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Sep 5, 2026

विज्ञानः झगड़े से बचना हो तो गले मिलें

 
किसी ने खुलकर गले लगाया हो, ज़ोरदार झप्पी दी हो, तो उसके बाद उस पर बरस पड़ना या उससे जमकर झगड़ना मुश्किल होता है। हमारा यह अनुभव रहा है कि सकारात्मक स्पर्श – हाथ थामना, थपथपाना, सहलाना, आलिंगन वगैरह आपसी रिश्तों को मज़बूत करते हैं। 

और अब, ऐसा वानरों में भी देखा गया है। देखा गया है कि तनाव की स्थिति में रिश्ते बनाए रखने के लिए, तनाव टालने के लिए बोनोबो और चिम्पैंज़ी गले मिलते हैं, हाथ पकड़ते हैं। इस बात का पता लगा है दो अभयारण्यों में रह रहे बोनोबो और चिम्पैंज़ी समूहों के अवलोकन से। 

डरहम युनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों के एक दल ने डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और ज़ाम्बिया के अभयारण्यों में रह रहे बोनोबो और चिम्पैंज़ियों के पांच समूह का अध्ययन किया। शोधकर्ता वानरों के बाड़े की बागड़ पास जाकर समय-समय वानरों को पुकारते थे। वानर बाड़े के किनारे आ जाते थे और भोजन का इंतज़ार करते थे। कुछ समय बाद, शोधकर्ता मूँगफली से भरा एक बर्तन बाड़े में रख देते थे, जिसमें अपर्याप्त मात्रा में मूँगफली होती थी। कम मात्रा में मूँगफली होने के कारण वानरों में उन्हें लेने के लिए होड़ मच जाती थी। ऐसा करते समय शोधकर्ताओं ने मूँगफली मिलने से पहले, मूँगफली लेते और खाते समय, और खाने के बाद वानरों के आपसी व्यवहार का अवलोकन किया।

प्रोसीडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसाइटी बी में शोधकर्ताओं ने बताया है कि जो वानर मूँगफली मिलने से कुछ देर पहले एक-दूसरे को गर्मजोशी (हाथ पकड़ना, थपथपाना, सहलाना, आलिंगन आदि) से स्पर्श करते थे, वे आपस में मूँगफली के लिए लड़ने की बजाय उसे मिल-बाँटकर खाते थे। ऐसा स्वभाव अधिकतर शांतिप्रिय समूहों में देखा गया। यह दर्शाता है कि दोस्ताना स्पर्श सामाजिक रिश्तों को मज़बूत करता है और होड़ कम करता है। और तो और, यह तक देखा गया कि कुछ नर चिम्पैंज़ी एक-दूसरे के मुँह में अपनी उँगलियाँ दे रहे थे। गौरतलब है कि वानर समूहों में मुँह में उँगली देना तनाव या झगड़े की स्थिति में खतरे से खाली नहीं होता - लड़ाई-झगड़े की स्थिति में वानर प्रतिद्वंद्वी की उँगली बुरी तरह काटकर उसे चोटिल कर सकते हैं। लेकिन अपर्याप्त भोजन होने की स्थिति में भी वानरों का मुँह में उँगली डालकर जोखिम उठाना उनके भरोसे और मज़बूत रिश्ते का द्योतक था।

बोनोबो और चिंपैंज़ी हमारे करीबी रिश्तेदार हैं; इस साझा व्यवहार से लगता है कि गर्मजोशी जताकर शांति बनाए रखने का व्यवहार हमारे साझा पूर्वजों की देन है। (स्रोत फीचर्स)■

लघुकथाः प्रा र्थ ना एँ

  - अनिता मण्डा 

रसोईघर की खिड़की के बाहर छज्जे पर पौधों की टोकरियाँ लटकी हुई हैं। कइयों में मौसमी फूलों के पौधे हैं, कुछ में स्पाइडर प्लांट ख़ूब हरे-भरे लगे हुए हैं। कुछ दिनों से एक चिड़िया का जोड़ा इन पर खेल रहा था। 

जोड़े ने अभी पाँच-सात दिन से कुछ सामान; तिनके, नर्म पंख, धागे इत्यादि लाकर जमा करना शुरू कर दिया है। स्पाइडर प्लांट के बेबी पफ़ निकले हुए हैं, जिन पर कई बेबी प्लांट रहते हैं। उसी बेबी पफ़ वाली टहनी के सहारे यह जोड़ा अपना घर बना रहा है। रोज़ पचासों बार उड़ना, कुछ न कुछ लाना लगा हुआ है। ये सारी गतिविधियाँ देखकर मन बहुत ख़ुश है। 

डर भी है कि एक टहनी के सहारे बना घरौंदा किसी अनहोनी की भेंट न चढ़ जाए। दिन में कई-कई बार देखती हूँ, इस बात पर घर वाले अक्सर मेरा मज़ाक भी उड़ाते हैं।

चिड़े-चिड़ी को देखकर लगता है कि शीघ्र ही नए मेहमानों की आमद होने वाली है। यानी कि जचकी होने वाली है। दादी से बहुत पहले सुना था कि जब कभी घर में गाय, बकरी की जचकी होती थी; दादी की माँ उस दिन जचकी होने के पहले भोजन नहीं करती थी। कहती- "घर में कोई कष्टी है, तो निवाला गले से कैसे उतरे।"  शायद  यही कारण है कि इन दिनों मुझे भी ठीक से भूख नहीं लग रही है। 

नन्हे-नन्हे पंख खुलेंगे, सारा दिन चहचहाना गूँजेगा। सोचकर ही मीठी -सी गुदगुदी हो रही है।

प्रार्थना करती हूँ- “हे ईश्वर इनकी ख़ुशी सलामत रखना!’’■

हाइकुः किसान की कथाएँ

  - भीकम सिंह

1

दूर है कंत 

रुआँसे लौट रहे 

सारे बसंत।

2

उपेक्षित हैं 

किसान की कथाएँ 

खेत क्या गाएँ।

3

मेघों के स्वर 

बगावत के हैं तो?

क्या करें घर।

4

ढूँढते पाँव 

सुबह और शाम 

खेतों में गाँव।

5

सैंकड़ों बार 

स्मृतियों ने बाँधे हैं 

बन्दनवार 

6

चुप ही रहूँ

अँधेरों के खिलाफ 

क्या सच कहूँ ?

7

जगते दीये 

अँधियारा बैठा है 

होठों को सिये।

8

दरो-दीवारें 

आँगन के भी तारे 

माँ ही क्यूँ हारे।

9

बीड़ी फूँकता 

खेतों में बैठकर 

गाँव का डर।

10

नभ को हारे 

चाँद जस का तस 

दिखाता तारे।


प्रदूषणः ई-कचरे के समाधान की दिशा में बड़ी उपलब्धि

 - प्रमोद भार्गव

भारत ही नहीं दुनिया ई-कचरे के निस्तारण की समस्या से जूझ रही है। ऐसे में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास के शोधकर्ताओं ने मेक इन इंडिया के अंतर्गत एक स्वदेशी प्रायोगिक संयंत्र विकसित किया है। यह प्रतिवर्ष 100 टन इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट का प्रसंस्करण करने की क्षमता रखता है। यह प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (पीसीबी) के उपचार के लिए डिजाइन किया गया है। इसे भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) के तिरुचिरापल्ली में स्थित परिसर में स्थापित किया गया है। पीसीबी इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट सबसे अधिक खतरनाक और धातुओं से भरपूर घटकों में से एक हैं। इनमें तांबा, सीसा और टिन जैसी धातुएँ पर्याप्त मात्रा में होती हैं। यदि इस कचरे का उचित प्रबंधन नहीं किया जाए तो ये धातुएँ मिट्टी और भू-जल में रिसकर लंबे समय तक पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकती है। ऐसे समय में जब भारत हर वर्ष लगभग 50 लाख मीट्रिक टन ई-कचरा पैदा कर रहा हो, तब आईआईटी मद्रास के शोधार्थियों की यह उपलब्धि बहुत बड़ी है। क्योंकि यह अनुपयोगी हुए ई-उपकरणों से मिट्टी पानी या वायु को प्रदूषित किए बिना मूल्यवान धातुएँ निकाल कर उन्हें पुनः उपयोग के लायक बना देता है। 

आआईटी मद्रास के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग के प्राध्यापक एस पुष्पावनम और वाईबीजी वर्मा का कहना है कि भारत में ई-कचरे की चुनौती बढ़ने के साथ यह संयंत्र साफ-सुथरे तरीके से धातु निकालने के लिए एक ऐसा मॉडल है, जिसे आसानी से बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकता है। यह काम मेक इन इंडिया सर्कुलर इकोनॉमी और जरूरी खनिजों की सुरक्षा के लक्ष्यों के अनुरूप है। यह अकादमिक अनुसंधान को प्रौद्योगिकी विकास में बदलने का दुर्लभ उदाहरण है। इस प्रक्रिया को एकमात्र अम्ल के प्रयोग से संपन्न कर लिया जाता है। इसमें उच्च स्तरीय सुरक्षा के स्वचालित उपाय किए गए हैं। यह संयंत्र पूरी तरह भारतीय कंपनियों द्वारा निर्मित है। यह संयंत्र भारत और एशियाई देशों के लिए इसलिए बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि पर्यावरण पर वैश्विक निगरानी रखने वाली सिएटल स्थित संस्था बासेल एक्षन नेटवर्क (बीएएन) की रिपोर्ट में जानकारी दी है कि अमेरिका से लाखों टन खराब इलेक्ट्रॉनिक सामग्री कई देशों में ठिकाने लगाने की दृष्टि से भेजी जा रही है। जिनमें से अधिकांश दक्षिण-पूर्व एशिया के विकासशील देश हैं। इन देशों में इस खतरनाक कचरे का सुरक्षित रूप से नष्ट करने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए वे इसे लेने को तैयार नहीं हैं। बावजूद दस अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ प्रयोग की उम्र समाप्त कर चुके इलेक्ट्रॉनिक कचरे को एशिया और पश्चिमी एशिया के निर्धन देशों में ठिकाने लगा रही है। इसे ई-कचरे की छिपी हुई सुनामी माना जा रहा है। 

रपट के अनुसार यह ई-कचरे की अदृश्य सुनामी है, क्योंकि ये गरीब देश इस कचरे का पुनर्चक्रण करने में समर्थ नहीं हैं। फिर भी ताकतवर पूँजीपति देश इन देशों को अपने कचरे का ठिकाना बनाने में लगे हुए हैं। अतएव पर्यावरण को हानि पहुँचाने वाली संस्थाओं को यह आकलन करना कठिन हो रहा है कि घातक कचरा जिन देशों में फेंका जा रहा है, वहाँ का वायुमंडल किस हद तक प्रभावित एवं प्रदूषित होगा। वहाँ के लोगों के स्वास्थ पर कितना असर पड़ेगा, यह अंदाजा कोई नहीं लगा पा रहा है। इस कचरे में कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट, मोबाइल और अन्य आईटी उपकरण शामिल हैं। इनमें सीसा, कैडमियम और पारा जैसी सामग्रियाँ हैं, जो मूल्यावन होने के साथ विषाक्त हैं। जैसे-जैसे गैजेट्स नए मॉडल के साथ तेजी से बदले जा रहे हैं, वैसे-वैसे पुनर्चक्रित नहीं किए जाने वाला कचरा पाँच गुना बढ़ता जा रहा है। इस नजरिये से भारत में निर्मित यह संयंत्र अत्यंत उपयोगी है। भविष्य में इसके निर्यात से भारत विदेशी पूँजी भी कमाएगा। 

संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ और अनुसंधान शाखा (यूएनआईटीएआर) के अनुसार एकत्रित आँकड़े बताते है कि वैश्विक स्तर पर 2022 में 6.2 करोड़ मीट्रिक टन ई-कबाड़ उत्पन किया गया। 2030 तक इसके उत्पादन की मात्रा 8.2 करोड़ मीट्रिक टन हो जाने का अनुमान है। रपट के अनुसार हर महीने लगभग 2000 कंटेनरों में लगभग 33,000 मीट्रिक टन अमेरिका में इस्तेमाल किया गया ई-कचरा अमेरिकी बंदरगाहों से बाहर भेजा जाता है। इन कंटेनरों की खेपों की आपूर्ति करने वाली कंपनियों को ई-कचरा ब्रॉकर कहा जाता है। ये आमतौर पर स्वयं कचरे का पुनर्चक्रण करने की बजाय इसे लाचार गरीब देशों के बंदरगाहों पर उतार देती हैं। यह कचरा लगातार एशियाई देशों में कचरे के बोझ को बढ़ाकर कई तरह के पर्यावरणीय संकट पैदा कर जल, वायु और पृथ्वी को प्रदूषित कर रहा है। इस कचरे से घातक लैंडफिल गैसों का भी उत्सर्जन कुछ सालों के बाद होने लगता है। इनसे उत्पन्न जहरीला रसायन जल और मिट्टी को दूषित करता है। इस कचरे का बहुत बड़ा हिस्सा गरीब लोग अपनी आजीविका चलाने के लिए कबाड़खानों में पहुँचा देते हैं। यहां काम करने वाले मजदूर अकसर बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के उन्हें हाथों से जला एवं पिंघलाकर अलग कर खोलते हैं। इस प्रक्रिया से विषाक्त धुआँ निकलता है, जो अत्यंत हानिकारक होता है। बासेल एक्शन नेटवर्क की संधि के मुताबिक इस्तेमाल किए गए ई-कचरे को एक देश से दूसरे देश भेजने की अनुमति केवल ऐसे कचरे को है जिसे पुनर्चक्रित करके पुनः इस्तेमाल किया जा सके और जो पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करने वाला हो; लेकिन ये कंपनियाँ ऐसी किसी शर्त का पालन नहीं कर रही हैं। यही कारण है कि दुनिया में पुनर्चक्रण की तुलना में ई-कबाड़ में पाँच गुना वृद्धि हो रही है। 

      आज ई-कचरा,जिसमें बड़ी मात्रा में प्लास्टिक के उपकरण भी शामिल हैं, नष्ट करना भारत समेत दुनिया के देशों के लिए मुश्किल हो रहा है। इसे नष्ट करने के जैविक उपाय तलाशे जा रहे हैं। जापान के क्योटो विश्वविद्यालय ने एक ऐसे जीवाणु के अनुसंधान का दावा किया है,जो जैविक रूप से प्लास्टिक नष्ट कर सकता है; हालांकि भारत में यही काम औद्योगिक एवं प्रौद्योगिकी कचरे को नष्ट करने के लिए केंचुओं से कराया जा रहा है। औसतन एक टन ई-कचरे के टुकड़े करके उसे यांत्रिक तरीके से पुनर्चक्रित किया जाए तो लगभग 40 किलो धूल या राख जैसा पदार्थ तैयार होता है। इसमें अनेक कीमती धातुएँ समाहित रहती हैं। इन धातुओं को अलग करने की प्रक्रिया में हाथों से छंटाई, चुंबक शक्ति से विलगीकरण, विद्युत-विच्छेदन, सेंट्रीफ्यूजन और उलट ऑस्मोसिस जैसी तकनीक शामिल हैं। लेकिन ये तरीके मानव शरीर और पर्यावरण को हानि पहुँचाने वाले हैं; इसलिए इस हेतु बायो-हाइड्रो मेटलर्जिकल तकनीक कहीं ज्यादा बेहतर मानी जा रही है। इस तकनीक को अमल लाते वक्त सबसे पहले बैक्टीरियल लिंचिंग प्रोसेस; बायो लिंचिंग  का प्रयोग करते हैं। इसके लिए ई-कचरे को बारीक पीसकर उसे जीवाणुओं के साथ रखा जाता है। बैक्टीरिया में मौजूद एंजाइम कचरे में उपस्थित धातुओं को ऐसे यौगिकों में बदल देते हैं कि उनमें गतिशीलता पैदा हो जाती है। बायो-लिंचिंग की विधि में जीवाणु कुछ विशेष धातुओं को अलग करने में मदद करते हैं। हालाँकि कई प्रकार के जीवाणुओं और फफूंद का उपयोग प्रिंटेड सर्किट बोर्ड से सीसा, तांबा और टिन को अलग करने के लिए किया जाता रहा है। इस हेतु जीवाणुओं की बेसिलस प्रजातियाँ मसलन सेक्रोमाइसिस सेरेविसी, यारोविया लिपॉलिटिका प्रयोग में लाई जाती हैं। 

इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के विशेषज्ञों का मानना है कि औसतन एक स्मार्टफोन में 30 मिलीग्राम सोना होता है। यह फोन के सर्किट बोर्ड और इंटरनल कंपोनेंट्स में होता है। एपल ऐसे लाखों आईफोन और कंप्यूटर की रीसाइक्लिंग करता है,जिनमें सोना होता है। एपल अपने निगरानी एडिशन को पुनर्चक्रित भी करता है। इनमें 18 कैरेट की गुणवत्ता वाले तकरीबन 50 ग्राम सोने का इस्तेमाल होता है। साफ है, समस्या बने ई-कचरे को यदि पुनर्चक्रित करने के संयंत्र बड़ी संख्या में लगाए जाते हैं तो बड़े पैमाने पर युवा तकनीकियों को रोजगार तो मिलेगा ही, विकासशील और गरीब देश बड़े स्तर पर इस कचरे को नष्ट करने के झंझट से भी मुक्त हो जाएँगे। इसलिए इस कचरे को जो कंपनियाँ जिन देशों में ठिकाने लगा रही हैं, वहां इस कचरे के निस्तारण के लिए आईआईटी मद्रास द्वारा निर्मित संयंत्रों को निर्यात भी करने का रास्ता भविष्य में भी खुल जाएगा। ■

सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 9981061100


पर्यावरणः जलवायु परिवर्तन और लुप्त होता अमरनाथ शिवलिंग

  - पंकज चतुर्वेदी

करोड़ों हिंदुओं की गहरी आस्था का केंद्र अमरनाथ यात्रा को चलना तो 57 दिन हैं । तीन  जुलाई 2026 को यात्रा शुरू होने के बाद पाँचवें दिन के अंत तक दर्शनार्थियों की  संख्या बढ़कर 1,13,800 तक  पहुँच चुकी थी; लेकिन  इसी दिन से शिविलिंग लगभग 90 फीसदी पिघल गया । समझना होगा कि  यह आस्था के साथ-साथ स्थानीय लोगों के रोजगार का सवाल तो है ही, बल्कि यह हमारे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का एक बड़ा पैमाना भी है। लेकिन इस वर्ष 2026 की यात्रा ने एक ऐसा सच सामने रखा है, जो न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि पर्यावरण के प्रति हमारे लापरवाह रवैये पर कड़े सवाल भी खड़े करता है। अमरनाथ गुफा में जो पवित्र हिम-शिवलिंग प्राकृतिक रूप से बनता है, वह इस बार यात्रा के महज 5-6 दिनों में ही 90 प्रतिशत तक पिघल गया और उसकी ऊँचाई सिमटकर मात्र एक फुट रह गई ।  यह स्थिति किसी आपदा से कम नहीं है और यह हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित करती है।

यात्रा के लिए निर्धारित 57 दिनों की अवधि के बीच में ही शिवलिंग का इस तरह विलीन हो जाना यह दर्शाता है कि हम प्रकृति के साथ किस हद तक खिलवाड़ कर रहे हैं।  वैज्ञानिक और स्थानीय जानकारों का मानना है कि इसके पीछे कई ठोस कारण हैं। इस साल कश्मीर घाटी में तापमान ने कई पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। मई और जून के महीनों में पड़ी तेज धूप और गर्म हवाओं ने गुफा के आसपास के वातावरण को बुरी तरह प्रभावित किया।  इसके अलावा, पिछली सर्दियों में कम बर्फबारी हुई, जिससे गुफा के पास वह प्राकृतिक ठंडक नहीं बन पाई जो हिमलिंग को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए जरूरी होती है।

पिछले वर्षों के रुझानों को देखें तो यह स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई है। वर्ष 2024 में कश्मीर घाटी में जून-जुलाई के दौरान भीषण गर्मी की लहर देखी गई थी, जिसे हिमलिंग के जल्दी पिघलने का प्रमुख कारण माना गया।  इसी तरह, वर्ष 2025 में भी मौसमी अस्थिरता साफ दिखाई दी, जहाँ बर्फबारी के बाद न्यूनतम तापमान में 6 डिग्री तक का उछाल दर्ज किया गया, जो इस बात का संकेत है कि हिमालय में मौसमी पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं।  ये आँकड़े बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के मामले में दुनिया के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक है।

इस विषय पर एक बड़ी चुनौती सही डेटा के अभाव की भी है। अमरनाथ गुफा एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है, लेकिन वहाँ स्थायी रूप से काम करने वाले ऑटोमेटेड वेदर स्टेशनों का सार्वजनिक डेटा सीमित है।  भारतीय मौसम विभाग मुख्य रूप से 5 से 7 दिनों का पूर्वानुमान और जिला-स्तर के अपडेट देता है, न कि दशकों पुरानी क्लाइमेटोलॉजिकल सीरीज़।  इसी कारण शोधकर्ता और मीडिया अक्सर श्रीनगर, पहलगाम या अनंतनाग जैसे निकटवर्ती स्टेशनों के डेटा को आधार मानकर गुफा-स्तर के स्थानीय अवलोकनों—जैसे हवा, नमी और बर्फबारी—को जोड़ते हुए स्थिति का आकलन करते हैं।

सबसे गंभीर पहलू मानवीय हस्तक्षेप का है। अमरनाथ गुफा का तापमान वहाँ मौजूद ‘माइक्रोक्लाइमेट’ पर निर्भर करता है।  एक अध्ययन के अनुसार, गुफा के भीतर जाने वाला हर श्रद्धालु लगभग 100 वाट ऊष्मा उत्सर्जित करता है।  जब लाखों लोग वहाँ पहुँचते हैं, तो गुफा के अंदर की गर्मी और नमी खतरनाक स्तर तक बढ़ जाती है, जिससे बर्फ का शिवलिंग तेजी से पिघलने लगता है।  इसके ऊपर गुफा के आसपास होने वाली मशीनी गतिविधियाँ और शोर-शराबा भी वहाँ के तापमान को प्रभावित करते हैं, जिसका सीधा असर शिवलिंग के अस्तित्व पर पड़ता है। बढ़ती यात्रियों की संख्या के लिए सुविधाएँ जुटाने, वाहनों की अनुमति , पक्के निर्माण जैसे की कारण है जिसके चलते  अमरनाथ शिवलिंग समय से बहुत पहले सिमट गया ।

पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी दे रहे हैं कि ग्लेशियरों का सिकुड़ना और बर्फबारी के बदले हुए पैटर्न इस बात के स्पष्ट सबूत हैं कि हम जलवायु संकट के बीच में खड़े हैं।  पवित्र हिमलिंग का निर्माण एक अत्यंत सूक्ष्म प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें छत से टपकने वाली जल-बूँदें जमाव बिंदु के नीचे के तापमान में शिवलिंग का आकार लेती हैं।  जब हम उस स्थान के स्थानीय तापमान में मानवीय गतिविधियों या अत्यधिक भीड़ के जरिए बदलाव लाते हैं, तो यह कुदरती प्रक्रिया ठप हो जाती है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या हम अपनी आस्था के प्रतीक को बचाने के लिए कुछ बदलाव के लिए तैयार हैं? हमें यह समझना होगा कि तीर्थयात्रा का अर्थ केवल वहाँ तक पहुँचना नहीं है; बल्कि उस स्थान के प्रति सम्मान और संतुलन बनाए रखना भी है। इसके लिए विशेषज्ञों के सुझावों पर अमल करना अनिवार्य हो गया है।  हमें यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की दैनिक संख्या को नियंत्रित करना होगा; ताकि गुफा के भीतर का तापमान स्थिर रहे।  गुफा के आसपास मशीनों और अन्य यांत्रिक साधनों के उपयोग पर पूरी तरह रोक लगानी होगी।  साथ ही, हिमालयी क्षेत्र की विशिष्ट जलवायु को देखते हुए हमें अपनी विकासवादी सोच में बदलाव लाना होगा और जलवायु अनुकूलन पर जोर देना होगा।

आस्था और प्रकृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए। अगर हम आने वाली पीढ़ियों के लिए इस पवित्र धरोहर को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो हमें विकास और दर्शन के नए और सतत तरीके खोजने होंगे। यह समय चेतने का है; क्योंकि प्रकृति के साथ खिलवाड़ की कीमत अक्सर बहुत बड़ी चुकानी पड़ती है। क्या हम प्रकृति के इस नाजुक संतुलन को बनाए रखने के लिए अपनी जीवनशैली और यात्रा के तरीकों में बदलाव करने को तैयार हैं? हिमालय की गोद में बसी यह गुफा हमें बार-बार यह याद दिलाती है कि हम धरती के मालिक नहीं; बल्कि इसके संरक्षक हैं। आने वाले वर्षों में हमारी रणनीति केवल तीर्थयात्रा के प्रबंधन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; बल्कि यह जलवायु सुरक्षा का एक बड़ा अभियान होनी चाहिए, ताकि हिमलिंग का यह पवित्र रूप भविष्य में भी श्रद्धालुओं को दर्शन देता रहे। ■ (indiaclimatechange.com से साभार)