मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Oct 22, 2009

दिये की लौ बढ़ाओ

- डॉ. रत्ना वर्मा
इन दोनों हाथों में


आज भी महकती है
इस दिये की मिट्टी।
मिट्टी से दीपक बन जाने की
शाश्वत निर्माण प्रक्रिया में
हर बार
एक नई ऊर्जा बटोरते हाथ
चाक पर घूमते हैं
अंधेरे घरों के लिए
रोशनी का एक संकेत लेकर।

किसी ने नहीं पूछा
दूसरों के लिए
रोशनी बन जाने में
कितनी उमर बिताओगे
अपनी अंधेरी देहलीज के लिए
दीपक
कब बनाओगे?


व्यर्थ ढूंढ रहे हो
बिजली के लट्टुओं में
आदमी के हाथों की महक
ये तो
इशारे से जलने
बुझने वाले दिये हैं।

इस छद्म रोशनी में
नहीं मिलेगी तुम्हें
अपनी मिट्टी की गंध।

यह जगमगाता शहर
बिजली से चलता है
कम्प्यूटर से निर्धारित होती है
अंधेरे और रोशनी की सीमाएं।

चेहरों पर
नकली रोशनी बांटते हुए
पूछा होता कभी
लोगों के दिलों में
गहराते अंधेरे का हिसाब।

अभी भी
दूर टिमटिमा रहा है
इन दो हाथों से बना हुआ
मिट्टी का दिया
इस दिये की लौ बढ़ाओ
पास आओ और
हाथों की इस महक को गले लगाओ।

इन हाथों में
आज भी बहता है
आदमी का खून
ये कम्प्यूटर नहीं है
जब भी पास आयेंगे
अंधकार और प्रकाश का
सही समीकरण बतायेंगे।

तुम ऐसे क्यों आई लक्ष्मी

तुम ऐसे क्यों आई लक्ष्मी 
- प्रेम जनमेजय
पत्नी ने दरवाज़ा खोला, सामने लक्ष्मी नहीं, लक्ष्मीकांत वर्मा थे। उनका चेहरा सरकारी कर्मचारी को महंगाई-भत्ता मिलने के समाचार-सा खिला हुआ था। लक्ष्मीकांत बोले, 'भाभी जी, आज तो फटाफट मिठाई मंगवाइए, बढिय़ा चाय पिलवाइए और घर में बेसन हो तो पकौड़े भी बनवा दीजिए।'
लोग दीपावली पर लक्ष्मी पूजन करते हैं, मेरा सारे वर्ष चलता है। फिर भी लक्ष्मी मुझपर कृपा नहीं करती। मैं लक्ष्मी-वंदना करता हूं- हे भ्रष्टाचार प्रेरणी, हे कालाधनवासिनी, हे वैमनस्यउत्पादिनी, हे विश्वबैंकमयी! मुझ पर कृपा कर! बचपन में मुझे इकन्नी मिलती थी पर इच्छा चवन्नी की होती थी, परंतु तेरी चवन्नी भर कृपा कभी न हुई। यहां तक मुझमें चोरी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी आदि की सदेच्छा भी पैदा न हुई वरना होनहार बिरवान के होत चिकने पात को सही सिद्ध करता हुआ मैं अपनी शैशवकालीन अच्छी आदतों के बल पर किसी प्रदेश का मंत्री/किसी थाने का थानेदार/किसी क्षेत्र का आयकर अधिकारी/आदि-आदि बन देश- सेवा का पुण्य कमाता और लक्ष्मी नाम की लूट ही लूटता। युवा में मैं सावन का अंधा ही रहा। जिस लक्ष्मी के पीछे दौड़ा, उसने बहुत जल्द आटे-दाल का भाव मुझे मालूम करवा दिया। हे कृपाकारिणी मुझपर इस प्रौढ़ावस्था में ही कृपा कर। मैं मानता हूं कि मैंने मास्टर बनकर तेरी आराधना के समस्त द्वार बंद कर दिए हैं परंतु हे रिश्वकेशी तेरे प्रताप से जेलों के ताले खुल जाते हैं, एक दीन-हीन मास्टर के द्वार क्या चीज़ है। एक दरवाज़ा मेरी ही खोल दे।
तभी दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी। पत्नी बोली, 'सुनते हो, देखो शायद लक्ष्मी आई है।' मैं मुद्रास्फीति-सा एकदम उठकर लक्ष्मी के स्वागत को बढ़ा परंतु रुपए की अवमूल्यन-सा लुढ़क गया। क्यों कि मेरी पत्नी ने जिस लक्ष्मी के स्वागत के लिए दरवाजा खोलने का अलिखित आदेश दिया था, वह उस समय के अनुसार हमारी कामवाली हो सकती थी जिसके स्वागत की परंपरा हमारे परिवारों में कतई नहीं है।
'दरवाज़ा तुम ही खोल दो।' मेरे स्वर में आम भारतीय की हताशा थी।
पत्नी ने दरवाज़ा खोला, सामने लक्ष्मी नहीं, लक्ष्मीकांत वर्मा थे। उनका चेहरा सरकारी कर्मचारी को महंगाई-भत्ता मिलने के समाचार-सा खिला हुआ था। लक्ष्मीकांत बोले, 'भाभी जी, आज तो फटाफट मिठाई मंगवाइए, बढिय़ा चाय पिलवाइए और घर में बेसन हो तो पकौड़े भी बनवा दीजिए।'
उसकी इस मंगवाइए/बनवाइए आदि योजनाओं पर अपनी तीव्र प्रतिक्रिया देते हुए मैंने कहा, 'क्यों शर्मा, क्या तू विश्व बैंक का प्रतिनिधि है जो तेरा अभूतपूर्व स्वागत करने को हम बाध्य हों?'
'यही समझ ले घोंचूलाल! देख, मैं भाभी जी से बात कर रहा हूं, तू बीच में अपनी टांग क्यों अड़ा रहा है? भाभी जी, मैं आपके लिए हज़ारों रुपए मिलने की ख़बर लाया हूं और ये है कि,' लक्ष्मीकांत ने अमेरिकी स्वर में कहा।
'तुम चुप रहो जी!' पत्नी ने ससम्मान मुझे डांटा और लक्ष्मीकांत की तरफ़ मुस्कराकर देखा तथा कहा, 'आप बैठिए न भाई साहब मैं अभी आपके लिए सबकुछ बनाकर लाती हूं। आप हजारों मिलने वाली बात बताओ न।' पत्नी में ऐसा सेवाभाव मैंने कभी नहीं देखा था।
'भाभी जी, आपको याद होगा कि मैंने आपसे एक हजार रुपए लेकर एक कंपनी के शेयर भरवाए थे, उसका अलॉटमेंट लेटर आ गया है।'
'यानी हमारे हजार रुपए डूब गए। तुझे तो खुशी ही होगी हमारे रुपए डूबने की, तू हमारा सच्चा दोस्त जो है।' मैंने इस मध्य
आह भरी।
'अरे बौड़म, रुपए डूबे नहीं हैं, उस हज़ार रुपए के तीन महीने में दस हजार हो गए हैं। कंपनी का दस रुपए का शेयर आज सौ में बिक रहा है सौ में, कुछ समझे संत मलूकदास जी।'
पत्नी विवाहित जीवन के पच्चीस वसंत देखने से पूर्व या तो चहकी थी या फिर उस दिन लक्ष्मीकांत उवाच के कारण चहकी और चहकते हुए उसने पूछा, 'हमारे कितने शेयर हैं।'
'सौ शेयर।'
'सौ शेयर! और अगर हम उन्हें बेचें तो हमें दस हज़ार रुपए मिलेंगे दस हजार! अजी सुनते हो लक्ष्मी भैया की बदौलत हमें दस हजार मिलेंगे।' (सुधीजन नोट करें, धन, लक्ष्मी मैया के अतिरिक्त लक्ष्मी भैया की बदौलत भी मिल सकता है। अत: हे संतों, सदैव लक्ष्मी का स्मरण करें।) ये दस हजार हमें कब मिलेंगे लक्ष्मी मैया!'
'भाभी जहां इतना इंतज़ार किया वहां थोड़ा इंतजार और कर लो। आप देख लेना कुछ दिनों में ये दो-सौ नहीं तो डेढ़ पौने दो पर तो जाएगा ही। सिफऱ् दस-पंद्रह दिन की बात है दौड़ते घोड़े को चाबुक नहीं मारनी चाहिए। आप तो अब पार्टी की तैयारी कर लो और पंद्रह बीस हजार गिनने की भी तैयार कर लो।' लक्ष्मीकांत ने आशीर्वादात्मक मुद्रा में कहा।
'पार्टी तो आप जितनी ले लो। पंद्रह-बीस हजार! भाई साहब मुझे लगता है कि आप मेरा मन रखने के लिए ऐसा कह रहे हैं, मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है। बेसन नहीं मैं आपके लिए ब्रजवासी की पिस्ते वाली बरफी मंगवाती हूं कोला तो आपको पीकर ही जाना होगा। तुम आराम से सोफे पर क्या बैठे हो जल्दी से बाजार हो आओ हे भगवान!'
लक्ष्मीकांत तो अपना सत्कार कर के चले गए परंतु हम पति-पत्नी एक अंतहीन बहस में उलझ गए। पत्नी अंतर्राष्ट्रीय सहायता कोषरूपा हो गई और उसने बजट बनाने के दिशा- निर्देश मुझे जारी कर दिए। माता-पिता को भेजी जाने वाली राशि में कटौती करवाई, मुझसे अनेक वायदे लिए तथा चाय-पानी जैसी ज़रूरी चीजों को बेकार सिद्ध किया। पत्नी के सुप्रयत्नों से मेरा भुगतान-संतुलन बिगड़ गया और मित्रों की निगाह में दीन-हीन बन गया। भविष्य के लिए वह जो भी बजट बनाती, वह पंद्रह हजार से कम बन ही नहीं रहा था। पंद्रह अभी आए नहीं थे पर उसकी आशा में उधारी के छह-सात हजार शहीद हो चुके थे। बड़ी चादर की अपेक्षा में पैर फैल रहे थे। पत्नी रोज सुबह मुझे उठाती, हाथ में अखबार पकड़ाती और जैसे मैं कभी मां को रामायण सुनाया करता था वैसी ही श्रद्धा से पत्नी को शेयरों के भाव पढ़कर सुनाया करता। हम घंटों उस पेज को घूरते रहते। देश में कहां हत्या हो रही है, किसका घर जल रहा है और कौन जला रहा है ऐसे समाचारों में हमें कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी। जिस दिन शेयर का भाव बढ़ जाता उस दिन पत्नी अच्छा नाश्ता और भोजन खिलाती और जिस दिन घट जाता उस दिन घर में जैसे मातम छा जाता। बच्चे पिट जाते और पति-पत्नी के बीच महाभारत का लघु संस्करण खेला जाता। पत्नी का रक्तचाप पहले केवल मेरे कारण बढ़ता-घटता रहता था, आजकल शेयर बाजार की उसमें महत्वपूर्ण भूमिका रहती।
महीना बीत गया। शेयर डेढ़ सौ पर जाने की बजाय साठ पर आ गया यानी नौ हजार का कागजी नुकसान हमें हो गया। पत्नी ने संतोषधन नामक मंत्र का जाप किया और आदेश दिया कि प्रिय तुम शेयर-संग्राम में जाओ और इसका कुछ कर आओ। मैंने लक्ष्मीकांत से अनुरोध किया तो उसने हमारी हड़बड़ी पर लेक्चर दे डाला तथा सहज पके सो मीठा होय नामक मंत्र का जाप करने को कहा। उसने आत्मविश्वासात्मक स्वर में कहा कि कंपनी के रिजल्ट अच्छे आने वाले हैं और तब यह निश्चित ही दो सौ पर जाएगा। हम अपना परिणाम भूल कंपनी के परिणाम पर ध्यान देने लगे। लक्ष्मीकांत ने हमारे मन में लालच का दीपक पुन: जगा दिया था। मेरा पढऩा-लिखना बंद हो गया और मन विदेश-भ्रमण के लालच-सा सदैव शेयर बाज़ार के ईद-गिर्द ही मंडराता रहता।
जिस तरह से लक्ष्मी भैया ने लक्ष्मी मैया के आने का धमाका किया था वैसे ही उसके जाने का किया। कंपनी के परिणाम ठीक नहीं आए, उसे घाटा हुआ था अत: शेयर लुढ़कता-फुड़कता ग्यारह पर आ टिका। हमने भागते चोर की लंगोटी नामक मुहावरे की सार्थकता सिद्ध की तथ शुक्र मनाया की गांठ से पैसा नहीं गया। पत्नी ने सवा पांच रुपए का प्रसाद चढ़ाया और ऋ ण भुगतान में जुट गया।
अब मैं लक्ष्मी वंदना नहीं करता हूं, बस लक्ष्मी मैया से एक प्रश्न करता हूं तुमने आने का अभिनय क्यों किया लक्ष्मी! कहीं तुम भी तो चुनाव नहीं लड़ रही हो!'
 संपर्क-  संपादक : व्यंग्य यात्रा, 73, साक्षर अपार्टमेंट, ए-3 पश्चिम विहार, नई दिल्ली-110 063, मोबाइल नम्बर- 09811154440 Email- prem_janmejai@yahoo.com
व्यंग्यकार के बारे में ...
प्रेम जनमेजय व्यंग्यकर्म के क्षेत्र में एक बेहद सक्रिय हस्ती हैं। व्यंग्य और व्यंग्यकारों के प्रति जो विकट जुड़ाव प्रेम जी में दिखलाई देता है वह अन्यत्र दुर्लभ है। व्यंग्य लेखन, व्यंग्य की पत्रिकाओं और संकलनों के सम्पादन तथा व्यंग्य के आयोजनों में वे न केवल स्वयं निरंतर जुटे होते हैं बल्कि लोगों को अधिकाधिक जोडऩे का भाव भी उनमें प्रबल है। वे साहित्य की परम्परागत उठा- पटक से दूर रहते हुए हरदम रचनात्मकता के साथ खड़े होते हैं । ऐसे समय में भी जब कोई लेखकीय संकट का दौर गुजर रहा हो। इसे प्रमाणित भी उन्होंने किया है। पिछले कुछ समय से प्रेम जनमेजय 'व्यंग्य यात्रा' नामक एक त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन कर रहे हैं। यह देश की एकमात्र व्यंग्य पत्रिका है जो सार्थक लेखन और आलोचना के प्रति गंभीर है। प्रेम जनमेजय उन बिरले व्यंग्यकारों में से हैं जो व्यंग्य की विधा के अतिरिक्त अन्य विधाओं में लिखते हैं। उन्होंने नाटक लिखे हैं और बाल साहित्य पर भी उनकी पुस्तिकाएं प्रकाशित हुई हैं। वे आयोजनों के सिलसिले में देश-विदेश की खूब यात्रा करने वाले एक घुमक्कड़ लेखक भी हैं, पर जहां भी वे जाते हैं व्यंग्य उनके साथ होता है। अपनी इसी सक्रियता के लिए उनके सम्मानित और पुरस्कृत होने का समाचार अक्सर सुर्खियों पर होता है। 
यहां प्रस्तुत व्यंग्य रचना 'तुम ऐसे क्यों आई लक्ष्मी..' में उनकी वही तरल और आत्मीय भाषा है जैसी उनके रोजमर्रा के जीवन में है। वे ज्यादातर विषय भी आम जन जीवन से उठाते हैं और उसी बोलचाल में रचना की बुनावट करते हैं जो आम जन की भाषा होती है। यहां शेयर मार्के ट में शेयर लेने के चक्कर में पड़े उस मध्यम वर्गीय समाज की लोलुपता का चित्रण है जिसके लिए परसाई जी कह गए हैं कि 'यह मध्यम वर्गीय समाज एक विकट किसम का जीव है जिसमें उच्च वर्ग का अहंकार होता है और निम्न वर्ग की दयनीयता।'
                - विनोद साव

इस अंक के लेखक

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
19 मार्च 1949 को बेहट जिला सहारनपुर में जन्मे रामेश्वर काम्बोज की शिक्षा एम ए (हिन्दी), बी एड। प्रकाशित  रचनाएं- 'माटी, पानी और हवा', 'अंजुरी भर आसीस',  'कुकडूं कूं', 'हुआ सवेरा' (कविता संग्रह), 'धरती के आंसू', दीपा, दूसरा सवेरा (लघु उपन्यास), असभ्य नगर (लघुकथा संग्रह), खूंटी पर टंगी आत्मा (व्यंग्य संग्रह) अनेक  संकलनों में लघुकथाएं संकलित तथा गुजराती, पंजाबी, उर्दू एवं  नेपाली में अनूदित। वेब साइट पर प्रकाशन, रचनाकार, अनुभूति, अभिव्यक्ति, हिन्दी नेस्ट, साहित्य कुंज, लेखनी, इर्द-गिर्द, इन्द्र धनुष आदि। निर्देशन- केन्द्रीय विद्यालय संगठन में हिन्दी कार्य शालाओं में विभिन्न स्तरों पर संसाधक , निदेशक एवं केन्द्रीय विद्यालय  संगठन के ओरियण्टेशन के फ़ैकल्टी मेम्बर के रूप में कार्य। सेवा- 7 वर्षों तक उत्तरप्रदेश के विद्यालयों तथा 32 वर्षों तक केन्द्रीय विद्यालय संगठन में कार्य। प्राचार्य- केन्द्रीय विद्यालय के पद से सेवानिवृत्त।
 पता - 37, बी/2 रोहिणी सेक्टर -17, नई दिल्ली-110 089
मोबाइल नंबर- 9313727493 www.laghukatha.com व    
बच्चों के लिए ब्लॉगर  http://patang-ki udan.blogspot.com
प्रो. डॉ. मधुसूदन पुरोहित 
6 अगस्त 1948 रायपुर छत्तीसगढ़ में जन्मे प्रोफेसर डॉ. मधुसूदन पुरोहित होम्योपैथिक विशेषज्ञ एवं सलाहकार हैं। शिक्षा- बीकॉम, एमए (फिलोसफी) डीएचबी, डीएचएमएस। होम्योपैथिक संकाय के रविशंकर वि.वि. के भूतपूर्व अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ राज्य होम्योपैथिक परिषद के सदस्य, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया रायपुर के अधिकृत चिकित्सक।
संप्रति- महाराणा प्रताप होम्पोपैथिक कालेज रायपुर में प्रोफेसर।
पता- मधु होम्यो मेडिकोज, डॉ.पुरोहित बिल्डिंग, सदर बाजार,  
    रायपुर (छ.ग.) फोन नम्बर 0771 2226824,
    मोबाइल नंबर- 09406300430
सुमन परगनिहा  

रायपुर छत्तीसगढ़ में जन्मी श्रीमती सुमन परगनिहा सामाजिक संस्था माटी समाज सेवी संस्था की अध्यक्ष हैं। उन्होंने  स्वास्थ्य पर्यावरण, प्रदूषण और बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में कई प्रेेरक कार्य किए हैं। उनकी अभिरूचियां हैं यात्रा करना, चित्रकारी करना और सॉफ्ट टायज बनाना।  उनका पता है- राजनांदगांव बाड़ा, तात्यापारा, रायपुर (छ.ग.)
 मोबाइल नंबर- 09009535540
Email- suman1055@yahoo.com
सुकांत दास   
8 अक्टूबर 1976 पश्चिम बंगाल सोनामुखी में जन्मे सुकांत दास ने स्नातकोत्तर बंगाल के विष्णुपुर से तथा पेटिंग में मास्टर डिग्री खैरागढ़ से ली है। वर्तमान में वे  'मास्क'  आर्टिस्ट ग्रुप के सदस्य हैं और फ्रीलांस आर्ट डिजानिंग का कार्य करते हैं। उनका पता है- मास्क, 981, शांति नगर, राम मंदिर के पास, रायपुर (छ.ग.)  मोबाइल नंबर- 099935 75515
Email- ksdas101@yahoo.com
गोपाल सिंह चौहान
मैं एक फेलोशिप प्रोग्राम 'कम्यूनिटी' का हिस्सा हूं और हाथ के कारीगरों के साथ बीकानेर में ही कार्य कर रहा हूं।  मुझे लिखने और पढऩे के अलावा यात्राएं करने एवं शास्त्रीय संगीत सुनने का शौक है। मेरा पता है- गोपाल सिंह चौहान उस्ता बारी के अन्दर बीकानेर राजस्थान।
मोबाइल नंबर- 09928522992,
blog- gorakhh.blogspot.com,
Email- gopalbkn1@gmail.com

आपके पत्र / मेल बॉक्स

ई-मेल भी प्रकाशित करें
सितम्बर अंक मिला। अंक सदा की भांति अति सुंदर और उपयोगी बना है जिसमें आपका श्रम झलकता है। विविधरंगी उदंती मन को भा गई है। इसके प्रत्येक अंक का बेसब्री से इंतजार रहता है। सलाह है कि इसमें पत्र लेखकों के ई मेल पते भी यदि उपलब्ध हों तो अवश्य प्रकाशित किया करें।
- अविनाश वाचस्पति, नई दिल्ली, avinashvachaspati@gmail.com
जनता है भई सब जानती है
बढिय़ा अंक निकालने के लिए बधाई। अनकही/सादगी का व्यापार पढ़ा। दरअसल हमारे नेताओं की सादगी का मखौल इसलिए बनाया जा रहा है कि यह सादगी केवल दिखावा है। करोड़ों रुपये के जीवन में कुछ सौ रुपये की बचत बतला कर हमारे नेता जनता को उल्लू नहीं बना सकते। ये जनता है भई सब जानती है।
-चन्द्रमौलेशवर प्रसाद,cmpershad@gmail.com
विविधता से भरा अंक
 नया अंक काफी अच्छा लगा। आपने इसमें काफी विविधता और व्यापकता ला दी है। इसके लिए आप बधाई की पात्र हैं।
- डॉ. रमाकांत गुप्ता, मुंबई, drramakant@yahoo.com
ज्ञानवर्धक व रोचक
 पत्रिका प्राप्त हुई। बहुत अच्छी है। सभी विषयों पर इसमें चर्चा की गई है। अनकही में सादगी का व्यापार और व्यंग्य में निलम्बित डॉट काम ज्ञानवर्धक व रोचक है।
- अरून कुमार शिवपुरी, भोपाल
मैं अभी भी दूरदर्शन देखना पसंद करता हूं
दूरदर्शन के 50 बरस का सुनहरा सफर  में महत्वपूर्ण जानकारी  देने के लिये आपका आभार। इतने चैनलों की बाढ़ होने के बावजूद मैं अभी भी दूरदर्शन देखना पसंद करता हूं! सबसे कम उम्र की पोस्ट ग्रेजुएट .... में रश्मि स्वरूप का साक्षात्कार पढ़कर अच्छा लगा है। उदंती टीम व रश्मि जी को बधांईया और ढेरों मुबारकबाद!
- दीपक शर्मा, कुवैत, deepakrajim@gmail.com
विज्ञान संबंधी लेखों को अधिक स्थान दें
सितम्बर माह का अंक बहुत अच्छा है। इसमें पाठकों के जरूरत के अनुकूल सभी प्रकार की पठनीय एवं मनोरंजक सामग्री शामिल है। अनुपम मिश्र के लेख तालाब  में एक समुदाय द्वारा मिलजुल अपनी परंपराओं को संरक्षित रखने की बेहतर जानकारी दी गई है। पत्रिका में विज्ञान से संबंधित लेखों को अधिक स्थान दें।
- ब्रिजेन्द्र एस. श्रीवास्तव, brijshrivastava@rediffmail.com
प्रभावी रचनाएं
उदंती का नया अंक देखा हमेशा की तरह बहुत सुंदर है। गिरीश पंकज, अन्तोन चेखव, डॉ. रामाकान्त गुप्ता व देवी नागरानी सभी की रचनाएं प्रभावी है। उदंती टीम को धन्यवाद।
- जवाहर चौधरी, इंदौर, jc.indore@gmail.com
दोहरी मानसिकता
अभियान/ मुझे भी आता है गुस्सा में बेटी पुकारने में झिझक क्यों  में आपने बिल्कुल सही लिखा है।  आखिर बेटी को बेटा कहकर पुकारा जाए, तभी उसका मान बढ़े, वह घर का बेटा बनकर दिखाए, तभी जिम्मेदार हो, यह हमारी दोहरी मानसिकता को दर्शाता है। ऐसा करके हम एक बार फिर बेटी को नहीं बेटे को ही मान दे रहे हैं। असल में सारी लड़ाई तभी शुरू हो जाती है जब बराबरी की नौबत आती है, जो जैसा है वैसा रहे, सबको अपना-अपना हक मिले तो तुलना करने की जरुरत ही पड़ेगी।
- वर्षा निगम, दिल्ली, varshanigam@gmail.com

घोंसले में रहने वाला मेंढक

यह तो सभी जानते हैं पंक्षी घोंसला बनाते हैं, लेकिन क्या आपने घोंसला बनाने वाले मेढ़क के बारे में सुना है। भारत के एक वैज्ञानिक ने मेंढकों की तीन ऐसी दुर्लभ प्रजातियां ढूंढने का दावा किया है जो अपने अंडे देने के लिए घोंसले बनाते हैं।
मेंढक की ये प्रजातियां केरल और कर्नाटक की पश्चिमी पहाड़ी श्रंखलाओं के जंगलों में पाई जाती है जहां ख़ूब बारिश होती है।  दिल्ली विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ इनवॉयरोंमेंटल स्ट्डीज के वरिष्ठ वैज्ञानिक एसडी बीजू ने बताया कि पूरी दुनिया से इस तरह की यह पहली रिपोर्ट है और एशिया में इस तरह के मेंढक की यह एकमात्र प्रजाति है, जो कीटों और गर्मी से बचने के लिए घोंसला बनाता है। चमकीला हरा या हल्की लालिमा लिए हुए हरे रंग वाले विलुप्तप्राय प्रजाति के इस मेंढक को एक सदी के बाद फिर से खोज निकाला गया है जो एशिया भर में सिर्फ यहीं पाए जाते हैं
 इनका घोंसला 53 से 80 मिमी लंबा और 28-64 मिमी चौड़ा होता है, जिसमें एक साथ 43 से 72 अंडे समा सकते हंै। इस घोंसले को बनाने में मादा मेढ़क 15 मिनट से आधे घंटे का वक्त लेती है।
वैज्ञानिक को दुर्लभ प्रजाति के इन मेंढकों का पता 20 वर्ष के शोध के बाद चला है। वर्ष 2000 से 2005 के बीच केरल में वयनाड जिले के कलपेट्टा में किए गये इस अध्ययन की रिपोर्ट करेंट साइंस के नए अंक में प्रकाशित हुआ है।
क्या आपने खेले हैं ऐसे अनोखे खेल
जिंदगी में आनंद और उत्साह भरने की कला कोई फिनलैंड वासियों से सीखे। फिनलैंड वासियों ने अपने मनोरंजन के लिए अनेक ऐसे खेल ईजाद किए है जिनके बारे में सुनकर अन्य लोग सोच में पड़ जाते हैं, जैसे मोबाइल फोन थ्रोइंग गेम। पिछले दिनों फिनलैंड में मोबाइल फोन थ्रोइंग वल्र्ड चैम्पियनशिप आयोजित की गई। फिनलैंड में आयोजित की जाने वाली अन्य खेल प्रतियोगिताओं में वाइफ कैरीइंग रेस, बूट थ्रोइंग, सौना एन्ड्योरेस जैसे अनेक खेल शामिल है। खास बात यह है कि फिनलैंड वासियों के लिए ये प्रतियोगिताएं मजाक नहीं है, बल्कि इन खेल आयोजनों को लोग बड़ी गंभीरता से लेते है।
मोबाइल फोन थ्रोइंग प्रतियोगिता की शुरूआत वर्ष 2000 में फिनलैंड में अंतरराष्ट्रीय खेल के रूप में हुई। इसके बाद से हर साल इसके आयोजन का सिलसिला बरकरार है। इस खेल में यह देखा जाता है कि आपने कितनी दूरी से मोबाइल फोन फेंका है या उसे फेंकने की आपकी शैली कैसी है। इस खेल में हर प्रकार के मोबाइल फोन इस्तेमाल किए जा सकते है, बस शर्त यह है कि उनका वजन 220 ग्राम या उससे अधिक होना चाहिए।
वाइफ कैरीइंग चैम्पियनशिप  प्रतियोगिता में पुरूषों को अपनी पार्टनर को कंधे पर लादकर दौड़ लगानी होती है। इस रेस में पानी इत्यादि जैसी कुछ बाधाएं भी होती हैं, जिन्हें सफलतापूर्वक पार करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता।
 बूट थ्रोइंग वल्र्ड चैम्पियनशिप के दो बार आयोजक रहे हैरी किनूनन कहते है कि इस खेल की शुरूआत की कहानी तो ज्ञात नहीं है, पर मैं समझता हूं कि शराब के नशे में चूर कुछ लोगों ने अपने जूते उतार कर फेंके होंगे और जब उन्हें इसमें आनंद मिलने लगा, तो यह एक खेल बन गया। वर्ष 1992 में
फिनलैंड में प्रथम बूट थ्रोइंग वल्र्ड र्चैम्पियनशिप आयोजित की गई थी। धीरे-धीरे यह खेल ब्रिटेन और न्यूजीलैंड जैसे देशों में भी लोकप्रिय हो गया। इस खेल के नियम-कायदे सुनिश्चित करने का कार्य इंटरनेशनल बूट थ्रोइंग एसोसिएशन पर है। बूट थ्रोइंग गेम के लिए इटैलियन मैन्यूफैक्चरर द्वारा खास तौर पर जूते डिजाइन किए जाते है। इस खेल के दौरान इस संबंध में भी कड़ी नजर रखी जाती है कि खिलाडिय़ों ने निषेध वस्तुओं का सेवन तो नहीं किया। फिनलैंड में यह खेल काफी लोकप्रिय है।