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Feb 3, 2024

लघुकथाः गौरैया का घर

 - मीनू खरे

सृष्टि अपर्टमेंट्स की 9वीं मंज़िल की बाल्कनी में खड़े नन्हे नीटू ने मानसी से पूछा-"माँ गौरैया कैसी होती है?"

मानसी ने बताया "गौरैया एक चिड़िया होती है।"

"माँ गौरैया कहाँ रहती है?"

"गौरैया पेड़ों पर रहती है और फुदक-फुदक कर चूँ-चूँ बोलती है।"

" पेड़ तो हमारे अपर्टमेंट्स में नहीं है माँ, फिर गौरैया कहाँ रहती होगी? कहाँ चूँ-चूँ बोलती होगी? नीटू ने परेशान हो कर पूछा।

"आँगन में चूँ-चूँ बोलती है गौरैया" मानसी ने बात टालते हुए कहा।

"आँगन क्या होता है माँ?" नीटू ने अगला प्रश्न बिना देरी किए दागा।

ऑफ़िस से थककर चूर हो लौटी मानसी में नीटू के प्रश्नों की रेलगाड़ी को हरी झंडी दिखाने की-की ताब नहीथी। उसने अपने चारों ओर उगे कंक्रीट के जंगल पर एक चुभती निगाह डाली और नीटू को लेकर कमरे में आ गई। नीटू अब भी मचल रहा था-"माँ मुझे गौरैया देखनी ही है।"

"अभी दिखाती हूँ बेटे।" कहकर मानसी ने तुरंत लैपटॉप आन किया। गूगल खोलते ही गौरैया सामने थी। फुदकती गौरैया देख नीटू ताली बजाने लगा।

अगले दिन क्लास में टीचर पढ़ा रही थीं।

"शेर के घर को माँद कहते हैं।"

"चूहे के घर को बिल कहते हैं।"

"मधुमक्खी के घर को छत्ता कहते हैं।"

"गौरैया के घर को ..."-टीचर के वाक्य को बीच में ही काट कर नीटू चिल्लाया-"गौरैया के घर को गूगल कहते हैं।"


दो लघुकथाः 1. हनीट्रैप, 2. अन्तर्दृष्टि

  -  डॉ. उपमा शर्मा

1. हनीट्रैप

मॉल के प्रवेश द्वार के किनारों  पर लगे बड़े -बड़े होर्डिंग्स पर लिखे आकर्षक ऑफर्स ने अंजू का ध्यान अपनी ओर खींच ही लिया। आगे बढ़ते ही एक ओर सुंदर परिधानों में सजे बाई वन गेट टू का ऑफर देते मॉडल के विज्ञापन तो दूसरी ओर रंग-बिरंगे पैकेट्स में लगे खाद्यान्नों के ढेर पर एक पर एक फ्री का टैग के फोटो देख अंजू से रुका न गया।

"सुनो! वहाँ देखो फाइव थाउजेंड में फाइव शर्ट्स। ब्राण्ड भी और जेब पर भी कम भारी।"

"अभी दो महीने पहले ही तो सेम ब्रांड की शर्ट ली हैं अंजू। ये भी देखो पाँच हजार खर्च करोगी तो पाँच मिलेगी। तुम अपनी जींस लेने आई हो, ले लो फिर मूवी देख कर चलेंगे।"

"उन पर भी सेल चल रही है सर। ये दो के पे करके चार आ जायेंगी। तीन और सलैक्ट कर लीजिए आप। "मैडम आप इस बार बहुत दिनों बाद।" मुस्कुराती हुई सेल्स मैनेजर उस ओर लपकी।

"बस इधर आना नहीं हो पाया।"

"ये देखिए। कितनी सुंदर कुर्तियाँ। लेटेस्ट फैशन। एकदम आपकी पसंद। "

"हाँ बहुत खूबसूरत हैं।"

"ट्वेन्टी परसैन्ट का डिस्काउंट भी है। शिवानी! इधर आओ, मैडम को कुछ अच्छा सा कलैक्शन दिखाओ।"

"वाह! मेल सैक्टर में बड़ी सेल। ये देखो ये टीशर्ट कितनी सुंदर है। बाय वन गेट थ्री का ऑफर है। मैं तो कहती हूँ फटाफट ले लो इससे पहले कोई और इसे उठाए।"

"मेरे पास पहले ही इतनी है यार।"

"अभी कम में मिल रही हैं। फिर लेना सीजन में डबल रेट पर। अच्छी भली बचत हो रही अभी; लेकिन नहीं तुम तभी लेना जब फ्रेश अराइवल में पूरे पैसे देने हों। अभी ये भी ऑफर में और फाइव थाउजेंड से ऊपर की शॉपिंग पर फ्री गिफ्ट वाउचर भी।"

"लेकिन अंजू।"

"क्या अंजू- अंजू कर रहे हो? तुम बड़ा बोर करते हो। मैं ये सब बिलिंग के लिए रख रही हूँ।"

"मैडम। ये बिटिया के लिए एक बड़ी सुंदर ड्रैस आई है। बहुत फबेगी इस पर।"

"दिखाइए। "

"अंजू! हमें देर हो रही है।"

"सर! फिर ये पीस नहीं मिलेगा। फिर अभी सेल भी है।"

"हाँ आप दिखाइए।"

"जी देखिए। बिटिया पर बड़ा सुंदर लगेगा ये कलर।"

"वाकई। इसे न देखती तो बहुत यूनीक चीज मिस कर देती।"

"फिर ये कर दूँ मैडम।"

"हाँ जी।"

"इसे कैश काउन्टर पर पहुँचा दीजिए।"

"अभी कैसे। मैडम ने तो कुछ लिया ही नहीं जींस के सिवाय।"

"बस हो गया।"

"ऐसे कैसे। आप आई भी इतने दिन बाद हो। ऐसे नहीं जाने दूँगी। आप अपने लिए भी तो देखिए कुछ।"

"हम जरा जल्दी में हैं।" 

"क्या ज़ल्दी की रट लगा रखी है नितिन। ग्रोसरी का सामान भी तो लेना है। टाइम है मूवी में अभी।"

"मैम! मैं ये आपके लिए कुर्तियाँ रखवा देती हूँ।"

"लेकिन अंजू हमने तय किया था कि फाइव थाउजेंड तक की ही शॉपिंग करेंगे। इतने की तो शर्टस ही ले ली। तुमने बच्चों के कपड़े भी बिना जरूरत लिये हैं अभी। इतना बजट नहीं है अभी।"

"क्रेडिट कार्ड किसलिए होता है नितिन। दो महीने बाद लेने ही थे न। तब इतना अच्छा ऑफर मिलता?" फिर ज्यादा शॉपिंग पर फ्री गिफ्ट वाउचर भी तो है।"

"यार अब कितना घी इकट्ठा करोगी। 4 किलो पहले ही रखा है। और कितने किलो चावल घर में पहले ही रखे हैं अंजू। प्लीज ये पेंसिल-इरेज़र मत उठाना अब।"

"हाँ तो खाया जाता है। आगे पीछे लेना ही है न। पुराने चावल अच्छे होते हैं। अब ये मत कहना इतने मसालों का क्या करोगी? साल भर काम आते हैं। इकट्ठे लेने पर सस्ते पड़ जाते हैं।

‘‘और स्टेशनरी का सामान चाहिए ही होता है बच्चों को।"

"अब चलें अंजू!"

"सुनो! साबुन, सर्फ सब तो हो गया। अभी फ्री गिफ्ट वाउचर के लिए 500 रुपये की शॉपिंग और करनी है। ये चिप्स और चॉकलेट और ट्वाएज डाल लेते हैं। कुछ खाने और कुछ गिफ्टस के काम आ जाएँगे।"

क्रेडिट स्कोर बढ़ता जा रहा था। सामने बाजार मुस्कुरा रहा था। ■

2. अन्तर्दृष्टि 

कला प्रदर्शनी में लगी अनगिनत चित्रों की भीड़ में वो चित्र बरबस ही अपना ध्यान खींच रहा था। चित्रकार की कल्पना के अनूठे भाव उस चित्र में दिख रहे थे। आसमान से गिरती हुई बूँदें  अपनी नियति के अनुसार अलग-अलग स्थान पर गिर रहीं थीं। कुछ चातक की प्यास बुझा रहीं थीं। कुछ धरती पर गिर उसे हरीतिमा प्रदान करने के उपक्रम में लगी थीं।प्र कृति के अनुपम रंगों की छटा उस चित्र में अलग ही खूबसूरती बिखेर रही थी; लेकिन अन्य चित्रों पर जहाँ भीड़ लगी हुई थी, यह चित्र अकेला। क्या एक भी दर्शक को इसकी कला समझ नहीं आई? सलौनी के कदम भीड़ से इतर उस चित्र की ओर मुड़ गए।

"वाह! अनुपम, अद्वितीय। प्रकृति के कितने रूप। और हर रूप अनूप।"

"जी शुक्रिया।" चित्रकार ने निर्विकार भाव से कहा।

"कलर स्कीम बहुत सटीक और सुंदर है। ऐसा लगता है- ये नदियाँ बह रही हैं। ये पंछी बस बोलने ही वाले हैं।" चित्रकार अभी भी शांत था।

"आपने बूँदों के संकेत से संगत के असर का बहुत सार्थक चित्र बनाया है।"

चित्रकार के अधरों पर स्मित ने अब  अपनी जगह बना ली। वो कुछ बोलता उससे पहले ही सलौनी बोल पड़ी।

"लेकिन आश्चर्य! इतने सार्थक और सुंदर चित्र पर एक भी दर्शक नहीं। जबकि हर जगह भीड़ ही भीड़ है। तुम पहली बार यहाँ आए हो क्या?"

"जी! मैं पहली बार ही आया हूँ। अभी नवोदित कलाकार हूँ।"

"तुम्हें अपनी कला की उपेक्षा देख बुरा नहीं लग रहा चित्रकार!"

"बिल्कुल नहीं! "चित्रकार के चेहरे पर अब भी वही चिरपरिचित स्मित खेल रही थी।

"ऐसा कैसे हो सकता है? यह तो ह्यूमन बिहेवियर है।"

" क्योंकि मेरे गुरु ने मुझे सच्चे प्रशंसक और प्रपंच का अर्थ भली-भाँति समझाकर ही मुझे इस जगत् की आँच में पकने के लिए छोड़़ा है। वे कहते हैं अगर तुम्हारी कला का एक ही सच्चा प्रशंसक हो, तो समझना तुम्हारी कला सार्थक हो गई।"

चित्र में बहती हुई बूँद सीपी के अंदर गिर पड़ी थी, जो मोती बनने की प्रक्रिया में थी। ■

सम्पर्कः बी-1/248, यमुना विहार, दिल्ली- 110053


कथाः अपना-पराया

 -  प्रिया देवांगन ‘प्रियू’

"अभी तक खेत से माँ-बाबूजी दोनों नहीं आए हैं। कम से कम माँ को तो आ ही जाना चाहिए । पता नहीं, इतनी बारिश में वे दोनों कहाँ होंगे।" घर से बार-बार निकल कर सुमन राधे और गौरी की राह ताक रही थी।

 शाम का समय था। घड़ी की सुइयाँ पाँच बजने का इशारा कर रही थी। चूँकि बारिश का मौसम था; सो घटाटोप अँधेरा छाने लगा था। तरह–तरह के कीट–पतंगों व झींगुर की आवाज सुमन के कानों को छू रही थी। सुमन बहुत डरी हुई थी आज। कई तरह की शंकाएँ सुमन को घेरती जा रही थी- "पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ था; पता नहीं आज अचानक क्या हो गया। वे दोनों खेत से जल्दी आ जाया करते थे।"

 सुमन के दिलो-दिमाग में बड़ा विचलन था। उसका किसी कार्य में मन ही नहीं लग रहा था। देखते ही देखते बादलों का गरजना शुरू हो गया। बिजली भी चमकने लगी। तभी उसे कुछ दिन पहले गाँव में हुई एक घटना याद आने लगी। वह सहम गई। खेतों में काम कर रही महिलाओं के ऊपर गाज जो गिर गई थी। सब ने दम तोड़ दिया था। बार–बार वह दृश्य आँखों के सामने झूल रहा था रहा था। अब तो सुमन की मन ही मन बात हो रही थी कि माँ–बाबू जी दोनों से मैंने कहा था कि जल्दी आना। फिर भी वे मेरी बातें नहीं सुनते। 

जैसे ही सुमन घर अंदर आई, बिजली चली गई। जैसे–तैसे उसने मोमबत्ती जलाई। घर में रोशनी हुई। मन थोड़ा शांत लगा। सुमन घबराने लगी थी- "हे प्रभु ! मेरे माँ–बाबू जी जल्दी घर आ जाए। मुझे बहुत घबराहट हो रही है। कहीं... कुछ...!" 

थोड़ी देर बाद सुमन को राधे की आवाज सुनाई दी- "सुमन ....! अरी ओ सुमन बिटिया ! जरा मोमबत्ती बाहर लाना तो; बहुत अँधेरा है।" सुमन के जान में जान आई। "जी बाबू जी...." कहते हुए बाहर निकली। सुमन की आँखें माँ को ढूँढ रही थी- "बाबू जी, माँ कहाँ है ? आप लोगों ने इतनी देर क्यों लगा दी आने में ? देखो न, बस बारिश होने ही वाली है; जल्दी आना था ना। क्या कर रहे थे आप लोग अभी तक ?"

 सुमन का तो आज सवाल पे सवाल हो रहा था। तभी पीछे से माँ की परछाई नजर आई। सुमन मुँह बनाते हुए बोली- "आप दोनों को तो मेरी बिल्कुल चिंता ही नहीं है।" तभी अचानक अपनी माँ गौरी को देखते ही सुमन की आँखें फटी की फटी रह गईं। उनकी गोद में एक छोटा- सा घायल बछड़ा था। 

सुमन चुपचाप घर के अंदर चली गई। सुमन का गुस्सा और भी तेज हो गया था। बोलने लगी कि इतनी रात हो गई; और आप लोग इस बछड़े को लाए। इसकी क्या जरूरत थी। मैं यहाँ परेशान हूँ। तरह–तरह के मन में ख्याल आ रहे हैं और आप लोग, बस !" 

 राधे और गौरी ने सुमन को शांत करते हुए पूरी घटना की जानकारी दी- "यह बछड़ा कुछ देर पहले ही जन्म लिया था और इसकी माँ उसे छोड़कर कहीं चली गई थी। बछड़ा हम्मा...हम्मा... कर रहा था। इसकी मदद करने वाला कोई नहीं दिखा। तेज बारिश भी हो रही थी। बेचारा भीग रहा था। हमें लगा कि बछड़ा बेसहारा है। आधी रात को भला कहाँ जाएगा ? यदि कभी कोई तुम्हें मदद माँगे, तो क्या तुम छोड़कर आ जाओगी सुमन ? मदद नहीं करोगी? अरे ये तो बेचारा बोल नहीं सकता, तो क्या हम इनकी भाषा भी ना समझें। हमें सब की मदद करनी चाहिए सुमन।" गौरी बोलती ही रही- "सुमन, तुम ही बताओ। अभी थोड़ी देर पहले तुम हम दोनों के बगैर कैसे तड़प रही थी ? जबकि तुम्हें तो पता ही है कि हम आएँगे ही; फिर भी?" अपने माँ और बाबू जी की बातें सुन सुमन ने अपनी ओर देखते उस मासूम बछड़े को गले से लगा लिया। राधे और गौरी सुमन व बछड़े दोनों को सहला रहे थे

सम्पर्कः राजिम, जिला – गरियाबंद , छत्तीसगढ़

Priyadewangan1997@gmail.com


स्वास्थ्यः दिल के लिए... बैठने से बेहतर है

  - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

पूर्व में प्रकाशित एक लेख व्यायाम दिमाग को जवान रख सकता है में हमने चर्चा की थी कि व्यायाम हमारे मस्तिष्क को युवा रखता है। उसमें यह भी बात हुई थी कि नियमित व्यायाम और उचित आहार मस्तिष्क को युवा रखने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं; ठीक उसी तरह जैसे कोई नई भाषा सीखने या कोई वाद्य यंत्र बजाना सीखने की प्रवृत्ति। 

हाल ही में युनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन के जे. एम. ब्लोडेट और उनके साथियों ने युरोपियन हार्ट जर्नल में एक अध्ययन प्रकाशित किया है जिसके अनुसार वयस्कों में मृत्यु का प्रमुख कारण हृदय और रक्त-परिसंचरण सम्बंधी रोग हैं। दुनिया भर के 15,000 से अधिक लोगों का अध्ययन करने के बाद उनका सुझाव है कि मध्यम से द्रुत गति की गतिविधि फायदेमंद होती है। इनमें दौड़ना, तेज़ी से सीढ़ियाँ चढ़ना और लगभग एक घंटे तक फुर्तीला व्यायाम करना जैसी साधारण गतिविधियाँ शामिल हैं। हममें से बहुत से लोग ऑफिस में काम के दौरान पूरा दिन अपनी मेज़ पर बैठे रहते हैं, और फिर घर पर टीवी देखते या लैपटॉप का उपयोग करते समय भी। इसलिए, हमारे हृदय और स्वास्थ्य में सुधार के लिए उपरोक्त आसान गतिविधियों के अलावा खेल या तैराकी करना भी उपयोगी होगा। इसके अलावा ‘कार्यात्मक भोजन' (जिनका उल्लेख पिछले लेख कार्यात्मक खाद्य पदार्थों के स्वास्थ्य लाभ में किया गया था) भी हमारे हृदय और स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।

अच्छी नींद

न्यूयॉर्क स्थित कोलंबिया युनिवर्सिटी के शोधकर्ता बताते हैं कि अच्छी नींद भी हमारे दिल के लिए अच्छी है। एकाग्रता, नया सीखने और याददाश्त जैसे संज्ञानात्मक कौशल को बरकरार रखने में नींद मदद करती है। वहीं उचटती (या अल्प या खराब) नींद अपेक्षाकृत मामूली तनावों से भी निपटना अधिक मुश्किल बना सकती है और दुनिया को सटीक रूप से समझने की हमारी क्षमता को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा, रोचेस्टर विश्वविद्यालय के शोधकर्ता बताते हैं कि नींद वयस्क मस्तिष्क से चयापचय सफाई को प्रेरित करती है; दूसरे शब्दों में, यह तंत्रिका-विष कचरे (जैसे बीटा-एमिलॉयड नामक प्लाक जो मस्तिष्क की विभिन्न कोशिकाओं के बीच संचार को बाधित करता है) को हटा देती है जो दिन भर की गहमा-गहमी के दौरान जमा हो जाते हैं।

हम वयस्कों को हर रात लगभग सात घंटे की नींद की ज़रूरत होती है। तो लाइट बंद कर दें, किताब पढ़ना बंद कर दें, टीवी बंद दें और अपने सेलफोन को साइलेंट मोड में रख दें, और विषाक्त पदार्थों की सफाई होने दें। और यदि हम सेवानिवृत्त लोग दोपहर के भोजन के बाद सोते हैं, तो हमें लगभग एक घंटे ही सोना चाहिए और फिर तेज़ चाल में सीढ़ियाँ चढ़ना चाहिए और एक या दो घंटे व्यायाम करना चाहिए। जो लोग खेल खेलते हैं वे शाम को भी ऐसा कर सकते हैं।

सोते समय, कौन-सी शारीरिक-स्थिति (मुद्रा) आपके लिए सबसे अच्छी है? इस बारे में स्लीप हेल्थ नामक वेबसाइट निम्नलिखित सलाह देती है। दाईं करवट सोएँ या बाईं करवट - यह आपकी सहूलियत पर निर्भर करता है। पीठ के बल सोने की बजाय करवट लेकर सोने से संभवत: दर्द से राहत मिल सकती है, खर्राटे भरने (और दूसरों की नींद में खलल डालने) का खतरा कम हो सकता है, और पीठ दर्द को कम करके रीढ़ की हड्डी के सीधे होने में सुधार हो सकता है। यह मस्तिष्क से कचरे (बीटा एमिलॉयड) को तेज़ी से हटाने में मदद करता है। किस करवट सोना है, यह आपकी मर्ज़ी है। लेकिन गर्दन के दर्द, जकड़न और सिरदर्द को कम करने के लिए अपनी बाँह का नहीं, बल्कि तकिये का उपयोग करें। गद्दे का उपयोग करना भी मददगार होता है। यह पीठ, गर्दन, रीढ़ और पैरों को पर्याप्त सहारा देता है। तो स्वस्थ नींद लें और अच्छे सपने देखें - सात घंटे! (स्रोत फीचर्स)


जीवन दर्शनः सुकरात से सीख उर्फ मैं से निजात

 - विजय जोशी   

- पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

  आदमी का धरती पर पदार्पण व्यक्तिगत रूप से होता है, किंतु उसके आने का प्रयोजन समष्टिगत होता है। और इसके लिए यह आवश्यक है कि वह अपना अहं त्यागकर हृदय में ईश्वर को समाहित कर उसकी रचना के प्रति अपना सार्थक सहयोग प्रदान करे। पर यह अपने अहं को तिरोहत किए बिना संभव ही नहीं। इसे ही अंग्रेजी में इगो (EGO) कहा गया है। इगो यानी एजिंग गॉड आउट (Edging God out) अर्थात् अहं प्रवेश करते ही ईश्वर विदा हो जाते हैं, क्योंकि हृदय में इन दोनों में से केवल एक का ही निवास संभव है।

    सुकरात समुद्र तट पर टहल रहे थे। तभी उनकी नजर एक रोते बच्चे पर पड़ी। वे उसके पास गए और प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरकर पूछा  : बालक तुम क्यों रो रहे हो।

     लड़के ने कहा : ये जो मेरे हाथ में प्याला है, मैं इसमें समुद्र को भरना चाहता हूँ। पर यह समुद्र मेरे प्याले में समा ही नहीं रहा। मैं कोशिश करते -करते हार गया हूँ।

     बच्चे की बात सुनकर सुकरात विस्मय में चले गए और स्वयं भी बच्चे के साथ ही साथ रोने लगे। अब पूछने की बारी बच्चे की थी। बच्चे ने कहा : आप भी मेरे ही तरह रोने लगे हैं। पर आपका प्याला कहाँ है।

     सुकरात ने जवाब दिया : बालक, तुम छोटे से प्याले में समुद्र भरना चाहते हो और मैं अपनी छोटी सी बुद्धि में सारे संसार की जानकारी भरना चाहता हूँ।  आज तुमने मुझे समझा दिया कि समुद्र प्याले में नहीं समा सकता है। मैं व्यर्थ ही इतने सालों से बैचेन रहा। 

    सुकरात की यह बात सुनकर बच्चे ने प्याले को दूर समुद्र में फेंक दिया और बोला : सागर अगर तुम मेरे प्याले में नहीं समा सकते तो मेरा प्याला तो तुम में समा ही सकता है।

    इतना सुनना मात्र था कि सुकरात खुद बच्चे के पैरों पर गिर पड़े और बोले : तुम्हारे कारण आज बहुत ही कीमती सूत्र मेरे हाथ लगा है। सुकरात ने आगे अपनी बात कहना जारी रखा और वह यह कि : 

हे परमात्मा आप तो सारा का सारा मुझ में नहीं समा सकते, लेकिन मैं तो सारा का सारा आप में लीन हो ही सकता हूँ। 

    ईश्वर की खोज में भटकते सुकरात को शायद यही संदेश ईश्वर स्वयं बालक के माध्यम से देना चाहते थे, सो खुद उस बालक में समा गए। सुकरात का सारा का सारा अभिमान ध्वस्त करवाया।

    जिस सुकरात को मिलने के लिए सम्राट समय की प्रतीक्षा में रहा करते थे आज वह सुकरात बच्चे के चरणों में लोट कर रो रहे थे।

    प्रसंग का आशय स्पष्ट है और वह यह कि ईश्वर जब आपको अपने शरण में लेता है तो आपके अंदर का ‘मैं’ सबसे पहले मिटाता है। या यों कहें कि जब आपके अंदर का ‘मैं’ मिटता है तो तभी आप पर ईश्वर की कृपा होती है। 

दंभ कबहुँ नहिं कीजिए दंभ पतन आधार

दंभ चढ़ा सिर रावणा प्रभु कीन्ह संहार

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,
 मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com