना चाहिए, मेरे बच्चे, पिता ने कहा।
जी हाँ, उनके बारे में मैंने भी सुना है। अगर मुझे कभी कोई शेर देखा तो वहाँ से झटपट भाग लूँगा, शिशु गौर ने कहा।
नहीं बच्चे, उन्हें देखकर भाग लेने में समझदारी नहीं है, पिता गौर ने गंभीरता से कहा।
ऐसा क्यों? वे तो बहुत भयानक होते हैं और मुझे पकड़कर मार भी सकते है!
पिता गौर ने मुस्कुराते हुए अपने पुत्र को समझाया, बेटे, यदि तुम उन्हें देखकर भाग जाओगे तो वे तुम्हें पीछा करके पकड़ लेंगे। वे तुम्हारी पीठ पर चढ़कर तुम्हारी गर्दन दबोच लेंगे। तुम्हारा बचना तब असंभव हो जाएगा।
तो ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए? शिशु गौर ने पूछा।
जब तुम किसी शेर को देखो तो अपनी जगह पर अडिग रहकर उसे यह जताओ कि तुम उससे भयभीत नहीं हो। यदि वह वापस नहीं जाए तो उसे अपने पैने सींग दिखाओ और अपने खुरों को भूमि पर पटको। यदि इससे भी काम न चले तो उसकी ओर धीरे-धीरे बढऩे लगो। यह भी बेअसर हो जाए तो उस पर हमला करके किसी भी तरह से उसे चोट पहुँचाओ।
यह आप कैसी बातें कर रहे हैं? मैं भला ऐसा कैसे कर सकता हूँ? उन क्षणों में तो मैं डर से बेदम हो जाऊँगा। वह भी मुझ पर हमला कर देगा, शिशु गौर ने चिंतित होकर कहा।
घबराओ नहीं, बेटे। तुम्हें अपने चारों ओर क्या दिखाई दे रहा है?
शिशु गौर ने अपने चारों ओर देखा। उनके झुँड में लगभग 200 भीमकाय और खूँखार गौर थे जिनके कंधे मजबूत और सींग नुकीले थे।
बेटे, जब कभी तुम्हें भय लगे तो याद करो कि हम सब तुम्हारे समीप ही हैं। यदि तुम डरकर भाग जाओगे तो हम तुम्हें बचा नहीं पाएँगे, लेकिन यदि तुम शेरों की ओर बढ़ोगे तो हम तुम्हारी मदद के लिए ठीक पीछे ही रहेंगे।
शिशु गौर ने गहरी साँस ली और सहमति में सर हिलाया। उसने कहा, आपने सही कहा, मैं समझ गया हूँ।
हमारे चारों ओर भी सिंह घात लगाए बैठे हैं।
हमारे जीवन के कुछ पक्ष हमें भयभीत करते हैं और वे यह चाहते हैं कि हम परिस्तिथियों से पलायन कर जाएँ। यदि हम उनसे हार बैठे तो वे हमारा पीछा करके हमें परास्त कर देंगे। हमारे विचार उन बातों के धीन हो जाएँगे जिनसे हम डरते हैं और हम पुरुषार्थ खो बैठेंगे। भय हमें हमारे सामर्थ्य तक नहीं पहुँचने देगा। (हिन्दी ज़ेन)

फागण आयो रसिया...

     फागण आयो रसिया...

                   - ज्योत्स्ना 'प्रदीप'

बसंत ऋतु प्रकृति के यौवन की ऋतु है उस पर इस रूपसी के आँचल को स्पर्श करता- फागुन मास। सभी के आकर्षण का केन्द्र बन जाते हैं युगल प्रेमी। शायद इस महा-मिलन के अवसर पर ही भ्रमर आम्र मंजरियों को राग सुनाते हैं, सरसों मानो हल्दी का उबटन लगा और भी निखर जाती है गेहूँ की बालियाँ, नव परिधान मे खिलखिलाती हैं, कोकिल सबको मंगल गीत सुनाकर निमंत्रण देता है। एक मनचला अतिथि मुट्ठियों मे रंग, बाहों में ढेर सारा प्यार समेटे, अधरों पर लोकगीतों के मधुर स्वर लिये आता है, हमारा लाडला त्योहार- होली। होली भक्त प्रह्लाद की विजय का प्रतीक है, बुराई पर सत्य की जीत अर्थात् सत्य सतयुग से ही विजयी रहा है और बुराई को अग्नि भी क्षमा नहीं करती जैसे होलिका के साथ हुआ था।
हिन्दू पंचांग के अनुसार ये फागुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। पहले दिन को होलिका दहन तथा दूसरे दिन को धूलिवन्दन या दुल्हेंडी कहते हैं । वाद्य, नृत्य और लोकगीत होली के प्रमुख अंग है। हम बचपन से ही लोकगीतों की मिठास का रसास्वादन करते आ रहे हैं। फागुन मे लोकगीतों की परंपरा अत्यंत प्राचीन है शायद इस परंपरा का आरंभ तब से हुआ होगा जब से मानव के भीतर रसिकता का प्रादुर्भाव हुआ होगा। भारत मे लगभग सभी प्रांतों मे लोकगीत गाए जाते हैं; मगर उत्तर और पश्चिम भारत मे होली के लोकगीतों की छटा बड़ी निराली है। होली दहन के अंतर्गत गेहूँ की बालियाँ अग्निदेव को अर्पित करते हैं; तो लोगों की खुशी और भी बढ़ जाती है। सामूहिक रूप से होली दहन के बाद लोकगीत गाए जाते हैं। अग्नि के चारों ओर गाया जाने वाला ये लोकगीत प्रेम से परिपूर्ण हैं जिसे ढोल चंग और मंजीरों के साथ गाया जाता है -
फागण आया, फागण्यो रंगा द्यो रसिया,फागण आयो।
माथा ने मैमंद ल्याओ रंग रसिया,
काना न कुंडल ल्याओ रंग रसिया,
तो रखड़ी रतन जड़ाद्यो रसिया,फागण आयो।
राजी-राजी बोल गौरी,फागण्यो रंगाद्यू,
राखूं म्हारी प्यारी धण ने,
जीव की जड़ी, कचनार की कली, फागण आयो।
फागण आयो रसिया, खेला होली, फागण आयो।
दूसरे दिन को धूलिवन्दन कहते हैं सम्पूर्ण समाज को नव-चेतना  देने वाला दिन... रंगो तथा गुलाल की बरसात... सभी लोग इस उत्सव को बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। यह बड़ी मस्ती का दिन होता है । बच्चे, बूढ़े, जवान टोलियाँ बनाकर घर-घर जाकर खूब नाचते गाते हैं। प्रेम, मस्ती रंग और उस पर भंग! होली की टोली की मद भरी  ठिठोली देखिए।
होली का त्योहार है जमा हुआ है रंग,
छा जाएगा बाद में पहले घोट लो भंग।
दैनिक जीवन की ऊब को प्रसन्नता में बदलने वाला दिन लोक गीतों का इसमे बहुत बड़ा हाथ हैये गीत आनंद, हास-उल्लास के प्रतीक हैं। रंग, गुलाल,  केसर,  अबीर,  कुमकुम,  टेसू के फूल और साथ में बहुत सारी छेडख़ानी होती हैइन गीतों में-
जा साँवरियाँ के संग, रंग में कैसे होली खेलू री
कोरे-कोरे कलश भराये, जामे घोरौ ये रंग
भर पिचकारी सन्मुख मारी, चोली है गई तंग
ढोलक बाज़ै, मजीरा बाजै और बाजै मृदंग,
कान्हाजी की वंशी बाजै, राधाजी के संग
लहँगा त्यारो, दूम घुमारौ, चोली है पचरंग,
खसम तुम्हारे बड़े निखट्टू चलौ हमारे संग
उत्तर भारत में कई स्थानों में ऐसी मान्यता है कि लड़की का विवाह जिस साल हुआ हो उसे उस साल की होली को देखना नहीं चाहिए। ऐसी हालत में पिया अगर होली खेलने नहीं आता तो ये दशा तो होनी ही है उसकी-
फागुन में सखि फगुआ मचत है सब सखि खेलत फाग,
खेलत होली लोग करेला बोली, दगधत सकल शरीर।
एक लोक गीत-विरहिन की व्यथा का सुन्दर वर्णन -
पिया बिन नींद नहीं आवै
सखि फागुन मस्त महीना,
सब सखियन मंगल कीन्हा,
अरे तुम खेलत रंग गुलालै,
मोहे पिया बिन कौन दुलावै?
पिया  बिन नींद नहीं आवै
होली के लोक गीत मन मे छिपी संवेदनाओं को बरबस ही सबके समक्ष ले आते है। दु:ख व सुख दोनों को ही रागात्मक परिधान पहना देते है। सच पिया बिन होली का आनन्द है भी  कहाँ?
ब्रज के वायुमंडल में मानो राधा कृष्ण के दिव्य स्वर आज भी लोगो के पोर-पोर में रचे बसे हैं यहाँ के लोक गीत भक्ति रस का अनुष्ठान तो करते ही हैं साथ ही उल्लास की प्राणप्रतिष्ठा  भी करते हैं। कभी-कभी तो लोक गीत मन की शुद्धि को परमात्मा के मार्ग से मिला देते हैं। गुलाल...भोर की लाली -सा... कर्मों  की ओर अग्रसर करके ब्रज की धरा को आशीर्वादित करता है; जब वो बसंती पवन में नाचता ये लोक गीत सुनता है, तो धन्य हो जाता है-
आज बिरज में होरी है रे रसिया
उड़त गुलाल लाल भये बदरा
केसर की पिचकारी है रे रसिया। आज बिरज में ...
बाजत बीन,  मृदंग,  झाँझ ओ डफली
गावत दे-दे- तारी है रे रसिया। आज बिरज में ...
ब्रज से कुछ ही दूर बसा है बरसाना- जहाँ वो लोग रहते है जो नगरों के सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक भोले हैं। शायद इसलिए वे उल्लास की परिधि को पार कर दिव्य-आनन्द को छू लेते है इस पर्व पर।  बरसाना- जहाँ  बरसती है होली की रसधार,  नन्दगाँव के हुरियारे... कृष्ण और उनके सखा बनकर राधा के गाँव बरसाने जाते है। वहाँ की बालाएँ राधाजी और उनकी सखियो के धर्म का पालन करते हुए उनको रंगो की वर्षा में भिगो-भिगो कर वातावरण में अमृत -सी मिठास लिये यह गीत गाती हैं-
फ़ागत खेलत बरसाने आये हैं
नटवर नन्द किशोर।
घेर लई सब गली रंगीली
छाय रही छवि घटा रंगीली
ढप, ढोल, मृदंग बजाये है
वंशी की घनघोर
कभी-कभी तो बालाओं के प्रहारो से गोप लहूलुहान भी हो जाते हैं, पर चिंता कैसी? भगवान -इस जग के पालनहार हैं ना उनके साथ! जै गिर राज  बोल कर लो फिर से कूद गये रंगो के इस अनोखे समर में -
ले रहे चोट ग्वालन ढालन पै
हरिहर बाँमँगाये हैं, चलन लगे चहुँओर
नमन है ऐसी होली... ऐसे गीत... जो संतापो के गर्त को हटाकर...प्रेम बरसा दें...जीवन को इन्द्रधनुष बना दें....ऐसा इन्द्रधनुष ....जो वाद्ययंत्र के समान ...अपने में समाये स्वर..उस पर लुटा दे, जो उसे केवल  स्पर्श करता है ...बिन जाने कि उसे छूने वाला कौन है।

सम्पर्क: क्वार्टर नं-5, टाइप-3, सी आर पी एफ कैम्पस, जलन्धर- 144801 (पंजाब), Email-jyotsanapardeep@gmail.com

महिला दिवस पर नारी का सम्मान

महिला दिवस पर नारी का सम्मान

जिन्दल स्टील एण्ड पावर लिमिटेड रायगढ़ द्वारा अपने सामाजिक उत्तरदायित्व के क्रम में नारी जागरूकता कार्यक्रम की श्रृंखला में महिला दिवस के अवसर पर ओ.पी.जिन्दल स्कूल ऑडिटोरियम में नारी सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर जिले एवं क्षेत्र के समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाली महिलाओं का सम्मान किया गया। इनमें स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी डॉ. सुचित्रा त्रिपाठी, डॉ. काकोली पटनायक, डॉ. आनंदिता पुरकायस्थ, डॉ. लीना श्रीवास्तव, डॉ. देवतीर्था राय चौधरी, डॉ. सारिका सिंघल, बाल आयोग की जिला अध्यक्ष जस्सी फिलिप, प्रख्यात अधिवक्ता मायाभूषण गोस्वामी, राष्ट्रपति पुरूस्कार से सम्मानित शिक्षिका द्वय सुनीता चौबे व संध्या पाण्डे, महिला एवं बाल विकास कार्यक्रम से सम्बंद्ध साधना पाण्डेय, अन्तर्राष्ट्रीय मारवाड़ी महिला अध्यक्ष सुधा अग्रवाल, पंजाबी महिला समिति की चरणजीत कौर, मारवाड़ी ब्राह्मण समिति की मीना भारद्वाज, सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता माधुरी त्रिपाठी, ओ.पी.जिन्दल स्कूल की शिक्षिका लीना चाको, ग्राम कलमी की सरपंच बरत कुंवर पटेल, परसदा की सरपंच ढोल कुंवर पटेल, उपसरपंच संतोषी साहू सहित कामिनी वर्मा शामिल हैं।
इस अवसर पर अगरबत्ती निर्माण के लिए सरस्वती स्वसहायता समूह कलमी, सेनिटरी नैपकिन निर्माण इकाई के लिए जय माँ लक्ष्मी संयुक्त देयता समूह कुसमुरा, बड़ी पापड़, अचार निर्माण के लिए आदर्श स्वसहायता समूह जामपाली व ढोकरा आर्ट के लिए गोरखा विस्थापित झारा समूह पुरस्कृत किए गए। इस दौरान आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम के अन्तर्गत आशा दी होप एवं कलमी तथा भगवानपुर के महिला स्वसहायता समूह की महिलाओं ने लोकनृत्यों की आकर्षक प्रस्तुति दी। कार्यक्रम में जिन्दल संयंत्र क्षेत्र के आसपास के ग्रामों के स्वसहायता से संबद्ध सैकड़ों महिलाओं ने उत्साह के साथ अपनी गौरवशाली सहभागिता दर्ज करायी। वहीं वर्णिका जगन्नाथ ने ओडिसी नृत्य तथा राजश्री व श्वेता ने कथक प्रस्तुति से सबका मन मोह लिया। उक्त कार्यक्रमों के दौरान विशेष रूप से अंजना शुक्ला, विमला त्रिवेदी, अर्चना त्रिवेदी, जिन्दल महिला क्लब के वरिष्ठ सदस्य रंजना जिन्दल, श्रीमती ढिल्लन, अनुभा सिन्हा, सुमन चौहान, मीता पाण्डे, पूजा जोशी तथा धैर्यलक्ष्मी उपस्थित थीं। कार्यक्रम का आभार प्रदर्शन नीरू शर्मा ने किया।
कोल माईंस में भी मनाया गया महिला दिवस

विश्व महिला दिवस के अवसर पर जेएसपीएल कोल माईंस क्षेत्र में जागृति महिला मण्डल एवं निगमित सामाजिक दायित्व विभाग के संयुक्त तत्वाधान में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ जागृति महिला मण्डल की पदाधिकारियों एवं मुख्य अतिथि रेखा डोकानिया ने माँ सरस्वती की प्रतिमा के आगे दीप प्रज्वल्लन कर किया। इस वर्ष के थीम विषय नारी समानता सबकी प्रगति पर कार्यशाला के दौरान मुख्य अतिथि ने कहा कि हमें समानता का प्रयास घर से ही प्रारंभ करना चाहिए, तभी हम समाज में समानता की बात कर पाएँगे। महिला मण्डल की पदाधिकारी श्रीमती पण्डा ने कहा कि समाज को आगे बढ़ाने में महिलाओं का बराबर का योगदान है। सीएसआर के विभागाध्यक्ष दयानंद अवस्थी ने इस अवसर पर  निगमित सामाजिक दायित्व विभाग द्वारा महिला जागृति एवं उत्थान के कार्यक्रमों की जानकारी प्रदान की। फिर समाज के विकास में विशिष्ट योगदान देने वाली युवतियों व महिलाओं  को शाल एवं श्रीफल देकर सम्मानित किया गया। इस क्रम में निर्माण के क्षेत्र में ग्राम टपरंगा की कमला सिदार, शिक्षा के क्षेत्र में टपरंगा की पुष्पा धनेन्द्र, धौराभाठा की बबीता उरांव, जांजगीर की मोहरमति खंडईत, स्व सहायता समूह के माध्यम से महिला स्वावलंबन में योगदान के लिए आमगांव की सेतकुमारी सिदार को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर सीएसआर विभाग द्वारा संचालित कंप्यूटर प्रशिक्षण कार्यक्रम उड़ान की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए 52 विद्यार्थियों को प्रमाण पत्र भी प्रदान किए गए। इसमें पूजा सिदार ने सबसे अधिक 93 प्रतिशत अंक हासिल कर पहला स्थान प्राप्त किया।
महिलाएँ चली स्वावलंबन की राह पर
रायगढ़ में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ओपी जिंदल कम्यूनिटी कॉलेज द्वारा अपराजिता प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इसके तहत ओपी जिंदल कम्यूनिटी कॉलेज में बीते वर्ष 500 से अधिक महिलाओं ने विभिन्न शिक्षा एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर स्वावलंबन की राह पकड़ ली है। प्रशिक्षण हासिल कर ये महिलाएँ अब किसी पर आश्रित नहीं रहीं और स्वयं अपने परिवार का सहारा बन गई हैं। इससे न सिर्फ उनकी और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर हुईबल्कि सामाजिक स्तर में भी तेजी से बदलाव आ रहा है।
चेयरमैन नवीन जिंदल के मार्गदर्शन में जेएसपीएल हमेशा समाज में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए प्रयासरत रहा है। इसी दिशा में बड़ी पहल करते हुए ओपी जिंदल कम्यूनिटी कॉलेज के माध्यम से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपराजिता प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। ओपीजेसीसी की डायरेक्टर मिरियम जे कार्टर द्वारा इस प्रोजेक्ट के माध्यम से संयंत्र एवं कोयला खान क्षेत्र के आसपास बसे गाँवों के साथ पूरे जिले की महिलाओं को व्यावसायिक तौर पर प्रशिक्षित कर स्वावलम्बी बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट को लेकर महिलाओं ने भी अभूतपूर्व उत्साह दिखाया है। वर्ष 2013-14 में अब तक 500 से अधिक महिलाएँ इस प्रोजेक्ट से जुड़कर अलग-अलग क्षेत्रों में प्रशिक्षण हासिल कर स्व-रोजगार से जुड़ गई हैं। इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर ओपी जिंदल कम्यूनिटी कॉलेज ने अपराजिता प्रोजेक्ट की सफलता का भी उत्सव भी मनाया। इसके मुख्य अतिथि स्ट्रक्चरल स्टील डिवीजनपूंजीपथरा के कार्यपालन निदेशक एसवी राव रहे। अपराजिता प्रोजेक्ट के माध्यम से महिलाओं को राजमिस्त्रीप्लंबर एवं छोटे उपकरणों की मरम्मत का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
ओपी जिंदल कम्यूनिटी कॉलेज जिंदल समूह द्वारा सीएसआर के तहत की गई एक बड़ी पहल है। कॉलेज की डायरेक्टर मिरियम जे कार्टर ने कहा कि यहां बड़ी संख्या में ऐसे ग्रामीण युवा प्रशिक्षण हासिल कर रहे हैंजो किन्हीं कारणों से स्कूल की पढ़ाई अधूरी छोड़ चुके थे। इस कॉलेज का उद्देश्य मुनाफा हासिल करना नहीं है। इसके माध्यम से न सिर्फ युवाओं की बेरोजगारी दूर कर उन्हें विभिन्न कार्यों में दक्ष बनाते हुए नौकरियों के लिए तैयार किया जा रहा हैबल्कि उन्हें नैतिक रूप से भी मजबूत किया जा रहा है। ताकि वे मजबूत समाज का आधार बनकर देश की उत्पादकताशैक्षणिक और आर्थिक उन्नति में अपना हाथ बटा सकें। ओपी जिंदल कम्यूनिटी कॉलेजपूंजीपथरा में फिलहाल तीन और छह महीनों के प्रशिक्षण के लिए प्रवेश लिया जा रहा है। इसके लिए अंतिम तिथि 25 मार्च है। कॉलेज में सीमित संख्या में विद्यार्थियों के लिए हॉस्टल और आवाजाही की सुविधा भी उपलब्ध है। यहाँ किसी भी तरह की शैक्षणिक योग्यता वाले लोग प्रशिक्षण के लिए प्रवेश ले सकते हैं। इसके लिए 7389910788 या 7489172057 नंबर पर सुबह 9 से शाम 5 बजे के बीच संपर्क किया जा सकता है।
आमदनी के साथ सम्मान भी बढ़ा
तमनार की ही लक्ष्मीन भगत का कहना है कि प्रशिक्षण लेने से
पहले मैं निर्माण स्थल में एक सामान्य मजदूर की तरह काम करती थी। अब मैं पूर्णत: प्रशिक्षित राजमिस्त्री बन गई हूँ। इससे मेरी आमदनी भी पहले से काफी बढ़ गई है और मैं अधिक सम्मान से अपना काम कर पा रही हूँ। ओपी जिंदल कम्यूनिटी कॉलेज से प्रशिक्षण हासिल करने के बाद मेरे जीवन में यह बदलाव आया।

सुधर गई घर की आर्थिक स्थिति

ओपी जिंदल कम्यूनिटी कॉलेज से प्रशिक्षण हासिल कर राजमिस्त्री बनी तमनार की नवादाई भगत का कहना है कि राजमिस्त्री बनने के बाद मैं अपने परिवार की आर्थिक तौर पर बेहतर सहायता कर पा रही हूँ। पहले मिस्त्री के काम के लिए महिलाओं को उपयुक्त नहीं समझा जाता था। अब लोग स्वयं मेरे काम की प्रशंसा करते हैं। एक महिला राजमिस्त्री होने का मुझे गर्व है। घर के खर्च और दूसरी जरूरतों के लिए अब मैं अपने पति का हाथ अच्छी तरह से बंटा पा रही हूँ। इससे घर की आर्थिक स्थिति पहले से काफी सुधर गई है।  

हास परिहास का लें आनंद

हास परिहास का लें आनंद
  - विजय जोशी
  जीवन एक बड़ी आनन्ददायक निधि है , जो ईश्वर ने हमें प्रदान की है। कितनी मधुर सेज सजाकर उसने हमें इस धरती पर भेजा। पालन -पोषण की अनेक वस्तुएँ, स्वाद के लिये जिह्वा, पक्षियों का कलरव सुनने के लिये कान, रीतिमा देखने के लिआँखें, फूलों की सुगन्ध रसपान हेतु नासिका। हमारे आनन्द, ऐशो आराम और ऐश्वर्य का सौ प्रतिशत पुख्ता इंतजाम करने के बाद ही उसने हमें भेजा, लेकिन दुर्भाग्य, हम इन सबका वह आनन्द लाभ नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं, जो उसका अभिप्राय था।
आज की इस आपाधापी और बेइंतहा महँगाई के दौर में आदमी आनन्दतो दूर किसी तरह किसी तरह जी पाने के लिए ही संघर्ष कर रहा है। पुराना दौर और था ,जब विलासिता की वस्तुएँ नदारद थीं ;पर आदमी आनन्द में था। अब अंदर का आनन्द गायब है। मोबाइल और मोटरबाइक अधिक आवश्यक हो गए हैं; बजाय परिवार के साथ बैठकर खुशियाँ मनाने के। कृत्रिम कॉस्मेटिक जीवन हमारी विवशता बनाता जा रहा है। यह त्रासदी सही भी है, क्योंकि अब तो सत्रह से सत्तर रुपये पहुँची दाल भी- दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ वाली उक्ति को असत्य साबित कर रही है।
तो फिर क्या किया जाए, यह प्रश्न हम सबके जेहन को झकझोरता है। बड़ी खुशी की तलाश में हम छोटी-छोटी खुशियों की उपेक्षा करते हैं। सुनहरे भविष्य की खोज में अपना वर्तमान मटियामेट कर देते हैं। इसका एक मात्र उपाय है जीवन में हास परिहास का महत्त्व स्वीकारें। खुशियाँ मिलकर बाँटें । निगेटिक को पॉज़ीटिव में रूपांतरित करें; तब तो बात बनेगी।
एक दौर में मेरी नौकरी बहुत कठिन थी। न्यूनतम बारह घंटे प्रतिदिन। घर के काम महीनों लंबित रहते थे, जिन्हें पत्नी प्रसन्नतापूर्वक अंजाम दिया करती थी। लेकिन सब्र की भी सीमा हुआ करती है। एक दिन वह दुर्वासा बन बिफर पड़ी?- न जाने किस अशुभ मुहूर्त्त में मेरा तुमसे विवाह संस्कार हुआ, जो तुम मिले और जिसे मैं आज तक भुगत रही हूँ।
बात सारगर्भित, सत्य और सटीक थी - पुनर्जन्म तो मानती हो न मैंने पूछा-
हाँ अवश्य। पर पूछा क्यों- पत्नी बोली।
मैंने कहा- मैंने इस जन्म में न सही पर पूर्वजन्म में अवश्य अच्छे कर्म किये होंगे, जिस कारण तुम जैसी सुघड़ सुंदर और सलोनी पत्नी प्राप्त हुई। तुम्हें पति इतना दुष्ट क्यों मिला ,इसका कारण तुम खुद ही खोज लो। मैं तो तुम्हारे पूर्वजन्म के कर्मों का फल मात्र हूँ।
सूरजमुखी से ज्वालामुखी बनी पत्नी तुरंत चंद्रमुखी बन खिलखिला उठी। वो दिन है कि आज का दिन वह संवाद पत्नी ने फिर कभी नहीं दोहराया।
यह है हास- परिहास की शक्ति का चमत्कार जो कठिन संग्राम को सरल और सुहाने पलों में बदल सकता है। अपने अंदर के अबोध बालक को मरने मत दीजिए। बाल कृष्ण की शरारतों के बाद की मासूमियत ही तो यशोदा का गुस्सा कफूर कर दिया करती थी। जीवन आनन्द का दूसरा नाम है। इसे भुनाइए। अपने अंतस् में आनन्द पैदा कीजिए। खुद भी खुश रहिए, दूसरों को भी रखिए। कठिन पलों में वाद-विवाद के बजाय स्वीकारोक्ति का भी एक आनंद है, जो रिश्तों में खाई नहीं जन्मने देती।

सम्पर्क: 8/सेक्टर-2,शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास)           भोपाल- 462023, मो. 09826042641, Email-v.joshi415@gmail.com