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Jul 18, 2013

दोपहर का भोजन


दोपहर का भोजन
- अमरकांत
सिद्धेश्वरी ने खाना बनाने के बाद चूल्हे को बुझा दिया और दोनों घुटनों के बीच सिर रख कर शायद पैर की उँगलियाँ या जमीन पर चलते चीटें-चीटियों को देखने लगी।
अचानक उसे मालूम हुआ कि बहुत देर से उसे प्यास नहीं लगी हैं। वह मतवाले की तरह उठी और गगरे से लोटा-भर पानी ले कर गट-गट चढ़ा गई। खाली पानी उसके कलेजे में लग गया और वह हाय राम कह कर वहीं जमीन पर लेट गई।
आधे घंटे तक वहीं उसी तरह पड़ी रहने के बाद उसके जी में जी आया। वह बैठ गई, आँखों को मल-मल कर इधर-उधर देखा और फिर उसकी दृष्टि ओसारे में अध-टूटे खटोले पर सोए अपने छह वर्षीय लड़के प्रमोद पर जम गई।
लड़का नंग-धड़ंग पड़ा था। उसके गले तथा छाती की हड्डियाँ साफ दिखाई देती थीं। उसके हाथ-पैर बासी ककडिय़ों की तरह सूखे तथा बेजान पड़े थे और उसका पेट हंडिया की तरह फूला हुआ था। उसका मुख खुला हुआ था और उस पर अनगिनत मक्खियाँ उड़ रही थीं।
वह उठी, बच्चे के मुँह पर अपना एक फटा, गंदा ब्लाउज डाल दिया और एक-आध मिनट सुन्न खड़ी रहने के बाद बाहर दरवाजे पर जा कर किवाड़ की आड़ से गली निहारने लगी। बारह बज चुके थे। धूप अत्यंत तेज थी और कभी एक-दो व्यक्ति सिर पर तौलिया या गमछा रखे हुए या मजबूती से छाता ताने हुए फुर्ती के साथ लपकते हुए-से गुजर जाते।
दस-पंद्रह मिनट तक वह उसी तरह खड़ी रही, फिर उसके चेहरे पर व्यग्रता फैल गई और उसने आसमान तथा कड़ी धूप की ओर चिंता से देखा। एक-दो क्षण बाद उसने सिर को किवाड़ से काफी आगे बढ़ा कर गली के छोर की तरफ निहारा, तो उसका बड़ा लड़का रामचंद्र धीरे-धीरे घर की ओर सरकता नजर आया।
उसने फुर्ती से एक लोटा पानी ओसारे की चौकी के पास नीचे रख दिया और चौके में जा कर खाने के स्थान को जल्दी-जल्दी पानी से लीपने-पोतने लगी। वहाँ पीढ़ा रख कर उसने सिर को दरवाजे की ओर घुमाया ही था कि रामचंद्र ने अंदर कदम रखा।
रामचंद्र आ कर धम-से चौकी पर बैठ गया और फिर वहीं बेजान-सा लेट गया। उसका मुँह लाल तथा चढ़ा हुआ था, उसके बाल अस्त-व्यस्त थे और उसके फटे-पुराने जूतों पर गर्द जमी हुई थी।
सिद्धेश्वरी की पहले हिम्मत नहीं हुई कि उसके पास आए और वहीं से वह भयभीत हिरनी की भाँति सिर उचका-घुमा कर बेटे को व्यग्रता से निहारती रही। किंतु, लगभग दस मिनट बीतने के पश्चात भी जब रामचंद्र नहीं उठा, तो वह घबरा गई। पास जा कर पुकारा - बड़कू, बड़कू! लेकिन उसके कुछ उत्तर न देने पर डर गई और लड़के की नाक के पास हाथ रख दिया। साँस ठीक से चल रही थी। फिर सिर पर हाथ रख कर देखा, बुखार नहीं था। हाथ के स्पर्श से रामचंद्र ने आँखें खोलीं। पहले उसने माँ की ओर सुस्त नजरों से देखा, फिर झट-से उठ बैठा। जूते निकालने और नीचे रखे लोटे के जल से हाथ-पैर धोने के बाद वह यंत्र की तरह चौकी पर आ कर बैठ गया।
सिद्धेश्वरी ने डरते-डरते पूछा, 'खाना तैयार है। यहीं लगाऊँ क्या?’
रामचंद्र ने उठते हुए प्रश्न किया, 'बाबू जी खा चुके?’
सिद्धेश्वरी ने चौके की ओर भागते हुए उत्तर दिया, 'आते ही होंगे।’
रामचंद्र पीढ़े पर बैठ गया। उसकी उम्र लगभग इक्कीस वर्ष की थी। लंबा, दुबला-पतला, गोरा रंग, बड़ी-बड़ी आँखें तथा होठों पर झुर्रियाँ।
वह एक स्थानीय दैनिक समाचार पत्र के दफ्तर में अपनी तबीयत से प्रूफरीडरी का काम सीखता था। पिछले साल ही उसने इंटर पास किया था।
सिद्धेश्वरी ने खाने की थाली सामने ला कर रख दी और पास ही बैठ कर पंखा करने लगी। रामचंद्र ने खाने की ओर दार्शनिक की भाँति देखा। कुल दो रोटियाँ, भर-कटोरा पनियाई दाल और चने की तली तरकारी।
रामचंद्र ने रोटी के प्रथम टुकड़े को निगलते हुए पूछा, 'मोहन कहाँ हैं? बड़ी कड़ी धूप हो रही है।’
मोहन सिद्धेश्वरी का मँझला लड़का था। उम्र अठ्ठारह वर्ष थी और वह इस साल हाईस्कूल का प्राइवेट इम्तहान देने की तैयारी कर रहा था। वह न मालूम कब से घर से गायब था और सिद्धेश्वरी को स्वयं पता नहीं था कि वह कहाँ गया है।
किंतु सच बोलने की उसकी तबीयत नहीं हुई और झूठ-मूठ उसने कहा, 'किसी लड़के के यहाँ पढ़ने गया है, आता ही होगा। दिमाग उसका बड़ा तेज है और उसकी तबीयत चौबीस घंटे पढ़ने में ही लगी रहती है। हमेशा उसी की बात करता रहता है।’
रामचंद्र ने कुछ नहीं कहा। एक टुकड़ा मुँह में रख कर भरा गिलास पानी पी गया, फिर खाने लग गया। वह काफी छोटे-छोटे टुकड़े तोड़ कर उन्हें धीरे-धीरे चबा रहा था।
सिद्धेश्वरी भय तथा आतंक से अपने बेटे को एकटक निहार रही थी। कुछ क्षण बीतने के बाद डरते-डरते उसने पूछा, 'वहाँ कुछ हुआ क्या?’
रामचंद्र ने अपनी बड़ी-बड़ी भावहीन आँखों से अपनी माँ को देखा, फिर नीचा सिर करके कुछ रुखाई से बोला, 'समय आने पर सब ठीक हो जाएगा।’
सिद्धेश्वरी चुप रही। धूप और तेज होती जा रही थी। छोटे आँगन के ऊपर आसमान में बादल में एक-दो टुकड़े पाल की नावों की तरह तैर रहे थे। बाहर की गली से गुजरते हुए एक खड़ख़डिय़ा इक्के की आवाज आ रही थी। और खटोले पर सोए बालक की साँस का खर-खर शब्द सुनाई दे रहा था।
रामचंद्र ने अचानक चुप्पी को भंग करते हुए पूछा, 'प्रमोद खा चुका?’
सिद्धेश्वरी ने प्रमोद की ओर देखते हुए उदास स्वर में उत्तर दिया, 'हाँ, खा चुका।’
'रोया तो नहीं था?’
सिद्धेश्वरी फिर झूठ बोल गई, 'आज तो सचमुच नहीं रोया। वह बड़ा ही होशियार हो गया है। कहता था, बड़का भैया के यहाँ जाऊँगा। ऐसा लड़का..’
पर वह आगे कुछ न बोल सकी, जैसे उसके गले में कुछ अटक गया। कल प्रमोद ने रेवड़ी खाने की जिद पकड़ ली थी और उसके लिए डेढ़ घंटे तक रोने के बाद सोया था।
रामचंद्र ने कुछ आश्चर्य के साथ अपनी माँ की ओर देखा और फिर सिर नीचा करके कुछ तेजी से खाने लगा।
थाली में जब रोटी का केवल एक टुकड़ा शेष रह गया, तो सिद्धेश्वरी ने उठने का उपक्रम करते हुए प्रश्न किया, 'एक रोटी और लाती हूँ?’
रामचंद्र हाथ से मना करते हुए हड़बड़ा कर बोल पड़ा, 'नहीं-नहीं, जरा भी नहीं। मेरा पेट पहले ही भर चुका है। मैं तो यह भी छोड़ऩे वाला हूँ। बस, अब नहीं।’
सिद्धेश्वरी ने जिद की, 'अच्छा आधी ही सही।’
रामचंद्र बिगड़ उठा, 'अधिक खिला कर बीमार कर डालने की तबीयत है क्या? तुम लोग जरा भी नहीं सोचती हो। बस, अपनी जिद। भूख रहती तो क्या ले नहीं लेता?’
सिद्धेश्वरी जहाँ-की-तहाँ बैठी ही रह गई। रामचंद्र ने थाली में बचे टुकड़े से हाथ खींच लिया और लोटे की ओर देखते हुए कहा, 'पानी लाओ।’
सिद्धेश्वरी लोटा लेकर पानी लेने चली गई। रामचंद्र ने कटोरे को उँगलियों से बजाया, फिर हाथ को थाली में रख दिया। एक-दो क्षण बाद रोटी के टुकड़े को धीरे-से हाथ से उठा कर आँख से निहारा और अंत में इधर-उधर देखने के बाद टुकड़े को मुँह में इस सरलता से रख लिया, जैसे वह भोजन का ग्रास न हो कर पान का बीड़ा हो।
मँझला लड़का मोहन आते ही हाथ-पैर धो कर पीढ़े पर बैठ गया। वह कुछ साँवला था और उसकी आँखें छोटी थीं। उसके चेहरे पर चेचक के दाग थे। वह अपने भाई ही की तरह दुबला-पतला था, किंतु उतना लंबा न था। वह उम्र की अपेक्षा कहीं अधिक गंभीर और उदास दिखाई पड़ रहा था।
सिद्धेश्वरी ने उसके सामने थाली रखते हुए प्रश्न किया, 'कहाँ रह गए थे बेटा? भैया पूछ रहा था।’
मोहन ने रोटी के एक बड़े ग्रास को निगलने की कोशिश करते हुए अस्वाभाविक मोटे स्वर में जवाब दिया, 'कहीं तो नहीं गया था। यहीं पर था।’
सिद्धेश्वरी वहीं बैठ कर पंखा डुलाती हुई इस तरह बोली, जैसे स्वप्न में बड़बड़ा रही हो, 'बड़का तुम्हारी बड़ी तारीफ कर रहा था। कह रहा था, मोहन बड़ा दिमागी होगा, उसकी तबीयत चौबीसों घंटे पढ़ने में ही लगी रहती है।’ यह कह कर उसने अपने मँझले लड़के की ओर इस तरह देखा, जैसे उसने कोई चोरी की हो।
मोहन अपनी माँ की ओर देख कर फीकी हँसी हँस पड़ा और फिर खाने में जुट गया। वह परोसी गई दो रोटियों में से एक रोटी कटोरे की तीन-चौथाई दाल तथा अधिकांश तरकारी साफ कर चुका था।
सिद्धेश्वरी की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे। इन दोनों लड़कों से उसे बहुत डर लगता था। अचानक उसकी आँखें भर आईं। वह दूसरी ओर देखने लगी।
थोड़ी देर बाद उसने मोहन की ओर मुँह फेरा, तो लड़का लगभग खाना समाप्त कर चुका था।
सिद्धेश्वरी ने चौंकते हुए पूछा, 'एक रोटी देती हूँ?’
मोहन ने रसोई की ओर रहस्यमय नेत्रों से देखा, फिर सुस्त स्वर में बोला, 'नहीं।’
सिद्धेश्वरी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, 'नहीं बेटा, मेरी कसम, थोड़ी ही ले लो। तुम्हारे भैया ने एक रोटी ली थी।’
मोहन ने अपनी माँ को गौर से देखा, फिर धीरे-धीरे इस तरह उत्तर दिया, जैसे कोई शिक्षक अपने शिष्य को समझाता है, 'नहीं रे, बस, अव्वल तो अब भूख नहीं। फिर रोटियाँ तूने ऐसी बनाई हैं कि खाई नहीं जातीं। न मालूम कैसी लग रही हैं। खैर, अगर तू चाहती ही है, तो कटोरे में थोड़ी दाल दे दे। दाल बड़ी अच्छी बनी है।’
सिद्धेश्वरी से कुछ कहते न बना और उसने कटोरे को दाल से भर दिया।
मोहन कटोरे को मुँह लगा कर सुड़-सुड़ पी रहा था कि मुंशी चंद्रिका प्रसाद जूतों को खस-खस घसीटते हुए आए और राम का नाम ले कर चौकी पर बैठ गए। सिद्धेश्वरी ने माथे पर साड़ी को कुछ नीचे खिसका लिया और मोहन दाल को एक साँस में पी कर तथा पानी के लोटे को हाथ में ले कर तेजी से बाहर चला गया।
दो रोटियाँ, कटोरा-भर दाल, चने की तली तरकारी। मुंशी चंद्रिका प्रसाद पीढ़े पर पालथी मार कर बैठे रोटी के एक-एक ग्रास को इस तरह चुभला-चबा रहे थे, जैसे बूढ़ी गाय जुगाली करती है। उनकी उम्र पैंतालीस वर्ष के लगभग थी, किंतु पचास-पचपन के लगते थे। शरीर का चमड़ा झूलने लगा था, गंजी खोपड़ी आईने की भाँति चमक रही थी। गंदी धोती के ऊपर अपेक्षाकृत कुछ साफ बनियान तार-तार लटक रही थी।
मुंशी जी ने कटोरे को हाथ में ले कर दाल को थोड़ा सुड़कते हुए पूछा, 'बड़का दिखाई नहीं दे रहा?’
सिद्धेश्वरी की समझ में नहीं आ रहा था कि उसके दिल में क्या हो गया है- जैसे कुछ काट रहा हो। पंखे को जरा और जोर से घुमाती हुई बोली, 'अभी-अभी खा कर काम पर गया है। कह रहा था, कुछ दिनों में नौकरी लग जाएगी। हमेशा, बाबू जी, बाबू जी किए रहता है। बोला, बाबू जी देवता के समान हैं।’
मुंशी जी के चेहरे पर कुछ चमक आई। शरमाते हुए पूछा, 'ऐं, क्या कहता था कि बाबू जी देवता के समान हैं? बड़ा पागल है।’
सिद्धेश्वरी पर जैसे नशा चढ़ गया था। उन्माद की रोगिणी की भाँति बड़बड़ाने लगी, 'पागल नहीं है, बड़ा होशियार है। उस जमाने का कोई महात्मा है। मोहन तो उसकी बड़ी इज्जत करता है। आज कह रहा था कि भैया की शहर में बड़ी इज्जत होती हैं, पढऩे-लिखने वालों में बड़ा आदर होता है और बड़का तो छोटे भाइयों पर जान देता हैं। दुनिया में वह सब कुछ सह सकता है, पर यह नहीं देख सकता कि उसके प्रमोद को कुछ हो जाए।’
मुंशी जी दाल-लगे हाथ को चाट रहे थे। उन्होंने सामने की ताक की ओर देखते हुए हँसकर कहा, 'बड़का का दिमाग तो खैर काफी तेज है, वैसे लड़कपन में नटखट भी था। हमेशा खेल-कूद में लगा रहता था, लेकिन यह भी बात थी कि जो सबक मैं उसे याद करने को देता था, उसे बर्राक रखता था। असल तो यह कि तीनों लड़के काफी होशियार हैं। प्रमोद को कम समझती हो?  यह कह कर वह अचानक जोर से हँस पड़े।
मुंशी जी डेढ़ रोटी खा चुकने के बाद एक ग्रास से युद्ध कर रहे थे। कठिनाई होने पर एक गिलास पानी चढ़ा गए। फिर खर-खर खाँस कर खाने लगे।
फिर चुप्पी छा गई। दूर से किसी आटे की चक्की की पुक-पुक आवाज सुनाई दे रही थी और पास की नीम के पेड़ पर बैठा कोई पंडूक लगातार बोल रहा था।
सिद्धेश्वरी की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहे। वह चाहती थी कि सभी चीजें ठीक से पूछ ले। सभी चीजें ठीक से जान ले और दुनिया की हर चीज पर पहले की तरह धड़ल्ले से बात करे। पर उसकी हिम्मत नहीं होती थी। उसके दिल में जाने कैसा भय समाया हुआ था।
अब मुंशी जी इस तरह चुपचाप दुबके हुए खा रहे थे, जैसे पिछले दो दिनों से मौन-व्रत धारण कर रखा हो और उसको कहीं जा कर आज शाम को तोड़ने वाले हों।
सिद्धेश्वरी से जैसे नहीं रहा गया। बोली, 'मालूम होता है, अब बारिश नहीं होगी।
मुंशी जी ने एक क्षण के लिए इधर-उधर देखा, फिर निर्विकार स्वर में राय दी, 'मक्खियाँ बहुत हो गई हैं।’
सिद्धेश्वरी ने उत्सुकता प्रकट की, फूफा जी बीमार हैं, कोई समाचार नहीं आया।
मुंशी जी ने चने के दानों की ओर इस दिलचस्पी से दृष्टिपात किया, जैसे उनसे बातचीत करने वाले हों। फिर सूचना दी, 'गंगाशरण बाबू की लड़की की शादी तय हो गई। लड़का एम.ए. पास है।
सिद्धेश्वरी हठात चुप हो गई। मुंशी जी भी आगे कुछ नहीं बोले। उनका खाना समाप्त हो गया था और वे थाली में बचे-खुचे दानों को बंदर की तरह बीन रहे थे।
सिद्धेश्वरी ने पूछा, 'बड़का की कसम, एक रोटी देती हूँ। अभी बहुत-सी हैं।
मुंशी जी ने पत्नी की ओर अपराधी के समान तथा रसोई की ओर कनखी से देखा, तत्पश्चात् किसी छँटे उस्ताद की भाँति बोले, 'रोटी? रहने दो, पेट काफी भर चुका है। अन्न और नमकीन चीजों से तबीयत ऊब भी गई है। तुमने व्यर्थ में कसम धरा दी। खैर, कसम रखने के लिए ले रहा हूँ। गुड़ होगा क्या?
सिद्धेश्वरी ने बताया कि हंडिया में थोड़ा -सा गुड़ है।
मुंशी जी ने उत्साह के साथ कहा, 'तो थोड़े गुड़ का ठंडा रस बनाओ, पीऊँगा। तुम्हारी कसम भी रह जाएगी, जायका भी बदल जाएगा, साथ-ही-साथ हाजमा भी दुरूस्त होगा। हाँ, रोटी खाते-खाते नाक में दम आ गया है। यह कह कर वे ठहाका मारकर हँस पड़े।
मुंशी जी के निबटने के पश्चात सिद्धेश्वरी उनकी जूठी थाली ले कर चौके की जमीन पर बैठ गई। बटलोई की दाल को कटोरे में उड़ेल दिया, पर वह पूरा भरा नहीं। छिपुली में थोड़ी-सी चने की तरकारी बची थी, उसे पास खींच लिया। रोटियों की थाली को भी उसने पास खींच लिया। उसमें केवल एक रोटी बची थी। मोटी-भद्दी और जली उस रोटी को वह जूठी थाली में रखने जा रही थी कि अचानक उसका ध्यान ओसारे में सोए प्रमोद की ओर आकर्षित हो गया। उसने लड़के को कुछ देर तक एकटक देखा, फिर रोटी को दो बराबर टुकड़ों में विभाजित कर दिया। एक टुकड़े को तो अलग रख दिया और दूसरे टुकड़े को अपनी जूठी थाली में रख लिया। तदुपरांत एक लोटा पानी ले कर खाने बैठ गई। उसने पहला ग्रास मुँह में रखा और तब न मालूम कहाँ से उसकी आँखों से टप-टप आँसू चूने लगे।
सारा घर मक्खियों से भनभन कर रहा था। आँगन की अलगनी पर एक गंदी साड़ी टँगी थी, जिसमें पैबंद लगे हुए थे। दोनों बड़े लड़कों का कहीं पता नहीं था। बाहर की कोठरी में मुंशी जी औंधे मुँह हो कर निश्चिंतता के साथ सो रहे थे, जैसे डेढ़ महीने पूर्व मकान-किराया-नियंत्रण विभाग की क्लर्की से उनकी छँटनी न हुई हो और शाम को उनको काम की तलाश में कहीं जाना न हो।

चार लघुकथाएँ


जिंदगी
- सुकेश साहनी


पेट में जैसे कोई आरी चला रहा हैं... दर्द से बिलबिला रहा हूँ....। पत्नी के ठंडे, काँपते हाथ सिर को सहला रहे हैं। उसकी आँखों से टपकते आँसुओं की गरमाहट अपने गालों पर महसूस करता हूँ। उसने दो दिन का निर्जल उपवास रखा है। माँग रही है कैंसर ग्रस्त पति का जीवन ईश्वर से। ...ईश्वर? ....आँखों पर जोर डालकर देखता हूँ, धुँध के उस पार वह कहीं दिखाई नहीं देता...।
घर में जागरण है। फिल्मी गीतों की तर्ज पर भजनों का धूम-धड़ाका है। हाल पूछने वालों ने बेहाल कर रखा है। थोड़ी-थोड़ी देर बाद कोई न कोई आकर तसल्ली दे रहा है, ''सब ठीक हो जाएगा, ईश्वर का नाम लो।....ईश्वर?....फिल्मी धुनों पर आँखों के आगे थिरकते हीरो-हीराइनों के बीच वह कहीं दिखाई नहीं देता....
नीम बेहोशी के पार से घंटियों की हल्की आवाज सुनाई देती है। ऊपरी बलाओं से मुझे मुक्ति दिलाने के कोई सिद्ध पुरूष आया हुआ है...। नशे की झील में डूबते हुए पत्नी की प्रार्थना को जैसे पूरे शरीर से सुन रहा हूँ, ''इनकी रक्षा करो, ईश्वर!’....ईश्वर?....मंत्रोच्चारण एवं झाड़-फूँक से उठते हुए धुँए के बीच वह कहीं दिखाई नहीं देता...
श्मशान से मेरी अस्थियाँ चुनकर नदी में विसर्जित की जा चुकी हैं। पत्नी की आँखों के आँसू सूख गए हैं। मेरी मृत्यु से रिक्त हुए पद पर वह नौकरी कर रही है। घर में साड़ी के पल्लू को कमर में खोंसे, वह काम में जुटी रहती है। मेरे बूढ़े माँ-बाप के लिए बेटा और बच्चों के लिए बाप भी बनी हुई है। पूजा पाठ (ईश्वर) के लिए अब उस समय नहीं मिलता। ....ईश्वर?...वह उसकी आँखों से झाँक रहा है!


बेटी का खत
बेटी का खत पढ़ते ही बूढ़े बाप के चेहरे पर हवाइयाँ उडऩे लगीं।
'खैरियत तो है न?’ पत्नी ने पूछा, 'क्या लिखा है?’
'सब कुशल-मंगल है,’ आवाज में कंपन था।
'फिर पढ़ते ही घबरा क्यों गए?’  पत्नी बोली, फिर उसके हाथ से चिट्ठी लेकर खुद पढऩे लगी।
खत खैरियत वाला ही था। बेटी ने माँ-बाप की कुशलता की कामना करते हुए अपनी राजी-खुशी लिखी थी, अंत में लिखा था-राजू भइया की बहुत याद आती है। पत्र पढ़ने के बाद पत्नी निश्चिंत होकर रसोई में चली गई।
            जब लौटी तो देखा पति अभी भी उस खत को एकटक घूरे जा रहा है, चेहरा ऐसा मानो किसी ने सारा खून निचोड़ लिया हो।
पत्नी को देखते ही उसने सकपकाकर खत एक ओर रख दिया। सहज होने का असफल प्रयास करते हुए बोला, 'सोचता हूँ, कल रजनी बेटी के पास हो ही आऊँ।’
पत्नी ने उसके पीले उदास चेहरे की ओर ध्यान से देखा, फिर रुँधे गले से बोली, 'आखिर हुआ क्या है? अभी कल ही तो दशहरे पर बेटी के यहाँ जाने की बात कर रहे थे, फिर अचानक ऐसा क्या जो... तुम्हें मेरी सौं जो कुछ भी छिपाओ!’
इस बार वह पत्नी से आँख नहीं चुरा सका, भर्राई आवाज में बोला, 'पिछली दफा रजनी ने मुझे बताया था कि ससुराल वाले उसकी लिखी कोई चिट्ठी बिना पढ़े पोस्ट नहीं होने देते, तब मैंने उससे कहा था कि भविष्य में अगर वे लोग उसे तंग करें और वह हमें बुलाना चाहे तो खत में लिख दे- राजू भइया की बहुत याद आती है। इस बार उसने खत में यही तो लिखा है’- कहते हुए बूढ़े बाप की आँखें छलछला आर्इं।

जागरूक
लड़की अपनी धुन में मस्त चली जा रही थी। रात के सन्नाटे में उस आधुनिका के सैंडिलों से उठती खट्-खट् की आवाज काफी दूर तक सुनाई दे रही थी। जैसे ही वह उस पॉश कालोनी के बीचों बीच बने पार्क के नजदीक पहुँची, वहाँ पहले से छिपे बैठे दो बदमाश उससे छेड़छाड़ करने लगे।
लड़की ने कान्वेंटी अन्दाज में  'शट अप! यू.....बास्टर्ड! ’ वगैरह-वगैरह कहकर अपना बचाव करना चाहा, पर जब वे अश्लील हरकतें करते हुए उसके कपड़े नोचने लगे तो वह  'बचाओ...बचाओ....’ कहकर चिल्लाने लगी। उसकी चीख पुकार पार्क के चारों ओर कतार से बनी कोठियों से टकराकर लौट आई। कोई बाहर नहीं निकला।
वे लड़की को पार्क में झुरमुट की ओर खींच रहे थे। उनके चंगुल से मुक्त होने के लिए वह बुरी तरह छटपटा रही थी।
तभी वहाँ से गुजर रहे एक लावारिस कुत्ते की नजर उन पर पड़ी। वह जोर-जोर से भौंकने लगा। जब उसके भौंकने का बदमाशों पर कोई असर नहीं हुआ तो वह बौखलाकर इधर-उधर दौडऩे लगा। कभी घटनास्थल की ओर आता तो कभी किसी कोठी के गेट के पास जाकर भौंकने लगता मानो वहाँ रहने वालों को इस घटना के बारे में सूचित करना चाहता हो। उसके इस प्रयास पर लोहे के बड़े-बड़े गेटों के उस पार तैनात विदेशी नस्ल के पालतू कुत्ते उसे हिकारत से देखने लगे।
संघर्षरत लड़की के कपड़े तार-तार हो गए थे, हाथ-पैर शिथिल पड़ते जा रहे थे। बदमाशों को अपने मकसद में कामयाबी मिलती नजर आ रही थी।
यह देखकर गली का कुत्ता मुँह उठाकर जोर-जोर से रोने लगा। कुत्ते के रोने की आवाज इस बार कोठियों से टकराकर वापस नहीं लौटी ; क्योंकि वहाँ रहने वालों को अच्छी तरह मालूम था कि कुत्ते के रोने से घर में अशुभ होता है। देखते ही देखते तमाम कोठियों में चहल-पहल दिखाई देने लगी। छतों पर बालकनियों पर बहुत से लोग दिखाई देने लगे।
उनके आदेश पर बहुत से वाचमैन लाठियाँ-डंडें लेकर कोठियों से बाहर निकले और उस कुत्ते पर पिल पड़े।


ओएसिस
मिक्की की आँखों में नींद नहीं थी। वह पिल्ले को अपने पास नहीं रख पाएगा, सोच कर उसका मन बहुत उदास था। पिल्ले को लेकर ढेरों सपने बुने थे पर घर आते ही सब कुछ खत्म हो गया था। माँ ने पिल्ले को देखते ही चिल्लाकर कहा था, 'अरे, यह क्या उठा लाया तू? तेरे पिता जी ने देख लिया तो किसी की भी खैर नहीं। उन्हें नफरत है इनसे। जा, इसे वापस छोड़ आ।’ दादी माँ ने बुरा सा मुँह बनाया था, 'राम-राम! कुत्ता सोई जो कुत्ता पाले। बाहर फेंक इसे।’ यह सब सुनकर उसे रोना आ गया था। कितनी खुशामद करने पर दोस्त पिल्ला देने को राजी हुआ था। चूँकि दोस्त का घर दूर था इसलिए एक रात के लिए उसे पिल्ले को घर में रखने की इजाजत मिली थी। पिता जी के आने से पहले ही उसने बरामदे के कोने में टाट बिछाकर उसे सुला दिया था।
कूँ...कूँ की आवाज से वह चौंक पड़ा। बरामदे में स्ट्रीट लाइट की वजह से हल्की रोशनी थी। पिल्ले को ठंड लग रही थी और वह बरामदे में सो रही दादी की चारपाई पर चढऩे का प्रयास कर रहा था। वह घबरा गया...सोना तो दूर दादी अपना बिस्तर किसी को छूने भी नहीं देतीं...उनकी नींद खुल गई तो वे बहुत शोर करेंगी...पिता जी जाग गए तो पिल्ले को तिमंजिले से उठाकर नीचे फेंक देंगे... वह रजाई में पसीने-पसीने हो गया। सोते हुए माँ ने एक हाथ उस पर रखा हुआ था, वह चाहकर भी उठ नहीं सकता था। पिल्ले की कूँ-कूँ और पंजों से चारपाई को खरोंचने की आवाज रात के सन्नाटे में बहुत तेज मालूम दे रही थी।
दादी की नींद उचट गई थी, वह करवटें बदल रही थीं। आखिर वह उठ कर बैठ गर्इ।
आने वाली भयावह स्थिति की कल्पना से ही उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसे लगा दादी पिल्ले को घूरे जा रही हैं।
दादी ने दाएँ-बाएँ देखा...पिल्ले को उठाया और पायताने लिटा कर रजाई ओढ़ा दी।
संपर्क: 193121, सिविल लाइंस, बरेली -243001, Email- sahnisukesh@gmail.com

धरा पर रंग


धरा पर रंग
- अनुपमा त्रिपाठी
1
 उर-पटल

हैं स्मृति की  रेखाएँ
मिट न पाएँ।
2
पलकों में है 
मोती-से अनमोल
छुपे रतन।
3
सजल नैन
भरी जीवन-पीर,
डबडबाएँ।
4
मन-सागर
है वेदना असीम
सूखे नयन।
5
सूरज डूबे
ढेरों रश्मियाँ लिये
डूबती आशा।
6
बर्फ-सी ठंडी
संवेदनाएँ हुई
शिथिल  मन।
7
अथाह पीड़ा
बस मौन ही रहूँ
किससे  कहूँ ....?
8
ज्यों टूटकर
गिरते पीले पात 
बीते हैं लम्हें ।
9
कुछ तो कहो
ऐसे चुप न रहो
नदी-से बहो।
10
ठिठक गई
मूक-सी हुई जब
संवेदनाएँ।
11
मानवता ही
परम दया धर्म
एक मुस्कान।
12
सृजन खिला
संवेदनशील हो
तरंग बना।
13
रंग-बिरंगे 
हैं धरा पर रंग
पुष्प बिखरे।
14
बीन-बटोर
शब्द-शब्द सुमन
गूँथी है माला ।
15
अर्पण करूँ
प्रभु तुमरे द्वार
शब्द-संसार।
16
शब्दों से तुम
सजाते मेरा मन
कविता खिले।
17
शब्द की कथा
कहे मन की व्यथा
भावना बहे।
18
कैसे रचाऊँ ?
नित नया सृजन
ये शब्द पूछें ...!
19
पंख पसार
उड़ जा उस पार
संदेसा ले जा।
20
उड़े बयार
शब्द उड़ा ले जाएँ 
कुछ न सूझे।
21
हुए हैं एक
मिल धरा-गगन
सृष्टि मगन।
22
पसरा मौन
बिखरे हैं सुमन
आया है कौन ...?
23
खिली लालिमा
देती अब सन्देश
मिटी कालिमा।
24
छूकर तुम्हें
आई है मेरे द्वार
चंचल हवा।          
लेखिका के  बारे में: जन्म- 13-05-63  शिक्षा- एम.ए(अर्थशास्त्र)1984 में रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय(जबलपुर)। संगीत विशारद (संगीत)  2006 में प्रथम श्रेणी में। वर्तमान में संगीत अलंकार कर रहीं हैं। व्यावसायिक अनुभव अर्थशास्त्र की व्याख्याता 1984-85 जबलपुर में। 2010 में क्वालालंपुर मलेशिया में TEMPLE OF FINE ARTS में हिन्दुस्तानी  शास्त्रीय संगीत पढ़ाया। संगीत के कई कार्यक्रमों में गाया और 'यादें’ नामक सी.डी में भी गाकर अपना योगदान दिया। ब्लॉग http://anupamassukrity.blogspot.com/ पर कविताएँ और लेख। http://swarojsurmandir.blogspot.com/ पर संगीत के विषय में जानकारी। Email- tripathi_anupama@yahoo.com

ब से...

ब से...
- सुमित प्रताप सिंह
आज ए बी सी डी की कैद से निकलकर ओलम पढऩे का मन कर रहा है। आप भी मेरे साथ इस कैद से बाहर आइए न। देखिए अपनी चीज में जो अपनापन होता है, वह भला विदेशी चीज में कहाँ। अच्छा यह बताइए कि आपको ओलम में कौन सा अक्षर सबसे अधिक भाता है। ओहो फिर वही जिद, कि शुरुआत मुझसे हो। कभी तो मौका दिया करें, कि शुरुआत आपसे भी हो। खैर आपकी जिद टालने का न तो कभी मन होता है और न कभी साहस। देखिए वैसे तो मुझे पूरी ओलम ही प्रिय है, लेकिन न जाने क्यों ब अक्षर मुझे बहुत आकर्षित करता है। पारंपरिक ओलम में ब से बकरा होता है, लेकिन समय बदलने के साथ-साथ जीवन के अर्थ बदलते जा रहे हैं। जब संसार अपने आपको समय के अनुसार ढाल रहा है, तो हमें भी अक्षरों के साथ कुछ नया प्रयोग करने का साहस तो करना ही चाहिए। अब देखिये ब एक शब्द होता है बड़ा। जो बड़ा होता है वो असल में बड़ा होता है या फिर नहीं यह एक शोध का विषय है, क्योंकि जो बड़े होते हैं, वे स्वयं को बड़ा नहीं मानते और जो बड़े नहीं होते वे स्वयंभू बड़े बन जाते हैं। साहित्यिक जगत में ऐसे बड़े लोग थोक के भाव में मिलते हैं। हालाँकि आने वाला समय अपने आप बता देता है, कि वे वास्तव में बड़े थे अथवा स्वयं ही बड़े बनकर अभिमान से तनकर खड़े थे। ब से बरगद भी होता है। बरगद की विशेषता होती है, कि वह अपने विकास को ही महत्त्व देता है। उसकी छाया में रहने वाले पौधे बेचारे पौधे से वृक्ष बनने की चाहत में समाप्त हो जाते हैं। साहित्यिक बरगदों ने अपने स्वार्थ के लिए न जाने कितने पौधों को विकसित होने से पहले ही अपनी शोषक छाया से बर्बाद कर दिया होगा। ऐसे बरगद जब तक रहते हैं, छोटे पौधे अपने आपको किसी प्रकार से अस्तित्व में बचाए रखने के लिए संघर्ष करते रहते हैं और सत्यनारायण की कथा अथवा कलमा पढ़कर ऊपर वाले से कामना करते रहते हैं , कि कोई ऐसी शुभ घड़ी आए और ये बरगद धड़ाम से टूटकर नीचे गिरें, ताकि वे बेचारे पौधे अपने पौधेपन से मुक्ति पाकर वृक्षपन का आनंद उठा सकें। ब से बंज़र शब्द भी होता है। अं की मात्रा की चिंता किए बिना ध्यान से इस शब्द पर विचार करें तो यह ब से बहुत ही उपयुक्त शब्द है। इस शब्द का प्रयोग लोग अपने-अपने हिसाब से करते हैं। किसान के लिए बंजर शब्द ज़मीन से होता है। कुछ दुष्ट बिन संतान के दम्पति को इस शब्द के प्रयोग से आहत करते हैं, किंतु बंजर नामक इस विशेष शब्द को हम उन महान लेखकों से करेंगे, जो मस्तिष्क से अनुपजाऊ अर्थात बंजर हो चुके हैं। कहते हैं कि वे पहले उपजाऊ थे और लेखन की फसल नियमित तौर पर काटते रहते थे। उन्होंने अपने लेखन की इतनी पैदावार की, कि बेचारे मस्तिष्क से बंजर हो गए और अब दूसरे लेखकों की रचनाओं से माल उड़ाकर अपना गुज़ारा करने लगे। ऐसा भी हो सकता है, कि वे लेखन जगत में प्रवेश करने से पहले ही बंजर हों और इधर-उधर से चोरी-चकारी करके रचनारूपी अनाज का भंडारण करते रहे हों। ऐसे बंजर लेखक युवा लेखकों की रचनाओं पर पैनी नज़र रखते हैं और उनकी रचनाओं के अंजर-पंजर ढीले करके एक नई रचना लिख डालते हैं और झूठी वाहवाही के मंज़र देखते हैं। फिल्म जगत में तो ऐसे बंजर लेखकों की भरमार है और वहाँ नए लेखक अपना गुज़ारा चलाने के लिए अपनी उगी-उगाई फसल इन बंजरों को सौंप देते हैं। नए लेखकों को संघर्ष करने के लिए कुछ धन मिल जाता है और बंजर लेखकों को बंजर न दिखने के लिए रचनारुपी संतान। इन्हीं विचारों को मस्तिष्क की भट्टी में उबालते हुए एक मकान के बगल से निकल रहा था, कि एक पिता को अपने बच्चे को ओलम सिखाते हुए देखा। वह ब शब्द पर आया और बोला ब से बकरा, तो यह सुनकर मन हुआ कि उसके पास जाऊँ और उसके कानों में जोर से चीखकर उससे बोलूँ, कि ब से बकरा नहीं ब से होता है बंजर।                                     
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