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Mar 24, 2018

लघुकथा

सुख
ख़लील जिब्रान, अनुवाद-  सुकेश साहनी
एक दिन पैगम्बर शरीअ को एक बाग में एक बच्चा मिला। वह दौड़ता हुआ उनके पास आया और बोला, ‘गुडमार्निग सर!
गुडमार्निग टू यू सर!पैगम्बर ने कहा, ‘तुम अकेले हो?’
इस पर बच्चा खिलखिलाकर हँसते हुए बोला, ‘अपनी आया (नर्स) से पीछा छुड़ाने में बहुत देर लगी। अब वह सोच रही होगी कि मैं उन झाडिय़ों के पीछे हूँ, पर...मैं...मैं तो यहाँ हूँ।फिर पैगम्बर की ओर ध्यान से देखते हुए बोला, ‘आप भी तो अकेले हैं, आपकी आया कहाँ हैं?’
अ...हाँ, वह एक अलग बात है,’ पैगम्बर ने कहा, ‘सच तो यह है कि मैं अक्सर पीछा नहीं छुड़ा पाता, पर अभी जब मैं बगीचे में आया तो वह मुझे झाड़ियों के पीछे ढूँढ़ रही थी।
बच्चा तालियाँ बजाते हुए किलक उठा, ‘अच्छा...तो आप भी मेरी तरह जानबूझकर खो गए हैं। इस तरह गुम हो जाना कितना अच्छा लगता है!...आप कौन हैं?’
लोग मुझे पैगम्बर शरीअ कहते हैं,’ उन्होंने उत्तर दिया,‘तुम कौन हो?’
मैं...मैं हूँ,’ बच्चे ने कहा, ‘मेरी नर्स मुझे ढूँढ़ रही है और वह नहीं जानती कि मैं कहाँ हूँ।
तब पैगम्बर ने आकाश की ओर देखते हुए कहा,‘मैं भी थोड़ी देर के लिए अपनी नर्स से निकल भागा था लेकिन वह मुझे ढूँढ़ लेगी।
मैं जानता हूँ...मैं भी ढूँढ़ लिया जाऊँगा।बच्चे ने कहा।
तभी बच्चे का नाम लेकर पुकारती एक औरत की आवाज़ सुनाई दी।
देखा...बच्चे ने कहा, ‘मैंने आपसे कहा था, वह मुझे ढूँढ़ लेगी।
तभी एक और आवाज़ सुनाई दी, ‘आप कहाँ हैं, शरीअ?’
देखा मेरे बच्चे, उन्होंने मुझे ढूँढ़ लिया।पैगम्बर ने कहा फिर आवाज़ की दिशा में मुँह करके उत्तर दिया, ‘मैं यहाँ हूँ।
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देह मोगरा हो गई

देह मोगरा हो गई 
- आभा सिंह
1
चौखट थामे झाँकता, सँवल सलोना रूप,
होठों पर निखरी रही,मदिर फागुनी धूप।
2
आँखों में जब खिल उठे, भीगे टेसू रंग,
मान भूल अभिमान को, लगा नेह के अंग।
3
पाती लेकर आ गई, फागुन का संदेश,
शेष दिनों को लाँघ मन, पहुँचा पी के देश।
4
पीला टेसू महकता, आँखों बरसे नेह,
इंद्रधनुष सा झर पड़ा, रंगबिरंगा मेह।
5
धीमे पाँव गुज़र गया, ओढ़ रज़ाई शीत,
फूला टेसू गा उठा, रंग -बिरंगे गीत।
6
फागुन आने की खबर, पहुँची नीबू द्वार,
घोले मिसरी गंध में, वंदन को तैयार।
7
फूलों से अंजलि भरे, होठों पर मधु हास,
शुभकामना बोल रहे, कब से खड़े पलास।

देने-लेने की साड़ियों की रंगदारी

देने-लेने की साड़ियों की रंगदारी 
- हरि जोशी
जिसे बारात का अनुभव नहीं, जो घोड़ी कभी चढ़ा नहीं या जिसने भारतीय विवाह देखा नहीं, उसे तो निरा बन्दर ही कहें? और बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद? ऐसे लोगों के सामने इन साड़ियों की कथा सुनाना भैंस के आगे बीन बजाने से अधिक कुछ नहीं है। खैर जिन्होंने वे लाव-लश्कर देखे हैं, वही ज्ञानी मालवा की शेरवानी के महत्त्व को समझते हैं। इस प्रथा का आविष्कार भारतीय महिलाएँ ही कर सकती थीं और वे भी मालवा की शोध कर्ता, सो उन्होंने कर लिया। अमेरिका या इंग्लैंड की किसी महिला से आप उम्मीद नहीं कर सकते कि इस तरह के किसी भी रंगीन रस्म रिवाज़ की खोज वह कर सकती है? न हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा। कार्यक्रम की शोभा भी हरदम बनी रहे और साड़ी का रंग तो क्या बरसों बरस उसकी घड़ी तक न टूटे? देने वालों की हमेशा पौ बारह रहे, वहीं लेने वालों के बारह बजते रहें।
मैं जिन साड़ियों की बात कर रहा हूँ वे कोई ऐसी वैसी साड़िय़ाँ नहीं हैं, शादी विवाहों की शान में चार चाँद लगा देने वाली होती हैं। वे न हों तो मालवा की कोई शादी सुचारू रूप से हो नहीं सकती। सर्वाधिक सुंदर वही होती हैं, डॉन की तरह रंगदारी दिखाती हैं। उनकी उपस्थिति से अच्छे अच्छों की बोलती बंद हो जाती है। उनके आने के बाद कोई कुछ बोल सकता है ? वे पहनने -ओढऩे के काम की भले ही नहीं होती होंगी ,किन्तु आकर्षक और दिखलौट इतनी कि बस अपने हत्थे चढ़ जाए? वे केवल देने लेने के लिए होती हैं। वे तो हरसिंगार के फूल की तरह होती हैं जिसे बस देखते रहो और उसकी सुगंध का आनंद लेते रहो। तोड़ दिया तो बिखर जाएगा। रेले रेस में जिस तरह एक खिलाड़ी दूसरे को डम्बल देकर रुक जाता है और दूसरा लेकर तीसरे को दे देता है। फिर तीसरा चौथे को देता है, इसी तरह देने लेने की साड़ियाँ अनवरत पास ऑन होती रहती हैं। मैंने तो उन्हें कभी रुकते या फेल होते नहीं देखा। हाथो- हाथ ली जाती या दी जाती हैं।
भारतीय जानते हैं कि 1947 के पहले जब बांगला देश भी भारत का हिस्सा हुआ करता था, तब ढाका की मलमल प्रसिद्ध थी। कहा जाता है कि मलमल की पूरी की पूरी साड़ी सुई की नोक में से निकल जाती थी ,किन्तु अब कौन उनकी बात करता है ? आज तो देने लेने की साड़ी दसों दिशाओं में चर्चित है और सचमुच उनकी बात कुछ और ही है। आज भी उनका दबदबा पूर्ववत् कायम है। कितनी पारदर्शी हो सकती हैं आप कल्पना भी नहीं कर सकते? ढाका की मलमल की साड़ी होती तो भी उनके सामने कहाँ ठहरती? देखने में अत्यंत आकर्षक और स्वभाव में एकदम छुईमुई। आपने घड़ी तोड़ी कि साड़ी घड़ी गिनने लगती है। एक बार पहन ली फिर दूसरी बार नहीं पहनी जा सकती। इसीलिए समझदार लोग उसे भेंट दर भेंट देते रहते हैं, स्वयं पहन लेना शायद किसी शाप से ग्रस्त हो जाना माना जाता है। इंदौर भोपाल उज्जैन आदि शहरों में तो बड़ी बड़ी दूकानें इसी की कृपा से चल रही हैं। कई कम्पनियाँ इन्हीं के भरोसे खड़ी हैं। आश्चर्य नहीं की देश के कई अंचलों में इनका दबदबा कायम हो ?
जबसे प्रेम विवाह या लिव इन रिलेशनशिप का चलन बढ़ा है, मैं उन साड़ियों के बारे में चिंतित हो उठा हूँ। अब उन साड़ियों को कौन पूछेगा? जो उस ज़माने में तो बड़ी खोज के बाद, बाजार बाजार भटकने के बाद, खरीदी जाती थी। पुराने लोगों को ही कोई नही पसंद करता तो अब पुरानी प्रथा को कौन पूछेगा? अब शादियाँ साड़ियों वाली न रहकर ताड़ियों वाली या व्हिस्की और रम वाली हो गयी हैं। उन साड़ियों को भले ही कुछ नासमझ लोग रद्दी का माल मानते रहे किन्तु खरीदने वालों के लिए प्राण से भी प्यारी होती हैं। पहले तो वे बहुत तेजी से चलती रहती थी। रमता जोगी, बहता पानी की तरह वे निरंतर चलायमान रहती थी, क्योंकि बार बार खो कर दी जाती थी। खो- खो के खेल की सर्वाधिक निष्णात खिलाड़ी होती थी। विवाह का मौसम आते ही उन आभूषणों और उपहारों को अपने हाथ करने की होड़ लग जाती थी जो नई प्रजातियों की तरह, ठीक उसी प्रकार पहली बार देखी जाती थी जिस प्रकार अभयारण्य में कोई बेलबूटेदार हिरनी दिखाई दे जाती है। दिखने में आकर्षक बस दर्शनीय। सहेजकर रखने योग्य। उपयोग दृष्टि से बेकार। कुछ दिन तक उसकी डिजाइन या बेलबूटों की खूब चर्चा होती। कम से कम सामने तो महिलाएँ उस शोधकर्ता की प्रशंसा किए बिना न रहती, ‘कहाँ से ढूँढकर लाई हो इस मूल्यवान् मणि को?’ अवश्य ही इंदौर के सांटा बर से लाई होगी? ऐसी दुर्लभ और कीमती वस्तुएँ, पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की निगाह में अधिक समाती हैं। उन्हें इतनी रास आती हैं कि निगाह में ही नहीं, दिल में ही उतर जाती हैं, जिन्हें वे हथियाए बिना कभी नहीं मानती। क्रय करने वाली टीम की प्रभावी महिला परस्पर तर्क वितर्क सुनने के बाद अपना निर्णय दे देती है कि देने लेने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त यही साड़ियाँ हैं? भोपाल के चौक बाज़ार का, इंदौर के सांटा बाज़ार का या उज्जैन के गोपाल मंदिर के पास की दूकान का सेल्स मेन जब शरीर पर डालकर दिखाता है तो वह दुल्हिन से कम नहीं जँचता? दर्शक कहे बिना नहीं रहता कितनी जम रही है?’ सस्ती सुंदर और टिकाऊ। टिकाऊ शायद इसलिए कि सदियों टिकी रहती हैं। सेल्समेन के ओढऩे के बाद, कोई कभी उन्हें पहनता नहीं? क ने ख की शादी में दी,ख ने ग के घर उपहार में टिकाई। ये लोमड़ियों की तरह किसी लूम से निकली हुई बेलबूटेदार धावक साड़ियाँ होती हैं? जो निरन्तर भागती ही रहती हैं। और सिर्फ साड़ियाँ ही क्यों अन्य कई उपहारी कपड़े याने शर्ट पेंट भी इसी परम उद्देश्य से खरीदे जाते रहे हैं। बल्कि कई कम्पनियाँ इन्हीं के प्रताप से चल निकली हैं।
यह खरीदने वाले की मेधा पर निर्भर करता है कि किस चतुराई से वह उन्हें खरीदता है। उनमें कई कपड़े बहुत अनूठे होते हैं। वे व्हेनसांग और संघमित्रा की तरह दीर्घ यात्रा करते रहते हैं, कई बार तो अश्वमेध के घोड़े होते हैं जिन्हें कभी कोई रोकता नहीं।आज भी किसी भी दूकान पर चले जाइए जो सबसे मनमोहक और एक ओर अपनी विशिष्ट जगह बनाए हुए होंगे वे देने लेने के कपड़े ही होंगे। उन्होंने बड़ी प्रतियोगिता और संघर्ष के बाद शीर्ष स्थान पाया है, अब अपने स्थान से उन्हें कोई डिगा नहीं सकता। आसानी से टस से मस होने वाले नहीं हैं, ये देने लेने के कपड़े। इन कपड़ों को कभी कोई पहनता नहीं, भगवान के मंदिर में जिस तरह हम प्रतिदिन हाथ जोडक़र प्रणाम कर लेते हैं, ठीक वैसा ही शीर्ष सम्मान उन्हें हर घर में प्राप्त होता रहता है। धावक साड़ियाँ प्रेस की हुई यथावत और करीने से सँभाल कर रख दी जाती हैं, जैसे किसी लॉकर में। और जैसे ही फिर किसी विवाह का निमंत्रण मिला कि रामबाण दवा की तरह तैयार रहती हैं। अपनी भूमिका निभाने को तत्पर। जब तक घर में दो चार देने लेने की साड़ियाँ रखी हैं चिंता की कोई बात नहीं रहती। आते रहें निमंत्रण पर निमंत्रण किस बात का डर? केवल उपहारदाता को इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा कि पूर्व पर्ची निकाल ली जाए जिसने अपना नाम लिखकर पहले वही साड़ियाँ या शर्ट पेंट दिए थे। यदि वे पूर्व के नाम नहीं निकाले गए तो उपहारदाता को प्राप्तकर्ता द्वारा निश्चित ही कहा जाएगा कि भैया तूने अच्छा नाम निकाला?’ हाँ यदि कभी किसी संवेदनशील या अन्तरंग परिवार में देने लेने के कपड़े उपहार में दे दिए, वहाँ लेने के देने पड़ सकते हैं। भले ही आप, देना एक न लेना दो, की निश्चिन्तता वाला काम कर रहे हों, फिर भी आपको लेने के देने पड़ जायेंगे।
कई बार तो ऐसा पाया जाता है कि आठ साल पहले जिस किसीने इन्हें विवाह में पिरावनी में चढ़ाया था, वही पारदर्शी साड़ियाँ दस बारह घर घूम कर फिर किसी पिरावनी में उन्हें ही उपहार स्वरुप वापस भेंट में दे दी गयीं। इतनी अच्छी तरह लपेटकर दी जाती हैं कि प्रथम दृष्ट्या उन साडियों की दीर्घ यात्रा का आकलन करना असंभव होता है। लपेटने वालियों से कौन पूछ सकता है कि वे किस तरह सामने वाले को लपेट लेती हैं। स्पष्ट है दस बारह विवाहों में पिरावनी की शोभा ये बढ़ा कर, पर्याप्त अनुभव संपन्न होकर आई होती हैं। तत्काल अनुभवी प्राप्त कर्ता भी साड़ियों को गले लगाता है चूमता है, और फिर मन ही मन आदेश देता है कि अभी तो और दस बीस घरों के चक्कर लगाना है। अंत में अमूल्य आभूषणों की तरह आलमारी में ताले चाबी में सुरक्षित रख दी जाती हैं। मुझे तो हमारे ऋषि मुनियों के चरैवेति चरैवेति वाले सिद्धांत का अक्षरश: पालन करने वाली दिखाई देती हैं, ये देन लेन की साड़ियाँ।
सम्पर्क: 3/32 छत्रसाल नगर, फेका-2जे.के.रोड, भोपाल- 462022 (म.प्र.) फोन-0755-2689541, मो.098264-26232
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तोहफ़ा

तोहफ़ा 
- सविता मिश्रा अक्षजा
डोरबेल बजे जा रही थी। रामसिंह भुनभुनाए इस बुढ़ापे में यह डोरबेल भी बड़ी तकलीफ़देती है।दरवाज़ा खोलते ही डाकिया पोस्टकार्ड और एक लिफ़ाफा पकड़ा गया।
लिफ़ाफे पर बड़े अक्षरों में लिखा था वृद्धाश्रम
रुँधे गले से आवाका दी-सुनती हो बब्बू की अम्मा, देख तेरे लाडले ने क्या हसीन तोहफ़ा भेजा है!
रसोई से आँचल से हाथ पोंछती हुई दौड़ी आई - ऐसा क्या भेजा मेरे बच्चे ने जो तुम्हारी आवाज भर्रा रही है। दादी बनने की ख़बर है क्या?’
नहीं, अनाथ!
क्या बकबक करते हो, लाओ मुझे दो। तुम कभी उससे खुश रहे क्या!
वृद्धा शब्द पढ़ते ही कटी हुई डाल की तरह पास पड़ी मूविंग चेयर पर गिर पड़ी।
कैसे तकलीफों को सहकर पाला-पोसा, महँगे से महँगे स्कूल में पढ़ाया। खुद का जीवन अभावों में रहते हुए इस एक कमरे में बिता दिया।कहकर रोने लगी
दोनों के बीते जीवन के घाव उभर आए और बेटे ने इतना बड़ा लिफ़ाफा भेजकर उन रिसते घावों पर अपने हाथों से जैसे नमक रगड़ दिया हो।
दरवाको की घण्टी फिर बजी। खोलकर देखा तो पड़ोसी थे।
क्या हुआ भाभी जी? आप फ़ोन नहीं उठा रहीं है। आपके बेटे का फोन था। कह रहा था अंकल जाकर देखिए जरा।
उसे चिन्ता करने की जरूरत है!चेहरे की झुर्रियाँ गहरी हों गईं।
अरे इतना घबराया था वह, और आप इस तरह। आँखे भी सूजी हुई हैं। क्या हुआ?’
क्या बोलू श्याम, देखो बेटे ने..मेज पर पड़े लिफ़ाफ़ा और पत्र की ओर इशारा कर दिया।
श्याम पढऩे लगा। लिफ़ाफे में पता और टिकट दोनों भेज रहा हूँ। जल्दी आ जाइए। हमने उस घर का सौदा कर दिया है।
सुनकर झर-झर आँसू बहें जा रहें थे। पढ़ते हुए श्याम की भी आँखें नम हो गई। बुदबुदाये इतना नालायक तो नहीं था बब्बू!
रामसिंह के कन्धे पर हाथ रख दिलासा देते हुए बोले- तेरे दोस्त का घर भी तेरा ही है। हम दोनों अकेले बोर हो जाते हैं। साथ मिल जाएगा हम दोनों को भी।
कहते कहते लिफ़ाफा उठाकर खोल लिया। खोलते ही देखा - रिहाइशी एरिया में खूबसूरत विला का चित्र था, कई तस्वीरों में एक फोटो को देख रुक गए। दरवाजे पर नेमप्लेट थी सिंहसरोजा विला। हा! हा! हा! जोर से हँस पड़े।
श्याम तू मेरी बेबसी पर हँस रहा है!
हँसते हुए श्याम बोले- नहीं यारा, तेरे बेटे के मज़ाक पर। शुरू से शरारती है वह।
मज़ाक..!
देख जवानी में भी उसकी शरारत नहीं गयी। कमबख्त ने तुम्हारे बाल्टी भर आँसुओं को फ़ालतू में ही बहवा दिया।कहते हुए दरवाजे वाला चित्र रामसिंह के हाथ में दे दिया।
चित्र देखा तो आँखे डबडबा आईं।
नीचे नोट में लिखा था- बाबा, आप अपने वृद्धाश्रम में अपने बेटे-बहू को भी आश्रय देंगे न।
पढक़र रामसिंह और उनकी पत्नी सरोजा की आँखों से झर-झर आँसू एक बार फिर बह निकले।
लेखक के बारे में : 1/6/73 को इलाहाबाद में जन्म, शिक्षा- बैचलर आफ आर्ट इलाहाबाद विश्वविधालय  (हिंदी, राजनीति शास्त्र, इतिहास)। सम्पर्क: 2/श देवेन्द्र नाथ मिश्रा (पुलिस निरीक्षक), फ़्लैट नंबर-302, हिल हॉउस, खंदारी अपार्टमेंट, खंदारी, आगरा 282002,  मो.-09411418621

भीड़ का हिस्सा

भीड़ का हिस्सा 
 - सुदर्शन रत्नाकर
लम्बे- लम्बे क़दम रखते हुए वह शीघ्रता से सडक़ पर आ गई। रात के नौ बजे थे। पर सर्दी का मौसम होने के कारण लोग कम थे। बस स्टॉप पर भी तीन चार यात्री खड़े थे। पन्द्रह मिनट बीत गए, परन्तु अभी तक बस नहीं आई थी। उसकी परेशानी बढ़ गई। बॉस ने उसे घर छोडऩे के लिए कहा भी था। पर उसने इन्कार कर दिया था। रात के समय यूँ उनके साथ अकेले जाना उसे ठीक नहीं लगा। भले ही उन्हें एक साथ काम करते कितने बरस हो गए हैं लेकिन उसकी सोच ने मना करना ही उचित समझा था। वह ऑफ़िस से समय पर निकल आती है। कभी -कभी देर हो जाती है पर इतना नहीं। आज तो विशेष रूप से मि. आनन्द ने उसे रुकने के लिए कह दिया था। साढ़े पाँच बजे ऑफ़िस बंद होता है, आज उसे काम निपटाते हुए छह बज गए थे। वह बाहर निकल ही रही थी कि वेदपाल उसे बुलाने आ गया था।
मि. मनीष आज छुट्टी पर थे। वह उनके साथ ही नए प्रोजेक्ट पर काम कर रही है, उसी सिलसिले में बॉस ने उसे बुलाया था और कब इतना समय हो गया उसे पता ही नहीं चला।
बस अभी तक नहीं आई थी। उसे घबराहट होने लगी। घर पर उसने फ़ोन तो कर दिया था, पर इतनी देर नहीं होनी चाहिए। संयता को दो दिन से बुखार है। आज वह उसे ऑफ़िस भी नहीं आने दे रही थी। मम्मा, आज मत जाओ, मेरे पास रुक जाओ न प्लीका।लेकिन वह उसकी प्लीकाको अनसुना करके आ गई थी। ऑफ़िस पहुँचने तक उसका मन खऱाब रहा। संयता की आवाज़ उसके कानों में गूँजती रही थी। लेकिन काम में व्यस्त हो जाने के बाद वह जैसे भूल ही गई थी, और अब तो इतनी रात हो गई है। पता नहीं वह कैसी होगी। सृजना की परीक्षाएँ हो रही हैं। शाम के समय वह उसे पढ़ाती है। आज उसने तैयारी भी की होगी कि नहीं। पहले ही वह पढ़ाई में पिछड़ रही है। पिछले टेस्ट में भी उसने कम अंक लिए थे। टीचर ने उसे बुलवाया था। वह जा ही नहीं पाई। ऑफ़िस से घर पहुँचने में ही सात बज जाते हैं। कहाँ से काम शुरू करे, उसकी समझ में नहीं आता।
 सुबह पाँच बजे उठने के साथ ही उसकी दिनचर्या आरम्भ हो जाती है, जो रात ग्यारह बजे तक चलती है। अपने लिए तो उसके पास समय ही नहीं बचता। विवाह से पहले उसे केवल ऑफ़िस जाना होता था इसलिए अच्छा लगता था लेकिन उसके बाद तो सब कुछ बदल गया है। वह एक धुरी बन कर रह गई है जिसके चारों ओर सिद्धार्थ, संयता, सृजना, मम्मीजी, घर परिवार ऑफ़िस सब घूमते हैं। अपनी सोच में वह अपने परिवार-ऑफ़िस को तोलती रहती है, कौन -सा पलड़ा भारी है। मन तो परिवार का साथ देता है लेकिन रहता है ऑफ़िस का ही। कहीं कुछ न कुछ हर बार परिवार के लिए छूट जाता है।
खड़े -खड़े वह थक जाती है। रेलिंग का सहारा लेकर वह फिर सोचने लगती है। वह कई बरस पीछे लौट जाती है। उससे एक वर्ष बड़ा भाई रितिन और वह एक ही कक्षा में थे। बोर्ड की परीक्षा में उसके अंक रितिन से अधिक आए थे और जब पिताजी ने रितिन को इंजीनियरिंग में दाखिला दिलवाने की बात कही तो वह भी जिद्द करने लगी। उस समय लड़कियाँ इंजीनियरिंग कम ही करती थीं। पिताजी तो मान ही नहीं रहे थे। पर माँ ने उसका साथ दिया था। कहीं माँ के अंतर में पढ़ -लिख कर आगे बढऩे की साध थी जो पूरी नहीं हो पाई और अब वह उसके माध्यम से पूरी करना चाहती थीं।
 पिताजी ने कहा था, लड़की को इंजीनियर बनाना क्या ज़रूरी है। बी.ए. कर ले, बाद में प्रशिक्षण लेकर स्कूल में नौकरी कर लेगी।लेकिन माँ ने समझौता नहीं किया था। पिताजी को उनकी बात माननी पड़ी थी। कुछ अलग से बनने, अलग से कर दिखाने की उसकी इच्छा पूरी हो गई थी। कोर्स पूरा होते ही उसकी नौकरी लग गई थी। रितिन को देर से मिली थी। पिताजी को अच्छा नहीं लगा था, पर माँ खुश थी। उन्हें उस पर गर्व था। ऐसा वह कई बार कहती थीं।
उसका ऑफिस नौ बजे का था। वह आठ बजे घर से निकलती और शाम छह बजे तक घर पहुँच जाती थी। घर का काम वह करती नहीं थी। माँ करने ही नहीं देती थी। छुट्टी के दिन वह अवश्य माँ की सहायता करती थी।
एक वर्ष यूँ ही बीत गया और फिर सिद्धार्थ के साथ उसका विवाह हो गया। घर-परिवार, परिवेश, नौकरी सब कुछ बदल जाने से उसके सामने कई चुनौतियाँ आ खड़ी हुईं। विवाह के कुछ समय तक तो कुछ विशेष घटित नहीं हुआ, लेकिन सृजना के जन्म के बाद तो जैसे सब कुछ ही बदल गया था। घर -नौकरी के बीच चलती जिंदगी में सृजना का आगमन ठहराव ले आया था। एक ठंडेपन का अहसास। जीवन से कोई लगाव ही नहीं रहा। इस परिधि के बीच घूमते -घूमते वह शेष सबसे कट गई
मम्मीजी ने तब कहा था,‘सुचिता, घर और बच्चों की देखभाल कारूरी है, नौकरी इतनी नहीं। सिद्धार्थ जितना पा लेता है, उतने से संतोष कर लेंगे।
 उसने कहा था, आज के इस महँगाई के युग में एक अकेले की कमाई से क्या होता है! अच्छा और पूरा जीवन जीने के लिए मेरी नौकरी तो ज़रूरी है। फिर पढ़ -लिख कर यूँ घर  पर बैठना भी तो ठीक नहीं लगता। इतनी अच्छी नौकरी छोड़ी भी तो नहीं जा सकती।
 पर वह पूरा जीवन कहाँ जी पाई है।। विश्लेषण करने पर अपने को नगण्य ही पाती है। बस आत्मसंतुष्टि भर उसके हिस्से में आती है। वह भीड़ में अपनी अलग पहचान बनाना चाहती थी, पर लगता है, वह स्वयं भीड़ का हिस्सा ही नहीं बन पाई, उसमें कहीं खो गई है।
 मम्मीजी ने भी परिस्थितियों के साथ समझौता कर लिया था, नहीं करतीं तो और भी कठिन हो जाता। सुबह वह बहुत- सा काम निपटाने का प्रयत्न करती है फिर भी मम्मीजी का सारा दिन  मेड से काम करवाने और बच्चों की देखभाल में ही निकल जाता है। इस उम्र में यह इच्छा रहती है कि घर सम्भालने में कोई सहायता करे। पर उनकी यह इच्छा पूर्ण नहीं हो पाई। शाम होते -होते वह थक जाती हैं। इधर वह भी थकी-माँदी घर पहुँचती है। दोनों एक दूसरे का मुँह देखती हैं। दोनों को ही आराम की आवश्यकता महसूस होती है। लेकिन मन मसोस कर रह जाती हैं। मम्मीजी तो कभी तबीयत खऱाब होने पर काम नहीं कर पातीं तो ऐसे में बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ घर के दूसरे काम भी पूरे करने होते हैं।
 सिद्धार्थ स्वयं थक कर आते हैं। न भी थके हों तो भी उनकी इच्छा रहती है कि ऑफ़िस से वापिस आने पर चाय मम्मीजी या वह बना कर दें। उनके छोटे-छोटे काम भी उसे ही करने पड़ते हैं। बच्चों को पढ़ाने के लिए कह दे तो भी वह खीझ जाते हैं। आज भी पता नहीं सृजना को टेस्ट की तैयारी करवाई होगी कि नहीं।
उसकी तन्द्रा टूटी। लोगों में हलचल होने लगी थी। शायद बस आ रही थी। वह रेलिंग छोड़ कर आगे आ गई। उसका अनुमान ठीक था, बस आ गई थी। सवारियाँ अधिक हो गई थीं, जैसे-तैसे वह बस में चढ़ गई पर बैठने के लिए जगह नहीं मिल पाई। महिला आरक्षित सीटों पर भी महिलाएँ बैठी थीं। उसने सोचा, इनकी भी देर से घर जाने की कोई विवशता रही होगी। वह भी उनके साथ थोड़ी-सी जगह पर बैठ गई। घर पहुँचते -पहुँचते सवा दस बज चुके थे।
संयता का बुखार अभी नहीं उतरा था। सृजना और मम्मीजी सो गई थीं। उसे ज़ोरों से भूख लगी थी। बिना गर्म किए उसने खाना प्लेट में लिया और खाने लगी। सिद्धार्थ बिस्तर में बैठे कोई मैगज़ीन पढ़ रहे थे। उसकी ओर देखा, मुस्कराए, पर इतनी देर से आने का कारण नहीं पूछा। क्या पूछते! वह जानती है उसका भारी वेतन घर गृहस्थी के बोझ को हल्का करने में कितना सहायक है।
खाना खाकर वह जल्दी से छोटे-मोटे काम निपटाने में लग गई। सुबह उसे फिर ऑफ़िस जाना था।
सम्पर्क: ई-29, नेहरू ग्राँऊड,फऱीदाबाद 121001, मो. 9811251135,
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