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Dec 2, 2022

कहानीः अनुगामिनी

 - डॉ.  बलराम अग्रवाल

पिछले दिनों अनायास ही मुझे जब शारीरिक थकावट महसूस होने लगी, भूख कम और प्यास अधिक लगने लगी तो नीलू चिन्तित हो उठी। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। पत्नी अगर ठेठ भारतीय हो तो उसे अपने स्वास्थ्य की कम, पति और बच्चों के स्वास्थ्य की चिन्ता अधिक सताती है। वह मुझे तुरन्त किसी डॉक्टर से सलाह लेने की बात कहने लगी। हिन्दुस्तान में सामान्यत: निजी प्रतिष्ठानों में नौकरी करते हुए शारीरिक और मानसिक शोषण कराते रहने को शापित लोगों की दास्तान के बारे में तो कहना ही क्या। सभी को उनका हाल मालूम है। असल तकलीफ तो उन लोगों को है जो सरकारी विभागों की नौकरी में रहते हुए भी निजी प्रतिष्ठानों के नौकरों-जैसा जीवन जी रहे हैं और किसी से शिकायत भी नहीं कर सकते। स्वयं मेरे कार्यालय का हाल यह है कि एक सुपरवाजर और चार लिपिक- कुल पाँच कर्मचारियों के सैंक्शन्ड स्टाफ के कामकाज को पिछले चार साल से लिपिक- स्तरीय केवल दो आदमी सम्हाल रहे हैं- एक मैं और दूसरे सुरेशजी। हम दोनों में से किसी एक का भी छुट्टी लेना तो दूर, काम में ढील बरतना भी तनाव को न्यौता दे डालने- जैसा होता है। न टाल पाने वाले अवसरों पर ही हम छुट्टी ले पाते हैं।

नीलू ने जब देखा कि उसके कहने का मुझ पर कोई असर नहीं हो रहा है तो रविवार की एक सुबह उसने स्वयं ही मुझे डॉक्टर के सामने जा उपस्थित किया और सारी परेशानियाँ उसे बता दीं।

"डायबिटिक हैं क्या?" डॉक्टर ने मुझसे पूछा।

"मालूम नहीं।" मैंने कहा।

"अभी कुछ खाकर आए हैं?" उसने पुन: पूछा।

"जी, बैड-टी लेने की आदत है मेरी।" मैंने बताया।

"कोई बात नहीं," अपने लेटर हेड पर कुछ लिखकर मुझे देते हुए उसने कहा, "ये कुछ टेस्ट कल सुबह आठ बजे बिना कुछ खाए-पिए क्लीनिक में आकर आपको कराने होंगे। रिपोर्ट कल शाम को मुझे मिल जाएगी। परसों सुबह आकर मुझसे मिलिए।"

"अगले हफ्ते करा लूँ?" मैंने डॉक्टर से पूछा।

"मैं तो यही कहूँगा कि रोग को पलने नहीं देना चाहिए।" डॉक्टर ने कहा, "बाकी, जैसी आपकी मर्जी।"

"कल क्यों नहीं?" यह सवाल डॉक्टर की बजाय वहीं बैठी नीलू ने मुझसे पूछा।

"सुबह आठ बजे ऑफिस के लिए नहीं निकला तो..."

"तो ठप हो जायगा ऑफिस?" उसने व्यंग्य भरे अंदाज़ में मुझसे पूछा।

"ऑफिस की नहीं, मुझे सुरेशजी की चिन्ता है।" मैंने कहा, "वह बेचारे..."

"कल लेट जाओ ऑफिस को, छुट्टी करो आधे दिन की या पूरे दिन की- मैं नहीं जानती।" डॉक्टर के सामने ही उसने निर्णायक फरमान जारी किया, "टेस्टिंग के लिए कल सुबह यहाँ आना है, बस।"

मेरी एक वरिष्ठ महिला- कुलीग मिसेज उषा गुप्ता कहा करती थीं- "शुक्लाजी, आयु- विशेष पर पहुँचकर ज्यादातर मर्द अपनी पत्नी के सामने पुत्र- समान जीवन व्यतीत करने लगते हैं। ...इस बात को आप यों भी कह सकते हैं कि समझदार पत्नियाँ आखिरकार पूरे घर की कमान अपने हाथों में थाम लेती हैं; पति ही नहीं, सास- ससुर की भी।"

यह अब से लगभग बीस वर्ष पहले की बात है। तब मैं तीसेक साल का रहा होऊँगा। उनकी बातें मुझे बड़ी अटपटी और बेहूदी लगती थीं। कोई स्वाभिमानी पति कैसे अपनी पत्नी के सामने बच्चा बनकर जी सकता है! लेकिन अब, एकाएक ही मुझे लगा कि उस महिला की बात सौ प्रतिशत अनुभवजन्य थी और मैं आयु के उसी दौर में प्रविष्ट हो चुका हूँ, जिसका जिक्र वह किया करती थीं।

नीलू की घुड़की का डॉक्टर के केबिन में ही प्रतिवाद प्रस्तुत करना मुझे उचित नहीं लगा, सो वहाँ से मैं बाहर निकल आया। क्या मुसीबत है!- क्लीनिक से बाहर निकलते हुए मैं नीलू को सुनाते हुए बुदबुदाया; लेकिन उसने मेरी बुदबुदाहट को अनसुना कर दिया। मुझे साथ लेकर वह घर आ गई।

सोमवार को अन्य दिनों की अपेक्षा वह जल्दी बिस्तर से उठ बैठी। मैंने रुटीन के मुताबिक ही अपनी आँखें खोलीं। घड़ी पर नजर डाली- सात बज रहे थे।

"चाय लाना जी..." मैंने रोजाना की तरह ही नीलू को हाँक लगाई।

"चाय- पानी जो कुछ भी लेना हो, टेस्टिंग के लिए ब्लड एंड यूरिन देने के बाद क्लीनिक की कैन्टीन में बैठकर लेना आज।" रसोईघर से उसकी आवाज आई तो मुझे डॉक्टर की सलाह पर नीलू द्वारा तय किया गया अपना आज का कार्यक्रम याद हो आया। मुझे लगा कि ऑफिस की सारी फाइलें भड़भड़ाकर मेरे सिर पर आ गिरी हैं और उन्होंने मेरा साँस लेना दूभर कर दिया है। अन्दर ही अन्दर मैं थरथरा-सा उठा।

"यार...बिना किसी पूर्व-सूचना के इस तरह लेट ऑफिस में पहुँचना या छुट्टी पर बैठ जाना नियम के अनुकूल नहीं है।" दबे स्वर में ही सही, नीलू के निर्णय का प्रतिवाद करता- सा मैं बोला, "ऐसा करता हूँ कि आज ऑफिस जाकर कल के लिए..."

"क्या कर लेंगे..." मेरी बात पर वह लगभग उग्र स्वर में वहीं से बोली, "एक दिन का वेतन काट लेंगे? काट लेने दो।"

"यार, बात वेतन की उतनी नहीं है जितनी कि सुरेशजी के अकेले रह जाने की है।" मैंने भावनात्मक पासा फेंका।

"सुरेशजी क्यों अकेले रहेंगे?" इस पासे को वापस मेरे मुँह पर मारते हुए उसने कहा, "आप क्लीनिक जा रहे हैं या बाघा बॉर्डर?"

"तुमसे बहस करने से कहीं अच्छा है कि आदमी दीवार में सिर मार ले दो- चार बार।" मैं झुँझलाया।


"दो-चार बार नहीं, दस बार।" मेरी इस बात पर वह रसोई से बाहर आकर बोली। इसके साथ ही रोजाना से कुछ बड़ा टिफिन कैरियर मेरे बैग में फँसाकर उसने मेज पर टिका दिया। बोली, "आधा घंटे से ज्यादा लेट नहीं होओगे ऑफिस के लिए, समझे! फिर भी, नमूने देने में अगर कुछ ज्यादा समय लग जाय और क्लीनिक की कैन्टीन में जाकर ब्रेकफास्ट लेने का समय न रहे तो ऑफिस के लिए निकल जाना सीधे। लंच के अलावा भी कुछ सामान रख दिया है, ऑफिस में जाकर खा लेना चाय के साथ।"

अन्य दिनों के मुकाबले पेंतालीस मिनट पहले टिफिन लगाकर सामने रख दिया था उसने। मैं एक अक्षर भी आगे न बोल सका। उसके दवाब के चलते उसी दिन क्लीनिक जाकर मैंने जाँच के लिए खून और पेशाब के नमूने दिये और लगभग सही समय पर ऑफिस जा पहुँचा। मैंने हालाँकि उसको यही उलाहना दिया कि उसकी नादानी की वजह से मैं नाहक ही एक घंटा देर से ऑफिस पहुँचा।

तीसरे दिन उसने मुझे पुन: डॉक्टर के सामने जा उपस्थित किया।

"आपको सेकेंड स्टेज डायबिटीज़ है मिस्टर शुक्ला," मेज पर रखे बहुत- से लिफाफों में से मेरे नाम वाले लिफाफे से निकालकर रिपोर्ट को पढ़ते हुए उसने कहा, "बट यू डोंट वरी। भीतर किडनी, लंग्स वगैरा सब ठीक- ठाक हैं, कुछ बिगड़ा नहीं है अभी। यह...एक गोली और एक कैप्सूल सुबह नाश्ते से दस- पन्द्रह मिनट पहले लेना शुरू कर दीजिए, बस।"

"इन दवाइयों के अलावा कुछ और...?" नीलू ने पूछा।

"कुछ नहीं," उसने कहा, "मीठी चीजें खाना एकदम बन्द। काउंटर से एक डाइट- चार्ट ले लेना। खाने का शिड्यूल उसके अनुसार रखने की कोशिश कीजिए। शुगर को कन्ट्रोल रखेंगे तो सब ठीक- ठाक चलता रहेगा, डोंट वरी। घूमने जाते हैं?"

"जी नहीं।" नीलू ने बताया।

"जाने लगिए मिस्टर शुक्ला।" उसका जवाब सुनकर डॉक्टर ने मुझसे कहा, "शुगर कन्ट्रोल रखने में बड़ी मदद मिलती है।"

ये सब बातें उसने क्योंकि नीलू की उपस्थिति में कही थीं;  इसलिए इनमें से किसी एक को भी उससे छिपा पाना मेरे लिए असम्भव था। तात्पर्य यह कि डॉक्टर की सलाह के अनुरूप उसी दिन से चीनी मेरी चाय से रफू-चक्कर हो गई। वस्तुत: तो चाय के नाम पर मुझे एक प्याला काढ़ा थमाया जाने लगा। दूसरे, उसने मुझे सुबह- शाम पार्क में भी भेजने का दवाब बनाना शुरू कर दिया।

"सच कह रहा हूँ... घूमने जाना मेरी प्रकृति में कभी नहीं रहा नीलू।" मैं उसके सामने कई बार गिड़गिड़ाया लेकिन बेकार। उसने मेरी एक न सुनी। एक रात सुबह पाँच बजे का अलार्म लगाकर सो गई। सुबह अलार्म बजते ही खुद उठ बैठी और मुझे झिंझोड़ती हुई बोली, "कपड़े पहनकर तैयार हो जाइए, घूमने चलना है।"

"क्या मुसीबत है यार, तुम तो पीछे ही पड़ जाती हो।" चादर को कुछ- और जकड़ते हुए मैं उस पर झुँझलाया। लेकिन उस झुँझलाहट का उस पर कोई असर नहीं पड़ा। उसने पुन: मुझे झिंझोड़ डाला। उनींदा-सा मैं तकिए को गोद में रखकर बिस्तर पर बैठ गया। आँखें खोलकर देखा तो घूमने जाने के लिए एकदम तैयार उसे सामने खड़ी पाकर बोला, "तुम भी साथ चलोगी तो नाश्ता कौन बनाएगा बच्चों के साथ रखने के लिए?"

"वह सब कल सोचना," उसने कहा, "आज रविवार है।"

हे भगवान! - मैं मन ही मन बुदबुदाया- इस औरत से बच पाना बेहद मुश्किल काम है। शौचादि से निपटकर मैंने कुल्ला किया और कुर्ता- पाजामा पहनकर मरे कदमों से उसके पीछे-पीछे हो लिया। बिल्कुल वैसा नजारा था जैसा किसी पिल्ले को जबरन घसीटने के समय बनता है। मेरे गले में पट्टा नहीं बँधा था, बस। पार्क तक जाना- आना और वहाँ घूमना कुल मिलाकर एक घंटे में निपट गया। सात बजे यानी कि रोजाना ही अपना बिस्तर छोड़ने के समय से भी दस- पन्द्रह मिनट पहले हम वापस घर में आ घुसे थे। अनिच्छापूर्वक घूमने जाने के कारण मेरा शरीर ऊपर से नीचे तक टूटता- सा महसूस हो रहा था। सो मैं जूते उतारकर सीधा बेडरूम में गया और बिस्तर पर पसर गया। सम्भवत: रविवार होने के कारण ही नीलू ने मुझे टोका या रोका नहीं। लेट जाने के बाद आठ बजे मेरी आँख खुली।

"आज तो चल गया," कुछ देर बाद ही काढ़े का कप ड्रेसिंग टेबल पर टिकाते हुए नीलू बोली, "कल ऑफिस भी जाना होगा इसलिए घूमकर आने के बाद का लेटना बन्द।"

"धीरे-धीरे सारी सुख-सुविधाएँ बन्द हो जानी हैं- ऐसा लगता है।" मैंने कहा।

"स्वास्थ्य को सही रखने के लिए जो- जो चीजें बन्द करनी जरूरी लगेंगी, वह की ही जाएँगी।" वह निर्णायक स्वर में बोली।

"ठीक है बाबा," काढ़े का कप टेबल से उठाते हुए मैंने मुस्कराते हुए गाया, "सुख भरे दिन बीते रे भैया, अब दुख आयो रे..."

"शाम का खाना खाने के बाद भी घूमने को चलना है, समझे!" मेरे दुख को कुछ-और बढ़ाती हुई वह बोली।

"चलना है माने?" मैंने पूछा, "शाम को भी मेरे साथ चलोगी?"

"अकेले नहीं निकलोगे घूमने को तो चलना ही पड़ेगा।" उसने कहा।

"मैं चला जाया करूँगा बाबा," मैंने अपने कंठ को चुटकी में भरकर उससे कहा, "कसम से।"

तात्पर्य यह कि घरेलू काम-काज और बच्चों को सँभालने की विवशता के चलते उसे मेरी बात पर विश्वास करना पड़ा। नीलू के साथ घूमते हुए पहले दिन ही मैंने इस विवशता से मुक्ति की जगह तय कर ली थी। पार्क के गेट से दूर वाले छोर पर एक पेड़ के नीचे सीमेंट की बनी एक बेंच रखी थी। अगली सुबह मैंने उसी पर जाकर बैठना और लेट जाना शुरू कर दिया। अपने मोबाइल में ठीक सात बजे सुबह का 'रिपीट अलार्म' सेट कर लिया था। वह बजता। मैं जागता; और तरोताजा मूड में घर वापस आ जाता। रविवार और राजपत्रित अवकाश के दिनों को छोड़कर, लम्बे समय तक मैं उस सुख को भोगता रहा। फिर एकाएक ही सुख के उन क्षणों पर वज्रपात हो गया।

हुआ यों कि किन्हीं प्रशासनिक कारणों से बच्चों के स्कूल दो दिन के लिए बन्द घोषित कर दिए गए। तीसरे दिन रविवार था। सो उनके स्कूल की तीन दिन की छुट्टी हो गई। नीलू ने उन तीनों दिन बच्चों को पार्क में घुमा ले आने का कार्यक्रम बना लिया। उसकी दृष्टि से देखा जाए, तो यह सब मुझे बताने की कोई जरूरत उसने नहीं समझी। पहले दिन- मैं अपने रुटीन के अनुरूप घर से निकला और पार्क की बेंच पर जा पसरा। मेरे जाने के पन्द्रह-बीस मिनट बाद ही- जैसाकि नीलू और बच्चों ने तीसरे यानी रविवार वाले दिन घर पहुँचने पर मुझे बताया- वे भी वहाँ जा पहुँचे। दौड़ लगाते हुए, पार्क में बच्चे पहले दाखिल हुए। घूमते-घामते, मुझे तलाशते, सबसे पहले उन्होंने ही मुझे बेंच पर सोया देखा। वे वापस मुड़े और इसकी शिकायत अपनी 'मॉम' से कर आए। उसने उनको समझाया कि वे अब उस बेंच की तरफ न जाएँ और 'डैड' को यानी कि मुझे इस बारे में जरा भी शक न होने दें कि हमें यह सब पता है। कमाल की बात यह रही कि दोनों बच्चे अपनी माँ के पक्के चमचे निकले। समर्पित माँएँ बिना प्रयास ही बच्चों को अपने अनुरूप ढाल लेती हैं- यह मैंने तभी जाना। उसके बताने से पहले उन बदमाशों ने तिलभर भी इस रहस्य से अपने परिचित होने की भनक मुझे नहीं लगने दी। मैं करीब सवा सात बजे घर पहुँचता था और वे तीनों मुझसे आधा घंटा पहले,

ठीक पौने सात बजे। उसके बाद ऑफिस के लिए मेरे निकलने तक घर का माहौल वे ऐसा बनाए रखते थे जैसे कि स्कूल जा चुके हों और घर में हों ही नहीं। इस नाटक का पर्दाफाश तीसरे दिन संयुक्त रूप से उन तीनों ने स्वयं ही किया। किया यह कि उस दिन पार्क में इधर-उधर खेलने न जाकर वे मेरी बेंच के आसपास ही घूमते रहे, किसी भी प्रकार का शोर किए बिना। ठीक सात बजे मेरे मोबाइल का अलार्म टिनटिनाया। मैं उठकर बैठ गया और आँखें खोलकर सामने जो देखा तो नीलू और बच्चों को घास में बैठकर आसन करते पाया।

"अरे, तुम लोग!" मैं अचकचाकर बच्चों से बोला, "स्कूल नहीं गए आज?"

"नहीं, स्कूल की मॉम ने आज छुट्टी करा दी।" चिंटू ने कहा।

मुझे लगा कि नीलू मुझे चेक करने की नीयत से ही पार्क में आई होगी बच्चों के साथ। सो अपने लेटे होने की सफाई देते हुए बोला, "घूमते-घूमते थोड़ा थक गया था इसलिए..."

"लो सुनो, हमने कुछ पूछा भी है?" मेरे बोलते ही नीलू ने दोनों बच्चों से कहा।

"आप तो गए डैड..." उसके यह कहते ही दोनों बच्चे एक साथ बोले, "मॉम इज़ द डॉन इन सच सरकमस्टान्सेज़, यू नो!"

"अरे यार..." मैं गिड़गिड़ाते स्वर में बोला, "मैं कभी झूठ बोलता हूँ क्या?"

"कभी नहीं, कभी नहीं।" दोनों बच्चे व्यंग्यपूर्वक होंठ बिचकाते, गरदन हिलाते हुए बोले।

"अच्छा, मजाक छोड़ो और घर चलो।" मैंने कहा, "सात से ऊपर बज चुके हैं। मुझे ऑफिस के लिए भी निकलना है।"

मेरी इस बात पर किसी ने कुछ नहीं कहा, सब के सब उठकर खड़े हो गए। वहाँ से चलकर हम घर आए। मैंने यथासम्भव अपने-आप को सामान्य बनाए रखा। घर पहुँचकर नीलू ने साबुन से हाथ-पैर धोए। रसोईघर में गई। अपने और बच्चों के लिए नाश्ता व मेरे लिए काढ़ा तैयार कर लाई और बोली, "कल से, पार्क में अपना मोबाइल साथ नहीं ले जाएँगे आप।"

उसका यह वाक्य सुनकर मेरे गले में चाय का फंदा लगते- लगते बचा।

"अरे यार," मैं स्वर को सामान्य रखते हुए बोला, "तुम विश्वास क्यों नहीं करती हो मेरी बातों पर।"

"उसका कारण तो अभी, इसी समय ये बच्चे आपको बता देंगे।" उसने भी सहज स्वर में ही कहा, "बहरहाल, कल सुबह से पार्क में अपना मोबाइल साथ नहीं ले जाएँगे आप।"

"उस एक घंटे के दौरान कहीं से कोई कॉल आ गई..." मैंने प्रतिवाद किया, "या घूमते-घूमते मुझे ही तुमसे...या तुम्हें मुझसे कुछ कहना पड़ गया तो?"

"कोई भी कॉल मिस नहीं होगी।" वह पूर्ववत बोली, "आपका मोबाइल हाथ में लेकर मैं पीछे-पीछे चला करूँगी आपके।"

"क्या!" यह शब्द कुछ इस तरह निकला कि मेरे मुँह में भरा सारा काढ़ा बाहर आ पड़ा।

सॉनेटः कादंबरी

  - प्रो. विनीत मोहन औदिच्य

शृंगों पर आच्छादित स्वर्णिम परतें  हृदय हुआ कुसुमित

उसकी चिट्ठी पर लगे सिंदूर- सा नभ हुआ आलोकित

सभी शब्द आए ओढ़कर व्यर्थ अभिमान की चादर

भूल गया मैं लिखना उत्तर जो नयनों में उभरा आदर।

 

उतर आया मैं संग पश्चिमी तट पर लिये  अनेक सितारे

किंतु लिख नहीं पाया मम प्रेयसी के स्वर भीगे इशारे

ये मौन शिलाएँ कह रहीं जैसे वो लिये हों सपने हजार

किंतु निशा भी तो गुफाओं में छुपी- सी लिए निद्रा अपार।


 स्वर्ण- मंडित शिखरों से यह प्रश्न करना है अकारण

अंबर का आँचल क्यों है मात्र उनके लिए आवरण

व्यथा की अपेक्षा शीतल पवन समेटे है  विस्फोटक चिंगारी

मैं नहीं, यह घना अंधकार ही कहेगा स्वयं की पीड़ाएँ सारी।


 चलो, कादंबरी!अलकों को समेटों नभ के गहरे नीलेपन से

मैं चन्द्रापीड तुम्हे क्षितिज तक ले चलूँ दूर अधूरेपन से।

सम्पर्कः सागर, मध्यप्रदेश, nand.nitya250@gmail.com

व्यंग्यः भोजन के लिए हेल्पलाइन नम्बर

 - गिरीश पंकज

उसे भूख लगी थी, जैसे सबको लगती है। पर उसके पास भोजन नहीं था। जैसे बहुतों के पास नहीं होता। वह परेशान होकर भोजन की तलाश में था, जैसे कोई पराजित नेता विजय की तलाश में रहता है। लेकिन विजयश्री उसकी हरकतों के कारण किसी दूसरे का वरण कर लेती है। खैर, तो वह भूखा बन्दा रोटी की तलाश में था। तभी किसी ने उसे पिछले दिनों शुरू की गई हेल्पलाइन-420 के बारे में बताया। इस नंबर पर डायल करो और अपनी भूख मिटा लो। सरकार की एकदम नई लेटेस्ट पहल है। आजकल सरकार अनेक तरह के हेल्प नंबर जारी कर रही है, जिसकी मदद से-ऐसा कहा जाता है कि-लोगों को हेल्प मिल जाती है। मिलती है या नहीं मिलती, यह शोध का विषय है। लेकिन हेल्पलाइन नंबर तो मौजूद रहता है। लोगबाग हेल्पलाइन नंबर डायल करके अकसर ख़ुद को हेल्पलेस ही महसूस करते हैं;  क्योंकि कोई ख़ास हेल्प तो मिलती नहीं। बस, नम्बर पर नम्बर डायल करते रहिए।

उस दिन एक गरीब बंदा भी इस चक्कर में फँस गया। वह गरीब तो था;  लेकिन समय के साथ चल रहा था, इसलिए उसके पास बहुत सस्ता मोबाइल फ़ोन था। (अब तो कुछ भिखारी तक मोबाइलधारी हो गए हैं। भीख माँग-माँगकर जब वे बोर हो जाते हैं, तो पता चला वीडियो गेम खेलते हैं। मगर यह सब छुप-छुपकर करते हैं। खुले आम तो उनके हाथ में कटोरा ही नज़र आता है;  लेकिन जब कभी वीडियो गेम खेलने का मूड होता है, तो चालाक भिखारी किसी दीवार की आड़ ले लेते हैं) । यह नया-नया गरीब था। उतना चालाक नहीं था। साधारण मोबाइल से काम चला रहा था। जब उसे पता चला कि हेल्पलाइन नंबर 420 पर फ़ोन करके मनचाहा खाना बुलाया जा सकता है और भूख मिटाई जा सकती है, तो उसने हेल्पलाइन का नंबर मिलाया। वहाँ से किसी कन्या की सुमधुर आवाज़ आई, "हेल्पलाइन नम्बर-420 में आपका स्वागत है। अँग्रेज़ी में बात करने के लिए एक दबाइए। हिन्दी में बात करने के लिए दो दबाएँ और अगर हमारी केवल परीक्षा लेने के लिए आए हैं, तो कुछ मत दबाइए।"

भूखे ने दो नंबर दबाया।

दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, "रोटी खाने के लिए एक नंबर दबाइए। पराठा खाने के लिए दो नंबर दबाइए।"

भूखे ने एक नंबर दबाया। उसे उत्तर मिला, "सूखी रोटी खाने के लिए एक नंबर दबाइए, घी चुपड़ी रोटी पाने के लिए दो नंबर दबाएँ। पूड़ी खाने का मन है, तो तीन नंबर दबाइए और अगर हमारा सर खाने का मन है, तो जीरो दबाइए।"

बंदे को लगा, कोई बेवजह फिरकी ले रहा है; इसलिए अंट-शंट निर्देश दे रहा है। उसे तो रोटी खानी थी, किसी का सर क्यों खाता। उसे तो सूखी रोटी खाने का अभ्यास था;  इसलिए उसने एक नंबर ही दबाया।

उधर से सुमधुर उत्तर मिला, "कड़क रोटी के लिए एक नंबर दबाइए, सामान्य रोटी के लिए दो नंबर दबाएँ।"

भूखे ने दो नंबर दबा दिया।

फिर वहाँ से वही सुमधुर आवाज़ आई, "दो रोटी पाने के लिए एक नंबर दबाइए। चार रोटी पाने के लिए दो नंबर दबाएँ।" बन्दे को जमकर भूख लगी थी। उसने दो नंबर दबा दिया।

फिर आवाज़ आई, "पंचतारा होटल वाली रोटी पाने के लिए एक दबाएँ, साधारण होटल की रोटी के लिए दो दबाएँ और ढाबे की तंदूरी रोटी के लिए तीन दबाएँ।"

भूखे ने सोचा पंचतारा होटल का बड़ा नाम सुना है; इसलिए उसने एक नम्बर दबा दिया।

उधर से आवाज़ आई, "अब अपना आधार नंबर यहाँ दर्ज करें।"

भूखे के पास आधार कार्ड तो था; लेकिन नंबर भरने में वह हड़बड़ा गया और एक अंक कम भर दिया। उधर से मैसेज आया, सॉरी आपका आधार नंबर ग़लत है। फिर से ट्राई करें।"

इतना बोलने के बाद कॉल डिस्कनेक्ट हो गई। भूखा परेशान। उसने एक बार फिर हेल्पलाइन नंबर को रिंग किया। काफ़ी देर बाद फिर वही रिकॉर्डेड आवाज़ आई, "हेल्पलाइन नंबर 420 में आपका स्वागत है। अँग्रेज़ी में बात करने के लिए एक नंबर दबाइए। हिन्दी में बात करने के लिए दो नंबर और केवल मनोरंजन करना हो तीन दबाएँ। भक्ति संगीत सुनना है तो चार दबाएँ। मौसम का हाल जानना हो तो पाँच दबाएँ।"

भूखे ने दो नंबर दबाया। उधर से आवाज़ आई "सब्जी पाने के लिए एक नंबर दबाइए, रोटी पाने के लिए दो नंबर। हलुआ और पूरी खाना हो, तो तीन नम्बर दबाएँ।"

भूखे की तो गोया लॉटरी निकल गई। उस ने सोचा, पता नहीं हलुआ पूरी मिले-न-मिले। रोटी का भी भरोसा नहीं। चलो, अब सब्जी ही बुलवा लेते हैं, इसलिए उसने एक नंबर दबा दिया। उधर से आवाज़ आई, "आलू की सब्जी पाने के लिए एक नंबर दिखाइए। बैंगन की सब्जी पाने के लिए दो नंबर दबाइए। भिंडी की सब्जी पाने के लिए तीन नंबर दबाइए और करेले की सब्जी पाने के लिए चार नंबर दबाइए। मिक्स वेजिटेबल के लिए पाँच दबाएँ।

भूखा सोचने लगा, करेले की सब्जी कड़वी होती है। वह ठीक नहीं रहेगी। भिंडी उसे पसंद नहीं है और बैंगन से भी उसे एलर्जी है, तो आलू की सब्जी ही ठीक रहेगी। मिक्स वेजिटेबल में अकसर बची-खुची सब्जी मिला दी जाती है इसलिए उसे बुलाना ठीक नहीं; इसलिए उसने एक नंबर दबा दिया। सदाबहार आलू की सब्जी। नम्बर दबाते ही फिर उधर से आवाज़ आई, "आलू की रसेदार सब्जी पाने के लिए एक नंबर दिखाइए। भुजिया सब्जी पाने के लिए दो नंबर दबाएँ।"

युवक परेशान हो गया सोचने लगा, नंबर पर नंबर दबाए जा रहा हूँ। पता नहीं सब्जी कब आएगी। सामने वाले ने मेरा पता तो पूछा ही नहीं। शायद अंत में पूछे। उस ने आलू की सब्जी के लिए दो नंबर दबा दिया।

उधर से आवाज़ आई "बिना मिर्च की सब्जी खाने के लिए एक नंबर दबाइए। मिर्च और प्याज वाली सब्जी के लिए दो नंबर दबाइए। युवक ने मुस्कराते हुए दो नम्बर दबा दिया। फिर उधर से सुमधुर आवाज़ आई," धन्यवाद, हम आपको आपकी मनचाही सब्जी भेजेंगे। कृपा अपना आधार नंबर डालिए और पता टाइप करें। "

युवक ने आधार नंबर सावधानी के साथ डाला। फिर वहाँ से आवाज़ आई, "अपना आधार नंबर ठीक से डालिए।"

भूखे ने एक बार फिर आधार नंबर चेक किया और ध्यान से डाला। दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, "कुछ तो गड़बड़ है। फिर ट्राई करें।"

भूखे ने फिर ट्राई किया तो इस बार आवाज़ आई, "धन्यवाद, हम आपके पते पर आलू की सब्जी भेज रहे हैं।"

भूखे ने सोचा, सब्जी तो आ रही है। चलो, एक बार फिर रोटी के लिए ट्राई करते हैं। उसने फिर हेल्पलाइन का नंबर डायल किया। इस बार कोई रिस्पांस नहीं आया। टूं... टूं ...टूं की आवाज़ आती रही। बार-बार वह नंबर डायल करता रहा, मगर उसे कोई रिस्पांस नहीं मिला। भूखे ने सोचा, चलो कोई बात नहीं, सब्जी खाकर ही भूख मिटा लेंगे, या इस बीच कहीं से रोटी का जुगाड़ भी कर लेंगे।

भूखा अब तक सब्जी का इंतज़ार कर रहा है। पता नहीं वह कब आएगी। न सब्जी आई और न दोबारा हेल्पलाइन का नंबर ही लगा। अब वह हेल्प लाइन नम्बर-420 दबाने से डरता है। भूख मिटाने के लिए कुछ भी आता-जाता नहीं, बस बातें बड़ी स्वादिष्ट होती हैं। भूखा बन्दा सोच रहा है, काश! मीठी-मीठी बातों से ही अपन का पेट भर जाता, तो क्या बात है।

 सम्पर्कः संपादक, सद्भावना दर्पण (मासिक ), जी-३१,  नया पंचशील नगर,, रायपुर. छत्तीसगढ़. 492001, मोबाइल : 09425212720

लघुकथाः इमीटेशन

- खलील जिब्रान (अनुवाद :सुकेश साहनी)

शरतकाल में मैंने अपने सभी दुखों को एकत्र कर अपने बगीचे में दफना दिया।

जब अप्रैल में वसन्त ने धरती को अपने आलिंगन में लिया तो मेरे बगीचे में दूसरे फूलों से अलग बहुत ही खूबसूरत फूल उग आए।

और तब मेरे पड़ोसी उन फूलों को देखने आए और मुझसे बोले, "अगले शरत में बुवाई के समय इन फूलों के बीज हमें भी देना ताकि हम भी इनसे अपने बगीचों की शोभा बढ़ा सकें। ●

लघुकथाः सोच

 - हरीश कुमार 'अमित'

 ‘‘मुझे समझ नहीं आता सीमा, तुम्हें साथवाले पड़ोसियों से इतनी जलन क्यों हैं? हमारे मुक़ाबले तो वे लोग ज़्यादा पैसेवाले भी नहीं हैं। सुख-सुविधा के बहुत-से साधन उनके पास नहीं हैं। अपनी ख़ुद की कार भी नहीं है उनके पास।’’ आख़िर एक दिन मैंने अपनी पत्नी से यह सब कह ही दिया।

‘‘इसी बात पर ही तो कुढ़न होती है मुझे. हमें कहीं जाना होता है तो हर बार वही हमारा ड्राइवर शामसिंह होता है; वही हमें सलाम करता है; और वही हम लोगों के लिए हमारी कार का दरवाज़ा खोलता है, लेकिन इन पड़ोसियों के तो मज़े हैं। कहीं जाना हो तो चाहें बस या मेट्रो से जाओ या फिर रिक्शा या ऑटोरिक्शा से। चाहो तो टैक्सी कर लो।’’ कितने मज़े हैं न इन लोगों के!

‘‘ओफ्फोह, तुम्हारी सोच भी कितनी अजीब-सी है। महीने में पंद्रह दिन तो होटल या रेस्तराँ से खाना आता है अपने घर। वैसे भी रसोई का सारा काम कमला बाई ही सँभालती है। इन बेचारों को देखो। कभी देखा है इन्हें बाहर से खाना मँगवाते? ख़ुद ही पकाते हैं सुबह-दोपहर-शाम।’’ मैंने समझाना चाहा सीमा को।

‘‘ख़ुद खाना बनाने का भी अपना ही आनंद होता है। और फिर जब मर्ज़ी बनाओ, जब मर्ज़ी खाओ। ख़ुद बनाया खाना होता भी कितना साफ़-सुथरा है।’’

‘‘सीमा, पता नहीं तुम कैसे ऊटपटाँग तरीके से सोचती हो!’’

‘‘तो ग़लत कहाँ सोचती हूँ? इतने ऐशोआराम के बावजूद इस ढलती उमर में हम दोनों अकेले ही इस घर में रह रहे हैं। दोनों बेटे शादी होते ही इसी शहर में हमसे अलग रहने लगे थे। साल में एकाध बार ही उनसे आमना-सामना होता है, मगर इन पड़ोसियों के दोनों बेटे तो शादी के बाद भी अपने माँ-बाप के साथ ही रहते हैं। हर रोज़ इन लोगों के हँसी-ठहाकों की आवाज़ें सुनाई देती हैं और हमारे घर में पूरे दिन मनहूस सन्नाटा छाया रहता है।’’

मुझे लगा सीमा की हर सोच ग़लत नहीं है।

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