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Sep 26, 2013

चार लघुकथाएँ

१.मस्तराम जिन्दाबाद
-कमलेश भारतीय
वे बेकार थे और सड़कों से अधिक दफ्तारों के चक्कर लगाते थे। भूखे थे और घर से पैसे आने बंद थे।
एक होटल में पहुँचे और आवाज़ लगाई- मस्तराम को बुलाओ।
मस्तराम हाजि़र हुआ। वहाँ काउंटर पर सब्जियों से भरे पतीले थे और वे सुबह से भूखे थे, पर ललचाई दृष्टि से देखते तो मस्तराम को शक पड़ जाता। ज़रा रौब से बोले, मस्तराम, हमें एक समारोह करना है। वो सामने वाला हॉल बुक करवा लिया है। लगभग दो सौ आदमियों का खाना इन्तज़ाम मतलब खाने-पीने का तुम्हारा रहेगा। ठीक है?
जी, साहब! यह तो आपने कल भी फरमाया था।
अच्छा, आज खाना चेक कराओ, ये हमारे बड़े संयोजकों में से एक हैं। ये तुम्हारा खाना देखेंगे...ठीक
नहीं, साहब, आप कहीं और इन्तजाम कर लें। मैं रोज़-रोज़ मुफ्त खाना चेक नहीं करवा सकता।
अरे, बेवकूफ, कल ये तुम्हें एडवांस दे जाएँगे। इसलिए दिल्ली से विशेष रूप से आए हैं।
ठीक है साहब लगवाता हूँ ।
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ मुस्कराकर देखा और योजना की सफलता पर आँखों ही आँखों में बधाई दी। डटकर खाना खाया। उठकर चलने से पहले खाने के बारे में अपनी राय बताई कि कल से थोड़ा अच्छा है; पर उस दिन तुम जानते हो बाहर से लोग आएँगे, काफी अच्छा बनाना। मस्तराम जी साहब, जी साहब करता गया। वे बाहर चले गए और सड़कों पर नारे लगाने लगे-मस्तराम जिंदाबाद!
२.विभाजन
बहुत भारी बहसों में भाग लेने व सुनने का मौका मिलता रहा कि हमारे यहाँ अमीरी व गरीबी के बीच बहुत फासला है। हम इसे कैसे दूर कर सकते हैं? कर भी सकते हैं या नहीं? दीवाली का दिन आया। सब घरों में दीवाली से कुछ दिन पहले ही रंग बिरंगी लडिय़ाँ जगमगा कर अपनी अमीरी का परचम लहराने लगीं। हमारे पड़ोस का घर अँधेरे में ही डूबा रहा। वे लोग दुकानों पर छोटे-मोटे काम करने सुबह ही निकल जाते हैं और घर की औरतें भी कोई न काम कर घर का सहारा बनती हैं। मेरा नाती आर्यन उनके हमउम्र बच्चे विक्की से पूरी तरह हिलमिल चुका है। हर वक्त उसे खेलने के लिए बुला लाता है। वह खेलकर अपने घर चला जाता है।
दीवाली आ गई। मेरे नाती का मन था कि वह अपने हमउम्र से मिल कर पटाखे छोड़े। पर वह उसे कहीं दिखाई नहीं दिया नाती ने अपनी माँ से पूछा- विक्की क्यों नहीं आया? माँ ने उसे प्यार से समझाया कि शायद उसके पास पटाखे न हों।
क्यों? आर्यन ने मासूम सवाल पूछा।
शायद उनके पापा इतने पैसे खर्च न कर सकते हों। माँ ने वैसा ही भोला- सा जवाब दिया।
तो मम्मी मैं विक्की को अपने पटाखों में से कुछ पटाखे दे दूँ?
हाँ-हाँ, क्यों नहीं।
आर्यन दौड़ कर विक्की के घर गया और सोने का बहाना कर रहे विक्की को उठाकर ले आया और अपने हिस्से के पटाखे उसे देकर खुद ताली बजाने लगा। पर क्या यह विभाजन दूर करना इतना सरल हैं? दीवाली की रोशनी में यह विभाजन और भी बुरी तरह चमकने ही नहीं बल्कि चुभने लगा। चुभता रहता है, हर दीवाली पर।

३.मेरे अपने
अपना शहर व घर छोड़े लगभग बीस साल से ज़्यादा वक्त बीत चुका। इस दौरान बिटिया सयानी हो गई। वर ढूँढा और हाथ पीले करने का समय आ गया। विवाह के कार्ड छपे, सगे-सम्बन्धियों व मित्रों को भेजे। शादी के शगुन शुरू हुए आँखें द्वार पर लगी रहीं। इस आस में कि दूर- दराज़ के सगे-सम्बन्धी आएँगे। वे सगे सम्बन्धी, जिन्होंने उसे गोदी में खिलाया और जिन्हें बेटी ने तोतली ज़ुबान में पुकारा था। पण्डित जी पूजा की थाली सजाते रहे। मैं द्वार पर टकटकी लगाए रहा। मोबाइल पर सगे सम्बन्धियों के सन्देश आने लगे। सीधे विवाह वाले दिन ही पहुँच पाएँगे जल्दी न आने की मज़बूरियाँ बयान करते रहे।
मैं उदास खड़ा था। इतने में ढोलक वाला आ गया। उसने ढोलक पर थाप दी। सारे पड़ोसी भागे चले आए और पण्डित जी को कहने लगे- और कितनी देर है? शुरू करो न शगुन!
पण्डित जी ने मेरी ओर देखा। मानो पूछ रहे हों कि क्या अपने लोग आ गए? मेरी आँखे खुशी से नम हो गईं। परदेस में यही तो मेरे अपने हैं। मैंने पण्डित जी से कहा-शुरू करो शगुन, मेरे अपने सब आ गए!
४.इस बार
इधर बच्चों के इम्तहान शुरू होते उधर नानाजी के खत आने शुरू हो जाते- इम्तहान खत्म होते ही बच्चों को माँ के साथ भेज देना- फौरन। यह हमारा हुक्म है। साल भर बाद तो पढ़ाई को बोझ उतरता है। मौज मस्ती कर लेंगे। हम भी इसी बहाने तुम लोगों से मिल लेंगे।
पिछले कई सालों से यह लगभग तयशुदा कार्यक्रम था जिसमें उलट- फेर करने की हमारी न इच्छा थी, न हिम्मत पड़ती थी। बच्चे भी इम्तहान खत्म होते-होते 'नानी के घर जाएँगे’  की रट लगाने लगते। बीच-बीच में उन्हें नाना-नानी का प्यार-दुलार, मामा-मामी का सैर-सपाटा कराना याद आ जाता। वे और उतावले हो उठते। इस बार इम्तहान शुरू होने की जैसे किसी को खबर ही न हुई, कोई चिट्ठी - पत्री नहीं। पत्नी रोज़ रात को पूछे- दफ्तर के पते पर कोई चिट्ठी नहीं आई?
आखिर चिट्ठी आई, लिखा था- इस बार आप लोगों को बुलाना चाहकर भी बुला नही पाएँगे। हालात खराब हैं। गोली-सिक्का बहुत बरस रहा है। पता नहीं कब, कहाँ, क्या हो जाए। हवा भी दरवाजे पर दस्तक देती है तो मन में बुरे ख्याल आने लगते हैं। आप जहाँ हैं, वहीं खुश रहो, सुखी रहो। हमारी बात का बुरा मत मानना। कौन माँ-बाप अपनी बेटी से मिलना न चाहेगा? पर इस बार अपने ही घर छुट्टियाँ मनाना। बच्चों को प्यार अपनी राजी खुशी की चिट्ठी लिखते रहो करो।

 सम्पर्क: उपाध्यक्ष, हरियाणा ग्रन्थ अकादमी, अकादमी भवन,पी-16, सेक्टर-14, पंचकूला 134113, फोन-0172-2585521,  Email- bhartiyakamlesh@yahoo.com

चम्पा चटकी

चम्पा चटकी

-शशि पुरवार

चम्पा चटकी
इधर डाल पर
महक उठी अँगनाई।

उषाकाल नित
धूप तिहारे
चम्पा को सहलाए ।

पवन फागुनी
लोरी गाकर
फिर ले रही बलाएँ।

निंदिया आई
अखियों में और
सपने भरें लुनाई।

श्वेत चाँद-सी
पुष्पित चम्पा
कल्पवृक्ष-सी लागे।

शैशव चलता
ठुमक-ठुमक कर
दिन तितली- से भागे।


नेह- अरक में
डूबी पैंजन
बजे खूब शहनाई।




सम्पर्क:  4, 2/1 सरकारी निवास सागर पार्क के सामने ,  कोजी कॉटेज के बाजू में महाबल रोड , जलगाँव (महाराष्ट्र) 425001 मो. 09420519803

हिन्दी को युवा वर्ग की चेतना बनाने का संघर्ष

हिन्दी को युवा वर्ग की चेतना बनाने का संघर्ष
डॉ. सुधा ओम ढींगरा

अमेरिका में हिन्दी एक विदेशी भाषा के रूप में जानी-पहचानी और पढ़ी जाती है; पर इसे इस स्वरूप तक लाने के लिए बहुत से भारतीयों ने अथक परिश्रम किया है। विदेश में हिन्दी के लिए वातावरण बनाना और वहीं पर जन्मे-पले बच्चों को माँ-बाप की भाषा सिखाना सरल कार्य नहीं। आज हिन्दी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। इसके पीछे एक लम्बा संघर्ष है; जिसे बताने की आवश्कता इसलिए है कि पाठक जान पाएँ कि अमेरिका में हिन्दी का कार्य किन-किन रास्तों से निकल कर किया गया है। अमेरिका में रह रहे भारतीयों ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए कई राहें अपनाई। हालाँकि भारतवासियों को वे राहें बेमानी और बेमतलब की लगेंगी; पर उन राहों का अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में बहुत योगदान है। एक तो विदेश की धरती, दूसरा अमेरिका का भौगोलिक फैलाव इतना है कि हिन्दी भाषी बिखरे हुए हैं और जब तक उन्हें एक छत तले इकठ्ठा करके इसके बारे में चिन्तन-विमर्श  न किया  जाए, तब तक हिन्दी का प्रचार-प्रसार करना, कठिन कार्य था। पर उन्हें एक छत तले लाया कैसे जाए ? यह प्रश्न भी हर क्षण हिन्दी प्रेमियों के आगे खड़ा रहता था। इसे समझने और समझाने के लिए कुछ दशक पहले के पृष्ठ पलटती हूँ।
 सन् पचास और साठ के दशक में अमेरिका में हिन्दी का प्रचार-प्रसार एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। भिन्न परिवेश और विदेशी भाषा के साम्राज्य में अपनी भाषा को जिन्दा रख पाना दुष्कर था। भारतीय मूल के लोग भारत से अपने साथ अनेक प्रतीक ले कर आए थे। इन प्रतीकों में शामिल थे -जीवन मूल्य, रीति-रिवाज़, पूजा- पद्धति, भाषाएँ, खान -पान की आदतें और पारिवारिक संरचना की परम्पराएँ। पहचान और स्थापना के संघर्ष ने उन्हें अपने में ही इतना उलझा दिया कि नए परिवेश में आकर अस्तित्व की दौड़  जारी रखते हुए उनके कुछ प्रतीक तो बच गए, कुछ कमज़ोर पड़ गए व कुछ बदल गए। नहीं बदला तो प्रवासी भारतीयों का पारंपरिक भाषा हिन्दी के साथ प्राकृतिक सम्बन्ध और भावनात्मक लगाव। कुछेक विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाने लगी थी। सन् 63 -64 और फिर 69-70 में अज्ञेय जी बर्कले में अतिथि प्रोफ़ेसर बन कर आए थे। पर आम भारतीय और नई पीढ़ी की हिन्दी भाषा के प्रति चेतना शून्य में ही टँगी रही। विश्वविद्यालयों में बहुत कम बच्चे हिन्दी पढऩे आते थे ।
 सन् अस्सी तक आते-आते बच्चों को हिन्दी भाषा की तरफ आकर्षित करने से अधिक गहन समस्या थी, हिन्दी भाषी परिवारों को हिन्दी के प्रति उनकी उस उदासीनता से उबारना, जो संघर्ष और भिन्न परिवेश में कहीं अनजाने ही पनप गई थी। हिन्दी के प्रति उनकी उदासीनता ही युवा पीढ़ी को हिन्दी से दूर ले जा रही थी; अत: हिन्दी के साथ उनके प्राकृतिक सम्बन्ध और नई पीढ़ी के लिए उन्हें सचेत करना प्रमुख लक्ष्य नज़र आया। उसके लिए एक जुट होकर कार्य करना बहुत महत्त्वपूर्ण था। बहुत से हिन्दी प्रेमी निस्वार्थ भाव से और तन, मन, धन से उस  हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए एकत्र हो गए, जो प्रवासी भारतीयों के माथे की बिंदी, अस्मिता और पहचान है।
सन् 1980 में (स्वर्गीय) डॉ. कुँवर चन्द्र प्रकाश सिंह ने अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति की स्थापना  की। सी सुब्रमण्यम और के .आर .नारायणन ने इस की नींव डाली। उनके बेटे डॉ. रवि प्रकाश सिंह ने इस संस्था को आगे बढ़ाया। इस संस्था के कई लक्ष्य हैं, उनमें से एक है कवि सम्मलेन करवाना। शुरू से ही इस के पीछे भाव था, इन कवि सम्मेलनों के द्वारा हिन्दी भाषी, हिन्दी प्रेमियों को एक छत तले इकठ्ठा करना, ताकि वे इसके प्रचार-प्रसार के बारे में सोचें और आगामी पीढ़ी को यह भाषा सिखाने के लिए प्रेरित हों। उस समय कवि सम्मेलन ही एक ऐसा माध्यम नज़र आया, जिससे हिन्दी भाषी इकट्ठे  हो सकते थे। जुलाई 1983 में पहला कवि सम्मलेन करवाया गया, जिसमें अटल बिहारी बाजपेयी और गुलाब खंडेलवाल ने हिस्सा लिया। उसके बाद नीरज, प्रभा ठाकुर और नंद किशोर नौटियाल आए। फिर अनंत शास्त्री एवं जयरमन और 1985 में वृजेन्द्र अवस्थी और सोम ठाकुर आए। तब तक कवि सम्मेलनों में जो सुनने के लिए आते थे वे सिर्फ साहित्य में रुचि रखने वाले या वे हिन्दी भाषी जो कवि सम्मेलनों को भारत में भी सुनते आए थे और इस पम्परा से परिचित थे। हाँ जागृति स्वरूप कई मंदिरों में हिन्दी स्कूल ज़रूर शुरू हो गए थे, हालाँकि कई शहरों के मंदिरों में पहले से ही हिन्दी पढ़ाई जा रही थी। कई हिन्दी भाषी स्वयं सेवी अध्यापक बने और छोटे बच्चों को हिन्दी पढ़ाने लगे। मंदिरों का चुनाव इसलिए किया जाता था और किया जाता है कि वहाँ हिन्दी पढ़ाने के लिए कमरों की सुविधा होती है।
अमेरिका में अपने वर्षों के प्रवास और हिन्दी के विभिन्न कार्यों से जुड़े होने और 1985 में यूनिवर्सिटी में हिन्दी पढ़ाने के अनुभवों से एक बात महसूस की थी वह यह है कि यहाँ के जन्मे- पले भारतीय मूल के छात्रों को हिन्दी भाषा की तरफ तभी आकर्षित कर सकते हैं, अगर यह सहज और सरल तरीके से उन तक पहुँचाई जाए। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी, सेंट लुईस में हिन्दी पढ़ाते हुए एहसास हुआ कि भारतीय मूल के होते हुए भी, यहाँ के छात्र हिन्दी को विदेशी भाषा के रूप में सीखते हैं, अत: शुद्ध हिन्दी की बजाय सरल हिन्दी में उन्हें पढ़ाना पड़ा। मैंने जब हिन्दी फिल्मों के गीतों और फिल्मों के उन दृश्यों का सहारा लिया, जिनसे मैं विद्यार्थियों को हिन्दी की शब्दावली, व्याकरण, रिश्ते, महीने, वर्ष आसानी से और जल्दी से सिखा सकी, तो कक्षा में बच्चों का प्रवेश बढ़ गया। बहुत से अहिन्दी भाषी परिवारों के बच्चे भी हिन्दी कक्षाओं में प्रवेश लेने लगे। गीतों में संस्कृति भी होती है और आसान से आसान ढंग से हिन्दी पढ़ाने में फिल्मी गीतों का उपयोग कर मैंने यह पाया कि इस तरह से एक तो कक्षा जीवन्त हो उठती थी और दूसरा व्याकरण उन्हें तुरंत समझ में आती थी।
अमेरिका में भाषाएँ खेल-खेल में सिखा दी जाती हैं- मेरे सामने पब्लिक ब्राडकास्टिंग सर्विसिज़ (पी. बी. एस.) के कार्यक्रम सेस मी स्ट्रीट का उदाहरण था, जिसमें तरह-तरह की कठपुतलियाँ खेलतीं, आपस में बातचीत करतीं और  बच्चों को अंग्रेज़ी सिखा जाती हैं। यह कार्यक्रम आज भी पी. बी. एस. पर चल रहा है। सन् 2003 में कोलंबिया विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका डॉ. अंजना संधीर ने एक पुस्तक निकाली -Learn Hindi and Film Songs.यह पुस्तक New York Life Insurance  ने छपवाई थी और इसकी दस हज़ार कापियाँ पूरे अमेरिका में बच्चों वाले परिवारों को मुफ्त में उपलब्ध करवाई गईं। हिन्दी गानों की यह सशक्त विधा अमेरिका में भाषा-शिक्षण के पाठ्यक्रमों में अधिक प्रभाव के साथ उभरी।
सन् अस्सी से नब्बे के दशक में बड़े शहरों में तो हिन्दी सिनेमा थियेटर में दिखाया जाता था, पर छोटे शहरों में लोगों को यह सुविधा नहीं थी। हाँ उन दिनों विडिओ प्लेयर बाज़ार में उपलब्ध हो गूँजने लगे फिल्मी गाने जो बच्चों को आकर्षित करने लगे। उनकी रिदम तथा बीट उन्हें भाने लगी। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वे उन पर नाचने लगे.. और साथ ही उनके अर्थ और उच्चारण भी सीखने लगे..इसी समय अमेरिका में कम्प्यूटर उद्योग में एक क्रांति आई। भारत से भारी संख्या में युवा भारतीय अमेरिका आए और छोटे-बड़े शहरों के सिनेमा घर हिन्दी फिल्में देखने वालों से भरने लगे। विश्वविद्यालयों में भी भारत से पढऩे आने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या में वृद्धि हुई और साथ ही भारतीय मूल के छात्र भी सिनेमा घरों तक पहुँचने लगे व धड़ल्ले से विश्वविद्यालयों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में फिल्मी गीत गाने लगे। फिल्मी गीतों, लोक गीतों पर भाँगड़ा और गिद्धा होने लगा। भारतीय मूल के छात्रों में एक भारी परिवर्तन आया। विभिन्न भाषा-भाषी परिवारों के छात्र अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिन्दी के शब्द अपनी बातचीत में लाने लगे और हिन्दी फिल्मों पर बातचीत होने लगी।
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति से तीन संस्थाओं ने जन्म लिया-अखिल विश्व हिन्दी समिति, हिन्दी न्यास और हिन्दी यू. एस. ए. अखिल विश्व हिन्दी समिति और हिन्दी न्यास तो अमरीका के कवियों के कवि सम्मलेन करवाते हैं और अखिल विश्व हिन्दी समिति कभी-कभी भारत से भी कवि बुला लेती है। हिन्दी  यू. एस. ए. हर साल हिन्दी महोत्सव कार्यक्रम करते हैं, जिसमें वे भारत से कवि बुला कर कवि सम्मलेन करवाते हैं, पर यह कार्यक्रम मुख्य रूप से नई पीढ़ी का होता है। इसमें 1500 बच्चों का कविता पाठ करवाया जाता है और सिर्फ 80 बच्चे  उनमें से चुने जाते हैं। हिन्दी महोत्सव से कई दिन पहले यह प्रतियोगिता शुरू हो जाती है। बच्चे जब कविता सुनाते हैं, तो ऐसा महसूस होता है कि कवि सम्मेलनों का, हिन्दी का भविष्य अमेरिका में सुरक्षित है और कविता कहने की यह विधा और परम्परा युवा पीढ़ी में प्रचलित हो रही है। हिन्दी यू. एस. ए के 30 से ऊपर हिन्दी के स्कूल हैं जिनमें सिर्फ हिन्दी पढ़ाई जाती है, 3000 से अधिक विद्यार्थी हिन्दी पढ़ते हैं, 250 अध्यापक और 70 स्वयं सेवी हैं।       
आज स्थिति यह है कि अमरीका के हर शहर में प्रवासी भारतीय लघु भारत बसाए हुए हैं और विभिन्न भाषा-भाषी आपसी संवाद के रूप में हिन्दी का प्रयोग अधिक कर रहे हैं हिन्दी के इस निरन्तर बढ़ते प्रयोग के लिए हिन्दी सिनेमा और हिन्दी दूरदर्शन का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं सराहनीय है। विडियो टैक्नालोजी और उपग्रह रेडियो संचरण के माध्यम से हज़ारों मील दूर बसे प्रवासी भारतीयों के घरों में आज भारतीय सिनेमा, टेलीविज़न और रेडियो सहज ही पहुँच रहे हैं। इस कारण प्रवासी भारतीयों का अपने भारत से सम्बन्ध बराबर बना रहता है। वे सजीव समाचारों के माध्यम से वहाँ की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति से भी अवगत रहते हैं। अपनी भाषा को सीखने और सुरक्षित रखने की जागरूकता भी उनमें बढ़ गई है। हिन्दी पढऩे वाले विद्यार्थियों की संख्या विश्वविद्यालयों में लगातार बढ़ती जा रही है और हिन्दी में मास्टर और पी-एचडीकरवाने की कोशिश जारी है।
अमेरिका के साहित्यकारों ने हिन्दी साहित्य को भी समृद्ध किया है। यहाँ के साहित्यकारों के 300 के करीब कविता- कहानी संग्रह और उपन्यास आ चुके हैं। कई साहित्यकार साहित्य की मुख्य धारा का अंग बन चुके हैं।
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की ओर से विश्व, हिन्दी न्यास की तर$फ से हिन्दी जगत, अखिल विश्व हिन्दी समिति की सौरभ और हिन्दी यूएसए की कर्म भूमि पत्रिकाएँ छपती  हैं। अमरीका और कैनेडा के संयुक्त प्रयास से हिन्दी प्रचारिणी सभा की पत्रिका हिन्दी चेतना पिछले 15 वर्षों से नियमित और निरन्तर छप रही है तथा स्तरीय पत्रिका के रूप में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर रही है। यह सर्कुलेशन में सबसे अधिक है।
कैनेडा में हिन्दी राइटर गिल्ड्स, हिन्दी साहित्य सभा और हिन्दी परिषद् हिन्दी के प्रचार-प्रसार में सक्रिय हैं। कैनेडा से हिन्दी टाइम्स, हिन्दी एब्रॉड आदि साप्ताहिक समाचार पत्र निकलते हैं। यूके से कथा यूके, यूके हिन्दी समिति संस्थाएँ हिन्दी को समृद्ध कर रहीं हैं। यूके हिन्दी समिति ‘पुरवाई’ पत्रिका निकालती है। नार्वे में सुरेश चन्द्र शुक्ल आलोक स्पाइल पत्रिका निकालते हैं। अन्य देशों में भी हिन्दी के विकास के लिए निरन्तर प्रयास हो रहे हैं।
स्थानीय भाषाओं के प्रभुत्व में इतने प्रयासों के बावजूद हिन्दी को युवा वर्ग की चेतना बनाने का संघर्ष अभी भी जारी है।

सम्पर्क: 101 Guymon Ct.Morrisville, NC-27560,USA , Email-sudhadrishti@gmail.com

घर-परिवार की धूप-छाँव तले सुखद शाम

घर-परिवार की धूप-छाँव तले सुखद शाम

-       प्रांजल कुमार

'घर परिवार' कल्याणी केशरवानी जी की पहली प्रकाशित कृति है। हालांकि अस्सी और नब्बे के दशक में उनके पारिवारिक आलेख पत्र पत्रिकाओं में प्रमुखता से छपते रहे हैं। प्रस्तुत पुस्तक उन्हीं आलेखों का संग्रह है। उनके आलेखों में अपने और आस-पास घटने वाली घटनाओं का सहज सरल विश्लेषण और निराकरण होता है ,जिससे आम पाठक उसे अपने परिवार की समस्या मानकर खुश हो जाता था। घर है तो परिवार है ... और घर -परिवार में चार बर्तन है तो उसमें टकराव होगा ही। परिवार में इगो, मतभेद, शंका-कुशंका और पति-पत्नी के झगड़े धीरे-धीरे इतने विकराल हो जाते हैं कि परिवार बिखर जाता है  और कभी कभी तो इसके दुष्परिणम होते हैं। दहेज, भौतिक सुख -सुविधा की अनुलब्धता, बच्चे नहीं हुए या लड़के की चाह में लड़कियों की फेहरिस्त आदि अनेक कारणों से परिवार में अशांति हो जाती है और परिवार में पति-पत्नी अजनबी जैसे रहने के लिए मजबूर होते हैं। किसकी चाह नहीं होती कि उसका पति उसक बेइन्तिहा चाहता रहे, उसकी हर चाहत को खुशी खुशी पूरी करे लेकिन न जाने ऐसा क्या होता है कि यह चाहत धरी रह जाती है। रोज-रोज की छोटी-छोटी समस्याएँ विकराल रूप धारण करके परिवार की शांति में जहर घोल देता है। दिन भर के कामकाज के बाद दो घड़ी का सुकून और प्रेम -भरा साथ भी दूभर हो जाता है ; क्योंकि वही चाहत जो कभी एक दूसरे के लिए थी, अब कुछ और चाहने लगता है। इसके लिए लेखिका का सुझाव है कि वैवाहिक सम्बन्धों को मधुर बनाए रखने और पति-पत्नी को खुश रखने की दिशा में सबसे कारगर उपाय है संयम। गुस्सा किसे नहीं आता और जब आता है तो दूध के उफान की तरह। मुँह से निकली बातें तरकश से निकले तीर की तरह वापस नहीं आती। ऐसे समय में संयम से काम लिया जाए ,तो बात नहीं बिगड़ नहीं पाती। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में संयम अधिक होता है। घर को घर बनाए रखने की चिंता भी उसी को अधिक होती है।
आज के भौतिकतावादी युग में जहाँ पति-पत्नी दोनों को घर की चार दीवारी को लाँघने पर मजबूर कर दिया ,वहीं परिवार को बड़े बूढ़ों और बच्चों से अलग कर दिया है। संयुक्त परिवार की बात अब कपोल कल्पित लगते हैं। पत्नी सारा दिन खटने के बाद जब घर लौटती है तो बच्चे-बूढ़े सब अपना बोझ उनके साथ शेयर करने को बेताब रहते हैं। थोड़ा- सा खाली समय जिसमें बच्चों की देखरेख और ममता चाहिए, पति को सेवा चाहिए, परिवार को व्यवस्था चाहिए और अतिथियों को सत्कार...। थके पाँव, सीमित समय और चारों ओर व्यस्तता, ऐसे में सुखद शाम की बात धरी की धरी रह जाती है। बड़े बुजुर्गो की अनुभवी झिड़की और बच्चों को मन लुभावनी शरारतें भी बोझ लगने लगता है।
प्रस्तुत पुस्तक 'घर परिवार' में 28 पारिवारिक आलेख संगृहीत हैं जो परिवार की विभिन्न समस्याओं को लेकर लिखी गयी है। अपने आलेखों में कल्याणी जी ने सुखी और समृद्ध परिवार के लिए महत्त्वपूर्ण सुझाव भी दिए हैं ,जो घर परिवार के छाँव तले सुखद शाम की बात को साकार करती है। इससे यह पुस्तक हर घर और परिवारजन के लिए उपयोगी बन गई है। घर परिवार को रेखांकित  करता पुस्तक का मुख पृष्ठ । इसे और आकर्षित बनाता है।


दर्द भरी आवाज़

दर्द भरी आवाज़ 


 -फ़िराक़ गोरखपुरी


जो न मिटे ऐसा नहीं कोई भी संजोग


होता आया है सदा मिलन के बाद वियोग।



जग के आँसू बन गए निज नयनों के नीर

अब तो अपनी पीर भी जैसे पराई पीर।


मैंने छेड़ा था कहीं दुखते दिल का साज़

गूँज रही है आज तक दर्द भरी आवाज़।