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May 2, 2025

लघुकथाः बड़कऊ

  - रचना श्रीवास्तव   

पूरा घर दहाड़े मार -मारकर रो रहा था। अम्मा बार बार बेहोश हुए जा रहीं थीं। मीरा और सुन्दर पिता के पैर पकड़ पकड़ रो रहे थे। पड़ोसी फुसफुसाकर बातें कर रहे थे आखिर बड़कऊ ने ऐसा क्यों किया। कोई कह रहा था- अरे, अम्मा ने सबसे पहले देखा पंखे से झूलते हुए। बेचारी अम्मा। एक ही तो बेटा था। इस अशांत घर में बस रीमा ही शांत थी। उसको मानो कोई दुःख नहीं था।

तभी मोहल्ले के एक व्यक्ति ने आकर कहा- रीमा भाभी, आपसे मिलने कोई मधुरिमा आई हैं। इतना सुनना था कि शान्त बैठी रीमा चिल्ला उठी- ‘क्यों आई है वो यहाँ ? उसी कुलच्छणी के कारण हुआ है ये सब। उसको बोलो, चली जाए यहाँ से। मुझको मेरे हाल पर छोड़ दे।” रीमा जोर जोर से चिल्ला रही थी। तब तक मधुरिमा अन्दर आ चुकी थी। बोली-‘मैं न तुमसे लड़ने आई हूँ, न तुम्हारा दुःख बढ़ाने आई हूँ। बड़कऊ ने कई महीनों पहले मुझे यह पत्र दिया था और कहा था कि 14 फरवरी को आपको यह पत्र दे दूँ। वही देने आई थी। यहाँ आकर पता चला- यह सब हो गया। मुझे पता नहीं इस खत में क्या है?” इतना कहकर मधुरिमा ने बड़कऊ को प्रणाम किया और चली गई। मधुरिमा के जाते ही रीमा पत्र लेकर अपने कमरे में आ गई। पत्र खोलकर पढ़ने लगी-

प्रिय रीमा ,

जब तक तुमको ये पत्र मिलेगा, मैं तुमसे बहुत दूर जा चूका हूँगा। शक का जो कीड़ा तुम्हारे अंदर घुस चुका है, उसने तुम्हारी आत्मा तक को दूषित कर दिया। मैंने बहुत प्रयास किया कि तुम्हारा शक दूर हो सके; पर नाकाम रहा। संदेह करने की तुम्हारी आदत ने मेरा जीना कठिन कर दिया था। मुझे मर जाना आसान लगा। मैंने सोचा- शायद तुम समझ सको कि मेरा कहीं चक्कर नहीं था और तुम्हारा शक दूर हो सके।

तुम्हारा बड़कऊ

रीमा थोड़ी देर पत्र हाथ में  लिये बैठी रही। फिर खुद से ही बोली ‘मरकर भी झूठ बोल गया’ और बड़बड़ाते हुए बाहर आकर बैठ गई। ■

rach_anvi@yahoo.com

कविताः अम्मा का गुटका





 - भावना सक्सैना

चाची और अब छोटी भाभी ने

बड़ी सँभाल से रखा है

मटमैली जिल्द और

पीले पन्नों वाला

रामायण का एक गुटका

अम्मा का गुटका

देख उसे अनायास ही

भीग गईं अँखियाँ।

अम्मा के इस गुटके में

साँस ले रही हैं

कितनी कहानियाँ

कितने चित्र, कितनी स्मृतियाँ।

रामायण, गीता,  सुखसागर

गुनती, बाँचती अम्मा

पीछे कहीं बाबा की आवाज़

“अरी भागवान, बाल्टी में पानी भर

धूप में रखा या नहीं”

इसे देख जी उठा है बचपन

खुला ईंट बिछा आँगन

एक पीढ़ा, एक पलकिया

कहीं गाँव में मिलते हों शायद

शहर में तो नहीं दिखते 

न पीढ़ा, न पलकिया, न आँगन…

राम नाम की लूट है

गुनगुनाती

कँपकँपाते जाड़े में

हैंडपंप के पानी से स्नान कर

भीगे कपड़े निचोड़ती

भीगे बालों में खड़ी अम्मा

अपने ठाकुर जी और

लड्डू गोपाल जी को स्नान कराती

उनका शृंगार करती

धूप दीप सजाती, आरती देती

बतासा हाथ पर धर असीसती

सीधे पल्ले की धोती में

मुस्कुराती अम्मा

 काले फ़्रेम का चश्मा नाक पर चढ़ाए

फिर-फिर गीता के अध्याय दोहराती

जाड़ों की धूप

गर्मियों की लंबी दोपहर में

पढ़ती, सुनाती, समझाती अम्मा।


इस गुटके में महक है अम्मा की उँगलियों की

कुछ छंदों चौपाइयो पर हैं सही के निशान

उन्हें पढ़ा होगा, गुना होगा मेरी अम्मा ने बार-बार

या चिह्नित कर छोड़ा होगा आने वाली

पीढ़ी के लिए, किसी कुंजी स्वरूप

सब कुछ छोड़ मैं पढ़ना चाहती हूँ,

गुनना चाहती हूँ इसे

सब लागलपेट छोड़

हो जाना चाहती हूँ

अम्मा- सी सरल

उनका ही प्रतिरूप।

ग़ज़लः तुम्हें राधा बुलाती है

 - अशोक शर्मा 

कभी तू मान जाती है, कभी तू रूठ जाती है,

अज़ब हैं ख़ेल क़िस्मत का, हँसाती है, रुलाती है।


अदा उसकी यही प्यारी मुझे हरदम लुभाती है,

लिखे वो नाम मेरा और लिख-लिखकर मिटाती है।


वही तो गाँव है, गलियाँ, वही है नीम पे झूला,

अचानक क्यों भला इनको अकेला छोड़ जाती है।


बताया तो हुआ मालूम क्यों ये हाल है मेरा,

मुझे भी हो गया है प्यार ये दुनिया बताती है।


तुम्हें मालूम हो तो तुम बताओ ये ज़रा हमको,

चुराकर ले गया है कौन, क्यों ना नींद आती है।


नहीं है ज़िन्दगी को चैन इक पल भी किसी ज़ानिब,

मदद करती नहीं है और तानें भी सुनाती है।


अभी है वक़्त तेरा तो परख ले ज़िन्दगी हमको,

हमारा  वक़्त  आने  दे,  सुनेंगे  क्या सुनाती है।


कभी उपवास रखती है, कभी रोज़ा रखा उसने,

ग़रीबों की अना तो भूख को यूँ भी छिपाती है।


ज़रा देखो पलटके श्याम, तुम क्या छोड़ आए हो,

तुम्हें  गोकुल  बुलाता  है, तुम्हें  राधा बुलाती है।


पराया धन कहा उसको, पराया कर दिया हमने,

यही  इक  बात  बेटी  को, अकेले  में रुलाती है।

रचनाकार के बारे में- छत्तीसगढ़ शासन से सेवानिवृत्त राजपत्रित अधिकारी, -लगभग चार दशकों से सक्रिय लेखन,मूलतः ग़ज़ल लेखन, अनेक गीत, दोहे, स्वतंत्र आलेख ,कविताएँ और कहानियाँ भी । एक स्वतंत्र ग़ज़ल संग्रह,तीन साझा ग़ज़ल संग्रह और एक साझा दोहा संग्रह प्रकाशित। देश विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और डिजिटल पटल पर अनेक रचनाओं का नियमित प्रकाशन। सम्पर्कः  ‘सोहन-स्नेह’, कॉलेज रोड, महासमुंद (छत्तीसगढ़) 493445, मो. 9425215981, ईमेल- informashoksharma@gmail.com

किताबेंः विचित्रता से घिरे मन और बुद्धि

 - रश्मि विभा त्रिपाठी 

 मन विचित्र बुद्धि चरित्र (कहानी-संग्रह): डॉ. सुषमा गुप्ता, पृष्ठ: 208, मूल्य: 209 , संस्करण: 2025,  प्रकाशक: हिंद युग्म, सी- 31, सेक्टर- 20, नोएडा (उ.प्र.)- 201301, आवरण- चित्र: प्रियम गुप्ता

संवेदनशील कथाकार डॉ. सुषमा गुप्ता का कहानी- संग्रह ‘मन विचित्र बुद्धि चरित्र’ विचित्रता से घिरे मन और बुद्धि के निर्णय से बना चरित्र या तो समाज के लिए एक आदर्श बनता है या फिर एक कलंक।  
11 कहानियों से सजा संग्रह ‘मन विचित्र बुद्धि चरित्र’ मास्टर पीस है, जिसमें मन, बुद्धि का मूर्तरूप दिखता है। 
‘मरीचिका की गंध’ स्त्री को लेकर भ्रम में जी रहे एक युवक की कहानी है। प्रमुख पात्र न बरसों पहले गई लड़की की आत्मा तक पहुँच सका और न अपनी मौजूदा प्रेमिका के लिए अपनी आत्मा के तहखानों का दरवाजा खोल पाता है.
तहखाने ‘ताजे गोश्त की हवस में’ बदबूदार हो चुके हैं; इसीलिए अपनी प्रेमिका के आने से पहले वह सबकुछ समेट लेना चाहता है।
कहानी ‘मंत्रविद्ध’ में सपनों और यथार्थ के बीच मानसिक और भावनात्मक प्रवाह में बहता हुआ एक पात्र है। स्वप्न में वह देखता है कि ट्रेन छूटने के बाद एक लड़की मदद के लिहाज से उसे अपने घर ले जाती है। उसकी डायरी उसके हाथ लगती है। डायरी में वह परिष्कृत समाज का चेहरा देखता है और सोचता है कि कहीं वह देह व्यापार से तो नहीं जुड़ी; मगर फिर भी उसकी ओर खिंचता चला जाता है। यह अवचेतन मन की शक्ति है, जो उसे अपनी ओर खींचती है। जीवन के अनुभव और घटनाएँ इसी अवचेतन मन की शक्ति का परिणाम हैं, जिन्हें चेतन मन भोगता है। भावनाएँ कभी किसी से इस तरह जुड़ जाती हैं कि हम अपने आसपास उसकी उपस्थिति महसूस करते हैं। 
‘ख़्वाब की छाल में यथार्थ की कील’ कहानी दिखाती है कि कैसे सत्ताधारी गिद्ध किसी की बुद्धि को लील जाते हैं और कैसे किसी को औजार बनाते हैं अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए। कहानी संदेश देती है कि जब तक समाज में धार्मिक भेदभाव की दीवारें खड़ी करने वाले स्वार्थपरक असंवेदनशील लोग हैं, शांति और मानवता तब तक कायम नहीं हो सकती।
कहानी ‘मिस्टिक स्टे’ एक गम्भीर मुद्दे को उठाती है। सुनसान गलियों से होकर एक जोड़ा हवेली में पहुँचता है, वहाँ पता चलता है कि वह एक होटल है। हवेली देखकर वह वहीं ठहरने का निश्चय करते हैं; हालाँकि होटल रहस्यमय है और किसी भी वेबसाइट पर सूचीबद्ध नहीं है।कहानी सोचने पर मजबूर करती है कि आज के युग में किस तरह हमारी निजता का हनन हो रहा है। ऐसे में हम अपनी सुरक्षा को लेकर कितने सतर्क हैं? 
‘ग्रेवडिगर’ कहानी में वास्तविक प्रेम और धोखे का चित्रण है। कहानी में एक ज़हीन ग्रेवडिगर लड़कियों की क़ब्र खोदता है और जब कोई लड़की मरने लगती, तो उसे कब्र से खींचकर बाहर निकाल लेता और जब जिन्दा होने लगती, तो उस पर कब्र की मिट्टी डाल देता है। प्रेम के नाम पर लड़कियों के जीवन को बर्बाद करने का यह तरीका है कि लड़की न जी सके और न मर सके। प्रेम के नाम पर शारीरिक मानसिक शोषण, धोखा करने वाला ग्रेवडिगर ही है। 
लड़की द्वारा लड़के की अनदेखी करने पर लड़के के अहंकार को चोट लगती है। अपने अहंकार को बचाने के लिए वह दोस्ती का हाथ बढ़ाता है और फिर चोट खाया आदमी क्या कर सकता है, यह बताने की जरूरत नहीं।
कहानी ‘भद्दी हँसी’ जुनून पर आधारित है कि कैसे व्यक्ति का ध्यान लगातार किसी पर रहता है, वह लगातार उसके बारे में सोचता है, जब इंसान पर हावी होने लगता है, तो न केवल उसे बल्कि उसके निजी रिश्तों को भी प्रभावित करता है।
गुब्बारे बेचने वाली दो लड़कियों में से एक पर रोशन लगातार ध्यान देने लगता है, उसकी मदद करने की सोचता है, जबकि वह जानता है कि वह समाज सुधारक नहीं है, रोशनी से वह प्रेम करता है; लेकिन उस लड़की की ओर जाने क्यों भागता है। लड़की की भद्दी हँसी में सामाजिक असमानता, समाज- सेवा, गरीबी और शिक्षा पर एक व्यंग्य है।  
‘दिन के ख़्वाब सुनाएँ किसको!’ प्रेम का अर्थ, परिभाषा, प्रेम के बदलते स्वरूप, प्रेम सम्बन्धों के उतार-चढ़ाव और अलगाव की कहानी है। नायिका अलगाव को अच्छा मानती है। अलगाव वाकई अच्छा ही है अगर साथी में रिश्ते के प्रति सच्ची निष्ठा नहीं।
दूसरों के दुख को अपना समझने वाली ‘उठान हाड़ की लड़की’ की संवेदनशील पात्र शम्पा साबित करती है कि आज के युग में संवेदना का मूल्य समझने वाला शायद विरला ही होगा। उठान हाड़ की लड़की की आत्महत्या से वह दुखी है, जबकि उसके पति को लगता है कि उसे साइकेट्रिस्ट की जरूरत है। कहानी समाज की काली सच्चाई दिखाती है जहाँ पैसों के लिए डोनर प्रक्रिया की आड़ में महिलाओं की देह से खिलवाड़ हो रहा है। 
‘टंच’ सुस्पष्ट स्वप्न (ल्यूसिड ड्रीमिंग) के अनुभव से गुजर रहे एक युवक की एक रोचक कहानी है।
‘मूक चीखें’ समाज का काला सच बताती है कि किस प्रकार एक दसवीं कक्षा के बच्चे को कुछ बिगड़ैल लड़कों ने न सिर्फ शारीरिक, मानसिक रूप से प्रताड़ित किया; बल्कि उसपर यौन हिंसा की। बच्चे ने गहरे अवसाद में आकर आत्महत्या कर ली। विकृत मानसिकता के लड़कों के इस घिनौने कृत्य में उनके माता- पिता और स्कूल प्रबंधन दोनों जिम्मेदार हैं।
‘मनारा’ देशभक्ति, प्रेम और मानवता की कहानी है, जिसका नायक निश्कान बर्लिन के हीरोज डैन जाता है, जहाँ दूसरे विश्व युद्ध में शहीद हुए शहीदों की खून से सनी वर्दी, उनके लिखे ख़त, उनका हर सामान अमानत के तौर पर सहेजा गया है। वहाँ उसे एक बटुआ मिला, जिसपर लियो लिखा था। बटुए में लियो की प्रेमिका मनारा के नाम एक खत था। जाने किस भाव से उसने लियो का बटुआ लिया और मनारा की तलाश में निकल पड़ा, लियो का खत लौटाने के लिए।
संग्रह की हर कहानी के संवाद, भाव, विचार एक दृश्य की तरह पाठक की आँखों के सामने से गुजरते हैं। भाषा में एक लय है, जिसमें पात्रों की भावनाओं की गूँज सुनाई देती है।  
‘मन विचित्र बुद्धि चरित्र’ कहानी- संग्रह साहित्य जगत में अपना एक अलग और विशिष्ट स्थान बनाएगा। ■

कविताः नमस्कार

 - रवींद्रनाथ टैगोर

 अनुवाद: मुरली चौधरी

"अरे ओ नवयुवक,

अरे मेरे बच्चे,

अरे हरे-भरे, अरे अबोध,

कोमल पत्तों की बहार

प्रकाश के देश में

तू ले आया ताज़ा फूलों की माला

नए रूप में।

तेरी यात्रा शुभ हो।" 

(यह कविता (काज़ी नज़रुल इस्लाम के प्रति रवींद्रनाथ की आशीर्वचन-स्वरूप श्रद्धांजलि है, जिसमें उनकी रचनात्मक ऊर्जा को नमन किया गया है। )