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Jun 11, 2013

प्रेरक

कल मैंने आपको कुछ बंदरों की कहानी पढ़वाई थी, जो कुँए में दिख रहे चंद्रमा को वास्तविक चंद्रमा समझकर उसे निकालने का प्रयास करते हैं लेकिन पेड़ की डाली टूट जाने के कारण बेचारे कुँए में गिरकर मर जाते हैं। कहानी का शीर्षक था 'मूर्ख बंदर और चंद्रमा’ । कहानी का ऐसा शीर्षक निष्प्रयोजन ही दिया गया था। वस्तुत: किसी भी जीव को मूर्ख नहीं कहना चाहिए। जिन जीवों जैसे गधा आदि को हम बहुधा मूर्ख कहते हैं वे मानव जाति के बहुत काम आते हैं और हर प्रकार के कष्टों को सहकर भी मानवों के लिए अति उपयोगी सिद्ध होते हैं!
बच्चों की कहानियों में आमतौर पर विभिन्न जंतुओं के लिए 'चालाक लोमड़ी’ , 'धूर्त सियार’ , 'कपटी मगरमच्छ’  जैसी उपमाओं का प्रयोग किया जाता है लेकिन इसका उद्देश्य केवल कहानी को बच्चों (और बड़ों) के लिए रोचक और बोधगम्य बनाना होता है, किसी जन्तु विशेष को अन्य जंतुओं से हीन दिखाना या उसका अपमान करना  नहीं।

दो बंदरों की कहानी
दो बंदर एक दिन घूमते-घूमते एक गाँव के समीप पहुँच गए और उन्होंने वहाँ सुन्दर व मीठे प्रतीत होने वाले फलों से लदा हुआ एक पेड़ देखा।
'इस पेड़ को देखो!’  एक बंदर ने दूसरे से चिल्लाकर कहा- 'ये फल कितने सुंदर दिख रहे हैं। ये अवश्य ही बहुत स्वादिष्ट होंगे! चलो हम दोनों पेड़ पर चढ़कर फल खाएँ’ ।
दूसरा बंदर बुद्धिमान था। उसने कुछ सोचकर कहा- 'नहीं, नहीं। एक पल के लिए सोचो। यह पेड़ गाँव के इतने समीप लगा है और इसके फल इतने सुंदर और पके हुए हैं, लेकिन यदि ये अच्छे फल होते तो गाँव वाले इन्हें ऐसे ही क्यों लगे रहने देते? लोगों ने इन्हें अवश्य ही तोड़ लिया होता! लेकिन ऐसा लगता है कि किसी ने भी इन फलों को हाथ भी नहीं लगाया है। इन्हें मत खाओ। मुझे विश्वास है कि ये फल खाने लायक नहीं हैं’ ।
'कैसी बेकार की बातें कर रहे हो!’  पहले बंदर ने कहा- 'मुझे तो इन फलों में कुछ बुरा नहीं दिख रहा। मैं तो फल खाने के लिए पेड़ पर चढूँगा’ ।
'जैसी तुम्हारी इच्छा’   बुद्धिमान् बन्दर ने कहा- 'मैं खाने के लिए कुछ और ढूँढता हूँ’ ।
पहला बंदर पेड़ पर चढ़कर फल खाने लगा और उसने जी भर के फल खाए; लेकिन वे फल उसका अंतिम भोजन बन गए क्योंकि फल स्वादिष्ट तो थे ;परन्तु जहरीले थे। दूसरा बंदर जब कहीं और से खा-पी कर आया तो उसने पेड़ के नीचे अपने मित्र को मरा हुआ पाया। उसे यह देखकर बहुत दु:ख हुआ लेकिन वह तो पहले ही अपने मित्र को सावधान कर चुका था।
अच्छे विचार- बुरे विचार
'मुझे कोई मार्ग नहीं सूझ रहा है. मैं हर समय उन चीज़ों के बारे में सोचता रहता हूँ जिनका निषेध किया गया है। मेरे मन में उन वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छा होती रहती है जो वर्जित हैं। मैं उन कार्यों को करने की योजनाएँ बनाते रहता हूँ जिन्हें करना मेरे हित में नहीं होगा। मैं क्या करूँ?’  - शिष्य ने गुरु से उद्विग्नतापूर्वक पूछा।
गुरु ने शिष्य को पास ही गमले में लगे एक पौधे को देखने के लिए कहा और पूछा कि वह क्या है। शिष्य के पास उत्तर नहीं था।
'यह बैलाडोना का विषैला पौधा है। यदि तुम इसकी पत्तियों को खा लो तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। लेकिन इसे देखने मात्र से यह तुम्हारा कुछ अहित नहीं कर सकता। उसी प्रकार, अधोगति को ले जाने वाले विचार तुम्हें तब तक हानि नहीं पहुँचा सकते जब तक तुम उनमें वास्तविक रूप से प्रवृत्त न हो जाओ । (hindizen.com से)

एक पाँव का जूता



 एक पाँव का जूता
- भैरव प्रसाद गुप्त
जाने कैसी आवाज़ उनके कानों में पड़ी कि वह चिहुँक उठीं। तीन दिन से रात में कई-कई बार ऐसा हो रहा था। जीवन में पहले ऐसा कभी हुआ हो, उन्हें याद नहीं। इसी कारण दो रातों वह अपने कानों पर विश्वास न कर सकीं, यों ही, कुछ नहीं कहकर उन्होंने अपने को बहला लिया और करवट बदलकर सो गयीं। किन्तु आज वह कुछ सावधान थीं, दो रातों के लगातार अनुभव ने उनके मन में अनजाने की एक सन्देह पैदा कर दिया था। दिन में कई-कई बार उन्होंने बाबूजी को घूर-घूर कर देखा था। बाबूजी उन्हें बेहद उदास दिखाई पड़ते थे। उन्हें ऐसा लगा था कि अबकी लखनऊ से वापस आने के बाद बाबूजी की बोली बहुत कम सुनने को मिली थी। लेकिन ऐसा तो जीवन में अनेक बार हो चुका था। उनके मौन-व्रत से कौन परिचित नहीं? फिर भी आज उन्हें लगा कि ज़रूर कोई बात है! बाबूजी उदास यों ही नहीं होते, मौन-व्रत भी वह सब से कहकर ही धारण करते। लेकिन इधर तो बाबूजी ने उनसे भी कोई बात नहीं की थी।
उन्होंने पूछा था-क्या बात है? ऐसे खोए-खोए क्यों दिखाई देते हैं? तबीयत तो ठीक है?
बाबूजी ने जाने कैसी नज़रों से उन्हें एक पल को देखा था और फिर आँखें झुकाकर घर से बाहर चले गये थे। उन्हें उस तरह जाते हुए देखकर मन में खटका होना स्वाभाविक ही था। उन्होंने सोचा, शायद वह बाहर बैठक में जाएँगे। वह दरवाजे तक आई थीं; लेकिन बाबूजी तो दूसरी दिशा में उसी तरह सिर झुकाए जाने कहाँ चले जा रहे थे। बिना कोई  ख़बर दिए तो वह कभी कहीं नहीं जाते। वह वहीं फ़र्श पर बैठ गई थीं।
ज़रा दूर जाकर ही बाबूजी लौट आए थे। द्वार पर ठिठककर वह बोले थे-मन व्यग्र है। लेकिन तुम कोई चिन्ता न करो। जाकर भोजन करो। मैं थोड़ा आराम करूँगा।-और वह बैठक की ओर बढ़ गए थे।
बाबूजी के इस तरह के व्यवहार की वह अभ्यस्त थीं। बाबूजी ने उन्हें शुरू से ही सिखाया था कि उनकी व्यग्रता की स्थिति में उन्हें अकेले छोड़ देना चाहिए, उनके पीछे नहीं पडऩा चाहिए और उनके आदेश का, बिना किसी हील-हुज्जत के, पालन करना चाहिए। उन्हें इसी से शान्ति मिलती है।
वह अन्दर जाकर बाबूजी के आदेश का पालन करने लगीं। बाबूजी की तरह इनका भी जीवन यान्त्रिक होकर रह गया था। सन् 31 में जो बाबूजी ने एक व्रत लिया था, जीवन-भर के लिए उसी के व्रती होकर रह गए। कभी किसी ने कोई अन्तर नहीं देखा... वही एक जोड़ा अपने काते सूत के खद्दर का कुर्ता, धोती, गंजी, गाँधी टोपी और झोला... वही चप्पल, वही अपने हाथ से कपड़े साफ करना, दिन-रात में एक बार भोजन करना, चौकी पर चटाई बिछाकर सोना, सदा तीसरे दर्जे में सफ़र करना, सच बोलना और जनता की सेवा के लिए सदा तत्पर रहना। पहले तो बाबूजी का यह सुराजी बाना जाने कैसा-कैसा उन्हें लगा था। यह किसी ऋषि की तपस्या से किसी भी माने में कम नहीं था। लेकिन बाबूजी की दृढ़ता भी कोई साधारण नहीं थी। कभी वह अपने पन से डिगे हों, ऐसा किसी ने नहीं देखा। वह बेचारी क्या करतीं? बब्बू को गोद में लिये वह मन-ही-मन रोतीं, लेकिन ऊपर से बाबूजी के आदेशों के पालन में कोई कमी दिखाई न दे, इसके प्रयत्न में लगी रहतीं। बब्बू के होने के बाद बाबूजी ने यह व्रत लिया, इसे वह अपना सौभाग्य समझतीं, वर्ना... और इसके आगे सोचकर वह काँप-काँप उठतीं। बाबूजी कभी ऐसे हठी हो जाएँगे, कौन सोचता था।
बाबूजी की तपस्या सफल होते बहुत देर न लगी। जनता के वह प्रिय हो गये। कस्बे से जि़ले के और फिर प्रान्त के नेता हो गये। चारों ओर बाबूजी की धूम, सब के मुँह पर बाबूजी-बाबूजी! लेकिन बाबूजी का जीवन वहीं-का-वहीं। रंचमात्र का भी परिवर्तन नहीं, जैसे जो बाबूजी पहले थे, वही अब भी, कहीं कोई अन्तर आया ही नहीं। फिर जेल... पुलिस की लाठियाँ ... और सन् बयालीस... भगवान की कृपा से उन्हें सिर्फ दस साल की सज़ा हुई, वर्ना लोग तो कहते थे, फाँसी पर लटका दिये जाएँगे।... प्यूनिटिव टैक्स... खेती-बारी ज़ब्त। कैसे कटे थे बब्बू की माँ के दिन! भगवान दुश्मन को भी न दिखाये वैसे दिन! लोग उनके पास भी आते सहमते। घर में एक दाना नहीं। रात को पड़ोसी सोता पडऩे पर छुपकर कुछ खाने को दे जाता, तो अधम काया की भूख मिटती वर्ना फ़ाँका...
आखिर वे यातना और आतंक के दिन भी कट ही गये। स्थिति सुधरी तो खोज-खबर लेनेवाले भी आए।... फिर तीन बरस बीतते-न-बीतते बाबूजी छूटकर आ गए। उनका स्वागत देखकर जैसे सारा कष्ट भूल गया। वह एक दिन और यह एक दिन! बाबूजी घर में आए तो बब्बू को गोद में उठाकर चूमा और उसकी माँ के सिर पर हाथ रखकर पूछा-तुम्हें बहुत कष्ट सहना पड़ा न!
तीन वर्ष तक रोते-रोते बब्बू की माँ के आँसू जैसे सूख गए थे। इस क्षण अचानक जाने कहाँ से फिर उबल पड़े।
बाबूजी जाने कैसे कण्ठ से बोले- रोती हो? मैं तो नहीं रोया।
बब्बू की माँ आँचल से आँसू पोंछती हुई बोलीं-आप आ गए, ये तो खुशी के आँसू थे।
बाहर भीड़ बाबूजी जि़न्दाबाद के नारे लगा रही थी।
बाबूजी अचानक गम्भीर होकर बोले-मैं आ गया, तुम खुश हो। लेकिन मेरी खुशी तो गुलामी ने लूट ली है। जब तक हमारा देश आज़ाद नहीं हो जाता, हमारी खुशी वापस नहीं आने की। आज़ादी बहुत मुश्किल चीज़ है, इसके लिए... और वह बब्बू को गोद से उतारकर बाहर चले गए।
बब्बू की माँ की समझ में कुछ न आया था। उनकी खुशी बहुत ही छोटी थी, वही उनका जीवन था। उन्होंने बाबूजी को कभी किसी शिकायत का मौका नहीं दिया।... लेकिन जब बाबूजी की खुशी के दिन आए तो अचानक ही बब्बू की माँ को लगा कि अब उनकी खुशी बहुत बड़ी हो गई है। कई बार उनका मुँह खुला कि बाबूजी से कुछ कहें। लेकिन कुछ कहने की हिम्मत नहीं पड़ी। जाने वह खुशी बाबूजी के चेहरे पर कब आई और कब चली गई, जैसे एक फुलझड़ी जली हो, और बुझ गई हो। और बब्बू की माँ मुँह ताकती रह गई हों।
बब्बू ने किसी तरह हाईस्कूल पास किया और अपनी योग्यता से या भाग्य से रेलवे में क्लर्क हो गया। लोगों ने बब्बू की माँ से कहा-बाबूजी का इकलौता लड़का और ...
लेकिन बब्बू की माँ ने बाबूजी से फिर भी कोई शिकायत न की।
लोगों ने कहा-बाबूजी के सभी-के-सभी साथी जाने क्या-से-क्या हो गये। लेकिन बाबूजी एम.एल.ए. होकर भी...
और बाबू जी के जीवन में जैसे कोई परिवर्तन आने ही वाला न हो। वही सब-कुछ, बल्कि और भी सख्ती के साथ। कभी-कभी वह आप ही बब्बू की माँ के पास आ बैठते और जैसे आत्म-स्वीकृति कर रहे हो, बोल उठते-बब्बू की माँ! मैं कितना ग़लत सोचता था! आज़ादी अपने में कोई खुशी की चीज़ नहीं। खुशी तो देश की खुशहाली में है। हाय, हम कितने ग़रीब हैं, कितने दुखी हैं! जिस दिन यह ग़रीबी दूर होगी, दरअसल वही खुशी का दिन होगा! ...
और बब्बू की माँ जैसे उनकी यह बात भी नहीं समझती और उनका मुँह ताकती रहतीं। उनकी खुशहाली बहुत छोटी थी और वह सोचती थीं कि बाबूजी उसे बड़ी आसानी से हासिल कर सकते हैं, लेकिन वह कुछ भी न कहतीं।
लोग कहते- बाबूजी सचमुच महात्मा हैं!
बब्बू की माँ सुनतीं और गुनतीं कि महात्मा का अर्थ क्या होता है, लेकिन कहतीं कुछ नहीं।
लोग कहते- न रहने पर तो सभी फ़कीर बनते हैं, रहने पर जो फ़कीर बने वही सच्चा फ़कीर!
बब्बू की माँ सुनतीं और गुनतीं कि फ़कीर किसे कहते हैं, लेकिन कहतीं कुछ नहीं।
उनकी बानी तो बाबूजी थे, उन्हें खुद कहने की क्या ज़रूरत?
एक बार पहले भी इसी तरह लखनऊ से लौटकर उन्होंने अपनी व्यग्रता प्रकट की थी। लेकिन उस बार तो ज़रा ही देर बाद बब्बू की माँ के पास आकर हँसते हुए कह गये थे-वे सब मुझे पाखण्डी कहते हैं, बब्बू की माँ। कहते हैं, जब फ़र्स्ट क्लास का टिकट मिलता है तो थर्ड क्लास में सफ़र करने का क्या मतलब? कुछ समझती हो?
बब्बू की माँ क्या समझें? जीवन में उन्होंने सफ़र कब किया कि उन्हें फ़र्स्ट और थर्ड की तमीज़ हो?
लेकिन उस बार रात में कभी कोई ऐसी आवाज़ सुनाई नहीं दी थी। अबकी तो तीन-तीन दिन बीत गए। दिन-भर बाबूजी मौन व्यग्रता में पड़े रहते हैं। और रात में कई-कई बार जाने कैसी आवाज़ बब्बू की माँ के कानों में पड़ती है कि वह चिहुँक-चिहुँककर उठ बैठती हैं। लगता है, जैसे कोई बालक रोता हो, बापू-बापू की रट लगाता हो।
बब्बू की माँ आज रात अपने को बहला न सकीं। वह उठ बैठीं। आवाज़ वैसी ही आ रही है। उन्होंने ज़रा ध्यान से आहट ली, तो लगा, आवाज बाहर से आ रही है। बाहर सहन में बाबूजी सो रहे थे। अन्दर आँगन की अपनी चारपाई से बब्बू की माँ उठ खड़ी हुई। आँगन में मैली चाँदनी फैली हुई थी। दिन-भर की लू की मारी हवा इस वक्त कुछ ठण्डी-ठण्डी सी लग रही थी। रात के सन्नाटे में वह किसी बालक के रुदन-सी आवाज़ कितनी भयानक लग रही थी! बब्बू की माँ को ध्यान आया कि पहले तो यह आवाज़ ज़रा-ज़रा देर में चुप हो जाती थी, लेकिन आज तो यह जाने कब से आ रही है।... दूर के अपने स्टेशन पर जाने बब्बू कैसे है? क्यों ऐसा लगता है कि जैसे बब्बू ही रो रहा हो? जैसे शिकायत कर रहा हो कि बाबूजी ने उसकी पढ़ाई भी पूरी नहीं कराई... यह उम्र हो गई, अभी शादी नहीं कराई... लेकिन नहीं, नहीं, वह शिकायत करने वाला, मुँह लेकर कुछ कहने वाला बेटा नहीं है! जैसी माँ , वैसा ही बेटा।...
वह आवाज़ जैसे और भी करुण, और भी भयानक हो उठी। अकेले घर में बब्बू की माँ को डर लगने लगा। वह चारपाई से उठ खड़ी हुई। बाहर के दरवाज़े के पास की खिड़की से उन्होंने बाहर झाँका। आवाज़ बाहर से आ रही थी। बाबूजी चौकी पर दायीं करवट पड़े थे। कुहनी में उनका मुँह छुपा हुआ था, साफ़ दिखाई न दे रहा था। वह आवाज़ उसी तरह बही आ रही थी। फिर बाबूजी को देखते हुए बब्बू की माँ को सहसा ही ऐसा लगा कि जैसे अब वह आवाज़ उनके कानों से टकराकर दूर चली गई है और उनको एक बहुत पुरानी बात याद आ गई। जब वह इस घर में आई थीं तो बाबूजी अकेले ही थे। उनके माँ-बाप जाने कब के गुज़र चुके थे। रात में चारों ओर जब सोता पड़ जाता तो वह इसी खिड़की पर आकर उन्हें धीरे-धीरे पुकारते, दरवाज़ा खोलो... और एक बार वह भी इस खिड़की पर आई थीं। यही जेठ के दिन थे। आँगन में सोई यी थीं कि अचानक उनकी नींद उचट गई। जाने मन में क्या उठा कि वह इस खिड़की पर आ गईं। लेकिन उन्हें पुकारें कैसे? फिर आँगन में से कुछ कंकडिय़ाँ चुन लाईयीं और एक-एक कर खिड़की से उनकी चारपाई पर फेंकने लगीं। वह उठे तो दरवाज़ा ज़ोर से खोलकर आँगन में चली गई थीं। उन्होंने अन्दर आकर कहा-एक कंकड़ी मेरी भौंह पर लगी है!
-अरे, उन्होंने व्यस्त होकर कहा था-कहाँ? चोट तो नहीं लगी?
-नहीं, नहीं, वह कंकड़ी थी कि पंखुड़ी? ...
और वह बब्बू! हे भगवान, उस रात कहीं वह चुक गई होतीं तो उन्हें बब्बू की माँ कौन कहता? और फिर उसके बाद तो ...
उनके मन में आया, एक कंकड़ी फेंकूँ क्या? ... कि अचानक बाबूजी चौकी पर उठ बैठे।
और बब्बू की माँ के मन में आया, दरवाज़ा खोल दूँ क्या? और सच ही बढ़कर उन्होंने दरवाज़ा खोला ही था कि उनकी आवाज़ आई-बब्बू की माँ! -उस आवाज़ में कैसी तो एक तड़प थी कि बब्बू की माँ का सपना टूट गया। सिर का आँचल ठीक करती हुई जैसे एक अपराधी की तरफ वह बोलीं-कहिए!
-इस बेला तुमने दरवाज़ा क्यों खोला?
-मुझे ऐसा लगा कि बाहर कोई बालक रो रहा है।
-तुमने सुना था?
-तीन रातों से सुन रहीं हूँ।
-ओह! तनिक रुककर बाबूजी ने कहा-यहाँ आओ।
वह सहमी-सहमी-सी उनके पास आ गई।
वह बोले- बैठो!
आपकी चौकी पर?
-हाँ, तुमसे एक बात कहनी है।
-मुझसे?
-हाँ, बाबूजी खड़े-खड़े ही बोले-अपनी यह बात मैं और किसी से कह नहीं सकता। ... जानती हो तीन रातों से मैं ही रो रहा हूँ...
-आप?
-हाँ, मैं। तुम ने ठीक ही किसी बालक का रुदन सुना। इन्सान जब रोता है तो बालक ही बन जाता है।
-लेकिन क्यों? आप तो मोह-माया...
-कितने दिनों बाद आज तुमने मुझसे एक सवाल पूछा है...
-ओह, क्षमा कीजिए!
-नहीं-नहीं, बब्बू की माँ! एक नहीं तुम हज़ार सवाल पूछो!
मेरा पतन हो गया है। जिस सिंहासन पर तुम लोगों ने मुझे बैठा रखा था, उससे मैं च्युत हो गया हूँ। मैं...
-यह सब आप क्या कहते हैं? मेरी समझ...
-आज तक तुम ने समझकर मेरी कोई बात नहीं मानी। मेरी बात ही तुम लोगों के लिए वेद-वाक्य रही। लेकिन आज मैं चाहता हूँ कि पहले तुम मेरी बात समझो। तुम्हें मैं वह पूरी घटना ही सुनाता हूँ, जिसने मेरे जीवन के सभी आदर्शों, सिद्धान्तों और बड़ी-बड़ी त्याग-तपस्या की बातों को एक मामूली- सी स्थिति की चट्टान पर पटककर चूर-चूर कर दिया है। मैं तीन दिनों से रो रहा हूँ, लेकिन ऐसा लगता है कि सारी जि़न्दगी जिस राह मैं चला हूँ, उसी पर मैं भटक गया हूँ। सुनो! उस दिन गाड़ी में बेहद भीड़ थी। दोपहर को गाड़ी पहुँची, तो ऐसी भीड़ डब्बे में घुसी कि मेरा दम फूलने लगा। ऐसा लग रहा था। कि मैं बेहोश हो जाऊँगा। लोगों की साँसों से जैसे लपटें छूट रही थीं । सोचा, उतरकर जान बचाऊँ, लेकिन उस भीड़ में से उतरना कोई मामूली काम न था। फिर भी मैं झोला लेकर उठ खड़ा हुआ। और किसी तरह एक पग बढ़ाया ही था कि गाड़ी ने सीटी दे दी। अब क्या करूँ, लोगों ने कहा, बैठ जाइए, गाड़ी चलेगी तो थोड़ी राहत मिलेगी। मेरे बैठते-बैठते गाड़ी चल पड़ी। तभी एक चमरौंधा जूता मेरी गोद में आ गिरा। मैंने खिड़की की ओर नज़र घुमाई तो एक पोटली मेरी पीठ से बज उठी। देखा, एक बूढ़ा किसान मेरी खिड़की में पाँव डाले ऊपर चढ़ रहा है। जाने मुझे क्या हुआ कि मेरा दिमाग ही खराब हो गया। गोद का जूता उठाकर मैंने बाहर फेंक दिया और मारे गुस्से से काँपने लगा। किसानों ने अन्दर आकर माथे का पसीना मेरे सिर पर चुलाते हुए कहा, छिमा कीजिएगा, बाबूजी, हमें दो ही टीसन जाना है। उसके मुँह से बाबूजी सुनकर मेरे ऊपर घड़ों पानी पड़ गया। वह शायद मुझे पहचानता था। मैंने दूसरी ओर मुँह फेर लिया वह अपनी पोटली और जूते सँभालने लगा। फिर बोला, हमारा एक जूता किधर जा पड़ा? मैं जानता था कि उसका एक जूता कहाँ है, लेकिन मेरे मुँह से कोई बात नहीं निकली। अब मैं सोच रहा था कि कहीं इसे मालूम हो जाय कि मैंने ही इसका एक जूता... वह छटपटाकर आस-पास के लोगों से पूछ रहा था और लोग उसे डाँट रहे थे। आखरी हार-पछताकर उसने पूछना बन्द कर दिया। फिर भी रह-रहकर बोल उठता था, जाने हमारा एक जूता कहाँ चला गया? भुभुर में मेरा पाँव जल जाएगा। आखरी बेल्थरा रोड आया और जब वह एक जूता और पोटली लटकाये नीचे उतर गया, तो मेरी जान में जान आयी। लेकिन, बब्बू की माँ, फिर जो दृश्य मैंने देखा है, वह... वह...बाबू जी का गला भर्रा गया- वह मैं कभी भी न भूल सकूँगा! वह किसान एक पाँव में जूता डाले और दूसरे नंगे पाँव से पिघलते कोलतार पर चला जा रहा था।  उसका पाँव पिघलते कोलतार पर ऐसे पड़ रहा था, जैसे अंगार पर और फिर मुझे ऐसा लगा कि वह नंगे पाँव अंगार पर नहीं, मेरी छाती पर चल रहा है... और मैं कुचला जा रहा हूँ ...कुचला जा रहा हूँ ... बब्बू की माँ, मैं क्या करूँ? क्या करूँ?- और बाबूजी अपनी छाती मसलते हुए चौकी पर बैठ गए।
बब्बू की माँ को लगा कि जैसे वही आवाज़ फिर उनके कानों से आकर टकराने लगी। वह उठ खड़ी हुईं और दरवाज़े की तरफ बढ़ती हुई बोलीं- मैं क्या जानूँ, बाबूजी मेरी समझ में तो आज तक आपकी कोई बात नहीं आई, फिर यह बात तो और भी मुश्किल मालूम होती है। मैं आपको क्या बता सकती हूँ?  

हमारी पहली हवाई यात्रा

हमारी पहली हवाई यात्रा
- अनुज खरे
हवाई जहाज से यात्रा करना आज भी देश में अभिजात्य की निशानी माना जाता है। कल भी माना जाता था। बल्कि तब तो यात्रा अभिजात्य लोग ही करते थे। जैसे देश में जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति अभिजात्य होना चाहता है, हम भी होना चाहते थे, बल्कि हम तो बचपन से ही इस दिशा में प्रयासरत थे। चांस हाल ही में मिला। यात्रा भोपाल से चंडीगढ़ तक की थी। इससे आगे की कसौली तक की बाय रोड भी थी ; लेकिन यह बात गोपनीय है और कुल कहानी का वज़न कम कर रही है, इसलिए फिर कभी।
तो यात्रा पर जाने से पहले जितने लोगों को टिकट दिखाया जा सकता था, दिखाया गया। जिन्हें टिकट नहीं दिखाया जा सकता था , उन्हें यात्रा विवरण से लगातार लाभान्वित करवाया गया। आखिर आदमी की भी सीमा होती है, कितने लोगों को बताया जा पाता। खैर, हमने तो उपलब्ध हर संसाधन का प्रयोग करके दूर-दूर तक जाकर अपनी यात्रा की जानकारी प्रेषित कर दी। जहाँ नहीं जा पाए वहाँ दूरस्थ यंत्र की मदद से सूचना पहुँचाई गई। दूरसंचार क्रांति का महत्तव पहली बार इस गतिविधि के दौरान ही स्पष्ट हुआ। जो हमारे शुभचिंतक थे उन्होंने हमें बधाई दी। जो विरोधी थे उन्होंने हमारे ओछेपन का मज़ाक उड़ाया। ओछेपन वाली बात हमारे शुभचिंतकों ने ही उन्हें बताई थी यह बात भी हमें बाद में पता चली। खैर, जलन तो देवताओं तक के बीच में भी होती है।
जब विमान में बैठे, तो जिस नजर से एयर होस्टेस नामक पात्र को हमने देखा, उससे भी बुरी नजरों से उन्होंने हमें देखा। उन्होंने विमान में पहली-पहली बार बैठने वालों के नजरिए से काफी निर्देश दिए। जो अंग्रेजी में इतनी वहशी भाव-भंगिमा में दिए गए कि जिसे हमने नहीं सुना। बाद में जो हिन्दी में कहा गया, उसका हमने नोटिस ही नहीं किया। आखिर विमान में बैठा हर आदमी अंग्रेजी में पढ़ रहा था, जब पढ़ नहीं रहा था, तो अंग्रेजी में बात कर रहा था। बाकियों की देखादेखी पढऩे की हमने भी कोशिश की तो अंग्रेजी किताब के चित्र सुंदर दिखने लगे। पहली बार हमें चित्रों की ताकत का अहसास हुआ। लगा कोई किताब केवल चित्रों के सहारे ही पढ़ी जा सकती है। एक चित्र एक हजार शब्दों के बराबर होता है। अभिव्यक्ति किसी भी भाषा की मोहताज नहीं होती, किस्म की बातें याद आई, सच लगीं। एयर होस्टेस नंबर एक को भी हमने थोड़ी बहुत तभी तवज्जो दी, जब वे कुछ खाने को लाईं, अन्यथा तो पूरी यात्रा के दौरान हमने उन्हें मुँह तक नहीं लगाया, रूठे -से रहे बात तक नहीं की। उन पर भी दिखता था कि हमारे अभिजात्य का खासा रौब पड़ा था, क्योंकि उन्होंने भी हमें मुँह नहीं लगाया। आस-पास के लोगों से सर, सर करके बातें करती रहीं, हमारी तरफ देखकर मुस्कुराती रहीं। उनकी इस प्रक्रिया के दौरान हमें मुस्कुराहट के प्रकारों में से व्यंज्य वाली मुस्कुराहट का उप प्रकार तत्काल समझ में आ गया। हालाँकि जब एयर होस्टेस नंबर दो पास से गुजरीं और उन्होंने जिस नज़र से हमें देखा उनसे हमें तत्काल प्यार हो गया, मध्यवर्गीय लोगों यही तो बुरी आदत है कि किसी भी लड़की ने जरा-सी दया नहीं दिखाई कि वे प्रवृत्तिवश इसे प्यार मान बैठते हैं, फिर एयर होस्टेस नंबर तीन ने भी पास से निकलते वक्त इसी तरह की नजरों से देखा, तब हमारे पास उनसे फॉलिंग इन लव हो जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। इस तरह बैठे-बिठाए मामला ट्राएंगल हो गया। हालाँकि जब दोनों ने हमारे अलावा कइयों को भी इसी नज़र से देखा और एयर होस्टेस नं. एक ने इसी दौरान वापस एंट्री मारी, दोनों के सम्मिलित प्रभाव से उपर्युक्त कहानी बिना परवान चढ़े ही खत्म हो गई। हालाँकि उन पर तो हमें इतना गुस्सा आया कि पानी तक बाजूवाले का उठाकर पी दिया, वो तो जब उसने हमें उठाकर बाहर फेंकने वाली निगाहों से देखा , तभी हमारा गुस्सा और प्यार का बुखार उतरा।
विमान का भीतरी दृश्य देश के विकास की सच्ची तस्वीर था। पुरुष समाज खाया-पिया पौष्टिकता की चमक से युक्त था, तो एयर होस्टेसों का गोरा रंग तो इतनी चमक मार रहा था कि समझ ही नहीं आया कि इन्हें कहाँ से आर्डर देकर बनवाया गया होगा। आस-पास के लोग फैशन के साक्षात् प्रतीक लग रहे थे। पड़ोस में ही कुछ मॉडलनुमा महिलाएँ बच्चों के साथ बैठी थीं, वे भयंकर रूप से डायटिंग की शिकार इतनी दुबली-पतली दिख रही थीं कि उनके बच्चे उनसे बड़े लग रहे थे। उन्हें देखकर निश्चिंतता हो गई कि देश के कुछ हिस्सों में शादी के बाद बच्चे पैदा करने की परंपरा प्राय: लुप्त हो चुकी है या खाने में केवल हवा खाकर भी जीवित रहा जा सकता है। जो पुरुष फैशन में लिप्त नहीं थे, वे आस-पास की नारियों को देखते हुए मोबाइल पर अपने कर्मचारियों को डाँट रहे थे, जो बिचारे कर्मचारियों को अफोर्ड नहीं कर सकते थे, वे दाएँ-बाएँ से गुज़रती एयर होस्टेसों को देखकर अपने अधीनस्थों पर ही पिले पड़े थे। मेरे साथ वाली सीट पर बैठे भाई साहब ने तो अपनी किसी कर्मचारी को इतना कसकर डाँटा कि मेरी आत्मा तक अंदर से सर, सर गलती हो गई वाली मध्यवर्गीय हरकत पर उतर आई थी। विमान चला तो नीचे लोग इतने तुच्छ नजर आए जैसा कि ऊँचाई पर जाने वाले हर आदमी को नजर आते होंगे। इस पर हम तत्काल ही ऊँचाई की ताकत के कायल हो गए। ऊपर से बड़े शहर तो फिर भी ठीक हैं, कस्बे और गाँव तो नजर ही नहीं आ रहे थे। इस पर यह भी स्पष्ट हुआ कि आदमी हो या नेता, हवाई हो जाने पर आम आदमी उसकी और वो आम आदमी की नजर से ओझल हो जाता है। हालाँकि कसूर ऊँचाई का रहता है, लोग बड़े आदमियों को अनावश्यक कोसते हैं। हालाँकि वे बिचारे भी क्या करें कभी इतनी ऊँचाई से उन्होंने अपना वजूद देखा नहीं होता है, अन्यथा उनके विचार भी विमान वालों जैसे ही होते। इस तरह यह सिद्धान्त भी काफी हद तक स्पष्ट हुआ कि ऊपर चढऩे वाली कोई भी चीज जैसे दिमाग देर सबेर तकलीफ़ का कारण ही बनती है।
इसी तरह विमान का भीतरी मंज़र भी दो भागों में बाँटा था। आगे वाले-पीछे वाले। आगे बिजनेस क्लास वाले लोग थे, जिनकी नजरों में पीछे वाले पूअर थे। पीछे इकोनॉमी क्लास वाले लोग थे जिनकी नजरों में आजू-बाजू वालों के साथ नीचे वाले वेरीपूअर थे। दोनों तरह के व्यक्तियों की चाल-चलन और नज़रों में इस तरह की विभाजन रेखा के खंभे स्पष्ट गड़े नज़र आ रहे थे। इसे देखकर ही लगा कि देश में विलो पावर्टी लाइन के पैरामीटर ऐसी ही किसी हवाई यात्रा में बिजनेस क्लास में बैठे किसी विद्वान ने बनाए होंगे, क्योंकि जिस तरह देश से प्रतिवर्ष गरीबी और कुपोषण घटता हुआ बताया जा रहा है (हालाँकि गरीब बढ़ रहे हैं) उससे स्पष्ट है कि ऐसे सूचक विमान के अंदर के ऐसे ही किसी सीन को देखकर बनाए जा सकते हैं।यह कयास इतना पुख्ता है कि आगे चलकर कभी रहस्य खुला तो सही ही पाया जाएगा।
इसके पहले हवाई अड्डे पर सुरक्षा जाँच का सीन तो गजब रहा। हर बार हमारा बैग जाँच में पाक साफ पाया जाता था। हमें ही रोक लिया जाता था। पता नहीं उन्हें हमारी सूरत में क्या दिखता था कि कई प्रकार की पूछताछ संपन्न करने के पश्चात् भी बिठाए रहते थे। फिर कई प्रकार से अपनी हस्ती के बारे में बताने पर भी जब उन पर रौब नहीं पड़ता था, तभी हमें मजबूरी में अपनी रचनाएँ निकालना पड़ती थीं; जिनकी दहशत के कारण ही हमें छुटकारा मिलता था। हालाँकि हमें यह सोचकर डर भी लगा कि कहीं आतंकवादी भी इसी तरीके से सुरक्षा न भेदने लगें। इसी तरह वहाँ की ड्यूटी फ्री दुकानों में रखे सामान की कीमत पूछकर ही हवाई अड्डे पर लोग इतने शान्त क्यों बैठे हैं, वाली बात स्पष्ट हो गई।
इसी बीच एयर होस्टेस की घोषणा भी सुनाई देने लगी। जो बात उन्होंने हिन्दी में बोली वो हिन्दी-भाषियों को समझ में नहीं आई। जब उन्होंने उसका तर्ज़ुमा अंग्रेजी में सुनाया,तो वो किसी की भी समझ में नहीं आया। कुल मिलाकर लोगों ने खिड़की के बाहर झाँककर खुद ही अर्थ निकाल लिया। जो इस तरह था, कि कोई हवाई अड्डा आने वाला है। चकर-चकर खाना बंद कर दो। सीट बेल्ट बाँध लो। सीटों पर जो सज्जन औंधे मुँह लेटे हैं, वे सीधे हो जाएँ, नहीं तो विमान रुकने पर औंधे
मुँह ही गिरेंगे। सामान उठाएँ, तो अपना ही उठाएँ। हमें जो आपने सेवा का मौका दिया है उसके लिए धन्यवाद। अगर फिर पैसे इकट्ठे हो पाएँ और हवाई यात्रा की गुंजाइश बन ही जाए तो हमारी ही कंपनी के विमान से यात्रा करना। कुल मिलाकर यह स्पष्ट किया गया कि एयर होस्टेसों को घूरने का समय समाप्त हुआ, निकल लो।
तो इस तरह उनके ससम्मान नीचे उतार देने के साथ ही हमारी पहली हवाई यात्रा संपन्न हुई। अब सामान में जगह-जगह एयरलाइंस कंपनियों के टैग लगे हैं। यात्रा के बेकार टिकट को हमने पैसे से भी ज्यादा सँभाल कर रख लिया है। टैक्सी में सामान रख दिया है। हमने मोबाइल मिला लिया है। बात चल रही पड़ी है- यार, जस्ट अभी एयरपोर्ट पर उतरा हूँ, बड़ा हैक्टिक शिडच्यूल था। दो फ्लाइट चैंज करनी पड़ी। हवाई यात्रा के बाद जमीनी यात्रा शुरू हो गई है। बात के बीच-बीच में लगातार टैक्सीवाले पर नजर है, कि उस पर पर्याप्त प्रभाव पड़ रहा है कि नहीं। 
                    
लेखक अपने  बारे में: पिताजी का सरकारी नौकरी में होने के कारण निरंतर ट्रांसफर, घाट-घाट का पानी पिया। समस्त स्थलों से ज्ञान प्राप्त किया। ज्ञान देने का मौका आने पर मनुष्य प्रजाति ने लेने से इनकार किया तो इस तरह के व्यंग्यों के रूप में कसर निकाली। कहीं जाते समय ऑटो पंक्चर हुआ तो उतरकर जिस सद्भावना के साथ उसके ड्राइवर के गुणों का विश्लेषण और महिमामंडन किया उसे लोगों ने कालांतर में व्यंग्य के रूप में पहचाना। पत्रकारिता जीविका, अध्यापन शौकिया तो व्यंग्य अव्यवस्था के खिलाफ इसी ड्राइवरीय सद्भावना की पारी को आगे बढ़ाने का जरिया। अपने बल्ले के बल पर जबर्दस्ती टीम में घुसकर क्रिकेट खेलने के शौकीन। फिल्मी क्षेत्र की थोड़ी-बहुत जानकारी रखने की गलतफ़हमी। कुल मिलाकर जो हैं वो नहीं होते तो अद्भुत प्रतिभाशाली होने का दावा। शिक्षा- जनसंचार, इतिहास-पुरातत्त्व में स्नातकोत्तर। विदेश यात्राएँ- इंग्लैंड, इजिप्ट, लीबिया, चीन (हांगकांग, मकाऊ)। कई सम्मान, पुरस्कार एवं फैलोशिप प्राप्त। व्यंग्य संग्रह चिल्लर चिंतन, मप्र की संस्कृति-जनजीवन पर एक किताब। देशभर के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में 150 से अधिक व्यंग्य रचनाओं का प्रकाशन। संप्रति- कार्यकारी संपादक (dainikbhaskar.com)
 
  संपर्क: c-108 सेक्टर 61 नोयडा मो. 8860427755  

लगाओ पौधे

लगाओ पौधे
- अनिता ललित
1
सोंधी महक,
स्वच्छ वातावरण
कहाँ खो गया?
2
धूल, ईधन,
बारूद से दूषित
जग हो गया!
3
प्लास्टिक हँसे,
पेड़ों के ठूँठ रोएँ
जो हवा चले!
4
वृक्षों के लहू
सींचे जब धरती
प्रकृति रोए!
5
हँसती सृष्टि,
महकती प्रकृति
अब चीत्कारे!
6
ना काटो वन,
घुटने लगीं साँसें
सुलगे घन!
7
युद्ध है सर्प,
प्रदूषण है डंक,
कुचलो फन!
8
भुला दुश्मनी,
जलाओ नेह-दीप
बुझा बारूद!
9
धुआँ ही धुआँ,
तनाव के घेरे में
विक्षिप्त मन!
10
महके माटी,
प्रकृति- गोद झूले
ये देखे स्वप्न!
11
जले नकाब,
धरा के सौंदर्य का
बचाओ उसे!
12
लगाओ पौधे,
सजाओ हरीतिमा
सहेजो उसे!
13
स्वर्ण कलश
सिंधु में ढुलकाती
उषा पधारी!
14
सृष्टि सदा ही,
स्फूर्ति से है हँसती
उदय-अस्त!
15
कवि- कल्पना,
नहीं बँधे सीमा में
जो खोले पंख!
16
सीमा ना जाने,
हर बंधन तोड़े
प्रेम- लहर!
17
है सीमाहीन,
ममता का आकाश,
बच्चे हैं तारे!
18
मासूम आँखें
ले कल के सपने
फिरें बेचैन ।
19
जो देखें कल
अनुभवी नज़रें
होतीं बेचैन।
20
थाम लो हाथ,
दुनिया को दें मात
हम जो साथ!
21
शब्दों में गर
दुख सिमट सके
क्यों आँसू बहें?
22
दिल से बहे,
जब प्रेम की धार
जीवन खिले!
23
साँस है 'धागा’ ,
उम्र पिरोए 'मोती’ ,
जीवन 'माला’ !
24
एक कहानी,
सपनों की रवानी,
ये ज़िन्दगानी!    
 
लेखक के  बारे में: जन्म- 6 सितम्बर, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश), शिक्षा- एम. ए. इंग्लिश लिटरेचर!
अभिरुचि- जो भी मेरे दिल को छू जाए... वो संगीत, कविता, कहानी, लेख मुझे पसंद हैं और वही सुनना, पढऩा तथा लिखना मुझे बहुत पसंद है! लिखने का शौक मुझे शेली और कीट्स को पढ़ते-पढ़ते हुआ! हाइकु, ताँका व चोका मंच पर आकर बहुत कुछ सीखने को मिला! कम शब्दों में अपने भावों को व्यक्त करने का अनोखा अवसर मिला! मैनें मई 2012 में अपना ब्लॉग शुरू किया। अभी तक मैंने कुछ कविताएँ, कहानियाँ तथा कुछ लेख लिखे हैं ।
 मेरे ब्लॉग का लिंक है- http://boondboondlamhe-anita.blogspot.in/  Email- anita.atgrace@gmail.com, संपर्क: 1/16 विवेक खंड, गोमतीनगर,लखनऊ, (उ.प्र.)