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Apr 1, 2022

आधुनिक बोध कथा- 4ः गधे की कीमत

 - सूरज प्रकाश 

एक था कुम्हार। उसके पास थे बहुत सारे गधे। वैसे तो कुम्हार का अपना पुश्तैनी धंधा था; लेकिन बदलते बाज़ार के तेवर देखते- देखते उसने कई तरह के धंधे अपना लिये थे। इस वजह से उसका कारोबार भी बढ़ रहा था और गधों की संख्या भी। कभी वह अपने गधों को ढुलाई के कामों में लगा देता, कभी दूसरे जरूरतमंद लोगों को अपने गधे भाड़े पर दे देता। कई बार तो काम धंधे से वापिस आते हुए वह अपने चुनिंदा और मजबूत गधों पर अशक्त और बीमार सवारियाँ भी बिठा लेता। इस तरह से उसका काम बहुत अच्छे से चल रहा था। वह अक्सर गधे खरीदता और बेचता भी रहता। उसके अच्छे दिन आ गए थे।

अब हुआ यह कि इस बार मेले में उसने जो गधे खरीदे, उनमें से एक गधा अव्वल दर्जे का हरामी निकला। हट्टा-कट्टा था, देखने में भी अच्छा था; लेकिन काम करने में महा आलसी और बेईमान। वह गधा हर बार कोई ऐसी जुगत भिड़ाता कि अर्थ का अनर्थ हो जाता और कुम्हार का नुकसान होता सो अलग। कभी सवारी को गिरा देता, कभी किसी भले आदमी पर दुलत्ती चला देता।

एक बार तो उसने ग़ज़ब ही कर दिया। कुम्हार को नमक की ढुलाई का बहुत बड़ा ठेका मिला। सब गधों पर नमक लाद दिया गया और चल पड़े मंजिल की तरफ। रास्ते में पड़ती थी एक छोटी- सी नदी। बाकी गधे तो आराम से नदी पार कर गए; लेकिन वह गधा जान बूझकर नदी के बीच बैठ गया। नतीजा ये हुआ कि पानी में बहुत सा नमक घुल गया और गधे की पीठ पर रखा वज़न बहुत कम हो गया। कुम्हार समझ गया कि गधे ने चाल चलकर अपना बोझ कम कर लिया है। आखिर वह भी गधे का बाप था। उसने गधे को सबक सिखाने की सोची। अगली लदान में उसने बाकी गधों की पर तो नमक लदवाया लेकिन इस गधे पर थोड़ा कम नमक लादकर ढेर सारी रुई लदवा दी।

गधा अपनी मस्ती में चला। जब नदी आयी तो पहले की तरह पानी में बैठ गया। लेकिन यह क्या। नमक तो घुल गया; लेकिन भीगने से रुई का वज़न बहुत बढ़ गया। गधा भी समझ गया कि कुम्हार ने आखिर बदला ले लिया।

दिन बीतते रहे। न गधा अपनी हरकतों से बाज आया न कुम्हार ने उसे सज़ा देने में कोई कसर छोड़ी।

आखिर कुम्हार ने तय किया कि वह इस नामुराद गधे को अगले पशु मेले में बेच देगा। उसने गधे की कीमत पाँच हजार रुपये तय की। अब किस्मत की मार, सारा काम धंधा छोड़कर वह कई-कई बार उस गधे को बेचने के लिए अलग-अलग पशु मेलों में जाता रहा; लेकिन गधे का कोई ग्राहक नहीं मिलना था, नहीं मिला।

एक बार सब लोग बहुत हैरान हुए, जब उन्होंने देखा कि उस गधे के गले में पाँच हजार के प्राइस टैग के बजाये पच्चीस हजार रुपये का टैग लगा हुआ था।

सबने पूछा – रे कुम्हार, बावरा हुआ है क्या। जो गधा इतने दिन से पाँच हजार में नहीं बिक रहा था, उसे आज तू पच्चीस हजार में बेचने चला है। ऐसा क्या नया जुड़ गया है गधे में कि तू पाँच गुना कीमत पर बेच रहा है।

कुम्हार ने ठंडी सांस भरते हुए कहा - इस गधे ने तो मेरी जान सांसत में डाल रखी है। इसकी वजह से मेरा सारा धंधा चौपट हुआ जा रहा है। अब कल की ही बात लो। मैं आँगन में सोया हुआ था। वसूली करके लाया था। बीस हजार रुपये के कड़क नोट मेरे सिरहाने अँगोछे में बँधे रखे थे। मेरी आँख लग गई और ये नामुराद अँगोछे समेत सारे नोट खा गया। अब मैं वह बीस हजार भी तो इसी को बेच कर वसूल करूँगा।

डिस्‍क्‍लेमर: इस बार डिस्‍क्‍लेमर थोड़ा अलग है। एक देश है। वहाँ बहुत सारे बैंक हैं। इन बैंकों के जरिये (या मिलीभगत से) समूची अर्थव्यवस्था को चट कर जाने वाले कुछ शातिर लोग हैं। बैंक उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते या बिगाड़ना नहीं चाहते। फिर उन बैंकों में अपनी मेहनत की कमाई रखने वाले मामूली लोग हैं। उन्हें बैंकों के जरिये ही दिन में बीस बार लेनदेन करना पड़ता है। मजबूरी है; क्योंकि वह देश कैश रहित लेनदेन में विश्वास रखता है। उस देश में बैंक इसी बात का पूरा फायदा उठा रहे हैं। नोट चबा जाने वालों पर तो उनका बस चलता नहीं, गरीब आदमी की पीठ पर रुई लादकर उसकी जान निकाले दे रहे हैं। एक गधे पर बस नहीं चला, तो दूसरी गधी के कान उमेठ दिये।

9930991424, kathaakar@gmail.com

कविताः यूक्रेन युद्ध

 - बसन्त राघव

....क्या हो गया है

इस बदहवास भीड़ को!

क्यों भागे जा रहे हैं बेतहाशा

क्यों है इतनी बेचैनी

छोड़ने की ..अपने वतन को

....

सहमें हुए हैं

घायल रक्त रंजित वृद्ध, बच्चे, स्त्रियाँ

भागे जा रहे हैं, भागे जा रहे हैं

शरणार्थी शिविरों की ओर

....

आज सारा युक्रेन

तब्दील हो गया है

श्मशान में

जल रहा है धू -धू

....

एक आग सुलगने लगी है

लोगों के भीतर भी लहू खौल रहा है

युद्धोन्माद के खिलाफ

एक यक्ष प्रश्न तैर रहा है हवा में

क्या युद्ध के अलावा

और कोई रास्ता नहीं बचा है

समाधान का ...

...

हर क्षण भयावह और वीभत्स

जाने कब कौन, कहाँ शिकार हो जाये

निर्दय खूंखार गोलियों का

उड़ाये जा रहे हैं मिसाइलों से

इंसानियत के परखच्चे

शनैश्चर विचरण कर रहा है

मुँडेर - दर -मुँडेर

कहीं यह अतंर्दृष्टि की

घोर चूक तो नहीं

वोलोदिमीर जेलेंस्की

देखो तो कैसा मंजर है चारों ओर

या फिर तुम्हें दिखाई नहीं देता

कि क्या हो रहा है?

....

किसी को कुछ नजर नहीं आता

कोहरा बहुत घना है

तो जाएँ कहाँ,

हर मोड़ पर तो खतरा है

‘टैंक’  मुँह बाएँ खड़ा है

....

कदम -कदम पर है बिछा है

मौत का पहरा

रची जा रही मानवता की अग्नि समाधि

कर रहा अट्टहास राक्षसी दंभ

....

क्या घर, क्या बाहर,

क्या गली, क्या चौपाल

हर जगह, हर समय मँडरा रहा  काल

न जाने क्यों अब किसी पर

भरोसा नहीं होता

क्यों दिखाई नहीं देता

शांति की पहल करनेवाला

कोई मसीहा

....

कभी खारकीव, कभी खेरसाँन में

तो कभी चेर्निहाइव और मारियुपोल,

इरपिन और कभी कीव में

हर शहर, गाँव में

कभी दस-बीस तो कभी हजार

जानें जा रही हैं

तमाशबीन हो गई है सारी दुनिया

बर्बरता की पराकाष्ठा

लिख रही है कलंक कथा

स्कूलों, अस्पतालों, चर्चों तक में

....

रोको- रोको इस महाविनाश को

रोको और अधिक अशुभ होने से

रोको खंडित होने से मानवता को ,

विश्वबन्धुत्व को

....

अभी भी वक्त है चेतो,

बाज आओ ठहरो- ठहरो जरा

ओ सैन्य वीरों सोचो- सोचो जरा

ओ कर्णधारों आओ

महाविनाश के सभी हथियार

सिरा आएँ सागर में

मनुष्य हैं तो, मनुष्य बनकर रहें

सुंदर धरती को लहू से सींच कर

क्या कभी तुमने

किसी फूल को खिलते

देखा है?


सम्पर्कः पंचवटी नगर, मकान नं.30, बोईरदादर, कृषि फार्म रोड,

रायगढ़, छत्तीसगढ़, मो. 8319939396, basantsao52@gmail.com

फिल्मः इतिहास का तथ्यात्मक सत्यः ‘द कश्मीर फाइल्स’

इतिहास तथ्य, घटना और साक्ष्य के सत्य पर आधारित होता है। 32 साल पहले कश्मीर की धरती पर पंडित एवं अन्य हिंदुओं के साथ हत्या, अत्याचार और दुराचार की एक नहीं अनेक तथ्यात्मक घटनाएँ घटी थीं। नतीजतन चार से सात लाख लोगों को रातों-रात पलायन को विवश होना पड़ा था। उस समय सत्य का सामना करने से लोकतंत्र के चारों संवैधानिक स्तंभ आँख चुराते रहे थे। लिहाजा जो तथ्य और घटनाएँ घटीं, उनके जीवित और पीड़ित सैंकड़ों साक्षियों के साक्ष्यों के आधार पर जब एक फिल्म सामने आई है, तो उसे झुठलाने की कोशिश हो रही है। भारतीय इतिहास का यह दुर्भाग्यपूर्ण पहलू रहा है कि जब भी इतिहास से मुठभेड़ होती है, तो तथाकथित बुद्धिजीवी ठोस सच्चाइयों को या तो नकारते हैं या फिर सुधारने की बात करते हैं। अयोध्या के विवादित राम मंदिर के पुरातत्त्वीय उत्खनन से सामने आए साक्ष्यों को भी वामपंथी कथित बौद्धिकों ने कुछ इसी तर्ज पर नकारा था। इतिहास को झुठलाने में छद्म धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ जाने को भी मुद्दा बनाया जाता रहा है। इसी सिलसिले में जब जोधा-अकबर जैसी फिल्में बनती हैं, तो उन्हें सराहा जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ पर ठीक ही कहा है - ‘अभिव्यक्ति की आजादी के झंडे लेकर घूमते थे, वे पूरी तरह बौखला गए हैं। उसे वे फिल्म की तथ्य और कला के आधार पर समीक्षा करने की बजाय बदनाम करने में जुटे हैं। यह पूरा का पूरा इकोसिस्टम कोई सत्य उजागर करने का साहस करे, तो उसके साथ ऐसा ही करते हैं। ऐसे लोग इस सत्य को न तो समझने के लिए तैयार हैं और न ही यह चाहते है कि दुनिया इसे देखें।’ दरअसल इस फिल्म में इस्लामिेक आतंकवादियों द्वारा पंडितों पर किया गया क्रूर से क्रूरतम अत्याचार को हुबहू उसी रूप में दर्शाया गया है, जिस रूप में खूनी इबारत लिखकर घटना को अंजाम तक पहुँचाया गया था। इस संदर्भ में यह इतिहास के सत्य को वर्तमान रूप में फिल्माने वाली वास्तविक फिल्म है। चश्मदीद गवाहों के रूप में आज भी इन घटनाक्रमों के साक्षात्कार करने वाले लाखों पंडित शरणार्थी शिविरों में उन दिनों की याद करके दहशत में आकर रो पड़ते हैं।  

कश्मीर का अतीत खँगालने से पता चलता है कि कश्मीर का इकतरफा सांप्रदायिक चरित्र तब से गढ़ना शुरू हुआ, जब 32 साल पहले नेशनल कांफ्रेस के अध्यक्ष और तब के मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला के घर के सामने सितम्बर 1989 में भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष टीकालाल टपलू की हत्या हुई थी। अलगाववादी हड़ताल तथा उग्र प्रदर्शन से बाज नहीं आ रहे थे और मस्जिदों से हिंदुओं को औरतें छोड़कर, कश्मीर छोड़कर भाग जाने के माइक से ऐलान किए जा रहे थे। इसी आशय के पोस्टर उनके घरों के दरवाजों पर चिपका दिए गए थे। नतीजतन अल्पसंख्यक हिन्दुओं के सामूहिक पलायन का सिलसिला शुरू हो गया था। उस समय जम्मू-कश्मीर राज्य में कांग्रेस तथा नेशनल कांफ्रेंस गठबंधन की सरकार थी और खुद डॉ. फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे। इस बेकाबू हालत को नियंत्रित करने में राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने की बजाय 20 जनवरी 1990 को एकाएक डॉ. अब्दुल्ला कश्मीर को जलता छोड़ लंदन भाग खड़े हुए थे। इस समय केंद्र में वीपी सिंह प्रधानमंत्री थे और ग्रहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद थे; लेकिन कश्मीर के राज्यपाल जगमोहन द्वारा हालात से निपटने के लिए सेना की माँग करने के बावजूद सेना नहीं भेजी गई।

1990 में शुरू हुए पाक प्रायोजित आतंकवाद के चलते घाटी से कश्मीर के मूल सांस्कृतिक चरित्र के प्रतीक कश्मीरी पंडितों को बेदखल करने की यह सुनियोजित साजिश रची गई थी। इस्लामी कट्टरपंथियों का मूल मकसद घाटी को हिन्दुओं से विहीन कर देना था। इस मंशा को पूरा करने में वे सफल भी रहे। देखते-देखते वादी से हिन्दुओं का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो गया और वे अपने ही पुश्तैनी राज्य में शरणार्थी बना दिए गए। ऐसा हैरान कर देने वाला उदाहरण अन्य किसी देश में नहीं है। पूरे जम्मू-कश्मीर में करीब 45 लाख कश्मीरी अल्पसंख्यक हैं, जिनमें से 7 लाख से भी ज्यादा विस्थापन का दंश झेल रहे हैं।

            कश्मीर की महिला शासक कोटा रानी पर लिखे मदन मोहन शर्मा ‘शाही’ के प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास ‘कोटा रानी’ पर गौर करें, तो बिना किसी अतिरिक्त आहट के कश्मीर में शांति और सद्भाव का वातावरण था। प्राचीन काल में कश्मीर संस्कृत, सनातन धर्म और बौद्ध शिक्षा का उत्कृष्ठ केंद्र था। ‘नीलमत पुराण’ और कल्हण रचित ‘राजतरंगिनी’ में कश्मीर के उद्भव के भी किस्से हैं। कश्यप ऋषि ने इस सुंदर वादी की खोज कर मानव बसाहटों का सिलसिला शुरू किया था। कश्यप पुत्र नील इस प्रांत के पहले राजा थे। कश्मीर में यहीं से अनुशासित शासन व्यवस्था की बुनियाद पड़ी। 14 वीं सदी तक यहाँ शैव और बौद्ध मतों ने प्रभाव बनाए रखा। इस समय तक कश्मीर को काशी, नालंदा और पाटलिपुत्र के बाद विद्या व ज्ञान का प्रमुख केंद्र माना जाता था। कश्मीरी पंडितों में ऋषि परंपरा और सूफी संप्रदाय साथ-साथ परवान चढ़े; लेकिन यही वह समय था जब इस्लाम कश्मीर का प्रमुख धर्म बन गया।

सिंध पर सातवीं शताबदी में अरबियों ने हमला कर, उसे कब्जा लिया। सिंध के राजा दाहिर के पुत्र जयसिंह ने भागकर कश्मीर में शरण ली। तब यहाँ की शासिका रानी कोटा थीं। कोटा रानी के आत्म-बलिदान के बाद पर्शिया से आए इस्लाम के प्रचारक शाहमीर ने 14वीं शताब्दी में कश्मीर का राजकाज सँभाला। इस वंश के क्रूर शासकों को इस्लामिक कट्टरता का पाठ पढ़ाया जाता रहा। जिन सूफियों को साझा संस्कृति का वाहक माना गया था, वे वास्तव में छिपे रूप में इस्लाम के कट्टर व रूढ़िवादी पाठ पढ़ाकर मुस्लिमों को हिंदुओं के विरुद्ध खड़ा करते रहे। इन सूफियों ने केरल के मोपला में हिंदू नरसंहार में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सुल्तान सिकंदर बुतशिकन के कालखंड में यह अत्याचार और बढ़ गया। यहीं से जबरन धर्म परिवर्तन करते हुए कश्मीर का इस्लामीकरण शुरू हुआ और एक-एक कर मंदिर भी तोड़े जाने लगे। इन मंदिरों के जीर्णोद्धार और नए मंदिरों के निर्माण पर रोक लगा दी गई। जिस पर आज तक स्थायी विराम नहीं लगा है।

जरूरी नहीं कि इतिहास की लाचारियाँ, बाध्यताएँ और गलतियाँ किसी गतिशील समाज को स्थिर बनाए रखने का काम करें। यदि 32 साल में कोई ठोस तथ्यात्मक फिल्म कश्मीर समस्या पर नहीं बनाई गई, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वर्तमान या भविष्य में फिल्में बनाई ही न जाएँ। जिस देश का अतीत जितना प्राचीन होता है, उसे नए-नए संदर्भों में दोहराया जाता है। रामायण, महाभारत, सम्राट अशोक और चाणक्य पर आज भी फिल्म व टीवी सीरियल बन रहे हैं। अकबर, सिकंदर और पोरस, पद्मावती, कंगना रानौत की मर्णिकर्णिका-द क्वीन ऑफ झाँसी भी ऐतिहासिक घटनाओं पर बनाई गई नई फिल्में हैं। कश्मीर पर 2020 में शिकारा फिल्म भी बनी थी; लेकिन वास्तव में यह फिल्म पीड़ित कश्मीरी हिंदुओं के दर्द को दर्शाने की बजाय, उसकी आड़ में हरकत करती दिखाई दी थी। इसमें बताया गया था कि कश्मीर में आतंकवाद सरकारी दमन के कारण पैदा हुआ। नतीजतन इस फिल्म को देखने के बाद मजहबी जिहाद से आहत हिंदुओं ने खुद को छला हुआ अनुभव किया। कोई फिल्म परिणाममूलक हों, यह जरूरी नहीं; लेकिन यदि फिल्म इतिहास की छिपी हुई सच्चाई से अवगत कराती है तो यह ऐतिहासिक प्रमाण का बोध कराने वाली फिल्म है। कश्मीर का इतिहास और यह फिल्म इस बात का भी सबक है कि आखिर उदारमना हिंदू समाज उदार नीतियों और अंजान विदेशियों को शरण देने के चलते ही न केवल पिटा है, बल्कि अपनी राज्य सत्ता से विस्थापित भी हुआ है। इस लिहाज से इस फिल्म को इतिहास का दस्तावेज भी मान सकते हैं।  -प्रमोद भार्गव  


कहानीः फ़ैसला

 - प्रेम गुप्ता ‘मानी’

सुबह नींद जल्दी खुल गई नैना की...यही कोई सवा छह बजे। पर वह उठ नहीं पा रही थी, सिर में बहुत तेज़ दर्द था । लगता था जैसे सिर की सारी नसें चटक जाएँगी और उसके चटकने से पूरा चेहरा ही नहीं, बल्कि उसकी आत्मा भी लाल रंग से सराबोर हो जाएगी...और फिर ?

कितनी बार तो रेखा ने कहा है, “एक बार जाकर डॉक्टर से कम्पलीट चेकअप करवा लो, ये रोज़-रोज़ दर्द की गोली लेने से कोई फ़ायदा नहीं ।”

रेखा की बात को वह हँस कर टाल देती है । उसे कैसे बताए कि यह कोई बीमारी नहीं है । डॉक्टर को भी जाकर वह दिखा तो चुकी है, एक बार नहीं, बल्कि कई बार...। हर बार उनका एक ही जवाब होता है, “थोड़ा खुश रहा कीजिए। खाना-नाश्ता समय से खाइए और हलकी एक्सरसाइज किया कीजिए । परिवार के बीच ज़्यादा से ज़्यादा समय बिताने की कोशिश कीजिए । अरे भई, ये सब सिरदर्द वगैरह अक्सर टेंशन से उपजता है । ज़्यादा सोचा न कीजिए, रिलैक्स रहिए...।”

अब वह डॉक्टर के यहाँ नहीं जाती । सिर दर्द हो या बदन दर्द, एस्प्रिन की एक गोली दर्द कम कर ही देती है, पर मन का यह दर्द जो समय-समय पर उसके आत्मा तक उतर जाता है, उसका वह क्या करे ?

अपने हाथ से ही अपना सिर दबाते हुए उसने आसपास देखा, सुयश वहाँ नहीं था । बाथरूम से पानी गिरने की आवाज़ आ रही थी । अभी नहा कर निकलते ही चाय-नाश्ते की फ़रमाइश...। उसे वैसे भी उसके किसी दर्द से कोई लेना-देना नहीं था । उसे सिर्फ अपने आप से वास्ता था । समय से नाश्ता-खाना चाहिए और उसके बाद उसकी अपनी ज़िन्दगी...। नैना को कभी-कभी शक़ होता कि उसका पति इंसान है भी या नहीं...? आज इतवार है लेकिन सुयश की रूटीन में कोई फ़र्क नहीं...।

उसका ऑफिस दस बजे का है लेकिन चाय-नाश्ता करके वह आठ बजे ही घर से निकल जाता है। मैनेजर होने के नाते बढ़िया सा लंच ऑफिस में ही होता है । अक्सर ही वह ऑफिस के लंच और उसके बनाए खाने की तुलना करता रहता है, “शुक्र है भगवान का कि रोज़ तुम्हारे हाथों का सड़ा खाना मुझे नहीं खाना पड़ता ।”

वह तिलमिला कर रह जाती है । जानती है कि सुयश जानबूझकर उसका अपमान करता है...। दोस्तों के आने पर सुयश का लहजा कितना बदल जाता है । उसके दोस्त जब नैना की तारीफ़ करते हैं तब वह इस तरह मुस्कराता है, जैसे वह पत्नी के हाथ का खाकर एकदम तृप्त हो । सुयश की कुटिल मुस्कराहट को उसके सिवा कौन महसूस कर सकता है । सुयश अच्छी तरह जानता है कि नैना खाना बनाने में ही नहीं बल्कि घर सँवारने में भी बहुत माहिर है, पर...।

सिर दर्द के कारण उसकी हिम्मत पस्त हो रही थी, पर फिर भी उठना तो था ही । उठ कर उसने ब्रश करके दो बिस्किट के साथ एस्प्रिन की गोली ली और फिर चाय-नाश्ता बनाने के लिए रसोई में घुस गई । अभी उसने गैस पर चढ़ाई ही थी कि स्कूटर स्टार्ट होने की आवाज़ आई । वह ज़रा भी नहीं चौंकी । जानती थी कि सुयश कहाँ जा रहा है । रोकने का कोई फ़ायदा नहीं । एक बार कोशिश की थी । कीमती सामान की तोड़फोड़ के साथ चीख-चिल्लाहट से कलह भी काँप गया था...। मिसेज खरे ने उसके दो दिन बाद ही तो हँसकर कहा था, “क्या बात हो गई थी सुबह-सुबह...। सुयश भाई साहब इतना नाराज़ क्यों हो गए थे ? उनकी आवाज़ मेरे घर तक आ रही थी...मैं तो घबरा ही गई थी ।”

उसने भीतर तक अपने को अपमानित महसूस किया था और कोई अपराध न करने के बावजूद अपना मुँह मोहल्ले में छुपाती फिरी थी । दोबारा अपमानित न होना पड़े इसलिए उसने फिर कभी सुयश को रोकने की बात ही नहीं सोची । छुट्टी के दिन सुयश सात बजे सुबह ही घर से निकल जाता और फिर रात गए ही वापस आता ।

दो कप चाय वह बना ही चुकी थी कि तभी कॉल-बेल बजी । गैस धीमी करके उसने दरवाज़ा खोला तो देखा, सुमन थी । अन्दर आकर सुमन ने झाड़ू उठाया ही था कि उसने रोक दिया, “सुमन...पहले चाय पी लो, फिर सफ़ाई करना ।”

हाथ धोकर सुमन उसके पास ही आकर ज़मीन पर बैठ गई । उसने सुमन को चाय के साथ दो टोस्ट दे दिए और खुद भी लेकर बैठ गई । अभी उसने चाय का पहला घूँट ही भरा था कि सहसा सुमन के चेहरे पर निगाह पड़ते ही चौंक गई, “अरे सुमन...ये तुम्हारे चेहरे को क्या हुआ ? कितनी चोट लगी है, खून सब जमा हुआ है । आखिर यह चोट लगी कैसे? तुम्हारे आदमी ने कुछ किया क्या फिर से ?” उसे लगा जैसे वह सुमन से नहीं, खुद से सवाल कर रही है । न चाहते हुए भी उसकी आँखें भर आई ।

सुमन अपना दर्द भूलकर उसका हाथ सहलाने लगी, “आप दुखी क्यों होती हैं दीदी, यह तो मेरा रोज़ का किस्सा है । जब मरद को दूसरी औरत भाती है, तो अपनी औरत ज़हर लगती है...और ज़हर पीना किसको बर्दाश्त है ? आपको बताएँ दीदी, कल रात को मैंने भी उसे जमकर कूट दिया...। इसी मारपीट में चोट ज़रा ज़्यादा लग गई...।” कहते हुए सुमन हँसने लगी; पर वह नहीं हँस पाई, “अरे तुम हट जाती वहाँ से...मारपीट में खुद को भी घायल करने से क्या फायदा मिला?”

“अरे छोड़ो दीदी, क्यों परेशान होती हैं ? वैसे भी आपकी तबियत ठीक नहीं रहती ।”

तबियत के नाम पर उसे याद आया, सुमन का दर्द बाँटने में वह अपना दर्द तो भूल ही गई । सच में, किसी और से बात कर के मन कितना हल्का हो जाता है । सुमन करीब दस साल से उसके यहाँ काम कर रही है । उसका स्वभाव इतना अच्छा है कि दुःख-दर्द बाँटते समय वह कहीं से भी नौकरानी नहीं लगती, बल्कि उसे तो लगता है जैसे वह उसकी सहेली ही हो । कुछ न बताने पर भी वह उसका दर्द समझ लेती है । आज भी उसने कुछ नहीं कहा, पर सुमन फिर ताड़ गई, ज़बरदस्ती उसका सिर दबाने लगी, “दीदी, आप इतना परेशान रहती हैं न, इसलिए तो सिर में दर्द होता है । आखिर आपको कमी किस बात की है?”

अब वह सुमन को क्या बताए कि भौतिक रूप से उसके पास भले ही सब कुछ है, पर अन्दर से कुछ भी नहीं है । सुयश से शादी होने के बाद से ही उसकी ज़िन्दगी नरक से बदतर हो गई थी । पल भर का चैन भी खो गया । सुयश का चीखना-चिल्लाना तो तब भी बर्दाश्त हो जाता है, पर गिरा हुआ चरित्र...? सुयश की हरकतों के कारण कितनी बार दूसरों के सामने उसे शर्मिंदगी उठानी पड़ी है ।

सुमन के सिर दबाने के कारण उसे आराम मिला तो उसने अपनी आँखें बंद कर लीं । उसे सोया जानकर सुमन भी काम करने उठ गई । बर्तनों की खनक और झाड़ू-पोंछे की आवाज़ से वह अजीब-सा सकून महसूस कर रही थी । वह जानती थी कि साफ़-सफाई के बाद सुमन रसोई में घुसकर उसके लिए कुछ-न-कुछ बना लाएगी...और फिर उसे ज़बरदस्ती खिलाकर ही जाएगी । उसने अनायास मुस्कराने की कोशिश की पर मुस्करा नहीं पाई...बंद आँखों की कोटरों में पानी जो भर गया था ।

सुमन ने जिस सहजता से आज अपने आदमी को कूट दिया था, उस तरह उसकी भी इच्छा हुई कि वह भी सुयश को एक बार कूट ही दे । सुयश ने तो एक बार उसे पीटने की कोशिश भी की थी; लेकिन उस दिन जाने कैसे उसमें साहस आ गया था । उसने सुयश का हाथ ही मरोड़ दिया था, “ख़बरदार जो मुझे असहाय समझ कर मारने की कोशिश भी की... । तुम्हारी तोड़फोड़ और चीखना-चिल्लाना तो बर्दाश्त कर लेती हूँ, पर इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारी मार भी बर्दाश्त कर लूँगी... ।”

उस दिन पता नहीं क्या सोच कर सुयश रुक गया था, पर उसके बाद उसका घर से बाहर रहना और बढ़ गया था ।

सहसा उसकी तन्द्रा टूट गई । सामने सुमन खड़ी थी, “उठो दीदी, मुँह हाथ धोकर कुछ खा लो । मैं जानती हूँ, मेरे जाने के बाद बिना कुछ खाए-पिए तुम ऐसे ही पड़ी रहोगी... ।”

न चाहते हुए भी उसकी आँखें डबडबा गईं । एक बच्चे की तरह वह चुपचाप उठी और फिर मुँह-हाथ धोकर वापस आकर सोफ़े पर बैठ गई । सामने मेज पर अचार के साथ नमकीन पराठा और कॉफ़ी का मग रखा हुआ था । पराठे की ओर हाथ बढ़ाते वह रुक गई, “सुमन, तुम्हारा नाश्ता कहाँ है ? अपना ले आओ, तभी खाऊँगी, समझी...।”

सहसा सुमन खिलखिला कर हँस पड़ी, “अरे दीदी, अपना भी बनाया है...ला रही हूँ । अपने आदमी को कूटने के चक्कर में घर पर कुछ नहीं बनाया न ।” सुमन के साथ वह भी खिलखिला पड़ी। माहौल अचानक ही हल्का हो गया था और उसका सिर-दर्द न जाने कहाँ दुबक गया ।

सारा काम निपटा कर सुमन को गए बहुत देर हो गई थी । घर में उसके करने के लिए कुछ काम बचा ही नहीं था । सुमन सुबह ही आकर सब निपटा देती थी । कई बार उसकी तबियत ख़राब देखकर वह शाम की सब्ज़ी भी बना कर फ्रिज में रख जाती । वैसे भी सुमन बिना कहे इतना कुछ कर देती थी कि अक्सर उसके पास कुछ करने के लिए बचता ही नहीं था ।

बेटा तन्मय मुंबई में पत्नी और बच्चों के साथ खुश था । साल में जब कभी उसकी याद आती, तो मेहमान की तरह दो-चार दिन के लिए आ जाता । चाहती तो वह ही जाकर तन्मय के पास कई दिन रह सकती थी, पर वे सभी अपने-अपनी ज़िंदगी और व्यस्तताओं में कुछ इस कदर उलझे रहते हैं कि वहाँ रहने के दौरान भी उसे अक्सर अकेलापन महसूस होता है । इसी लिए वह तन्मय के बुलाने पर भी जाने से कतराने लगी थी । सुयश से तो तन्मय वैसे भी नाराज़ ही रहता है, सो उसे अपने पास बुलाने में उसे कभी कोई रुचि नहीं रही । सुयश भी जैसे भूल चुके हैं कि उसका अपना एक बेटा भी है, पर वह कैसे भूलती ?

कितना कष्ट सहकर उसे पाल-पोस कर बड़ा किया था...और वह बड़ा भी तो कितना हो गया था। खुद ही लड़की पसंद कर ब्याह कर लिया था, उसके लिए कुछ बोलने या नाराज़ होने की कोई कसर ही नहीं छोड़ी। नाराज़ होकर वह करती भी क्या ? उसके पास था ही क्या जो सपने पालती...।

सहसा वह चौंकी । यादों की गुफ़ा में वह इतनी दूर निकल गई थी कि नहाना ही भूल गई थी । उसने आलमारी से कपड़े निकाले और बाथरूम में घुस गई । सिर के ऊपर शॉवर से गिरता ठंडा पानी उसे राहत भी देता है तो कहीं-न-कहीं बेचैन भी करता है...। उसे लगता जैसे ज़ोरों की बारिश हो रही है, चारो तरफ अजीब सा कोलाहल है...। सड़कों पर भरा पानी कहीं-कहीं कीचड़ भी जमा रहा है...उसके ऊपर चलते हुए पैर फिसल रहे हैं और वह...?

दूसरों का वह नहीं जानती पर अपनी ज़िंदगी के रास्तों पर जमे कीचड़ में वह बार-बार फिसल ही तो रही है । समझ नहीं पाती कि इस कीचड़ को वह कैसे साफ़ करे ? कैसे वह सूखी और साफ़-सुथरी ज़मीन पर चले...किसका हाथ थामे...? भाई-बहन, रिश्तेदारों की अपनी दुनिया है और उन सबकी दुनिया में वह सेंध नहीं मारना चाहती...फिर...?

‘फिर’ पर आकर उसकी ज़िंदगी अटक जाती है । ठीक उस दिन की तरह जब कीचड़ भरी सड़क पर सुयश का दोस्त छदम फिसलकर किसी गाड़ी की चपेट में आकर दूसरी दुनिया में चला गया था और उसकी पत्नी गौरी अपने दो बच्चों के साथ अकेली पड़ गई थी । सास-ससुर थे नहीं, ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी...। मायके में सारी ज़िंदगी हाथ थमने को कोई तैयार नहीं था । छदम चूँकि बैंक में ही था , सो गौरी को बैंक में आया की नौकरी मिल गई । उसकी ज़िंदगी के कठिन रास्ते के सारे कंकड़-पत्थर चुनकर सुयश ने उसे आगे के लिए इतना आसान कर दिया कि गौरी को भी लगने लगा कि सुयश का हाथ थाम कर वह बाकी का रास्ता आसानी से पार कर लेगी ।

सुयश के वे दोस्त जो कभी घर आ चुके थे , उन्होंने उसे आगाह किया था पर वह जानती थी कि भटके हुए इंसान को रास्ते पर लाया जा सकता है; पर जिसका चरित्र ही घिनौना हो, उसे सुधारा नहीं जा सकता । सुयश की ज़िंदगी में गौरी न होती तो कोई और होती ।

सहसा उसे लगा, यादों की गुफा में कितना अँधेरा है, अगर उसने हाथ बढ़ा कर उजाला नहीं किया तो इस अँधेरे में घुट कर मर जाएगी।

शाम का झुटपुटा धीरे-धीरे नीचे झुकने लगा था । उसने हाथ बढ़ाकर स्विच-बोर्ड का बटन दबा दिया । कमरा हलकी रौशनी से नहा गया । उसने घड़ी पर निगाह डाली, उसकी सुई छह पर चहलकदमी कर रही थी । सुमन शाम की सब्जी बना कर फ्रिज में रख गई थी । सुयश अगर जल्दी आ गए, तो बस रोटी ही बनानी रहेगी, वरना वह कुछ हल्का-फुल्का ही खा लेगी ।

वह अँधेरी गुफा में दुबारा नहीं जाना चाहती थी । इसी से वह आराम की मुद्रा में सोफे पर अधलेटी हो गई । मेज पर कुछ मैगजीन और अखबार स्पर्श के इंतज़ार में थे । उसने उन पर एक निगाह डाली और फिर अखबार उठाकर पढ़ने लगी ।

अभी चंद लाइनें ही पढ़ी थीं कि दरवाज़े की घंटी बजी । उठकर दरवाज़ा खोला, तो सामने सुयश खड़े थे...हलके, बेचैन से...। कारण पूछते-पूछते वह रुक गई । सुयश कभी-कभार ही जल्दी घर आते थे । बिना किसी आश्चर्य के वह चुपचाप रसोई में चाय बनाने चली गई । अभी चाय में ठीक से उबाल भी नहीं आया था कि सुयश की आवाज़ ने उसे रोक दिया, “सुनो, चाय रहने दो, मैं पीकर आया हूँ । तुम बस आठ बजे तक मुझे खाना दे दो । मैं जल्दी सोऊँगा...सुबह की शताब्दी से दिल्ली जाना है, ऑफिस के काम से...।”

उसकी इच्छा हुई कि खुद भी सुयश के साथ दिल्ली जाने को कहे, पर अपनी इच्छा को उसने अपने भीतर ही दबा लिया । ऑफिस के काम से सुयश अक्सर कहीं-न-कहीं टूर पर जाता रहता था । एक बार जिद करके उसने भी साथ जाने को कह भर दिया था, उसके बाद घर में जो तूफ़ान मचा था कि पूरा घर तहस-नहस हो गया था । महीनों वह सकून से सो नहीं पाई थी। उसके बाद अपनी उस इच्छा का उसने खुद ही गला घोंट दिया था । शादी से पहले अपने पिताजी के साथ जितना घूम पाई थी, उसे ही अपनी यादों का हिस्सा मान लिया था । बाद में तो इस पिंजरे में इस तरह क़ैद होकर रह गई थी कि खुली हवा में साँस लेना ही भूल गई थी।

अपनी घुटती साँसों के साथ अँधेरे से जूझते कब सुबह की रौशनी उसके रूबरू आ गई, उसे पता ही नहीं चला। अहसास तो तब हुआ जब अपने आप ही चाय बनाकर पी चुके सुयश ने उसे आवाज़ दी, “दरवाज़ा बंद कर लो, मैं जा रहा हूँ ।”

“भाभी जी, एक बात कहूँ, बुरा न मानिएगा । वैसे तो यहाँ सब जानते हैं कि गौरी के कारण आपके जाने का कोई स्कोप नहीं, पर फिर भी...सुयश भाई साहब के साथ आप भी बाहर जाने की कोशिश किया कीजिए...।” पिछली बार सुयश के मुंबई जाने पर उसके सहकर्मी पाण्डे की बीवी ने उसका हालचाल पूछने के बहाने फोन पर कहा था, तो उसकी आवाज़ में सहानुभूति की बजाय एक आनंदित खनक को महसूस कर वह अन्दर तक तिलमिला गई थी। भीतर कहीं गहरे तक अपमान की एक टूटन भी चुभी थी, पर वह खामोश रह गई थी । जब अपना सोना खोटा तो परखइए का क्या दोष...।

दिन के उजाले के बावजूद अँधेरा उसे फिर अपनी गिरफ्त में लेता कि तभी उसने चाय की प्याली छान ली और उसे लेकर सोफे पर आकर बैठ गई । आज का अखबार मेज पर अभी अनछुआ ही पड़ा था । चाय की चुस्की लेते हुए उसने उसे खोला तो सामने ही एक विज्ञापन पर उसकी नज़र गई । शहर के मशहूर महिला डिग्री कॉलेज में हॉस्टल वार्डन और आया की ज़रूरत थी...।  तनख्वाह के अलावा रहना-खाना भी शामिल था ।

सुख की लहर उसे कहीं दूर ले जाती कि तभी दरवाज़े की घंटी ने उसे आवाज़ देकर रोक लिया । सुमन आ गई थी और वह उसे भी अपने साथ उस लहर में बहा ले जाना चाहती थी । चहकती- सी वह बहुत कुछ कहने को आतुर थी | हाथ धोकर सुमन एक कप और चाय के साथ नाश्ता भी ले आई, “क्या बात है दीदी, आज बहुत खुश दिख रही ?”

“एक बात बताओ सुमन, अगर कभी मेरे साथ कहीं रहने को मिले तो क्या तुम चलोगी ?”

“हाँ...क्यों नहीं दीदी...वैसे भी कौन मेरे लिए पीछे रोने को बैठा है...।”

सच ही तो कह रही थी सुमन...। एक तरह से देखा जाए तो यह उन दोनों का ही सच था । अपना कहने को न सुमन के पास घर था न उसके पास...। दोनों के ही बहू-बेटे के पास उनके लिए वक़्त नहीं था और पति नाम का जीव...?

सुयश एक हफ्ते के लिए बाहर गए थे, तब तक उसे भी कोई निर्णय ले लेना था । उसने दिए गए नम्बर पर संपर्क करके संक्षेप में अपने और सुमन के बारे में बताया तो उन्होंने उसे उसी दिन इंटरव्यू के लिए आने को बोल दिया । सुमन से वह कुछ कह पाती, उससे पहले ही उसने उसे रोक दिया, “मैं सब सुन रही थी दीदी...। तुम कुछ कहती नहीं तो क्या, मैं सब समझती हूँ । दिन भर बस सफ़ेद दीवारों से बातें करने से तो अच्छा है, अब अपने बारे में कुछ सोचा जाए...। दीदी, तुम जहाँ रहोगी, मैं वही तुम्हारे पास रह कर अपने दिन गुज़ार लूँगी...। कम-से-कम हम लोग खुश तो रहेंगे न...।”

उसकी आँखें पूरी तरह छलकती, उससे पहले ही वह बाथरूम में घुस गई, “सुमन, जब तक मैं नहा कर आती हूँ, तुम फटाफट काम निपटा लो...। मेरे पास एक साड़ी है, तुम भी यहीं तैयार हो लेना...। हम लोग को आज ही इंटरव्यू के लिए चलना है...।”

इस एक पल में उसने अपने साथ-साथ सुमन की ज़िंदगी के लिए भी एक सही फैसला ले लिया था...।

सम्पर्कः एम.आई.जी-292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना संख्या-एक, कल्याणपुर, कानपुर-208017 (उ.प्र), ईमेल: premgupta.mani.knpr@gmail.com, ब्लॉग: www.manikahashiya.blogspot.in. 

यात्रा संस्मरणः नेतरहाट- बाँस के जंगल या चीड़ वन

- रश्मि शर्मा
बचपन से सुना है नेतरहाट के बारे में। एक तो वहाँ का सूर्योदय और सूर्यास्‍त, दूसरा नेतरहाट वि‍द्यालय, जो अपनी शि‍क्षा के कारण बेहद प्रसि‍द्ध है। बि‍हार बोर्ड की परीक्षाओं में माना जाता था कि‍ प्रथम दस तक का स्‍थान नेतरहाट आवासीय वि‍द्यालय के बच्‍चे ही प्राप्‍त करते थे।

यह संयोग ही रहा कि‍ देश के अनेक जगहों में जाना हुआ; मगर अपने ही झारखंड के इस सुरम्‍य वादि‍यों में जा नहीं पाई। शायद मन में यह भाव था कि‍ यह तो अपने घर के पास ही है। जब चाहे जाया जा सकता है। हुआ भी ऐसा ही। आनन-फानन में नेतरहाट जाने की योजना बनी और 2 घंटे के अंदर परि‍वार के कुछ लोगों के साथ नि‍कल पड़ी।

रांची से नेतरहाट की दूरी करीब 155 कि‍लोमीटर है। यह क्षेत्र लातेहार जि‍ले में पड़ता है। कुड़ू के बाद लोहरदगा, फि‍र घाघरा से दाहि‍नी ओर मुड़ना पड़ा नेतरहाट के लि‍ए। रास्‍ता अच्‍छा और जाना पहचाना था, सो आराम से चल दि‍ए। घर से नि‍कलते ही दोपहर हो गई थी। समय बचाने के लि‍ए खाना घर ही से पैक कर नि‍कले थे। लोहरदगा के पहले एक जगह रास्‍ते में रुककर हमलोगों ने भोजन कि‍या और आगे नि‍कले।

गर्मी के दि‍न.. दोपहर की धूप मगर पूरे रास्‍ते हरि‍याली। आम से लदे पेड़ और नीचे बच्‍चों का जमावड़ा। कोई पत्‍थर चलाकर आम तोड़ रहा है,  तो कोई गुलेल से नि‍शाना साध पके आम जमीन पर गि‍रा रहा है। लड़कि‍याँ भी कम नहीं थी। खूब ढेला चलाती दि‍खीं। कुछ बच्‍चि‍यों ने अपने फ्राक में आम समेट रखे थे और कुछ तुरंत गि‍रे आमों का स्‍वाद ले रहे थे।

सच कहूँ..तो अपना बचपन याद आ गया। आम चुनने के चक्‍कर में कभी गर्मी का अहसास हुआ ही नहीं। सारी दोपहर आम के बगीचे में बीतता था। पूरे रास्‍ते इन पेड़ों और बच्‍चों को देखकर लगा कि‍ वाकई फलदार पेड़ लगाना परोपकार का कार्य है। मेरे जैसा कोई भी पथि‍क अपनी इच्‍छा पूरी कर सकता है अपने ही हाथों आम तोड़कर खाने की।

खैर ..इन्‍हीं नज़ारों के बीच झारखंड के सुंदर गाँवों को पार करते हम पहुँचे बनारी गाँव। इसके बाद सड़क ऊपर की तरफ जाने लगी। गोल-गोल चक्‍कर खाती सड़कें। ऐसा लगा कि‍ हम कि‍सी पहाड़ पर चढ़ रहे। पि‍छले वर्ष डलहौजी गए, तो ऐसा ही लगा था बि‍ल्‍कुल। नेतरहाट समुद्रतल से 3622 फीट की  ऊँचाई पर है। हम जरा आगे बढ़े तो सड़क कि‍नारे बंदर नजर आए, जैसा कि‍ हर पहाड़ी स्‍थल पर दि‍खता है।

चक्‍कर खाते ऊपर की ओर जा रहे थे। सड़क के दोनों तरफ बाँस का जंगल था। हमने पहली बार बाँस का जंगल देखा। अब जाकर नेतरहाट के नाम का अर्थ भी समझ आया। नेतरहाट नाम इस लि‍ए पड़ा कि‍ नेतुर का अर्थ (बाँस) होता है और हातु यानी‍ (हाट)। इन दोनों को मि‍लाकर बना नेतरहाट। बहरहाल, हम बाँस के जंगल के बीच से गुजर रहे थे। बीच-बीच में कचनार के पेड़ भी नज़र आ रहे थे। कचनार के फूल बेहद खूबसूरत होते हैं। यहाँ आदि‍वासी जनजीवन में कचनार के कोमल पत्‍ति‍यों का साग खाया जाता है। बहुत स्‍वादि‍ष्‍ट होता है यह साग। और फूलों की सुंदरता से तो सभी परि‍चि‍त ही हैं।

हम जंगल की सुंदरता नि‍हारते हुए आगे चलते गए। मन में डर भी था कि‍ कहीं सूर्यास्‍त रास्‍ते में ही न हो जाए। बीच जंगल में जाने की इच्‍छा होते हुए भी समय का ख्‍याल रखते हुए हम नहीं रुके। अब जंगल का दृश्‍य बदलने लगा था। बाँस का जंगल साल के ऊँचे लंबे पेड़ और चीड़ के दरख्‍तों के जंगल में बदल चुका था। हम खुशी और आश्‍चर्य से चीख ही पड़े....हमारे झारखंड में चीड़ के जंगल..हमें आजतक पता ही नहीं। दिये तले  अँधेरा इसीलि‍ए कहा जाता है। यहाँ ऊँचे यूकोलि‍प्‍टस( नीलगिरी) के पेड़ भी हमारा स्‍वागत कर रहे थे।

हम मुग्‍ध भाव से आसपास देखते आगे बढ़ चले। शाम 5 बजे हम नेतरहाट में थे। पूछने पर पता लगा कि‍ सनसेट प्‍वांट यहाँ से करीब दस कि‍लोमीटर की दूरी पर है। अब वक्‍त नहीं था कुछ देखने-सुनने का। हम सीधे पहुँचे सूर्य डूबने का नज़ारा देखने। रास्‍ते में एक खूबसूरत बड़ा- सा तालाब दि‍खा, जो कि‍सी झील की तरह लग रहा था।

जब हम सनसेट प्‍वांइट पहुँचे तो सूर्य अस्‍तचलगामी था। एक बछड़ा अपनी माँ का दूध पी रहा था। अवि‍ ने रुककर गौर से देखा। तस्‍वीर भी ली। आगे बढ़े तो लोगों की भीड़भाड़ थी। सरकार ने सौंदर्यीकरण करा दि‍या है। बैठने के लि‍ए शेड की व्‍यवस्‍था है, तो ऊपर से नज़ारा देखने का जगह भी। मतलब ऐसी जगह जहाँ शाम प्राकृति‍क नज़ारे देखकर बि‍ता सके।

जैसे ही बढ़े..सड़क पर भूरे रंग के फूल बि‍छे थे, जैसे हमारा स्‍वागत कर रहे हो। ऊपर नज़रें उठाकर देखा तो साल के पेड़ फूलों से लदे थे। ऊपर नीले आकाश में आधा चाँद दमक रहा था। पश्‍चि‍म में आकाश पीला था। दो तीन पहाड़ि‍याँ नजर आ रही थीं। मुझे डलहौजी की पहाड़ि‍याँ याद आईं। ऐसा ही खूबसूरत लगता था वहाँ भी। नेतरहाट पठार के नि‍कट की पहाड़ि‍याँ सात पाट कहलाती हैं। आँखों को ऐसा आभास हुआ कि‍ सातों पहाड़ दि‍ख रहे हैं सूरज की पीली रौशनी में चमकते हुए।

सखुआ के जंगल के बीच है यह स्‍थल। आसपास की मि‍ट्टी का रंग लाल था और बैरि‍केटिंग के बाद एक सुंदर स्‍त्री-पुरुष की प्रति‍मा भी थी। लड़की के हाथ में बास्‍केट और लड़के के हाथ में बाँसुरी। स्‍वभावि‍क है, जि‍ज्ञासा ठाठें मारने लगी कि‍ प्रति‍मा क्‍यों बनाई गई यहाँ।

पता चला,  लड़की का नाम मैग्‍नोलि‍या था। मैग्‍नोलि‍या एक अंग्रेज अधि‍कारी की बेटी थी। गाँव में एक चरवाहा रहता था। वह प्रति‍दि‍न अपने मवेशि‍यों को लेकर जंगल में एक स्‍थान पर जाता, जहाँ से खूबसूरत आसमान से देखते-देखते घाटि‍यों में छुपता था सूरज। वह बहुत मधुर बाँसुरी बजाता था।  मैग्‍नोलि‍या को इसी आदि‍वासी चरवाहे से प्‍यार हो गया। वह रोज चरवाहे की बाँसुरी सुनने के लि‍ए वहाँ जाती।

जब अंग्रेज अधि‍कारी को इसका पता लगा, तो बहुत नाराज़ हुआ। उसने चरवाहे को समझाने की कोशि‍श की। जब नहीं माना, तो उसने चरवाहे को मरवा दि‍या। मैग्‍नोलि‍या को जब इसका पता लगा, तब वि‍रह से व्‍याकुल होकर इसी स्‍थान पर आई और अपने घोड़े सहि‍त यहाँ से नीचे घाटी में कूदकर अपना जीवन समाप्‍त कर लि‍या। उसी की याद में बना है यह सनसेट प्‍वांइट, जि‍से नाम दि‍या गया ‘मैग्‍नोलि‍या प्‍वांइट’। आज भी वह पत्‍थर मौजूद है, जि‍स पर बैठकर वो चरवाहा बाँसुरी बजाया करता था। जाने कथा सच्‍ची है या गढ़ी हुई, मगर लोगों को आकर्षि‍त करती है।

अब लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। कुछ लोग हमारी तरह कैमरा हाथ में पकड़े पश्‍चि‍म की ओर टकटकी बाँधे बैठे थे। धूप से पत्तियाँ चमक रही थी। सखुआ के फूल जमीन पर थे और खुशबू हवाओं में। परि‍सर में एक चाय की दुकान थी। वहाँ लोगों की भीड़ लगी हुई थी। गरमागरम पकौड़ियाँ नि‍कल रही थी। लोग चाय-पकौड़ी के साथ शाम का आनंद ले रहे थे। सूखे पेड़ के ठीक बगल में सूर्यास्‍त का नजारा सबसे सुंदर लगेगा, इस अहसास के साथ मैं वहीं खड़ी रही।

शाम का रंग बदलने लगा था। सूरज के आसपास नारंगी रंग फैला था। एक के बाद एक पहाड़ दूर तक नज़र आ रहे थे। लोगों का ध्‍यान सब तरफ से हटकर सूरज की ओर था। आसमान साफ था, सो हम आराम से देख पा रहे थे कि‍ कैसे सूरज के आसपास लालि‍मा बढ़ती जा रही है और गहरे होते आसमान में सूरज बहुत खूबसूरत लगने लगा।

धीरे-धीरे सूरज डूब गया। अब हल्‍का उजाला ही बाकी था। लोग वापस  जाने लगे। पर अब हम वहाँ आराम से बैठे थे। चाय के साथ आलू की पकौड़ी बनवाई;  क्‍योंकि‍ दुकान में प्‍याज खत्‍म हो गई थी। आसपास एक दो घर थे। कुछ गाँववाले ही थे। पर्यटक सारे जा चुके थे।

आसमान में चाँद चमक रहा था। सखुआ के फूल चुनने लगे हमलोग। वादि‍याँ और मनमोहक लगने लगीं। शांत वातावरण में ऐसा लगा, जैसे कोई बाँसुरी बजा रहा हो। जरूर वह चरवाहा मधुर बाँसुरी बजाता होगा, जि‍सके आकर्षण में बंधकर मैग्‍नोलि‍या को प्‍यार हो गया होगा उससे। अद्भुत है जगह..जहाँ एक प्रेम कहानी जिंदा है। वहाँ चरवाहे और मैग्‍नोलि‍या के प्रेम की तस्‍वीरें उकेरी हुई हैं। उस घोड़े की भी प्रति‍मा है, जि‍सके साथ वह लड़की कूद गई थी घाटि‍यों में। एक प्रेम कहानी को मन में गुनते हुए वहाँ से वापस आए।

वन वि‍भाग के रेस्‍ट हाउस में ठहरना था हमे। रास्‍ते में प्रसि‍द्ध नेतरहाट वि‍द्यालय मि‍ला। कुछ देर वहाँ रुककर देखा। कैंपस के अंदर नहीं गए;  क्‍योंकि‍ शाम ढल गई थी। नेतरहाट वि‍द्यालय की स्‍थापना 15 नवंबर 1954 में हुई थी। 24 जुलाई 1953 को इस वि‍द्यालय की स्‍थापना का निर्णय लि‍या गया था। इसका श्रेय जाता है सर पि‍यर्स को, जि‍नके प्रयास से एक ऐसे आवासीय वि‍द्यालय की स्‍थापना हुई, जि‍सके छात्रों ने अनेकानेक क्षेत्रों में अपने नाम की कीर्ति फैलाई। भारतीय शि‍क्षा जगत में सर पि‍यर्स का अतुलनीय योगदान है। अंग्रेज होने पर भी उन्‍होंने भारत को अपनी कर्मभूमि‍ मान लि‍या था। नेतरहाट का चयन इसलि‍ए कि‍या गया ; क्‍योंकि‍ ग्रामीण परि‍वेश और वहाँ की जलवायु उत्तम थी।

 दरअसल इस तरह के आवासीय वि‍द्यालय की माँग तत्‍कालीन बि‍हार के धनी वर्ग की थी, जो अपने बच्‍चों को सिंधि‍या, दून आदि‍ दूर के स्‍कूलों में भेजने के बजाय पास ही कोई वैसा स्‍कूल चाहते थे, जि‍समें वैसी सुवि‍धाएँ हों।  वि‍द्यालय में शि‍क्षा का माध्‍यम हिंदी है और नामांकन परीक्षा के आधार पर होता है। हालाँकि‍ अब पहले सी उज्ज्वल छवि‍ नहीं, कई और स्‍कूलों का परीक्षाफल भी अच्‍छा होने लगा है पर एक वक्‍त था जब इसी वि‍द्यालय का डंका बजता था।

 इस सुरम्‍य स्‍थल को सामने लाने का श्रेय सर एडवर्ट गेट तत्‍कालीन लेफ्टि‍नेंट बंगाल, बि‍हार एवं उड़ीसा को  जाता है। उन्‍हें यहाँ की प्राकृति‍क सुंदरता से प्रेम था। उन्‍होंने ही अपने आवास राजभवन शैले हाउस का नि‍र्माण के  साथ-साथ अन्‍य बुनि‍यादी संरचनाएँ भी स्‍थापि‍त की। शैले लकड़ी की एक भव्‍य इमारत है। नेतरहाट वि‍द्यालय  के प्रथम सत्र के छात्रों इसी इमारत में पढ़ना शुरू किया था।

अब हम अपने पड़ाव की ओर अग्रसर थे। वन वि‍भाग के रेस्‍ट हाउस में जाकर आराम करना था। बहुत मोहक और खूबसूरत बना हुआ है रेस्‍ट हाउस। शाम की दूसरी चाय यहीं पी हमने और ढेर सारी बातें भी की। बच्‍चे बैडमिंटन खेलने में लग गए।  कुछ देर बाद जब चाँदनी रात में टहलने नि‍कले, तो चीड़ के दरख्‍त और यूकोलि‍प्‍टस की गगन छूते पेड़ देखकर हमें रोमांच हो आया। रातरानी की खूशबू से परि‍सर महक रहा था।

मगर यहाँ नेटवर्क की समस्‍या थी। न रि‍लाइंस का फोन कार्य कर रहा था, न जि‍यो न वोडाफोन। बस ऐयरटेल का एक नंबर चालू था। दूसरी दि‍क्‍कत यह कि‍ बहुत छोटी जगह है। खाने-पीने के सामान मि‍लने में भी परेशानी होती है। स्‍थानीय बाजार साप्‍ताहि‍क है, इसलि‍ए सब्‍जि‍यों की भी आमद कम है। होटल भी कम ही हैं और ऐसे दुकान भी, जहाँ से सामान लि‍या जा सके। हालाँकि‍ कुछ घर ऐसे नजर आए हमें, जिन्हें देखकर लगा कि‍ उन लोगों ने अपने घर को गेस्‍ट हाउस में तब्‍दील कर दि‍या है। यह देखकर वाकई बहुत दुख होता है कि‍ इतनी खूबसूरत जगह को सरकार तरीके से डेवलप करे, तो कि‍तने लोग आएँगे यहाँ। नेतरहाट को यूँ ही 'छोटानागपुर की रानी' नहीं कहा जाता। वाकई बहुत खूबसूरत वादि‍याँ हैं मगर उपेक्षा की शि‍कार।

हमारा खाना यहीं रेस्‍ट हाउस में बना। कुछ लोग जगह की तलाश में आए वहाँ, मगर बि‍ना बुकिंग के संभव नहीं था ठहरना। खाने के बाद सब लोग एक बार फि‍र टहलने नि‍कले। गर्मी कम थी। राँची का मौसम तो अब बहुत बदल गया है। बि‍ना एसी के काम नहीं चलता। मगर बाहर तो ठंडी हवा थी और रात कमरे में एक पंखे से काम चल गया। हमें सूर्योदय के लि‍ए सुबह उठना था , मगर सोने को कोई तैयार ही नहीं था। मुश्‍कि‍ल से दो-तीन घंटे की नींद ले पाए। सुबह चार बजे सारे लोग उठकर तैयार।

सूर्योदय के लि‍ए पता लगा कि‍ राज्‍य पर्यटन वि‍भाग का होटल है प्रभात वि‍हार होटल, वहीं जाना होगा। हम सब तुरंत वहाँ के लि‍ए नि‍कले। पहुँचे तो पता लगा कि‍ होटल और आसपास बन रहे बि‍ल्‍ड़ि‍ग के ऊपर चढ़कर लोग देखते हैं सूरज का नि‍कलना। महसूस हुआ कि‍ इससे कहीं बेहतर है अपने रेस्‍ट हाउस के उस प्‍वाइंट से देखना जो खास इसके लि‍ए बनाया गया है। वहाँ के कर्मचारी ने कहा भी था कि‍ यहाँ से बहुत अच्‍छा दि‍खता है, आप देख सकते हैं।

अब वापस रेस्‍ट हाउस। उजाला फैलना शुरू ही हुआ था। सूरज नि‍कलने में देर थी। बच्‍चे आनंद लेने लगे। सामने घना जंगल। परतों में पहाड़ दि‍ख रहा था। आसपास चीड़ के पेड़ थे। गुलमोहर के फूल ज़मीन पर गि‍रे थे। बच्‍चे चीड़ के फल जमा करने लगे तो कभी ट्री हाउस पर चढ़कर सूरज को आवाज लगाने लगे। पूरब की तरफ पहाड़ों के ऊपर, चीड़ की पत्तियों के पीछे से सूरज नि‍कलने लगा। हल्‍की धुंध के पीछे से नि‍कलता सूरज सबको रोमांचि‍त कर रहा था। वैसे भी शहरों में लोग कहाँ देख पाते हैं सूर्योदय। सूरज की पहली कि‍रण का स्‍पर्श कि‍तना सुखकर हो सकता है..यह देर से बि‍स्‍तर छोड़ने वालों को क्‍या पता।

कुछ देर बात सूर्य की रश्‍मि‍याँ फैल गईं सब ओर। हम भी बि‍खर गए अपनी-अपनी पसंद की जगह देखने के लि‍ए। फोटोग्राफी के लि‍ए सबसे अच्‍छा वक्‍त होता है सुबह का।

 मैं कैमरा लि‍ए नि‍कल गई वहीं। देखा, दूर जंगल में लोग पानी की बोतल थामे चले जा रहे है। अब लोटे का रि‍वाज खत्‍म हुआ न.....सरकार का नारा अभी हर जगह स्‍वीकार्य नहीं। शायद वो ‘सोच नहीं सो शौचालय भी नहीं’। नजरें घुमाकर देखा.. फूलों का रंग और चटख था। यूकोलि‍प्‍टस के सफेद , चि‍कने तने और गगनचुंबी डालि‍यों ने हैरत में डाला हमें। बेगनबोलि‍या की सफेद, गुलाबी फूल मन मोह रहे थे तो तरह-तरह के फूलों से जमीन पटी हुई थी। पेड़ से गि‍रे भूरे पत्ते और पेड़ों पर लगे हरे पत्‍ते मि‍लकर अद्भुत दृश्‍य बना रहे थे। हमने खूब तस्‍वीरें ली।

सूरज की गर्मी महसूस होने लगी। हमें वापस जाना था आज ही ; क्‍योंकि‍ अचानक प्‍लान बना कर आए थे। गर्मी देखकर ये लगा कि‍ दि‍न में कहीं घूमना संभव नहीं होगा। इसलि‍ए बेहतर है एक बार और घूमने के लि‍ए जाड़ों में आए जाए। यहाँ आसपास कई फॉल है। ऊपरी घाघरा झरना नेतरहाट से चार कि‍लोमीटर की दूरी पर है और नि‍चली घाघरा झरना 10 कि‍लोमीटर की दूरी पर। हालाँकि‍ पता चला कि‍ गर्मी के कारण पानी कम है अभी, इसलि‍ए जाने का कोई फायदा नहीं।

हमारा मन लोध झरना जाने का ज़रूर था। इसे झारखंड का सबसे ऊँचा झरना माना जाता है। कहते हैं कि‍ झरने के गि‍रने की आवाज आस-पास 10 कि‍लोमीटर तक सुनाई पड़ता है। यह नेतरहाट से 60 कि‍लोमीटर की दूरी पर बुरहा नदी के पास है।  मगर सभी लोग जाने के लि‍ए तैयार नहीं हुए। सुबह के चार बजे उठने की आदत नहीं कि‍सी की सो सब अलसाए लगे। हमने तय कि‍या कि‍ कुछ दि‍नों बाद फि‍र आएँगे यहाँ।

हमने सामान समेटा और नि‍कल गए। थोड़ी दूर पर नाशपाती का बाग मि‍ला। फल लदे थे, मगर कच्‍चे थे अभी। अब वापसी में वही सब नज़ारा। घने दरख्‍त, कोईनार या कचनार के पेड़..चीड़ के ऊँचे पेड़ और बाँस के घने जंगल से आती सरसराहट की आवाज। रास्‍ते में नदी मि‍ली जि‍सका पानी कम था।

हाँ, इस वक्‍त आम के पेड़ के नीचे बच्‍चे कम थे मगर सड़कों पर लकड़ी ले जाते कई लोग मि‍ले, खासकर औरतें। सड़क पर जगह-जगह कुछ सूखने के लि‍ए कटहल के बीज पड़े थे। जब कटहल पक जाते हैं तो उनके बीज नि‍कालकर सब्‍जी बनाई जाती है।

मैंने अक्‍सर देखा है-गाँव में पक्‍की सड़क पर कभी धान सूखने डाला होता है तो कभी महुआ। आज कटहल के बीज देखे, वो भी बहुत सारे। धूप सर पर थी। सड़कों में सन्‍नाटा। बच्‍चे सो गए थे। हमें भी नींद आ रही थी। लगभग चार घंटे का सफ़र था और उसके बाद हम अपने घर में। जल्‍दी ही दोबारा आने के वादे के साथ।

सम्पर्कः रमा नर्सिंग होम, मेन रोड, राँची, झारखंड- 834001, मो. 9204055686, email- ashmiarashmi@gmail.com