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May 1, 2026

अनकहीः गर्मी से भागते हुए… क्या 'सच' से भी भाग रहे हैं?

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

इन दिनों मैं पहाड़ों की ओर रोड ट्रिप पर हूँ। जब भी घर या दोस्तों से बात होती है और वे जब उधर का हाल बताते हैं कि यहाँ तो पारा 45-46 डिग्री से भी ऊपर पहुँच गया है, तो एक अजीब-सी द्वंद्वात्मक स्थिति मन में जन्म लेती है। एक ओर मैं हूँ, जो इस भीषण गर्मी से राहत पाने, अपने घुमक्कड़ी शौक को पूरा करने, पहाड़ों की ठंडी हवा में सुकून ढूँढने निकल पड़ी हूँ; दूसरी ओर वे लोग हैं, जो उसी तपिश में झुलस रहे हैं।

सच तो यह है कि मुझे घूमने का शौक है। मौका मिले, साथ मिले, तो बस निकल पड़ती हूँ। इस बार की यात्रा भी कुछ ऐसी ही है- रायपुर से सिलीगुड़ी, फिर कालिम्पोंग, गंगटोक में चंगू लेक और नाथुला दर्रा होते हुए दार्जिलिंग की ओर बढ़ रही हूँ। यहाँ का मौसम मन को हर पल ठंडक देता है। बादलों की ओट में लिपटे पहाड़, हल्की बारिश की फुहारें और ठंडी हवा के झोंके- सब कुछ किसी स्वप्नलोक जैसा लगता है। यहाँ आकर मन प्रसन्न है, आत्मा जैसे तरोताज़ा हो गई हो।

लेकिन जैसे ही नीचे के इलाकों का हाल सुनती हूँ, मन ठहर जाता है। सोचने को विवश हो जाती हूँ- क्या हम सिर्फ़ इस ठंडक का आनन्द लेने के लिए यहाँ आए हैं, या उस तपिश से आँख चुराने के लिए भी, जो अब हर साल और भयावह होती जा रही है?

छह दशक का जीवन बीत चुका है। बचपन से लेकर अब तक हर साल गर्मियाँ देखी हैं। लू के थपेड़े भी नए नहीं हैं; लेकिन पिछले एक- दो दशकों में जो बदलाव आया है, वह सामान्य नहीं कहा जा सकता। अब गर्मी सिर्फ़ असहनीय नहीं रही, बल्कि खतरनाक होती जा रही है। हाल ही में देश के कई हिस्सों से खबरें आई हैं- राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगढ़- जहाँ तापमान 45-48 डिग्री तक पहुँच गया। कई शहरों में ‘हीट वेव’ को लेकर रेड अलर्ट जारी किया गया। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक के मरीज बढ़ रहे हैं। कुछ जगहों पर तो मौत की खबरें भी सामने आई हैं।

वैज्ञानिक भी लगातार चेतावनी दे रहे हैं। बदलते मौसम और धरती के लगातार गर्म होने की समस्या अब कोई भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि आज की सच्चाई बन चुकी है। दुनिया भर में तापमान बढ़ रहा है, बर्फ के पहाड़ पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर ऊपर उठ रहा है- ये सब संकेत हैं कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ चुका है।

पर सवाल यह है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? उत्तर बहुत जटिल नहीं है- हम स्वयं हैं।

विकास की दौड़ में हमने प्रकृति को पीछे छोड़ दिया है। सड़कों के लिए जंगल काटे जा रहे हैं, पहाड़ों को चीर दिया जा रहा है, रेल लाइन बिछाने के लिए पहाड़ों पर कंक्रीट के भारी भारी पिलर खड़े किए जा रहे हैं।  बिजली बनाने के लिए अब भी कोयले पर ज्यादा निर्भरता है। शहरों में ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी हो रही हैं; लेकिन उनके लिए पर्यावरण के कड़े नियमों का पालन अक्सर नहीं दिखता।

विडंबना यह है कि जिन पहाड़ों की ओर हम गर्मी से राहत पाने आते हैं, वहाँ भी वही कहानी दोहराई जा रही है। पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर पहाड़ों को कंक्रीट से ढका जा रहा है। होटल, रिसॉर्ट, सड़कें- सब कुछ इस तरह बढ़ रहे हैं कि पहाड़ों की असली बनावट ही खतरे में पड़ रही है। पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि पहाड़ी इलाकों में अंधाधुंध निर्माण से भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ रही हैं। जल- स्रोत सूख रहे हैं। जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की विविधता भी खतरे में पड़ रही है।


मौसम विभाग और दुनिया की कई संस्थाएँ बार-बार कह रही हैं कि यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में लू और भी तेज़ और लंबे समय तक पड़ सकती है। सवाल यह भी उठता है कि क्या यह सब चिंता सिर्फ़ पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और सरकारों की जिम्मेदारी रह गई है, क्या हमारी अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। हम अक्सर कहते हैं- “सरकार कुछ नहीं कर रही।” लेकिन क्या हम स्वयं कुछ कर रहे हैं?

क्या हमने अपने स्तर पर पेड़ लगाने की कोशिश की? क्या हमने बिजली और पानी के इस्तेमाल में संयम बरता? क्या हमने प्लास्टिक का उपयोग कम किया? क्या हमने अपने शहरों में हरियाली बचाने की कोशिश की? सच यह है कि हम समस्या को समझते हैं, उस पर चर्चा भी करते हैं, लेकिन समाधान की दिशा में कदम उठाने से बचते हैं। आज आवश्यकता है कि हम अपनी सोच में बदलाव लाएँ।

विकास जरूरी है; लेकिन वह प्रकृति को नुकसान पहुँचाए बिना होना चाहिए। तरक्की तो हर किसी को चाहिए; पर हमें ऐसी तरक्की करनी होगी, जिसमें हम आगे भी बढ़ें और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे। सरकारों को भी कड़े नियम बनाने होंगे- जंगलों की कटाई पर नियंत्रण, निर्माण कार्यों के लिए कठोर पर्यावरणीय स्वीकृति, सूरज, हवा और पानी से मिलने वाली ऊर्जा का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करना होगा;  लेकिन इसके साथ-साथ, आम नागरिक के रूप में हमें भी अपनी भूमिका निभानी होगी। जैसे- जब हम यात्रा पर निकलें, तो प्रकृति का सम्मान करें। कूड़ा न फैलाएँ, स्थानीय संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग न करें। ऐसे पर्यटन को अपनाएँ , जिससे घूमना भी हो और प्रकृति भी सुरक्षित रहे।

आज जब मैं इन पहाड़ों की ठंडी हवा में साँस ले रही हूँ, तो यह सोचकर संतोष होता है कि अभी भी प्रकृति ने हमें बहुत कुछ दिया है और देती ही जा रही है; लेकिन यह संतोष तभी तक है, जब तक हम इसे सहेज कर रख सकें। यदि हमने अभी भी चेतावनी को अनसुना किया, तो वह दिन दूर नहीं, जब ये पहाड़ भी तपने लगेंगे और हमें राहत पाने के लिए कोई ठिकाना नहीं मिलेगा।

इसलिए जरूरी है कि हम सिर्फ़ चिंतित न रहें, बल्कि सक्रिय भी हों; क्योंकि यह सिर्फ़ मौसम का बदलाव नहीं है, यह हमारे अस्तित्व का प्रश्न है।

11 comments:

  1. पर्यावरण की रक्षा करना हमारी भावी पीढ़ी को सुरक्षित रखना.... यह हमारा धर्म होना चाहिए.... बहुत ही सुंदर ज्ञानवर्धक लेख... 🙏

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    1. शुक्रिया अनिमा जी, आपने बिल्कुल सही बात कही हम सबका पहला धर्म पर्यावरण की रक्षा का ही होना चाहिए। प्रतिक्रिया के लिए आपका धन्यवाद आभार।

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  2. Anonymous04 May

    समसामयिक सारगर्भित सम्पादकीय। एक ऐसी ज्वलंत समस्या जो हमें कब से सम्भलने के लिए सचेत कर रही है। पर हम हैं कि समझते ही नहीं। प्रकृति का दोहन करने पर तुले हुए हैं। ठीकरा किसी के भी सिर पर फोड़ें, सहना तो मानव को ही पड़ेगा।बहुत कुछ सह भी रहा है।। बढ़ता तापमान, वर्षा की अनिश्चितता, विकास के नाम पर वनों का कटना, क्या नहीं हो रहा। प्रकृति से जुड़कर ही उसकी सुंदरता और उपयोगिता को जाना जा सकता है।
    आपकी पर्यावरण के परिवर्तन के प्रति चिंता पाठकों को जागरूक करने वाली है। हमेशा की तरह बहुत सुंदर लिखा है।बधाई । सुदर्शन रत्नाकर

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    1. आदरणीय सुदर्शन रत्नाकर जी,
      आपकी इस सारगर्भित प्रतिक्रिया और उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से आभार।
      आपने बहुत ही सटीक और मर्मस्पर्शी बात कही है। वास्तव में, प्रकृति और मानव का संबंध 'अस्तित्व' का है, 'अधिकार' का नहीं। जिस तरह से हम विकास की अंधी दौड़ में पर्यावरण की अनदेखी कर रहे हैं, वह आत्मघाती है।
      आशा है कि हम सब मिलकर प्रकृति की इस सुंदरता और उपयोगिता को बचाने में अपना प्रयास जारी रखेंगे।

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  3. Anonymous10 May

    Bahut sundar,prayavaran bachane ka sandesh deti prerak kahani

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  4. Anonymous12 May

    आपका यह लेख घुमक्कड़ी और पर्यावरणीय चेतना के बीच रस्साकशी को ईमानदारी से रेखांकित करता है। लेखिका ने पहाड़ों के सुकून और मैदानी इलाकों की भीषण गर्मी के विरोधाभास के माध्यम से वर्तमान पर्यावरण संकट को आईना दिखाया है।
    पर्यटन के नाम पर कंक्रीट के जंगलों में बदलते पहाड़ और अंधाधुंध विकास पर्यावरण के लिए भयावह संकेत हैं। लेखिका ने आमजन की संवेदनहीनता पर चोट करते हुए यह स्पष्ट किया है कि केवल चर्चा से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत प्रयासों (वृक्षारोपण, संसाधन संरक्षण) से ही प्रकृति बचेगी। यह आलेख एक चेतावनी है कि यदि हम अपनी जीवनशैली नहीं बदलेंगे, तो प्रकृति के कोप से राहत का कोई कोना शेष नहीं बचेगा। यह जागरूकता जगाती एक सशक्त और चिंतनपरक रचना है।
    अंत में, यह लेख केवल एक यात्रा संस्मरण नहीं, बल्कि हमारी सोई हुई पर्यावरणीय चेतना को जगाने वाली एक गंभीर दस्तक है।
    बसंत राघव

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    1. बसंत राघव जी,
      आपकी इतनी गहन, संवेदनशील और विचारोत्तेजक प्रतिक्रिया के लिए हृदय से आभार। आपने लेख के भाव और उसके उद्देश्य को जिस गंभीरता से समझा और शब्द दिए, वह मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक है।

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  5. Anonymous14 May

    आपके सम्पादकीय में जागरूकता के अणु हैं
    जो आज के पाठक के विचारधारा में शामिल होकर अपना रंग लाएगी
    हमेशा की तरह उदंती के अंक में गागर में सागर समाया हुआ अंक मिला
    हार्दिक धन्यवाद
    देवी नागरानी

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  6. आपने बहुत सार्थक विषय उठाया है। सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि हम सारी समस्याओं के लिए किसी और का मुँह ताकते हैं, फिर चाहे वह सरकार हो या फिर कोई और...। अगर आप ग़ौर करें तो विगत के कई वर्षों में पहाड़ों पर भी गर्मी दिखने लगी है। मुझे याद है कि सन 2012 की गर्मी में मैं पहली बार नैनीताल गई और वहाँ के होटल के कमरे में दीवार पर पंखा लगा था। होटल मैनेजर ने बताया कि पहले पहाड़ों पर पंखे की कोई ज़रूरत ही महसूस नहीं होती थी, लेकिन उस साल उनको पंखे लगाने पड़े थे। ग़नीमत थी कि रात तब भी ठंडी थी।
    लेकिन बात तो वही है न...समय के साथ साथ हम इन सब बातों के प्रति लापरवाही करते ही जा रहे और अगली पीढ़ी को और भी भयावह स्थिति की तरफ धकेलते ही जा रहे। कहीं तो थमना होगा न...।

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