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Jun 11, 2013

एलिवेशनल म्यूरल


लोक को कला से जोड़ता माध्यम
 - संदीप राशिनकर

  अभिव्यक्ति के परिचित एवं प्रचलित माध्यम भाषा, बोलियों और लिपियों के इस दौर में यह जानना कम रोचक नहीं होगा कि मानव की विकास यात्रा में भाषा-लिपियों का आविष्कार मानव उत्पत्ति के लंबे समय बाद हुआ। पारस्परिक अभिव्यक्ति का पुरातन माध्यम निश्चित ही चित्र रहा है। जिसके प्रमाण हमें विश्वभर में फैले शैलाश्रयों/गुफाओं में शैलचित्रों के रूप में मिलते है।
भित्तिचित्र कहलाने वाली विद्या म्यूरल की परंपरा का विकास भले ही मानव सभ्यता के विकास के प्रारंभिक काल में शैलचित्रों के रूप में हुआ हो किंतु इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि अभियक्ति की यह पुरातन व प्रभावी शैली सभ्यता की विकास यात्रा में कही पीछे छूटकर गुम हो गयी।
कला और आम मानस के बीच बढ़ती हुई खाइयों के रस दौर में आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो गया है। कि आम मानस में कला बोध  जाग्रत हो संवर्धित हो। जनमानस और समाज में कला बोध जागृत करने का जरिया कभी भी कला विथिकाएँ या आर्ट गैलेरी नहीं हो सकता। हमें लोगों को हाँककर कला वीथिकाओं तक ले जाने  के बनिस्बत कला को लोगों के बीच ले जाने का जतन करना होगा।
सार्वजनिक स्थलों में ठेठ लोगों के बीच कला की स्थायी और प्रभावी उपस्थिति के लिए भवनों के आमुखों से उपयुक्त और क्या कैनवास हो सकता है? इसी सोच का रचनात्मक परिणाम है, भवनों के आमुखों पर सृजित भित्तिचित्र, और यही है एलिवेशनल म्यूरल।
 दो दिशाओं में विस्तारित होते भित्तिचित्र भवनों के आमुखों पर आते-आते अभिव्यक्ति में तीसरी दिशा प्रोजेक्शन्स / रिसेशन को समाहित कर रिलीफ में तब्दील हो गए। भित्तिचित्रों से भित्तिशिल्पों में रूपांतरित होते ये एलिवेशनल म्यूरल दर्शकों को चित्रों के साथ-साथ शिल्पों की अनुभूति से सराबोर करते है। भवनों की आयु तक उसका अभिन्न हिस्सा बनी रहने वाली यह अद्भुत कलाभिव्यक्ति न सिर्फ एक शाश्वत कला प्रदर्शन है वरन् लोगों के बीच होने से परोक्ष या अपरोक्ष  रूप से  जनमानस की कला दृष्टि / कला अभिरुचि को विकसित करने में सफल सिद्ध होती है।
 एलिवेशनल म्यूरल भवन का एक स्थायी भाग होने से इसकी संरचना, माध्यम और सृजन प्रक्रिया में तकनीकी जानकारी, सोच व प्रक्रिया की अहम भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता।
आपकी यह कलाकृति कोई सुरक्षित या वातानुकूलित परिसर में सुशोभित नहीं होने जा रही है, उसे तो खुले में सारी ऋतुओं, आपदाओं, विपदाओं से बाबस्ता होना है।  जरूरी  है कि उसका सृजन, उसका माध्यम व उसकी संरचना ऐसी दृढ़ता सहेजे हो जो न सिर्फ वातावरण के विभन्न प्रभावों से सुरक्षित रहे वरन् रख रखाव के स्तर पर भी अपेक्षाओं से रहित हो।
    समाज में कला -संवर्धन की दृष्टि के साथ ही एलिवेशनल म्यूरल किसी भी वस्तु में समाहित वह तत्व है जो मात्र स्वयं के बूते पूरी वास्तु को विशिष्टता प्रदान करने का माद्दा रखता है। आदिकाल से आज तक मानव के मन में विशिष्टता के प्रति एक गहरा रुझान रहा है। कपड़े हो, रहन-सहन हो या भवन हो हर पक्ष हर स्तर पर मनुष्य नवीनता चाहता है। विशिष्टता चाहता है। भवन के क्षेत्र में विशिष्टता की चाहत का समाधान है। एलिवेशनल म्यूरल।
    मेरी मान्यता है कि लेटेस्ट आर्किटेक्चर और कास्टलिएस्ट फिनिश भवनों को वह सार्वकालिक विशिष्टता नहीं दे सकते , जो एक एलिवेशनल म्यूरल दे सकता है। आर्किटक्चर जहाँ एक ट्रेंड है वहीं फिनिशेस मार्केट आइटम है जिसकी पुनरावृत्ति संभव ही नहीं अवश्यंभावी है। कला व तकनीक के सुनियोजित एवं रचनात्मक संयोजन से एलिवेशनल म्यूरल्स में फाम्र्स मटेरियल माध्यम और संरचना के स्तर पर निश्चित ही संभावनाओं का एक भरा पूरा वितान है।
    जहाँ तक इसमें निहित व्यय का प्रश्न है जो जनमानस में कला की कीमतों और कला के बाजारीकरण के चलते यह भ्रम मन में बैठ चुका है कि कला या म्यूरल्स आम की नहीं खास की जागीर है। कलाकारों को चाहिए कि कला की आम मानस में पैठ के लिए ऐसे प्रामाणिक प्रयास करें कि कला जन-जन की हमराह बन सके।
एलिवेशनल म्यूरल के क्षेत्र में लेखक के द्वारा किए गए समर्पित और प्रमाणिक प्रयासों के चलते अल्प परिचित यह विद्या अमीरों के ही नहीं सामान्यजन के भवनों को भी अपनी कला सुरभि से सुरभित कर रही है। संरचना माध्यम की लंबी शृंखला में हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम हर आर्थिक स्तर के लिए म्यूरल्स का सृजन कर सकें।
    निरंतरता से न सिर्फ सृजन के स्तर पर वरन् तकनीक के स्तर पर भी इस विद्या के वैशिष्ट्य को संवर्धित किए जाने की महती आवश्यकता है। यह कलाभिव्यक्ति का वह आयाम है जो निश्चित ही विध्वंस के इस दौर में जनमानस में सृजन व कला के प्रति आसक्ति का अंकुरण कर परिवेश को कलात्मक व रचनात्मक बनाने का मुद्दा रखता है।  
      
संपर्क: 11 बी, राजेन्द्रनगर,
इंदौर-452012 (म.प्र) फोन नं. 0731-2321192

लंबा जीवन चाहिए तो भलाई कीजि



लंबा जीवन चाहिए तो भलाई कीजिए
अगर आपको लंबा जीवन चाहिए तो दूसरों की भलाई कीजिए। यह बात हम नहीं बल्कि एक अध्ययन में कही गई है। एक अमेरिकी अध्ययन में यह बात सामने आई है। इस अध्ययन में 10,317 कॉलेज छात्रों को शामिल किया गया था। इन छात्रों के 1957 में स्नातक करने के बाद से ही उन पर अध्ययन किया जा रहा था। समाचार पत्र 'डेली एक्सप्रेस’  के मुताबिक इन छात्रों से साल 2004 में कहा गया कि वे बीते 10 सालों में नियमित रूप से उनके द्वारा किए गए स्वैच्छिक कार्यों के संबंध में बताए। चार साल बाद ऐसे 4.3 प्रतिशत लोगों की मौत हो गई जिन्होंने स्वैच्छिक कार्य नहीं किए थे ;जबकि स्वैच्छिक कार्य करने वाले चार प्रतिशत लोगों की ही मौत हुई । जिन लोगों के कार्य दूसरों की खुशी को ध्यान में रखकर किए गए थे उनमें से केवल 1.6 प्रतिशत लोगों की मौत हुई। अध्ययनकर्ता आंद्रेई फुरल फोर्बिस के मुताबिक यह कहना उचित है कि इससे लोगों का फायदा होता है इसलिए उन्हें दूसरों के लिए स्वैच्छिक रूप से काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि वैसे शोध में देखा गया है कि जो लोग खुद के फायदे के लिए स्वैच्छिक कार्य करते हैं उन्हें इससे ज्यादा लाभ नहीं होता है ।                     

ऊँचे शिखरों पर रोमांच का सफर

ऊँचे शिखरों पर रोमांच का सफर
- लोकेन्द्र सिंह
कठिनाइयाँ आपको अंदर से मजबूत करती हैं। अचानक से आई मुसीबतें आपको फटाफट निर्णय लेने का अनुभव देती हैं। अनजाने रास्ते और लंबे सफर आपके लिए नई राहें खोलते हैं। यह सब करने के लिए बस थोड़े-से साहस की जरूरत होती है।  उठाइए साइकिल और निकल जाइए ऐसे रास्तों पर जहाँ जाने के लिए आपका जी मचल रहा हो। जिंदगी को ठाट से जीने के लिए साइकिलिंग से अच्छा विकल्प नहीं है। यह कहना है रोमांच के साथी युवा देवेन्द्र तिवारी का। मध्यप्रदेश के जिले ग्वालियर में कृषक परिवार में जन्मे देवेन्द्र तिवारी देश के कई दुर्गम क्षेत्रों को साइकिलिंग से जीत चुके हैं।
अपनी पहली कठिन यात्रा का जिक्र करते हुए वे कहते हैं कि अचानक एक दिन बैठे-बैठे मेरे दिल में खयाल आया कि क्यों न हिमालय की चोटियों और घाटियों को अपनी साइकिल के पहिए से नापा जाए। कुल्लू मनाली क्षेत्र के 13,000 फीट से अधिक ऊँचे चँद्रखानी पास ट्रैक चला जाए। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड ऐसे प्रदेश हैं जिनका जर्रा-जर्रा खूबसूरत और आकर्षक है। हर कोई बार-बार और हमेशा के लिए इन्हें अपने ज़ेहन में स्पंदित करने की चाह रखता है। अविवाहित श्री तिवारी चुटकी लेते हुए बताते हैं कि मनाली को उत्तर भारत का हनीमून कैपिटल भी कहते हैं। विवाह के बाद वे अपनी पत्नी के साथ जरूर इस खूबसूरत वादी में आना चाहेंगे, बल्कि बार-बार आते रहेंगे।
व्यास नदी के तट पर बसा यह शहर हमेशा पर्यटकों से गुलजार रहता है। कुल्लू की दो चीज काफी मशहूर हैं- ऊनी शाल और दशहरा पर्व। मनाली एडवेंचर में रुचि रखने वालों को भी अपनी ओर खींचता है। इसी चुंबकीय आकर्षण में आकर 13 हजार फीट से अधिक ऊँचे ट्रैक चँद्रखानी पास को फतह करने की मन में ठान ली। तब मेरे पास उम्दा माउंटेन साइकिल उपलब्ध नहीं थी। एक एडवेंचर क्लब से जुड़े होने पर मुझे किराए पर वह साइकिल उपलब्ध हो गई। जरूरी तैयारी के साथ मैं निकल पड़ा अपनी पहले कठिन सफर पर। मनाली से शुरू होने वाला चँद्रखानी पास ट्रैक मलाना और मणिकर्ण होते हुए बिजली महादेव तक जाता है। चँद्रखानी पास को देवी-देवताओं के मिलन की जगह भी कहा जाता है। समतल सड़कों पर साइकिलिंग के बजाय पहली बार ऊँचे शिखर पर साइकिल चलाने का रोमांच ही अलग था। मानो सातवाँ आसमान छू लिया हो। इस पहली जीत से इस यात्रा को और अधिक रोमांचकारी बनाने का साहस मन में पैदा हुआ। इस बार हाड़ कँपाने वाली सर्दी में हिमालच प्रदेश के बर्फीले पर्वतीय शृंखला धौलाधार में कुछ तूफानी करने का तय किया। यहाँ तो ऐसा लगा जैसे स्वप्नों में देखा स्वर्ग साकार उपस्थित हो गया हो। धौलाधार पर्वत रेंज कांगड़ा जिले का सबसे आकर्षक पर्यटन और साहसिक गतिविधियों का केन्द्र है। इसे 12 माह दूधिया बर्फ से ढका हुआ देखा जा सकता है। हनुमान का टिंबा या सफेद पर्वत इस पर्वत शृंखला की सबसे ऊंची चोटी है। धौलाधार की समुद्र तल से ऊंचाई 3500 से 6,000 मीटर तक है। छोटा हिमालय के नाम से ख्यात धौलाधार पर्वत शृंखला डलहौजी के पास से शुरू होती है। इसके बाद साहसिक खेलों में रुचि रखने वाले युवा देवेन्द्र तिवारी ने कभी पीछे पलटकर नहीं देखा। जैसे ऊँचे पहाड़ उन्हें आवाज देकर बुलाते हों, वे बार-बार उनके बुलावे पर जाते रहे। छोटा सियाचिन (14,200 फीट), रोहतांग पास (13,051 फीट), बड़ा-लाचा-ला-दर्रा (16,040 फीट), नकीला पास (15,547 फीट) और दुनिया के दूसरे सबसे ऊँचे चलने योग्य मार्ग तग-लांग-ला दर्रा (17,500 फीट) पर भी ग्वालियर के देवेन्द्र तिवारी ने भारत का झंडा फहराया।
मध्यप्रदेश में साइकिलिंग और साहसिक गतिविधियों में अपना योगदान देने के लिए देवेन्द्र तोमर का सरकार और सामाजिक संस्थाओं ने सम्मान भी किया है। कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज और केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने उन्हें साहसिक गतिविधि के लिए सम्मान दिया है। हाल ही में उन्हें वन्देमातरम् राष्ट्रीय अलंकरण से नवाजा गया।
देवेन्द्र तिवारी कहते हैं कि दुनिया को साइकिल के पहिए से नापने की उनकी अदम्य इच्छा है। वे साइकिल से विश्व यात्रा पर निकलकर बेटी बचाओ का संदेश देना चाहते हैं। साथ ही वे पर्यावरण के प्रति भी दुनिया को सचेत करना चाहते हैं। उनका मानना है कि व्यक्ति को दैनिक जीवन में फिर से साइकिल को अपना लेना चाहिए। इसके कई फायदे हैं- शरीर चुस्त रहेगा, ईधन का संकट कम होगा और महँगाई की मार से भी बचा जा सकेगा। ट्रैकिग पर जाने वाले साथियों को वे सलाह देते हैं कि ट्रैकिंग के लिए जगह और मार्ग चुनने से पहले अपनी रुचि और क्षमताओं को परखना जरूरी है। अगर आपको ऊँचाई पर चढऩे में तकलीफ है तो समतल मैदान ही चुनें। यदि ऊँचाई आपको आनंदित करती है और आप लम्बे समय तक पहाड़ों में भटकने का माद्दा रखते हैं तो जरूर लम्बे रास्ते, ऊँची जगह चुनें और ऊँचे शिखरों पर  जीवन को रोमांच के साथ जिएँ।
                           
संपर्क: गली नंबर-1 किरार कालोनी, एस.ए.एफ. रोड,
कम्पू, लश्कर, ग्वालियर (म.प्र.) 474001, मो. 9893072930

निदा फ़ाज़ली के 5 दोहे



निदा फ़ाज़ली के 5 दोहे
1
बच्चा बोला देखकर , मस्ज़िद आलीशान !
अल्ला तेरे एक को , इतना बड़ा मकान ॥
2
मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार ।
दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार ॥
3
' सीधा-सादा डाकिया, जादू करे महान ।
एक ही थैले में भरे, आँसू और मुस्कान ॥
4
रस्ते को भी दोष दे, आँखें भी कर लाल ।
चप्पल में जो कील है, पहले उसे निकाल ॥
5
जीवन के दिन रैन का, कैसे लगे हिसाब ।
दीमक के घर बैठकर, लेखक लिखे क़िताब ॥