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Jan 15, 2020

कालजयी लघुकथा


राष्ट्र का सेवक
-प्रेमचंद
राष्ट्र के सेवक ने कहा - देश की मुक्ति का एक ही उपाय है और वह है नीचों के साथ भाईचारे का सलूक, पतितों के साथ बराबरी का बर्ताव। दुनिया में सभी भाई हैं, कोई नीच नहीं, कोई ऊँच नहीं।
दुनिया ने जय-जयकार की - कितनी विशाल दृष्टि है, कितना भावुक हृदय!
उसकी सुंदर लड़की इंदिरा ने सुना और चिंता के सागर में डूब गई।
राष्ट्र के सेवक ने नीची जाति के नौजवान को गले लगाया।
दुनिया ने कहा - यह फरिश्ता है, पैगंबर है, राष्ट्र की नैया का खेवैया है।
इंदिरा ने देखा और उसका चेहरा चमकने लगा।
राष्ट्र का सेवक नीची जाति के नौजवान को मंदिर में ले गया, देवता के दर्शन कराए और कहा - हमारा देवता गरीबी में है, जिल्लत में है, पस्ती में है।
दुनिया ने कहा - कैसे शुद्ध अंतःकरण का आदमी है! कैसा ज्ञानी!
इंदिरा ने देखा और मुसकराई।
इंदिरा राष्ट्र के सेवक के पास जाकर बोली - श्रद्धेय पिताजी, मैं मोहन से ब्याह करना चाहती हूँ।
राष्ट्र के सेवक ने प्यार की नजरों से देखकर पूछा - मोहन कौन है?
इंदिरा ने उत्साह भरे स्वर में कहा - मोहन वही नौजवान है, जिसे आपने गले लगाया, जिसे आप मंदिर में ले गए, जो सच्चा, बहादुर और नेक है।
राष्ट्र के सेवक ने प्रलय की आँखों से उसकी ओर देखा और मुँह फेर लिया।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर की क्षणिकाएँ

रवीन्द्रनाथ ठाकुर की क्षणिकाएँ
(अंग्रेजी से हिन्दी में काव्य-रूपान्तर: डॉ. कुँवर दिनेश सिंह)
1
तुम्हारी कौन सी भाषा है, ओ सागर?’
सतत प्रश्न की भाषा।’
तुम्हारे उत्तर की कौन सी भाषा है, ओ गगन?’
सतत मौन की भाषा।’
-0-
हम सरसराते पत्तों की आवाज
तूफानों को जवाब देती है,
पर तुम कौन हो - इतने खामोश?’
मैं तो सिर्फ एक फूल हूँ।’
-0-

जल में मछली खामोश है,
धरा पर जानवरों का शोर है,
हवा में पंछी गा रहा है।
लेकिन मानव के अन्तर में
समुद्र की खामोशी है,
धरा का शोर है, और
हवा का संगीत है।
-0-
मेरा दिन बीत गया है,
और मैं हूँ किनारे पर पहुँची हुई
किश्ती की तरह,
सन्ध्या-समय सुन रहा हूँ
लहरों के नर्तन-संगीत को।
-0-
कवि-पवन निकल पड़ा है
समुद्र में
और वन में
अपने निजी स्वर की तलाश में।
-0-
मृत्यु में अनेक हो जाते हैं एक,
जीवन में एक बन जाता है अनेक।
उस दिन धर्म एक हो जाएगा -
जिस दिन ईश्वर मृत हो जाएगा।
-0-
ए फल, तुम मुझसे कितना दूर हो?’
ए फूल, मैं तो छिपा हूँ तुम्हारे ही हृदय में।’
-0-
चाँद में तुम भेजते हो प्रेम-पत्र मुझे,’
कहा रात ने सूर्य से।
मैं घास पर आँसुओं में
भेजती हूँ जवाब अपने।’
-0-
सम्भव ने असम्भव से पूछा,
तुम्हारा घर कहाँ है?’
जवाब मिला
नपुंसक के स्वप्नों में।’
-0-
बारिश की बूँद ने
चमेली के कान में कहा,
मुझे हमेशा अपने दिल में रखना।’
चमेली बोली ‘आह’, और
गिर पड़ी ज़मीन पर।
-0-
डॉ. कुँवर दिनेश सिंह की कुछ मौलिक क्षणिकाएँ
छाया-युद्ध
चाहता तो हूँ
अन्धकार को जीतना
मैं प्रयास करता हूँ
प्रकाश से
आगे बढ़ने का
किन्तु मैं यह जाता हूँ
बनकर
सिर्फ एक छाया ----
-0--

बरसाती नाला
मत सोचो सैलाब लाऊँगा
मैं तो हूँ
एक बरसाती नाला
उतर आया हूँ
सड़क पर,
मैं चला जाऊँगा
बारिश थम जाने पर ----
-0-
नज़रबट्टू
गुलाबों के साथ काँटे
और चंदन के साथ भुजंग
नहीं करते भंग
उनकी मर्यादा को, शान को,
मगर बचाते हैं
बुरी नज़र से उनको ....
-0-

नदी की मजबूरी
मैंने माँगी शरण
नदी से,
किंतु वह बहती रही
बेपरवाह, बेरुख सी,
मैं नहीं जानता था
नदी स्वयं
ढूँढ रही थी कोई
शरण ...
-0-
भँवर का रास्ता
शुरू होता है
मेरे हृदय से
और जाता है
उसके हृदय तक
और बचने का कोई रास्ता
मुझे सूझता ही नहीं
-0-

नए साल का संकल्प!!


नए साल का संकल्प!!  
- गिरीश पंकज 
 उसने इस बार भी मुझसे कहा था कि नए साल पर कुछ करके दिखाऊँगा। मैंने उसे गंभीरता से नहीं लिया; क्योकि पिछले साल भी उसने वादा किया था कि अगले साल कुछ करके दिखाऊँगा; लेकिन कुछ ख़ास नहीं किया। मतलब वो पक्का झूठा निकला। कुछ लोग हमारे यहाँ यही करते हैं।  जो कहते हैं, वो करते कहाँ हैं? मैं सोचने लगा, कहीं ये लड़का बर्बादी की राह पर तो नहीं चल पड़ाइतनी उम्र हो गई है। कुछ तो करे।
युवक के वादे को मैं भूल चुका  था, मगर उस दिन नये साल के पहले दिन ही बंदा बाजार में मिल गया। उसने विचित्र हुलिया बना रखा था। उसने मैली-कुचैली किस्म की जींस की फुलपैंट पहन रखी थी, जो बुरी तरह फटी हुई थी. सामने से लगभग तार-तार।  टी-शर्ट का रंग भी मैला-कुचला किस्म का था। बंदे ने दाढ़ी भी बढ़ाई हुई थी।  बाल भी लड़कियों की तरह लम्बे कर रखे थे।
 मैं चिंतित हो गया. पूछा, ''अरे-अरेतुमने ये क्या हाल बना रखा है? फुलपैंट की माली हालत इतनी खराब? क्या हुआ, दिवाला पिट गया है क्या?''
वह हँसकर बोला,  ''आपके दिमाग का निकल गया है।  फैशन को समझ नहीं पाए और दिवाला पीट रहे हैं मेरा।''
मैंने कहा, '' भाई, मेरे तुम जैसे कपडे़ पहने हुए हो, उसे किसी भिखारी को भी दोगेतो नहीं लेगा।  हाथ जोड़कर यही कहेगा कि बाबूजी,  भिखारी हूँ मगर इतना भी निर्लज्ज नहीं कि इतने फटे कपड़े दान में ले लूँ। खैर, अब तुम कहते हो तो मान लेते है कि यही फैशन है। अच्छा, तो यह बताओ , तुमने कहा था कि नए साल में कुछ करके दिखाऊँगा, क्या कर रहे हो इस बार? तुम बोल रहे थे, कुछ नया करूँगा। कुछ किया?''
युवक बोला, ''बिलकुल, नया ही  करना है। देखिए, शुरुआत तो इस हुलिया से हो गई है।  ये जो जींस देख रहे हैं न आप ? ब्रांडेड है, अंकल !!  मॉल से खरीदी है. बहुत बड़ी कंपनी है। फलाने हीरो ने पहनी थी।  ''
''मतलब जो तुम नया कुछ करने वाले थे, उसकी शुरुआत इस फटी जींस से हो रही है? वाह, नया साल और फटी जीन्स!!  तुम तो धन्य हो।  तुम होगे कामयाब एक दिन। ''
मेरी बात को सुनकर वह फिर उखड़ गया, ''ये क्या मज़ाक है अंकल, आप मेरी इस जींस को बार-बार फटी कह रहे हैं? अरेयह ब्रांडेड जींस है।  लेटेस्ट फैशन वाली। डू यू नो ब्रांडेड?  पाँच हजार में खरीदी है और आप इसे फटी कहकर इसकी 'बेइज़्ज़ती खराब' करने पर तुले हैं? इसे फटी नहीं, फैशनेबल जींस कहते है ''
मैंने कहा, ''ओहसॉरी भाई, माफ़ करो।  यह कमाल की जींस है। अद्भुत है।  हम धन्य भये इसके दर्शन करके ! तुम्हारे माता-पिता भी गर्व करते होंगे तुम पर कि कितना होनहार लड़का है। फटी पेंट पहनता है।  सादगी से रहता है। अच्छा तो यह बताओ, क्या सोचा है। इस साल का एजेंडा क्या है?''
वह बोला, ''बॉलीबुड की हर फिल्म देखूँगा।  आजकल अच्छी-अच्छी फिल्में बन रही है।''
''अच्छा-अच्छाउससे कुछ ज्ञान मिलेगा तुमको ताकि अपने कैरियर के लिए कुछ करोगे ? कुछ फिल्मे होती होंगी ऐसी।  ''
मेरी बात पर  वह हँसकर बोला, ''ज्ञान-फ्यान के लिए नहीं अंकल, आजकल के लड़के और लड़कियाँ इंटरटेन के लिए  फ़िल्में  देखते हैं.. उससे हमें पता चलता है कि फैशन का लेटेस्ट ट्रेंड क्या चला रहा है। उस हिसाब से फिर हम अपने बाल को कभी खड़ा कर लेते हैं, कभी आड़ा, कभी तिरछा। कभी पीला, कभी

नीला, कभी हरा कर लेते हैं।  फिर  हीरो के माफिक स्टाइल मारते हैं।  उसी की तरह कपड़े सिलवाते हैं। हीरो की माफिक ही चलते हैं, बोलते है।  मज़ा आता है।  इस साल अब तो यही करना है मुझे।''
''और पढाई- लिखाई ? कैरियर? सब गए तेल लेने? ''  मेरे इस प्रश्न पर वह फिर हँसा और बोला, ''समय मिला, तो वो भी करेंगे न । इतनी जल्दी क्या है।  कैरियर तो कल भी बन जाएगा; लेकिन फैशन जो आज है, वो कल नहीं रहेगा इसलिए उसके अनुसार विहेब ज़रूरी है। आप नहीं समझोगे मेरी बात। बिकॉज़  यू आर ए बैकवर्ड परसन!''
''मतलब नए साल में तुम केवल और केवल फैशन ही करोगे? और कुछ नहीं?''
''जी हाँ, यही सोचा है।  फैशन ही मेरा पैशन है. ये कर लूँ, फिर कैरियर भी है । माँ कसम!''

इतना बोलकर युवक मुस्करायाफिर घड़ी देख कर अचानक चौंका, ''ओह , चलूँ।  मेरा तो टाइम हो रहा है। नई फिल्म लगी है।  सुना  है कि उसमे हीरो और हीरोइन ने भी जो जींस पहनी है, वो पीछे से पूरी फटी हुई है. देखना है पीछे से फटी पेंट में कितना ब्यूटीफुल लुक आता है।  पेंट कैसी है, कितनी फटी है। इसका बारीक अध्ययन करके उसी की तरह की सिलवाऊँगा।  वैसे मॉल में मिल ही जाएगीतो खरीद लूँगा।''
"अच्छा, तो यह बताओ कि तुम पुरानी फटी जींस का करोगे क्या ?"
मेरे प्रश्न पर होनहार युवक ने कहा, " किसी ज़रूरतमंद भिखारी को दे  दूँगा।"
मैंने कहा,  "अगर भिखारी ने लेने से इंकार कर दिया, तो क्या करोगे? मैंने पहले ही कहा है कि भिखारी भी आजकल स्मार्ट हो गए है। वे फटी जींस को स्वीकार नहीं करते।"
इस बार युवक कुछ बोला नहीं। मुझे घूरकर देखने लगा। मैं घबरा गया। मैने कहा, "ओह सॉरी, माफ करना।" फिर होनहार युवक को शुभकामनाएँ  दीं, मगर वो तो लिए बगैर ही आगे बढ़ गया।  

सोशल मी़डिया मिथक में कैद मोबाइल

मिथक में कैद मोबाइल
- डॉ. महेश परिमल
भारतीय समाज तेजी से बदल रहा है। कई अभिव्यंजनाएँ बदल रही हैं। जैसे- आज के युवा तब सोते हैं, जब मोबाइल की बैटरी 5% रह जाती है। युवा इसलिए सोते हैं, ताकि मोबाइल को आराम मिल जाए। मोबाइल के बिना जीवन बिलकुल अधूरा है। इसके बिना जीवंत जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। सबसे अधिक विश्वसनीय बन गया है आज मोबाइल। पहले रोज सुबह उठकर हम अपनी हथेली को देखते थे, ताकि हमें लक्ष्मी की प्राप्ति हो। अब सोकर उठते ही हाथों में मोबाइल होता है। फिर दिन भर वही उसका सबसे सच्चा दोस्त होता है।
इन हालात में हम कह सकते हैं कि आज का युवा जाग उठा है। अब वह जब तक दो जीबी डाटा खत्म नहीं कर लेता, तब तक चैन से नहीं बैठेगा। इससे हम कह सकते हैं कि कराग्रे वसते मोबाइल, करमूले फेसबुक करमध्ये तु वाट्सअप, प्रभात करे साइन इन....। आज का सच यही है कि आज वही मानव सबसे सुखी है, जो किसी भी वाट्स एप ग्रुप में नहीं है।
हथेली पर अब देवों का नहीं, बल्कि देवों के देव मोबाइल का कब्जा है। अब हम भूल गए हैं प्राचीन प्रार्थना। पहले लोग अपनी संस्कृति से सदैव जुड़े रहते थे। सोशल मीडिया ने संस्कृति को बदल दिया है। हमारे देश में कराग्रे वसते लक्ष्मी बोलने के साथ सुबह होती थी। आधुनिकता में हमने इस प्रार्थना को भुला दिया है। अब तो जिसके पास स्मार्ट मोबाइल नहीं, उसे मनुष्य की श्रेणी में भी नहीं रखा जा रहा है। पहले यही मोबाइल कई लोगों के लिए वरदान बन गया था, अब यह अभिशाप बन गया है। पर इसे हमने अभी तक ठीक से समझा नहीं है। यह हमारे जीवन में घुसकर हमें पूरी तरह से तबाह करने को आतुर है। एक धीमा ज़हर है, जो धीरे-धीरे हमारी रगों में पहुँच रहा है। बच्चा अधिक रो रहा है, तो उसे मोबाइल थमा देने पर वह चुप हो जाता है। पालक भी अपनी बला टालने के लिए ऐसा ही कर रहे हैं। आज मोबाइल का होना इस बात का परिचायक बन गया है कि आपके पास ज्ञान का खजाना है। पर इस ज्ञान से हम कितने अज्ञानी बन रहे हैं, यह तो वक्त बता ही रहा है। भीड़ में भी इंसान खुद को अकेला महसूस कर रहा है।
आज जीवन का कटु सत्य यह है कि आप चाहकर भी इस मोबाइल से अलग हो ही नहीं सकते। केवल दृढ़ संकल्प ही हमें इससे दूर कर सकता है। कुछ देशों में यह रिवाज शुरू भी हो गया है कि अब रविवार को कोई भी किसी को किसी भी प्रकार का संदेश नहीं भेजेगा और न ही इस तरह का संदेश स्वीकार करेगा। रविवार का दिन आपका है, आपके परिवार का है, इसे अपने परिवार के साथ बिताएँ। उनके सुख-दु:ख में शामिल हों। उन्हें ऐसा न लगे कि वे परिवार के साथ रहकर भी अकेले हैं। एक दिन ई फास्ट रखा जा सकता है। यह अब बहुत ही आवश्यक हो गया है, अच्छा जीवन जीने के लिए। आज अमेरिका में यह अभियान चल रहा है कि विश्व को आपके विचार की आवश्यकता नहीं है, बल्कि आपके परिवार को आपके विचार की आवश्यकता है। आज कोई भी कुछ भी कह सकता है कि ऑनलाइन रहकर वह चाहे जो कर सकता है। ऐसे में हमें यह सोचने को विवश करता है कि अपने परिवार के लिए यदि हमारे पास समय नहीं है, तो हमसे अधिक कोई गरीब हो ही नहीं सकता। किसी भी बात पर सोशल मीडिया जब दिलो-दिमाग पर कब्जा कर लेता है, तो कई लोग मानसिक रोगी होने के कगार पर पहुँचने लगते हैं।
इसलिए आजकल सोशल नेटवर्क पर रविवार और घोषित अवकाश पर किसी को संदेश न भेजने और किसी का भी संदेश न स्वीकारने का जो अभियान चल रहा है, उससे बहुत से लोग काफी खुश हैं। कई ग्रुप में यह भी लिखा जा रहा है कि शनिवार-रविवार आप अपने परिवार के साथ रहें। उनके साथ समय गुजारें। फिर रात 11 बजे के बाद तो किसी भी प्रकार का संदेश तो भेजें ही नहीं और न ही किसी का संदेश स्वीकारें। इसे कुछ अनमने ढंग से लोगों ने स्वीकारा तो सही, पर जब उसके सुखद परिणाम आए, तो सभी को यह प्रयोग अच्छा लगा।
आज इस मोबाइल ने हमारी संवेदनाओं को मार डाला है। अब हमें कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारा पड़ोसी बीमार है या फिर उसके घर में किसी तरह का शोक है। हम उसे भूलकर अपना पूरा काम उसी रूटीन के साथ करते हैं। मोबाइल में जो सामने हैं, उसे अनदेखा कर रहे हैं और जो अनजाना दूर है, उसे हम सहजता से स्वीकार रहे हैं। कई बार तो हमें यह भी पता नहीं होता है कि जिससे हम चेटिंग कर रहे हैं, वह युवक है या युवती। वह रास्ते का कोई भिखारी भी हो सकता है या फिर आपके घर काम करने वाली कामवाली बाई भी हो सकती है। मोबाइल ने देश-दुनिया ही नहीं, बल्कि समाज को भी काफी छोटा कर दिया है। सारे रिश्ते  उँगलियों में कैद होकर रह गए हैं। हम तड़पकर रह जाते हैं, कोई अपना मिल जाए, प्यार से सिर पर हाथ फेरे, हम उनसे ऊर्जा पाएँ, हमारे आँसू बहकर निकल जाएँ, हम हलके हो लें, कोई माँ की तरह हमें भींच ले, हमारी तड़प खत्म हो जाए। हम बचपन में लौट जाएँ, जहाँ कुछ नहीं था, पर उस संसार में सब कुछ समाया था।
email- parimalmahesh@gmail.com 

षोडश शृंगार


षोडश शृंगार

- शशि पाधा     

नील गगन पर बिखरी धूप,
किरणें बाँधें वन्दनवार
कुसुमितशोभित आँगन बगिया
चन्दन सुरभित चले बयार
नवल वर्ष के अभिनन्दन में
नीड़-नीड़ गुंजित  गुंजार।

दूर देश से पाहुन आया
चकित-मुदित-सी आन मिलूँ
अक्षत-चन्दन भाल सँवारे
देहरी पे बन ज्योत जलूँ
अंजली में ले पुष्पित लड़ियाँ
स्वागत में आ खड़ी द्वार।

भोर किरण से लाया चुनरी
ओस कणों से मुक्तक हार
जवा कुसुम के कर्णफूल औ
बदली से कजरे की धार
खुली पिटारीलाँघे देहरी
अंग-अंग छा गई बहार।

धरती का षोडश शृंगार
नवल वर्ष लाया उपहार!

            २. समय सारिणी                
देहरी द्वारे रंग बदलना
जीने के सब ढंग बदलना
बदलोगे जब दीवारों पे
टँगी पुरानी समय सारिणी।

नव पृष्ठों पर लिखना तब तुम
नई उमंगेनव अनुबंध
खाली तिथियों में भर देना
स्नेहप्रेमसुहास आनन्द

संकल्पों के शंखनाद में
गूँजेगी नव राग-रागिनी।

 मन मंथन कर जरा सोचना
कैसे  मिट सकती है लाचारी
झोली भर विश्वास बाँटना
मिटे भूखशोषण बेकारी

अँधियारों में भी पंथ आलोकित
करेगी नभ की ज्योत दामिनी।

गाँठ बाँध तू संग ही रखना
बीते कल की सीख सयानी
सुलझा देगी मन की उलझन
पुरखों की अनमोल निशानी

पग पग अंगुली थाम चलेगी
भावी सुख की भाग्य वाहिनी ।