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Oct 1, 2025

दो लघुकथाएँ

- डॉ. शंकर पुणतांबेकर

1. आम आदमी

नाव चली जा रही थी।

मझधार में नाविक ने कहा, "नाव में बोझ ज्यादा है, कोई एक आदमी कम हो जाए तो अच्छा, नहीं तो नाव डूब जाएगी।"

अब कम हो जाए तो कौन कम हो जाए? कई लोग तो तैरना नहीं जानते थे: जो जानते थे उनके लिए भी तैरकर पार जाना खेल नहीं था।

नाव में सभी प्रकार के लोग थे- डॉक्टर, अफसर, वकील, व्यापारी, उद्योगपति, पुजारी, नेता के अलावा आम आदमी भी। डॉक्टर, वकील, व्यापारी ये सभी चाहते थे कि आम आदमी पानी में कूद जाए। वह तैरकर पार जा सकता है, हम नहीं।

उन्होंने आम आदमी से कूद जाने को कहा, तो उसने मना कर दिया। बोला, "मैं जब डूबने को हो जाता हूँ तो आप में से कौन मेरी मदद को दौड़ता है, जो मैं आपकी बात मानूँ? "

जब आम आदमी काफी मनाने के बाद भी नहीं माना, तो ये लोग नेता के पास गए, जो इन सबसे अलग एक तरफ बैठा हुआ था। इन्होंने सब-कुछ नेता को सुनाने के बाद कहा, "आम आदमी हमारी बात नहीं मानेगा तो हम उसे पकड़कर नदी में फेंक देंगे।"

नेता ने कहा, "नहीं-नहीं ऐसा करना भूल होगी। आम आदमी के साथ अन्याय होगा। मैं देखता हूँ उसे। मैं भाषण देता हूँ। तुम लोग भी उसके साथ सुनो।"

नेता ने जोशीला भाषण आरम्भ किया जिसमें राष्ट्र, देश, इतिहास, परम्परा की गाथा गाते हुए, देश के लिए बलि चढ़ जाने के आह्वान में हाथ ऊँचा कर कहा, "हम मर मिटेंगे, लेकिन अपनी नैया नहीं डूबने देंगे…नहीं डूबने देंगे…नहीं डूबने देंगे"….!

सुनकर आम आदमी इतना जोश में आया कि वह नदी में कूद पड़ा।

2. और यह वही था

तस्कर ने जब सौगंध खाई कि अब मैं यह धंधा नहीं करूँगा तो इधर उसने उस पर तमंचा दाग दिया। तमंचा सिर्फ आवाज करके रह गया। तस्कर जिन्दा का जिन्दा।

यह देख उसने तमंचा देनेवाले की गर्दन पकड़ी।

उस गरीब ने बताया, " मेरी क्या गलती है! यह तो मैंने खासी भरोसे की जगह सरकारी आर्डनेंस फैक्टरी से चुराया था।"

उसने जाकर आर्डनेंस फैक्टरी के बड़े अफसर की गर्दन पकड़ी।

उसे अफसर ने बताया, "मेरा क्या दोष ! ऊपर आप अपने पिताजी को ही गर्दन पकड़िए।"

और उसने जाकर सचमुच अपने पिता की भी गर्दन पकड़ी। बोला, "आपकी वजह से देश की फैक्टरियों में ऐसे गलत तमंचे बन रहे हैं।"

इस पर पिता ने कहा, "तुमसे क्या छिपाऊँ बेटे! इसमें दोष मेरा है, पर पूरी तरह से मेरा ही नहीं, माल जुटानेवाले ठेकेदार का भी है। पर ठेकेदार की गर्दन न पकड़ना। हम कहीं के नहीं रहे जाएँगे।"

और पिता से जब उसने ठेकेदार का नाम पूछा,तो ज्ञात हुआ वह और कोई नहीं, वही तस्कर था, जिस पर उसने तमंचा दागा था।

दो लघुकथाएँः

- श्याम सुंदर अग्रवाल 

1. मकान 

मकान को देखकर किराएदार बहुत खुश हो रहा था। उसने कभी सोचा भी न था कि इतना बढ़िया मकान किराए के लिए खाली मिल जाएगा। सब कुछ बढ़िया था-बेडरूम, ड्राइंगरूम, किचन। कहीं भी कोई कमी नहीं थी।

"हाँ जी, बिल्कुल पक्की। ऊपर पानी की टंकी भी है। आप जाकर देख आओ! "

किराएदार सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर गया और कुछ देर बाद वापस आ गया। अब वह निराश था।

"अच्छा जी, आपको तकलीफ दी। मकान तो बहुत बढ़िया है, पर मैं यहाँ रह नहीं सकता।"

मकान-मालिक ने कहा, "आपको कोई वहम हो गया है। मकान में भूत नहीं है और न ही पुलिस-चौकी इसके आसपास है।"

किराएदार ने जब पीछे पलटकर नहीं देखा, तो मकान-मालिक ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया, "मकान तो चाहे आप किराए पर न लो, लेकिन यह तो बताओ कि इसमें कमी क्या है? लोग तो कहते हैं कि शहरों में मकानों का अकाल-सा पड़ गया है, पर यहाँ इतना बढ़िया मकान खाली पड़ा है।"

मकान-मालिक पूरे का पूरा प्रश्नचिह्न बनकर किराएदार के सामने खड़ा था।

किराएदार ने मकान-मालिक से अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा, "आपको पता नहीं कि आपका मकान घर के योग्य नहीं है। इसके एक तरफ गुरुद्वारा है और दूसरी तरफ मंदिर !"

2. संतू 

प्रौढ़ उम्र का सीधा-सा संतू बेनाप बूट डाले पानी की बाल्टी उठा जब सीढ़ियाँ चढ़ने लगा तो मैंने उसे सचेत किया, "घ्यान से चढ़ना। सीढ़ियों में कई जगह से ईटें निकली हुई हैं। गिर न पड़ना।"
"चिंता न करो, जी! मैं तो पचास किलो आटे की बोरी उठाकर सीढ़ियाँ चढ़ते हुए भी नहीं गिरता।"
और सचमुच बड़ी-बड़ी दस बाल्टियाँ पानी ढोते हुए संतू का पैर एक बार भी नहीं फिसला।
दो रुपये का नोट और चाय का कप संतू को थमाते हुए पत्नी ने कहा, "तू रोज आकर पानी भर दिया कर।"
चाय की चुस्कियाँ लेते हुए संतू ने खुश होकर सोचा-"रोज बीस रुपये बन जाते हैं पानी के। कहते हैं अभी नहर में महीना और पानी नहीं आनेवाला। मौज हो गई अपनी तो !"
उसी दिन नहर में पानी आ गया और नल में भी।
अगले दिन सीढ़ियाँ चढ़कर जब संतू ने बाल्टी माँगी तो पत्नी ने कहा, "अब तो जरूरत नहीं। रात को ऊपर की टूँटी में भी पानी आ गया था।"
"नहर में पानी आ गया! " संतू ने आह भरी और लौटने के लिए सीढ़ियों पर कदम घसीटते लगा। कुछ क्षण बाद ही किसी के सीढ़ियों में गिरने की आवाज हुई। मैंने दौड़कर देखा, संतू आँगन में औधे मुँह पड़ा था। मैंने उसे उठाया। उसके माथे पर चोट लगी थी।
अपना माथा पकड़ते हुए संतू बोला, "कल बाल्टी उठाए, तो गिरा नहीं, आज खाली हाथ गिर पड़ा।"

पंजाबी कहानीः विषधर

  - बचिंत कौर, अनुवाद : सुभाष नीरव

रत्तीभर भी मन नहीं कर रहा था बेबे भागवन्ती का कि वह आज ही गाँव की गाड़ी चढ़ जाए। अभी परसों ही तो वह एक शादी में रामपुरा से दिल्ली आई थी, जहाँ उसकी एकमात्र लाडली बेटी मुख्तियारो भी ब्याही हुई थी।

पड़ोस में रहते गिल की बेटी की डोली विदा करने के बाद, बेबे भागवन्ती अभी-अभी ही अपनी बेटी मुख्तियारो के घर पहुँची थी। 

 “बेटी मुख्तियारो, अगर तू कहे तो दो दिन ठहर के रामपुरा चली जाऊँगी। वहाँ कौन-सी गाड़ी रुकी हुई है मेरे बग़ैर।”

अपने दामाद लहणा सिंह के सामने इतनी-सी बात मानो बेबे भागवन्ती ने झिझकते-झिझकते कही थी। इसके साथ ही उसने गाँव से मुख्तियारों के लिए लाई हुई सौगातों की कई छोटी-मोटी पोटलियाँ ही नहीं, अपने नये सिले छींट के सूट को भी ट्रंक से बाहर निकाला और उसकी तह खोलने लगी।

माँ की ओर से लाई गई ढेर सारी सौगातों की ओर मोहभरी नज़र फेरकर, पल ही पल अपने पति की नज़रों में झाँकते हुए मुख्तियारो ने कहा -“हाँ माँ, तूने अभी वहाँ जाकर कौन-सा कसीदा काढ़ना है। इतनी दूर से आई हो तो चार दिन रहकर ही जाना मेरे पास। रोज़-रोज़ कहाँ निकला जाता है घर से। पता नहीं कैसे आ गई तीन सालों बाद। फिर इतवार को तो गिल्लों के बलदेव ने भी वापस लौटना ही है गाँव को। उसके साथ ही चली जाना, गाँव तक साथ हो जाएगा तेरा।”

यह सब कहते हुए जैसे मुख्तियारो ने अपने मन की साफ़-साफ़ बात अपने पति लहणा सिंह को कह सुनाई थी। वैसे बेटी माँ को उम्रभर अपने पास रखना चाहती थी। माँ की देखभाल करने का ठेका सिर्फ बेटों के पास ही क्यों? जब जायदाद में बराबर का हिस्सा माँगने के लिए दामाद अपनी बीवियों को जबरन आगे किए रहते हैं।

“चलो, दो चार दिन ही सही, क्या फायदा घर में क्लेश डालने का।” अपने सवाल का खुद ही जवाब देती मुख्तियारो ने अपनी बात के समर्थन के लिए कड़वे स्वभाव के अपने पति लहणा सिंह की ओर चोर निगाहों से देखा।

उधर माँ, बेटी के सामने अपना पेट खंगालने के लिए न जाने कब से बेचैन थी।

मांवां ते धीयां दी दोस्ती नी माये

कोई करदियाँ गलोड़ियाँ...

नी कणकाँ लम्मियाँ धीयाँ क्यूँ 

जम्मियाँ नी माये...।

न जाने कितनी ही अंतड़ियाँ कड़-कड़ करके टूटी होंगी, जब ये बोल किसी माँ से बिछुड़ी बेटी के कलेजे को चीरते उसके होठों पर आये होंगे? माँ-बेटियों की टूटती दोस्ती के गीत यूँ तो पंजाब की धरती के सारे जंगल-बियाबानों में गूँजते हैं, पर मुख्तियारो और भागवन्ती बेबे की दोस्ती के चर्चे, गाँव के बच्चे-बच्चे के मुँह पर ही नहीं, उसके भाई बलवन्त और भाभी मिन्दरो के मुँह से भी दिन-रात होते ही रहते। मिन्दरो पास-पड़ोस में बैठी, बलवन्त सिंह के साथ बातें करती -

“जी, बेबे गई तो बेशक गिल्लों की बेटी के ब्याह पर है, पर यह चावलों से भरा पीपा, चने की दाल, सरसों का सूखा साग और ये अपने हिस्से के सारे के सारे बादाम भला क्यों लेकर गई है अपने साथ?”

“हाँ, वैसे भी इतना बोझ राह में कौन उठाएगा बेबे का?”

मिन्दरों की बात की पूरी-पूरी हिमायत करता था मुख्तियारो का भाई बलवन्त भी।

“निरे बुद्धू हो तुम तो...गिल्लों की लड़की के ब्याह का तो बहाना था बेबे के पास दिल्ली जाने के लिए। हमारी क्या कोई सगी रिश्तेदारी है जट्टों के साथ। न लेना, न देना कभी। ज़रा-सी जान-पहचान होने पर ही भला कोई यों चल पड़ता है, इतनी दूर। दिल्ली का तो किराया-भाड़ा भी बहुत है यहाँ से। असल बात तो यह है कि बेटी मुख्तियारो के पास जाना था। मैं जानती नहीं जैसे, तुम देख लेना अगर बेबे लौट आए महीनेभर से पहले।”

“हूँ...।” बलवन्त ने मिन्दरो की बात का फिर हुंकारा भरा।

“भला क्या, चावलों की कमी है दिल्ली में, जो पीपा भरकर ले चली साथ। और सेवियाँ कौन-सा नदीद फल हैं, वहाँ ले जाने के लिए। सारी की सारी पीपी उलटकर ले गई झोले में। हम भी तो किसी की बेटियाँ हैं न। हमारी माँ तो ऐसा नहीं करती कभी कि बहू-बेटों के मुँह से छीनकर बेटियों के घर भरे जाओ। मैं पूछती हूँ, भला क्या नहीं मिलता है वहाँ दिल्ली जैसे शहर में। चाहे तो आदमी सारा बाजार खरीद ले खड़े पैर। मैं नहीं जानती जैसे बुढ़िया को...। नकद कहाँ था, जो देकर आती बेटी को। बाई जी की पिलसन में से भी निकालकर ले गई है साथ।”

मिन्दरो जैसे भागवन्ती बेबे के फौज में मारे गये पति की पेंशन पर भी अपना पूरा-पूरा हक़ जमाती थी। तभी तो उसको मुख्तियारों के लिए धेले भर की चीज़ भी सौ की लगती।

वैसे मुख्तियारो को, बेबे भागवन्ती बलवन्त से कम प्यार नहीं करती थी। इस असीम मोह के कारण ही माँ-बेटी दोनों को यह बिछोड़ा झेलना कठिन हो जाता था। बेबे भागवन्ती जब कभी एक-दो दिन के लिए दिल्ली में मुख्तियारो के पास आती, एक मिनट के लिए भी खाली न बैठती।

“ला, बेटी मैं बैठी-बैठी कोई सब्जी-भाजी ही चीर दूँ। आटा गूँध दूँ। और कुछ नहीं तो लहसुन ही छीलकर रख देती हूँ। जब भाजी बनानी होगी, झट कुतरकर डाल लेंगे।” अच्छी-भली घर में बर्तन माँजनेवाली माई आती थी, फिर भी बेबे भागवन्ती बर्तन माँजने बैठ जाती।

दूसरे कितने ही छोटे-मोटे काम बेबे भागवन्ती मुख्तियारो के यहाँ बैठी-बैठी सँवारती रहती। किसी थैले की तनी टूटी होती, झट सुई-धागा लेकर सिलने बैठ जाती। किसी रजाई का कवर फटा होता, उसे सीने लगती। किसी दरी के किनारे उधड़े होते तो बेबे तुरन्त कहीं से पुराने कपड़े का टुकड़ा ढूँढकर लगाने बैठ जाती। बेबे जितना समय मुख्तियारो के घर में रहती, उसके सौ-सौ काम सँवारती। फिर भी उसके मुँह से यही शब्द निकलते, “वैसे तो बेटा मैं यों ही बोझ हूँ। ना काम की, ना काज की।”

“बेबे, तू यूँ ही न अनाप-शनाप बोला कर। मैं तो कभी तुझे खाली बैठे नहीं देखती।” मुख्तियारो की प्यार भरी नज़रें छोटे-छोटे काम सँवारती बेबे को जैसे सिर से पाँव तक चूमने लगतीं।

लेकिन, लहणा सिंह घर में आई बेबे भागवन्ती को एक बार ‘नमस्ते’ कहने के बाद, उसके गाँव लौट जाने तक फिर कभी भूले-भटके भी उससे कोई बात न करता। उसकी यह बेरुखी देख बेबे तब तक रसोई में ही सिकुड़कर बैठी रहती, जब तक वह अपने काम पर न चला जाता। फिर, एक अफसोस, एक पछतावा दिन-रात बेबे भागवन्ती की अंतड़ियों को अन्दर ही अन्दर चूहे की भाँति कुतरता रहता। उठते, बैठते, सोते, जागते हर पल यह सोच उसके मन में उठती रहती- ‘भला, मैं यों ही बेटी के द्वारे क्यों बैठी हूँ?...मिलना एक दिन का भी वही, दो दिन का भी वही।’

पर माँओं का बेटियों से मोह भला ऐसे ही कहाँ टूट पाता है! 

माँवाँ ते धीआँ दी दोस्ती नी माये

कोई टुटदी ए कहिराँ दे नाल

नी कणकाँ निसरियाँ 

धीयाँ क्यूं विसरियाँ माये...

मुख्तियारो ने सोच में डूबी माँ की ओर एक नज़र देखा। एक ही समय में दोनों के दिलों की पता नहीं कितनी गहराइयों से एक ठंडी आह एक साथ निकली और उनके अधरों पर उदासी की एक परत जमा गई।

एक बार तो मुख्तियारो का मन हुआ कि वह साफ़-साफ़ अपने पति लहणा सिंह से कह दे कि मैं भी तो बराबर का कमाती हूँ। अगर मेरी माँ दो दिन हमारे पास रह लेगी, तो घर का आटा खत्म नहीं होने वाला। 

पर वह मन ही मन कुढ़ते लहणा सिंह की गुस्से भरी लाल आँखों में झाँककर ही रह गई;  क्योंकि पास के पलंग पर बैठे लहणा सिंह ने जान-बूझकर मुख्तियारो की सारी बात अनसुनी करके लगभग टाल ही दी थी। 

कुछ समय के लिए चारों ओर सारे वातावरण में एक गाढ़ी उदासी और एक भय-सा फैलकर रह गया था। फिर, बेटी मुख्तियारो की एक चुप ने जैसे बेबे भागवन्ती का एकदम ही दिल तोड़कर चूर-चूर कर दिया था; लेकिन, अन्दर ही अन्दर वह अभी भी चाह रही थी कि एक बार मुख्तियारो उसे झूठे से ही कह दे, “बेबे, आज नहीं जाना तूने गाँव। एक-आध दिन ठहर कर चली जाना।”

कितना मोह!

कितनी लाचारी!

इतनी बेरुखी, इतनी बेकद्री, बड़े-छोटे का ज़रा लिहाज ही नहीं था लहणा सिंह को तो। बेबस मुख्तियारो लहणा सिंह के हुंकारे की प्रतीक्षा करती रही और बेबे भागवन्ती बेहद उदास और पश्चात्ताप भरी नज़रों से कितनी ही देर तक मुख्तियारो के मुँह की ओर ताकती रही। आख़िर, बेबे दोनों हाथों में पकड़े छींट के सूट को टूटे हुए दिल के साथ फिर से धीरे-धीरे तहाकर अपने ट्रंक में रखने लगी। सेवियाँ, चने की दाल और अन्य छोटी-मोटी सौगातों की छोटी-छोटी पोटलियाँ, दो सेर बादामों के झोले सहित मुख्तियारो के हाथ में पकड़ाते हुए उसने धीमे से कहा-“ले बेटी, यह भी रख ले उधर रसोई में। तड़के को रोज़ दूध में भिगोकर दो-चार गिरियाँ लहणा सिंह को दे दिया कर। और तू भी पी लिया कर कभी-कभी दूध के दो घूँट। देख तो, कैसे बिल्ली के बच्चे-सा मुँह निकला पड़ा है तेरा। आख़िर, फैक्टरी में भी तो तुझे सारा दिन बड़ी माथा-पच्ची करनी पड़ती है। उस पर घर का भी सारा काम अपने हाथों से करना होता है। किसी का सहारा तो है नहीं तुझे ज़रा भी। मैं तो कहती थी कि दो दिन तुझे आराम मिल जाता... पीछे से मैं घर सँभाल लेती, थोड़ा-बहुत, जितने के लायक हूँ। यह चारपाई भी तेरी बिलकुल ही टूटी पड़ी है। बाण ला देते, तो मैं ही बुन जाती। यह खेस भी वैसे का वैसा, नया का नया पड़ा है, इसके किनारों की लटें ही बट जाती। बैठी-बैठी इतना भर तो कर ही लेती। और बेटी, अब मैं किस लायक हूँ। वैसे तो अब रब मुझे उठा ही ले तो अच्छा...।”

यह सब कहते हुए बेबे भागवन्ती का गला भर आया था। बेबे तो पहले ही मुख्तियारो की एक चुप से समझ गई थी कि लहणा सिंह नहीं चाहता कि वह यहाँ रहे।

क्रोध में आग-बबूला हुई मुख्तियारो चुपचाप लहणा सिंह की नज़रों में झाँकती मानो अन्दर ही अन्दर जल-भुनकर रह गई थी।

“वैरी... कसाई न हो तो। खुद ने तो किसी बहन-भाई के साथ बनाकर नहीं रखी, मुझे भी तोड़ता है मेरे अपनो से। किससे वास्ता डाल दिया ईश्वर ने। बेअकल...बड़े-छोटे की शरम तो है ही नहीं ज़रा भी। मैं जानती हूँ, कौन-सी गोली बजती है इसके सीने में, मेरी माँ को दो दिन मेरे पास रखते हुए। यही न कि जितने दिन माँ यहाँ रहेगी, मैं उसके पास ही सोऊँगी। अब झाँकना... अगर सुलगती लकड़ी न मारूँ काले मुँहवाले के।”

मन ही मन साँप की तरह विष घोलती मुख्तियारो घंटा भर लहणा सिंह को बुरा-भला कहती रही और फिर गुस्से में ऊँचे स्वर में बोली- “चल बेबे, तुझे गाड़ी पर बिठा आऊँ।”

“अच्छा बेटा, खुश रहो अपने घर।” दोनों को एक आशीष देती बेबे भागवन्ती लहणा सिंह का सिर सहलाकर उसकी हथेली पर दस का नोट रख, दुखों की एक गाँठ सिर पर उठाए चुपचाप बेटी मुख्तियारो के पीछे-पीछे चल पड़ी थी। 

“बेबे, तू यों ही न साँपों को दूध पिलाती रहा कर।” मुख्तियारो ने दस का नोट लहणा सिंह के हाथ से लेकर फिर बेबे की मुट्ठी में दे दिया था।

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कविताः आत्मदीप

  - हरिवंश राय बच्चन







मुझे न अपने से कुछ प्यार,

मिट्टी का हूँ, छोटा दीपक,

ज्योति चाहती, दुनिया जब तक,

मेरी, जल-जल कर मैं उसको देने को तैयार ।


पर यदि मेरी लौ के द्वार,

दुनिया की आँखों को निद्रित,

चकाचौध करते हों छिद्रित

मुझे बुझा दे बुझ जाने से मुझे नहीं इंकार ।


केवल इतना ले वह जान

मिट्टी के दीपों के अंतर

मुझमें दिया प्रकृति ने है कर

मैं सजीव दीपक हूँ मुझ में भरा हुआ है मान ।


पहले कर ले खूब विचार

तब वह मुझ पर हाथ बढ़ाए

कहीं न पीछे से पछताए

बुझा मुझे फिर जला सकेगी नहीं दूसरी बार ।

व्यंग्यः अमीर बचाइए, सिस्टम बचेगा

  - जवाहर चौधरी  

एक न एक दिन मरना तो सबको पड़ता है । आया है सो जाएगा, राजा रंक फकीर । कोई विकल्प तो है नहीं।  अस्पताल चलें हम । अस्पताल में आदमी कायदे से मरता है। अस्पताल के पास सुपर स्पेशलिटी होती है। वे अपना काम जानते हैं और करने में दक्ष होते हैं। घरों में लोगों को नहीं मालूम होता हैं कि कब क्या करना चाहिए। मरीज की सांस उखड़ने लगती है तो दौड़कर बुआ जी को फोन करते हैं कि जल्दी आ जाओ बाबूजी की साँस उखड़ रही है। जो भी होना है बुआजी के सामने हो तो अच्छा होता है वरना बाद में केस बिगड़ सकता है। अस्पताल में ऐसा नहीं है। 

जब किसी की सांस उखड़ने लगती है , तो वह डिपॉजिट की रकम बढ़ाकर जमा करवा लेते हैं। इससे जमा बॉडी के जिन्दा रहने की उम्मीद बढ़ जाती है। लोगों को लगता है कि इतना रुपया जमा करवा रहे हैं तो अच्छा इलाज करेंगे। मरीज यानी जमा बॉडी को इतना आराम हो जाता है कि उसकी तरफ से साँस भी मशीन लेती है। इधर आत्मा यमराज के दरबार में पेश हो चुकती है, उसके करम चेक हो चुकते हैं, स्वर्ग या नरक में उसको खोली मिल चुकती है और बंदा अस्पताल में बाकायदा साँसें ले रहा होता है। अब इसे भी आप चमत्कार नहीं कहोगे तो मरो घर पे।

   हम एक खाँटी लोकतांत्रिक देश हैं और सिस्टम उसे जिंदा मानता है जो वोट दे देता है। मजबूरी है, क्या किया जा सकता है। अमीर आदमी का रुतबा अलग है वह वोट नहीं देता फिर भी बकायदा जिंदा माना जाता है। इसका रहस्य है कि वह चंदा देता है। राजनीतिक दल चंदे से जिंदा रहते हैं। अमीर लोग राजनीतिक दलों के ऑक्सीजन सिलेंडर होते हैं। सत्ता की साँसें अमीरों की तिजोरी में होती है। अमीर ना हों तो ऊपर बैठे मालिक का कारोबार भी ठीक से नहीं चले। आप समझ गए होंगे कि अमीर की इच्छा ही सिस्टम की जान होती है। इसलिए अमीरों को बचाना सिस्टम को बचाना है।  बड़े और समझदार आदमी हर काम कायदे से करते हैं; इसलिए अमीरों के अस्पताल अलग और गरीबों के अलग होते हैं । कायदे चाहे अस्पताल के हों, न्यायालय के हों या फिर धरम के हों, कोई भी कायदा गरीब अफोर्ड नहीं कर पाता है। वो अक्सर अच्छे अस्पताल और इलाज की कामना करते हुए मर जाता है। वैसे कामना का क्या है, लोग हूरों की भी करते ही हैं । गालिब ने कहा है कि ‘दिल को बहलाने के लिए खयाल अच्छा है।’ बहुत से कार्ड वाले गरीब अस्पताल के दरवाजे तक पहुँचकर कैसे तो भी मर लेते हैं। दरअसल अपने गरीब को भ्रम होता है कि वे जिंदा है। अस्सी करोड़ को सरकार से मुफ़्त राशन और पेड़ों से मुफ़्त ऑक्सीजन मिल रही  है । कुल मिल कर साँस चल रही हो तो लोग भी मान लेते हैं कि आदमी जिंदा है। 

सरकारें अस्पताल बनवाती हैं, ताकि आदमी जिंदा रहे और गरीबी भी । गरीबों के अस्पताल भी खासे गरीब होते हैं। गरीब से गरीब की मेचिंग होती है और ये संबंध बुरा नहीं  लगता है । यहाँ कोई ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए नहीं दौड़ता, ताबीज और भभूत के लिए पेरेरल दौड़ता दिखता है । गरीब अस्पताल में जब तब रोने चीखने की आवाज गूँजती है, तो जमीन पर पड़े मरीज के घर वाले खुश होते हैं कि शायद अब बेड मिल जाएगा। हूरों वाली कामना आखरी में आ कर एक बेड पर सिमट जाती है । बेड पर मरने को मिले तो गरीब की मुक्ति हो गई मानी जाती है। 

सम्पर्कः BH 26 सुखलिया, भारतमाता मंदिर के पास, इंदौर- 4520 10 , मो.  940 670 1 670