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Dec 12, 2019

रहीम के दोहे

 रहीम के  दोहे

अनकीन्‍हीं बातैं करै, सोवत जागे जोय।
ताहि सिखाय जगायबो, रहिमन उचित न होय।।1

अमर बेलि बिनु मूल की, प्रतिपालत है ताहि।
रहिमन ऐसे प्रभु हिंतजि, खोजत फिरिए काहि।।2

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय।।3

कदली, सीप, भुजंग-मुख, स्‍वाति एक गुन तीन।
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन।।4

कहि रहीम धन बढ़ि घटे, जात धनिन की बात।
घटैबढ़ै उनको कहा, घास बेंचि जे खात।।5

कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत।
बिपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत।।6

खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे ना दबैं, जानत सकल जहान।।7

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछू न चाहिए, वे साहन के साह।।8

जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो लगे, बढ़े अँधेरो होय।।9

टूटे सुजन मनाइए, जौ टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्‍ताहार।।10

देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन।
लोग भरम हम पै धरें, याते नीचे नैन।।11

नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत।
ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछु न देत।।12

पाँखुरी नोची गई

1-पाँखुरी नोची गई

 - रमेश गौतम 

फिर सुनहरी
पाँखुरी नोंची गई
फिर हमारी शर्म से गर्दन झुकी ।

फिर हताहत
देवियों की देह है
फिर व्यवस्था पर
बहुत सन्देह है
फिर खड़ी
संवदेना चौराहे पर
फिर बड़े दरबार की साँसे रुकी ।

फिर घिनौने क्षण
हमें घेरे हुए
एक गौरैया गगन
कैसे छुए
लौटती जब तक नहीं
फिर नीड़ में
बन्द रहती है हृदय की धुकधुकी ।

फिर सिसकती
एक उजली सभ्यता
फिर सभा में
मूक बैठे देवता
मर गई है
फिर किसी की आत्मा
एक शवयात्रा गली से जा चुकी ।

फिर हुई है
बेअसर कड़वी दवा
फिर बहे कैसे
यहाँ कुँआरी हवा
कुछ करो तो
सार्थक पंचायतों में
छोड़कर बातें पुरानी बेतुकी ।

2-सजल चित्र

  शब्द की

तूलिका से बनाए गए
गीत अनुभूतियों के सजल चित्र हैं
जब उदासी गहन
चीरती है हृदय
देह से खींचता
प्राण निर्मम समय
तब अनायास
संजीवनी की तरह
गीत ही सिद्ध होते परममित्र हैं
आँसुओं के सदा ही
कथानक हुए
हर गली पाँव
संवेदना के छुए
आचरण अक्षरों का
सुवासित हुआ
गीत करुणा-कलित नैन का इत्र हैं
ओढ़कर आवरण
सब गले से लगे
चार रिश्ते नहीं
ढूँढ पाए सगे
पारदर्शी कथा
कागजों पर लिये
नेह की व्यंजना
गीत ही तो यहाँ राम–सौमित्र हैं

3-महानगर!


गौरैया भी
एक घोंसला रखले
इतनी जगह छोड़ना
महानगर।
खड़े किए लोहे के पिंजरे
हत्या कर
हरियाली की,
इतने निर्मम हुए कि
गर्दन काटी
फिर खुशहाली की;
पहले प्यास बुझे
हिरनों की
तब अरण्य से नदी मोड़ना
महानगर।
माटी के आभूषण सारे
बेच रहे हैं सौदागर
गर्भवती
सरसों बेचारी
भटक रही है अब दर–दर
गेहूँ–धान
कहीं बस जाएँ तो
खेतों की मेड़ तोड़ना
महानगर।
फसलों पर
बुलडोजर
डोले
सपने हुए हताहत सब
मूँग दले छाती पर
चढ़कर
बहुमंजिली इमारत अब
फुरसत मिले कभी तो
अपने पाप–पुण्य का
गणित जोड़ना
महानगर।

4- मैं अकेला ही चला हूँ  


मैं अकेला ही चला हूँ
साथ लेकर बस
हठीलापन

एक ज़िद है बादलों को
बाँधकर लाऊँ यहाँ तक
खोल दूँ जल के मुहाने
प्यास फैली है जहाँ तक
धूप में झुलसा हुआ
फिर खिलखिलाए
           नदी का यौवन             

सामने जाकर विषमताएँ
समन्दर से कहूँगा
मरुथलों में हरीतिमा के
छन्द लिखकर ही रहूँगा
दर्प मेघों का
विखण्डित कर रचूँ मैं
बरसता सावन

अग्निगर्भा प्रश्न प्रेषित
कर चुका दरबार में सब
स्वाति जैसे सीपियों को
व्योम से उत्तर मिलें अब
एक ही निश्चय
छुएँ अब दिन सुआपंखी
सभी का मन

सम्पर्कः रंगभूमि, 78–बी, संजय नगर, बरेली-243001

बालकथा

मुन्ना : मेरा दोस्त 
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

      जब से जंगल कटने शुरू हुए, हमारी तो मुसीबत ही हो गई। जंगल में शिकार नहीं मिलता तो बाघ और भेड़िए गाँव में घुस आते हैं। जो मिला, उसे ही मारकर खा जाते हैं। चाहे बछड़ा मिले चाहे भेड़-बकरी, चाहे कुत्ता बिल्ली। हमारे गाँव में पिछले कई दिनों से कई वारदात हो चुकी हैं। रात में चुपके से बाघ आया और गाय को मारकर खा गया। अगले दिन हमारे पड़ोसी की गाय का बछड़ा मारकर खा गया। भेड़िए ने एक रात  हमारे मालिक सरपंच के कुत्ते टोमी को ही निबटा दिया। गाँववालों के मन में डर बैठ गया –ये बाघ और भेड़िए किसी दिन किसी आदमी को भी मार डालेंगे।
     सभी लोग यह समस्या लेकर सरपंच किशन लाल के पास आ गए। सब अपनी –अपनी कह रहे थे– ‘इस बार बारिश नहीं हुई। सभी तालाब  सूख गए हैं।’
सरपंच जी बोले– ‘तभी तो पानी की तलाश में भेड़िए और बाघ गाँव का रुख करने लगे हैं। जंगल भी लगातार कट रहे हैं। छोटे-छोटे जंगली जानवरों का शिकार किया जा रहा है। ऐसे में बाघ और भेड़िए कहाँ जाएँ?’
    हरिया दुखी स्वर में बोला-‘बाघ ने मेरी तो गाय की बछिया को  ही मार दिया। कुछ उपाय सोचा जाए।’
चरणसिंह ने कहा- ‘रामकला लुहार से एक फंदा बनवा लेते हैं। जो बाघ या भेड़िया ऊधम मचा रहा है, किसी तरह वह फँस जाए तो सब चैन से रहा सकेंगे।’
    चरणसिंह की बात सबको ठीक लगी। रामकलालुहार ने कहा– ‘ऐसा फंदा बना दूँगा कि बाघ हो चाहे भेड़िया पैर रखते ही फँस जाएगा। यह भी तय कर लिया जाए कि इन्हें फँसाने के लिए क्या किया जाए? कोई भेड़ –बकरी फन्दे के पास बाँधनी पड़ेगी,  तभी तो बाघ वहाँ आएगा।’
     ‘बकरी मैं दे दूँगा’-सरपंच किशन लाल ने कहा।
मैं कुछ दूर खूँटे से बँधी यह सब सुन रही थी। मेरे तो पैरों के नीचे की ज़मीन खिसक गई। मेरा सिर चकराने लगा। मुझे सरपंच के ऊपर गुस्सा आने लगा। टोमी ने अपनी जान देकर मेरी जान बचाई थी। वह ज़ोर-ज़ोर से भौंकता रहा था। किसी ने ध्यान ही नहीं दिया आख़िकार भेड़िए ने उसी को अपना शिकार बना लिया।
      मुन्ना भी चारपाई पर चुपचाप बैठा लोगों की बातें सुन रहा था। वह बोल पड़ा- ‘मैं अपनी बकरी नहीं दूँगा। गाँव में कई लोगों के यहाँ कई-कई बकरियाँ हैं। हम ही क्यों अपनी बकरी दें?’
     उसे बीच में इस तरह बोलता देखकर किशनलाल ने डपटकर कहा-‘बच्चे इस तरह बड़ों के बीच में नहीं बोलते।’
 कई लोगों ने एक साथ मुड़कर मुन्ना की तरफ़ देखा। वह सबकी तरफ़ घूर रहा था।
मुझे बहुत अच्छा लगा –चलो कोई तो है जो मेरे बारे में सोचता है। मेरी जान में जान आई।
मुन्ना ज़िद्दी है; वह मेरे लिए कुछ भी कर सकता है। हमारे परिवार में केवल तीन प्राणी हैं– मेरी माँ,  मेरी बहिन छुटकी और मैं। माँ को फन्दे के पास बाँधा जाएगा तो उसे बाघ या भेड़िया खा जाएगा। मेरी बहिन छुटकी अभी घास बहुत कम खाती है। वह सुबह-शाम दूँध ज़रूर चूँघती है। माँ के बिना वह पलभर नहीं रह सकती और दूध के बिना एक भी दिन नही।
    अब केवल मैं बची थी। रमकलालुहार ने लोहे का फन्दा बना दिया। गाँव के किनारे वाले रास्ते पर बाँधने के लिए मुझे ले गए। मुन्ना  ने बहुत हाय-तौबा मचाई। बहुत रोया भी, पर उसकी बात किसी ने नहीं सुनी। मुझे एक खूँटे से बाँध दिया गया। मेरे सामने हरी-हरी पत्तियाँ   डाल दी ईं। एक तसले में मेरे पीने के लिए पानी भी रख दिया गया। जिन पत्तियों को मैं चाव से चपर-चपर करके खा जाती थी,  वे मुझे आज अच्छी नहीं लग रही थी। गला सूखने पर थोड़ा –सा पानी ज़रूर पिया।
रात हो चली थी। जो भी उधर से गुज़रता,  वही बोलता –सरपंच की यह बकरी तो गई जान से। बाघ इसे चट कर जाएगा। चारों तरफ़ सन्नाटा छाने लगा। मेरे तो होश ही उड़ गए। मुझे माँ की याद आने लगी। छोटी बहिन छुटकी मेरे साथ दिनभर कुदकती रहती थी। अब क्या होगा? जंगल से तरह –तरह की आवाज़ें आ रही थीं। डर के मारे मेरी टाँगे काँपने लगीं। मिमियाकर रोने का मन कर रहा था,  लेकिन मैं डर के मारे चुप थी। कहीं मेरी आवाज़ सुनकर ही बाघ न आ जाए। तभी पत्तों पर किसी के चलने की आवाज़ आई। मेरी तो साँस ही अटक गई। अरे यह तो उछ्लू खरगोश है। मुझे बँधा हुआ देखकर वह बिदककर भाग गया। बहुत दूर सियारों के हुआँ-हुआँ करने की वाज़ आने लगी। डर के कारण मैं बैठ गई।
रात और गहरी हो गई थी। मुझे लग रहा था कि बाघ अब आया तब आया। मुझे किसी के धीरे –धीरे चलने की आहट महसूस हुई। बस अब मेरे प्राण गए। मैंने डर के मारे आँखें बन्द कर लीं। लगा कि बाघ या भेड़िया अब मुझे दबोचने ही वाला है। किसी ने मेरे गले पर हाथ रखा। मैं डर के मारे काँप रही थी। पर यह हाथ तो बहुत मुलायम है- मुन्ना के हाथ जैसा। हाँ यह मुन्ना ही था। वह मेरे गले की रस्सी खोलकर  फुसफुसाया–“जा, घर भाग जा।”
मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मैं ताबड़तोड़ घर की ओर दौड़ी। मेरी माँ मेरे बिना ज़ोर –ज़ोर से मिमिया रही थी। मुझे वापस आया देखकर छुटकी उछलने लगी। मुझे आज पता चला कि मुन्ना मुझसे कितना प्यार करता है।
अगले दिन पता चला-तसले में रखा पानी पीने के चक्कर में एक भेड़िया उस फन्दे में फँस गया है। गाँव वालों ने उसे वन –विभाग को सौंप दिया।
ई-मेल-rdkamboj@gmail.com

भेंट एक लेखक से

भेंट एक लेखक से
- डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल
नित नए लोगों से भेंट करना और भेंट के दौरान उनकी छठी तक के दूध का हिसाब-किताब मालूम करना हम भारतवासियों की राष्ट्रीय हॉबी है। बिल्कुल इसी तरह जैसे दरिद्रता हमारा राष्ट्रीय गुण है और इस राष्ट्रीय गुण को स्थायी बनाए रखने के लिए विदेशी वित्तीय संस्थाओं से ऋण लेना हमारे वित्तमंत्रियों की हॉबी है।
सो, उस दिन एक साहब से मुलाक़ात हुई. हमने आदत के अनुसार उनका नाम पूछा। नाम था पं श्यामबिहारी लाल शर्मा। बताया गया 'लेखक हैं।' सच मानो, सुनकर बड़ी निराशा हुई. अगले सारे सवाल जैसे 'वेतन कितना मिलता है?' या 'ऊपर की आमदनी कितनी हो जाती है?' आदि मन-ही-मन में घुटकर रह गए. दरअसल, हम भारतीय पहली भेंटवार्ता में ही व्यक्ति के स्टेंडर्ड का पता लगा लेते हैं और क्षण-भर में यह निर्णय भी कर लेते हैं कि नवपरिचित सम्बंध बनाए रखने के योग्य है या नहीं! वैसे हम जानते हैं कि संपन्न व्यक्ति भी समय पड़ने पर चावल के चार दाने उधार देने से कतरा जाता है, पर आदमी को यह गर्व तो रहता ही है कि उसकी मित्र-मंडली में नंगे-बूचे लोग ही हीं हैं, खाते-पीते संपन्न लोग भी हैं। पराए पैसे पर इतराना हमारी दूसरी राष्ट्रीय हॉबी है।
'लेखक हैं।' यह सुनना था कि हम भुन-से गए. क्रोध हमें इस बात पर था कि होश सँभालते ही लेखकों की जिस भीड़ ने हमारा घेराव शुरू किया था, उसका सिलसिला आज तक जारी है। प्राइमरी स्कूल से लेकर एम.ए. की पढ़ाई पूरी करने तक ये लेखक लोग हमारी छाती पर कुछ इस तरह सवार रहे, जैसे वह हमारी छाती न हो, उनका अपना बैडरूम हो। वैसे हमें शक है कि लेखकों के घर में बैडरूम नाम की कोई चीज़ होती होगी।
तो साहब, होश सँभालते ही हम विद्यार्थी बन गए या यूँ कहिए कि बना दिए गए. रात-रात भर लेखकों की जीवनियाँ रटते। कब पैदा हुए, कब वीरगति को प्राप्त हुए, कौन-कौनसी पुस्तकें लिखीं और क्या-क्या तीर मारे? उनकी रचनाओं का अर्थ याद करते। लेकिन सुबह होते ही लगता कि दिमाग़ का मैदान जो है, वह सारा साफ़ है। बहुत सोचते और बहुत देर तक सोचते लेकिन दिमाग़ में कुछ होता, तभी तो सामने आता। आख़िर सब्र करना हम भारतीयों की तीसरी हॉबी है।
परीक्षा होती तो प्रश्न-पत्र देखकर हमारा ख़ून खौल जाता। लिखा होता-नीचे लिखे गद्यांश का संदर्भ-सहित अर्थ लिखो और यह भी लिखो (या बताओ) कि लेखक द्वारा लिखी गई इन पंक्तियों से तुम्हें क्या शिक्षा मिलती है? अथवा निम्नलिखित पद्यांश का अर्थ अपने शब्दों में विस्तार से लिखो और यह भी बताओ कि इसका लेखक कौन है और यह अंश उसकी किस पुस्तक से लिया गया है? अथवा प्रेमचंद की जीवनी कम-से-कम एक हज़ार शब्दों में लिखो।
हद हो गई हमारा क्या लेना-देना इन व्यर्थ के सवालों से? यहाँ तो 'करे कोई और भरे कोई' वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। यानी 'करनेवाला कवि और भरनेवाला रवि'।
मरता क्या न करता !   हम भी एक ही काइयाँ थे। लेखकों के चंगुल से बच निकलने का रास्ता ढूँढ़ ही निकाला। वह  नक़ल मारनी शुरू की कि बस इस कला में पूरे दक्ष हो गए। छोटी-छोटी पर्चियाँ जेब में रखकर परीक्षा-कक्ष में जाते। यह अमुक लेखक की जीवनी  है, यह अमुक की। यह अमुक पद्यांश का भावार्थ है, यह अमुक का। अब यह बात अलग है कि अक्सर एक लेखक की जीवनी दूसरे के और दूसरे की तीसरे के नाम लिखी जाती और सारा गुड़ गोबर हो जाता। वैसे गोबर करना भी तो हमारी राष्ट्रीय हॉबी है। है कि नहीं?
हाँ, तो हम बता रहे थे कि लेखकों ने बचपन से ही जो हमारी गुद्दी ऐंठनी शुरू की सो अब तक ऐंठ रहे हैं। परीक्षा-कक्ष में यह सोचकर ग़ुस्सा आता था कि अमुक लेखक की जीवनी लिखें और कम-से-कम एक हज़ार शब्दों में लिखें। क्या धाँधली है? यानी हम आम भी आपको खाने को दें और गुठलियाँ भी गिनें। सो, हम जब तक विद्यालय में रहे, आम भी खिलाते रहे और गुठलियाँ भी गिनते रहे।
विद्यालय-जीवन से निकलकर जब यथार्थ के जीवन में आए, तब भी क्रम टूटा नहीं, क्योंकि कान पकडक़र बैठकें लगाने के अलावा जीवन का और कोई अर्थ हमारे लिए है ही नहीं। लेकिन इस त्रासदी के पीछे भी हाथ भाँति-भाँति के लेखकों का ही है। न हम इनकी जीवनियाँ रटते, न मेहनत से काम करके खाने की आदत डालते और न इस हालत में पहुँचते। सीधे-सीधे हाज़ी मस्तान बनकर मौज़ उड़ाते। नोट कीजिए कि जनाब हाज़ी मस्तान को किसी भी छोटे-बड़े लेखक की जीवनी याद नहीं है, यह अलग बात है कि वह जीवित लेखकों के अब तक एक सौ एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों की अध्यक्षता कर चुके हैं। हाज़ी साहब इस रहस्य से परिचित हैं कि लेखक बनने से ज़्यादा लेखकों के सम्मेलन की अध्यक्षता करना सम्मानजनक होता है।
बात काफी दूर निकल गई. हम पं. श्यामबिहारीलाल शर्मा की बात कर रहे थे। हमने उन्हें सिर से पाँव तक घूरकर देखा। कहीं-से-कहीं तक कोई निशानी ऐसी नहीं मिली, जिससे प्रमाणित होता कि वे लेखक हैं। सूटेड-बूटेड, मोटे-ताज़े, हँसते-खेलते। न तो उलझे हुए लंबे बाल, न बढ़ी हुई लंबी दाढ़ी। लेखक तो बेचारा समाज में इंकलाब लाने के लिए जीवन-भर क़लम घसीटता है, पर इंकलाब तो आता नहीं, लेखक का 'जिंदाबाद' अवश्य हो जाता है। लगता है, यह लेखक-वेखक कुछ नहीं है। यदि है तो डुप्लीकेट। लेखक तो मंटो था, घंटों उकड़ू बैठकर क़लम घिसता रहता था और जो समय बाकी रहता था उसमें एडि़याँ रगड़ता था, कभी फ़र्श पर तो कभी खाट पर। तब कहीं जाकर एक कहानी पूरी होती थी। कहानी पूरी होते ही मंटो भागता बाज़ार की ओर, जहाँ किसी प्रकाशक के हाथ घास के भाव कहानी बेचता और मंटो से एकदम 'मंटो साहब' हो जाता।
लेखक तो मुंशी प्रेमचंद थे। समाज उन्हें उस वक़्त तक यह याद दिलाता रहा, जब तक वे जीवित रहे कि लेखक होने की तुलना में मुंशी होना अधिक सम्मानसूचक है। इसलिए जीते-जी ही नहीं, वरन् मरने के बाद भी 'मुंशी' का शब्द उनके नाम का दुमछल्ला बना रहा। मरने के बाद सचमुच बहुत शोधकार्य हुआ मुंशी प्रेमचंद पर, पर शोध इस बात पर भी होनी चाहिए थी कि प्रेमचंद के व्यक्तित्व में लेखक अधिक था या मुंशी और यदि उनमें लेखक अधिक था तो मुंशी उपाधि उन्हें किस कारण दी गई?
गिनती के क्षणों में दर्जनों लेखकों के चेहरे हमारे मन-मस्तिष्क पर उभरे और ग़ायब हो गए, किंतु पं। श्यामबिहारी लाल शर्मा जैसे साफ़-सुथरा, चमकदार, ख़ुशहाल चेहरा उनमें से किसी का नहीं था। सारे के सारे फक्कड़, सारे घनचक्कर, सबके सब खल्लास। संदेह हुआ कि हम भारत में हैं या किसी और देश में। क्या सचुमुच हमारे देश में लेखकों की कायापलट हो गई है? लेकिन विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि कल तक तो हमने अपने ही शहर में कई लेखकों को जूतियाँ चटखाते और सडक़ नापते देखा था। हमने एक बार फिर अपनी पैनी दृष्टि उन पर डाली। फिर पूछा-'कितना कमा लेते हो भाई, लेखन-कार्य से?'
तुरंत उत्तर मिला-'कभी हज़ार, कभी पाँच सौ रुपए प्रतिदिन।'
प्रतिदिन शब्द आश्चर्य भरी चीख़ बनकर हमारे होंठों से फूट पड़ा। मन ही मन दुहराया-'हज़ार रुपए प्रतिदिन। यानी कि तीस हज़ार रुपए महीना। बाप रे बाप! दाता दे और बंदा ले। काश, हम भी लेखक होते और इसी टाइप के होते।' मन-ही-मन सोचा कि ये या तो पि ल्मी-जगत के लेखक हैं अथवा कवि-सम्मेलनों के चुटकुलेबाज़ कवि। वैसे लेखक तो हरगिज नहीं हो सकते, जैसे मुंशी प्रेमचंद जी थे, निराला जी थे या जैसे। हमने नामों की सूची आगे नहीं बढ़ाई. क्योंकि हमें ख़तरा था कि किसी एक नाम पर पहुँचते-पहुँचते हमारा हार्ट फेल हो जाने की नौबत आ सकती थी। हम स्वयं तो फेल हो जाने को हँसी-ख़ुशी सहन करने के आदी थे, किंतु हार्ट फ़ेल हो जाने की बात तो सोच भी नहीं सकते थे। असमंजस के गहरे सागर से अपना सिर उभारते हुए हमने पूछा-'क्यों लेखक जी, यह तो बताओ कि आप लिखते क्या हैं? फिल्मी कहानियाँ लिखते हैं आप? (यह बात नोट करने की है, हम उन्हें श्यामबिहारी लाल कहते-कहते एकदम' लेखक जी'कहने पर उतर आए थे, क्योंकि अच्छे पैसे वाला या अच्छे पैसे कमानेवाला हो तो हम जैसे टटपूँजिए पर उसका रुआब तो पड़ता ही है। सम्मान भी वह अपना हम जैसे लोगों से करवा ही लेता है।) लेखक साहब ने हमारा सवाल सुना तो तिरस्कार-भरे भाव से बोले-' नहीं साहब। फिल्मी-इल्मी कहानियों से क्या लेना-देना है हमें? हम कोई उल्लू या उसके पट्ठे नहीं है, जो रात-रात भर जाग कर फिल्मी कहानियाँ लिखें और बॉक्स ऑपि स पर उनके फ़्लाप होने का तमाशा भी देखें। '
भाई श्यामबिहारीलाल ने फिल्मी-लेखकों पर इतना लंबा लेक्चर दिया कि हम अपनी सुध-बुध भूल गए. हमें विश्वास हो गया कि पि ल्मी लेखकों से अधिक अस्वीकार्य प्राणी शायद ही दुनिया में हो। हमने साहस जुटाकर पूछा-'तो आप क्या गीतकार हैं?'
लेखक जी बोले-'नहीं जी.' और 'जी' पर उन्होंने इतनी दूर तक साँस खींची कि उनकी 'जी' हमारे जी का जंजाल बन गई. हमने फिर पूछा-'तो क्या आप कहानीकार हैं?'
इस बार उनकी त्योरी पर बल पड़ गए. झुँझलाकर बोले-'अरे साहब, कह तो दिया कि हम कहानीकार नहीं हैं और गीतकार भी नहीं हैं।'
'हो न हो, आप अवश्य ही व्यंग्यकार होंगे।' लेकिन लेखक जी ने इस 'कार' को भी अस्वीकार कर दिया और हम बेकार के संकट में पड़ गए. सोच रहे थे कि ये कैसे लेखक हैं, कहानी यह लिखते नहीं, कविता यह करते नहीं, व्यंग्य यह सुनते नहीं। तो क्या कोई और विधा प्रचलित हो गई है इन दिनों साहित्य के क्षेत्र में, जो हज़ार-पाँच सौ रुपये रोज़ ही रायल्टी दिला देती है। इच्छा हुई कि पूछें, 'वह कौनसी विधा है, जिसमें आप लिखते हैं और इतनी मोटी रक़म लेते हैं।'
कुछ पल दोनों के बीच चुप का परदा तना रहा। हमारे मन में जिज्ञासा बिजली की तेज़ी से दौड़ रही थी और हम सोच रहे थे कि इस नई विधा का पता चले तो इस पर पुस्तक ही संपादित कर दें।
साहस करके पूछा-'भाई साहब, यह तो बताइए कि आप लिखते क्या हैं?'
लेखक साहब ने झट उत्तर दिया-'दस्तावेज़।'
सारी बात समझ में आ गई। रजिस्ट्री कार्यालय का नक़्शा आँखों में घूम गया। ज़मीन, मकानों के बयनामे कल्पना में उलट-पुलट होने लगे, 'अमुक पुत्र, अमुक निवासी, अमुक स्थान का हूँ।'
जी चाहा, हास्य-व्यंग्य का यह पुलिंदा बगल में दबाए फिरने की जगह और कलम जेब में अटकाकर गली-गली घटनाओं की खोज में भटकने की बजाय काश हम ऐसे ही एक दस्तावेज़-लेखक होते और हज़ार पाँच सौ रुपए रोज़ ऐंठकर मौज़ की वंशी बजा रहे होते। हमारे मुँह से निकला--‘भारत का एक महान् लेखक श्यामबिहारी लाल दस्तावेज़ लेखक।